Thursday, 29 January 2026

पेपर 1.4 पारिवारिक विधि - हिंदू विधि (Hindu Law)

Family Laws - Hindu Laws (Acts And Ruls)
डॉ. भीमराव अंबेडकर विधि विश्वविद्यालय, जयपुर
LLB प्रथम सेमेस्टर के हिन्दू विधि का 
          पेपर 1.4 का पाठ्यक्रम 
UNIT - I: पारिवारिक विधि के स्रोत और अनुप्रयोग
1.1 भारत में व्यक्तिगत विधियों (Personal Laws) का विकास
1.2 हिन्दू विधि - स्रोत और अनुप्रयोग
1.3 समअंशी (Coparcenary) संयुक्त परिवार संपत्ति और स्व-अर्जित संपत्ति, कर्ता, उसकी शक्तियां और उसके कर्तव्य।1.4 धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्त मंदिरों और ट्रस्टों से संबंधित कानूनी प्रावधान।
1.5 पारिवारिक विधि में उभरते रुझान: समलैंगिक विवाह और लिव-इन रिलेशनशिप
यूनिट - II: हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955
2.1 वैध हिन्दू विवाह की शर्तें: विवाह की रस्में और पंजीकरण, शून्य और शून्यकरणीय विवाह।
2.2 दाम्पत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना और न्यायिक पृथक्करण
2.3 शून्य और शून्यकरणीय विवाह से उत्पन्न बच्चों की वैधता, ऐसे विवाहों से जन्मे बच्चों के कानूनी अधिकार।
2.4 तलाक और इसके आधार: तलाक की कार्यवाही में वैकल्पिक राहत, आपसी सहमति से तलाक।
2.5 तलाक पर एक साल की रोक, तलाकशुदा व्यक्ति दोबारा कब शादी कर सकते हैं, अधिकार क्षेत्र और अदालती प्रक्रिया।
यूनिट - III: हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 एवं हिन्दू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956
3.1 हिन्दू पुरुष की संपत्ति का उत्तराधिकार, संयुक्त परिवार (Coparcenary) संपत्ति के हित में उत्तराधिकार के नियम।
3.2 हिन्दू महिला की संपत्ति, महिला की संपत्ति पर उसका पूर्ण अधिकार, और महिला की संपत्ति के उत्तराधिकार के नियम।
3.3 उत्तराधिकार के सामान्य नियम और अयोग्यताएं: अयोग्यता के आधार राजगामी संपत्ति (Escheat), न्यायिक प्रतिक्रियाएं।
हिन्दू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956
3.4 वैध दत्तक ग्रहण (गोद लेने) की आवश्यकताएं: गोद लेने की पात्रता, गोद देने की पात्रता, दत्तक ग्रहण के कानूनी प्रभाव और अन्य विविध प्रावधान।
3.5 पत्नी, बच्चों और माता-पिता का भरण-पोषण, विधवा पुत्रवधू का भरण-पोषण, आश्रित और उनका भरण-पोषण, भरण-पोषण की राशि का निर्धारण, न्यायिक प्रतिक्रियाएं।
यूनिट-IV: हिन्दू अप्राप्तवयता और संरक्षकता अधिनियम, 1956
4.1 प्राकृतिक संरक्षक और उनकी शक्तियां, वसीयती संरक्षक और उनकी शक्तियां, तथ्यतः संरक्षक (De Facto Guardian)।
4.2 संरक्षकता के सामान्य प्रावधान, न्यायिक प्रतिक्रियाएं।
4.3 हिन्दू विधि के तहत विभाजन - अर्थ, विभाजन योग्य संपत्ति, विभाजन के लिए वाद, दायर करने के हकदार व्यक्ति, अंशों का आवंटन और विभाजन कैसे प्रभावी होता है।
4.4 अंशों का निर्धारण - विभाजन को पुनः खोलना, और पुनर्मिलन
4.5 ऋण - पवित्र बाध्यता का सिद्धांत (Doctrine of Pious Obligation), पूर्ववर्ती ऋण (Antecedent Debts), न्यायिक प्रतिक्रियाएं।
प्रमुख वाद (LEADING CASES)
01. शास्त्री यज्ञपुरुषदासजी vs.मूलदास 
02. बिपिन चंद्र vs. प्रभावती
03. डॉ. नारायण गणेश दस्तने vs. सुचेता दस्तने
04. धर्मेन्द्र कुमार vs.उषा कुमार
05. तुलसामा vs. शेषा रेड्डी
06. सरला मुद्गल vs.भारत संघ
07. विनीता शर्मा vs. राकेश शर्मा 
08. सरोज रानी vs. सुदर्शन कुमार
09. गीता हरिहरन vs. RBI 
10. पिंकी जैन vs. संजय जैन
11. भवरूलाल vs. गिरधारीलाल
12. यमुनावती vs. अनंतराव
13. अश्वनी कुमार बनाम राज्य (1998)

मुख्य विषय
विवाह- कानूनी प्रक्रियाएं और प्रतिबंध (प्रतिषिद्ध नातेदारी)।
तलाक- विवाह विच्छेद के आधार और प्रक्रियाएं।
उत्तराधिकार- संपत्ति के बंटवारे के नियम, जिसमें बेटों और बेटियों के अधिकार शामिल हैं (हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम द्वारा संशोधित)।
गोद लेना और संरक्षकता- बच्चों के गोद लेने और उनके अभिभावकत्व से संबंधित नियम।
पारिवारिक मामले- संयुक्त परिवार और भरण-पोषण से जुड़े नियम।
आधुनिक हिन्दू विधि - आधुनिक हिन्दू कानून, औपनिवेशिक काल में विकसित हुआ और स्वतंत्रता के बाद कानूनों (जैसे हिंदू कोड बिल) के माध्यम से संहिताबद्ध किया गया। यह अब प्राचीन सिद्धांतों और आधुनिक विधायी प्रावधानों का मिश्रण है, जिसका उद्देश्य समानता और सामाजिक न्याय सुनिश्चित करना है।

भारत में व्यक्तिगत विधियों (Personal Laws) का विकास - भारत में व्यक्तिगत विधियों का विकास एक दिन की घटना नहीं है। यह सदियों के इतिहास, विभिन्न धर्मों की परंपराओं और ब्रिटिश शासन के हस्तक्षेप का परिणाम है। इस इतिहास को हम चार भागों में बांट सकते हैं- 
1. प्राचीन काल (Ancient Period) - 
प्राचीन भारत में व्यक्तिगत कानून धर्म पर आधारित थे।
I. हिन्दू विधि - यह वेदों, स्मृतियों (जैसे मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति) और प्रथाओं पर आधारित थी। समाज में 'धर्म' ही कानून था।
II. मुस्लिम विधि - मध्यकाल में जब मुस्लिम शासक आए, तो उन्होंने शरीयत (कुरान, हदीस, इज्मा और कियास) के आधार पर कानून लागू किए।
2. ब्रिटिश काल, एक महत्वपूर्ण मोड़ - 
अंग्रेजों ने भारत के प्रशासन को संभालने के लिए कानूनों का संहिताकरण शुरू किया, लेकिन उन्होंने लोगों के निजी मामलों में हस्तक्षेप करने से परहेज किया।
I. वारेन हेस्टिंग्स की योजना (1772) - उन्होंने घोषणा की कि विरासत, विवाह, जाति और अन्य धार्मिक रीति-रिवाजों के मामलों में हिन्दुओं के लिए हिन्दू शास्त्र और मुसलमानों के लिए कुरान के नियम लागू होंगे।
II. विभाजन - यहीं से भारत में समान नागरिक संहिता के बजाय व्यक्तिगत कानून की जड़ें मजबूत हुईं। हालांकि, 
A. सती प्रथा उन्मूलन (1829) और 
B. हिन्दू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम (1856) 
जैसे कुछ सुधार शास्त्रों से अलग किए गए।
3. स्वतंत्रता के बाद, सुधार का युग - आज़ादी के बाद, भारतीय संविधान के निर्माताओं ने महसूस किया कि पुराने कानूनों में सुधार की ज़रूरत है, विशेषकर महिलाओं के अधिकारों के लिए।
A. हिन्दू कोड बिल (1955-56) - डॉ. B.R. अंबेडकर के प्रयासों से हिन्दू कानून को संहिताबद्ध किया गया। इसे चार प्रमुख अधिनियमों में बांटा गया - 
I. हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955
II. हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956
III. हिन्दू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956
IV. हिन्दू अप्राप्तवयता और संरक्षकता अधिनियम, 1956
B.मुस्लिम विधि - यह आज भी बड़े पैमाने पर असंहिताबद्ध है और प्रथाओं तथा शरीयत अधिनियम, 1937 पर आधारित है।
4. आधुनिक रुझान और न्यायपालिका- 
वर्तमान में, व्यक्तिगत कानूनों का विकास अब संसद के बजाय सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों से अधिक हो रहा है।
सुधार
ट्रिपल तलाक (सायरा बानो केस), शबरीमला विवाद और 
विनीता शर्मा केस (बेटियों का संपत्ति में अधिकार) 
जैसे फैसलों ने व्यक्तिगत विधियों को आधुनिक और अधिक न्यायपूर्ण बनाया है।
5. समान नागरिक संहिता (UCC) - संविधान का अनुच्छेद 44 पूरे भारत के लिए समान कानून की बात करता है, जो वर्तमान में चर्चा का विषय है।
निष्कर्ष - भारत में व्यक्तिगत विधियां विविधता में एकता का प्रतीक हैं। जहाँ हिन्दू कानून पूरी तरह लिखित और आधुनिक है, वहीं अन्य समुदायों के कानून अभी भी परंपराओं और न्यायिक व्याख्याओं के माध्यम से विकसित हो रहे हैं। 
हिंदू कोड बिल - हिंदू कोड पारित करना भारतीय कानूनी और सामाजिक इतिहास की सबसे क्रांतिकारी घटनाओं में से एक थी। इसे पारित करने के पीछे गहरे सामाजिक, राजनैतिक और कानूनी कारण थे।
यहाँ इसके मुख्य कारण दिए गए हैं - 
1. महिलाओं को समान अधिकार देना - यह सबसे प्रमुख कारण था। प्राचीन हिंदू कानून में महिलाओं की स्थिति काफी गौण थी। उन्हें संपत्ति में अधिकार नहीं था और वे पूरी तरह से पिता या पति पर निर्भर थीं।
∆. संपत्ति का अधिकार - महिलाओं को संपत्ति में सीमित रुचि के बजाय पूर्ण अधिकार देना।
∆. समानता - डॉ. अंबेडकर का मानना था कि जब तक महिलाओं को बराबरी का दर्जा नहीं मिलेगा, देश प्रगति नहीं कर सकता।
2. हिंदू कानून का संहिताकरण - उस समय हिंदू कानून वेदों, स्मृतियों और विभिन्न स्थानीय प्रथाओं में बिखरा हुआ था।
∆. भ्रम को दूर करना - अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग नियम थे (जैसे मिताक्षरा और दायभाग)। एक स्पष्ट और लिखित कानून की जरूरत थी ताकि न्यायपालिका को फैसले लेने में आसानी हो।
∆. एकरूपता - पूरे भारत के हिंदुओं के लिए एक समान कानून लागू करना।
3. सामाजिक कुरीतियों का अंत - समाज में प्रचलित ऐसी प्रथाओं को खत्म करना जो मानवाधिकारों के खिलाफ थीं:
∆. बहुविवाह - पुरुषों को एक से अधिक पत्नी रखने की अनुमति थी, जिसे खत्म कर 'एकविवाह' (Monogamy) को अनिवार्य बनाना था।
∆.बाल विवाह - शादी के लिए एक कानूनी उम्र तय करना।
4. तलाक का कानूनी प्रावधान - हिंदू धर्म में विवाह को एक अटूट संस्कार माना जाता था, जहाँ तलाक की कोई जगह नहीं थी।
∆. विकल्प देना - यदि कोई वैवाहिक जीवन नर्क बन जाए, तो विशेष परिस्थितियों में कानूनी रूप से अलग होने का अधिकार देना अनिवार्य समझा गया।
5. आधुनिक और लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना - भारत नया लोकतांत्रिक राष्ट्र बना था। संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 15 (भेदभाव का निषेध) को प्रभावी बनाने के लिए पुराने और भेदभावपूर्ण व्यक्तिगत कानूनों को बदलना जरूरी था।
एक रोचक ऐतिहासिक जानकारी - हिंदू कोड बिल का इतना कड़ा विरोध हुआ था कि इसे एक बार में पारित नहीं किया जा सका। अंततः इसे चार अलग-अलग हिस्सों में बांटकर (1955-56 में) पारित किया गया। डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने इस बिल के विरोध और इसमें हो रही देरी के कारण ही कानून मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था।

हिंदू कोड बिल का विरोध - हिन्दू कोड बिल के खिलाफ हुए विरोध के मुख्य बिंदु और इस संघर्ष की पूरी कहानी यहाँ दी गई है। यह आपके ब्लॉग के लिए एक बेहतरीन ऐतिहासिक विश्लेषण साबित हो सकता है।
हिन्दू कोड बिल के विरोध के प्रमुख कारण
जब डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने इस बिल को पेश किया, तो उन्हें संसद के भीतर और बाहर भारी विरोध का सामना करना पड़ा। विरोधियों के तर्क - 
1. धर्म के मामले में राज्य का हस्तक्षेप -
रूढ़िवादी समूहों का तर्क था कि हिन्दू कानून ईश्वरीय है (वेदों और स्मृतियों से प्रेरित है)। उनके अनुसार, संसद एक धर्मनिरपेक्ष संस्था है और उसे धार्मिक कानूनों को बदलने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।
2. अविभाजित परिवार की संरचना का टूटना - विरोधियों का मानना था कि यदि बेटियों को संपत्ति में हिस्सा दिया गया, तो इससे संयुक्त हिन्दू परिवार (HUF) की व्यवस्था बिखर जाएगी। उन्हें डर था कि संपत्ति परिवार से बाहर चली जाएगी।
3. विवाह की पवित्रता पर खतरा - हिन्दू धर्म में विवाह को अटूट संस्कार माना जाता था। तलाक के प्रावधान को पेश करने पर कहा गया कि यह पश्चिमी सभ्यता का प्रभाव है और इससे भारतीय समाज की पारिवारिक मर्यादा नष्ट हो जाएगी।
4. केवल हिन्दुओं के लिए ही क्यों - एक बड़ा तर्क यह भी दिया गया कि यदि सरकार आधुनिकता लाना चाहती है, तो वह केवल हिन्दू कानूनों को क्यों बदल रही है? समान नागरिक संहिता (UCC) की मांग करते हुए पूछा गया कि मुस्लिम और अन्य धर्मों के कानूनों को क्यों नहीं छुआ जा रहा।
संघर्ष का परिणाम अंबेडकर का इस्तीफा - विरोध इतना प्रबल था कि तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को भी कदम पीछे खींचने पड़े। इस देरी और बिल के स्वरूप को छोटा करने से नाराज़ होकर सितंबर 1951 में डॉ. अंबेडकर ने कानून मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया। बाद में, 1952 के चुनावों के बाद, नेहरू सरकार ने इस बिल को चार अलग-अलग हिस्सों में पेश किया ताकि विरोध को कम किया जा सके - 
I. हिन्दू विवाह अधिनियम (1955)
II. हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम (1956)
III. हिन्दू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम (1956)
IV. हिन्दू अप्राप्तवयता और संरक्षकता अधिनियम (1956)
आज की स्थिति - आज हम देखते हैं कि जो बदलाव उस समय विनाशकारी बताए गए थे, उन्हीं बदलावों ने हिन्दू समाज को अधिक न्यायपूर्ण और प्रगतिशील बनाया है। 2005 और 2020 के संशोधनों ने तो बेटियों को बेटों के बिल्कुल बराबर खड़ा कर दिया है।

1. Sources of Hindu Law (हिंदू विधि के स्रोत) -  
A. प्राचीन स्रोत 
श्रुति (Shruti)
चार वेद - 
1. ऋग्वेद - देवी देवताओं की स्तुति।
2. यजुर्वेद - यज्ञ, मंत्र एवं यज्ञ विधि।
3. सामवेद - संगीतबद्ध मंत्र जो यज्ञों में गाए जाते हैं।
4. अथर्ववेद - तंत्र विद्या, औषधि और जादू टोना होता है।
छः वेदांग - 
1. शिक्षा - उच्चारण एवं स्वर शास्त्र
2. कल्प - यज्ञों की विधि एवं नियम
3. व्याकरण - संस्कृत व्याकरण
4. छंद - वैदिक छंदों का उद्यियियन 
5. निरुप्त/निर्वचन - शब्दों का युक्ति शास्त्र
6. ज्योतिष - काल एवं ग्रह स्थिति की गणना
स्मृति - मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य (मिताक्षरा)स्मृति, नारद स्मृति आदि
अठारह पुराण - 
1. ब्रह्मपुराण
2. शिवपुराण
3. मार्कण्डेयपुराण 
4. ब्रह्मवैवर्त पुराण 
5. स्कंद पुराण 
6. मत्स्य पुराण
7. पद्म पुराण
8. भागवत पुराण
9. अग्नि पुराण
10. लिंग पुराण
11. वामन पुराण
12. गरुड़ पुराण
13. विष्णु पुराण
14. नारद पुराण
15. शिविद्य पुराण
16. वाराह पुराण
17. कूर्मपुराण
18. ब्राह्मण पुराण
प्रथा एवं आचार- (Customs & Usages) समाज द्वारा मान्य प्रथा, रिवाज व परंपराएँ।
B. आधुनिक स्त्रोत - 
न्यायिक निर्णय - अदालतों के फैसले, नजीर।
विधि - संसद द्वारा बनाए गए कानून (जैसे Hindu Marriage Act, 1955)।
02. हिंदू विधि की शाखाएँ - 
अ. मिताक्षरा - 
पूरे भारत में मान्य (सिवाय बंगाल व असम के कुछ भाग के) जिसमें संयुक्त परिवार और सहृदायिकता पर जोर, स्त्रियों का संपत्ति पर अधिकार सीमित था (हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम 2005 01.01.2005 के बाद लागू)
हिंदू विधि की बुनियादी विधि मिताक्षरा - केवल किताब नहीं, वह कानूनी विचारधारा है जिससे सदियों तक भारत (पश्चिम बंगाल और असम को छोड़कर) के हिंदू परिवारों के उत्तराधिकार और संपत्ति के नियम चलते रहे हैं।
मिताक्षरा विधि की मुख्य बातें - 
यह ऋषि विज्ञानेश्वर (याज्ञवल्क्य स्मृति पर आधारित) द्वारा 11वीं शताब्दी में लिखी गई महान टीका है जिसे हिंदू कानून की एक शाखा माना जाता है।
मिताक्षरा की मुख्य विशेषताएं - 
जन्म से अधिकार - मिताक्षरा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि एक पुत्र (2005 के बाद पुत्री भी) अपने पिता की पैतृक संपत्ति में जन्म लेते ही हिस्सेदार बन जाता है। उसे पिता की मृत्यु का इंतजार नहीं करना पड़ता।
संयुक्त/अविभक्त हिंदू परिवार (HUF) - यह विचारधारा संयुक्त हिंदू परिवार की अवधारणा पर जोर देती है, जहाँ संपत्ति पूरे परिवार की होती है और उसका प्रबंधन कर्ता (आमतौर पर पिता) करता है।
उत्तरजीविता का सिद्धांत (Doctrine of Survivorship) - पुराने मिताक्षरा नियम के अनुसार, यदि परिवार के किसी सदस्य की मृत्यु हो जाती है, तो उसका हिस्सा बाकी जीवित सदस्यों में मिल जाता था (इसे 2005 के संशोधन द्वारा काफी हद तक बदल दिया गया है)
संशोधन - आधुनिक कानून में स्थिति (2005 का संशोधन)
हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 ने मिताक्षरा के कई पुराने नियमों को बदल दिया था, लेकिन सबसे बड़ा बदलाव 9 सितंबर 2005 को आया।
1. बेटियां सहृदायिक - अब मिताक्षरा परिवार में बेटियों को भी बेटों के बराबर सह-दायक (Coparcener) माना जाता है। अब बेटी का भी पैतृक संपत्ति में उतना ही अधिकार है जितना बेटे का, चाहे उसका जन्म 2005 से पहले ही क्यों न हुआ हो।
वर्तमान में - आज के समय में शुद्ध मिताक्षरा नियम कम और हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम (संशोधित) ज्यादा प्रभावी है, लेकिन पैतृक संपत्ति की जो भी व्याख्या आज अदालतें करती हैं, उसका आधार यही मिताक्षरा विचारधारा है।
ब. दायभाग Dayabhaga
मुख्यतः बंगाल और असम में
पुत्रों को पिता की संपत्ति में अधिकार पिता की मृत्यु के बाद ही मिलता है।
दायभाग विचारधारा मुख्य रूप से जीमूतवाहन द्वारा रचित ग्रंथ पर आधारित है। यह विचारधारा बंगाल और असम के क्षेत्रों में लागू रही है। मिताक्षरा जहाँ जन्म से अधिका' की बात करता है, वहीं दायभाग का दर्शन पूरी तरह से अलग है।
दायभाग की मुख्य विशेषताएं - 
1. जन्म से कोई अधिकार नहीं - दायभाग के अनुसार, पुत्र को पिता की संपत्ति में जन्म से कोई अधिकार नहीं मिलता। संपत्ति पर पुत्र का अधिकार केवल पिता की मृत्यु के बाद ही शुरू होता है।
2. पिता का पूर्ण अधिकार - जब तक पिता जीवित है, वह अपनी संपत्ति (चाहे वह पैतृक हो या खुद की कमाई हुई) का पूर्ण स्वामी होता है। वह उसे बेच सकता है, दान कर सकता है या किसी को भी दे सकता है। पुत्र उसे ऐसा करने से कानूनी रूप से नहीं रोक सकता।
उत्तरजीविता (Survivorship) का अभाव - इसमें उत्तरजीविता का नियम लागू नहीं होता। यदि किसी सदस्य की मृत्यु हो जाती है, तो उसका हिस्सा उसके उत्तराधिकारियों (जैसे उसकी पत्नी या बच्चों) को जाता है, न कि परिवार के बाकी पुरुष सदस्यों में बंटता है।
बंटवारे का अधिकार - चूंकि पुत्रों का जन्म से कोई हक नहीं होता, इसलिए वे पिता के जीवित रहते संपत्ति के बंटवारे (Partition) की मांग नहीं कर सकते।
मिताक्षरा और दायभाग में प्रमुख अंतर
लेखक - ऋषि ज्ञानेश्वर की याज्ञवल्क्य स्मृति पर टीका = जीमूतवाहन द्वारा लिखित पुस्तक
अधिकार - जन्म से = पिता की मृत्यु के बाद।
पिता की शक्ति - सीमित (पैतृक संपत्ति के मामले में) = असीमित (स्वामी के रूप में)।
बंटवारा - पुत्र कभी भी मांग सकता है = पिता की मृत्यु के बाद ही संभव।
क्षेत्र - शेष भारत = बंगाल और असम
स्त्रियों का अधिकार - पहले बहुत सीमित था (2005 के बाद बदला) = विधवा को पति का हिस्सा प्राप्त करने का अधिकार शुरू से ही बेहतर था।
आधुनिक समय में महत्व - 1956 के हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम (और 2005 के संशोधन) ने पूरे भारत में उत्तराधिकार के नियमों को काफी हद तक एक समान कर दिया है, लेकिन संपत्ति के स्वरूप को समझने के लिए आज भी इन विचारधाराओं का संदर्भ लिया जाता है।
निष्कर्ष - 
∆ दायभाग में व्यक्ति की मृत्यु के बाद ही उत्तराधिकार तय होता है।
∆ मिताक्षरा में परिवार के सह-दायिकी (Coparcenary) का विचार आज भी पैतृक संपत्ति के मामलों में बहुत महत्वपूर्ण है।

हिंदू संयुक्त परिवार (HUF) में कर्ता - संयुक्त हिंदू परिवार में कर्ता का स्थान सबसे महत्वपूर्ण होता है। सरल शब्दों में कहें तो कर्ता परिवार का मुखिया या प्रबंधक (Manager) होता है।
मिताक्षरा कानून के अनुसार, परिवार के सभी मामलों और संपत्ति का संचालन कर्ता के माध्यम से ही होता है।
संयुक्त हिंदू परिवार Hindu Undivided Family (HUF) - 
HUF हिंदू कानून की वह सबसे बड़ी इकाई है जिसकी नींव पर कर्ता और सह-दायिकी टिके हुए हैं जो केवल एक कानूनी शब्द नहीं है, बल्कि यह एक सामाजिक और धार्मिक संस्था है जो भारत में सदियों से चली आ रही है।
1. संयुक्त हिंदू परिवार - एक संयुक्त हिंदू परिवार में वे सभी लोग शामिल होते हैं जो एक ही सामान्य पूर्वज के वंशज होते हैं। इसमें उनकी पत्नियाँ और अविवाहित पुत्रियाँ भी शामिल होती हैं।
HUF के मुख्य बिंदु - 
स्थापना - यह किसी समझौते या कॉन्ट्रैक्ट से नहीं बनता, बल्कि कानून के संचालन से बनता है। जब एक बच्चा जैसे ही परिवार में जन्म लेता है, वह इस परिवार का हिस्सा बन जाता है।
निरंतरता - जब तक परिवार का कोई एक पुरुष या महिला सदस्य जीवित है, तब तक HUF का अस्तित्व बना रहता है। यह एक पूर्वज की मृत्यु के बाद भी खत्म नहीं होता।
2. HUF के सदस्य - 
A. सामान्य पूर्वज- सबसे बुजुर्ग व्यक्ति (जिससे वंश शुरू होता है)।
B. वंशज - उनके पुत्र, पौत्र (पोते), प्रपौत्र और अब पुत्रियाँ भी।
C. पत्नियां - परिवार के पुरुष सदस्यों की पत्नियां जो विवाह के बाद इस परिवार का हिस्सा बनती हैं।
D. दत्तक बच्चे (Adopted Children) - जिन्हें कानूनी रूप से गोद लिया गया हो।
नोट - एक पुत्री विवाह के बाद अपने पति के HUF का हिस्सा बन जाती है, लेकिन वह अपने पिता के परिवार में सह-दायक (Coparcener) हमेशा बनी रहती है।
4. HUF के प्रमुख लक्षण - 
साझा रसोई और पूजा - पारंपरिक रूप से, एक HUF वह है जहाँ लोग एक साथ खाते हैं, एक साथ पूजा करते हैं और एक ही संपत्ति का उपभोग करते हैं।
कर्ता का नेतृत्व - परिवार का प्रबंधन कर्ता के हाथ में होता है (जैसा कि हमने पहले चर्चा की थी)।
आयकर लाभ - भारत के इनकम टैक्स कानून में HUF को एक अलग इकाई (Unit) माना जाता है। यानी HUF के नाम पर अलग से पैन कार्ड (PAN Card) बन सकता है और टैक्स में छूट ली जा सकती है।
HUF का अंत - HUF तब समाप्त होता है जब - 
1. परिवार के सदस्य आपस में पूर्ण बंटवारा कर लें।
2. परिवार में केवल एक ही सदस्य जीवित बचे (क्योंकि परिवार होने के लिए कम से कम दो सदस्यों का होना जरूरी है)।

कर्ता - 
1. कर्ता कौन -
. (वरिष्ठतम पुरुष सदस्य) सामान्यतः परिवार का सबसे बुजुर्ग पुरुष सदस्य ही कर्ता बनता है परन्तु
2005 के संशोधन के बाद, अब परिवार की वरिष्ठतम महिला सदस्य भी कर्ता बन सकती है विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा सुप्रीम कोर्ट, के बाद यह और भी स्पष्ट हो गया।
ब. कनिष्ठ सदस्य - यदि सभी सदस्य सहमत हों, तो वरिष्ठ सदस्य की अनुपस्थिति या उसकी इच्छा पर परिवार का कोई छोटा सदस्य भी कर्ता बन सकता है।
2. कर्ता की शक्तियाँ (Powers) - 
कर्ता के पास व्यापक अधिकार होते हैं, लेकिन वे असीमित नहीं हैं - 
अ. संपत्ति का प्रबंधन - वह परिवार की आय और खर्च का हिसाब रखता है। वह तय करता है कि परिवार के किस सदस्य को कितनी सुविधा मिलेगी।
ब. आय पर अधिकार - परिवार के सभी सदस्यों की कमाई (जो साझा व्यवसाय से हो) कर्ता के पास आती है।
स. कर्ज लेने का अधिकार - परिवार के व्यवसाय या जरूरतों के लिए वह कर्ज ले सकता है।
द. संपत्ति बेचना या गिरवी रखना - यह सबसे महत्वपूर्ण शक्ति है। कर्ता परिवार की संपत्ति को केवल तीन विशेष स्थितियों में ही बेच या हस्तांतरित कर सकता है - 
A. कानूनी आवश्यकता (Legal Necessity) - जैसे परिवार का कर्ज चुकाना, बच्चों की शिक्षा या विवाह, या सरकारी टैक्स भरना।
B. संपत्ति के लाभ के लिए (Benefit of Estate) - जैसे पुरानी नुकसानदेह संपत्ति बेचकर कोई लाभ वाली संपत्ति खरीदना।
C. धार्मिक कार्यों के लिए (Pious Duties) - जैसे पूर्वजों का श्राद्ध या आवश्यक धार्मिक अनुष्ठान।
3. कर्ता की जिम्मेदारियाँ (Duties) - 
अ. भरण-पोषण - परिवार के प्रत्येक सदस्य (पत्नी, बच्चे, विधवाएं आदि) को भोजन, निवास, शिक्षा और चिकित्सा सुविधा प्रदान करना।
ब. हिसाब-किताब देना - वैसे तो कर्ता को हर छोटी बात का हिसाब देने की जरूरत नहीं होती, लेकिन यदि कोई सदस्य बंटवारा (Partition) मांगता है, तो कर्ता को परिवार की संपत्ति और आय का सही विवरण देना पड़ता है।
स. शादी का दायित्व - परिवार की अविवाहित बेटियों की शादी करना कर्ता की कानूनी जिम्मेदारी है।
4. कर्ता की स्थिति (Legal Position) 
कर्ता परिवार का एजेंट (Agent) या ट्रस्टी (Trustee) नहीं होता, बल्कि उसकी स्थिति इन सबसे ऊपर और अनोखी होती है। वह परिवार का मुखिया होता है और उसके द्वारा सद्भावना (Good Faith) में किए गए निर्णय परिवार के सभी सदस्यों पर बाध्यकारी होते हैं।
निष्कर्ष - कर्ता परिवार का वह धागा है जो पूरे परिवार और उसकी संपत्ति को जोड़कर रखता है। यदि कर्ता अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करता है, तो परिवार के अन्य सदस्य अदालत में उसे चुनौती दे सकते हैं।

सह दायिकी (Coparcenary) - कर्ता के बाद सह-दायिकी को समझना सबसे महत्वपूर्ण है। अगर कर्ता परिवार का मैनेजर है, तो सह-दायक उस संपत्ति के असली हिस्सेदार हैं।
हिंदू कानून में सह-दायिकी एक छोटा समूह होता है जो संयुक्त हिंदू परिवार (HUF) के भीतर ही मौजूद होता है।
सह-दायिकी उन सदस्यों का समूह है जिनके पास परिवार की पैतृक संपत्ति में जन्म से अधिकार होता है।
एक साथ स्वामित्व - जब तक बंटवारा नहीं होता, पूरी संपत्ति पर सभी सह-दायकों का समान अधिकार होता है।
हिस्से में उतार-चढ़ाव - सह-दायिकी में किसी सदस्य के जन्म लेने पर हर सदस्य का हिस्सा कम हो जाता है और किसी सदस्य की मृत्यु होने पर हिस्सा बढ़ जाता है।
सह-दायक कौन - पारंपरिक रूप से, इसमें परिवार की चार पीढ़ियां शामिल होती हैं:
1. स्वयं (माना कि पिता)
2. पुत्र/पुत्री
3. पौत्र/पौत्री (Grandson)
4. प्रपौत्र/प्रपौत्री (Great Grandson)
महत्वपूर्ण बदलाव (2005) - पहले केवल पुरुष ही सह-दायक होते थे, लेकिन 9 सितंबर 2005 के बाद कानून बदल गया। अब बेटियां भी अपने पिता की सह-दायिकी में बेटे के बराबर की हिस्सेदार हैं।
सह-दायक के अधिकार - एक सह-दायक के पास निम्नलिखित प्रमुख अधिकार होते हैं:
अ. बंटवारे का अधिकार (Right to Partition) - कोई भी सह-दायक कभी भी परिवार की संपत्ति से अपना हिस्सा मांग सकता है और बंटवारा करवा सकता है।
ब. संपत्ति का संयुक्त आनंद - उसे परिवार के घर में रहने और संपत्ति का उपयोग करने का पूरा हक है।
स. अवैध हस्तांतरण को रोकना - यदि कर्ता (मुखिया) बिना किसी कानूनी आवश्यकता के संपत्ति बेचता है, तो सह-दायक अदालत जाकर उसे रोक सकता है।
द. हिस्से का वसीयत करना - अब सह-दायक अपने हिस्से की वसीयत (Will) भी कर सकता है।
संयुक्त परिवार - और सह-दायिकी में अंतर - 
इन दोनों को अक्सर एक ही समझ लिया जाता है, लेकिन इनमें कानूनी अंतर है - 
आधार - संयुक्त हिंदू परिवार = सहदायिकी
सदस्य - इसमें पति, पत्नी, बच्चे और उनकी पत्नियां—सब शामिल = इसमें केवल वे सदस्य शामिल हैं जिनका संपत्ति में जन्म से अधिकार है।
दायरा - इसका दायरा बहुत बड़ा होता है = यह HUF के भीतर एक छोटा हिस्सा है।
अधिकार - सभी सदस्यों को भरण-पोषण का हक है, लेकिन बंटवारा मांगने का नहीं। = हर सह-दायक को संपत्ति के बंटवारे की मांग करने का कानूनी हक है।
HUF (बड़ा घेरा)- इसमें परिवार के सभी लोग (माता, पत्नी, विधवाएं, बच्चे) शामिल हैं। इन सबको संपत्ति में रहने और भरण-पोषण (Maintenance) का अधिकार है, लेकिन सबको बंटवारा मांगने का हक नहीं है।
सह-दायिकी (छोटा घेरा)- इसमें केवल वे सदस्य हैं जो संपत्ति के मुख्य हिस्सेदार हैं और जो बंटवारा (Partition) मांग सकते हैं।
निष्कर्ष - सहदायिकी ही वह व्यवस्था है जो यह सुनिश्चित करती है कि पैतृक संपत्ति परिवार की अगली पीढ़ियों तक सुरक्षित रहे। 2005 के बाद बेटियों के शामिल होने से अब यह अधिकार और भी न्यायपूर्ण हो गया है।

धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्त मंदिरों और ट्रस्टों से संबंधित कानूनी प्रावधान - 
धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्त से संबंधित कानूनी ढांचा भारत में काफी विस्तृत है, जिसमें केंद्र और राज्य दोनों के कानून शामिल हैं। इसका मुख्य उद्देश्य मंदिरों और ट्रस्टों की संपत्तियों का सही प्रबंधन और उनके धार्मिक उद्देश्यों की पूर्ति सुनिश्चित करना है।
प्रमुख कानूनी प्रावधानों - 
1. संवैधानिक प्रावधान - भारत का संविधान धार्मिक संस्थानों के प्रबंधन के लिए मौलिक अधिकार प्रदान करता है - 
I. अनुच्छेद 25 - सभी व्यक्तियों को अपने धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है।
II. अनुच्छेद 26 - धार्मिक संप्रदायों को अपने स्वयं के धार्मिक और धर्मार्थ संस्थान स्थापित करने, उनका प्रबंधन करने और  चल और अचल संपत्ति के स्वामित्व का अधिकार देता है।
III. अनुच्छेद 25(2) - राज्य को धार्मिक प्रथाओं से जुड़ी आर्थिक, वित्तीय या राजनीतिक गतिविधियों को विनियमित करने की शक्ति देता है।
2. केंद्रीय कानून - कुछ प्रमुख कानून पूरे भारत या विशिष्ट क्षेत्रों में लागू होते हैं।

I. धार्मिक विन्यास अधिनियम, 1863 -
यह सरकार को मंदिरों और मस्जिदों के सीधे प्रबंधन से अलग करने और इसे स्थानीय समितियों को सौंपने हेतु किया गया प्रावधान है। यह कानून भारत में ब्रिटिश काल के दौरान बनाया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य मंदिरों, मस्जिदों और अन्य धार्मिक संस्थानों के प्रबंधन से सरकार (तब की ब्रिटिश सरकार) को सीधे तौर पर अलग करना था।
अधिनियम विशेषताएं और प्रावधान - 
1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि - 1863 से पहले, ब्रिटिश सरकार स्वयं धार्मिक संस्थानों के राजस्व और प्रशासन की देखभाल करती थी (मद्रास और बंगाल के विनियमों के तहत)। ईसाई मिशनरियों और अन्य दबाव समूहों के विरोध के बाद सरकार ने धार्मिक मामलों से हाथ खींचने का फैसला किया और यह कानून बनाया।
2. अधिनियम के मुख्य प्रावधान - 
A. प्रबंधन का हस्तांतरण धरा 3 व 4
धारा 3 - उन संस्थानों के लिए है जहाँ प्रबंधन की नियुक्ति का अधिकार सरकार के पास था। यहाँ सरकार को एक स्थानीय समिति बनानी थी जिसे सारा प्रबंधन सौंप दिया गया।
धारा 4:- उन संस्थानों के लिए है जहाँ प्रबंधन का उत्तराधिकार निजी तौर पर (वंशानुगत या धार्मिक परंपरा के अनुसार) तय होता था। यहाँ सरकार ने सीधे हस्तक्षेप बंद कर दिया और प्रबंधन को संबंधित ट्रस्टी या प्रबंधक को वापस कर दिया।
B. स्थानीय समितियों की भूमिका धारा 7 से 12 - 
I. अधिनियम के तहत नियुक्त समितियों का कार्यकाल सामान्यतः जीवन भर के लिए होता है।
II. ये समितियाँ ट्रस्टियों, प्रबंधकों या अधीक्षकों के कामकाज की निगरानी करती हैं।
C. अदालती हस्तक्षेप धारा 14 - यह इस अधिनियम की सबसे महत्वपूर्ण धारा है - 
I. कोई भी व्यक्ति जिसकी उस संस्थान में धार्मिक रुचि हो, वह प्रबंधन के खिलाफ दीवानी अदालत में मुकदमा दायर कर सकता है।
II. यह मुकदमा कर्तव्य की उपेक्षा (Neglect of Duty) या भरोसे के उल्लंघन (Breach of Trust) के आधार पर किया जा सकता है।
III. अदालत को अधिकार है कि वह भ्रष्ट प्रबंधक को पद से हटा दे या संस्थान की संपत्ति के संरक्षण के लिए आदेश जारी करे।
3. अधिनियम की सीमाएं - 
I. सीमित दायित्व- यह अधिनियम केवल प्रबंधन की बात करता है, यह धार्मिक अनुष्ठानों या प्रथाओं में हस्तक्षेप नहीं करता।
II. सक्रियता की कमी - चूंकि सरकार ने स्वयं को हटा लिया था, इसलिए समितियों में होने वाले भ्रष्टाचार को रोकने के लिए कोई बाहरी सरकारी तंत्र नहीं बचा था (जब तक कि कोई अदालत न जाए)।
III. केवल विशिष्ट संस्थान - यह उन धार्मिक संस्थानों पर लागू नहीं होता जो 1863 के बाद बने या जो निजी प्रकृति के थे।
4. वर्तमान प्रासंगिकता - आज के समय में, कई राज्यों (जैसे तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश) ने अपने स्वयं के हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्त अधिनियम (HR&CE Acts) बना लिए हैं, जिन्होंने 1863 के अधिनियम की जगह ले ली है। हालांकि उन क्षेत्रों या संस्थानों में जहाँ कोई विशेष राज्य कानून नहीं है, वहाँ आज भी 1863 के अधिनियम के प्रावधानों और सिद्धांतों का उल्लेख किया जाता है।

II. धर्मार्थ बंदोबस्त अधिनियम, 1890 - यह उन संपत्तियों के प्रशासन के लिए है जो धर्मार्थ उद्देश्यों के लिए समर्पित हैं।
भारत में धर्मार्थ संपत्तियों के प्रशासन और उनके संरक्षण के लिए बनाया गया एक महत्वपूर्ण केंद्रीय कानून है। जहाँ 1863 का अधिनियम मुख्य रूप से 'धार्मिक' संस्थानों के लिए था, वहीं 1890 का यह कानून 'धर्मार्थ' (Charitable) उद्देश्यों पर अधिक केंद्रित है।
यहाँ इस अधिनियम के प्रमुख पहलुओं का विवरण दिया गया है:
1. अधिनियम का मुख्य उद्देश्य - इस कानून का प्राथमिक उद्देश्य धर्मार्थ संपत्तियों (जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, गरीबों की सहायता आदि के लिए दान की गई संपत्ति) को सुरक्षित रखना और उनके प्रबंधन के लिए एक 'सरकारी ट्रस्टी' की व्यवस्था करना है। यह सुनिश्चित करता है कि दान दी गई संपत्ति का उपयोग केवल उसी उद्देश्य के लिए हो जिसके लिए उसे समर्पित किया गया था।
2. प्रमुख प्रावधान और कार्यप्रणाली - 
A. धर्मार्थ बंदोबस्त कोषाध्यक्ष -
I. इस अधिनियम के तहत, सरकार एक अधिकारी की नियुक्ति करती है जिसे धर्मार्थ बंदोबस्त कोषाध्यक्ष कहा जाता है।
II. यह अधिकारी एक निगम के रूप में कार्य करता है, जिसका अर्थ है कि वह अपने पद के नाम पर संपत्ति रख सकता है और कानूनी कार्रवाई कर सकता है।
B. संपत्ति का निहित होना धारा 4 - 
I. जब कोई व्यक्ति अपनी संपत्ति किसी धर्मार्थ कार्य के लिए देना चाहता है, तो वह आवेदन कर सकता है कि उसकी संपत्ति 'कोषाध्यक्ष' के नाम कर दी जाए।
II. एक बार संपत्ति कोषाध्यक्ष के पास निहित हो जाने पर, वह सुरक्षित हो जाती है और उसे निजी स्वार्थ के लिए नहीं बेचा जा सकता।
C. प्रबंधन की योजना - Section 5)
I. कोषाध्यक्ष स्वयं संपत्ति का प्रबंधन या प्रशासन (Administration) नहीं करता है। वह केवल संपत्ति का 'कस्टोडियन' (रक्षक) होता है।
II. संपत्ति का वास्तविक प्रबंधन एक प्रबंधन योजना के तहत उन लोगों द्वारा किया जाता है जिन्हें संपत्ति समर्पित करने वाले व्यक्ति ने नियुक्त किया हो।
3. धर्मार्थ उद्देश्य की परिभाषा - इस अधिनियम के अनुसार, धर्मार्थ उद्देश्यों में निम्नलिखित शामिल हैं - 
I. गरीबों की राहत
II. शिक्षा
III. चिकित्सा सहायता
IV. सार्वजनिक उपयोगिता का कोई अन्य उद्देश्य
नोट - इसमें विशुद्ध रूप से धार्मिक उद्देश्यों को शामिल नहीं किया गया है, क्योंकि उनके लिए 1863 का अधिनियम मौजूद था।
4. अधिनियम की मुख्य विशेषताएं - 
I. स्वैच्छिक प्रकृति - यह अधिनियम अनिवार्य नहीं है। कोई भी व्यक्ति स्वेच्छा से अपनी संपत्ति इस अधिनियम के दायरे में ला सकता है।
II. पारदर्शिता - चूँकि संपत्ति सरकारी कोषाध्यक्ष के नाम होती है, इसलिए गबन या धोखाधड़ी की संभावना कम हो जाती है।
III. निरंतरता - ट्रस्टी बदलते रह सकते हैं, लेकिन कोषाध्यक्ष के पास संपत्ति होने के कारण कानूनी निरंतरता बनी रहती है।
5. 1863 और 1890 के अधिनियम में अंतर - 
धार्मिक विन्यास अधिनियम, 1863 = धर्मार्थ बंदोबस्त अधिनियम, 1890
I. मुख्य ध्यान - धार्मिक संस्थान (मंदिर/मस्जिद) = धर्मार्थ संस्थान (स्कूल/अस्पताल)
II. नियंत्रण - स्थानीय समितियों द्वारा = सरकारी कोषाध्यक्ष द्वारा (कस्टडी)
III. हस्तक्षेप - सरकार ने स्वयं को अलग कर लिया = सरकार एक सुरक्षित रक्षक की भूमिका निभाती है
IV. उद्देश्य - प्रबंधन का हस्तांतरण = संपत्ति का संरक्षण

III. भारतीय न्यास अधिनियम, 1882 - यह मुख्य रूप से निजी ट्रस्टों पर लागू होता है। सार्वजनिक और धार्मिक ट्रस्ट अक्सर इसके दायरे से बाहर होते हैं, लेकिन इनके सिद्धांतों का उपयोग मार्गदर्शन के लिए किया जाता है।
भारत में निजी न्यासों को विनियमित करने वाला मुख्य कानून है। यह अधिनियम परिभाषित करता है कि एक ट्रस्ट कैसे बनाया जाता है, ट्रस्टी के कर्तव्य क्या हैं और लाभार्थियों के अधिकार क्या होते हैं।
महत्वपूर्ण पहलु - 
1. न्यास (Trust) - अधिनियम की धारा 3 के अनुसार, न्यास एक ऐसा दायित्व है जो संपत्ति के स्वामित्व से जुड़ा होता है। इसमें एक व्यक्ति (Settlor) अपनी संपत्ति किसी दूसरे व्यक्ति (Trustee) को इस विश्वास के साथ सौंपता है कि वह उसका उपयोग किसी तीसरे व्यक्ति (लाभार्थी) के लाभ हेतु करेगा।
2. ट्रस्ट के तीन मुख्य पक्ष - 
I - न्यासकर्ता (Author/Settlor) - वह व्यक्ति जो विश्वास प्रकट करता है और संपत्ति सौंपता है।
II. न्यासी (Trustee) - वह व्यक्ति जो संपत्ति स्वीकार करता है और उसका प्रबंधन करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य है।
III. हितग्राही (Beneficiary) - वह व्यक्ति जिसके लाभ के लिए ट्रस्ट बनाया गया है।
3. ट्रस्ट का निर्माण धारा 6 - 
एक वैध ट्रस्ट बनाने के लिए पांच निश्चितताएं आवश्यक हैं - 
I. इरादा - स्पष्ट इरादा कि एक ट्रस्ट बनाया जा रहा है।
II. उद्देश्य - ट्रस्ट का उद्देश्य कानूनी होना चाहिए।
III. हितग्राही - स्पष्ट होना चाहिए कि लाभ किसे मिलेगा।
IV. ट्रस्ट की संपत्ति - वह संपत्ति स्पष्ट होनी चाहिए जिसे ट्रस्ट में स्थानांतरित किया जा रहा है।
V. स्थानांतरण - संपत्ति का ट्रस्टी को हस्तांतरण अनिवार्य है।
4. ट्रस्टी के कर्तव्य और अधिकार
I. कर्तव्य - ट्रस्ट की शर्तों का पालन करना, संपत्ति की रक्षा करना, निष्पक्ष रहना और खातों का सही विवरण रखना।
II. अधिकार - ट्रस्ट के प्रबंधन में किए गए खर्चों की प्रतिपूर्ति प्राप्त करना और अदालत से मार्गदर्शन मांगना।
5. लाभार्थियों के अधिकार - 
I. निरीक्षण का अधिकार - ट्रस्ट के दस्तावेजों और खातों को देखने का अधिकार।
II. लाभ प्राप्त करना - ट्रस्ट की आय या संपत्ति से अपना हिस्सा प्राप्त करना।
III. ट्रस्टी को हटाना - यदि ट्रस्टी अपना कर्तव्य निभाने में विफल रहता है, तो लाभार्थी उसे हटाने के लिए अदालत जा सकता है।
6. यह अधिनियम का लागू होना - यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि भारतीय न्यास अधिनियम, 1882 सार्वजनिक या धार्मिक न्यासों पर लागू नहीं होता है।
I. यह केवल निजी ट्रस्टों (जैसे परिवार के सदस्यों या विशिष्ट व्यक्तियों के लिए बनाए गए ट्रस्ट) पर लागू होता है।
II. सार्वजनिक और धार्मिक ट्रस्टों के लिए राज्य-विशिष्ट कानून (जैसे चैरिटी कमिश्नर के नियम) लागू होते हैं।
7. अधिनियम की समाप्ति - 
एक ट्रस्ट तब समाप्त हो जाता है जब - 
I. उसका उद्देश्य पूरा हो गया हो।
II. उसका उद्देश्य गैर-कानूनी हो गया हो।
III. न्यासकर्ता द्वारा उसे रद्द कर दिया गया हो।
3. राज्य-विशिष्ट कानून - भारत में मंदिरों का नियंत्रण अक्सर राज्य सरकारों के पास होता है, विशेषकर दक्षिण भारत में:
I. तमिलनाडु हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्त अधिनियम, 1959 - यह राज्य में मंदिरों के प्रशासन के लिए सबसे प्रमुख कानूनों में से एक है।
II. कर्नाटक हिंदू धार्मिक संस्थान और धर्मार्थ बंदोबस्त अधिनियम, 1997 - यह कर्नाटक में मंदिरों और ट्रस्टों के पंजीकरण और प्रबंधन को नियंत्रित करता है।
III. बॉम्बे पब्लिक ट्रस्ट एक्ट, 1950 - महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्यों में सार्वजनिक ट्रस्टों (चाहे वे धार्मिक हों या नहीं) के पंजीकरण और नियंत्रण के लिए यह एक व्यापक कानून है।
4. प्रमुख विधिक सिद्धांत - 
मंदिरों और ट्रस्टों के प्रबंधन में कुछ महत्वपूर्ण कानूनी अवधारणाएँ उपयोग की जाती हैं:
I. मूर्ति की विधिक स्थिति - हिंदू कानून के तहत, मंदिर की मूर्ति को एक न्यायिक व्यक्ति माना जाता है, जो संपत्ति रख सकती है और मुकदमा कर सकती है।
II. शेबियत/ट्रस्टी - मूर्ति की संपत्ति का प्रबंधन करने वाले व्यक्ति को शेबियत या प्रबंधक कहा जाता है। उनके पास संपत्ति के प्रबंधन के व्यापक अधिकार होते हैं, लेकिन वे इसके मालिक नहीं होते।
III. साइ-प्रिस का सिद्धांत - यदि किसी ट्रस्ट का मूल उद्देश्य पूरा होना असंभव हो जाए, तो अदालत उस धन को उसी तरह के किसी अन्य धर्मार्थ उद्देश्य में लगाने का आदेश दे सकती है।
5. प्रबंधन और विवाद - 
पंजीकरण - अधिकांश राज्यों में धार्मिक ट्रस्टों को चैरिटी कमिश्नर के पास पंजीकृत कराना अनिवार्य है।
II. लेखापरीक्षा - ट्रस्टों को अपने खातों का विवरण सरकार को देना होता है ताकि धन का दुरुपयोग न हो।
III. हस्तक्षेप - यदि प्रबंधन में भ्रष्टाचार या लापरवाही पाई जाती है, तो राज्य सरकार या अदालत प्रशासक नियुक्त कर सकती है।

पारिवारिक विधि (हिंदू कोड) और समलैंगिक विवाह - वर्तमान में यह मुद्दा भारतीय समाज का गंभीर मुद्दा है।
1. हिंदू कोड और विवाह की परिभाषा - हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के अनुसार हिंदू कानून के तहत विवाह को विनियमित करता है।
धारा 5 - यह धारा विवाह की शर्तों को परिभाषित करती है। इसमें शब्दावली का उपयोग दूल्हा और दुल्हन के रूप में किया गया है।
पारंपरिक दृष्टिकोण - हिंदू विवाह कोपरम्परागत संस्कार माना गया है जो एक पुरुष और एक महिला के बीच होता है। कानून की वर्तमान व्याख्या इसी लैंगिक द्वैतवाद पर आधारित है।
2. समलैंगिक विवाह पर सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय (2023) - समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने की मांग को लेकर 
सुप्रियो चक्रवर्ती बनाम भारत संघ 2023
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की पांच न्यायाधीशों की बेंच ने अक्टूबर 2023 में फैसला सुनाया।
न्यायालय के मुख्य निष्कर्ष - 
∆. विवाह का मौलिक अधिकार नहीं - कोर्ट ने माना कि संविधान के तहत विवाह करने का कोई मौलिक अधिकार नहीं है।
∆. संसद का अधिकार क्षेत्र - कोर्ट ने स्पष्ट किया कि समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देना या हिंदू विवाह अधिनियम और विशेष विवाह अधिनियम में बदलाव करना संसद का काम है, न्यायपालिका का नहीं।
∆. अधिकारों की रक्षा - हालांकि कोर्ट ने विवाह की मान्यता नहीं दी, लेकिन केंद्र सरकार को एक समिति बनाने का निर्देश दिया जो समलैंगिक जोड़ों को मिलने वाले राशन कार्ड, बैंकिंग, और विरासत जैसे प्रशासनिक अधिकारों पर विचार करे।
3. हिंदू कोड में समलैंगिक विवाह की चुनौतियाँ - यदि समलैंगिक विवाह को हिंदू कोड के तहत शामिल किया जाता है, तो कई अन्य कानूनों में बदलाव की आवश्यकता होगी - 
I. शब्दों में बदलाव - धारा 5 (HMA) शब्द दूल्हा और दुल्हन
II. लिंग में बदलाव - शब्दों को लिंग तटस्थ बनाना होगा।
III. दत्तक ग्रहण - हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 के तहत समलैंगिक जोड़ों के गोद लेने के अधिकारों को स्पष्ट करना होगा।
IV. उत्तराधिकार - हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 में पति/पत्नी की परिभाषा में बदलाव की आवश्यकता होगी ताकि समलैंगिक साथी को कानूनी वारिस माना जा सके।
V. भरण-पोषण - धारा 18 (HAMA) और धारा 24 से 25 (HMA) के तहत गुजारा भत्ता के प्रावधानों को संशोधित करना होगा। |
4. समलैंगिक अधिकारों के पक्ष और विपक्ष में तर्क
पक्ष में तर्क - 
I. समानता (अनुच्छेद 14) - कानून के समक्ष सभी समान हैं, इसलिए लैंगिक आधार पर विवाह से वंचित करना भेदभावपूर्ण है।
II. निजता और गरिमा (अनुच्छेद 21) - अपने जीवनसाथी को चुनने का अधिकार व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा है।
विपक्ष में तर्क - 
I. सांस्कृतिक और धार्मिक परंपरा - हिंदू विवाह को धार्मिक अनुष्ठान माना जाता है, जिसका उद्देश्य संतानोत्पत्ति और धर्म का पालन है।
II. कानूनी जटिलता - विवाह केवल शारीरिक मिलन नहीं, कई सामाजिक और कानूनी अधिकारों का आधार है, जो वर्तमान में लिंग-आधारित हैं।
5. वर्तमान स्थिति (2026 तक) - अभी 
विशेष विवाह अधिनियम, 1923 - 
भारत में समलैंगिक जोड़ों को सिविल यूनियन या विवाह की कानूनी मान्यता प्राप्त नहीं है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार गठित सरकारी समितियाँ उनके व्यावहारिक और प्रशासनिक मुद्दों (जैसे नॉमिनेशन और संयुक्त खाते) के समाधान पर कार्य कर रही हैं।

लीव-इन रिलेशनशिप (Live-in Relationship) - लीव इन रिलेशनशिप का अर्थ है दो वयस्क आपसी सहमति से बिना विवाह किए एक ही छत के नीचे पति-पत्नी की तरह रहते हैं। भारत में इसके लिए कोई विशिष्ट कानून (जैसे विवाह के लिए हिंदू विवाह अधिनियम है) नहीं है, लेकिन माननीय सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों ने इसे कानूनी मान्यता और सुरक्षा प्रदान की है।
1. कानूनी स्थिति - भारत में लीव-इन रिलेशनशिप अवैध नहीं है।
स्वतंत्रता का अधिकार - सर्वोच्च न्यायालय ने माना है कि अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के तहत दो वयस्कों को अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ रहने का अधिकार है।
विवाह जैसी प्रकृति - कानून केवल उन्हीं जोड़ों को सुरक्षा देता है जो समाज के सामने खुद को पति-पत्नी की तरह पेश करते हैं और एक लंबी अवधि तक साथ रहते हैं। केवल वाकिंग-इन और वाकिंग-आउट (दोस्त की तरह थोड़े समय साथ रहना) को लीव-इन की कानूनी सुरक्षा नहीं मिलती।
2. महिलाओं के अधिकार - घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम 2005, लीव-इन में रहने वाली महिलाओं को विशेष सुरक्षा देता है - 
घरेलू हिंसा से सुरक्षा - यदि पार्टनर शारीरिक, मानसिक या आर्थिक शोषण करता है, तो महिला शिकायत दर्ज करा सकती है।
भरण-पोषण -
चन्मुनिया बनाम वीरेंद्र कुमार सिंह कुशवाहा 
इस मामले में कोर्ट ने माना कि यदि जोड़ा लंबे समय तक साथ रहा है, तो महिला धारा 125 (CRPC/BNSS) के तहत गुजारा भत्ता मांग सकती है।
साझा घर में रहने का अधिकार - महिला को उस घर से जबरन नहीं निकाला जा सकता जहाँ वे साथ रह रहे थे।
3. बच्चों के अधिकार और वैधता - लीव-इन रिलेशनशिप से पैदा हुए बच्चों के संबंध में कानून बहुत स्पष्ट और प्रगतिशील है:
वैधता - सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि ऐसे बच्चों को नाजायज नहीं माना जाएगा। उन्हें समाज में एक वैध संतान का दर्जा प्राप्त है।
संपत्ति में अधिकार - ऐसे बच्चे अपने माता-पिता की स्व-अर्जित संपत्ति में उत्तराधिकार के हकदार होते हैं।
अभिभावकत्व (Guardianship) - बच्चों के पालन-पोषण और संरक्षण की जिम्मेदारी दोनों (माता-पिता) की होती है।
4. प्रमुख अदालती दिशानिर्देश -
वेलुसामी vs. डी पंचाइमल 
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने लीव-इन को विवाह जैसी प्रकृति का मानने के लिए कुछ शर्तें तय की हैं - 
I. आयु - दोनों पार्टनर की उम्र विवाह के योग्य (लड़का 21, लड़की 18) होनी चाहिए।
II. स्थिति - वे अविवाहित होने चाहिए (या कानूनी रूप से तलाकशुदा)।
III. ईच्छा - वे स्वेच्छा से साथ रह रहे हों।
IV. सामाजिक प्रदर्शन - उन्होंने दुनिया के सामने खुद को पति-पत्नी की तरह प्रस्तुत किया हो।
5. वर्तमान बदलाव (Uttarakhand UCC) - हाल ही में उत्तराखंड राज्य ने समान नागरिक संहिता (UCC) लागू की है, जिसमें लीव-इन रिलेशनशिप के लिए अनिवार्य पंजीकरण का प्रावधान किया गया है। यदि जोड़ा पंजीकरण नहीं कराता है, तो उन्हें दंड या जेल की सजा हो सकती है। यह भारत का पहला ऐसा कानून है जो लीव-इन को लिखित रूप में विनियमित करता है।
6. लीव इन की चुनौतियाँ - 
I. सामाजिक स्वीकृति - कानूनी मान्यता के बावजूद, भारत के कई हिस्सों में इसे सामाजिक रूप से स्वीकार नहीं किया जाता।
II. विरासत - पार्टनर की मृत्यु के बाद उसकी संपत्ति पर जीवित पार्टनर का कोई सीधा कानूनी हक नहीं होता (जब तक कि वसीयत न हो), जो कि विवाह में स्वत: मिल जाता है।

विशेष विवाह अधिनियम 1923 
विशेष विवाह अधिनियम 1923, वास्तव में 1872 के मूल अधिनियम का संशोधन है, जिसने भारत में नागरिक विवाह के स्वरूप को बदल दिया।
1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि - 
1872 का अधिनियम - मूल रूप से, 1872 का विशेष विवाह अधिनियम उन लोगों के लिए था जो यह घोषणा करते थे कि वे किसी भी प्रचलित धर्म (हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, आदि) को नहीं मानते।
1923 का संशोधन - सर हरी सिंह गौर अधिनियम, 1923 में सर हरी सिंह गौर के प्रयासों से इसमें बड़ा बदलाव किया गया। अब हिंदु, बौद्ध, सिख और जैन धर्मावलंबियों को धर्म परिवर्तन के बिना इस अधिनियम के तहत विवाह करने की अनुमति मिल जाती है।
2. 1923 के अधिनियम के मुख्य प्रावधान - 
A. धर्म परिवर्तन की आवश्यकता नहीं - 1923 से पहले, यदि कोई हिंदू इस अधिनियम के तहत विवाह करना चाहता था, तो उसे यह शपथ लेनी पड़ती थी कि मैं हिंदू धर्म नहीं मानता। 1923 के संशोधन ने इस अपमानजनक शर्त को हटा दिया।
B. कानूनी परिणाम - इस अधिनियम के तहत विवाह करने के कुछ कड़े कानूनी परिणाम भी थे - 
परिवार से पृथक्करण - यदि कोई व्यक्ति जो हिंदू अविभाजित परिवार (HUF) का सदस्य है, इस अधिनियम के तहत विवाह करता है, तो उसे कानूनी रूप से अपने परिवार से अलग मान लिया जाता था।
उत्तराधिकार - ऐसे विवाह से होने वाली संतान और दंपत्ति पर हिंदू उत्तराधिकार नियम के बजाय भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम लागू होता था।
C. गोद लेने का अधिकार - इस अधिनियम के तहत विवाह करने वाले व्यक्ति का हिंदू कानून के तहत किसी बच्चे को गोद लेने का अधिकार समाप्त हो जाता था, हालांकि बाद के कानूनों ने इसमें सुधार किया।
3. 1923 और वर्तमान 1954 के अधिनियम में अंतर - 
I. मूल - 1954 का अधिनियम (संशोधित 1872) आज के विशेष विवाह अधिनियम 1923 का आधार बना।
II. विशेषता - 1923 का अधिनियम (संशोधित 1872) = 1954 का अधिनियम (वर्तमान)
III. धर्म - मुख्य रूप से हिंदुओं/सिखों/जैनियों पर लागू = पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष किसी भी धर्म के जोड़ों पर लागू
IV. संयुक्त परिवार - विवाह होते ही परिवार से स्वत: अलगाव = कुछ विशेष परिस्थितियों में अलगाव नहीं होता।
V. तलाक = तलाक के प्रावधान बहुत सीमित थे = पारस्परिक सहमति सहित तलाक के विस्तृत प्रावधान। |
VI. पंजीकरण - केवल विवाह के समय पंजीकरण = पहले से हुए धार्मिक विवाह के पंजीकरण की सुविधा भी।
4. विशेष विवाह अधिनियम 1923 का महत्व - यह कानून भारत में अंतर्जातीय और अंतर्धार्मिक विवाहों को कानूनी मान्यता देने की दिशा में पहला बड़ा कदम है। इसने व्यक्तिगत आस्था को बनाए रखते हुए नागरिक अनुबंध के रूप में विवाह करने का मार्ग प्रशस्त किया।
5. समलैंगिक विवाह और विशेष विवाह अधिनियम (SMA) - वर्तमान में समलैंगिक विवाह की कानूनी मान्यता के लिए सबसे बड़ी मांग इसी विशेष विवाह अधिनियम (1954) के तहत की जा रही है, क्योंकि यह एक धर्मनिरपेक्ष कानून है। प्रदर्शनकारियों का तर्क है कि SMA में पुरुष और स्त्री की जगह व्यक्ति या साथी शब्द का प्रयोग करके समलैंगिक विवाह को शामिल किया जा सकता है।

                   UNIT II 
03.हिंदू विवाह अधिनियम (Hindu Marriage Act, 1955) - 
भारतीय संसद द्वारा पारित एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानून है। इसने सदियों से चली आ रही हिंदू विवाह की धार्मिक परंपराओं को एक व्यवस्थित और आधुनिक कानूनी ढांचा प्रदान किया।
हिंदू विवाह अधिनियम की धाराएं - 
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 में कुल तीस धाराएं हैं, जिन्हें अलग-अलग अध्यायों में बांटा गया है। ये धाराएं विवाह की शर्तों से लेकर, तलाक और कानूनी उपचारों तक का विवरण देती हैं। इस अधिनियम की सबसे महत्वपूर्ण धाराओं का संक्षिप्त विवरण दिया गया है - 
प्रारंभिक और परिभाषाएँ (धारा 1-4 तक)
धारा 1- संक्षिप्त नाम और विस्तार 
यह धारा बताती है कि कानून का नाम क्या है और यह कहाँ तक फैला हुआ है।
विवरण- इसका नाम हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 है। यह पूरे भारत पर लागू होता है।
उदाहरण- यदि कोई हिंदू जोड़ा राजस्थान के चूरू में रहता है या तमिलनाडु में, उन दोनों पर यही एक कानून लागू होगा।
धारा 2 - अधिनियम का लागू होना - यह स्पष्ट करती है कि यह कानून किन पर लागू होता है (हिंदू, बौद्ध, जैन, सिख)।
विवरण - यह कानून उन सभी पर लागू होता है जो धर्म से हिंदू, बौद्ध, जैन या सिख हैं। यह उन पर भी लागू होता है जो मुस्लिम, ईसाई, पारसी या यहूदी नहीं हैं।
उदाहरण- यदि एक सिख लड़का और एक सिख लड़की शादी करते हैं, तो उनकी शादी इसी अधिनियम के तहत मानी जाएगी, न कि किसी अलग सिख कानून के तहत।
धारा 3 - परिभाषाएँ - यह धारा कानून में इस्तेमाल होने वाले शब्दों का अर्थ समझाती है।
प्रथा/रिवाज या रीति - ऐसी परंपरा जो बहुत पुराने समय से चली आ रही हो।
सपिंड - पिता की ओर से 5 पीढ़ी और माता की ओर से 3 पीढ़ी तक के रिश्तेदार।
उदाहरण - कुछ समुदायों में मामा की लड़की से शादी करना एक प्रथा है। यदि वह प्रथा कानूनी रूप से सिद्ध है, तो उसे धारा 3 के तहत छूट मिल सकती है।
धारा 4 - अधिनियम का अध्यारोही प्रभाव
विवरण - इस कानून के लागू होने के बाद, हिंदू धर्म की पुरानी कोई भी ऐसी परंपरा या शास्त्र का नियम खत्म हो जाएगा जो इस कानून के खिलाफ हो।
उदाहरण- पहले कुछ जगहों पर एक पुरुष को कई शादियाँ करने की अनुमति थी, लेकिन इस धारा ने उन पुरानी प्रथाओं को रद्द कर दिया।
विवाह के रीति रिवाज (5 से 8) - 
धारा 5 (सबसे महत्वपूर्ण) - एक वैध हिंदू विवाह की 5 शर्तें बताती है (जैसे- उम्र, एक विवाह, मानसिक स्वास्थ्य आदि)।
वैध विवाह के अनिवार्य शर्तें - 
किसी भी शादी को कानून की नजर में वैध मानने के लिए इन शर्तों का पूरा होना जरूरी है - 
I. दोनों पक्ष हिंदू हों - अंतरधार्मिक विवाह इस अधिनियम के अनुसार शासित नहीं होंगे।
II. एक पति/पत्नी विवाह - विवाह के समय दोनों पक्षों में से कोई भी या तो अविवाहित हो या या विधिक रूप से तलाकशुदा हो या पूर्व में विवाहित है तो पति या पत्नी जीवित नहीं होना चाहिए।(अर्थात दूसरी शादी तब तक नहीं हो सकती जब तक पहली शादी कानूनी रूप से खत्म न हो जाए)।
III. उम्र - पुरुष की उम्र कम से कम 21 वर्ष और महिला की कम से कम 18 वर्ष होनी चाहिए।
IV. मानसिक स्थिति - दोनों पक्ष अपनी सहमति देने में सक्षम हों और किसी मानसिक विकार से ग्रस्त न हों।
V. निषिद्ध रिश्ते - पक्षकार सपिंड या निषिद्ध संबंधों की डिग्री के भीतर नहीं होने चाहिए, जब तक कि उनकी प्रथा या रिवाज इसकी अनुमति न देती हो।
विवाह के रीति-रिवाज और पंजीकरण
सप्तपदी - (अग्नि को साक्षी मानते हुए सात फेरे)- अधिनियम के अनुसार, विवाह हिंदू रीति-रिवाजों (जैसे पवित्र अग्नि के सामने सात फेरे) से संपन्न होना चाहिए। सातवां कदम पूरा होते ही विवाह पूर्ण माना जाता है।
पंजीकरण - हालांकि शादी रीति-रिवाजों से मान्य हो जाती है, लेकिन भविष्य में कानूनी सबूत के तौर पर इसका पंजीकरण कराना अनिवार्य है।
धारा 6 - विवाह में संरक्षकता  (Repeal)
Guardianship in Marriage में 1976 के संशोधन द्वारा समाप्त
नाबालिगों की संरक्षकता - पहले इसमें नाबालिगों की शादी के लिए माता-पिता की सहमति की बात थी, लेकिन अब न्यूनतम आयु अनिवार्य होने के कारण इसकी जरूरत नहीं रही।
धारा 7 - हिंदू विवाह के संस्कार -विवाह के रीति-रिवाजों की मान्यता। इसमें सप्तपदी (सात फेरे) आदि
विवरण- विवाह किसी भी पक्ष (वर या वधू) के पारंपरिक रीति-रिवाजों से किया जा सकता है।
सप्तपदी- यदि रीति-रिवाज में 'सप्तपदी' (अग्नि के समक्ष सात फेरे) शामिल है, तो सातवां फेरा पूरा होते ही शादी संपन्न और कानूनी मानी जाएगी।
उदाहरण- यदि किसी समुदाय में केवल वरमाला से शादी की परंपरा है, तो वह भी धारा 7 के तहत वैध है।
धारा 8 - हिंदू विवाहों के पंजीकरण से संबंधित नियम।
विवरण- राज्य सरकारें शादी को प्रमाणित करने के लिए 'विवाह रजिस्टर' बना सकती हैं।
महत्व- पंजीकरण शादी का एक ठोस कानूनी सबूत होता है, जो पासपोर्ट बनवाने या बैंक कार्यों में काम आता है।
उदाहरण- शादी फेरों के साथ संपन्न हो गई, लेकिन उसका सरकारी प्रमाण पत्र बनवाना धारा 8 की प्रक्रिया के अंतर्गत आता है।
धारा 9 वैवाहिक अधिकारों (दाम्पत्य जीवन) की बहाली - यदि पति या पत्नी बिना किसी उचित कारण के एक-दूसरे से अलग रहने लगें, तो पीड़ित पक्ष अदालत से वापस साथ रहने का आदेश मांग सकता है। यह धारा तब लागू होती है जब पति या पत्नी में से कोई एक, बिना किसी ठोस कारण के, दूसरे को छोड़कर अलग रहने लगे और साथ रहने से मना कर दे। ऐसी स्थिति में पीड़ित पक्ष (जो साथ रहना चाहता है) अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है।
धारा 9 की मुख्य बातें - 
A.धारा 9 का उद्देश्य - इसका मुख्य उद्देश्य वैवाहिक बंधन को बचाना और पति-पत्नी को फिर से साथ लाना है। कानून यह मानता है कि शादी के बाद पति-पत्नी को एक-दूसरे की संगत (Society) में रहने का अधिकार है।
B. अनिवार्य शर्तें - कोर्ट में धारा 9 के तहत याचिका लगाने के लिए निम्नलिखित शर्तें पूरी होनी चाहिए - 
I. पति- पत्नी एक-दूसरे से अलग रह रहे हों।
II. एक पक्ष ने दूसरे का साथ बिना किसी उचित कारण के छोड़ा हो।
III. याचिकाकर्ता (जो कोर्ट गया है) वास्तव में साथ रहना चाहता हो।
C. उचित कारण - यदि कोर्ट को लगता है कि अलग रहने के पीछे कोई ठोस कारण है, तो वह साथ रहने का आदेश नहीं देगा।  उदाहरण - 
I. क्रूरता (मारपीट या मानसिक प्रताड़ना)।
II. अन्यत्र संबंध- जारता पति/पत्नी का किसी और के साथ संबंध होना।
III. दहेज उत्पीड़न - दहेज की मांग करना (विवाह के प्रारंभिक सात वर्ष तक ही मान्य।)
IV. अन्य - कोई ऐसी परिस्थिति जिससे साथ रहना असुरक्षित हो।
D. कोर्ट की प्रक्रिया - जब कोई पति या पत्नी धारा 9 के तहत अर्जी देता है, तो कोर्ट दूसरे पक्ष को नोटिस भेजता है।
कोर्ट दोनों की बातें सुनता है।
यदि कोर्ट संतुष्ट हो जाता है कि अलग रहने का कोई वाजिब कारण नहीं है, तो वह डिक्री (आदेश) जारी करता है कि वे दोनों साथ रहें।
E. कोर्ट के आदेश की अवमानना पर - 
धारा 9 के आदेश का मतलब यह नहीं है कि पुलिस जबरदस्ती पति-पत्नी को एक कमरे में बंद कर देगी। लेकिन इसके महत्वपूर्ण कानूनी परिणाम होते हैं।
संपत्ति की कुर्की- यदि आदेश के बाद भी कोई साथ नहीं आता, तो उसकी संपत्ति कुर्क की जा सकती है।
तलाक का आधार (धारा 13(1A))- यदि धारा 9 का आदेश पारित होने के 1 साल बाद तक भी पति-पत्नी साथ नहीं रहते, तो यह तलाक लेने का कानूनी आधार बन जाता है।
उदाहरण- मान लीजिए A और B पति-पत्नी हैं। बिना किसी झगड़े या कारण के मायके चली जाती है और वापस आने से मना कर देती है। A उसे बहुत समझाता है लेकिन वह नहीं मानती। यहाँ A कोर्ट में धारा 9 के तहत केस कर सकता है। अगर B कोर्ट में यह साबित नहीं कर पाती कि A उसे परेशान करता था या कोई और ठोस कारण था, तो कोर्ट B को A के साथ रहने का आदेश देगा। इसके विपरीत B को भी A पर वैसा ही अधिकार है।
निष्कर्ष - धारा 9 वैवाहिक अधिकारों को वापस पाने का एक तरीका है, लेकिन आधुनिक समय में इसे लेकर काफी बहस भी होती है क्योंकि किसी को शारीरिक रूप से साथ रहने के लिए मजबूर करना व्यक्तिगत स्वतंत्रता के खिलाफ माना जाता है। इसीलिए इसका उपयोग अक्सर तलाक के आधार के रूप में या सुलह के अंतिम प्रयास के रूप में किया जाता है।
धारा 10 न्यायिक पृथक्करण - इसमें पति-पत्नी को तलाक लिए बिना अलग रहने की अनुमति मिलती है, लेकिन वैवाहिक संबंध पूरी तरह खत्म नहीं होते।
यह तलाक और धारा 9 (साथ रहने का आदेश) के बीच का एक रास्ता है। जब पति-पत्नी के बीच संबंध इतने खराब हो जाएं कि वे साथ न रह सकें, लेकिन वे शादी के बंधन को पूरी तरह खत्म (तलाक) भी न करना चाहें, तब वे न्यायिक पृथक्करण का सहारा लेते हैं।
न्यायिक पृथककरण के पहलू - 
A. धारा 10 का मुख्य प्रभाव - जब कोर्ट धारा 10 के तहत आदेश (Decree) दे देता है, तो इसके परिणाम निम्नलिखित होते हैं - 
I. साथ रहने की बाध्यता खत्म - अब पति और पत्नी को एक घर में या एक साथ रहने की कानूनी जरूरत नहीं है।
IIशादी बरकरार रहती है - कानूनी तौर पर वे अभी भी पति-पत्नी ही कहलाते हैं। वे दूसरी शादी नहीं कर सकते।
III. वैवाहिक कर्तव्य समाप्त - एक-दूसरे के प्रति जो वैवाहिक दायित्व (जैसे साथ रहना) होते हैं, वे अस्थाई रूप से निलंबित हो जाते हैं।
B. आदेश के आधार - धारा 10 के लिए वे सभी आधार मान्य हैं जो धारा 13 (तलाक) के लिए होते हैं। जैसे - 
क्रूरता - शारीरिक या मानसिक प्रताड़ना।
परित्याग - बिना कारण कम से कम 2 साल से अलग रहना।
व्यभिचार - पति या पत्नी का किसी अन्य व्यक्ति के साथ संबंध होना।
धर्म परिवर्तन - किसी एक पक्ष द्वारा हिंदू धर्म छोड़ देना।
लाइलाज बीमारी- मानसिक विकार या कोई संक्रामक गंभीर बीमारी।
C. धारा 10 (पृथकरण) व धारा 13 (तलाक) में अंतर - 
1. धारा का  अंतर- पृथकरण में धारा 10 व तलाक में धारा 13 लगती है।
2. वैवाहिक स्थिति- 10में शादी का बंधन बना रहता है। 13 में वैवाहिक संबंध समाप्त।
3.पुनर्विवाह - दूसरी शादी नहीं कर सकते। दूसरी शादी करने के लिए स्वतंत्र।
4. उद्देश्य - रिश्तों को सुधारने का एक और मौका, रिश्ते हमेशा के लिए समाप्त।
5. प्रक्रिया - कभी भी रद्द किया जा सकता है। तलाक के बाद रिश्ते खत्म।
6. आधार - धारा 10 धारा 13 का आधार हो सकती है।
D. आदेश को रद्द करना - धारा 10 की एक खास बात यह है कि यदि भविष्य में पति-पत्नी के बीच समझौता हो जाए और वे फिर से साथ रहना चाहें, तो वे कोर्ट में अर्जी देकर इस आदेश को रद्द(Rescind) करवा सकते हैं। इसके बाद वे फिर से सामान्य पति-पत्नी की तरह रह सकते हैं।
E. तलाक का आधार - (धारा 13(1A))
यदि कोर्ट द्वारा धारा 10 का आदेश दिए जाने के 1 साल या उससे अधिक समय बीत जाने के बाद भी पति-पत्नी के बीच सुलह नहीं होती और वे साथ नहीं रहते, तो उनमें से कोई भी इस आधार पर तलाक के लिए अर्जी दे सकता है।
उदाहरण - मान लीजिए R और K के बीच बहुत झगड़े होते हैं। K को लगता है कि उसे कुछ समय के लिए R से अलग रहना चाहिए ताकि वह मानसिक शांति पा सके। वह तलाक लेकर समाज में तलाकशुदा का ठप्पा नहीं चाहती। वह कोर्ट से धारा 10 के तहत न्यायिक पृथक्करण की मांग सकती है। इससे वह कानूनी रूप से अलग भी रह पाएगी और भविष्य में अगर हालात सुधरे, तो वापस R के पास जा सकेगी।
5. धारा 11 विवाह की शून्यता - एक बहुत ही महत्वपूर्ण कानूनी प्रावधान है, जो शून्य विवाह के बारे में बताती है। धारा 11 उन परिस्थितियों को परिभाषित करती है जिनमें विवाह कानून की नजर में शुरू से ही अवैध (अस्तित्वहीन) माना जाता है।
विवाह शून्य होने की शर्तें - यदि कोई विवाह धारा 5 की अनिवार्य शर्तों का उल्लंघन करता है, तो वह धारा 11 के तहत शून्य माना जाएगा। ये शर्तें निम्नलिखित हैं - 
द्विविवाह - विवाह के समय यदि पति या पत्नी में से किसी का भी पहले से जीवित जीवन साथी मौजूद है और पिछला विवाह कानूनी रूप से समाप्त नहीं हुआ है।
प्रतिषिद्ध नातेदारी - यदि पक्षकार एक-दूसरे के साथ प्रतिषिद्ध नातेदारी की डिग्रियों के भीतर हैं (जब तक कि उनकी प्रथा या रीति-रिवाज इसकी अनुमति न देते हों)। जैसे भाई-बहन या कुछ करीबी रिश्तेदारों से विवाह।
सपिण्ड नातेदारी - (पिता- 5 माता- 3 पीढ़ी) यदि पक्षकार एक-दूसरे के सपिण्ड हैं (जब तक कि रीति-रिवाज इसकी अनुमति न देते हों)। इसमें पिता की ओर से पांच पीढ़ियों और माता की ओर से तीन पीढ़ियों के भीतर आने वाले रिश्तेदार शामिल होते हैं।
मुख्य कानूनी प्रभाव
विवाह शुरुआत से ही शून्य- ऐसे विवाह को कानून की नजर में कभी विवाह माना ही नहीं जाता। इसके लिए किसी विशेष अदालती डिक्री की आवश्यकता नहीं होती, लेकिन स्पष्टता के लिए अदालत से अकृतता की डिक्री ली जा सकती है।
अधिकारों का अभाव - धारा 11 के तहत शून्य विवाह में पत्नी को आमतौर पर उत्तराधिकार के वह अधिकार नहीं मिलते जो एक वैध पत्नी को मिलते हैं।
बच्चों की स्थिति- यह एक महत्वपूर्ण बिंदु है। धारा 16 के अनुसार, भले ही विवाह शून्य (धारा 11 के तहत) हो, फिर भी उस विवाह से पैदा हुए बच्चों को वैध माना जाता है और उन्हें अपने माता-पिता की संपत्ति में अधिकार मिलता है।
धारा 12 शून्यकरणीय विवाह - धारा 11 और धारा 12 में सबसे बड़ा अंतर यह है कि धारा 11 वाला विवाह शुरुआत से ही बेकार होता है, लेकिन धारा 12 वाला विवाह तब तक वैध रहता है जब तक कि पीड़ित पक्ष उसे अदालत में चुनौती देकर रद्द न करवा दे। 
धारा 12 के तहत विवाह को रद्द करने के चार आधार - 
I. नपुंसकता - यदि विवाह के समय पति या पत्नी में से कोई भी नपुंसक था और इस कारण विवाह के बाद शारीरिक संबंध  नहीं बन पाए।
II. मानसिक अस्वस्थता - यदि विवाह के समय कोई पक्ष धारा 5(ii) की शर्तों को पूरा नहीं करता था, जैसे 
. वह मानसिक रूप से इतना अस्वस्थ था कि विवाह के लिए वैध सहमति नहीं दे सकता था।
. मानसिक अस्वस्थता - सहमति तो दे सकता था, लेकिन मानसिक विकार के कारण विवाह और संतानोत्पत्ति हेतु अयोग्य था।
ग. मिर्गी - उसे मिर्गी के बार-बार दौरे पड़ते थे (यह अब संशोधन के बाद कुछ हद तक सीमित कर दिया गया है)।
. बल प्रयोग या धोखाधड़ी - यदि विवाह के लिए पक्षकार या उसके अभिभावक की सहमति ज़बरदस्ती (डर दिखाकर) या धोखाधड़ी (जैसे पहचान छुपाना या किसी भौतिक तथ्य को झूठ बताना) से ली गई हो।
च. विवाह के समय गर्भावस्था  - यदि पत्नी विवाह के समय किसी अन्य व्यक्ति से गर्भवती थी और पति को विवाह के समय इस बात की जानकारी नहीं थी।
महत्वपूर्ण शर्तें - 
धारा 12 के तहत मामला दर्ज करने के लिए कुछ नियम हैं - 
धोखाधड़ी - जैसे ही धोखाधड़ी का पता चले या ज़बरदस्ती खत्म हो, उसके 1 साल के भीतर याचिका दायर करनी होती है।
गर्भावस्था - पति को इस बात का पता चलने के 1 साल के भीतर कोर्ट जाना चाहिए, और उसने पता चलने के बाद पत्नी के साथ स्वेच्छा से शारीरिक संबंध न बनाए हों।
निष्कर्ष - जब तक अदालत धारा 12 के तहत विवाह को रद्द करने की अकृतता की डिक्री (Decree of Nullity) नहीं देती, तब तक वह विवाह कानूनी रूप से पूरी तरह मान्य रहता है और पति-पत्नी के सभी अधिकार सुरक्षित रहते हैं।
धारा 11 और 12 में अंतर
प्रकृति - यह विवाह शुरू से ही अवैध होता है - तब तक वैध है जब तक कोई पक्ष इसे अदालत में चुनौती न दे।
आधार - द्विविवाह, सपिण्ड या प्रतिषिद्ध रिश्ते - नपुंसकता, धोखाधड़ी, मानसिक अस्वस्थता या सहमति का अभाव।
विकल्प -  कानून इसे विवाह मानता ही नहीं - पीड़ित पक्ष के पास विकल्प होता है कि वह रिश्ते में रहे या इसे खत्म करे।
धारा 13 तलाक (Divorce) - 
धारा 11 और 12 विवाह को अमान्य करने की बात करती हैं, जबकि धारा 13 एक वैध विवाह को समाप्त करने का कानूनी रास्ता देती है।
तलाक के मुख्य आधार - 
धारा 13 (1) - इसके तहत पति या पत्नी में से कोई भी निम्नलिखित आधारों पर तलाक की अर्जी दे सकता है - 
1.व्यभिचार - यदि विवाह के बाद पति या पत्नी ने अपनी इच्छा से किसी अन्य व्यक्ति के साथ शारीरिक संबंध बनाए हों।
2.क्रूरता - यदि एक पक्ष दूसरे के साथ शारीरिक या मानसिक रूप से क्रूर व्यवहार करता है, जिससे साथ रहना मुश्किल हो जाए।
3.परित्याग - यदि पति या पत्नी ने बिना किसी उचित कारण के और बिना सहमति के कम से कम 2 वर्ष से अपने साथी को छोड़ दिया हो।
4.धर्म परिवर्तन - यदि एक पक्ष हिंदू धर्म छोड़कर कोई दूसरा धर्म अपना ले।
5.असाध्य मानसिक विकार - यदि साथी मानसिक रूप से इतना अस्वस्थ हो कि उसके साथ रहना संभव न हो।
6.कुष्ठ या संक्रामक रोग - (नोट- कुष्ठ रोग को अब तलाक के आधार से हटाने के लिए कानून में संशोधन किए गए हैं, लेकिन संक्रामक यौन रोगों के आधार पर तलाक मांगा जा सकता है)।
7.संन्यास - यदि साथी ने दुनिया का त्याग कर दिया हो और संन्यासी बन गया हो।
8.जीवित न माना जाना - यदि साथी के बारे में पिछले 7 वर्षों से उन लोगों ने कुछ न सुना हो जो सामान्यतः उसके बारे में सुनते (यानी वह लापता हो)।
केवल पत्नी को प्राप्त विशेष अधिकार धारा 13(2) के तहत पत्नी को कुछ अतिरिक्त आधार मिलते हैं विवाह के बाद यदि पति ने - 
बलात्कार
गुदा मैथुन
पशुगमन
जैसे अपराध किए हों तो पत्नी तलाक की अर्जी लगा सकती है।
विकल्प का अधिकार - यौवनवस्था (15 साल की उम्र) से पहले हुई शादी को यदि लड़की ने 18 साल की होने से पहले ठुकरा दिया हो तो लड़की तलाक की अर्जी लगा सकती है।
धारा 13 के अन्य महत्वपूर्ण भाग - 
धारा 13B (आपसी सहमति से तलाक) - जब पति और पत्नी दोनों मिलकर यह तय करते हैं कि वे साथ नहीं रह सकते, तो वे आपसी सहमति से तलाक ले सकते हैं। यह सबसे तेज़ और उत्तम तरीका माना जाता है।
न्यायिक पृथक्करण - कभी-कभी कोर्ट सीधे तलाक न देकर धारा 10 के तहत अलग रहने की अनुमति देता है ताकि सुलह की गुंजाइश बनी रहे।
तलाक के लिए समय सीमा - सामान्य तौर पर, विवाह के 1 वर्ष पूरे होने से पहले तलाक की याचिका दायर नहीं की जा सकती (धारा 14), जब तक कि मामला बहुत अधिक कष्टदायक न हो।
धारा 14 और 15 विवाह के बाद के उस समय की बात करती हैं, जब आप तलाक ले सकते हैं या दूसरी शादी कर सकते हैं। ये दोनों धाराएं जल्दबाजी में लिए गए फैसलों को रोकने के लिए बनाई गई हैं।
धारा 14 - विवाह के एक वर्ष के भीतर तलाक पर रोक - यह धारा कहती है कि विवाह के एक वर्ष बीतने से पहले तलाक की याचिका अदालत में पेश नहीं की जा सकती।
उद्देश्य - इसका मकसद वैवाहिक जीवन को एक मौका देना है ताकि छोटी-मोटी अनबन के कारण परिवार न टूट जाए।
अपवाद - यदि मामला बहुत अधिक असाधारण कष्ट का हो या प्रतिवादी (जिसके खिलाफ केस करना है) की ओर से असाधारण दुराचार हुआ हो, तो कोर्ट 1 साल से पहले भी अर्जी की अनुमति दे सकता है।
गलत जानकारी- यदि कोर्ट को बाद में पता चलता है कि याचिकाकर्ता ने 1 साल से पहले अनुमति लेने के लिए झूठ बोला था, तो कोर्ट तलाक की डिक्री को तब तक के लिए टाल सकता है जब तक शादी को एक साल पूरा न हो जाए।
धारा 15 - तलाकशुदा द्वारा पुनर्विवाह-
तलाक की डिक्री (कोर्ट का फैसला) मिलने के पुनर्विवाह की समय सीमा -
अपील का समय समाप्त होने पर - यदि कोर्ट ने तलाक दे दिया है और उस फैसले के खिलाफ अपील करने का समय (आमतौर पर 90 दिन) बीत चुका है और किसी भी पक्ष ने अपील नहीं की है।
अपील का निपटारा- की गई अपील को ऊपरी अदालत द्वारा खारिज कर देने और तलाक को बरकरार रखने के फैसले के बाद।
कोई अपील का अधिकार न होना - यदि फैसले के खिलाफ अपील करने का कोई रास्ता न बचा हो तो भी तलाक मिलते ही अगले दिन शादी नहीं कर सकते। संबंधित को तब तक इंतजार करना होगा जब तक कि विपक्ष का कानूनी रूप से उस फैसले को चुनौती देने का हक खत्म न हो जाए। 
धारा 16 - शून्य और शून्यकरणीय विवाहों से पैदा हुए बच्चों की वैधता - यह धारा मानवीय दृष्टिकोण से बहुत महत्वपूर्ण है।
नियम- भले ही कोई विवाह धारा 11 के तहत शून्य हो या धारा 12 के तहत रद्द कर दिया गया हो, उस विवाह से पैदा हुए बच्चे वैध माने जाएंगे।
अधिकार- ऐसे बच्चों को अपने माता-पिता की संपत्ति में पूरा उत्तराधिकार मिलता है। हालांकि, वे केवल अपने माता-पिता की संपत्ति के हकदार होते हैं, अन्य रिश्तेदारों (जैसे दादा-दादी की पैतृक संपत्ति) पर उनका अधिकार सीमित हो सकता है।
धारा 17 - द्विविवाह के लिए दंड - 
यह धारा स्पष्ट करती है कि यदि कोई हिंदू  पति या पत्नी के जीवित रहते हुए दूसरा विवाह करता है, तो - 
A. वह विवाह शून्य होगा।
B. उस व्यक्ति पर भारतीय न्याय संहिता (पहले IPC की धारा 494 और 495) के तहत मुकदमा चलाया जाएगा और उसे सजा मिलेगी।
धारा 18 - अदालती प्रक्रिया - 
यह याचिका पेश करने की प्रक्रियात्मक धारा है। यह बताती है कि इस अधिनियम के तहत कोई भी याचिका (तलाक, वैवाहिक अधिकारों की बहाली आदि) कहाँ और कैसे दायर की जा सकती है। यह मुख्य रूप से जिला अदालतों के अधिकार क्षेत्र की बात करती है।
धारा 19 - अदालत का अधिकार क्षेत्र - 
यह तय करती है कि केस किस शहर या जिले की अदालत में चलेगा। याचिका वहाँ दायर की जा सकती है जहाँ - 
1. विवाह संपन्न हुआ था।
2. प्रतिवादी रहता हो।
3. पति-पत्नी अंतिम बार साथ रहे हों।
4. यदि पत्नी याचिकाकर्ता है, तो जहाँ वह वर्तमान में रह रही है।
धारा 20 - याचिकाओं की सामग्री और सत्यापन - 
1. इस धारा के अनुसार, अदालत में दी जाने वाली हर याचिका में तथ्यों का स्पष्ट विवरण होना चाहिए।
2. याचिकाकर्ता को यह सत्यापित करना होता है कि जो जानकारी वह दे रहा है वह सच है और उसने दूसरे पक्ष के साथ मिलकर कोई मिलीभगत नहीं की है।
धारा 21 सिविल प्रक्रिया संहिता 
I. (CPC) - यह धारा तकनीकी है। यह कहती है कि हिंदू विवाह अधिनियम के तहत चलने वाले सभी केसों में CPC 1908 के नियम लागू होंगे। यानी अदालत बिल्कुल वैसे ही काम करेगी जैसे सामान्य दीवानी मामलों में करती है।
II. धारा 21A - यदि पति और पत्नी ने अलग-अलग शहरों में केस किए हैं, तो उन्हें एक ही जगह ट्रांसफर किया जा सकता है।
III. 21B - यह धारा निर्देश देती है कि वैवाहिक विवादों का निपटारा तेजी से (अधिकतम 6 माह में) होना चाहिए।
IV. 21C - अदालती कार्यवाही के दस्तावेजों और अपीलों के रिकॉर्ड के बारे में बताती है।
धारा 22- कार्यवाही का बंद कमरे में - वैवाहिक विवाद निजी होते हैं, इसलिए यह धारा प्रावधान करती है कि - 
1.यदि कोई भी पक्ष चाहे (या कोर्ट उचित समझे), तो सुनवाई बंद कमरे में होगी ताकि बाहर के लोग इसे न सुन सकें।
2.कोर्ट की अनुमति के बिना ऐसी कार्यवाही की कोई भी बात छापना या प्रकाशित करना अपराध है।
धारा 24- अंतरिम भरण-पोषण - यह धारा बहुत महत्वपूर्ण है। जब केस कोर्ट में चल रहा हो, तब के खर्च के लिए यह प्रावधान है। यदि पति या पत्नी में से किसी के पास अपना खर्चा चलाने के लिए स्वतंत्र आय नहीं है, तो कोर्ट दूसरे पक्ष को आदेश दे सकता है कि वह - 
A. केस लड़ने का खर्चा दे।
B. हर महीने गुजारा भत्ता दे।
C. विशेष बात - यह अधिकार पति और पत्नी दोनों के लिए है (यदि पति के पास आय नहीं है और पत्नी कमाती है, तो पति भी मांग सकता है)।
धारा 25 स्थायी भरण-पोषण व गुजारा भत्ता - यह धारा तब लागू होती है जब केस का अंतिम फैसला (डिक्री) आ जाता है (जैसे तलाक के समय) - 
कोर्ट आदेश दे सकता है कि एक पक्ष दूसरे को जीवन भर के लिए एकमुश्त राशि (Lump sum) या मासिक राशि दे
बदलाव - यदि भविष्य में परिस्थितियां बदलती हैं (जैसे जिसे पैसा मिल रहा है उसने दूसरी शादी कर ली या उसकी आय बढ़ गई), तो कोर्ट इस आदेश को बदल या रद्द भी कर सकता है।
धारा 24 और 25 से संबंधित कुछ बिंदु - धारा 24 और 25 के तहत जब कोर्ट भरण-पोषण या एलुमनी की राशि तय करता है, तो वह कुछ खास मापदंडों को देखता है, वो मुख्य बातें जो कोर्ट ध्यान में रखता है
राशि तय करने के मुख्य आधार - 
1. दोनों पक्षों की आय - कोर्ट देखता है कि पति और पत्नी वास्तव में कितना कमा रहे हैं। इसमें सैलरी, बिजनेस से होने वाला मुनाफा और बैंक बैलेंस शामिल होता है।
2. संपत्ति - किसके नाम पर कितनी चल, अचल संपत्ति (घर, जमीन) या निवेश (Shares, FD) है।
3. जीवन स्तर - शादी के दौरान पति-पत्नी जिस तरह के जीवन स्तर (जैसे कार, घर की सुख-सुविधाएं) के आदी थे, उसे बनाए रखने की कोशिश की जाती है।
4. आश्रित सदस्य - देने वाले पक्ष पर कितने और लोग निर्भर हैं (जैसे बुजुर्ग माता-पिता या बच्चे)।
5. उचित आवश्यकताएं  - भोजन , आवास, कपड़ों, शिक्षा और चिकित्सा पर होने वाला जरूरी खर्च।
विशेष - अदालतों ने अब (आय का शपथ-पत्र) अनिवार्य कर दिया है। यानी पति और पत्नी दोनों को अपनी कमाई और खर्चों का पूरा और सच्चा विवरण लिखित में देना पड़ता है। यदि कोई जानकारी छुपाता है, तो उस पर भारी जुर्माना या कानूनी कार्यवाही हो सकती है।
धारा 26 बच्चों का संरक्षण - यह धारा कोर्ट को अधिकार देती है कि वह केस के दौरान या बाद में बच्चों की कस्टडी, उनकी शिक्षा और उनके रखरखाव के बारे में आदेश दे सके। कोर्ट का मुख्य फोकस बच्चे का कल्याण होता है।
धारा 27 विवाह के समय के उपहार - कोर्ट उन संपत्तियों या उपहारों जैसे गहने, सामान के निपटारे का आदेश दे सकता है जो विवाह के समय पति-पत्नी को संयुक्त रूप से मिले थे।
धारा 28 अपील - Appeals - इस अधिनियम के तहत जिला अदालत के किसी भी फैसले या डिक्री के खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है। अपील करने की सामान्य समय सीमा 90 दिन होती है।
धारा 29: व्यावृत्तियां (बचत) - यह धारा बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बताती है कि इस अधिनियम के आने के बावजूद किन चीजों पर कोई असर नहीं पड़ा। यह एक तरह का अपवाद है।
1. पुरानी शादियां - इस अधिनियम के आने (1955) से पहले जो शादियां हो चुकी थीं, वे अवैध नहीं मानी जाएंगी, बशर्ते वे उस समय के रीति-रिवाजों के अनुसार सही थीं।
1. रीति-रिवाज - यदि किसी समुदाय या जाति में तलाक लेने का कोई विशेष रीति-रिवाज पहले से चला आ रहा है (जैसे पंचायत के माध्यम से), तो यह अधिनियम उस रीति-रिवाज को खत्म नहीं करता। लोग अपने पुराने रीति-रिवाजों से भी तलाक ले सकते हैं।
2. विशेष विवाह अधिनियम - यदि किसी ने विशेष विवाह अधिनियम के तहत शादी की है, तो उस पर हिंदू विवाह अधिनियम लागू नहीं होगा, बल्कि वही कानून लागू होगा।
3. अन्य कानून - यह धारा अन्य कानूनों जैसे - बाल विवाह निरोधक अधिनियम के तहत मिलने वाली सजा या कार्यवाही को प्रभावित नहीं करती।
धारा 30: निरसन - यह धारा अब केवल ऐतिहासिक महत्व की है क्योंकि इसका काम कानून लागू होते ही पूरा हो गया था।
अर्थ - जब 1955 में हिंदू विवाह अधिनियम बना, तो उससे पहले हिंदू विवाह से संबंधित जो भी छोटे-बड़े कानून अलग-अलग राज्यों या क्षेत्रों में चल रहे थे जैसे बम्बई हिंदू तलाक अधिनियम आदि उन्हें इस धारा के जरिए खत्म (Repeal) कर दिया गया।
उद्देश्य: इसका उद्देश्य पूरे भारत में हिंदुओं के लिए विवाह और तलाक का एक समान कानून लागू करना था।
निष्कर्ष - 
 1. धारा 11-13: विवाह की वैधता और उसे खत्म करने (तलाक) के बारे में हैं।
2. धारा 14-15 - समय सीमा और पुनर्विवाह के बारे में हैं।
3. धारा 16-23 - बच्चों के हक, दंड और अदालती प्रक्रिया के बारे में हैं।
4. धारा 24-27 - भरण-पोषण और कस्टडी के बारे में हैं।
5. धारा 28-30 - अपील, पुराने रीति-रिवाजों की सुरक्षा और पुराने कानूनों को खत्म करने के बारे में हैं।

निषिद्ध नातेदारी - दोनों पक्ष एक-दूसरे के प्रतिषिद्ध नातेदारी की डिग्रियों में नहीं होने चाहिए (जब तक कि उनके रीति-रिवाज इसकी अनुमति न देते हों)।
इसकी धारा 3(g) में प्रतिषिद्ध नातेदारी की डिग्रियों को परिभाषित किया गया है। यह उन रिश्तों की सूची है जिनमें आपस में विवाह करना कानूनन वर्जित है।
हिन्दू कानून के अनुसार, दो व्यक्तियों को प्रतिषिद्ध नातेदारी में तब माना जाता है यदि - 
1. पूर्वज और वंशज - हिंदू अपने किसी भी सीधे पूर्वज से विवाह नहीं कर सकता। जैसे - 
I. पिता और पुत्री
II. माता और पुत्र
III. दादा और पोती
IV. दादी और पोता
2. वैवाहिक संबंधों के माध्यम से जुड़ाव - किसी करीबी रिश्तेदार की पत्नी या पति के साथ विवाह प्रतिबंधित है। जैसे - 
I. सौतेली माँ, दादी या परदादी
II. सौतेला पिता, दादा या परदादा
III. पिता के भाई की पत्नी (चाची/ताई), माता के भाई की पत्नी (मामी), या पिता/माता के पिता के भाई की पत्नी।
IV. भाई की पत्नी (भाभी) या चाचा, मामा, दादा के बेटों की पत्नियाँ।
3. भाई-बहन और सगे रिश्ते - कुछ विशेष रक्त संबंधों में भी विवाह वर्जित है - 
I. भाई और बहन (चाहे वे सगे हों, सौतेले हों या गर्भाशयज भाई-बहन हों।
II. चाचा और भतीजी
III. बुआ और भतीजा
IV. मामा और भांजी
V. मौसी और भांजा
इसके अपवाद - धारा 5(iv) के अनुसार, यदि दोनों पक्षों की रूढ़ि या प्रथा उनके बीच ऐसे विवाह की अनुमति देती है, तो वह विवाह वैध माना जाएगा। भारत के कुछ क्षेत्रों और समुदायों में मामा-भांजी या ममेरे-फुफेरे भाई-बहनों के बीच विवाह की परंपरा है, जिसे कानून मान्यता देता है यदि वह परंपरा प्राचीन और निरंतर चली आ रही हो।
दंड का प्रावधान धारा 18 - यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर प्रतिषिद्ध नातेदारी में विवाह करता है (और उनके यहाँ ऐसी कोई प्रथा भी नहीं है), तो - 
I. ऐसा विवाह शून्य माना जाता है।
II. इसमें शामिल व्यक्तियों को एक महीने तक का साधारण कारावास या 10,000 रुपये तक का जुर्माना, या दोनों हो सकते हैं।

सपिण्ड नातेदारी  - 
हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 3(f) में सपिण्ड नातेदारी को परिभाषित किया गया है। यह प्रतिषिद्ध नातेदारी से भी अधिक सूक्ष्म और तकनीकी अवधारणा है।
सपिण्ड शब्द 'स' (समान) और पिण्ड (शरीर के अंश या पूर्वजों को अर्पित किया जाने वाला अन्न) से मिलकर बना है। कानूनन, दो व्यक्ति एक-दूसरे के सपिण्ड तब कहलाते हैं जब वे एक ही वंश के हों और एक निश्चित सीमा तक उनके पूर्वज समान हों।
1. सपिण्ड नातेदारी की सीमाएँ - कानून ने सपिण्ड संबंधों को पहचानने के लिए दो अलग-अलग सीमाएँ तय की हैं - 
I. माता की ओर से - माता की पीढ़ी से 3 पीढ़ी ऊपर तक (माता को शामिल करते हुए)।
II. पिता की ओर से - पिता की पीढ़ी से 5 पीढ़ी ऊपर तक (पिता को शामिल करते हुए)।
∆. यदि दो व्यक्तियों का कोई साझा पूर्वज माता की ओर से तीसरी पीढ़ी या पिता की ओर से पांचवीं पीढ़ी के भीतर आता है, तो वे एक-दूसरे के सपिण्ड माने जाएंगे।
2. सपिण्ड विवाह की वैधता (धारा 5(v)) - अधिनियम की धारा 5 के अनुसार, एक वैध विवाह के लिए यह अनिवार्य शर्त है कि - पक्षकार एक-दूसरे के सपिण्ड नहीं होने चाहिए जहां तक रूढ़ियां एवं प्रथाएं अनुज्ञात करती हों।
अपवाद - यदि किसी समुदाय या परिवार की रूढ़ि या पुरानी परंपरा सपिण्ड विवाह की अनुमति देती है, तो ऐसा विवाह वैध माना जाता है। उदाहरण के लिए, दक्षिण भारत के कुछ समुदायों में सपिण्ड विवाह प्रचलित हैं और वहां उन्हें कानूनी मान्यता प्राप्त है।
3. सपिण्ड नातेदारी की गणना - पीढ़ियों की गणना हमेशा ऊपर की ओर की जाती है और इसमें उस व्यक्ति को भी गिना जाता है जिससे गणना शुरू हो रही है।
पिता की ओर से (5 पीढ़ियाँ) - 
I. वर/वधु (स्वयं)
II. पिता
III. दादा
IV. परदादा
V. परदादा के पिता
VI. माता की ओर से (3 पीढ़ियाँ) - 
I.वर/वधु (स्वयं)
II. माता
III. नाना
∆. यदि वर और वधु इन सीमाओं के भीतर किसी एक ही पूर्वज की संतानें हैं, तो वे आपस में विवाह नहीं कर सकते।
4. उल्लंघन के परिणाम - 
I. शून्य विवाह - सपिण्ड नातेदारी में किया गया विवाह कानून की दृष्टि में शून्य होता है, यानी उसका कोई कानूनी अस्तित्व नहीं होता।
II. दंड धारा 18 - सपिण्ड विवाह की शर्त का उल्लंघन करने पर एक महीने का कारावास या 10,000 रुपये का जुर्माना या दोनों हो सकते हैं।
सपिण्ड और प्रतिषिद्ध नातेदारी में मुख्य अंतर - 
नातेदार - प्रतिषिद्ध नातेदारी विशिष्ट रिश्तों की सूची है (जैसे भाई-बहन, चाचा-भतीजी)  और सपिण्ड नातेदारी यह पीढ़ियों की गणना पर आधारित व्यापक घेरा है।

2. विवाह की रस्में और पंजीकरण
रस्में (धारा 7) - हिन्दू विवाह किसी भी पक्ष के पारंपरिक रीति-रिवाजों और रस्मों के अनुसार किया जा सकता है।
सप्तपदी - जहाँ रस्मों में '/सप्तपदी (अग्नि के समक्ष सात फेरे) शामिल है, वहाँ विवाह सातवां फेरा पूरा होते ही पूर्ण और बाध्यकारी माना जाता है।
पंजीकरण (धारा 8) - विवाह का पंजीकरण हिन्दू विवाह रजिस्टर में किया जा सकता है। यह विवाह के प्रमाण के रूप में कार्य करता है। हालांकि, पंजीकरण न होने से विवाह अवैध नहीं हो जाता, लेकिन कानूनी कार्यों के लिए यह अनिवार्य माना जाता है।
3. शून्य और शून्यकरणीय विवाह - 
कानून के अनुसार, यदि विवाह की शर्तों का उल्लंघन होता है, तो उसे दो श्रेणियों में बांटा जाता है - 
शून्य विवाह धारा 11 - यह विवाह शुरुआत से ही कानून की नजर में अवैध होता है। इसके लिए तलाक की जरूरत नहीं होती क्योंकि यह अस्तित्व में ही नहीं माना जाता। कोई भी विवाह शून्य तब घोषित किया जाता है जब वह धारा 5 की निम्नलिखित अनिवार्य शर्तों का उल्लंघन करता है:
I. जीवित जीवनसाथी का होना,द्विविवाह
II. सपिण्ड नातेदारी में विवाह
III. निषिद्ध नातेदारी में विवाह
2. शून्य विवाह के कानूनी परिणाम
शून्य विवाह के प्रभाव अन्य विवाहों से बहुत अलग होते हैं
I. अस्तित्वहीन विवाह - इस विवाह को समाप्त करने के लिए अदालत से डिक्री (आदेश) लेना अनिवार्य नहीं है, क्योंकि कानून इसे पहले से ही शून्य मानता है। हालांकि, स्पष्टता के लिए पक्षकार अदालत से इसे शून्य घोषित करवा सकते हैं।
II. वैवाहिक अधिकार - इसमें पति-पत्नी को एक-दूसरे के विरुद्ध वैवाहिक अधिकार (जैसे साथ रहने का अधिकार) प्राप्त नहीं होते।
III. सजा का प्रावधान - द्विविवाह की स्थिति में BNS (पहले IPC) के तहत दंड भी दिया जा सकता है।
3. बच्चों की स्थिति (वैधता) धारा 16 - 
भले ही विवाह शून्य हो, लेकिन कानून ऐसे विवाह से पैदा हुए बच्चों को वैध मानता है जिन्हें माता-पिता की संपत्ति में पूरा अधिकार मिलता है। यहां यह जानना जरूरी है कि अवैध विवाह की वैध संतान केवल माता-पिता की संपत्ति के ही हकदार होते हैं, परिवार के अन्य पूर्वजों की संपत्ति पर उनका अधिकार नहीं होता।
विशेष - शून्य विवाह को कोई तीसरा पक्ष भी चुनौती दे सकता है।

शून्यकरणीय विवाह धारा 12 - यह शून्यकरणीय विवाह वह विवाह है जो कानून की नजर में तब तक पूरी तरह वैध रहता है, जब तक कि पीड़ित पक्ष (पति या पत्नी) अदालत में जाकर इसे रद्द करने की डिक्री प्राप्त न कर ले। यदि पीड़ित पक्ष चुनौती नहीं देता, तो यह विवाह जीवनभर वैध बना रहता है।
1. शून्यकरणीय विवाह के आधार - 
I. नपुंसकता - पति या पत्नी में से कोई एक दाम्पत्य जीवन के योग्य नहीं होने को नपुंसकता कहते हैं। संतानोत्पत्ति नपुंसकता का आधार नहीं है।
II. बल प्रयोग या धोखाधड़ी - जबरदस्ती या धोखाधड़ी से ली गई सहमति। यदि विवाह के लिए सहमति शारीरिक बल के प्रयोग से ली गई हो या किसी महत्वपूर्ण तथ्य (जैसे- आयु, चरित्र या पहचान) को छिपाकर धोखे से प्राप्त की गई हो।
3.वधु का गर्भवती होना - विवाह के समय दुल्हन का किसी अन्य से गर्भवती होना। यदि विवाह के समय पत्नी किसी अन्य व्यक्ति से गर्भवती थी और पति को इस तथ्य की जानकारी नहीं थी।
4. मानसिक अस्वस्थता - यदि विवाह के समय कोई भी पक्ष धारा 5(ii) की शर्तों को पूरा नहीं करता था (जैसे- सहमति देने में असमर्थ होना या बार-बार पागलपन के दौरे पड़ना)।
2. शर्त और समय सीमा - शून्यकरणीय विवाह को रद्द कराने के लिए कुछ विशेष नियमों का पालन करना होता है:
I. धोखाधड़ी के मामले में - यदि सहमति धोखे से ली गई है, तो याचिका उस धोखे का पता चलने के एक वर्ष के भीतर दायर की जानी चाहिए।
II. सहवास - यदि धोखे का पता चलने के बाद या बल प्रयोग समाप्त होने के बाद भी पीड़ित पक्ष अपनी मर्जी से साथ रहने लगता है, तो विवाह को रद्द करने का अधिकार खत्म हो जाता है।
III. पूर्व गर्भावस्था - इस आधार पर याचिका तभी स्वीकार होती है जब पति को विवाह के समय उस गर्भावस्था की जानकारी न हो और जानकारी होने के बाद उसने यौन संबंध न बनाए हों।
3. बच्चों की कानूनी स्थिति (धारा 16) - शून्य विवाह की तरह ही, शून्यकरणीय विवाह से उत्पन्न संतानें भी कानूनन वैध मानी जाती हैं। भले ही अदालत विवाह को रद्द कर दे, बच्चों का अपने माता-पिता की संपत्ति पर पूरा अधिकार बना रहता है।
निष्कर्ष - एक वैध विवाह के लिए केवल रस्में ही काफी नहीं हैं, बल्कि कानून द्वारा निर्धारित उम्र और संबंधों की मर्यादा का पालन करना भी आवश्यक है। जहाँ शून्य विवाह स्वतः ही रद्द होता है, वहीं शून्यकरणीय विवाह में पीड़ित पक्ष को अपनी इच्छा से उसे समाप्त करने का विकल्प मिलता है।

दाम्पत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना और न्यायिक पृथक्करण - हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 में वैवाहिक विवादों को सुलझाने और पति-पत्नी के बीच संबंधों को नियमित करने के लिए दो महत्वपूर्ण प्रावधान दिए गए हैं - 
1. दाम्पत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना 
2. न्यायिक पृथक्करण
1. दाम्पत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना धारा 9 -जब पति या पत्नी में से कोई एक, बिना किसी उचित कारण के, दूसरे का साथ छोड़ देता है और अलग रहने लगता है, तो पीड़ित पक्ष अदालत से गुहार लगा सकता है कि उनके साथी को वापस साथ रहने का आदेश दिया जाए।
मुख्य शर्तें - 
I. पति-पत्नी एक-दूसरे से अलग रह रहे हों।
II. अलग रहने का कोई उचित कारण न हो।
III. अदालत याचिकाकर्ता की बातों से संतुष्ट हो कि याचिका नेकनीयती से दायर की गई है।
प्रभाव - अदालत द्वारा डिक्री पारित कर अलग रहने वाले साथी को वापस आकर साथ रहने का कानूनी निर्देश दिया जाता है।
महत्व - इसका उद्देश्य विवाह को टूटने से बचाना और सुलह का अवसर प्रदान करना।
नोट - यदि इस डिक्री के पारित होने के 1 वर्ष के भीतर भी दोनों साथ नहीं रहते, तो यह तलाक का आधार बन सकता है।
2. न्यायिक पृथक्करण धारा 10 - न्यायिक पृथक्करण ऐसी स्थिति है जहाँ विवाह कानूनी रूप से बना रहता है, लेकिन पति-पत्नी को एक-दूसरे के साथ रहने की बाध्यता से मुक्ति मिल जाती है। यह तलाक से ठीक पहले का कदम माना जा सकता है।
मुख्य आधार - इसके आधार वही हैं जो धारा 13 (तलाक) के तहत दिए गए हैं, जैसे:
I. क्रूरता
II. परित्याग - कम से कम 2 वर्ष से।
III. व्यभिचार (Adultery)
IV. धर्म परिवर्तन
V. मानसिक विकार या संक्रामक रोग।
प्रभाव - 
I. विवाह का बंधन खत्म नहीं होता।
II. वे कानूनी रूप से अलग रह सकते हैं और एक-दूसरे के प्रति वैवाहिक कर्तव्यों के लिए बाध्य नहीं होते।
III. पक्षकार दूसरा विवाह नहीं कर सकते।
IV. बदलाव - यदि भविष्य में दोनों के बीच सुलह हो जाती है, तो वे अदालत में आवेदन देकर इस डिक्री को रद्द करवा सकते हैं और पुनः साथ रह सकते हैं।

तलाक (Divorce) 
तलाक के कानूनी प्रावधानों को हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत समझा जा सकता है।
1. आपसी सहमति से तलाक धारा 13B - जब पति और पत्नी दोनों इस बात पर सहमत हों कि वे अब एक साथ नहीं रह सकते और अपनी मर्जी से विवाह समाप्त करना चाहते हैं, तो इसे आपसी सहमति से तलाक कहा जाता है।
I. शर्तें - दोनों कम से कम 1 साल से अलग रह रहे हों।
II. वे साथ रहने में असमर्थ हों।
III. दोनों ने आपसी समझौते से विवाह भंग करने का निर्णय लिया हो।
प्रक्रिया - इसमें दो प्रस्ताव होते हैं। पहले प्रस्ताव के बाद अदालत 6 महीने का समय (कूलिंग पीरियड) देती है, हालांकि सुप्रीम कोर्ट के अनुसार विशेष परिस्थितियों में इसे कम किया जा सकता है)। यदि दूसरे प्रस्ताव तक सुलह नहीं होती है तो तलाक की डिक्री दे दी जाती है।
2. तलाक के मुख्य आधार धारा 13 - यदि एक पक्ष तलाक चाहता है और दूसरा नहीं तो निम्नलिखित आधारों पर याचिका दायर की जा सकती है - 
I. व्यभिचार - जीवनसाथी का किसी अन्य व्यक्ति के साथ स्वैच्छिक यौन संबंध।
II. क्रूरता - शारीरिक या मानसिक प्रताड़ना।
III. परित्याग - बिना किसी उचित कारण के कम से कम 2 वर्ष से जीवनसाथी को छोड़ देना।
IV. धर्म परिवर्तन - जीवनसाथी का हिंदू धर्म छोड़कर कोई अन्य धर्म अपना लेना।
V. असाध्य मानसिक विकार - यदि जीवनसाथी का मानसिक संतुलन ठीक न हो।
VI. संक्रामक रोग या कुष्ठ रोग - (अब कई संशोधनों के बाद इसे सीमित कर दिया गया है)।
3. तलाक की कार्यवाही में वैकल्पिक राहत धारा 13A - 
अदालत के पास यह शक्ति होती है कि वह कुछ मामलों में सीधे तलाक न देकर न्यायिक पृथक्करण की डिक्री दे दे।
उद्देश्य - यदि अदालत को लगता है कि रिश्ते में सुधार की गुंजाइश है या तलाक का आधार पर्याप्त मजबूत नहीं है, तो वह विवाह को तुरंत खत्म करने के बजाय पक्षों को अलग रहने की अनुमति दे सकती है।
प्रभाव - न्यायिक पृथक्करण में शादी का कानूनी अस्तित्व बना रहता है, लेकिन पति-पत्नी की एक-दूसरे के साथ रहने की बाध्यता खत्म हो जाती है। यदि एक साल तक पृथक्करण के बाद भी सुलह नहीं होती, तो यह बाद में तलाक का आधार बन सकता है।
महत्वपूर्ण नोट - भारत में अलग-अलग धर्मों के लिए अलग-अलग कानून हैं (जैसे मुस्लिमों के लिए मुस्लिम पर्सनल लॉ, ईसाइयों के लिए तलाक अधिनियम 1869)। ऊपर दी गई जानकारी मुख्य रूप से हिंदू कानून पर आधारित है जो सिखों, जैनियों और बौद्धों पर भी लागू होती है।

तलाक पर एक साल की रोक, तलाकशुदा व्यक्ति दोबारा कब शादी कर सकते हैं, अधिकार क्षेत्र और अदालती प्रक्रिया - 
1. तलाक की याचिका पर एक साल की रोक धारा 14 - कानून यह मानता है कि विवाह के शुरुआती समय में छोटे-मोटे झगड़े हो सकते हैं, इसलिए जल्दबाजी में लिए गए फैसलों को रोकने के लिए धारा 14 के तहत एक विशेष प्रावधान है - 
I. नियम - शादी की तारीख से 1 वर्ष पूरा होने से पहले तलाक की याचिका अदालत में पेश नहीं की जा सकती।
II. अपवाद - यदि याचिकाकर्ता को असाधारण कष्ट हो रहा हो या दूसरे पक्ष का व्यवहार असाधारण भ्रष्टता वाला हो, तो अदालत एक साल से पहले भी याचिका स्वीकार कर सकती है। इसके लिए अलग से आवेदन देना होता है।
2. दोबारा शादी कब कर सकते हैं? धारा 15 - तलाक के बाद दूसरी शादी करने हेतु कुछ समय का इंतजार करना कानूनी रूप से अनिवार्य है - 
I. अपील की अवधि (90 दिन) - तलाक की डिक्री मिलने के बाद 90 दिनों तक रुकना पड़ता है। यह समय इसलिए दिया जाता है ताकि यदि दूसरा पक्ष फैसले के खिलाफ ऊपरी अदालत में अपील करना चाहे, तो कर सके।
II. शर्तें - 
1. यदि अपील करने का समय (90 दिन) बीत चुका हो और कोई अपील न की गई हो।
2. यदि अपील की गई थी, लेकिन वह खारिज हो गई हो।
आपसी सहमति से तलाक - चूंकि इसमें दोनों पक्ष सहमत होते हैं, इसलिए इसमें अपील की गुंजाइश नहीं रहती फिर भी कानूनी सुरक्षा हेतु डिक्री के अंतिम होने तक इंतजार करना उचित है।
3. अधिकार क्षेत्र धारा 19 - तलाक की याचिका कहाँ दायर की जा सकती है? कानून के अनुसार, आप इन चार में से किसी भी जगह के जिला पारिवारिक न्यायालय में मामला दर्ज कर सकते हैं - 
I. जहाँ विवाह संपन्न हुआ था।
II. जहाँ प्रतिवादी (जिसके खिलाफ केस किया जा रहा है) याचिका दायर करने के समय रह रहा हो।
III. जहाँ पति-पत्नी आखिरी बार साथ रहे थे।
IV. यदि पत्नी याचिकाकर्ता है, तो जहाँ वह वर्तमान में रह रही है।
4. अदालती प्रक्रिया - 
I. याचिका दायर करना - वकील के माध्यम से उचित आधारों के साथ याचिका कोर्ट में दी जाती है।
II. समन जारी करना - कोर्ट दूसरे पक्ष को नोटिस भेजकर हाजिर होने के लिए कहता है।
III. जवाब और सुलह - दूसरा पक्ष अपना जवाब दाखिल करता है। कोर्ट सबसे पहले मध्यस्थता के जरिए समझौता कराने की कोशिश करता है।
IV. साक्ष्य और बहस - यदि समझौता न हो, तो दोनों पक्ष अपने गवाह और सबूत पेश करते हैं। इसके बाद दोनों पक्षों के वकीलों की बहस होती है।
V. अंतिम फैसला - सभी तथ्यों को देखने के बाद जज तलाक की डिक्री जारी करते हैं।

                 UNIT - III
हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 एवं हिन्दू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 - इस अधिनियम में कुल 31 धाराएं हैं, जिन्हें 4 अध्यायों में विभाजित किया गया है। 2005 के संशोधन ने इसकी धाराओं (विशेषकर धारा 6) के प्रभाव में व्यापक बदलाव किए हैं।
अध्याय 1: प्रारंभिक (धारा 1 से 4)
धारा 1 - इस अधिनियम का नाम हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 है जो पूरे भारत पर लागू है।
धारा 2 - यह हिंदुओं हिन्दू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 2 के अनुसार मुस्लिम, ईसाई के पारसी को छोड़कर सिक्ख, जैन, बौद्ध और सनातनी (शेव व वैष्णव) व्यक्तियों/धर्मों पर लागू होता है।
धारा 3 - परिभाषाएँ और निर्वचन (जैसे - अग्नेट, कॉग्नेट, पूर्ण रक्त, अर्ध रक्त आदि)।
धारा 4 - अधिनियम का अध्यारोही प्रभाव (यह अधिनियम पुराने रिवाजों और कानूनों को समाप्त करता है)।
अध्याय 2: निर्वसीयत उत्तराधिकार -यह अध्याय तब लागू होता है जब कोई व्यक्ति बिना वसीयत किए मर जाता है।
सामान्य प्रावधान - 
धारा 5 - यह अधिनियम किन संपत्तियों पर लागू नहीं होता (जैसे - विशेष विवाह अधिनियम के तहत हुई शादियाँ)।
धारा 6 - (अत्यंत महत्वपूर्ण) संयुक्त परिवार (HUF) की संपत्ति में हितों का हस्तांतरण। 2005 के बाद इसमें बेटियों को बेटों के समान अधिकार दिए गए हैं।
धारा 7 - मरुमक्कट्टयम या अलियासंतान कानून के तहत आने वाली संपत्तियों का उत्तराधिकार।
पुरुष के उत्तराधिकार के नियम - 
धारा 8 - एक हिंदू पुरुष की संपत्ति के उत्तराधिकार के सामान्य नियम।
धारा 9 - उत्तराधिकार का क्रम (अनुसूची के अनुसार श्रेणी I, श्रेणी II आदि)।
धारा 10 - श्रेणी I के वारिसों के बीच संपत्ति के वितरण के नियम।
धारा 11 - श्रेणी II के वारिसों के बीच वितरण।
धारा 12 - सपिण्डों और सगोत्रों के बीच उत्तराधिकार का क्रम।
धारा 13 - हिस्से की गणना के नियम।
महिला के उत्तराधिकार के नियम - 
धारा 14 - हिंदू महिला की संपत्ति उसकी पूर्ण संपत्ति होगी (सीमित अधिकार का अंत)।
धारा 15 - हिंदू महिला की संपत्ति के उत्तराधिकार के सामान्य नियम।
धारा 16 - महिला के वारिसों के बीच वितरण का क्रम।
सामान्य प्रावधान और अयोग्यताएं - 
धारा 17 - मरुमक्कट्टयम और अलियासंतान समुदायों के लिए विशेष प्रावधान।
धारा 18 - पूर्ण रक्त को अर्ध रक्त पर प्राथमिकता।
धारा 19 - जब दो या अधिक वारिस एक साथ संपत्ति पाते हैं।
धारा 20 - गर्भस्थ शिशु के अधिकार।
धारा 21- संमरण - यदि दो लोग साथ मरें, तो माना जाएगा कि छोटा व्यक्ति बाद में मरा।
धारा 22 - वरीयता का अधिकार - संपत्ति बेचने पर वारिसों को खरीदने का पहला हक।
धारा 23 - निवास गृह के संबंध में विशेष प्रावधान (2005 में इसे निरस्त/संशोधित कर दिया गया)।
धारा 24 - कुछ विधवाओं का पुनर्विवाह होने पर उत्तराधिकार से वंचित होना (2005 में निरस्त)।
धारा 25 - हत्यारा उत्तराधिकार से अयोग्य होगा।
धारा 26 - धर्म परिवर्तन करने वाले के वंशजों की अयोग्यता।
धारा 27 - अयोग्यता का प्रभाव (माना जाएगा कि अयोग्य व्यक्ति मर चुका है)।
धारा 28 - बीमारी या अंग-दोष के आधार पर कोई अयोग्यता नहीं होगी।
राजगामी संपत्ति
धारा 29 - वारिस न होने पर संपत्ति सरकार (राज्य) को मिलना (Escheat)।
अध्याय 3 वसीयती उत्तराधिकार - 
धारा 30 - वसीयत बनाने का अधिकार। कोई भी हिंदू अपनी संपत्ति (और पैतृक संपत्ति में अपने हिस्से) की वसीयत कर सकता है।
अध्याय 4 निरसन (Repeal) - 
धारा 31- निरसन (अधिनियम के पुराने कानूनों को निरस्त करना)।
महत्वपूर्ण अनुसूची - अधिनियम के अंत में एक अनुसूची है जो वारिसों को दो श्रेणियों में बांटती है:
श्रेणी I - पत्नी, पुत्र, पुत्री, माता, और मृत बच्चों के वारिस।
श्रेणी II - पिता, भाई, बहन, सौतेले रिश्तेदार आदि।

हिंदू व्यक्ति की संपत्ति एवं उत्तराधिकार - संपति का उत्तराधिकार एवं वितरण हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 (2005 के संशोधन के साथ) द्वारा विनियमित किया जाता है। जब हम एक हिन्दू पुरुष की संपत्ति की बात करते हैं, तो इसे दो मुख्य भागों में बांटा जाता है - 
1. स्व-अर्जित संपत्ति
2. पैतृक (संयुक्त परिवार) से प्राप्त संपत्ति।
1. स्व-अर्जित संपत्ति का उत्तराधिकार - यदि किसी हिन्दू पुरुष ने अपनी कमाई, वसीयत या उपहार से संपत्ति अर्जित की है और उसने कोई वसीयत नहीं की है, तो उसकी मृत्यु के बाद संपत्ति को प्राथमिकता के आधार पर चार श्रेणियों में बांटा जाता है:
श्रेणी-I के उत्तराधिकारी - सबसे पहले संपत्ति इन लोगों में बराबर बांटी जाती है - 
I. पत्नी
II. बेटे और बेटियां (विवाहित या अविवाहित दोनों)
III. माता (ध्यातव्य - पिता श्रेणी -I में नहीं आते)
IV. मृत बच्चों के वारिस (यदि कोई बेटा या बेटी पहले ही मर चुके हों)।
श्रेणी-II के उत्तराधिकारी - यदि श्रेणी -I का कोई भी सदस्य जीवित न हो, तब संपत्ति श्रेणी -II के वारिसों को मिलती है - 
I. पिता
II. भाई/बहन
III. सौतेले भाई/बहन
IV. अन्य रिश्तेदार
2. संयुक्त परिवार संपत्ति - हिन्दू अविभाजित परिवार (HUF) में संपत्ति का अधिकार जन्म से ही मिल जाता है।
I. सहदायिक - परिवार के सभी पुरुष सदस्य और 2005 के संशोधन के बाद सभी बेटियां जन्म से ही सहदायिक होती हैं। इसका मतलब है कि उन्हें पैतृक संपत्ति में बराबर का हिस्सा मांगने का अधिकार है।
II. विभाजन - एक सहदायिक किसी भी समय परिवार की संपत्ति के बंटवारे की मांग कर सकता है।
III. उत्तरजीविता का नियम - पहले नियम था कि किसी सदस्य की मृत्यु पर उसका हिस्सा बचे हुए सदस्यों में बंट जाता था, लेकिन अब (2005 के बाद) मृत व्यक्ति का हिस्सा उसके कानूनी वारिसों (पत्नी, बच्चे, मां) को मिलता है।
3. हिन्दू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 का महत्व - यह संशोधन भारतीय कानून में मील का पत्थर है, जिसने महिलाओं को संपत्ति में समान अधिकार दिए:
I. बेटियां अब सहदायिक हैं - अब बेटी का संपत्ति पर उतना ही हक है जितना बेटे का, चाहे उसकी शादी हो चुकी हो या नहीं।
II. पिता की मृत्यु की तारीख - सुप्रीम कोर्ट (विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा मामला) ने स्पष्ट किया है कि बेटी का अधिकार जन्म से है, भले ही पिता की मृत्यु 2005 के संशोधन से पहले हुई हो।
विशेष बिंदु कर्ता की शक्तियांसंयुक्त परिवार में कर्ता (आमतौर पर घर का मुखिया) के पास संपत्ति के प्रबंधन के व्यापक अधिकार होते हैं। वह कानूनी आवश्यकता या परिवार के लाभ के लिए संपत्ति को बेच भी सकता है, लेकिन इसके लिए ठोस कारण होना अनिवार्य है।

हिन्दू उत्तराधिकार कानून में संपत्ति के हित का उत्तराधिकार
यह उत्तराधिकार इस बात पर निर्भर करता है कि संपत्ति स्व-अर्जित है या पैतृक। 2005 के संशोधन ने इन नियमों में क्रांतिकारी बदलाव किए हैं।
मुख्य नियमों का विवरण नीचे दिया गया है
1. पैतृक संपत्ति में हित का उत्तराधिकार धारा 6 - जब किसी हिन्दू पुरुष की मृत्यु होती है और उसके पास मिताक्षरा संयुक्त परिवार की संपत्ति में हिस्सा होता है, तो उत्तराधिकार के नियम इस प्रकार हैं - 
I. समान अधिकार - अब पुत्रियों को भी पुत्रों के समान ही जन्म से सहदायिक माना जाता है। उनका हिस्सा और उत्तरदायित्व पुत्रों के बराबर होता है।
II. उत्तरजीविता का अंत - पहले सदस्य की मृत्यु पर उसका हिस्सा बचे हुए पुरुषों में बंट जाता था। लेकिन अब नियम यह है कि मृत व्यक्ति का हिस्सा उसके कानूनी वारिसों (Class -I) को मिलेगा।
काल्पनिक विभाजन - यह गणना करने के लिए कि मृतक का हिस्सा कितना था, यह माना जाता है कि उसकी मृत्यु से ठीक पहले परिवार का बंटवारा हुआ था।
2. निर्वसीयत उत्तराधिकार के सामान्य नियम धारा 8 - यदि किसी हिन्दू पुरुष ने अपनी संपत्ति के लिए कोई वसीयत नहीं की है, तो उसकी संपत्ति (स्व-अर्जित और पैतृक हिस्सा) निम्नलिखित क्रम में हस्तांतरित होती है - 
अ. श्रेणी-I के वारिस - ये सबसे पहले हकदार होते हैं और संपत्ति को आपस में बराबर बांटते हैं - 
I. पत्नी (विधवा)
II. बच्चे (पुत्र और पुत्रियाँ)
III. माता
IV. मृत बच्चों के वारिस (जैसे मृत पुत्र की विधवा या उसके बच्चे)।
                            A                       
I                 I        I                      I  W           S/D    M           PS/D'S/D
A- मृतक, S- पुत्र, D- पुत्री, PS- मृतक संतान की संतान
ब. श्रेणी-II के वारिस - यदि श्रेणी- I में कोई भी जीवित न हो, तब संपत्ति श्रेणी- II को जाती है (जैसे पिता, भाई, बहन आदि)।
स. सपिण्ड और सगोत्र - यदि श्रेणी- II में भी कोई न हो, तो दूर के रिश्तेदारों को प्राथमिकता दी जाती है।
3. संपत्ति वितरण के विशेष सिद्धांत - 
I. पूर्ण स्वामित्व धारा 14 - हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की इस धारा के तहत किसी महिला द्वारा प्राप्त की गई कोई भी संपत्ति उसकी पूर्ण संपत्ति होती है। वह उसे बेचने या वसीयत करने हेतु पूर्ण रुपेण स्वतंत्र है।
II. विवाह का प्रभाव - बेटी की शादी होने से उसके पैतृक संपत्ति के अधिकार समाप्त नहीं होते। वह अपने पिता की संपत्ति में हिस्सा लेने की वैसी ही हकदार है जैसी वह अविवाहित रहने पर होती।
III. हत्यारा उत्तराधिकारी नहीं धारा 25 - यदि कोई व्यक्ति संपत्ति पाने के लालच में संपत्ति के मालिक की हत्या कर देता है, तो वह उत्तराधिकार के अयोग्य हो जाता है ()।
4. वसीयतनामा उत्तराधिकार धारा 30 - कोई भी हिन्दू पुरुष अपनी स्व-अर्जित संपत्ति और संयुक्त परिवार संपत्ति में अपने अविभाजित हिस्से का निपटारा वसीयत के माध्यम से कर सकता है। यदि वसीयत वैध है, तो फिर ऊपर दिए गए उत्तराधिकार के सामान्य नियम लागू नहीं होंगे, बल्कि वसीयत के अनुसार ही संपत्ति का वितरण होगा।

पूर्ण स्वामित्व का अधिकार धारा 14 - 
हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 14 ने हिन्दू महिलाओं के संपत्ति के अधिकारों में ऐतिहासिक बदलाव किया। इसने महिलाओं को सीमित स्वामी से हटाकर पूर्ण स्वामी का दर्जा दिया।
मुख्य प्रावधान - 
1. महिला का संपत्ति पर पूर्ण अधिकार धारा 14 - 
I. पूर्ण संपत्ति - अधिनियम की धारा 14 (1) स्पष्ट करती है कि किसी हिन्दू महिला के पास मौजूद कोई भी संपत्ति (चाहे वह इस अधिनियम के लागू होने से पहले मिली हो या बाद में) उसकी पूर्ण संपत्ति होगी।
II. प्राप्ति के स्रोत - संपत्ति चाहे विरासत, विभाजन, भरण-पोषण, उपहार, या स्वयं की मेहनत से अर्जित की गई हो, महिला उसकी मालिक है।
III. सीमित अधिकार का अंत - पुराने कानून में महिलाओं को संपत्ति केवल जीवन भर इस्तेमाल के लिए मिलती थी, लेकिन अब वह उसे बेचने, उपहार देने या वसीयत करने हेतु पूर्णतया स्वतंत्र है।
2. हिन्दू महिला की संपत्ति के उत्तराधिकार के नियम (Section 15 & 16) - यदि कोई हिन्दू महिला अपनी संपत्ति की वसीयत किए बिना मर जाती है, तो उसकी संपत्ति का बंटवारा उत्तराधिकार के एक विशेष क्रम में होता है - 
अ. सामान्य नियम - संपत्ति निम्नलिखित प्राथमिकता के आधार पर बांटी जाती है:
I. सबसे पहले - बेटे, बेटियां (मृत बच्चों के बच्चों सहित) और पति को बराबर हिस्सा मिलता है।
II. यदि ऊपर कोई न हो - पति के वारिसों को।
III. यदि पति के वारिस भी न हों - माता और पिता को।
IV. यदि माता-पिता न हों - पिता के वारिसों को।
अंत में - माता के वारिसों को।
3. संपत्ति के स्रोत के आधार पर विशेष नियम - कानून यहाँ एक बहुत ही महत्वपूर्ण अंतर करता है। यदि महिला को संपत्ति उसके मायके या ससुराल से मिली है और उसकी कोई संतान नहीं है, तो नियम बदल जाते हैं - 
पिता या माता से विरासत में मिली संपत्ति - यदि महिला की कोई संतान (बेटा/बेटी) नहीं है, तो यह संपत्ति पति के वारिसों को जाने के बजाय वापस पिता के वारिसों को चली जाएगी।
पति या ससुर से विरासत में मिली संपत्ति - यदि महिला की कोई संतान नहीं है, तो यह संपत्ति उसके पिता के वारिसों को जाने के बजाय पति के वारिसों को जाएगी।
विशेष बिंदु, स्त्रीधन - स्त्रीधन वह संपत्ति है जो महिला को उसके विवाह के समय या उसके बाद उपहार स्वरूप मिलती है। इस पर महिला का विशेष अधिकार होता है। ससुराल वाले इसे केवल न्या के तौर पर रख सकते हैं, वे इसके मालिक नहीं होते। महिला किसी भी समय अपना स्त्रीधन वापस मांग सकती है। स्त्रीधन पर किसी भी स्थिति में (मृत्यु पर्यन्त) किसी अन्य का कोई अधिकार नहीं होता है।

हिंदू उत्तराधिकार एवं भरण-पोषण - हिन्दू उत्तराधिकार और भरण-पोषण के ये नियम कानून की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
1. उत्तराधिकार की अयोग्यता के आधार (धारा 24 से 28) - 
हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 24 से 28 के तहत कुछ ऐसी स्थितियां बताई गई हैं जहाँ एक व्यक्ति कानूनी वारिस होने के बावजूद संपत्ति प्राप्त करने का हक खो देता है - 
I. हत्यारा (धारा - 25) - यदि कोई व्यक्ति संपत्ति पाने के लालच में संपत्ति के मालिक की हत्या करता है या हत्या के लिए उकसाता है, तो वह उस संपत्ति को प्राप्त करने के अयोग्य हो जाता है।
II. धर्म परिवर्तन (धारा - 26) - यदि कोई हिन्दू धर्म बदलकर दूसरा धर्म अपना लेता है, तो वह खुद तो उत्तराधिकारी बना रहता है, लेकिन धर्म परिवर्तन के बाद पैदा हुए उसके बच्चे और उनके वंशज अपने हिन्दू रिश्तेदारों की संपत्ति के हकदार नहीं रहते (जब तक कि वे मृत्यु के समय हिन्दू न हों)।
III. अयोग्यता के अन्य आधार धारा 28 - कानून स्पष्ट करता है कि किसी बीमारी, शारीरिक दोष या अंग-भंग के आधार पर किसी को उत्तराधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।
2. राजगामी संपत्ति धारा 29 - जब किसी हिन्दू व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है और उसका कोई भी उत्तराधिकारी (श्रेणी-I, श्रेणी-II, सपिण्ड या सगोत्र) जीवित नहीं होता, तो ऐसी स्थिति में उसकी संपत्ति सरकार के पास चली जाती है। इसे ही राजगामी का सिद्धांत कहते हैं।
सरकार उस संपत्ति को उन सभी दायित्वों और कर्जों के साथ स्वीकार करती है जो उस व्यक्ति पर अपनी मृत्यु के समय थे।
3. न्यायिक प्रतिक्रियाएं - उत्तराधिकार के विवादों में अदालतें मुख्य रूप से दो प्रकार की कार्यवाही करती हैं - 
उत्तराधिकार प्रमाण पत्र - चल संपत्ति (जैसे बैंक बैलेंस, शेयर) के लिए।
प्रोबेट या लेटर ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन - वसीयत को प्रमाणित करने और अचल संपत्ति के हस्तांतरण हेतु।

4. हिन्दू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम (HAMA), 1956 - इस अधिनियम में कुल 30 धाराएं हैं, जिन्हें चार अध्यायों में विभाजित किया गया है। यह अधिनियम हिंदुओं के बीच गोद लेने और आश्रितों के भरण-पोषण से संबंधित कानूनों को संहिताबद्ध करता है।
यहाँ सभी धाराओं का संक्षिप्त विवरण दिया गया है:
अध्याय 1: प्रारंभिक 
धारा 1 - इस अधिनियम का नाम हिंदू दत्तक ग्रहण एवं भरण पोषण अधिनियम 1956 होगा जो सम्पूर्ण भारत में लागू होगा।
धारा 2 - यह अधिनियम हिन्दू (हिंदू, जैन, बौद्ध और सिक्खों पर लागू होगा)
धारा 3 - परिभाषाएँ - 
I. भरण-पोषण - इसमें केवल भोजन ही नहीं, बल्कि आवास, वस्त्र, चिकित्सा और शिक्षा भी शामिल है।
II. गोद (दत्तक) लेना - एक बार बच्चा गोद ले लिया जाए, तो उसका अपने जन्म के परिवार से नाता खत्म हो जाता है और वह गोद लेने वाले माता-पिता का कानूनी वारिस बन जाता है।
धारा 4 - अधिनियम का अध्यारोही प्रभाव (पुराने रिवाजों का अंत)।
अध्याय 2: दत्तक ग्रहण (धारा 4 से 17 तक - यह अध्याय गोद लेने की प्रक्रिया और उसकी वैधता को निर्धारित करता है।
धारा 5 - दत्तक ग्रहण का इस अध्याय के अनुरूप होना अनिवार्य है।
धारा 6 - वैध दत्तक ग्रहण की आवश्यक शर्तें।
धारा 7 - हिंदू पुरुष की गोद लेने की सामर्थ्य (पत्नी की सहमति आवश्यक)।
धारा 8 - हिंदू महिला की गोद लेने की सामर्थ्य।
धारा 9 - दत्तक देने के लिए सक्षम व्यक्ति (माता, पिता या संरक्षक)।
धारा 10 - जिसे दत्तक लिया जा सकता है (बच्चे की पात्रता)।
धारा 11 - एक वैध दत्तक ग्रहण की अन्य शर्तें (जैसे आयु का अंतर)।
धारा 12 - दत्तक ग्रहण के परिणाम (बच्चे का नए परिवार में कानूनी स्थान)।
धारा 13 - दत्तक माता-पिता का अपनी संपत्ति के निपटारे का अधिकार।
धारा 14 - कुछ मामलों में दत्तक माता का निर्धारण।
धारा 15 - वैध दत्तक ग्रहण को रद्द नहीं किया जा सकता।
धारा 16 - दत्तक ग्रहण के पंजीकृत दस्तावेजों के बारे में उपधारणा।
धारा 17 - दत्तक ग्रहण के बदले भुगतान पर रोक (दंडनीय अपराध)।
अध्याय 3 - भरण-पोषण धारा 18 से 28 तक) - यह अध्याय पत्नी, बच्चों और अन्य आश्रितों के अधिकारों की रक्षा करता है।
धारा 18 - पत्नी का भरण-पोषण (पति के साथ या अलग रहकर)।
धारा 19 - विधवा पुत्रवधू का भरण-पोषण (ससुर की जिम्मेदारी)।
धारा 20 - बच्चों और वृद्ध माता-पिता का भरण-पोषण।
धारा 21 - आश्रितों की परिभाषा (9 श्रेणियों की सूची) - किसी हिन्दू पुरुष या महिला की मृत्यु के बाद, उसकी संपत्ति के वारिसों की यह कानूनी जिम्मेदारी होती है कि वे उस संपत्ति से निम्नलिखित आश्रितों का भरण-पोषण करें - 
I. माता - मृतक की माँ।
II. पिता - मृतक के पिता।
III. विधवा - मृतक की विधवा जब तक वह पुनर्विवाह नहीं कर लेती।
IV. नाबालिग पुत्र - 18 वर्ष से कम आयु वाकोजब तक वह 18 वर्ष का (बालिग) नहीं हो जाता। यह पुत्र वैध या अवैध दोनों हो सकता है।
V. अविवाहित पुत्री - मृत व्यक्ति की वैध या अवैध पुत्री, जब तक कि वह विवाह नहीं कर लेती।
VI. विधवा पुत्री - यदि वह अपने पति की संपत्ति या अपने ससुर/बच्चों से भरण-पोषण प्राप्त करने में असमर्थ है।
VII. मृत पुत्र की विधवा - जब तक वह पुनर्विवाह नहीं कर लेती, बशर्ते वह अपने पति या बच्चों की संपत्ति से गुजारा न कर पा रही हो।
मृत पुत्र के बच्चे -
A. मृत पुत्र का नाबालिग बेटा।
B. मृत पुत्र की अविवाहित बेटी।
(यदि वे अपने माता-पिता की संपत्ति से भरण-पोषण न पा रहे हों तो)।
VIII. मृत पुत्र के मृत पुत्र की विधवा और बच्चे - इसी क्रम में अगली पीढ़ी के आश्रित भी शामिल होते हैं।
विशेष कानूनी शर्तें - 
I. मृतक के आश्रित का हिन्दू होना अनिवार्य धारा 24 - कोई भी व्यक्ति आश्रित के रूप में भरण-पोषण पाने का हकदार तभी होगा जब वह हिन्दू बना रहे। यदि वह धर्म परिवर्तन कर लेता है, तो उसका यह अधिकार समाप्त हो जाता है।
II. स्वयं की आय - यदि किसी आश्रित के पास स्वयं की पर्याप्त आय या संपत्ति है जिससे वह अपना गुजारा कर सकता है, तो वह मृतक की संपत्ति से भरण-पोषण का दावा नहीं कर सकता।
III. भरण-पोषण का दायित्व धारा 22 - मृतक की संपत्ति जिस वारिस को मिलती है, वह उस संपत्ति की सीमा तक इन आश्रितों को भरण-पोषण देने के लिए कानूनी रूप से बाध्य है।
धारा 22 - आश्रितों का भरण-पोषण (मृतक की संपत्ति लेने वाले वारिसों का दायित्व)।
धारा 23 - भरण-पोषण की राशि का निर्धारण (अदालत द्वारा विचार किए जाने वाले बिंदु)।
धारा 24 - भरण-पोषण के दावेदार का हिंदू होना आवश्यक।
धारा 25 - परिस्थितियों में बदलाव होने पर भरण-पोषण की राशि में परिवर्तन।
धारा 26 - भरण-पोषण का दावा कब एक भार बन जाता है।
धारा 27 - भरण-पोषण के लिए संपत्ति के हस्तांतरण का प्रभाव।
धारा 28 - भरण-पोषण का अधिकार हस्तांतरणीय नहीं है।
अध्याय 4 - निरसन और व्यावृत्ति 
धारा 29 - निरसन (पुराने कानूनों को हटाना)।
धारा 30 - व्यावृत्ति (अधिनियम लागू होने से पहले हुए दत्तक ग्रहण पर प्रभाव नहीं)।
महत्वपूर्ण बिंदु - 

हिन्दू दत्तक ग्रहण योग्यताएं एवं सीमाएं - HAMA1956 के तहत एक वैध दत्तक ग्रहण हेतु कुछ अनिवार्य शर्तों का पालन करना आवश्यक है। यदि इन शर्तों का उल्लंघन होता है, तो गोद लेना शून्य माना जाता है - 
1. वैध दत्तक ग्रहण की शर्तें धारा 6 - 
किसी भी गोद लेने की प्रक्रिया को कानूनी मान्यता तभी मिलती है जब - 
1. गोद लेने वाला व्यक्ति पात्र हो।
I. गोद देने वाला व्यक्ति सक्षम हो।
II. जिसे गोद लिया जा रहा है, वह गोद लेने योग्य हो।
III. गोद लेने की रस्म (आवश्यक होने पर दत्तक होम आदि की औपचारिकताएं पूरी की गई हों।
2. दत्तक पात्रता
क. गोद लेने वाले की पात्रता धारा 7- 8
- कोई भी बालिग और स्वस्थ मस्तिष्क वाला हिन्दू पुरुष या स्त्री चाहे वह (विवाहित, अविवाहित, तलाकशुदा या विधवा/विधुर हों गोद ले सकते हैं)।
∆. पुरुष - वह बालिग व स्वस्थ मस्तिष्क का होना चाहिए। यदि उसकी पत्नी जीवित है, तो उसकी सहमति अनिवार्य है (जब तक कि पत्नी ने संसार न छोड़ दिया हो या वह मानसिक रूप से अस्वस्थ न हो)।. 
∆. महिला - वह बालिग और स्वस्थ मस्तिष्क की होनी चाहिए। एक अविवाहित, विधवा या तलाकशुदा महिला भी गोद ले सकती है। यदि वह विवाहित है, तो उसे अपने पति की सहमति लेनी होगी।
ख. गोद देने की पात्रता धारा 9 - सिर्फ निम्नलिखित लोग ही बच्चा गोद दे सकते हैं - 
∆. माता और पिता - दोनों की आपसी सहमति अनिवार्य है।
∆. संरक्षक - यदि माता-पिता जीवित न हों या मानसिक रूप से अक्षम हों, तो न्यायालय की अनुमति से संरक्षक बच्चा गोद दे सकता है।
ग. जिसे गोद लिया जा रहा है धारा 10 
I. वह हिन्दू होना चाहिए।
II. वह पहले से गोद लिया हुआ नहीं होना चाहिए।
III. वह अविवाहित होना चाहिए (जब तक कि कोई विशेष प्रथा अनुमति न दे)।
VI. उसकी आयु 15 वर्ष से कम होनी चाहिए (जब तक कि कोई विशेष प्रथा अनुमति न दे)।
3. दत्तक ग्रहण के महत्वपूर्ण प्रतिबंध धारा 11
I. विपरीत लिंग का अंतर - यदि कोई पुरुष किसी लड़की को गोद लेना चाहता है, या कोई महिला किसी लड़के को गोद लेना चाहती है, तो गोद लेने वाले और बच्चे के बीच कम से कम 21 वर्ष का अंतर होना चाहिए।
II. एक ही लिंग का बच्चा - यदि आप बेटा गोद ले रहे हैं, तो आपका अपना कोई जीवित बेटा (या पोता) नहीं होना चाहिए। यही नियम बेटी गोद लेने पर भी लागू होता है।
4. दत्तक ग्रहण के कानूनी प्रभाव धारा 12 - एक बार गोद लेने की प्रक्रिया पूरी होने के बाद, बच्चे की कानूनी स्थिति पूरी तरह बदल जाती है:
I. नए परिवार का सदस्य - बच्चा अपने दत्तक परिवार का वैध बच्चा माना जाता है।
II. पुराने परिवार से संबंध विच्छेद - बच्चे के अपने जन्म देने वाले परिवार के साथ सभी कानूनी अधिकार (जैसे उत्तराधिकार) समाप्त हो जाते हैं।
III. संपत्ति का अधिकार - बच्चा अपने दत्तक माता-पिता की संपत्ति में ठीक वैसा ही अधिकार रखता है जैसा कि उनका अपना सगा बच्चा रखता।
IV. अपरिवर्तनीय - एक बार वैध रूप से गोद लिया गया बच्चा न तो रद्द किया जा सकता है और न ही वह बच्चा वापस अपने जन्म के परिवार में लौट सकता है।
5. अन्य विविध प्रावधान - 
I. पंजीकरण धारा 16 - यदि गोद लेने का कोई पंजीकृत दस्तावेज़ है, तो अदालत यह मानकर चलेगी कि गोद लेना वैध था, जब तक कि उसे गलत साबित न कर दिया जाए।
II. बच्चे को बेचने पर रोक धारा 17 - गोद लेने के बदले किसी भी प्रकार का भुगतान या इनाम देना या लेना पूरी तरह प्रतिबंधित और दंडनीय अपराध है। 
सरकार ने दत्तक ग्रहण संबंधित गतिविधियों की निगरानी रखने हेतु केंद्रीय दत्तक ग्रहण प्राधिकरण (Central Adoption Resource Authority) CARA का गठन किया है। CARA ऑनलाइन प्रक्रिया या अनाथ बच्चों को गोद लेने के बारे में निगरानी रखती है।

भरण-पोषण के हकदार - 
I. पत्नी का अधिकार - पत्नी अपने पति से जीवन भर भरण-पोषण पाने की हकदार है। यदि पति क्रूरता करता है या उसे छोड़ देता है, तो वह अलग रहकर भी इसका दावा कर सकती है।
II. बच्चों और माता-पिता का अधिकार - हिन्दू पुरुष या महिला अपने बूढ़े माता-पिता और नाबालिग बच्चों (वैध या अवैध दोनों) का भरण-पोषण करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य है।
III. विधवा बहू - एक विधवा बहू अपने ससुर से भरण-पोषण मांग सकती है, यदि उसके पास स्वयं की कोई संपत्ति न हो या वह अपने पति/माता-पिता की संपत्ति से गुजारा न कर पा रही हो।

भरण पोषण के तत्व - हिन्दू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 HAMA - के तहत भरण-पोषण केवल नैतिक कर्तव्य नहीं अपितु कानूनी बाध्यता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि परिवार के कमजोर सदस्य बिना किसी आर्थिक अभाव के सम्मानजनक जीवन जी सकें।
1. पत्नी का भरण-पोषण धारा 18 - हिन्दू पत्नी अपने पति से जीवन भर भरण-पोषण प्राप्त करने की हकदार है।
I. अलग रहने का अधिकार - वह पति से अलग रहते हुए भी भरण-पोषण का दावा कर सकती है यदि 
. पति ने उसे बिना किसी कारण के त्याग दिया हो।
. पति उसके साथ क्रूरता का व्यवहार करता हो।
. पति किसी संक्रामक कुष्ठ रोग से पीड़ित हो या उसने दूसरी शादी कर ली हो।
. अयोग्यता - यदि पत्नी व्यभिचार में लिप्त है या उसने धर्म परिवर्तन कर लिया है, तो वह भरण-पोषण का अधिकार खो देती है।
2. बच्चों और वृद्ध माता-पिता का भरण-पोषण धारा  20 - यह धारा एक व्यक्ति पर अपने आश्रितों की देखभाल की जिम्मेदारी डालती है - 
I. बच्चे - माता-पिता अपने नाबालिग बच्चों (वैध या अवैध दोनों) का भरण-पोषण करने के लिए बाध्य हैं। अविवाहित पुत्री तब तक भरण-पोषण की हकदार है जब तक वह अपनी शादी का खर्च खुद उठाने में सक्षम न हो जाए।
II. माता-पिता - अपनी कमाई में सक्षम संतान (बेटा या बेटी) का यह कानूनी कर्तव्य है कि वह अपने वृद्ध या अशक्त माता-पिता का भरण-पोषण करे।
3. विधवा पुत्रवधू का भरण पोषण धारा 19 - विधवा पुत्रवधू अपने ससुर से भरण-पोषण प्राप्त करने की हकदार है, लेकिन इसके लिए कुछ शर्तें हैं - 
I. वह अपने पति की संपत्ति या अपने माता-पिता की संपत्ति से गुजारा करने में असमर्थ हो।
II. ससुर के पास ऐसी पैतृक संपत्ति हो जिसमें से हिस्सा दिया जा सके।
विशेष - यदि विधवा दोबारा शादी कर लेती है, तो उसका यह अधिकार समाप्त हो जाता है।
4. आश्रित और उनका भरण-पोषण धारा 21 व 22 - अधिनियम की धारा 21 में नौ प्रकार के आश्रितो' की सूची दी गई है (ऊपर धाराओं में वर्णित है)
दायित्व - किसी मृत हिन्दू की संपत्ति लेने वाले वारिसों का यह कर्तव्य है कि वे उस संपत्ति से मृतक के आश्रितों का भरण-पोषण करें।
5. भरण-पोषण की राशि का निर्धारण धारा 23 - अदालत राशि तय करते समय निम्नलिखित बिंदुओं पर विचार करती है - 
I. पक्षकारों की स्थिति - उनका सामाजिक और आर्थिक स्तर क्या है ?
II. दावेदार की जरूरतें - भोजन, वस्त्र, आवास, शिक्षा और चिकित्सा।
III. दावेदार की अपनी आय - क्या दावेदार के पास आय का कोई और जरिया है।
IV. उत्तरदायी व्यक्ति की क्षमता - भरण-पोषण देने वाले व्यक्ति की कुल संपत्ति और उसकी देनदारियाँ।
6. न्यायिक प्रतिक्रियाएं - यदि कोई व्यक्ति भरण-पोषण देने से इनकार करता है, तो पीड़ित पक्ष निम्नलिखित कदम उठा सकता है:
I. फॅमिली कोर्ट में आवेदन - HAMA की धाराओं के तहत सिविल वाद दायर करना।
II. अन्तरिम भरण-पोषण - केस के लंबित रहने के दौरान अदालत तुरंत गुजारे के लिए अंतरिम राशि देने का आदेश दे सकती है।
III. CRPC / BNSS धारा 125 - यह एक आपराधिक प्रक्रिया है जो सभी धर्मों के लोगों पर लागू होती है। यह त्वरित राहत के लिए सबसे प्रभावी माध्यम माना जाता है।
IV. डिग्री का निष्पादन - यदि आदेश के बाद भी भुगतान नहीं होता, तो अदालत संपत्ति कुर्क करने या कारावास का आदेश दे सकती है।

                  UNIT -IV 
हिन्दू अप्राप्तवयता और संरक्षकता अधिनियम, 1956 - एक संक्षिप्त लेकिन महत्वपूर्ण कानून है, जिसमें कुल 13 धाराएं हैं। यह अधिनियम 1956 के हिन्दू कोड बिल का ही भाग है जो अवयस्कों (नाबालिगों) के हितों की रक्षा के लिए बनाया गया।
हिन्दू अप्राप्तवयता और संरक्षकता अधिनियम, 1956 की धाराएं - 
धारा 1- इस अधिनियम का नाम हिन्दू अप्राप्तवयता और संरक्षकता अधिनियम,1956 है जो पूरे भारत में लागू है।
धारा 2 स्पष्टीकरण - अन्य कानूनों के पूरक के रूप में अधिनियम यह स्पष्ट किया जाता है कि यह कानून संरक्षक और प्रतिपाल्य अधिनियम, 1890 के अतिरिक्त है उसके बदले में नहीं है।
धारा 3 लागू - यह अधिनियम हिंदुओं (हिन्दु, सिक्ख, जैन और बौद्ध) पर लागू होता है।
धारा 4 परिभाषाएं – इसमें अप्राप्तवय (अवयस्क, Minor नाबालिग) और संरक्षक (Guardian) जैसे शब्दों को परिभाषित किया गया है। नाबालिग वह है जिसने 18 वर्ष की आयु पूरी न की हो।
धारा 5 अध्यवरोहण - अधिनियम का अध्यारोही प्रभाव (समाप्त करता है) यह अधिनियम पुराने रिवाजों या कानूनों को वहां तक समाप्त करता है जहाँ वे इस कानून के विरुद्ध हैं।
धारा 6 - प्राकृतिक संरक्षक - यह बताती है कि किसी हिन्दू बच्चे के प्राकृतिक संरक्षक कौन होंगे (लड़के और अविवाहित लड़की के लिए पहले पिता, फिर माता)।
धारा 7 - दत्तक पुत्र की संरक्षकता – गोद लिए गए बच्चे के प्राकृतिक संरक्षक उसके दत्तक पिता और उसके बाद दत्तक माता होते हैं।
धारा 8 प्राकृतिक संरक्षक की शक्तियां - यह धारा सबसे महत्वपूर्ण है। यह बताती है कि संरक्षक नाबालिग के हित में क्या कर सकता है और अचल संपत्ति बेचने के लिए उसे अदालत की अनुमति लेना अनिवार्य है।
धारा 9 वसीयती संरक्षक और उनकी शक्तियां - माता या पिता द्वारा वसीयत के माध्यम से नियुक्त किए गए संरक्षकों के अधिकार।
धारा 10 संरक्षक का नाबालिग की संपत्ति का प्रबंधन करने का अधिकार - नाबालिग को किसी अन्य नाबालिग का संरक्षक बनने से रोकती है।
धारा 11 तथ्यत संरक्षक (De Facto Guardian) द्वारा संपत्ति का निपटारा न करना - यह धारा स्पष्ट रूप से किसी भी अनौपचारिक संरक्षक को नाबालिग की संपत्ति बेचने से प्रतिबंधित करती है।
धारा 12 अविभाजित संपत्ति के लिए संरक्षक की नियुक्ति न होना - यदि नाबालिग का हित संयुक्त परिवार की संपत्ति में है जिसका प्रबंधन कर्ता कर रहा है, तो उसके लिए अलग से संरक्षक नियुक्त नहीं किया जाएगा।
धारा 13 - नाबालिग का कल्याण सर्वोपरि (Welfare of Minor is Paramount) - यह इस अधिनियम की आत्मा है। किसी भी संरक्षक की नियुक्ति में अदालत केवल बच्चे के सर्वोत्तम हित और कल्याण को ही आधार बनाएगी।

अवयस्क की संरक्षकता - हिन्दू अप्राप्तवयता और संरक्षकता अधिनियम, 1956 अधिनियम के तहत नाबालिग बच्चों (Minor) के हितों की रक्षा रक्षार्थ लागू होता है। इसमें तीन मुख्य प्रकार के संरक्षकों का उल्लेख है - 
1. प्राकृतिक संरक्षक और उनकी शक्तियां धारा 6 व 8 - प्राकृतिक संरक्षक वे होते हैं जो कानून द्वारा स्वाभाविक रूप से बच्चे के संरक्षक माने जाते हैं।
 प्राकृतिक संरक्षक कौन - 
I. लड़का या अविवाहित लड़की - पहले पिता, और उसके बाद माता। (5 वर्ष की आयु तक के बच्चे की कस्टडी आमतौर पर मां के पास रहती है)।
II. अवैध बच्चा - पहले माता, और उसके बाद पिता।
III. विवाहित लड़की - उसका पति।
संरक्षक की शक्तियां धारा 8 - वह बच्चे के लाभ या पैतृक संपत्ति की रक्षा के लिए सभी आवश्यक कार्य कर सकता है।
संरक्षक की सीमाएँ - संरक्षक अदालत की अनुमति के बिना नाबालिग की अचल संपत्ति को बेच नहीं सकता, गिरवी नहीं रख सकता, या उपहार में नहीं दे सकता। यदि वह ऐसा करता है, तो नाबालिग बालिग होने पर उस सौदे को रद्द करवा सकता है।
2. वसीयती संरक्षक और उनकी शक्तियां धारा 9 - जब माता या पिता अपनी वसीयत के माध्यम से किसी व्यक्ति को अपने बच्चे का संरक्षक नियुक्त करते हैं, तो उसे वसीयती संरक्षक कहा जाता है।
वसीयती संरक्षक की नियुक्ति - 
I. पिता द्वारा - पिता अपनी वसीयत में संरक्षक नियुक्त कर सकता है, लेकिन यदि उसकी मृत्यु के बाद माता जीवित है, तो माता ही प्राकृतिक संरक्षक बनी रहेगी। पिता द्वारा नियुक्त संरक्षक तभी प्रभावी होगा जब माता की भी मृत्यु हो जाए।
II. माता द्वारा - माता भी अपनी वसीयत द्वारा संरक्षक नियुक्त कर सकती है।
वसीयती संरक्षक की शक्तियां -
वसीयती संरक्षक को वे सभी अधिकार प्राप्त होते हैं जो वसीयत में लिखे गए हों, बशर्ते वे कानून के खिलाफ न हों।
II. संपत्ति संबंधी शक्तियां - उसे भी अचल संपत्ति बेचने/रेहन रखने हेतु अदालत की अनुमति लेना अनिवार्य है।
3. तथ्यतः संरक्षक (De Facto Guardian) धारा 11 - तथ्यतः संरक्षक वह व्यक्ति होता है जो न तो प्राकृतिक संरक्षक है और न ही वसीयत द्वारा नियुक्त किया गया है, लेकिन वह वास्तव में बच्चे की और उसकी संपत्ति की देखभाल कर रहा है।
I. कानूनी स्थिति - अधिनियम की धारा 11 ने तथ्यतः संरक्षक की शक्तियों को पूरी तरह समाप्त कर दिया है।
II. प्रतिबंध - अब कोई भी तथ्यतः संरक्षक नाबालिग की संपत्ति को बेचने या हस्तांतरित करने का कानूनी अधिकार नहीं रखता। उसके द्वारा किया गया ऐसा कोई भी हस्तांतरण कानूनन शून्य माना जाता है।
उद्देश्य - इस प्रावधान का उद्देश्य नाबालिगों को उन लोगों से बचाना है जो बिना किसी कानूनी जवाबदेही के उनकी संपत्ति को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
विशेष बिंदु (बच्चे का कल्याण) - अधिनियम की धारा 13 स्पष्ट करती है कि किसी भी संरक्षक की नियुक्ति या शक्तियों के निर्धारण में अदालत के लिए सबसे सर्वोपरि विचार बच्चे का कल्याण होगा। यदि प्राकृतिक संरक्षक का व्यवहार बच्चे के हित में नहीं है, तो अदालत उसे हटा भी सकती है।

वसीयत अर्थ सहित व्याख्या - व्यक्ति अपनी संपत्ति की वसीयत बनाकर किसी को भी दे सकता है जो Indian Succession Act, 1925 के अनुसार अनुज्ञा प्राप्त है।
वसीयत तब वैध है जब - 
A- वसीयत कर्ता की मानसिक स्थिति स्वस्थ हो।
B- बिना दबाव, नशा और डर से बनाई गई हो।
C- उसके यथोचित गवाह हों।

हिंदू पुरुष की निर्वसीयत मृत्यु पर संपत्ति का विभाजन - हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की धारा 8, के अनुसार यदि कोई हिंदू पुरुष बिना बिना वसीयत के मरता है तो उसकी संपत्ति निम्नलिखित क्रम में जाएगी - 
(A) प्राथमिक वंश सबसे पहले अधिकार क्रम (मृतक) के - 
- पुत्र
- पुत्री
- विधवा 
- माता
- मृतक के पूर्व मृतक पुत्र का पुत्र 
- मृतक के पूर्व मृतक पुत्र की पुत्री
- मृतक के पूर्व मृतक पुत्र की विधवा
- मृतक के पूर्व मृतक पुत्री की पुत्री/पुत्र
- मृतक के पूर्व मृतक पुत्र की विधवा के पुत्र /पुत्री
इन सभी को समान भाग मिलेगा।
(B) प्राथमिक वंश के ना होने पर द्वितीय वंश - 
- पिता
- पुत्र की पुत्री/पुत्र के पुत्र/पुत्रों
- भाई - बहन
- अन्य सूचीबद्ध नातेदार
(C) यदि प्राथमिक वंश या द्वितीय वंश ना हो तो पिता की ओर से रिश्तेदार -
(D) यदि न हों तो माँ की ओर से रिश्तेदार
(E) अगर कोई न हो तो संपत्ति सरकार के पास जाएगी।
निर्वसियत हिन्दू महिला की मृत्यु पर संपत्ति का विभाजन धारा - 15 - यदि कोई हिंदू स्त्री बिना वसीयत के मरती है तो उसकी संपत्ति जाएगी - 
A. उसके पुत्र और पुत्री, पति
B. पति के उत्तराधिकारी
C. माता-पिता
D. पिता के उत्तराधिकारी
E. माता के उत्तराधिकारी
विशेष नियम – स्त्री को माता-पिता से प्राप्त संपत्ति उसके माता-पिता को वापस जाएगी, और पति से प्राप्त संपत्ति पति के पास (विधवा होने की स्थिति में) वारिसों के पास जाएगी। यदि फिर भी कोई उत्तराधिकारी नहीं बचा है तो यह दायित्व सरकार के पास चला जाएगा।

हिन्दू अप्राप्तवयता और संरक्षकता अधिनियम, 1956 (HMGA) के तहत संरक्षकता के सामान्य प्रावधान - इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य नाबालिग के शरीर और उसकी संपत्ति की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
1. संरक्षकता के सामान्य प्रावधान - 
I. नाबालिग की परिभाषा धारा 4 - वह व्यक्ति जिसने 18 वर्ष की आयु पूरी नहीं की है, नाबालिग माना जाता है।
II. सर्वोपरि सिद्धांत धारा 13 - इस कानून का मूल नियम यह है कि किसी भी संरक्षक की नियुक्ति या शक्तियों के विवाद में नाबालिग का कल्याण सबसे ऊपर होगा। यदि कोई कानूनी प्रावधान बच्चे के हित में नहीं है, तो अदालत उसे अनदेखा कर सकती है।
III. अचल संपत्ति का हस्तांतरण धारा 8 - प्राकृतिक संरक्षक नाबालिग की अचल संपत्ति (जमीन, घर) को न तो बेच सकता है, न गिरवी रख सकता है और न ही 5 साल से अधिक के लिए पट्टे पर दे सकता है, जब तक कि वह न्यायालय की पूर्व अनुमति न ले ले।
IV. संरक्षक की अयोग्यता - यदि संरक्षक ने हिन्दू धर्म छोड़ दिया है या वह पूरी तरह से संसार का त्याग कर चुका है, तो वह संरक्षक होने का अधिकार खो देता है।
2. न्यायिक प्रतिक्रियाएं और प्रक्रियाएं - जब संरक्षकता को लेकर विवाद होता है या संपत्ति बेचने की अनुमति की आवश्यकता होती है, तो न्यायालय निम्नलिखित तरीके से हस्तक्षेप करता है - 
क (I). न्यायालय द्वारा नियुक्त संरक्षक - यदि प्राकृतिक या वसीयती संरक्षक उपलब्ध न हों या वे अपना कर्तव्य निभाने में विफल रहें या अयोग्य हो जाएं तो संरक्षक और प्रतिपाल्य अधिनियम, 1890 के तहत जिला न्यायालय किसी व्यक्ति को संरक्षक नियुक्त कर सकता है।
(II). संबंधों की जांच - अदालत बच्चे की उम्र, लिंग, माता-पिता की इच्छा और बच्चे के साथ प्रस्तावित संरक्षक के संबंधों की जांच करती है।
ख (I). संपत्ति बेचने की अनुमति प्राप्त करना - यदि संरक्षक को नाबालिग की शिक्षा, स्वास्थ्य या किसी अन्य कानूनी आवश्यकता के लिए संपत्ति बेचनी है, तो उसे अदालत में आवेदन करना होता है।
(II). न्यायिक प्रक्रिया - अदालत एक सार्वजनिक नोटिस जारी करती है ताकि कोई आपत्ति हो तो सुनी जा सके। इसके बाद, अदालत यह सुनिश्चित करती है कि सौदा नाबालिग के लाभ के लिए है या नहीं।
ग (I). कस्टडी के लिए याचिका - यदि माता-पिता अलग रह रहे हैं, तो बच्चे की कस्टडी के लिए हेबियस कॉर्पस या HMGA की धारा 6 के तहत याचिका दायर की जा सकती है।
(II). अदालत का निर्णय - अदालत आमतौर पर 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों की कस्टडी माता को देती है, बशर्ते वह बच्चे की देखभाल करने में सक्षम हो।
घ. संरक्षक को हटाना - अदालत किसी भी संरक्षक को हटा सकती है यदि - 
(I). वह बच्चे के साथ दुर्व्यवहार करता हो।
(II). वह बच्चे की संपत्ति का दुरुपयोग कर रहा हो।
(III). उसका हित बच्चे के हित के विपरीत हो गया हो।
विशेष - वसीयती संरक्षक बनाम न्यायालय
यदि माता-पिता ने वसीयत में किसी को संरक्षक नियुक्त किया है, तो भी अदालत को यह अधिकार है कि वह बच्चे के हित में उस व्यक्ति को हटाकर किसी अन्य बेहतर व्यक्ति को संरक्षक नियुक्त कर दे।

हिन्दू विधि के तहत विभाजन - इसका  अर्थ केवल संपत्ति का भौतिक रूप से अलग होना नहीं है, बल्कि यह संयुक्तता की स्थिति को समाप्त करने की कानूनी प्रक्रिया है। हिन्दू विधि के तहत विभाजन केवल संपत्ति का बंटवारा नहीं है, बल्कि यह अधिकारों का एक जटिल समायोजन है। 
विभाजन से संबंधित कानूनी प्रावधान - 1. विभाजन का अर्थ - हिन्दू अविभाजित परिवार (HUF) के संदर्भ में विभाजन का अर्थ है - 
I. अधिकारों का निर्धारण - संयुक्त संपत्ति में प्रत्येक सह-दायिक के निश्चित हिस्से का तय होना।
II. स्थिति का परिवर्तन - संयुक्त स्वामित्व का व्यक्तिगत स्वामित्व में बदलना।
मिताक्षरा कानून के अनुसार, विभाजन दो प्रकार से होता है - 
I. अंशों का विभाजन - केवल मन में यह निश्चय करना कि मैं अब संयुक्त नहीं हूँ।
II. संपत्ति का भौतिक विभाजन - जमीन या संपत्ति को हिस्सों में बांटकर कब्जा लेना।
2. विभाजन योग्य संपत्ति - 
I. पैतृक संपत्ति - केवल पैतृक संपत्ति या HUF की संपत्ति का ही विभाजन हो सकता है।
II. संयुक्त संपत्ति - वह संपत्ति जो पूर्वजों से मिली हो या जिसे परिवार के संयुक्त कोष से खरीदा गया हो।
विभाजन योग्य नहीं  
I. स्वयं की संपत्ति (जरखरीद) - स्व-अर्जित संपत्ति, खुद की कमाई से या गिफ्ट में प्राप्त संपत्ति का विभाजन नहीं हो सकता।
II. अविभाज्य संपत्तियां (जैसे पारिवारिक मंदिर, सीढ़ियाँ, कुएँ या पुस्तकालय) जिन्हें भौतिक रूप से नहीं बांटा जा सकता (इनका उपयोग साझा किया जाता है)।
3. विभाजन के लिए वाद और हकदार व्यक्ति - विभाजन की मांग करने के लिए सह-दायिक होना अनिवार्य है। निम्नानुसार व्यक्ति विभाजन का अधिकार रखते हैं - 
I. पुत्र, पुत्री, पौत्र और प्रपौत्र, प्रपौत्री - 2005 के संशोधन के बाद बेटियों को भी बेटों के समान अधिकार प्राप्त हैं।
II. गर्भस्थ शिशु - यदि विभाजन के समय बच्चा गर्भ में है, तो उसके लिए हिस्सा सुरक्षित रखा जाना चाहिए।
III. विभाजन के बाद जन्में/गर्भ में आए शिशु - विभाजन के बाद में जन्में या गर्भ में आए शिशु हेतु ......
IV. दत्तक पुत्र/पुत्री - वैध रूप से गोद लिया गया बच्चा सगे बच्चे के समान हिस्सा पाता है।
V. माता/पत्नी - वे स्वयं विभाजन शुरू नहीं कर सकतीं, लेकिन यदि पति या बेटों के बीच विभाजन होता है, तो वे एक हिस्से की हकदार होती हैं।
4. अंशों का आवंटन - अंशों का निर्धारण शाखाओ के आधार पर होता है - 
I. शाखा वार विभाजन - सबसे पहले पिता और पुत्रों के बीच बराबर हिस्सा होता है। यदि किसी पुत्र की मृत्यु हो गई है, तो उसका हिस्सा उसके बच्चों (अगली शाखा) में बराबर बंटता है।
II. समानता का नियम - एक ही पीढ़ी के सभी सह-दायिको को समान हिस्सा मिलता है।
5. विभाजन कैसे प्रभावीकरण - विभाजन केवल अदालत के जरिए ही नहीं कई तरीकों से प्रभावी हो सकता है - 
I. घोषणा द्वारा - केवल एक नोटिस या स्पष्ट इच्छा जाहिर करने से कि मैं अलग होना चाहता हूँ, विभाजन प्रभावी हो जाता है।
II. पारिवारिक समझौता - परिवार के सदस्य आपसी सहमति से बिना किसी कानूनी विवाद के संपत्ति बांट लेते हैं। यह अधिक प्रचलित है। विवाद की स्थिति में समाज के अनुभवी लोग बैठ कर बंटवारा कर देते हैं।
III. पंजीकृत विभाजन विलेख - लिखित और पंजीकृत दस्तावेज के माध्यम से।
IV.  वाद दायर कर विभाजन की मांग -  जब आपसी सहमति न हो, तो अदालत में केस दायर किया जाता है। अदालत पहले प्रारंभिक डिक्री देती है जिसमें हिस्से तय होते हैं, और फिर अंतिम डिक्री से कब्जा मिलता है।
मध्यस्थता - किसी तीसरे व्यक्ति की मदद से किया गया बंटवारा। सामाजिक या पारिवारिक स्तर पर किया गया बंटवारा।
6. पुनर्मिलन - विभाजन के बाद यदि सदस्य फिर से संयुक्त होना चाहते हैं, तो हिन्दू विधि इसकी अनुमति देती है। हालांकि, पुनर्मिलन केवल उन्हीं व्यक्तियों के बीच हो सकता है जो विभाजन से ठीक पहले मूल रूप से संयुक्त परिवार का हिस्सा थे (जैसे पिता-पुत्र या भाई-भाई)।
यह प्रक्रिया नीचे से ऊपर की ओर बढ़ेगी। यह स्वैच्छिक समझौता है - 
पुनर्मिलन की योग्यता - 
I. मूल संयुक्त शाहदायिकी सदस्य - पुनर्मिलन केवल उन्हीं व्यक्तियों के बीच हो सकता है जो मूल रूप से विभाजन से पहले संयुक्त थे।
II. पिता, पुत्र और भाई - मिताक्षरा कानून के अनुसार, पुनर्मिलन केवल पिता, पुत्र और भाई के बीच ही संभव है।
पुनर्मिलन की शर्तें - 
I. इच्छा - सभी पक्षों की स्पष्ट और स्वैच्छिक सहमति होनी चाहिए।
II. संपत्ति का एकीकरण - सभी सदस्य अपनी अलग-अलग संपत्तियों को फिर से एक साझा कोष में मिला देते हैं।
III. कानूनी प्रभाव - पुनर्मिलन के बाद, वे फिर से एक संयुक्त परिवार बन जाते हैं और उन पर उत्तराधिकार के बजाय उत्तरजीविता के नियम फिर से लागू होने लगते हैं (हालांकि 2005 के संशोधन के बाद इसमें बदलाव आए हैं)।
विभाजन को पुनः खोलना - सामान्य नियम यह है कि विभाजन केवल एक बार होता है परन्तु कुछ विशेष परिस्थितियों में पहले से हुए विभाजन को रद्द कर दोबारा हिस्सा मांगा जा सकता है - 
I. गर्भस्थ शिशु - यदि विभाजन के समय कोई बच्चा गर्भ में था और उसके लिए हिस्सा नहीं छोड़ा गया, तो जन्म के बाद वह विभाजन को चुनौती दे सकता है।
II. दत्तक पुत्र - यदि विभाजन के बाद किसी बच्चे को वैध रूप से गोद लिया गया है (विशेष स्थितियों में), तो वह अपना अधिकार मांग सकता है।
III. धोखाधड़ी या कपट - यदि किसी सदस्य ने संपत्ति छिपाकर या गलत जानकारी देकर अनुचित लाभ उठाया हो, तो अन्य सदस्य विभाजन को पुनः खोलने की मांग कर सकते हैं।
IV. विस्मृत सह-दायिक - यदि कोई सदस्य विभाजन के समय उपस्थित नहीं था और उसे हिस्सा नहीं दिया गया।
V. अयोग्य सह-दायिक की योग्यता - यदि कोई सदस्य किसी अयोग्यता (जैसे मानसिक अस्वस्थता) के कारण हिस्सा नहीं पा सका परन्तु बाद में वह स्वस्थ हो जाता है, तो वह पुनः विभाजन खोलने की मांग कर सकता है।

पवित्र बाध्यता का सिद्धांत - हिन्दू विधि में पवित्र बाध्यता का सिद्धांत (Doctrine of Pious Obligation) अनूठा और प्राचीन सिद्धांत है, जो धार्मिक विश्वासों और कानूनी उत्तरदायित्वों के मेल से बना है। इस सिद्धांत के अनुसार - 
1. सिद्धांत का अर्थ - धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति ऋण (कर्ज) चुकाए बिना मर जाता है, तो उसे नर्क जाना पड़ता है। इस पाप से बचाने के लिए, मृतक के पुत्र, पौत्र और प्रपौत्र का यह पवित्र कर्तव्य माना जाता है कि वे अपने पूर्वज के कर्ज को चुकाएं। 
मुख्य विचार - पूर्वज की आत्मा की शांति और उसे ऋण-मुक्त करने के लिए वंशजों की जिम्मेदारी।
2. सिद्धांत की कानूनी सीमाएँ - आधुनिक कानून और न्यायिक निर्णयों के बाद, इस सिद्धांत के लागू होने की कुछ सीमाएँ तय की गई हैं - 
I. केवल पैतृक संपत्ति तक सीमित - पुत्र, पिता का कर्ज चुकाने हेतु स्वयं की व्यक्तिगत संपत्ति देने को बाध्य नहीं है। यह जिम्मेदारी केवल उसे विरासत में मिली पैतृक संपत्ति के हिस्से तक ही सीमित होती है।
अव्यावहारिक ऋणों हेतु बाध्यता नहीं - यदि पिता ने अनैतिक या अवैध कार्यों के लिए कर्ज लिया है, तो पुत्र उसे चुकाने के लिए बाध्य नहीं है। इन अव्यावहारिक ऋणों में शामिल हैं - 
I. शराब या जुए के लिए लिया गया कर्ज।
II. चोरी, दंड, जुर्माना या किसी अपराध के कारण देना पड़ा हर्जाना।
III. कामुक सुख (जारता) की पूर्ति हेतु लिया गया कर्ज।
3. उत्तरदायित्व का क्रम - पुराने कानून के अनुसार यह जिम्मेदारी तीन पीढ़ियों तक जाती थी - 
पुत्र - मूल धन और ब्याज दोनों के लिए।
पौत्र - केवल मूल धन के लिए (ब्याज नहीं)।
III. प्रपौत्र - केवल उतना ही जितना उसे विरासत में मिला हो।
बाद के कानूनों ने इसे सभी पीढ़ियों के लिए विरासत में मिली संपत्ति की सीमा तक समान कर दिया।
4. हिन्दू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 का प्रभाव - 2005 में हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 में संशोधन के बाद, इस सिद्धांत की प्रासंगिकता लगभग समाप्त कर दी गई है -
धारा 6 (4) - अब कोई भी न्यायालय केवल पवित्र बाध्यता के आधार पर किसी पुत्र, पौत्र या प्रपौत्र से उसके पिता या दादा का कर्ज वसूलने का आदेश नहीं दे सकता।
वर्तमान स्थिति - अब कर्ज की वसूली के लिए यह साबित करना जरूरी है कि वह कर्ज पारिवारिक लाभ या कानूनी आवश्यकता के लिए लिया गया था, न कि केवल पवित्र कर्तव्य के आधार पर।
निष्कर्ष - पवित्र बाध्यता का सिद्धांत अब भारतीय कानूनी प्रणाली में अपनी ऐतिहासिक महत्ता खो चुका है। आज के समय में, लेनदार को यह साबित करना पड़ता है कि ऋण संयुक्त परिवार के प्रबंधन या लाभ के लिए लिया गया था, तभी वह बच्चों के हिस्से से उसकी वसूली कर सकता है।

हिन्दू विधि के तहत पूर्ववर्ती ऋण का सिद्धांत - पूर्ववर्ती ऋण का सिद्धांत पवित्र बाध्यता के सिद्धांत से गहराई से जुड़ा हुआ है। इसका मुख्य उद्देश्य लेनदारों के हितों और पुत्रों के संपत्ति अधिकारों के बीच संतुलन बनाना है।
पूर्ववर्ती ऋण की परिभाषा एवं न्यायिक दृष्टिकोण - 
1. पूर्ववर्ती ऋण का अर्थ - पूर्ववर्ती का अर्थ है पहले का। कानूनी रूप से, किसी ऋण को पूर्ववर्ती मानने के लिए दो शर्तों का पूरा होना अनिवार्य है - 
I. समय का अंतर - ऋण, संपत्ति के हस्तांतरण (बेचने या गिरवी रखने) से पहले लिया गया होना चाहिए।
II. स्वतंत्रता - ऋण उस सौदे का हिस्सा नहीं होना चाहिए जिसके लिए संपत्ति बेची जा रही है। यानी, कर्ज लेना और संपत्ति बेचना दो अलग-अलग घटनाएँ होनी चाहिए।
उदाहरण - यदि पिता आज ₹1 लाख का कर्ज लेता है और उसे चुकाने के लिए 6 महीने बाद पैतृक संपत्ति बेचता है, तो वह ₹1 लाख पूर्ववर्ती ऋण कहलाएगा।
2. पिता की संपत्ति हस्तांतरण की शक्ति - हिन्दू पिता के पास यह विशेष शक्ति है कि वह अपने निजी पूर्ववर्ती ऋणों को चुकाने के लिए संयुक्त परिवार की संपत्ति (बेटों के हिस्से सहित) को बेच या गिरवी रख सकता है, बशर्ते - 
I. ऋण अव्यावहारिक (अनैतिक या अवैध) न हो।
II. ऋण पिता के कर्ता के रूप में नहीं, बल्कि व्यक्तिगत क्षमता में लिया गया हो।
3. न्यायिक प्रतिक्रियाएं - न्यायालयों ने विभिन्न ऐतिहासिक फैसलों के माध्यम से इस सिद्धांत को स्पष्ट किया है - 
. बृज नारायण बनाम मंगला प्रसाद 
इस लैंडमार्क केस में प्रिवी काउंसिल ने पाँच नियम प्रतिपादित किए - 
I. परिवार का कर्ता केवल कानूनी आवश्यकता के लिए संपत्ति हस्तांतरित कर सकता है।
II. यदि कर्ता पिता है, तो वह अपने व्यक्तिगत पूर्ववर्ती ऋण के लिए भी संपत्ति बेच सकता है।
III. पूर्ववर्ती का अर्थ समय और तथ्य दोनों में स्वतंत्र होना चाहिए।
IV. पुत्र केवल यह कहकर बच नहीं सकते कि वे पिता के ऋण के लिए उत्तरदायी नहीं हैं, जब तक कि वे ऋण को अव्यावहारिक साबित न कर दें।
ख. भार का सिद्धांत (Burden of Proof) - इसमें न्यायालयों का रुख स्पष्ट है - 
I. लेनदार पर जिम्मेदारी - लेनदार को केवल यह साबित करना होता है कि ऋण पूर्ववर्ती था।
II. पुत्रों पर जिम्मेदारी - यदि पुत्र संपत्ति के विक्रय को रोकना चाहते हैं, तो उन्हें अदालत में यह साबित करना होगा कि पिता ने वह पैसा जुए, शराब या किसी अनैतिक कार्य (अव्यावहारिक ऋण) में खर्च किया था।
4. 2005 के संशोधन के बाद की स्थिति - जैसा कि हमने पहले चर्चा की, हिन्दू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 ने पवित्र बाध्यता के आधार पर ऋण वसूली को समाप्त कर दिया है।
न्यायिक प्रभाव - 
I. अब बैंक या लेनदार सीधे पुत्रों पर पूर्ववर्ती ऋण के आधार पर दबाव नहीं बना सकते।
विशेष - यदि संपत्ति 2005 से पहले हस्तांतरित हो चुकी है, तो उस पर पुराने नियम ही लागू होंगे। वर्तमान में, लेनदार को यह साबित करना पड़ता है कि ऋण पारिवारिक लाभ हेतु था।
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केस लॉ- 
हिंदू लॉ के महत्वपूर्ण केस लॉज- हिंदू कानून को समझने के लिए केवल धाराओं को जानना काफी नहीं है, क्योंकि समय-समय पर माननीय उच्चतम न्यायालय के फैसलों ने इन कानूनों की व्याख्या को बदला और सुधारा है।
हिंदू लॉ के कुछ सबसे ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण केस लॉज - 
1. विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा (2020) - यह मामला हिंदू कानून के इतिहास में एक लैंडमार्क फैसला है। इसने बेटियों के संपत्ति अधिकारों को लेकर वर्षों से चले आ रहे भ्रम को हमेशा के लिए खत्म कर दिया।
1. मुख्य विवाद - हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 6 (2005 संशोधन) में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम में संशोधन किया गया था, जिसमें कहा गया कि बेटी भी एक सह-दायक होगी। लेकिन अदालतों के सामने दो बड़े सवाल थे - 
A. क्या यह अधिकार उन बेटियों को भी मिलेगा जिनका जन्म 2005 से पहले हुआ था?
B. क्या बेटी को हिस्सा मिलने के लिए यह जरूरी है कि उसके पिता 9 सितंबर 2005 (कानून लागू होने के दिन) को जीवित हों?
इससे पहले प्रकाश बनाम फूलवती केस में कोर्ट ने कहा था कि पिता का जीवित होना जरूरी है, जिससे हजारों बेटियों का हक छिना जा रहा था।
2. सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
जस्टिस अरुण मिश्रा की पीठ ने 11 अगस्त 2020 को स्पष्ट किया कि - 
 I. "एक बार बेटी, हमेशा के लिए बेटी" कोर्ट ने कहा कि पुत्र की तरह पुत्री भी जन्म से ही सह-दायक बनती है।
II. पिता का जीवित होना जरूरी नहीं - बेटी को हिस्सा तब भी मिलेगा जब उसके पिता की मृत्यु 2005 के संशोधन से पहले हो चुकी हो।
III. पिछला प्रभाव - यह कानून केवल नई शादियों या जन्मों पर नहीं, बल्कि उन सभी बेटियों पर लागू होता है जो 2005 में जीवित थीं।
3. इस केस का समाज पर प्रभाव - 
पूर्ण समानता - अब कानून की नजर में बेटा और बेटी बिल्कुल एक समान हैं। संपत्ति के बंटवारे के समय बेटी का हिस्सा भी उतना ही होगा जितना बेटे का।
पुरानी संपत्ति पर दावा- यदि 2005 से पहले संपत्ति का अंतिम बंटवारा नहीं हुआ था, तो बेटियाँ आज भी अपना दावा पेश कर सकती हैं।
वसीयत और पैतृक संपत्ति - पिता अपनी खुद की कमाई हुई संपत्ति की वसीयत तो कर सकता है, लेकिन पैतृक संपत्ति में वह बेटी का हिस्सा नहीं काट सकता।
4. कोर्ट की एक महत्वपूर्ण टिप्पणी - 
कोर्ट ने अपने फैसले में बहुत भावुक और सटीक बात कही थी - एक बेटा केवल तब तक बेटा होता है जब तक उसे पत्नी नहीं मिल जाती, लेकिन एक बेटी अपने पूरे जीवन भर के लिए बेटी बनी रहती है।
फैसला - कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बेटियों को जन्म से ही सह-दायक का अधिकार है। यह जरूरी नहीं कि 2005 के संशोधन के समय पिता जीवित हों। इस फैसले ने बेटियों को बेटों के बिल्कुल बराबर खड़ा कर दिया।
निष्कर्ष - इस फैसले ने यह सुनिश्चित कर दिया कि बेटियों का संपत्ति में अधिकार पिता की कृपा पर नहीं, बल्कि उनके जन्म के अधिकार पर आधारित है। यह बेटियों के संपत्ति अधिकार पर अब तक का सबसे बड़ा फैसला है।

2. सरला मुद्गल बनाम भारत संघ (1995) - यह केस द्विविवाह और धर्म परिवर्तन से जुड़ा है जो हिंदू विवाह की पवित्रता को बचाने और कानून के दुरुपयोग को रोकने के लिए एक मील का पत्थर माना जाता है।
1. मामले की पृष्ठभूमि - इस केस में कई याचिकाएं एक साथ सुनी गईं। मुख्य मामला यह था कि कुछ हिंदू पतियों ने अपनी पहली पत्नी को तलाक दिए बिना, दूसरी शादी करने के उद्देश्य से इस्लाम धर्म अपना लिया। उनका मानना था कि चूंकि इस्लाम चार शादियों की अनुमति देता है, इसलिए धर्म बदलकर वे अपनी पहली पत्नी के प्रति कानूनी जिम्मेदारी से बच जाएंगे और उन पर 'द्विविवाह' (Bigamy) का मुकदमा नहीं चलेगा।
2. सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य सवाल
A. क्या एक हिंदू पति धर्म बदलकर दूसरी शादी कर सकता है, जबकि उसकी पहली (हिंदू रीति से हुई) शादी अभी भी कानूनी रूप से अस्तित्व में है?
B. क्या ऐसी दूसरी शादी हिंदू विवाह अधिनियम और भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत अपराध मानी जाएगी?
3. सुप्रीम कोर्ट का फैसला - जस्टिस कुलदीप सिंह की पीठ ने इस पर बहुत कड़ा और स्पष्ट फैसला सुनाया- 
I. शादी खत्म नहीं होती- कोर्ट ने कहा कि केवल धर्म बदल लेने से पहली शादी अपने आप खत्म नहीं हो जाती। जब तक पहली शादी को हिंदू विवाह अधिनियम के तहत तलाक या डिक्री द्वारा समाप्त नहीं किया जाता, तब तक वह कानूनी रूप से मान्य रहती है।
II. दूसरी शादी अवैध - धर्म परिवर्तन के बाद की गई दूसरी शादी कानून की नजर में शून्य (Void) होगी।
III. द्विविवाह का अपराध - कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसा करने वाला पति IPC की धारा 494 (जो अब BNS में समाहित है) के तहत द्विविवाह का दोषी होगा और उसे जेल की सजा हो सकती है।
विवाह की पवित्रता - कोर्ट ने कहा कि विवाह केवल एक समझौता नहीं है, बल्कि एक कानूनी स्थिति है। कोई भी व्यक्ति अपनी कानूनी जिम्मेदारियों से बचने के लिए धर्म का 'ढाल' की तरह इस्तेमाल नहीं कर सकता।
4. समान नागरिक संहिता (UCC) पर टिप्पणी - इसी फैसले के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने भारत सरकार को समान नागरिक संहिता लागू करने की याद दिलाई। कोर्ट का मानना था कि अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों के कारण लोग कानून के साथ लुका-छिपी का खेल खेलते हैं, जिसे रोकने के लिए एक समान कानून की आवश्यकता है।
5. कोर्ट का फैसला - कोर्ट ने कहा कि यदि कोई हिंदू पुरुष दूसरी शादी करने के उद्देश्य से इस्लाम धर्म अपना लेता है, तो उसकी दूसरी शादी अवैध होगी। वह तब तक दूसरी शादी नहीं कर सकता जब तक कि उसकी पहली शादी कानूनन खत्म न हो जाए।
निष्कर्ष - इस केस ने यह संदेश दिया कि कानून नैतिकता से ऊपर नहीं हो सकता। इसने उन महिलाओं को सुरक्षा प्रदान की जिनके पति उन्हें बिना तलाक दिए दूसरी शादी कर लेते थे।

3. सायरा बानो बनाम भारत संघ (2017) ट्रिपल तलाक केस - सायरा बानो बनाम भारत संघ (2017) का मामला भारतीय कानूनी इतिहास में ट्रिपल तलाक केस के नाम से मशहूर है। यद्यपि यह मुस्लिम पर्सनल लॉ से संबंधित था, लेकिन इसने भारत में 'संवैधानिक नैतिकता और लैंगिक न्याय (Gender Justice) के सिद्धांतों को एक नई ऊँचाई दी।
1. मामले की पृष्ठभूमि - उत्तराखंड की रहने वाली सायरा बानो को उनके पति ने 15 साल की शादी के बाद एक पत्र के जरिए तलाक-ए-बिद्दत (एक बार में तीन बार तलाक' बोलकर) दे दिया। सायरा बानो ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की और मांग की कि तीन प्रथाओं को असंवैधानिक घोषित किया जाए - 
I. तलाक-ए-बिद्दत
II. निकाह हलाला
III. बहुविवाह
2. मुख्य कानूनी प्रश्न - 
A. कोर्ट के सामने सबसे बड़ा सवाल यह था कि क्या मुस्लिम पर्सनल लॉ को संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन और गरिमा का अधिकार) की कसौटी पर परखा जा सकता है? 
B. क्या तीन तलाक इस्लाम का अभिन्न हिस्सा है?
3. सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला (3:2 का बहुमत) - 
5 जजों की संवैधानिक पीठ (जिसमें अलग-अलग धर्मों के जज शामिल थे) ने अपना फैसला सुनाया - 
तीन तलाक असंवैधानिक घोषित - कोर्ट ने 3:2 के बहुमत से तलाक-ए-बिद्दत (एक साथ बार तीन तलाक) कहना) को असंवैधानिक और अमान्य घोषित कर दिया।
मनमाना व्यवहार - कोर्ट ने कहा कि यह प्रथा मनमानी है क्योंकि इसमें पुरुष अपनी मर्जी से बिना किसी सुलह की कोशिश के शादी तोड़ सकता है, जो समानता के अधिकार का उल्लंघन है।
कुरान के विरुद्ध - जस्टिस कुरियन जोसेफ ने कहा कि जो चीज धर्म के अनुसार गलत है, वह कानून के अनुसार सही नहीं हो सकती।
4. इस फैसले का परिणाम - नया कानून
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद भारत सरकार ने मुस्लिम महिल (विवाह अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 पारित किया। इसके तहत - 
एक बार में तीन तलाक देना अब एक संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) है। ऐसा करने वाले पति को 3 साल तक की जेल की सजा हो सकती है।
पीड़ित महिला अपने और अपने बच्चों के लिए निर्वाह भत्ता मांगने की हकदार है।
5. समाज पर प्रभाव - 
इस केस ने यह स्थापित कर दिया कि कोई भी धार्मिक प्रथा या व्यक्तिगत कानून देश के संविधान से ऊपर नहीं है। इसने मुस्लिम महिलाओं को वैवाहिक सुरक्षा और गरिमा प्रदान की। हालांकि यह कानून मुस्लिम समाज से जुड़ा है, लेकिन इसने भारत में व्यक्तिगत कानूनों (Personal Laws) और लैंगिक समानता की बहस को नई दिशा दी।

4. दस्तने बनाम दस्तने (1975) - 
यह मानसिक क्रूरता को समझने के लिए सबसे महत्वपूर्ण केस है। दस्तने बनाम दस्तने (1975) का मामला हिंदू कानून में क्रूरता की परिभाषा को बदलने वाला सबसे आधारभूत केस माना जाता है। इस केस ने यह तय किया कि तलाक लेने के लिए केवल शरीर पर चोट के निशान होना जरूरी नहीं है, बल्कि मानसिक प्रताड़ना भी पर्याप्त आधार है।
1. मामले की पृष्ठभूमि - डॉ. नारायण गणेश दस्तने और उनकी पत्नी सुचिता दस्तने के बीच का यह विवाद था। पति (डॉ. दस्तने) ने आरोप लगाया कि उनकी पत्नी का व्यवहार उनके और उनके परिवार के प्रति बहुत क्रूर है।
पत्नी पर आरोप थे कि वह - 
I. पति को गालियां देती थी।
II. उनके माता-पिता का अपमान करती थी।
III. खुद को चोट पहुँचाने या आत्महत्या करने की धमकी देती थी ताकि पति डरा रहें।
IV. पति को समाज में नीचा दिखाने की कोशिश करती थी।
2. सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य सवाल -
A. क्रूरता किसे माना जाए? 
B. क्या इसके लिए जान का खतरा होना जरूरी है?
C. क्या मानसिक पीड़ा को भी क्रूरता माना जा सकता है?
D. यदि पति ने पत्नी के व्यवहार के बावजूद उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए, तो क्या उसने पत्नी की गलती को माफ (Condone) कर दिया है?
3. सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला - जस्टिस वाई. वी. चंद्रचूड़ की पीठ ने इस मामले में कुछ बहुत महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत दिए - 
(धारा 13) मानसिक क्रूरता - कोर्ट ने कहा कि क्रूरता का अर्थ केवल शारीरिक हिंसा नहीं है। यदि एक साथी का व्यवहार ऐसा है जिससे दूसरे के मन में यह उचित डर पैदा हो जाए कि उसके साथ रहना हानिकारक या असुरक्षित होगा, तो वह क्रूरता है।
तय मानक - कोर्ट ने स्पष्ट किया कि क्रूरता को मापने का कोई एक पैमाना नहीं हो सकता। यह हर मामले की स्थिति, शिक्षा, सामाजिक स्तर और पक्षकारों के स्वभाव पर निर्भर करता है।
क्षमादान का सिद्धांत - इस केस का सबसे बड़ा मोड़ यही था। कोर्ट ने पाया कि पत्नी का व्यवहार क्रूर तो था, लेकिन पति ने उसके साथ शारीरिक संबंध जारी रखे। कानून के अनुसार, यदि पीड़ित पक्ष गलती करने वाले को माफ कर देता है और सामान्य वैवाहिक जीवन फिर से शुरू कर देता है, तो वह क्रूरता के आधार पर केस नहीं कर सकता। इसे कंडोनेशन (माफी) कहा गया।
फैसला - कोर्ट ने पहली बार विस्तार से समझाया कि क्रूरता केवल शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक भी हो सकती है। यदि साथी का व्यवहार ऐसा है कि दूसरे के लिए साथ रहना खतरनाक या असहनीय हो जाए, तो वह तलाक का आधार है।
4. इस केस का महत्व - इस फैसले के बाद ही 1976 में हिंदू विवाह अधिनियम में संशोधन किया गया और क्रूरता को तलाक का एक स्पष्ट आधार बनाया गया। आज भी जब मानसिक प्रताड़ना के आधार पर तलाक के केस लड़े जाते हैं, तो दस्तने बनाम दस्तने का उदाहरण सबसे पहले दिया जाता है।
निष्कर्ष - इस केस ने समाज को यह समझाया कि शब्द और व्यवहार, घावों से भी ज्यादा गहरे हो सकते हैं। हालांकि, डॉ. दस्तने को उनकी पत्नी के साथ रहने के कारण माफी के आधार पर राहत नहीं मिली, लेकिन उन्होंने आने वाली पीढ़ियों के लिए कानून का रास्ता साफ कर दिया।

5. अमरदीप सिंह बनाम हरवीन कौर (2017) - अमरदीप सिंह बनाम हरवीन कौर (2017) का मामला उन लोगों के लिए एक बड़ी राहत बनकर आया जोलेना चाहते हैं। (आपसी सहमति से तलाक धारा 13B (तलाक के लिए 6 महीने का वेटिंग पीरियड)। इस केस ने तलाक की प्रक्रिया में लगने वाले अनिवार्य समय को कम करने का रास्ता साफ किया।
1. कानूनी परिपेक्ष्य - हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13B(2) के अनुसार, जब पति-पत्नी आपसी सहमति से तलाक की अर्जी (First Motion) देते हैं, तो उन्हें कोर्ट की तरफ से 6 महीने का वेटिंग पीरियड (जिसे कूलिंग-ऑफ पीरियड कहते हैं) दिया जाता है। जिससे 6 महीने में शायद पति-पत्नी का मन बदल जाए और वे सुलह कर लें।
परन्तु व्यवहार में कई बार पति-पत्नी सालों से अलग रह रहे होते थे और वे तुरंत अलग होना चाहते थे, फिर भी उन्हें यह 6 महीने का इंतजार करना पड़ता था।
2. सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला - सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में बहुत ही व्यावहारिक फैसला सुनाया - 
A. अनिवार्य नहीं, निर्देशिका (Directory, not Mandatory): कोर्ट ने कहा कि धारा 13B(2) में दिया गया 6 महीने का समय अनिवार्य (Mandatory) नहीं है। यह केवल एक सुझाव या निर्देशिका (Directory) है।
B. जज को विवेकाधिकार - यदि कोर्ट को लगता है कि पति-पत्नी के बीच सुलह की कोई भी गुंजाइश नहीं बची है और वे लंबे समय से अलग रह रहे हैं, तो कोर्ट इस 6 महीने की अवधि को माफ (Waive off) कर सकता है।
3. वेटिंग पीरियड माफ करने की शर्तें - 
कोर्ट ने कुछ शर्तें तय कीं, जिन्हें पूरा करने पर ही 6 महीने का समय माफ किया जा सकता है:
A. पति-पत्नी पहले से ही 1 साल या उससे अधिक समय से अलग रह रहे हों।B. दोनों के बीच भरण-पोषण (Alimony), बच्चों की कस्टडी और संपत्ति के बंटवारे का मामला पूरी तरह सुलझ चुका हो।
C. सुलह के सभी प्रयास - (Mediation/Conciliation) पूरी तरह विफल हो चुके हों।
D. इंतजार करने से उनकी तकलीफ कम होने के बजाय और बढ़ेगी।
4. इस केस का महत्व - 
A. त्वरित न्याय - इस फैसले के बाद, जो तलाक होने में महीनों लगते थे, वे अब कुछ ही हफ्तों में (अदालत की अनुमति से) पूरे हो सकते हैं।
B. तनाव में कमी - यह उन जोड़ों के लिए वरदान साबित हुआ जो अपनी नई जिंदगी जल्द शुरू करना चाहते थे।
निष्कर्ष - इस फैसले ने कानून को लचीला बनाया। कोर्ट ने माना कि जहाँ रिश्ता पूरी तरह मर चुका हो, वहाँ उसे कागजों पर घसीटना न्याय नहीं है।

6. बद्री प्रसाद बनाम उप-निदेशक चकबंदी (1978) - (यह लिव-इन रिलेशनशिप की वैधता पर पहला प्रमुख केस है।) - यह मामला भारत में लिव-इन रिलेशनशिप और लंबे समय तक साथ रहने वाले जोड़ों के कानूनी अधिकारों पर सुप्रीम कोर्ट का पहला और सबसे महत्वपूर्ण फैसला माना जाता है।
यह केस विशेष रूप से इसलिए याद किया जाता है क्योंकि इसने समाज की पुरानी सोच के बजाय जमीनी हकीकत और न्याय को प्राथमिकता दी गई।
1. मामले की पृष्ठभूमि - इस केस में एक पुरुष और एक स्त्री लगभग 50 वर्षों तक पति-पत्नी की तरह साथ रहे थे। हालांकि, उनके पास अपनी शादी का कोई औपचारिक प्रमाण (मैरिज सर्टिफिकेट या गवाह) नहीं था। विवाद तब शुरू हुआ जब उनकी संपत्ति के उत्तराधिकार का मामला आया और विरोधियों ने यह तर्क दिया कि चूंकि उनकी शादी का कोई सबूत नहीं है, इसलिए महिला का संपत्ति पर कोई हक नहीं बनता।
2. सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य सवाल कि क्या बिना किसी औपचारिक प्रमाण के, केवल लंबे समय तक साथ रहने मात्र से किसी रिश्ते को वैध विवाह माना जा सकता है?
3. सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
जस्टिस कृष्णा अय्यर की पीठ ने इस मामले में एक बहुत ही मानवीय और तार्किक फैसला सुनाया - 
विवाह की उपधारणा - कोर्ट ने कहा कि यदि एक पुरुष और स्त्री लंबे समय तक पति-पत्नी के रूप में साथ रहते हैं और समाज उन्हें इसी रूप में जानता है, तो कानून यह मानकर चलेगा (Presume) कि वे विवाहित हैं।
सबूत का भार - कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जो व्यक्ति इस विवाह को अवैध कह रहा है उसे ही यह साबित करना होगा कि उनकी शादी नहीं हुई थी। कानून पति-पत्नी के पक्ष में झुका रहेगा।
कठोर प्रमाण की आवश्यकता नहीं - कोर्ट ने टिप्पणी की कि 50 साल बाद किसी से शादी का सबूत मांगना अन्यायपूर्ण है। साक्ष्य अधिनियम (Evidence Act) की धारा 114 के तहत यह एक स्वाभाविक अनुमान है।
फैसला - कोर्ट ने कहा कि यदि कोई पुरुष और स्त्री लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह साथ रहते हैं, तो कानून यह मानकर चलेगा कि वे विवाहित हैं, जब तक कि इसके विपरीत सबूत न दिया जाए।
4. इस केस का महत्व और प्रभाव - 
लिव-इन रिलेशनशिप का आधार - हालांकि 1978 में लिव-इन शब्द प्रचलित नहीं था, लेकिन इस फैसले ने भविष्य के लिव-इन रिश्तों और उनसे पैदा होने वाले बच्चों के अधिकारों के लिए रास्ता खोल दिया।
महिलाओं की सुरक्षा - इस फैसले ने उन महिलाओं को सुरक्षा दी जिन्हें शादी का सबूत न होने के कारण संपत्ति से बेदखल कर दिया जाता था।
सामाजिक मान्यता - कोर्ट ने माना कि कानून को समाज की वास्तविकताओं के साथ चलना चाहिए।
निष्कर्ष - बद्री प्रसाद केस ने यह सिद्धांत स्थापित किया कि कानून वैधता के पक्ष में होता है, न कि अवैधता के। यानी कानून का झुकाव रिश्ते को वैध मानने की तरफ रहेगा ताकि समाज में अराजकता न फैले।

7. विपिन चंद्र V. प्रभावती (1957) - यह मामला हिंदू विवाह अधिनियम के तहत परित्याग (Desertion) के आधार पर तलाक को समझने के लिए सबसे बुनियादी केस माना जाता है।
तलाक की धारा 13 में परित्याग एक प्रमुख आधार है, और इस केस ने यह तय किया कि केवल अलग रहना ही परित्याग नहीं है, बल्कि इसके पीछे की नियत (Intent) क्या है, ज्यादा महत्वपूर्ण है।
1. मामले की पृष्ठभूमि - 
विपिन चंद्र (पति) प्रभावती (पत्नी) से शादी के बाद कुछ समय के लिए विदेश (इंग्लैंड) गया था। जब वह लौटा, तो उसे अपनी पत्नी के चरित्र पर संदेह हुआ और उसने पत्नी को उसके मायके भेज दिया। बाद में पति ने तलाक की अर्जी इस आधार पर दी कि उसकी पत्नी ने उसे छोड़ दिया है।
2. सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य सवाल - A. क्या केवल एक-दूसरे से अलग रहना परित्याग माना जा सकता है?
B. परित्याग साबित करने के लिए किन शर्तों का होना जरूरी है?
3. सुप्रीम कोर्ट का फैसला - इस केस में कोर्ट ने परित्याग की एक ऐसी व्याख्या दी जो आज भी अदालतों में इस्तेमाल होती है। कोर्ट के अनुसार परित्याग के दो आवश्यक तत्व हैं - 
I. तथ्यात्मक अलग होना (Factum Deserendi) - यानी पति-पत्नी वास्तव में शारीरिक रूप से एक-दूसरे से अलग रह रहे हों।
II. छोड़ने का इरादा (Animus Deserendi) - यह सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है। अलग रहने वाले पक्ष के मन में यह नियत होनी चाहिए कि वह अब इस वैवाहिक रिश्ते को हमेशा के लिए खत्म करना चाहता है और वापस नहीं आना चाहता।
कोर्ट ने इस मामले में पाया कि - पत्नी मायके इसलिए गई थी क्योंकि पति ने उसे जाने के लिए मजबूर किया था और उसके चरित्र पर आरोप लगाए थे। पत्नी तो वापस आना चाहती थी, लेकिन पति ने उसे आने नहीं दिया। इसलिए, कोर्ट ने कहा कि यहाँ 'छोड़ने का इरादा' (Animus Deserendi) पत्नी का नहीं बल्कि पति का था। अतः पति को तलाक नहीं मिला।
4. इस केस से निकले महत्वपूर्ण सिद्धांत - 
A. बिना उचित कारण के परित्याग तभी माना जाएगा जब बिना किसी वाजिब कारण (जैसे मारपीट या प्रताड़ना) के साथी को छोड़ा गया हो।
B. सहमति का अभाव - यदि पति-पत्नी आपसी सहमति से अलग रह रहे हैं, तो उसे परित्याग नहीं कहा जा सकता।
C. वापसी की कोशिश - यदि छोड़ने वाला पक्ष वापस आने की सच्ची कोशिश करता है और दूसरा पक्ष उसे मना कर देता है, तो परित्याग खत्म हो जाता है।
निष्कर्ष - विपिन चंद्र केस ने यह साफ कर दिया कि कानून में इरादा (Intention) बहुत मायने रखता है। अगर कोई मजबूरी में घर छोड़ता है, तो उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

8. गुरुपद खंडप्पा vs. हीराबाई खंडप्पा  (1978) – सहदायिक संपत्ति में मृतक की विधवा के समान हिस्से का अधिकार। काल्पनिक विभाजन के सिद्धांत के इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 6 की व्याख्या स्पष्ट की।
1. मामले के मुख्य तथ्य - 
यह मामला एक हिन्दू पुरुष (खंडप्पा) की मृत्यु के बाद उसकी संपत्ति के बंटवारे से संबंधित था। खंडप्पा की मृत्यु वसीयत किए बिना हुई थी, और उसके पीछे उसकी पत्नी (हीराबाई), दो बेटे और तीन बेटियाँ थीं।
विवाद - विवाद इस बात पर था कि हीराबाई (पत्नी) को पैतृक संपत्ति में कितना हिस्सा मिलना चाहिए।
2. कानूनी प्रश्न - 
मुख्य प्रश्न यह था कि जब धारा 6 के तहत काल्पनिक विभाजन (यह मान लेना कि मृत्यु से ठीक पहले परिवार का बंटवारा हुआ था) किया जाता है, तो क्या पत्नी को वह हिस्सा भी मिलेगा जो उसे वास्तविक विभाजन में मिलता, या उसे केवल पति के हिस्से में से उत्तराधिकार मिलेगा?
3. सुप्रीम कोर्ट का निर्णय और सिद्धांत - जस्टिस चंद्रचूड़ की पीठ ने महत्वपूर्ण सिद्धांत प्रतिपादित किए - 
I. काल्पनिक विभाजन को पूर्णता देना - अदालत ने कहा कि काल्पनिक विभाजन की धारणा को केवल गणना तक सीमित नहीं रखा जा सकता। इसे इसके तार्किक अंत तक ले जाना चाहिए।
II. पत्नी का दोहरा अधिकार
. पहले चरण में, काल्पनिक विभाजन के आधार पर पत्नी उस हिस्से की हकदार होगी जो उसे पति और बेटों के बीच बंटवारा होने पर मिलता।
. दूसरे चरण में, पति के हिस्से में से भी उसे श्रेणी - I का वारिस होने के नाते अन्य बच्चों के साथ बराबर का हिस्सा मिलेगा।
ग. हिस्से का निर्धारण - यदि पिता और दो बेटों के बीच विभाजन होता, तो संपत्ति के 3 हिस्से होते (पिता, पुत्र 1, पुत्र 2)। लेकिन बॉम्बे स्कूल (जहाँ यह मामला था) के अनुसार पत्नी भी एक हिस्से की हकदार थी, इसलिए 4 हिस्से हुए। हीराबाई को पहले 1/4 हिस्सा मिला, और फिर पति के 1/4 हिस्से में से भी उत्तराधिकार के जरिए अतिरिक्त हिस्सा मिला।
4. निर्णय का महत्व - 
I. महिलाओं के अधिकार - इस फैसले ने स्पष्ट किया कि हिन्दू महिलाओं के संपत्ति अधिकारों को संकुचित तरीके से नहीं देखा जाना चाहिए।
II. धारा 6 की व्याख्या - इसने निर्वसीयत उत्तराधिकार और सहदायिकी के बीच के अंतर्संबंध को स्पष्ट किया।
III. नियम का स्पष्टीकरण - काल्पनिक विभाजन का अर्थ है कि परिवार की संयुक्तता उसी क्षण टूट गई है और सभी वारिसों के हिस्से निश्चित हो गए हैं।
III. न्यायालय का संदेश - कानून की व्याख्या ऐसी होनी चाहिए जो उत्तराधिकारियों के हितों की रक्षा करे।

9. प्रकाश v. फूलवती (2016) – 2005 का संशोधन कार्यशील है। हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम (संशोधन), 2005 की धारा 6 के लागू होने के संबंध में सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय।
विवाद - इस मामले में मुख्य विवाद यह था कि क्या 2005 का संशोधन उन बेटियों पर भी लागू होगा जिनके पिता की मृत्यु संशोधन के प्रभावी होने (9 सितम्बर 2005) से पहले हो चुकी थी।
मुख्य कानूनी बिंदु - 
1. मामले की पृष्ठभूमि - फूलवती (प्रतिवादी) ने 1992 में अपने पिता की पैतृक संपत्ति में हिस्से के लिए दावा पेश किया था। केस लंबित रहने के दौरान ही 2005 का संशोधन लागू हो गया, जिसमें बेटियों को सहदायिक बनाया गया।
फूलवती ने तर्क दिया कि संशोधन के बाद वह भी अपने भाइयों के समान हिस्से की हकदार है।
2. सुप्रीम कोर्ट का निर्णय - जस्टिस अनिल आर. दवे और जस्टिस आदर्श कुमार गोयल की पीठ ने फैसला सुनाया - 
I. संशोधन की प्रकृति - अदालत ने स्पष्ट किया कि 2005 का संशोधन पूर्वलक्षी (Retrospective) नहीं है, बल्कि यह भविष्यलक्षी (Prospective) है।
II. जीवित पिता और जीवित बेटी का सिद्धांत - सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धारा 6 के तहत बेटी को हिस्सा तभी मिलेगा जब 9 सितम्बर 2005 को पिता और बेटी दोनों जीवित हों।
III. मृत पिता के मामले में - यदि पिता की मृत्यु 9 सितम्बर 2005 से पहले हो गई थी, तो संपत्ति पहले ही पुराने कानून (उत्तरजीविता के नियम) के अनुसार हस्तांतरित हो चुकी है, और उसे नए संशोधन के आधार पर दोबारा नहीं खोला जा सकता।
3. निर्णय का निष्कर्ष - संशोधन के माध्यम से दिए गए अधिकार केवल जीवित बेटियों के जीवित सहदायिक पिता पर ही लागू होते हैं, चाहे बेटी का जन्म कभी भी हुआ हो।
4. विशेष (बाद का बदलाव) वर्ष 2016 के इस फैसले ने जीवित पिता की शर्त अनिवार्य कर दी परन्तु बाद में विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा (2020) के मामले में सुप्रीम कोर्ट की बड़ी पीठ ने प्रकाश बनाम फूलवती के इस फैसले को पलट दिया।
विनीता शर्मा केस (2020) के अनुसार अब स्थिति यह है - 
I. बेटी का सहदायिक अधिकार उसके जन्म से होता है।
II. अतः, पिता का 2005 में जीवित होना अनिवार्य नहीं है। यदि पिता की मृत्यु 2005 से पहले भी हुई थी, तब भी बेटी पैतृक संपत्ति में समान हिस्से की हकदार है।

10. यज्ञदास शास्त्री v. मूलदास, भूदरदास SC 14 जनवरी 1966
वादी - यज्ञपुरुष दास (महंत स्वामी नारायण मंदिर अहमदाबाद, बंबई प्रांत 
प्रतिवादी - मुलदास भूदरदास वैशय - महा गुजरात दलित संघ के अध्यक्ष।
सिविल अपील - 517 of 1964
निर्णय - October 3, 1958 HC बॉम्बे 
प्रथम अपील - 107 of 52 
वादी के अधिवक्ता - वसंत J देसाई, ML भालजिया AG रत्नपारखी
सरकारी अधिवक्ता - सी के दीप्ति, अतिकुर्रहमान एवं KL हाथी।
न्यायमूर्ति - मुख्य न्यायाधीश गजेन्द्र गडकर
केस की मुख्य पृष्ठभूमि - 
विवाद - यह विवाद अहमदाबाद (गुजरात) के स्वामीनारायण मंदिर (सत्संगी संप्रदाय) से शुरू हुआ था।
कारण - बम्बई सरकार ने 1947 एवं 1956 में बम्बई हरिजन मंदिर प्रवेश अधिनियम पारित किया, जिसके तहत दलितों (हरिजनों) को मंदिरों में प्रवेश का अधिकार दिया गया।
 विरोध - स्वामीनारायण संप्रदाय के अनुयायियों (शास्त्री यज्ञदास, मूलदास व अन्य) ने इसका विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि उनका संप्रदाय हिंदू धर्म से अलग एक स्वतंत्र धर्म है, इसलिए उन पर यह अधिनियम लागू नहीं होता।
मुख्य कानूनी मुद्दे- 
Iक्या स्वामीनारायण संप्रदाय हिंदू धर्म का हिस्सा है या एक अलग धर्म?
IIक्या मंदिर में दलितों का प्रवेश रोकने का अधिकार धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 26) के तहत सुरक्षित है?
ट्रायल - निचली अदालतें - ट्रायल कोर्ट (अहमदाबाद) ने पहले यज्ञपुरुषदास के पक्ष में फैसला दिया।
बंबई हाई कोर्ट ने कहा - स्वामीनारायण सम्प्रदाय अलग धर्म नहीं हो कर हिंदू धर्म का ही एक हिस्सा है। इसलिए मंदिरों पर बंबई एक्ट लागू होगा।
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला - 
सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश PB गजेंद्र गडकर ने इस पर विस्तार से व्याख्या की और निम्नलिखित बिंदु रखे - 
I. हिंदू धर्म की परिभाषा - कोर्ट ने कहा कि हिंदू शब्द को किसी एक सिद्धांत या एक ईश्वर की पूजा तक सीमित नहीं किया जा सकता। यह एक जीवन पद्धति है जिसमें विविध दर्शन, संप्रदाय और पूजा पद्धतियाँ समाहित हैं।
II. सुधारवादी आंदोलन - कोर्ट ने माना कि स्वामीनारायण संप्रदाय हिंदू धर्म के भीतर ही एक सुधारवादी आंदोलन के रूप में जन्मा था। उनके ग्रंथ (जैसे शिक्षापत्री) वेदों और हिंदू दर्शन पर आधारित हैं।IIIसरकारी दस्तावेजों में अंकन - स्वामीनारायण संप्रदाय के अनुयायियों ने हमेशा जनगणना और अन्य दस्तावेजों में स्वयं को हिंदू घोषित किया है। अतः स्वामीनारायण सम्प्रदाय हिंदू धर्म से अलग नहीं है, इसके अनुयायी हिंदू माने जाएंगे।
IV. अछूत प्रथा का अंत - संविधान के अनुच्छेद 17 (अस्पृश्यता का उन्मूलन) और अनुच्छेद 25(2)(b) का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि राज्य के पास सामाजिक सुधार के लिए हिंदू धार्मिक संस्थानों को हिंदुओं के सभी वर्गों के लिए खोलने का अधिकार है।
निष्कर्ष (महत्व) - कोर्ट ने फैसला सुनाया कि स्वामीनारायण संप्रदाय हिंदू धर्म का ही एक हिस्सा है और उनके मंदिरों में दलितों के प्रवेश को रोका नहीं जा सकता। इस फैसले ने स्पष्ट किया कि जैन, बौद्ध और सिख धर्मों की तरह विभिन्न संप्रदाय हिंदू धर्म की छतरी के नीचे आते हैं और सामाजिक न्याय के कानून उन पर समान रूप से लागू होते हैं।
यह न्यायिक इतिहास में महत्वपूर्ण केस है। इस केस ने मुख्य रूप से हिंदू कौन है और हिंदू धर्म की व्यापकता क्या है, इसे परिभाषित किया।
यह फैसला सामाजिक समानता और धार्मिक सुधार की दिशा में बहुत बड़ा कदम था। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि हिंदू धर्म में विभाजन का दावा करके मंदिरों से दलितों को अलग नहीं रखा जा सकता।

11. यमुनावती vs. अनंतराव1988 -(दूसरे विवाह पर पत्नी को भरण-पोषण के अधिकार के संदर्भ में) - यह केस मुख्य रूप से इस प्रश्न पर आधारित था कि क्या अवैध या शून्य विवाह से जुड़ी महिला भरण-पोषण पाने की हकदार है।
1. मामले की पृष्ठभूमि - 
विवाह - अनंतराव (पति) ने पूर्व में विवाहित होते हुए जीवित पत्नी के रहते हुए दूसरा विवाह यमुनावती के साथ कर लिया।
विवाद - कुछ समय बाद यमुनावती ने पति से अलग होने के बाद दंड प्रक्रिया संहिता (CRPC) की धारा 125 के तहत भरण-पोषण का दावा प्रस्तुत किया।
पति का तर्क - पति ने अदालत में यह दलील दी कि चूंकि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 5(i) के अनुसार पहली पत्नी के रहते दूसरा विवाह शून्य होता है, इसलिए यमुनावती कानूनी रूप से उसकी पत्नी नहीं है और उसे भरण-पोषण पाने का कोई हक नहीं है।
2. कानूनी प्रश्न - क्या शून्य विवाह करने वाली महिला CRPC की धारा 125 के अर्थ में पत्नी की परिभाषा के अंतर्गत आती है?
3. सुप्रीम कोर्ट का निर्णय और तर्क - 
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सख्त कानूनी रुख अपनाया और यमुनावती की याचिका को खारिज कर दिया। अदालत के मुख्य तर्क थे कि - 
I. वैध विवाह की अनिवार्यता - कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 125 के तहत पत्नी शब्द का अर्थ केवल वही महिला है जिसका विवाह कानूनन वैध हो।
II. शून्य विवाह - हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 5(i) द्वि-विवाह को प्रतिबंधित करती है। अतः, पहली पत्नी के जीवित रहते किया गया दूसरा विवाह शुरू से ही शून्य होता है और ऐसी महिला को पत्नी का कानूनी दर्जा नहीं मिल सकता।
III. सद्भावना का अभाव - कोर्ट ने यह भी कहा कि भले ही महिला को पति के पहले विवाह की जानकारी न हो, फिर भी कानून के स्पष्ट प्रावधानों को अनदेखा नहीं किया जा सकता।
4. निर्णय का महत्व और प्रभाव- 
I. दूसरी पत्नी की स्थिति - इस निर्णय ने दूसरी पत्नी के भरण-पोषण के अधिकार को लगभग समाप्त कर दिया, चाहे उसकी गलती न भी हो।
II. कानूनी कठोरता - यह केस सहानुभूति के बजाय कानून के अक्षर के पालन पर जोर देता है।
III. द्वि-विवाह पर रोक  - यह फैसला पुरुषों को दूसरा विवाह करने से हतोत्साहित करने के उद्देश्य से भी देखा गया।
5. वर्तमान स्थिति और बदलाव - हालांकि यमुनावती केस ने सख्त लकीर खींच दी थी, लेकिन बाद के कुछ फैसलों (बादशाह गोडसे बनाम उर्मिला, 2013) में सुप्रीम कोर्ट ने थोड़ा नरम रुख अपनाया। वर्तमान में, यदि पति ने अपनी पहली शादी की बात छिपाई है और महिला को धोखे में रखकर शादी की है, तो अदालतें महिला के पक्ष में भरण-पोषण के आदेश दे सकती हैं ताकि उसे बेसहारा होने से बचाया जा सके।

12. अश्वनी कुमार vs.उत्तर प्रदेश राज्य (1998) - (दत्तक ग्रहण की वैधता)
1. मामले की पृष्ठभूमि - 
विवाद - मामला संपत्ति के उत्तराधिकार को लेकर था, जहाँ याचिकाकर्ता (अश्वनी कुमार) ने दावा किया कि वह मृतक का दत्तक पुत्र है। निचले न्यायालयों ने दत्तक ग्रहण को इस आधार पर अमान्य माना कि गोद लेने की रस्मों और साक्ष्यों में स्पष्टता नहीं थी।
2. कानूनी प्रश्न - 
I. क्या किसी व्यक्ति को केवल लंबे समय तक पुत्र के रूप में रहने के आधार पर दत्तक पुत्र माना जा सकता है?
II. हिन्दू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 की शर्तों का पालन न करने पर दत्तक ग्रहण की क्या स्थिति होगी?
3. न्यायालय का निर्णय और सिद्धांत - 
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस मामले में दत्तक ग्रहण के साक्ष्यों पर कड़ा रुख अपनाते हुए निम्नलिखित सिद्धांत प्रतिपादित किए - 
I. कठोर प्रमाण की आवश्यकता - न्यायालय ने कहा कि दत्तक ग्रहण एक कृत्रिम प्रक्रिया है जो उत्तराधिकार के स्वाभाविक क्रम को बदल देती है। इसलिए, इसे साबित करने के लिए ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य होने चाहिए।
II. दत्तक देने और लेने की रस्म - कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अधिनियम की धारा 11 के तहत बच्चे को देने और लेने की रस्म अनिवार्य है। यदि यह रस्म साबित नहीं होती, तो केवल लंबे समय तक साथ रहने या स्कूल के रिकॉर्ड में पिता का नाम होने से कोई दत्तक पुत्र नहीं बन जाता।
III. दस्तावेजों की भूमिका - यदि गोद लेने का कोई पंजीकृत विलेख नहीं है, तो मौखिक साक्ष्यों को बहुत सावधानी से जांचा जाना चाहिए।
4. निर्णय का महत्व - 
I. दावे का आधार - केवल सामाजिक व्यवहार या उपनाम का उपयोग गोद लेने का प्रमाण नहीं है।
II. अनिवार्य शर्त - माता-पिता द्वारा बच्चे को वास्तव में सौंपा जाना अनिवार्य है।
III. न्यायिक रुख - दत्तक ग्रहण के दावों को संदेह की दृष्टि से देखा जाना चाहिए जब तक कि वे कानून की कसौटी पर खरे न उतरें।

13. भंवरूलाल बनाम गिरधारीलाल,1949 - यह मामला हिन्दू कानून के अंतर्गत दत्तक ग्रहण की वैधता और उसके लिए आवश्यक साक्ष्यों, विशेषकर देने और लेने  की रस्म से संबंधित है। यह मामला इस सिद्धांत को पुख्ता करता है कि गोद लेने की प्रक्रिया में केवल कागजी औपचारिकताएं पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि धार्मिक और भौतिक रस्में अनिवार्य हैं।
1. मामले की पृष्ठभूमि - इस मामले में विवाद एक संपत्ति के उत्तराधिकार को लेकर था। एक पक्ष ने दावा किया कि वह मृतक का दत्तक पुत्र है और उसने प्रमाण के रूप में एक दत्तक विलेख पेश किया। दूसरे पक्ष ने इस गोद लेने की प्रक्रिया को इस आधार पर चुनौती दी कि बच्चे को वास्तव में सौंपा नहीं गया था।
2. कानूनी प्रश्न - 
I. क्या केवल एक लिखित दस्तावेज गोद लेने को वैध बनाने के लिए पर्याप्त है?
II. क्या देने और लेने की रस्म के बिना दत्तक ग्रहण कानूनी रूप से मान्य हो सकता है?
3. न्यायालय का निर्णय और सिद्धांत - 
अदालत ने इस मामले में दत्तक ग्रहण के पारंपरिक और कानूनी पहलुओं पर जोर देते हुए निर्णय दिया कि - 
I. शारीरिक सौंपने की अनिवार्यता - न्यायालय ने स्पष्ट किया कि हिन्दू कानून में दत्तक ग्रहण के लिए बच्चे को एक परिवार से दूसरे परिवार में शारीरिक रूप से सौंपा जाना सबसे महत्वपूर्ण शर्त है।
II. दस्तावेज बनाम रस्म - कोर्ट ने कहा कि यदि यह साबित हो जाता है कि देने और लेने की वास्तविक रस्म नहीं हुई थी, तो भले ही कितना भी भव्य दत्तक विलेख क्यों न तैयार किया गया हो, वह गोद लेना शून्य माना जाएगा।
III. इच्छा मात्र पर्याप्त नहीं - गोद लेने की इच्छा होना या बच्चे को पुत्र की तरह पालना अलग बात है, लेकिन कानूनी उत्तराधिकारी बनने के लिए विधि सम्मत रस्मों का पालन अनिवार्य है।
4. निर्णय का महत्व और प्रभाव - 
I. औपचारिकता - लिखित दस्तावेज केवल साक्ष्य है, स्वयं में दत्तक ग्रहण नहीं।
II. अनिवार्य रस्म - बच्चे का एक गोद से दूसरी गोद में जाना अनिवार्य है।
III. साक्ष्य का भार - जो व्यक्ति दत्तक ग्रहण का दावा करता है, उसे ही रस्मों का होना साबित करना होगा। |
5. वर्तमान प्रासंगिकता - आज भी हिन्दू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 की धारा 11 के तहत देने और लेने की शर्त को बरकरार रखा गया है। भंवरूलाल का मामला आज भी वकीलों और जजों द्वारा इस बात को साबित करने के लिए उद्धृत किया जाता है कि गोद लेने में भौतिक रस्मों की अनदेखी नहीं की जा सकती।

14. धर्मेन्द्र कुमार vs. उषा कुमार 1977 - (हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत तलाक धारा 13(1A) की व्याख्या के संदर्भ में) यह मामला इस कानूनी प्रश्न का समाधान करता है कि क्या कोई पक्ष अपनी ही गलती का लाभ उठाकर तलाक ले सकता है।
1. मामले की पृष्ठभूमि - 
I. न्यायिक पृथक्करण - पत्नी (उषा कुमार) ने पहले पति के खिलाफ न्यायिक पृथक्करण की डिक्री प्राप्त की थी।
II. तलाक की याचिका - डिक्री मिलने के दो साल बाद तक दोनों के बीच कोई सुलह नहीं हुई। इसके बाद पत्नी ने धारा 13(1A)(i) के तहत तलाक के लिए याचिका दायर की।
III. पति का तर्क - पति ने तर्क दिया कि पत्नी ने डिक्री मिलने के बाद उसके साथ रहने की कोई कोशिश नहीं की और उसे घर में आने से रोका। पति के अनुसार, पत्नी अपनी ही गलती (सुलह न करने) का लाभ उठा रही थी, जो धारा 23(1)(a) के तहत प्रतिबंधित है।
2. कानूनी प्रश्न - क्या न्यायिक पृथक्करण की डिक्री प्राप्त करने वाला पक्ष, यदि वह सुलह की कोशिश नहीं करता है, तो क्या उसे धारा 23(1)(a) के तहत अपनी गलती का लाभ उठाना माना जाएगा और उसे तलाक देने से इनकार किया जा सकता है?
3. सुप्रीम कोर्ट का निर्णय और सिद्धांत - जस्टिस फज़ल अली की पीठ ने इस मामले में फैसला सुनाते हुए पति के तर्कों को खारिज कर दिया - 
I. गलती की परिभाषा - कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल साथ न रहना या सुलह की कोशिश न करना धारा 23(1)(a) के तहत गलती नहीं माना जा सकता। गलती ऐसी होनी चाहिए जो गंभीर हो और डिक्री के बाद के अधिकारों में बाधा डालती हो।
II. सुलह की बाध्यता - अदालत ने कहा कि न्यायिक पृथक्करण की डिक्री का मतलब ही यह है कि पक्षकार अब एक-दूसरे के साथ रहने के लिए बाध्य नहीं हैं। इसलिए, यदि डिक्री प्राप्त करने वाला पक्ष वापस नहीं आता है, तो वह कोई कानूनी गलती नहीं कर रहा है।
III. तलाक का अधिकार - यदि डिक्री के बाद निर्धारित समय (तब 2 वर्ष, अब 1 वर्ष) तक सहवास फिर से शुरू नहीं होता है, तो किसी भी पक्ष को तलाक मांगने का पूर्ण अधिकार है।
4. निर्णय का महत्व और प्रभाव - 
I. धारा 13(1A) - यह धारा स्वतंत्र अधिकार देती है, जिसका उद्देश्य मृत विवाह को समाप्त करना है।
II. धारा 23(1)(a) - इसका उपयोग केवल तब किया जा सकता है जब कोई पक्ष डिक्री मिलने के बाद कोई नया और गंभीर गलत कार्य करे। |
III. न्यायिक रुख - कानून अब सुलह न होने को गलती के बजाय विवाह की विफलता के रूप में देखता है।
5. सारांश - इस फैसले ने यह साफ कर दिया कि यदि कोर्ट ने एक बार अलग रहने की डिक्री दे दी है, तो पक्षकारों पर वापस साथ रहने का कोई कानूनी दबाव नहीं होता। यदि वे साथ नहीं आते, तो समय सीमा पूरी होने पर वे आसानी से तलाक ले सकते हैं।

15. वी. तुलसाम्मा बनाम शेषा रेड्डी,1977 - हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 14 की व्याख्या के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट का एक ऐतिहासिक और मील का पत्थर माना जाने वाला निर्णय है। यह केस स्पष्ट करता है कि एक हिन्दू महिला को भरण-पोषण के बदले मिली संपत्ति कब पूर्ण स्वामित्व में बदल जाती है।
1. मामले की पृष्ठभूमि - 
विवाद - तुलसाम्मा के पति की मृत्यु 1931 में हुई थी। अपने पति के भाई (शेषा रेड्डी) के साथ हुए समझौते के तहत, उसे भरण-पोषण के बदले कुछ संपत्तियां दी गई थीं।
शर्त - समझौते में यह शर्त थी कि तुलसाम्मा के पास वह संपत्ति केवल उसके जीवनकाल तक रहेगी और उसकी मृत्यु के बाद वह वापस शेषा रेड्डी को मिल जाएगी।
दावा - 1956 में हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम लागू होने के बाद, तुलसाम्मा ने दावा किया कि धारा 14(1) के तहत अब वह उस संपत्ति की पूर्ण स्वामी बन गई है और उसे वह संपत्ति बेचने का अधिकार है।
2. मुख्य कानूनी प्रश्न - क्या धारा 14(2) के तहत सीमित अधिकार वाली संपत्ति (जो किसी समझौते या डिक्री से मिली हो) धारा 14(1) के तहत पूर्ण अधिकार में बदल सकती है?
3. सुप्रीम कोर्ट का निर्णय और सिद्धांत - जस्त्टिस एस. मुर्तजा फज़ल अली ने इस मामले में विस्तृत निर्णय देते हुए निम्नलिखित सिद्धांत प्रतिपादित किए - 
I. धारा 14(1) बनाम 14(2) - कोर्ट ने कहा कि यदि किसी महिला को संपत्ति उसके पूर्व-विद्यमान अधिकार जैसे कि भरण-पोषण के बदले मिली है, तो वह धारा 14(1) के अंतर्गत आएगी। ऐसी स्थिति में, भले ही समझौते में सीमित अधिकार की शर्त लिखी हो, कानूनन वह पूर्ण स्वामित्व में बदल जाएगी।
II. भरण-पोषण का अधिकार - हिन्दू कानून में विधवा का भरण-पोषण का अधिकार केवल व्यक्तिगत अधिकार नहीं है, बल्कि यह पति की संपत्ति पर एक भार  की तरह है।
III. धारा 14(2) का सीमित दायरा - धारा 14(2) केवल उन मामलों में लागू होती है जहाँ महिला को संपत्ति पहली बार किसी उपहार या वसीयत के माध्यम से दी गई हो, जिसमें उसका पहले से कोई कानूनी हक न हो।
4. निर्णय का महत्व - 
I. महिला का सशक्तिकरण - इसने हज़ारों विधवाओं को उनकी संपत्ति का असली मालिक बनाया।
II. सीमित अधिकार का अंत - भरण-पोषण के बदले मिली संपत्ति पर किसी भी तरह की वापसी की शर्त को शून्य कर दिया गया।
III. व्यापक व्याख्या - कोर्ट ने कहा कि धारा 14 एक कल्याणकारी प्रावधान है और इसकी व्याख्या महिलाओं के पक्ष में होनी चाहिए।
5. सारांश - इस फैसले ने यह सुनिश्चित किया कि यदि एक हिन्दू महिला को उसके गुजारे के लिए संपत्ति दी गई है, तो 1956 के कानून के बाद वह उसकी एकमात्र और पूर्ण मालिक है। वह उस संपत्ति को बेच सकती है, वसीयत कर सकती है या उपहार में दे सकती है।

16. सरोज रानी बनाम सुदर्शन कुमार,1984 - हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 9 (दाम्पत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना की संवैधानिक वैधता के संबंध में)। इस मामले ने वैवाहिक अधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच के संतुलन को स्पष्ट किया।
1. मामले की पृष्ठभूमि - 
I. न्यायिक इतिहास - इस केस से कुछ समय पहले, आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने टी. सरिता बनाम वेंकट सुबैया मामले में धारा 9 को असंवैधानिक घोषित कर दिया था। कोर्ट का तर्क था कि यह धारा किसी व्यक्ति की निजता और शरीर पर उसके अधिकार का उल्लंघन करती है।
II. विवाद - सरोज रानी और सुदर्शन कुमार के मामले में, पति ने दाम्पत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना की डिक्री प्राप्त की थी, लेकिन एक वर्ष तक साथ न रहने के आधार पर उसने बाद में तलाक की याचिका दायर कर दी।
III. चुनौती - दिल्ली उच्च न्यायालय ने धारा 9 को वैध माना था। अंततः यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा ताकि इसकी संवैधानिकता पर अंतिम मुहर लग सके।
2. कानूनी प्रश्न - क्या हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 9 संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन करती है?
3. सुप्रीम कोर्ट का निर्णय और सिद्धांत - जस्टिस सब्यसाची मुखर्जी की पीठ ने निम्नलिखित महत्वपूर्ण निष्कर्ष दिए - 
I. धारा 9 की वैधता - सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के फैसले को पलटते हुए धारा 9 को पूरी तरह संवैधानिक करार दिया।
II. धारा 9 का उद्देश्य - कोर्ट ने कहा कि इस धारा का उद्देश्य विवाह को तोड़ना नहीं, बल्कि उसे बचाना है। यह पति-पत्नी को एक साथ रहने और आपसी मतभेद सुलझाने का एक कानूनी अवसर प्रदान करती है।
III. जबरदस्ती का अभाव - कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 9 की डिक्री का मतलब यह नहीं है कि किसी व्यक्ति को शारीरिक रूप से सहवास के लिए मजबूर किया जाएगा। यह केवल साथ रहने का आदेश है। यदि डिक्री का पालन नहीं होता, तो केवल संपत्ति की कुर्की जैसा नागरिक उपचार उपलब्ध है।
निजता का अधिकार - कोर्ट ने माना कि दाम्पत्य अधिकार वैवाहिक संस्था का आधार हैं और इन्हें अनुच्छेद 21 का उल्लंघन नहीं माना जा सकता, क्योंकि विवाह स्वयं में एक सामाजिक और कानूनी संस्था है।
4. निर्णय का महत्व और प्रभाव - 
I. विवाह की पवित्रता - कोर्ट ने माना कि विवाह को केवल अनुबंध नहीं, एक संस्कार के रूप में संरक्षित किया जाना चाहिए।
II. तलाक का आधार - यदि धारा 9 की डिक्री के एक वर्ष बाद भी पक्ष साथ नहीं आते, तो यह धारा 13(1A) के तहत तलाक का आधार बनता है।
III. अंतिम व्याख्या - इस फैसले ने धारा 9 पर चल रहे सभी कानूनी विवादों को समाप्त कर दिया और इसे भारतीय कानून का स्थाई हिस्सा बनाए रखा।
5. सारांश - सरोज रानी के केस ने यह स्पष्ट कर दिया कि कानून वैवाहिक संबंधों को जोड़ने का प्रयास कर सकता है। हालांकि आधुनिक समय में इस पर फिर से बहस हो रही है, लेकिन 1984 का यह फैसला आज भी भारत में दाम्पत्य अधिकारों के लिए सबसे बड़ा उदाहरण है।

17. गीता हरिहरन बनाम भारतीय रिजर्व बैंक, 1999) - (संरक्षकता और लैंगिक समानता के संदर्भ में)। इस मामले ने माता-पिता के बीच भेदभाव करने वाली पुरानी कानूनी व्याख्या को बदल दिया।
1. मामले की पृष्ठभूमि - 
I. विवाद का कारण - गीता हरिहरन (एक प्रसिद्ध लेखिका) ने अपने नाबालिग बेटे के नाम पर RBI के राहत बांड में निवेश के लिए आवेदन किया।
II. RBI का रुख - रिजर्व बैंक ने आवेदन यह कहकर वापस कर दिया कि हिन्दू अप्राप्तवयता और संरक्षकता अधिनियम, 1956 की धारा 6(a) के अनुसार, पिता ही प्राकृतिक संरक्षक है। माता केवल पिता की मृत्यु के बाद ही संरक्षक बन सकती है।
चुनौती - गीता हरिहरन ने इस प्रावधान को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, यह तर्क देते हुए कि यह महिलाओं के खिलाफ भेदभावपूर्ण है और संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन करता है।
2. कानूनी प्रश्न - क्या धारा 6(a) में प्रयुक्त शब्द पिता और उसके बाद माता का अर्थ यह है कि पिता के जीवित रहते माता कभी भी प्राकृतिक संरक्षक नहीं बन सकती?
3. सुप्रीम कोर्ट का निर्णय और व्याख्या - जस्टिस ए.एस. आनंद की अध्यक्षता वाली पीठ ने व्याख्या दी कि - 
 I. शब्द उसके बाद का अर्थ - कोर्ट ने कहा कि उसके बाद का मतलब केवल पिता की मृत्यु नहीं है। इसका अर्थ पिता की अनुपस्थिति में भी है।
II. अनुपस्थिति की परिभाषा - यदि पिता किसी भी कारण से बच्चे की देखभाल के लिए उपलब्ध नहीं है (जैसे कि वह विदेश में है, बीमार है, अलग रह रहा है, या बच्चे के प्रति उदासीन है), तो माता को प्राकृतिक संरक्षक के रूप में कार्य करने का पूर्ण अधिकार है।
III. संवैधानिक सामंजस्य - कोर्ट ने प्रावधान को असंवैधानिक घोषित करने के बजाय उसकी व्याख्या इस तरह की कि वह समानता के संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप हो सके।
4. निर्णय का महत्व और प्रभाव - 
I. लैंगिक समानता - इसने पिता की पूर्ण सर्वोच्चता को समाप्त किया और माता को समान दर्जा दिया।
II. बच्चे का कल्याण - कोर्ट ने दोहराया कि संरक्षकता में 'पिता का अधिकार' नहीं, बल्कि बच्चे का हित सर्वोपरि है।
III. प्रशासनिक बदलाव - इस फैसले के बाद स्कूलों, बैंकों और पासपोर्ट कार्यालयों में माता के हस्ताक्षर को पिता की उपस्थिति में भी मान्य किया जाने लगा।
5. सारांश - इस फैसले ने हिन्दू समाज की उस पितृसत्तात्मक सोच पर चोट की जहाँ माता को केवल पिता की अनुपस्थिति में विकल्प माना जाता था। आज इस निर्णय के कारण ही माताएं अपने बच्चों के कानूनी दस्तावेजों पर स्वतंत्र रूप से हस्ताक्षर कर सकती हैं, भले ही पिता जीवित हों।

18. पिंकी जैन बनाम संजय जैन, 2005 - (तलाक और क्रूरता की व्याख्या के संबंध में) यह मामला विशेष रूप से धारा 13(1)(ia) के तहत मानसिक क्रूरता के पहलुओं को उजागर करता है।
1. मामले की पृष्ठभूमि - 
I. विवाह - पिंकी जैन और संजय जैन का विवाह 1995 में हुआ था।
II. विवाद - पति (संजय जैन) ने तलाक की याचिका दायर की, जिसमें उसने आरोप लगाया कि पत्नी का व्यवहार उसके और उसके परिवार के प्रति अत्यंत अपमानजनक और क्रूर है।
III. आरोप - पति ने दावा किया कि पत्नी छोटी-छोटी बातों पर झगड़ा करती थी, उसे नपुंसक कहती थी और बिना बताए घर छोड़कर चली जाती थी। वहीं पत्नी ने पति पर दहेज उत्पीड़न और प्रताड़ना के आरोप लगाए।
2. कानूनी प्रश्न - 
I. क्या पति के विरुद्ध लगाए गए झूठे और अपमानजनक आरोप (जैसे नपुंसकता का आरोप) मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आते हैं?
II. क्या ऐसे व्यवहार के आधार पर धारा 13(1)(ia) के तहत तलाक की डिक्री दी जा सकती है?
3. न्यायालय का निर्णय और सिद्धांत - 
दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस मामले में पति के पक्ष में फैसला सुनाते हुए निम्नलिखित सिद्धांत प्रतिपादित किए - 
I. मानसिक क्रूरता - न्यायालय ने कहा कि क्रूरता केवल शारीरिक नहीं होती। यदि एक जीवनसाथी दूसरे पर बिना किसी आधार के नपुंसकता या अनैतिकता के आरोप लगाता है, तो यह गहरे मानसिक कष्ट और क्रूरता का कारण बनता है।
II. झूठे आरोप - कोर्ट ने पाया कि पत्नी द्वारा पति के विरुद्ध लगाए गए नपुंसकता के आरोप निराधार थे। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी पुरुष के पौरुष पर सार्वजनिक रूप से या कानूनी कार्यवाही में झूठा संदेह करना उसकी गरिमा को ठेस पहुँचाना है, जो तलाक के लिए पर्याप्त आधार है।
III. विवाह का टूटना - न्यायालय ने यह भी देखा कि दोनों पक्ष लंबे समय से अलग रह रहे थे और उनके बीच कड़वाहट इतनी बढ़ गई थी कि सुलह की कोई गुंजाइश नहीं थी।
4. निर्णय का महत्व - 
I. चरित्र हनन - जीवनसाथी के चरित्र या शारीरिक क्षमता पर झूठे आरोप लगाना 'मानसिक क्रूरता' है।
II. धारा 13(1)(ia) - क्रूरता को साबित करने के लिए शारीरिक हिंसा का होना अनिवार्य नहीं है।
III. न्यायिक रुख - न्यायालयों ने वैवाहिक संबंधों में गरिमा और मानसिक शांति को प्राथमिकता दी।
5. सारांश - इस फैसले ने यह स्थापित किया कि वैवाहिक जीवन में शब्दों और आरोपों का उतना ही महत्व है जितना कि कार्यों का। पिंकी जैन बनाम संजय जैन का मामला आज भी उन वकीलों द्वारा उद्धृत किया जाता है जहाँ एक पक्ष दूसरे पर झूठे और अपमानजनक आरोप लगाकर उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित करता है।

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नोट्स - LLB प्रथम सेमेस्टर 
द्वारा - शमशेर भालू खां 
छात्र - LLB प्रथम सेमेस्टर 2025
राजकीय विधि महाविद्यालय, चूरू 
पता - 296 सदफ आशियाना कायमखानी बस्ती सहजूसर, चूरू 
9587243963
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स्त्रोत एवं संदर्भ - 
पुस्तक - आधुनिक हिंदू विधि लेखक Dr. पारस दिवान प्रकाशक - इलाहाबाद लॉ एजेंसी पब्लिकेशंस, इलाहाबाद।
I.कानून.आर्ग 
II. विभिन्न आलेख एवं निर्णय
III. भारतीय संविधान
IV. विभिन्न अधिनियम एवं उनमें संशोधन 
V. Adv. अंजलि 
VI. Dr. श्रीराम शर्मा सहायक आचार्य (हिंदू विधि) राजकीय विधि महाविद्यालय चूरू 
VII. Online sites 
VIII. गूगल जैमिनाई
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