लघुकथा - नशा
सर्दी के दिनों की सुबह का समय गांव के नौजवान गुवाड़ में इकट्ठे हो रहे हैं, मुरली भी पीपल के नीचे लगे माइक के पास खड़ा था। कल उसकी माँ की तबियत ज्यादा बिगड़ जाने के कारण रात भर अस्पताल में था। अभी घर पहुंचा ही था कि माइक में बुलावा आ रहा था, धर्म स्थापना और धर्म रक्षार्थ कौन लड़े ?
"बात उन दिनों की है, जब देश में राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद विवाद चरम पर था।
सम्पूर्ण वातावरण - 'बच्चा बच्चा राम का जन्मभूमि के काम का' और 'जन्मभूमि के काम ना आए वो बेकार जवानी है- जिस हिंदू का खून ना खौले, खून नहीं वो पानी है', जैसे नारे गूँजते थे। ग्यारहवीं कक्षा में पढ़ने वाले 15 वर्षीय मुरली घर वालों को बिना बताए कार सेवा हेतु भाग गया। राम शिलाएँ पूजी जा चुकी थीं।
इधर मस्जिद में बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के लोग काफिरों के खात्मे की दुआ करवा रहे थे। "नारा ए तकबीर अल्लाह हूं अकबर", "नारा ए रिसालत या रसूल्लाह" बाबरी हमारी जान है, मुसलमानों की पहचान है।
हम लोग उन दिनों अपने गृहनगर भीलवाड़ा में राम मंदिर के लिए अभियान चला रहे थे। मेरी कार सेवा में शामिल होने की प्रबल इच्छा थी, ताकि अपने स्वयंसेवक होने को और मज़बूती दे सकूँ। अंततः मौक़ा मिल गया और मुझे भी सैकड़ों लोगों के एक बलिदानी जत्थे में शामिल कर लिया गया। हमारी रवानगी से पहले जगह-जगह हमारे जुलूस निकाले गए, मैं बेहद रोमांचित था, मुझे याद है कि हम लोग गले में मालाएँ, सर पर भगवा पट्टी और ललाट पर रक्तिम टीका लगाकर मुट्ठियाँ बाँधे 'जय श्रीराम' तथा 'जय-जय श्री राम' के गगनभेदी नारे लगाते हुए आगे बढ़ रहे थे। उस वक़्त हम सबकी जुबान पर एक ही गीत था- "रामजी के नाम पर जो मर जाएँगे-दुनिया में नाम अपना अमर वो कर जाएँगे।"
मुझे यक़ीन था कि हमारी भिड़ंत ज़रूर मुलायम सिंह की हिंदू द्रोही पुलिस से हो जाएगी और हम मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के नाम पर उनकी जन्मस्थली को मुक्त कराने के लिए अपना आत्मोत्सर्ग कर देंगे। हम एक ट्रेन के जरिए भीलवाड़ा से अजमेर पहुँचे। वहाँ एक धर्मशाला में सैकड़ों और लोग भगवा दुपट्टा ओढ़े पहले से ही जमा थे। इन सबको भी अयोध्या जाना था। सबके मन में एक ही लक्ष्य था, जल्दी से जल्दी राम की जन्मभूमि तक पहुँचना और गुलामी के प्रतीक चिह्न बाबरी ढाँचे को ध्वस्त करना। हमारे साथ संघ (आर.एस.एस.) और विश्व हिंदू परिषद(विहिप) के पदाधिकारीगण भी मौजूद थे। खाना खाने के बाद उन्होंने सबको सामूहिक दिशा-निर्देश दिए कि हमें हर हाल में अयोध्या पहुँचना है। मुलायम सिंह सरकार अगर रोके, गिरफ्तारी करे या दमन करे, इस परिस्थिति में हमें क्या करना है, उनसे कैसे बचना है, कैसे उन्हें चकमा देकर आगे जाना है, यह बताया गया। संघ के वरिष्ठ अधिकारियों का स्पष्ट निर्देश था कि चाहे हमें ख़ुद को क्यों ना मिटाना पड़े, गुलामी के उस कलंक बाबरी मस्जिद को उखाड़ फेंकना है। यह अक्टूबर 1990 की बात है।
मेरा दिल कर रहा था कि उड़कर अभी भगवान श्री राम की नगरी अयोध्या पहुँच जाऊँ और रामलला को 'म्लेच्छ विधर्मियों' के चंगुल से आज ही मुक्त करवा दूँ। आख़िर हिंदुओं के ही देश में हिंदुओं के आराध्य देवता राम की जन्मस्थली पर हम गुलामी का यह बाबरी ढाँचा कब तक बर्दाश्त करेंगे? हमें साफ़-साफ़ आदेश मिल चुका था कि किसी भी क़ीमत पर जान की परवाह किए बगैर हमें अयोध्या पहुँचकर बाबरी मस्जिद के ढाँचे की ओर बढ़ना है। कहा गया कि ढाँचा गिराने के लिए कुदाल, गेंती, फावड़े और सब्बल आदि हमें स्थानीय लोगों की ओर से उपलब्ध करवा दिए जाएँगें।
अब हमारा एकमात्र लक्ष्य था- हर हाल में अयोध्या पहुँचकर बाबरी ढाँचे को गिराना और रामलला को मुक्त करवाना। शाम हुई और हम लखनऊ जाने वाली ट्रेन की ओर बढ़े। हमारे ज़िले भीलवाड़ा से संघ, विहिप तथा भाजपा के कई जाने-माने चेहरे भी साथ आए थे, उन्हें साथ पाकर हमारा हौसला बढ़ रहा था। मैंने मन ही मन भगवान श्री राम को धन्यवाद दिया कि उसने इतना शानदार मौक़ा दिया कि आज मुझे इन बड़े-बड़े लोगों के साथ राम काज के लिए चुना गया। लगा कि आज हर व्यक्ति राम जी के नाम पर शहीद होने को तत्पर है। छोटे-बड़े, अमीर-गरीब, ख़ास या आम आदमी सभी तरह के फ़र्क ख़त्म हो चुके हैं। लोग करोड़ों की दौलत, कारखाने, महल, ऊँचे पद और प्रतिष्ठा सब त्यागकर राम काज करने को आतुर हैं। वाह राम जी क्या गजब लीला है तेरी !
लग रहा था कि यह आजादी की दूसरी जंग है। हम खुद को स्वतंत्रता सेनानी समझकर मन ही मन धन्य हो रहे थे। उत्साह और ख़ुशी के माहौल में हम ट्रेन पर सवार हुए। हम सबको अपना-अपना टिकट दे दिया गया था, यह कहकर कि अगर किसी कारण बिछुड़ जाएँ तो खुद का टिकट तो ख़ुद के पास होना ही चाहिए। हमें भी यह बात ठीक लगी। स्टेशन खचाखच भरा था। जाने वालों से ज़्यादा पहुँचाने वाले आए थे। तनी हुई मुट्ठियों और चीख़ते चेहरों ने अपना पूरा दम-खम 'वंदेमातरम्, जयकारे बजरंगी - हर-हर महादेव और जय-जय श्रीराम' के नारों पर लगा रखा था। इतनी उत्तेजना और शोरगुल मैंने आज से पहले कभी नहीं महसूस किया था। ट्रेन की सीटी बज चुकी थी। हमने भी मुट्ठियाँ बाँधी और पूरा जोर लगाकर चीखे - 'सौंगंध राम की खाते हैं- हम मंदिर वहीं बनाएँगे'। हम खुश थे कि हमारा सफ़र अयोध्या की तरफ शुरू हो चुका था।
ट्रेन सरकने लगी। साथ ही साथ हमारी बोगियों से बड़े-बड़े लोग भी सरकने लगे। अरे यह क्या ? ये भाई साहब क्यों उतर रहे हैं? ये प्रचारक जी क्या यहीं रहेंगे ? हमारे साथ नहीं चलेंगे ? मैंने देखा कि धीरे-धीरे तमाम सारे बड़े लोग, उद्योगपति, संघ प्रचारक, विहिप नेता और भाजपाई लीडरान ट्रेन से उतर गए। सब बड़े लोग हमें अयोध्या रवाना करके अपने घरों की ओर प्रस्थान कर गए। पीछे रह गए हम जैसे जुनूनी दलित, आदिवासी तथा पिछड़े व ग़रीब वर्ग के युवा एवं कुछ साधु-संत और हमें सँभालने के लिए कुछेक छुटभैय्ये नेतागण, जो हमें बता रहे थे कि भाईसाहब दूसरे जत्थों को रवाना करके सीधे अयोध्या पहुँच जाएँगे। हालाँकि उन्हें नहीं आना था, वे कभी नहीं आए, वे समझदार लोग थे, इसलिए घर लौट गए। मुझे समझ में आया कि समझदार लोग सदैव ही हम जैसे जुनूनी लोगों को लड़ाई में धकेलकर अपने-अपने दड़बों में लौट जाते हैं। यही उनका बड़प्पन है, शायद इन्हीं चालाकियों से ही वे बड़े बनते होंगे !
बड़े-बड़े भाई साहबों के अजमेर से ही गायब हो जाने से हम थोड़े असहज तो हुए, थोड़े से उदास और निराश भी। लेकिन जैसे-जैसे ट्रेन ने रफ्तार पकड़ी, निराशा का दौर जाता रहा। हमारा जुनून लौट आया। अगले स्टेशन पर स्थानीय लोगों ने हमारा ज़ोरदार स्वागत किया, खाने को फल दिए, चाय पिलाई। पान, बीड़ी, गुटखा भी मिला लोगों को। सब आनंद से सराबोर हो गए। ट्रेन में ज़्यादातर कारसेवक ही थे, थोड़े-बहुत रेगुलर यात्री भी थे, जो कि सहमे हुए बैठे थे। हमारी बोगी में कुछ मुस्लिम मुसाफ़िर भी थे। हमने उन्हें देखकर खूब नारे लगाए भारत में यदि रहना होगा- वंदे मातरम कहना होगा।' हमने उन्हें जी भरकर घूरा भी। इच्छा तो यह थी कि चलती ट्रेन से बाहर फेंक दें इनको। इन्हीं विधर्मी लोगों की वजह से हमारे भगवान राम एक जीर्ण-शीर्ण ढाँचे में कैद हैं। हमारा देश, हमारे राम और उनकी जन्मस्थली पर इन लोगों के द्वारा मंदिर नहीं बनाने दिया जा रहा है। हम हिंदू अपने ही देश में दोयम दर्जे के नागरिक हो गए हैं और ये म्लेच्छ मज़े ले रहे हैं! चार-चार शादियाँ करके बच्चों की फ़ौज पैदा करके अपनी आबादी बढ़ाते जा रहे हैं। पहले देश बाँट दिया, आधे वहाँ चले गए। बाक़ी हमारी छाती पर मूँग दलने के लिए यहीं रह गए ! ऐसे ही तरह-तरह के विचारों के चलते मैं इन मुस्लिम मुसाफ़िरों के प्रति नफ़रत के अतिरेक में डूबा हुआ था। उस वक़्त मुझमें इतना गुस्सा था कि अगर मेरे हाथ में हथियार होते तो राम जन्मभूमि की मुक्ति से पहले ही इन यवन, मुग़ल, पठान विधर्मियों को जिंदगी से मुक्त कर देता। कुछ तो माँ भारती का बोझ हल्का होता! हमारी नफ़रत से घूरती आँखों ने उन्हें ज़रूर आतंकित किया होगा, लेकिन हमें तो उन्हें इस तरह सहमे, सिमटे और भयभीत देखकर बहुत आनंद आया। जीवन में पहली बार लगा कि इनको हमने औक़ात दिखा दी है।
अच्छा हुआ, वो लोग चुपचाप ही रहे, वरना उस रात कुछ भी हो सकता था।खैर, रात गहराती जा रही थी। धीरे-धीरे नींद पलकों पर हावी होने लगी। भजनों, नारों और गीतों का कोलाहल शांत हो गया। कारसेवक अब सो रहे थे, या यों समझ लीजिए कि सो ही चुके थे। मैंने अपनी उनींदी आँखों से देखा कि बाक़ी के यात्री अब थोड़ी राहत महसूस कर रहे थे हम राम के भक्तों से। फिर हम सो गए एक मीठी-सी नींद, जिसमें सरयू किनारे बसी भगवान श्री राम की नगरी अयोध्या में प्रवेश का सुंदर सा सपना था और जिसे जल्दी ही साकार होना था।
रात कब बीती पता ही नहीं चला। सुबह-सुबह किसी टुंडला नामक स्टेशन पर मचे भारी शोरगुल ने नींद उड़ाई। कारसेवकों में हड़कंप-सा मचा हुआ था। पुलिस ने ट्रेन रुकवा रखी थी। शायद आगे नहीं जाने देंगे। जाँच शुरू हुई। सारे कारसेवक धरे गए, टिकटें हमसे ले ली गई और सबको स्टेशन पर उतार लिया गया। पूरा स्टेशन कारसेवकों से अट गया था, अलसुबह फिर से गगन भेदते उन्मादी नारे हवा में गुंजायमान थे- 'रोके चाहे सारी दुनिया, रामलला हम आएँगे, सौगंध राम की खाते है-हम मंदिर वहीं बनाएँगे।' पर हमारी शपथ पूरी न हो सकी। 'मुल्ला' यम की सरकार ने हमें रोक लिया था। हमें गिरफ्तार कर लिया गया था। रात का धुँधलका अब छँटने लगा था। भोर के उजास में हमने अपने आपको भेड़-बकरियों की तरह पुलिस के ट्रक में भरे हुए पाया। पहले मथुरा इंटर कॉलेज ले जाए गए। जगह नहीं मिलने पर वहाँ से आगरा के बहुद्देशीय स्टेडियम में बनाए गए अस्थायी जेल कैम्प में ले जाए गए। वहाँ भी क्षमता से अधिक लोग पहले से ही बंद थे। इसलिए तक़रीबन 80 कारसेवक बाहर ही रह गए। उनमें से एक मैं भी था, हमने इसी जेल में जाने की जिद की, नारे लगाए, हंगामा किया, धरना दिया। तब कहीं जाकर हमें उसी अस्थायी जेल में दूँसा गया।
काफ़ी जद्दोजहद के बाद हमें जेल में प्रवेश का सौभाग्य मिला। अंदर घुसे। जेल क्या थी, बड़ा-सा ग्राउंड था, जिसमें टेंट लगे हुए थे। दीवारें इतनी छोटी कि कोई भी कूदकर बाहर निकल सकता था, लेकिन बाहर कहाँ जाते ? आगरा शहर में तो कर्फ्यू लगा हुआ था। पुलिस पीछे पड़ी थी। इलाक़ा अनजान था। हमें प्रेरित करके शहीदी जत्थे में भेजने वाले सारे परम पूज्य भाई साहब लोग तो अजमेर से ही वापस चले गए थे। अब यहाँ पर हम जुनूनी जवान थे या थे वीतरागी संतगण, चिलमची, अफ़ीमची, गंजेड़ी, भंगेड़ी। उनमें से कइयों ने तो गाँजा पीना शुरू कर दिया और एक-दो को छोड़कर बाक़ी सब मस्त हो गए।
अब तो हम थे और हमारी यह अस्थायी जेल थी। ऊपर टेंट, नीचे दरी, खाने में सबसे घटिया गुणवत्ता वाली कंकर पत्थर युक्त दाल, जली हुई रोटियाँ, बेस्वाद पानी और पुलिस वालों की झिड़कियाँ खाते-खाते किसी तरह अपनी जिंदगी की पहली 10 दिवसीय जेल यात्रा पूरी की। इस तरह हम चले तो थे राम जन्मभूमि के लिए और पहुँचे कृष्ण जन्मभूमि में (जेल में)! मन में फिर भी गर्व था कि भगवान श्री राम के लिए जेल जाकर आए हैं, हम 'कारसेवक' हैं!
जिस दिन हमें जेल से रिहा किया गया, हमारे नाम-पते लिखे गए। हाथों पर जेल की मुहर लगाई गई और फिर छोड़ दिया गया। वैसे भी जेल में जेल जैसा कुछ था ही नहीं। अंदर ही संघ की शाखा लगती। खूब बातें होतीं, साधु-संत अपना भजन, कीर्तन और प्रवचन करते रहते थे। जेल जैसी तो कोई बात थी ही नहीं। जेल प्रवास पूरा हुआ तो जो ट्रक हमें लाए थे, वो गायब थे। बस यूँ ही छोड़ दिए गए। शहर में अभी भी कर्फ्यू जारी था। सो तय यह हुआ कि रेल की पटरियों पर होकर स्टेशन पहुँचा जाए। पटरी-पटरी हम आगरा कैंट की ओर चले। बलिदानी मानस अब थोड़ा थक चुका था। कारसेवा सफल नहीं रही थी। पता चला कि धर्मद्रोही, मुस्लिम परस्त मुलायम सिंह ने सरयू के पुल पर ही कारसेवकों पर गोलियाँ चलवा दी। दर्जनों कारसेवक मौत का ग्रास बन गए। कइयों को गोली लगी तो कई सारे गोली लगने के डर से वेगवती सरयू के पानी में कूदकर काल कवलित हो गए। बाबरी मस्जिद का ढाँचा तोड़ना तो दूर की बात, पुलिस की सख्ती के चलते परिंदा भी वहाँ पर नहीं मार सका। वाक़ई मुलायम कारसेवकों के लिए 'मुल्ला-यम' साबित हुए।
असफलता, घनघोर निराशा तथा डर और अवसाद की स्थिति में हम किसी तरह रेंगते हुए से रेल पटरियों पर आगरा कैंट की ओर बढ़ रहे थे। अचानक सामने से तक़रीब एक दर्जन लोग 'जय श्रीराम' के नारे लगाते हुए आते दिखाई दिए, हममें पुनः जोश का स्फुरण होने लगा। ओह, कर्फ्यू के बावजूद रामभक्त हमारे स्वागत को आ गए है! इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है? बहुत अच्छा लगा। हमने अपने अंदर उत्साह महसूस किया, हमारे क़दम ख़ुद-ब-खुद उठने लगे।
... पर यह क्या ? इनके तो हाथों में पत्थर हैं! अब इनकी ज़बान से जय श्रीराम नहीं निकल रहा था, हमारी सात पुश्तों तक उनकी भद्दी गालियाँ पहुँच रही थी-मादर... बहन..., यहाँ क्या... पकड़ने आए हो... मारो, मादर... को...' हम तो स्तब्ध रहगए। आँखों के आगे अँधेरा छाने लगा। आसपास की बस्ती की ओर मदद के लिए हमने कातर निगाहों से देखा। मगर सब तरफ इनकार ही इनकार के भाव थे। दरअसल इस रेल पटरी के चारों ओर सिर्फ मुस्लिम बस्ती ही थी। सामने से आए इन मुस्लिम युवाओं से छोटा-सा संघर्ष हुआ। कुछ लोगों को चोटें आई, सामान भी गिरा। एक कारसेवक होतुमल सिन्धी की उन्होंने पकड़कर जमकर पिटाई की। वह भारी शरीर था, भाग नहीं पाया, उनके हत्थे चढ़ गया। वे हमारे पीछे भी दौड़े, पत्थर फेंके, हम आगे-आगे और वो पीछे-पीछे।
किसी तरह जान बचाने के लिए हमने रेलवे पुलिस थाने की शरण ली। जीआरपी के थानेदार के श्रीमुख से भी हजारों गालियों की बौछार से हम नहाए। जिस पुलिस से मदद की उम्मीद थी, वही लट्ठ लेकर मारने को पीछे दौड़ी। पीछे पत्थर बरसाते मुल्ले और आगे लाठियाँ लिए खड़े ठुल्ले! हे भगवान, अब कहाँ जाएँ, हे राम जी! आप ही जान बचाओ अब हमारी...। एक क्षण तो लगा कि अब मौत ही हमारा अंतिम मुक़ाम है। लेकिन जहाँ 'राम रक्षा मंत्र' नहीं चल पाया, वहाँ 'रेल रक्षा यंत्र' ने काम किया। आगरा कैंट पर खड़ी एक मालगाड़ी के ख़ाली डिब्बों में घुसकर हमने दरवाजे बंद करके किसी तरह जान बचाई। गालियाँ देते मुस्लिम नौजवान और पुलिसकर्मी जब वापस चले गए, तब हमारी रुकी हुई साँसें फिर से चलने लगी। मालगाड़ी के डिब्बों से निकलकर हम वापस स्टेशन पर खड़े हुए। बाद में जयपुर की ओर जाने वाली किसी ट्रेन में हम सवार हुए। ट्रेन में भारी भीड़ थी। टॉयलेट के पास खड़े रहने भर की जगह मिली। टिकट भी खरीद नहीं पाए, बेटिकट ही बैठ गए थे। भारी भीड़, भय और पाखाने की भयंकर दुर्गंध सब एकाकार हो गए थे। कारसेवा के दौरान शहीद होने की इच्छा अब तक शहीद हो चुकी थी, एक ही इच्छा थी कि जल्दी से जल्दी घर पहुँचा जाए। घर पर परिजनों के हाल बेहाल थे अयोध्या की ख़बरें सुन-सुनकर। चूँकि हम दोनों ही भाई इस कारसेवा का हिस्सा बनने चले गए थे। इसलिए माँ-बाप ने सोच लिया कि हम जरूर पुलिस की गोली के शिकार हो गए होंगे और इस तरह वे बेऔलाद... मगर न तो हमें रामजी के नाम पर मौत आई और न ही वो निःसंतान हुए। महज 15 दिनों में हम घर लौट आए... सही सलामत, एकदम जिंदा सकुशल !
मेरे भाई साहब जिनका नाम बद्रीलाल मेघवंशी है, वे मुझसे 3 वर्ष बड़े हैं, उनको बचपन में ही हमारे ताऊ गोकुल जी के यहाँ दत्तक के रूप में ले जाया गया था, जब वे मात्र 6 माह के थे। वैसे तो उनका कभी आरएसएस से सीधा जुड़ाव नहीं रहा, पर हमारे गाँव के एग्रीकल्चर सुपरवाइजर रामेश्वर लाल तोतला के मोटीवेशनसे वे भी अयोध्या चल पड़े। बाद में राजनीतिक कारणों से उन्होंने भाजपा ज्वॉइन कर ली, लेकिन तब भी वे संघी नहीं हो पाए, भाजपा में भी तहसील कार्यकारिणी तक ही सीमित रहे। अंततः उन्होंने अपना ध्यान बिजनेस पर केंद्रित कर लिया। आजकल वे ट्रांसपोर्ट व ठेकेदारी के काम में हैं और दलित कन्फेडरेशन ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (डिक्की) के भीलवाड़ा जिले के अध्यक्ष है।