संबिदा विधि-1 पेपर प्रथम सेमेस्टर 3
डॉक्टर भीमराव अंबेडकर लॉ विश्वविद्यालय, जयपुर
पाठ्यक्रम प्रश्न पत्र 1.3
संविदा कानून-I
UNIT-I Definition and Classification of Contracts
इकाई-I: अनुबंध की परिभाषा और वर्गीकरण -
1.1 अनुबंध का अर्थ, तत्व और विशेषताएं
1.2 अनुबंध का गठन और वर्गीकरण -
विलेख और साधारण अनुबंध, औपचारिक लिखित दस्तावेज और सामान्य मौखिक या लिखित समझौते, द्विपक्षीय और एक पक्षीय अनुबंध, व्यक्त और निहित अनुबंध,
वैध, शून्य, शून्यकरणीय और अवैध अनुबंध, निष्पादित और निष्पादनीय अनुबंध।
1.3 प्रस्ताव और प्रस्ताव के लिए आमंत्रण,
प्रस्ताव का संवहन और प्रतिसंहरण, प्रस्ताव की सूचना देना और उसे वापस लेना।
1.4 प्रस्ताव की स्वीकृति, स्वीकृति का संवहन और प्रतिसंहरण
1.5 मानक प्रपत्र अनुबंध और ई-अनुबंध
इकाई II प्रतिफल (Consideration)
2.1. प्रतिफल - प्रतिफल का अर्थ, परिभाषा और तत्व; प्रतिफल का महत्व और पर्याप्तता; अनुबंध का संबंध, प्रतिफल के प्रकार और अपवाद।
2.2. अनुबंध करने की क्षमता - नाबालिग, पागल, जड़बुद्धि; कानूनी अक्षमता वाले व्यक्ति के साथ किए गए समझौते की प्रकृति और प्रभाव।
2.3. स्वतंत्र सहमति - स्वतंत्र सहमति को दूषित करने वाले कारक, उत्पीड़न, अनुचित प्रभाव, कपट, मिथ्या वर्णन, कानून और तथ्य की भूल।
2.4. अनुबंध की स्वतंत्रता पर सीमाएं - गैर-कानूनी समझौते, सार्वजनिक नीति, आंशिक रूप से गैर-कानूनी प्रतिफल और उद्देश्यों वाले समझौते।
2.5. प्रतिफल के बिना समझौता- विवाह में अवरोध डालने वाले समझौते, व्यापार में अवरोध डालने वाले समझौते, कानूनी कार्यवाही में अवरोध डालने वाले समझौते, बाजी या दांव के समझौते।
इकाई-III समाश्रित अनुबंध -
3.1 समाश्रित अनुबंध - निष्पादन अनुबंध, सशर्त अनुबंध जो किसी घटना के घटने या न घटने पर निर्भर हो, मानवीय आचरण से जुड़ी घटना।
3.2 अनुबंध का निष्पादन - निष्पादन करने वाले पक्ष, संयुक्त अधिकार और संयुक्त दायित्व, वचनों का निष्पादन, निष्पादन का समय, स्थान और तरीका।
3.3 अनुबंध की समाप्ति - निष्पादन द्वारा समाप्ति, समझौते द्वारा समाप्ति, असंभवता का सिद्धांत, कानून के संचालन द्वारा समाप्ति, उल्लंघन और नवीनीकरण द्वारा समाप्ति।
3.4 अर्ध-अनुबंध - अनुबंध से उत्पन्न दायित्वों के समान दायित्व, अवधारणा और वर्गीकरण।
3.5 अनुबंध भंग के उपचार - हर्जाना, हर्जाने की सुदूरता, हर्जाने का न्यूनीकरण, दंड और निर्धारित हर्जाना।
इकाई-IV विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 (Specific Relief Act, 1963) -
4.1. विनिर्दिष्ट अनुतोष का अर्थ - अनुबंधों का विनिर्दिष्ट पालन।
4.2. अनुबंध जिन्हें विनिर्दिष्ट रूप से लागू नहीं किया जा सकता- वे पक्ष जिनके द्वारा अनुबंधों को विनिर्दिष्ट रूप से लागू किया जा सकता है।
4.3. व्यादेश (Injunction) और इसके प्रकार।
4.4. घोषणात्मक वाद।
4.5. अनुबंध का विखंडन और रद्दीकरण - न्यायालय का विवेकाधिकार।
प्रमुख वाद (LEADING CASES)
1. कार्लिल बनाम कार्बोलिक स्मोक बॉल कंपनी (1893)
2. भगवानदास बनाम गिरधारी लाल एंड कंपनी, ए.आई.आर. 1966
3. मोतीलाल पदमपत शुगर मिल्स बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, ए.आई.आर. 1979
4. मोहरी बीबी बनाम धर्मोदास घोष, (1903)
5. सत्यव्रत घोष बनाम मुगनीराम बांगुर एंड कंपनी व अन्य, AIR 1954
इकाई-I
भारतीय संविदा अधिनियम Indian Contract Act,1872
ऐतिहासिक परिपेक्ष्य - भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 भारत के सबसे पुराने और महत्वपूर्ण व्यापारिक कानूनों में से एक है जिसकी इतिहास ब्रिटिश काल से जुड़ा है।
1. पृष्ठभूमि और आवश्यकता -
ब्रिटिश शासन के शुरुआती दौर में भारत में अनुबंधों के लिए समान कानून नहीं थे। उस समय प्रेसिडेन्सी नगरों (कलकत्ता, मद्रास, बॉम्बे) में अंग्रेजी कानून लागू होते थे।
मफस्सिल (ग्रामीण क्षेत्रों) में विवादों का निपटारा न्याय, साम्य और सद्भाव के आधार पर या व्यक्तिगत धार्मिक कानूनों (हिंदू/मुस्लिम लॉ) के अनुसार होता था।ब्रिटिश भारत में व्यापार करने आए थे, उनके इस उद्देश्य के विस्तार के साथ संहिताबद्ध कानून की जरूरत महसूस हुई ताकि कानूनी निश्चितता बनी रहे। इस आवश्यकता के मद्देनजर भारतीय संविदा अधिनियम लाया गया।
2. मसौदा और विकास (Drafting)
इस अधिनियम के निर्माण की प्रक्रिया लंबी चली मुख्य चरण इस प्रकार है-
तीसरा विधि आयोग - इस अधिनियम का मसौदा लंदन में 1866 में तीसरे विधि आयोग अध्यक्ष लॉर्ड रॉमली ने तैयार किया।
3. भारत में संशोधन - मूल मसौदा ब्रिटिश कानूनों पर आधारित था परन्तु भारत की सामाजिक और आर्थिक स्थिति अलग थी, जिसके कारण इसमें कई संशोधन किए गए। सर जेम्स फिट्जजेम्स स्टीफन ने किए गए संशोधनों को दिया विधान परिषद में प्रस्तुत किया, इसके पश्चात -
∆. अधिनियम पारित - 25 अप्रैल, 1872
∆. तत्कालीन ब्रिटिश भारत में लागू होने की तिथि - 1 सितंबर, 1872
∆. कुल धाराएं - पहले 266 (अब 2 भागों में भाग एक सामान्य 01 से 75, भाग दो 124 से 238।
I. अधिनियम की मूल संरचना में परिवर्तन - जब 1872 का कानून बहुत विस्तृत था। समय के साथ इसमें कुछ बदलाव किए गए, इसके कुछ हिस्सों को अलग कर नए कानून बनाए गए।
II. वस्तु विक्रय - मूल अधिनियम की धारा 76 से 123, वस्तु विक्रय से संबंधित थीं जिन्हें 1930 में निरस्त कर नया अधिनियम वस्तु विक्रय अधिनियम, 1930 बनाया गया।
III. साझेदारी - मूल अधिनियम की 239 से 266 तक की धाराएं साझेदारी से जुड़ी थी। इन्हें 1932 में हटा कर भारतीय साझेदारी अधिनियम, 1932 बनाया गया।
5. वर्तमान स्थिति - आज के समय में यह अधिनियम मुख्य रूप से दो भागों में विभाजित है -
I. सामान्य सिद्धांत (धारा 1 से 75) - इसमें प्रस्ताव, स्वीकृति, प्रतिफल और अनुबंध की वैधता के बुनियादी नियम हैं।
II. विशिष्ट अनुबंध (धारा 124 से 238) - इसमें क्षतिपूर्ति, गारंटी, उपनिधान, गिरवी और एजेंसी जैसे विशेष अनुबंध शामिल हैं।
अनुबंध (संविदा) (Contrect) की परिभाषा और वर्गीकरण -
अनुबंध (संविदा) का अर्थ - अनुबंध एक समझौता है जिसे कानून की मदद से लागू करवाया जा सके। इसे संविदा भी कहते हैं।
अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 2(h) के अनुसार - एक समझौता जो कानून द्वारा लागू हो, अनुबंध कहलाता है।
इस समीकरण के अनुसार -
संविदा = समझौता + कानूनी वैधता
वह समझौता जिसके बदले में कोई प्रतिफल मिलता है अनुबंध कहलाता है। हम कह सकते हैं कि - दो पक्षों में सहमति से किसी कार्य को करने या नहीं करने के बदले में कोई प्रतिफल मिलता है। इसकी पालना नहीं करने पर संविदा भंग करने वाले के विरुद्ध उचित कानूनी कार्यवाही की जा सकती है।
अनुबंध को हम इस प्रकार से समझ सकते हैं - A की सब्जी की दुकान है जिसके आगे उसने बोर्ड पर भाव लिख रखा है, ग्राहक आकर आवश्यकतानुसार सब्जियां लेता है और सूची के अनुसार राशि दे देता है। यहां प्रस्ताव पूर्व लिखित है, जैसे रोडवेज, रेल या हवाई किराया या होटल में चाय, नाश्ता खाना की लिखित राशि। यात्री/ग्राहक उसे पढ़ता है, स्वीकार करता है। ग्राहक के ऑर्डर देते ही या वाहन में बैठते ही अनुबंध स्वीकार हो जाता है। अनुबंध स्वीकार होते ही ऑर्डर की त्रुटि रहित पूर्ति/गंतव्य तक सुरक्षित पहुंच और राशि की अदायगी संविदा की पूर्णता है। यदि इन परिस्थितियों में दोनों में से किसी एक पक्ष ने कोई भी त्रुटि की हो तो संविदा भंग मानी जाएगी और पीड़ित पक्ष न्यायालय की शरण में जा सकेगा।
अन्य परिभाषाएं -
1. सर विलियम एन्सन - संविदा दो या दो से अधिक व्यक्तियों के बीच किया गया एक ऐसा प्रवर्तनीय करार है, जिसके द्वारा एक या अधिक पक्षों के पक्ष में कुछ अधिकार प्राप्त होते हैं और दूसरे पक्ष या पक्षों के ऊपर कुछ विधिक दायित्व या कर्तव्य थोपे जाते हैं।
2. साल्मंड - संविदा एक ऐसा करार है जो पक्षों के बीच दायित्व उत्पन्न करता है और उनकी परिभाषा करता है।
3. फ्रेडरिक पोलक - प्रत्येक करार और वचन जो कानून द्वारा प्रवर्तनीय हो, संविदा कहलाता है।
निष्कर्ष - इन सभी परिभाषाओं का विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि किसी भी संविदा के लिए निम्नलिखित का होना अनिवार्य है -
I. वैध प्रस्ताव
II. स्वतंत्र स्वीकृति
III. करार (लिखित/अलिखित)
IV. वास्तविक प्रतिफल
कानूनी बाध्यता - सभी पक्षों का इरादा कानूनी संबंध स्थापित करना होना चाहिए।
अधिनियम का पालन - वह भारतीय संविदा अधिनियम की शर्तों (जैसे स्वतंत्र सहमति, वैध प्रतिफल आदि) को पूरा करता हो।
अनुबंध के तत्व (घटक) -
भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 10 में उन तत्वों का उल्लेख किया गया है, जो एक साधारण समझौते को वैध अनुबंध बनाते हैं।
किसी भी अनुबंध को कानूनन सही मानने के लिए निम्नलिखित तत्वों का होना अनिवार्य है -
1. प्रस्ताव और स्वीकृति - एक पक्ष द्वारा वैध प्रस्ताव दिया जाना चाहिए और दूसरे पक्ष द्वारा उसकी बिना किसी शर्त के स्वीकृति दी जानी चाहिए। स्वीकृति की सूचना प्रस्तावक को मिलना आवश्यक है।
2. कानूनी संबंध बनाने का इरादा -पक्षों के बीच समझौता इस उद्देश्य से होना चाहिए कि यदि कोई पक्ष वादा तोड़े, तो कानूनी कार्यवाही की जा सके। घरेलू या सामाजिक समझौते (जैसे दोस्त को पार्टी पर बुलाना) अनुबंध नहीं होते।
3. वैध प्रतिफल - प्रतिफल का अर्थ है कुछ के बदले कुछ (Quid Pro Quo)। अनुबंध में दोनों पक्षों को कुछ न कुछ लाभ मिलना चाहिए। यह मूल्यवान होना चाहिए और कानून की नजर में वैध होना चाहिए।
4. पक्षों की क्षमता - अनुबंध करने वाले पक्ष कानूनन सक्षम होने चाहिए, वे -
I. वयस्क, आयु 18 वर्ष से अधिक हो।
II. स्वस्थ चित्त के हों।
III. कानून द्वारा अनुबंध हेतु अयोग्य घोषित न किए गए हों।
5. स्वतंत्र सहमति - पक्षों की सहमति स्वतंत्र होनी चाहिए। यदि सहमति निम्नलिखित कारणों से ली गई है, तो वह स्वतंत्र नहीं मानी जाएगी -
I. उत्पीड़न
II. अनुचित प्रभाव
III. कपट
IV. मिथ्या वर्णन
V. भूल
6. वैध उद्देश्य - अनुबंध का उद्देश्य कानून के विरुद्ध, अनैतिक या सार्वजनिक नीति के खिलाफ नहीं होना चाहिए (जैसे चोरी करने का अनुबंध)।
7. निश्चितता - अनुबंध की शर्तें स्पष्ट और निश्चित होनी चाहिए। अनिश्चित अर्थ वाले समझौते (जैसे मैं आपको कुछ पैसे दूंगा) वैध नहीं होते।
8. निष्पादन की संभावना - अनुबंध ऐसा होना चाहिए जिसे पूरा करना संभव हो। असंभव कार्य (जैसे जादू से खजाना खोजना) का अनुबंध शून्य होता है।
9. लिखित एवं पंजीकरण - सामान्यतः अनुबंध मौखिक भी हो सकते हैं, लेकिन कुछ विशेष अनुबंधों का लिखित होना और उनका गवाहों द्वारा हस्ताक्षरित या पंजीकृत होना अनिवार्य होता है (जैसे संपत्ति की बिक्री)।
समझौता (Agreement) - कोई एक व्यक्ति/पक्ष प्रस्ताव देता है और दूसरा उसे स्वीकार कर लेता है तो प्रस्ताव समझौता बन जाता है। इसे करार या वचन भी कहते हैं।
कानूनी बाध्यता - समझौते का उद्देश्य ऐसा होना चाहिए कि यदि कोई पक्ष अपना वादा तोड़े, तो दूसरा पक्ष अदालत जा सके।
उदाहरण - यदि आप किसी दोस्त को खाने पर बुलाते हैं और वह नहीं आता, तो यह अनुबंध नहीं है (यह सामाजिक समझौता है, सगाई की ओर तोड़ दी (यह समझौते (विवाह) का प्रारंभिक रूप है जो पूरा होने से पहले अस्वीकृत हो गया)। परंतु यदि आप किसी से कार खरीदने का लिखित समझौता करते हैं और पैसे देने के बाद वह कार नहीं देता, तो यह अनुबंध है। अब पीड़ित पक्ष न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है।
वैध समझौते (अनुबंध) की शर्तें -
दो पक्ष हों - कम से कम दो व्यक्तियों (पक्षों) के मध्य ही समझौता हो सकता है।
स्वतंत्र सहमति - दोनों पक्ष बिना किसी दबाव या डराने-धमकाने के रजामंदी से समझौता करें।
योग्यता - दोनों पक्ष वयस्क (18+) और स्वस्थचित्त के होने चाहिए।
वैध उद्देश्य - समझौता किसी गैर-कानूनी काम के लिए नहीं होना चाहिए। (किसी की हत्या अथवा मारपीट या नुकसान करने का समझौता) मान्य नहीं है।
प्रतिफल - बदले में कुछ मिलना (जैसे सामान के बदले पैसे) चाहिए।
अनुबंध का गठन (निर्माण) - वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से एक साधारण बातचीत या विचार कानूनी रूप से बाध्यकारी समझौते में बदल जाते हैं।
भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 के अनुसार अनुबंध के गठन के लिए मुख्य रूप से चार चरणों का होना आवश्यक है -
1. प्रस्ताव या प्रस्थापना धारा 2(a) - अनुबंध के गठन की शुरुआत प्रस्ताव से होती है। जब एक व्यक्ति (प्रस्तावक) किसी दूसरे व्यक्ति के सामने अपनी इच्छा इस उद्देश्य से प्रकट करता है कि उस कार्य को करने या न करने के लिए दूसरे की सहमति प्राप्त हो सके।
उदाहरण - अ ने ब से कहा, क्या तुम मेरी कार 2 लाख रुपये में खरीदोगे? यह एक प्रस्ताव है।
2. स्वीकृति धारा 2(b) - वह व्यक्ति जिसके सामने प्रस्ताव रखा गया है, उस पर अपनी सहमति दे देता है, तो इसे स्वीकृति कहा जाता है। जैसे ही प्रस्ताव स्वीकार कर लिया जाता है, वह वचन (Promise) बन जाता है।
नियम - स्वीकृति पूर्ण और बिना किसी शर्त के होनी चाहिए।
3. प्रतिफल (Consideration) - धारा 2(d) - बिना प्रतिफल के अनुबंध शून्य होता है। प्रतिफल का अर्थ है कि दोनों पक्षों को बदले में कुछ मिलना चाहिए। यह पैसा, सामान या कोई वादा हो सकता है।
उदाहरण में - प्रतिफल अ के लिए 2 लाख रुपये और ब के लिए कार।
4. करार धारा 2(e) - प्रस्ताव स्वीकार होते ही उसमें प्रतिफल जुड़ जाता है, तो वह करार (Agreement) बन जाता है।
समीकरण - प्रस्ताव + स्वीकृति = वचन + प्रतिफल = करार
5. कानूनी प्रवर्तनीयता - गठन का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण चरण यह है कि वह करार कानून द्वारा लागू करने योग्य होना चाहिए। इसके लिए धारा 10 की शर्तें पूरी होनी चाहिए -
I. पक्षों की स्वतंत्र सहमति हो।
II. पक्ष अनुबंध के लिए सक्षम (18+ वर्ष, स्वस्थ दिमाग) हों।
III. उद्देश्य और प्रतिफल वैध हों।
IV. करार स्पष्ट रूप से शून्य घोषित न किया गया हो।
संक्षेप में संविदा गठन की प्रक्रिया -
∆ प्रस्ताव (Offer)
∆ स्वीकृति (Acceptance)
∆ वचन (Promise)
∆ प्रतिफल (Consideration)
∆ करार (Agreement)
∆ कानूनी प्रवर्तनीयता (Enforceability)
∆ अनुबंध (Contract)
निष्कर्ष - हम कह सकते हैं कि प्रत्येक अनुबंध एक करार होता है, लेकिन प्रत्येक करार अनुबंध नहीं होता। केवल वही करार अनुबंध बनते हैं जिनमें कानूनी बाध्यता पैदा करने की शक्ति होती है।
अनुबंधों का वर्गीकरण - अनुबंध निर्माण, वैधता और प्रदर्शन के आधार पर किया जाता है। भारतीय संविदा अधिनियम के तहत इसे मुख्य रूप से निम्नलिखित श्रेणियों में बांटा गया है:
1. वैधता या प्रवर्तनीयता के आधार पर -
I. वैध अनुबंध - जिसमें एक अनुबंध के सभी आवश्यक तत्व (स्वतंत्र सहमति, वैध प्रतिफल आदि) मौजूद हों। यह कानून द्वारा लागू किया जा सकता है।
II. शून्य अनुबंध - धारा 2(j) के अनुसार, ऐसा अनुबंध जो कानून द्वारा लागू नहीं किया जा सकता। यह शुरू में वैध हो सकता है, लेकिन बाद में परिस्थितियों के कारण शून्य हो जाता है।
III. शून्यकरणीय अनुबंध - धारा 2(i) के अनुसार, ऐसा अनुबंध जो केवल एक पक्ष (जिसकी सहमति स्वतंत्र नहीं थी) की इच्छा पर रद्द किया जा सकता है।
2. अवैध अनुबंध - जो कानून द्वारा वर्जित हो (जैसे किसी को नुकसान पहुँचाने का समझौता)। ये शुरू से ही प्रभावहीन होते हैं।
2. गठन के आधार पर -
I. व्यक्त (मौखिक/लिखित) अनुबंध - वह अनुबंध जो स्पष्ट शब्दों द्वारा (मौखिक या लिखित) रूप से किया गया हो।
II. निहित (पूर्वज्ञान) अनुबंध - जो पक्षों के आचरण या परिस्थितियों से समझा जा सकता है। बस में चढ़ना एक निहित अनुबंध है कि सवारी गंतव्य तक जाने का किराया देगी।
III. ई/डिजिटल अनुबंध - ईमेल या वेबसाइट या अन्य ऑनलाइन/इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों के पटल पर किए डिजिटल रूप में किए गए अनुबंध ई अनुबंध कहलाते हैं।
IV. विलेख (Deeds) - ये औपचारिक लिखित अनुबंध होते हैं जिन पर मुहर लगी होती है।
3. प्रदर्शन के आधार पर अनुबंध-
I. निष्पादित अनुबंध - जहाँ दोनों पक्षों ने अपने हिस्से का काम पूरा कर लिया हो। कार्य पूर्ण का अर्थ अंतिम प्रतिफल मिलने तक है।
II. निष्पादनीय अनुबंध - जहाँ अभी एक या दोनों पक्षों को अपना वादा पूरा करना बाकी हो। अर्थात काम बाकी है।
III. एकपक्षीय अनुबंध - जहाँ केवल एक पक्ष को अपना वादा पूरा करना होता है (अक्सर इनाम वाले मामलों में)।
IV. द्विपक्षीय अनुबंध - जहाँ दोनों पक्ष एक-दूसरे को भविष्य में कुछ करने का वादा करते हैं। (मुस्लिम समाज में विवाह)
4. दायित्व के आधार पर -
एकल पक्षीय पूर्णता - जिसमें एक पक्ष ने अनुबंध के समय ही अपना दायित्व पूरा कर दिया हो एक पक्ष का लंबित हो।
द्विपक्षीय अपूर्णीय- जिसमें अनुबंध के समय दोनों पक्षों के दायित्व लंबित हों।
विलेख (Deed) - विधि के अंतर्गत विलेख एक महत्वपूर्ण दस्तावेज होता है। ऐसा लिखित और कानूनी दस्तावेज है जो किसी अधिकार, संपत्ति या दायित्व को निर्मित, पुष्ट, हस्तांतरित या समाप्त करता है विलेख कहलाता है।
अंग्रेजी कानून में इसे Contracts under Seal भी कहा जाता है।
विलेख की विशेषताएँ (शर्तें) -
I. लिखित - विलेख हमेशा लिखित स्वरूप (Written) में होता है। मौखिक रूप से कोई विलेख नहीं हो सकता।
II. हस्ताक्षर और मुहर - पारंपरिक रूप से एक विलेख पर प्रस्तावक के हस्ताक्षर और एक विशेष मुहर का होना अनिवार्य था। हालांकि, आधुनिक समय में मुहर के स्थान पर हस्ताक्षर और गवाहों का सत्यापन अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।
III. परिदान/सुपुर्दगी (Delivery) - विलेख तभी प्रभावी होता है जब उसे संबंधित पक्ष को परिदान/ सौंप दिया जाए। इसका अर्थ है कि विलेख बनाने वाला व्यक्ति उसे कानूनी रूप से लागू करने का इरादा रखता है।
प्रतिफल की आवश्यकता नहीं -साधारण अनुबंधों के विपरीत, यदि कोई विलेख सही ढंग से बनाया गया है, तो वह बिना किसी प्रतिफल के भी कानूनी रूप से मान्य हो सकता है।
साधारण अनुबंध - साधारण अनुबंध गठन हेतु किसी विशेष औपचारिक मुहर की आवश्यकता नहीं होती। इन्हें Parol Contracts भी कहा जाता है। कानून की दृष्टि में, विलेख को छोड़कर बाकी सभी अनुबंध साधारण अनुबंध की श्रेणी में आते हैं।
साधारण अनुबंध की विशेषताएं और नियम -
1. गठन का तरीका - साधारण अनुबंध तीन प्रकार से किए जा सकते हैं -
I. लिखित - जैसे किसी सेवा के लिए किया गया एग्रीमेंट।
II. मौखिक - आमने-सामने बोलकर किया गया वादा।
III. आचरण से - जैसे बस में चढ़ना या दुकान से सामान उठाना।
2. प्रतिफल की अनिवार्यता - साधारण अनुबंध की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह बिना प्रतिफल के वैध नहीं होता। कुछ के बदले कुछ का नियम यहाँ पूरी तरह लागू होता है। यदि बदले में कुछ देने का वादा नहीं है, तो साधारण अनुबंध कानूनी रूप से शून्य होगा।
3. कानूनी प्रवर्तनीयता - एक साधारण अनुबंध को कानून द्वारा लागू करवाने हेतु भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 10 की सभी शर्तों को पूरा करना आवश्यक है जैसे -
I. पक्षों की स्वतंत्र सहमति।
II. अनुबंध करने की क्षमता (वयस्कता, मानसिक स्वास्थ्य)।
III. वैध उद्देश्य।
4. सीमा अवधि - साधारण अनुबंधों के उल्लंघन पर कानूनी कार्यवाही करने की समय-सीमा आमतौर पर विलेख की तुलना में कम होती है। भारत में सामान्यतः यह समय-सीमा विवाद उत्पन्न होने के 3 वर्ष के भीतर होती है।
साधारण अनुबंध और विलेख में अंतर- साधारण अनुबंध = लिखित अनुबंध (विलेख)
प्रतिफल - अनिवार्य है = अनिवार्य नहीं है।
प्रपत्र (Form) - मौखिक या लिखित हो सकता है = अनिवार्य रूप से लिखित और औपचारिक।
हस्ताक्षर/मुहर - साधारण हस्ताक्षर पर्याप्त हैं = हस्ताक्षर, मुहर (पारंपरिक) और गवाह अनिवार्य।
सीमा अवधि - मुकदमा करने की समय सीमा आमतौर पर कम होती है = इस पर मुकदमा करने की समय सीमा अधिक लंबी होती है। |
साधारण अनुबंध के उदाहरण - यदि आप पड़ोसी से उसकी पुरानी साइकिल 1000 रुपये में खरीदने का मौखिक वादा करते हैं, तो यह एक साधारण अनुबंध है।
विलेख के उदाहरण -
∆ विक्रय विलेख (संपत्ति बेचते समय बनाया जाने वाला दस्तावेज)
∆ उपहार विलेख (Gift Deed) - किसी व्यक्ति द्वारा निकट रक्त संबंधी को संपत्ति को उपहार में देने का दस्तावेज।
∆ मुख्तारनामा (Power of Attorney) - किसी अन्य व्यक्ति को अपने बदले में या नाम से कार्य करने का अधिकार देना।
∆ पट्टा विलेख (Lease Deed) - संपत्ति को किराए या लीज पर देने के लिए। सरकारी पट्टा 99 वर्ष की लीज। राजस्थान में गंगा शाही या अन्य पट्टे जरखरीद (चांद सूरज के रहने तक) भी होते हैं।
लिखित अनुबंध (विलेख ) के प्रकार -
सामान्य (औपचारिक) लिखित (समझौता/विलेख दस्तावेज - कानून की दुनिया में वे प्रपत्र जो किसी विशेष कानूनी प्रक्रिया, नियम या प्रारूप के अनुसार तैयार किए जाते हैं। इनका उद्देश्य किसी अधिकार, जिम्मेदारी या समझौते को स्थायी और प्रमाणिक बनाना होता है।
1. सामान्य लिखित दस्तावेजों की विशेषताएं -
I. निश्चित प्रारूप - ये दस्तावेज मनमाने ढंग से नहीं लिखे जाते, बल्कि इनका एक निश्चित कानूनी ढांचा होता है (जैसे विलेख या शपथ पत्र)।
II. हस्ताक्षर और सत्यापन - इनमें संबंधित पक्षों के हस्ताक्षर अनिवार्य होते हैं। इन्हें गवाहों द्वारा प्रमाणित किया जाना आवश्यक होता है।
III. पंजीकरण - कई औपचारिक दस्तावेजों (जैसे संपत्ति विलेख) को सरकारी कार्यालय में पंजीकृत कराना अनिवार्य होता है, अन्यथा वे कानूनी रूप से मान्य नहीं होते।
IV. साक्ष्य के रूप में मूल्य - अदालत में मौखिक साक्ष्य के मुकाबले लिखित दस्तावेजों को प्राथमिक और अधिक विश्वसनीय सबूत माना जाता है। (स्टाम्प पेपर)
2. औपचारिक दस्तावेजों के प्रकार - सामान्य विलेख, शपथ पत्र, मुख्तारनामा,
समझौता ज्ञापन (MoU बाध्यकारी सहमति), पंचाट मध्यस्थ के माध्यम से दिया दोनों पक्षों की सहमति के आधार पर फैसला(Award),
3. सामान्य (औपचारिक) दस्तावेजों का महत्व -
I. स्पष्टता - यह पक्षों के बीच भविष्य में होने वाले भ्रम या गलतफहमी को दूर करता है।
II. कानूनी सुरक्षा - यदि कोई पक्ष वादा तोड़ता है, तो लिखित दस्तावेज के आधार पर अदालत से राहत पाना आसान होता है।
III. सुरक्षित एवं स्थायी - मौखिक बातें समय के साथ भूली जा सकती हैं, लेकिन लिखित दस्तावेज वर्षों तक रिकॉर्ड के रूप में सुरक्षित रहते हैं।
4. संविदा (Contract) के संदर्भ में -
भारतीय संविदा अधिनियम के अंतर्गत कुछ मौखिक अनुबंध मान्य हैं, कुछ अनुबंधों का लिखित और औपचारिक होना अनिवार्य है, जैसे -
I. उपहार पत्र (Gift deed)
II. समय-बाधित ऋण, चुकाने का वादा
III संपत्ति बेचान पत्र अचल संपत्ति
IV. वाहन से संबंधित दस्तावेज
V. पंचाट (award)
VI. बीमा अनुबंध पत्र (बॉन्ड)
VII. लीज/पट्टा
VIII. किराया नामा
सामान्य अनुबंध -
सामान्य समझौते - वे समझौते जो बिना किसी विशेष कानूनी औपचारिकता (जैसे स्टैम्प ड्यूटी या मुहर) के किए जाते हैं सामान्य समझौते कहलाते हैं। संविदा कानून के अनुसार, समझौते दो प्रकार के हो सकते हैं
1. मौखिक (Oral)
2. लिखित (Written)
1. मौखिक समझौते - दो पक्ष आपस में बातचीत करके, शब्दों के माध्यम से किसी काम को करने या न करने की सहमति बनाते हैं, तो उसे मौखिक समझौता कहते हैं।
मौखिक समझौते की वैधता - भारतीय संविदा अधिनियम के अनुसार, मौखिक समझौते पूरी तरह से वैध और कानूनी रूप से लागू करने योग्य होते हैं (सिवाय उन मामलों के जहाँ कानून ने लिखित होना अनिवार्य किया हो)।
मौखिक समझौते की चुनौती - मौखिक समझौते की सबसे बड़ी समस्या सबूत (Proof) की होती है। यदि कोई पक्ष मुकर जाए, तो उसे अदालत में साबित करना कठिन होता है। इसके लिए गवाहों या परिस्थितियों पर निर्भर रहना पड़ता है।
उदाहरण - आपने अपने दोस्त से कहा कि आप उसकी पुरानी साइकिल 500 रुपये में खरीदेंगे और उसने हाँ कह दिया। यह एक वैध मौखिक समझौता है। अब यदि आप लेने से या दोस्त देने से मुकर जाते हैं या तय राशि के संबंध में विवाद हो तो पीड़ित पक्ष न्यायालय तो जा सकता है परन्तु साबित करने में कठिनाई हो सकती है।
2. लिखित समझौते - जब समझौते की शर्तों को कागज पर लिखकर दोनों पक्षों द्वारा हस्ताक्षरित किया जाता है, तो उसे लिखित समझौता कहते हैं।
लिखित समझौते की विशेषताएं -
I. लिखित समझौते स्थायी और स्पष्ट होते हैं - इसमें नियम और शर्तें स्पष्ट होती हैं, जिससे भविष्य में विवाद की संभावना कम रहती है।
II. साक्ष्य के रूप में उपयोग - कानून में लिखित समझौते को प्राथमिक साक्ष्य माना जाता है। इसे अदालत में साबित करना बहुत आसान होता है।
कानूनी अनिवार्यता - कुछ समझौते कानूनन लिखित ही होने चाहिए (जैसे जमीन की बिक्री, वसीयत, या समय-बाधित ऋण चुकाने का वादा)।
उदाहरण - मकान मालिक और किराएदार के बीच होने वाला रेंट एग्रीमेंट।
मौखिक और लिखित समझौते का तुलनात्मक चार्ट -
1. प्रमाण - गवाहों और व्यवहार पर निर्भर = लिखित दस्तावेज स्वयं प्रमाण हैं।
2. विश्वसनीयता - कम विश्वसनीय (पक्ष मुकर सकते हैं) = अधिक विश्वसनीय और स्थायी।
3. लागत - कोई खर्च नहीं = स्टैम्प पेपर और ड्राफ्टिंग का खर्च हो सकता है।
4. उपयुक्तता - छोटे और दैनिक व्यवहार हेतु = बड़े व्यापारिक और संपत्ति विवादों हेतु।
निष्कर्ष - कानूनी सुरक्षा के लिहाज से हमेशा लिखित समझौते को प्राथमिकता दी जाती है, क्योंकि यह विवाद की स्थिति में अधिकारों की रक्षा करने का सशक्त माध्यम है।
एकपक्षीय (एक तरफा वादा) अनुबंध (Unilateral Contract) - वह अनुबंध जिसमें केवल एक पक्ष (प्रस्तावक) वादा करता है। इसमें दूसरा पक्ष किसी वादे से बंधा नहीं होता, बल्कि वह प्रस्तावक द्वारा निर्धारित किसी विशिष्ट कार्य को पूरा करने की स्वीकृति देता है। इसमें कानूनी दायित्व केवल एक ही पक्ष पर होते हैं।
एकपक्षीय अनुबंध की विशेषताएं -
1. केवल एक पक्ष का वचन अनुबंध - इसमें एक पक्ष (Promisor) वादा करता है कि यदि कोई व्यक्ति अमुक कार्य करेगा, तो वह उसे प्रतिफल (इनाम) देगा।
2. कार्य द्वारा स्वीकृति - यहाँ स्वीकृति शब्दों (हाँ या ना) से नहीं, बल्कि कार्य के निष्पादन (Performance) द्वारा दी जाती है।
3. खुला प्रस्ताव (Open Offer) - यह अनुबंध सामान्य प्रस्ताव (General Offer) के रूप में होते हैं, जो पूरी दुनिया या किसी समूह हेतु खुले होते हैं।
4. बाध्यकारी नहीं - दूसरे पक्ष (Offeree) पर कार्य करने की कोई कानूनी बाध्यता नहीं होती। यदि वह कार्य नहीं करता, तो उस पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।
उदाहरण (इनाम का मामला) -
मान लीजिए कि अ का कुत्ता खो गया है। अ अखबार में विज्ञापन देता है कि जो भी मेरे कुत्ते को ढूंढकर लाएगा, मैं उसे 5,000 रुपये का इनाम दूंगा। यहाँ अ ने एकपक्षीय अनुबंध का प्रस्ताव रखा है।
यदि ब कुत्ते को ढूंढ कर ले आता है, तो अ उसे 5,000 रुपये देने हेतु कानूनी रूप से बाध्य है। लेकिन ब या अन्य कोई भी व्यक्ति कुत्ता ढूंढने हेतु बाध्य नहीं है।
अनुबंध की कानूनी स्थिति - स्वीकृति का संवहन (Communication) एकपक्षीय अनुबंध में अलग से मैं आपका काम करूँगा कहने की जरूरत नहीं होती। कार्य का पूरा होना ही स्वीकृति मान ली जाती है।
वापसी (Revocation) यदि किसी ने कार्य करना शुरू कर दिया है, तो प्रस्तावक आमतौर पर बीच में अपना प्रस्ताव वापस नहीं ले सकता (न्याय और निष्पक्षता के सिद्धांत के आधार पर)।
द्विपक्षीय अनुबंध (Bilateral Contract) - संविदा की दुनिया का आम प्रकार का अनुबंध है जिसमें वादे के बदले वादा, एक हाथ दे एक हाथ ले, कुछ के बदले कुछ के सिद्धांत पर टीका अनुबंध है। इस प्रकार के अनुबंध में दो पक्ष होते हैं और दोनों ही एक-दूसरे के प्रति कुछ करने या न करने की कानूनी जिम्मेदारी स्वीकार करते हैं।
द्विपक्षीय अनुबंध की विशेषताएं -
दोनों पक्ष आबद्ध - द्विपक्षीय अनुबंध में दोनों पक्ष वचनदाता और दोनों ही वचनग्रही होते हैं। एक पक्ष के कुछ देने के वादे पर दूसरा उसके बदले में कुछ देने या करने का या ना करने का वचन देता है।
मजदूर ने आठ घंटे काम किया बदले में मालिक ने 500 रुपए दिए।
पारस्परिक दायित्व - जैसे ही अनुबंध पर हस्ताक्षर होते हैं या सहमति बनती है, दोनों पक्षों पर कानूनी बाध्यता लागू हो जाती है।
प्रस्ताव और स्वीकृति - एक पक्ष प्रस्ताव देता है और दूसरा उसे स्वीकार करता है।
उदाहरण - मान लीजिए आप अपनी कार ₹5,00,000 में बेचना चाहते हैं।
पक्ष A (आप/विक्रेता) - मैं अपनी कार आपको 5 लाख रुपये में देने का वादा करता हूँ।
पक्ष B (खरीदार/क्रेता) - मैं आपको इस कार के लिए ₹4 लाख देने का वादा करता हूँ। (प्रति प्रस्ताव)
पक्ष A - मैं गाड़ी ₹साढ़े चार लाख में बेच सकता हूं। प्रति प्रस्ताव का प्रति प्रस्ताव (सीधी भाषा में मोलभाव अंग्रेजी में बारगेनिंग)
पक्ष B - ठीक है मैं ₹साढ़े चार लाख में गाड़ी खरीद लूंगा।
प्रस्ताव स्वीकृत हुआ और वचन बन गया। अब आप पक्ष A गाड़ी बेच दी और पक्ष B ने रकम चुका दी।
यहां शुरुआत (प्रस्ताव) से लेकर रकम चुकाने और गाड़ी की चाबी सौंपने तक द्विपक्षीय अनुबंध पूर्ण हुआ। दोनों पक्षों ने एक-दूसरे को कुछ देने का वादा किया पर यदि अगले दिन खरीदार पैसे देने से मना कर दे या आप कार देने से मना कर दें, तो पीड़ित पक्ष अदालत जा सकता है क्योंकि यह द्विपक्षीय अनुबंध है।
द्विपक्षीय अनुबंध का कानूनी महत्व -
भारतीय अनुबंध अधिनियम 1872 के अंतर्गत अधिकांश व्यापारिक लेनदेन द्विपक्षीय होते हैं। इसमें प्रतिफल दोनों तरफ से होता है, जो इसे कानूनन वैध बनाता है।
द्विपक्षीय = एकपक्षीय
वचन - दोनों पक्ष = एक पक्ष
दायित्व - दोनों पक्ष बाध्य = कार्य पूरा होने पर एक पक्ष बाध्य
स्वीकृति - सहमति व्यक्त (हाँ/ना) करने पर = कार्य पूरा करने पर
दायित्व - अनुबंध होते ही दोनों पक्षों का = कार्य पूरा होने के बाद केवल प्रस्तावक का
उदाहरण - घर खरीदना-बेचना - खोए हुए कुत्ते को ढूंढने पर इनाम का विज्ञापन।
व्यक्त अनुबंध (Express Contract) - वह अनुबंध है जिसमें अनुबंध की शर्तें—चाहे वे मौखिक हों या लिखित स्पष्ट रूप से शब्दों के माध्यम से तय की जाती हैं।
जब दो पक्ष आपस में बात करके या लिखकर किसी समझौते पर अपनी सहमति व्यक्त करते हैं, तो उसे व्यक्त या 'स्पष्ट' अनुबंध कहा जाता है। भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 9 के अनुसार, यदि किसी प्रस्ताव या स्वीकृति को शब्दों में व्यक्त किया जाता है, तो वह व्यक्त वचन कहलाता है।
व्यक्त अनुबंध के रूप -
1. लिखित - यह सबसे सुरक्षित रूप माना जाता है। इसमें सभी शर्तें कागज पर लिखी होती हैं और दोनों पक्षों के हस्ताक्षर होते हैं। उदाहरण के लिए: रेंट एग्रीमेंट, सेल डीड या नौकरी का नियुक्ति पत्र।
2. मौखिक - इसमें पक्ष आमने-सामने या फोन पर बात करके शर्तें तय करते हैं। हालांकि यह कानूनी रूप से मान्य है, लेकिन विवाद की स्थिति में इसे साबित करना कठिन होता है।
मुख्य विशेषताएं
1. स्पष्टता - इसमें कोई संदेह नहीं रहता कि किस पक्ष को क्या करना है, क्योंकि शर्तें पहले ही बोलकर या लिखकर तय कर ली जाती हैं।
2. सहमति - दोनों पक्ष एक ही बात पर एक ही अर्थ में सहमत होते हैं।
3. प्रमाण - लिखित व्यक्त अनुबंध भविष्य में कानूनी साक्ष्य के रूप में कार्य करता है।
उदाहरण -
उदाहरण I. - R ने लिखित में A को अपना घर 50 लाख रुपये में बेचने का प्रस्ताव दिया और अमित ने उस पर हस्ताक्षर करके सहमति दे दी। यह एक लिखित व्यक्त अनुबंध है।
उदाहरण II. R ने फोन पर अपने दोस्त से कहा, क्या तुम मेरी साइकिल 2,000 रुपये में खरीदोगे? और उसने कहा, हाँ, मैं तैयार हूँ। यह एक मौखिक व्यक्त अनुबंध है।
निहित अनुबंध (Implied Contract) - वह अनुबंध जो शब्दों (बोलकर या लिखकर) के स्थान पर पक्षों के आचरण/ व्यवहार या विशिष्ट परिस्थितियों के आधार पर अस्तित्व में आता है।
भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 9 के अनुसार, यदि कोई प्रस्ताव या स्वीकृति शब्दों के अलावा किसी अन्य तरीके से की जाती है, तो उसे विवक्षित/ निहित अनुबंध माना जाता है।
निहित अनुबंध की विशेषताएं -
1. शब्दों का अभाव - इसमें पक्ष एक-दूसरे से न तो बात करते हैं और न ही कोई लिखित समझौता करते हैं।
2. आचरण पर आधारित - यह पक्षों के कार्यों से समझा जाता है। यदि आप किसी की सेवा लेते हैं जिसका भुगतान आमतौर पर किया जाता है, तो कानून मानता है कि आपने भुगतान करने का अनुबंध किया है।
3. कानूनी बाध्यता - भले ही यह अनुबंध लिखित में न हो, लेकिन अदालत में पूरी तरह से प्रवर्तनीय होता है।
उदाहरण -
I. सार्वजनिक परिवहन - किसी भी रूट की बस में चढ़ते हैं, सवारी उक्त ट्रैवल सर्विस/ परिवहन विभाग के साथ निहित अनुबंध में स्वतः ही बंध जाते हैं। बिना कुछ बोले/लिखे आपसी प्रतिफल स्वीकार करते हैं कि आप गंतव्य तक जाने का किराया देंगे।
II. रेस्टोरेंट - किसी रेस्टोरेंट में जाकर खाना/नाश्ता/चाय ऑर्डर करते हैं, खाने पीने से पहले ही ऑर्डर देते ही ग्राहक और मालिक स्वतः ही अनुबंधित हो गए। खाना खाने के बाद मेनू कार्ड के अनुसार बिल का भुगतान होगा।
III. कुली की सेवाएं - रेलवे स्टेशन पर कुली सवारी का सामान उठाता है और सवारी उसे नहीं रोके तो यह निहित अनुबंध है कि सामान पहुंचे ही मजदूरी दे दी जावे।
निहित अनुबंध के प्रकार
1. तथ्य द्वारा निहित - ऊपर बताए गए उदाहरण के अनुसार पक्षों के व्यवहार से निर्मित स्वतः अनुबंध।
2. कानून द्वारा निहित - इसे आभासी अनुबंध भी कहते हैं। इसमें पक्षों की इच्छा नहीं होती, लेकिन न्याय के आधार पर कानून उन पर जिम्मेदारी डाल देता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी को सड़क पर किसी का खोया हुआ बटुआ मिले, तो उसे मालिक को वापस करना होगा।
अर्ध-अनुबंध (Quasi-Contract) - यह वास्तव में कोई अनुबंध नहीं होता क्योंकि इसमें पक्षों के बीच न तो कोई बातचीत होती है और न ही कोई औपचारिक सहमति। इसे कानून द्वारा थोपा गया अनुबंध माना जाता है।
इसका मुख्य आधार साम्य और न्याय का सिद्धांत है, जिसे लैटिन में 'Unjust Enrichment कहते हैं। इसका अर्थ है कि किसी व्यक्ति को दूसरे की कीमत पर अनुचित रूप से अमीर होने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 68 से 72 तक अर्ध-अनुबंधों के बारे में बताया गया है।
अर्ध-अनुबंध की विशेषताएं -
1. सहमति का अभाव - इसमें पक्षों के बीच 'प्रस्ताव' और 'स्वीकृति' नहीं होती।
2. कानून द्वारा निर्मित - यह पक्षों की इच्छा से नहीं, बल्कि कानून के संचालन से पैदा होता है।
3. कर्तव्य पहले अधिकार बाद में - इसमें पहले एक पक्ष का कानूनी कर्तव्य बनता है, और उसके उल्लंघन पर दूसरे को अधिकार मिलता है।
4. केवल धन की वसूली - साधारणतया इसमें केवल उचित मुआवजे या धन की वसूली का अधिकार मिलता है।
उदाहरण (धारा 68-72)
1. धारा 68 अक्षम की सहायता करने पर पुनर्भुगतान - किसी अक्षम (पागल, वृद्ध, बीमार या नाबालिग ) के जीवन हेतु आवश्यक वस्तुएं (भोजन, दवा, शिक्षा, आवास) प्रदान करने वाले को उस अक्षम की संपत्ति से लागत वसूलने का अधिकार हैं।
2. धारा 69 हितबद्ध व्यक्ति द्वारा भुगतान - कोई व्यक्ति दूसरे की ओर से ऐसा भुगतान करता है जिसे करने के लिए वह कानूनी रूप से बाध्य था (जैसे किराएदार द्वारा मालिक का बकाया टैक्स भरना ताकि बिजली न कटे), तो वह मालिक से वह पैसा वापस पा सकता है।
3. धारा 70 गैर-अनुग्रहकारी कार्य - यदि कोई व्यक्ति आपके लिए कोई काम करता है या मिलने आया, गलती/भूल से सामान आपके घर छोड़ जाता है और आप उसको काम में ले रहे हैं या उससे लाभ उठाते हैं, तो भुगतान करना होगा।
4. धारा 71 खोया सामान मिलने पर लौटाने का दायित्व - किसी को किसी का खोया हुआ सामान मिलने पर वास्तविक मालिक को ढूंढकर लौटाना होगा। सामान मिलते ही व्यक्ति कानून की नजर में निक्षेपी हो जाते हैं जिसकी जिम्मेदारी है कि सामान को उसे संभाल कर रखें और मालिक को लौटाएं।
5. धारा 72 गलती या दबाव में किया गया भुगतान - किसी ने किसी को गलती भुगतान कर दिया या किसी और के खाते में पैसे भेज दिए हैं, तो वह व्यक्ति कानूनन उन्हें वापस करने के लिए बाध्य है।
वैध अनुबंध (Valid Contrect - वो समझौता जो कानून द्वारा पूरी तरह से लागू होता है और अनुबंध की सभी आवश्यक शर्तों को पूरा करता है, तो वह वैध अनुबंध (संविदा) है।
वैध संविदा की परिभाषा - संविदा अधिनियम 1872 की धारा 10 के अनुसार "सभी समझौते अनुबंध हैं यदि वे सक्षम पक्षों की स्वतंत्र सहमति से, कानूनी प्रतिफल हेतु और कानूनी उद्देश्य के साथ किए गए हों।"
वैध अनुबंध के आवश्यक तत्व - किसी भी समझौते को वैध अनुबंध बनने हेतु -
1. प्रस्ताव और स्वीकृति - एक पक्ष द्वारा स्पष्ट प्रस्ताव दिया जाना चाहिए और दूसरे पक्ष द्वारा उसे उसी रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए।
2. कानूनी संबंध बनाने का इरादा - पक्षों का उद्देश्य एक-दूसरे के प्रति कानूनी जिम्मेदारी बनाना होना चाहिए। सामाजिक या घरेलू समझौतों (जैसे पिता का पुत्र को पॉकेट मनी देने का वादा) को आमतौर पर वैध अनुबंध नहीं माना जाता।
3. पक्षों की क्षमता - अनुबंध करने वाले व्यक्ति को -
I. वयस्क - (आयु 18+ वर्ष) हो।
II. स्वस्थ मस्तिष्क (विक्षिप्त,पागल नहीं हो।
III. कानून द्वारा अयोग्य घोषित नहीं होना चाहिए।
IV. स्वतंत्र सहमति - सहमति बिना किसी दबाव अनुचित प्रभाव, धोखे, या गलती के हो।
V. कानूनी प्रतिफल - कुछ के बदले कुछ (Quid Pro Quo)। अनुबंध में दोनों पक्षों को कुछ न कुछ प्राप्त होना चाहिए, और वह वस्तु या कार्य कानूनी होना चाहिए।
VI. कानूनी उद्देश्य - अनुबंध का उद्देश्य कानून के विरुद्ध, अनैतिक या सार्वजनिक नीति के खिलाफ नहीं होना चाहिए (जैसे चोरी करने का अनुबंध वैध नहीं हो सकता)।
VII. निश्चितता - अनुबंध की शर्तें स्पष्ट होनी चाहिए। उदाहरण के लिए थोड़ा तेल बेचना निश्चित नहीं है क्योंकि यहां तेल का प्रकार और मात्रा स्पष्ट नहीं है।
उदाहरण - यदि आप अपनी जमीन बेचने का लिखित समझौता करते हैं, सही कीमत (प्रतिफल) तय करते हैं, और दोनों पक्ष वयस्क और मानसिक रूप से स्वस्थ हैं, तो यह एक वैध अनुबंध है। यदि खरीदार पैसे नहीं देता, तो आप अदालत जाकर उसे लागू करवा सकते हैं।
अवैध अनुबंध (Illegal Contract) - वह समझौता है जो कानून द्वारा स्पष्ट रूप से वर्जित (Forbidden) होता है अवैध संविदा कहलाती है। अवैध अनुबंध शून्य होने के साथ - साथ अपराध/दंडनीय भी हो सकता है।
संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 23 के अनुसार अवैध संविदा - कोई भी समझौता अवैध होगा यदि -
1. कानून द्वारा निषिद्ध हो - वह कार्य जो भारतीय दंड संहिता (IPC) या किसी अन्य कानून के तहत अपराध हो (जैसे चोरी, तस्करी या हत्या का अनुबंध)।
II. कानून तोड़ने वाला अनुबंध - जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से किसी कानून को तोड़ने हेतु किया गया हो।
III. कपटपूर्ण (Fraudulent) हो - जिसका उद्देश्य किसी के साथ धोखाधड़ी करना हो।
IV. किसी व्यक्ति या संपत्ति को नुकसान पहुँचाना - किसी की संपत्ति जलाने या किसी को शारीरिक चोट पहुँचाने का समझौता।
V. अनैतिक हो: जिसे अदालत समाज की नैतिकता के खिलाफ मानती हो।
VI. सार्वजनिक नीति के विरुद्ध - जैसे रिश्वत देना, सरकारी पदों की बिक्री, या न्यायिक प्रक्रिया में बाधा डालना।
अवैध अनुबंध के परिणाम -
I. शून्य (Void-ab-initio) - सभी अवैध अनुबंध शुरू से ही शून्य होते हैं।
2. कोई कानूनी उपचार नहीं (Ex turpi causa non oritur actio) - अवैध कार्य से कोई कार्रवाई उत्पन्न नहीं होती। अर्थात, एक तस्कर दूसरे तस्कर को पैसे नहीं देता है और लेनदेन में विवाद होता है तो इस स्थिति में तस्करी में लेनदेन के विवाद को लेकर वह अदालत नहीं जा सकता।
3. संबद्ध लेनदेन पर प्रभाव - अवैध अनुबंध से जुड़े अन्य सहायक समझौते भी शून्य हो जाते हैं। (यही वह बिंदु है जहाँ यह शून्य अनुबंध से अलग है)।
4. दंड - ऐसे अनुबंध करने वाले पक्षों पर आपराधिक मुकदमा चलाया जा सकता है।
उदाहरण 01 - नाबालिग के साथ अनुबंध शून्य संविदा है और किसी को हत्या की सुपारी देना अवैध संविदा है। यह शून्य होने के साथ - साथ दंड का भागीदर भी होगा।
उदाहरण 02. - यदि A, ने B को C की दुकान में आग लगाने के लिए पचास हजार रुपए दिए। यहां यह अवैध अनुबंध है। यदि B, C की दुकान जला देता है, पर A, B को राशि नहीं देता, तो B अदालत नहीं जा सकता। साथ ही, यदि A ने इस काम के लिए D से पैसे उधार लिए, और D को पता था कि पैसा आग लगाने के लिए लिया जा रहा है, तो D का ऋण वसूली का समझौता भी अवैध हो जाएगा।
विशेष - हर अवैध समझौता शून्य होता है, लेकिन हर शून्य समझौता अवैध नहीं होता।
शून्य अनुबंध (संविदा) - वह अनुबंध जो कानून की दृष्टि में कोई अस्तित्व नहीं रखता शून्य संविदा कहलाती है। संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 2(j) के अनुसार - एक अनुबंध जो कानून द्वारा लागू नहीं रह जाता वह तब शून्य हो जाता है जब वह लागू नहीं रह जाता।
सरल शब्दों में वह समझौता शून्य है जिसे कानून का सहारा लेकर लागू नहीं करवाया जा सकता। इसमें किसी भी पक्ष को कोई कानूनी अधिकार या जिम्मेदारी प्राप्त नहीं होती।
शून्य संविदा के कारण -
1. सक्षमता - यदि अनुबंध किसी ऐसे व्यक्ति के साथ किया गया है जो इसके योग्य नहीं है, जैसे कि नाबालिग या मानसिक अस्वस्थ व्यक्ति।
(मोहरी बीबी बनाम धर्मोदास घोष)।
2. कानूनी उद्देश्य या प्रतिफल का अभाव - यदि अनुबंध का उद्देश्य ही गैर-कानूनी हो (जैसे तस्करी करना या किसी को नुकसान पहुँचाना)।
3. असंभव कार्य - यदि अनुबंध ऐसी किसी बात के लिए किया गया है जिसे करना असंभव हो (जैसे जादू से खजाना खोजना या किसी मृत व्यक्ति को जीवित करना)।
4. परिस्थितियों में बदलाव - अनुबंध करते समय तो वह वैध था, लेकिन बाद में कानून बदलने या विषय-वस्तु के नष्ट हो जाने के कारण वह शून्य हो गया।
उदाहरण - आपने किसी से घोड़े का सौदा किया, लेकिन डिलीवरी से पहले ही घोड़े की मृत्यु हो गई।
5. लोक नीति के विरुद्ध - ऐसे समझौते जो समाज या देश के हित में न हों, जैसे शादी रोकने का समझौता (धारा 26) या व्यापार रोकने का समझौता (धारा 27)।
शून्य समझौते और शून्य अनुबंध में अंतर - हम अक्सर इन दोनों को एक समझते हैं, वास्तव में इनमें सूक्ष्म अंतर हैं जो -
अवैध अनुबंध समझौते = शून्य अनुबंध
1. शुरुआत - यह शुरू से ही (Ab-initio) शून्य होता है = यह शुरू में वैध हो सकता है, पर बाद में शून्य हो जाता है। |
2. वैधता - कानून की नजर में कभी वैध था ही नहीं = घटना या कानून बदलने तक वैध रहता है।
उदाहरण - नाबालिग के साथ किया गया वादा = युद्ध छिड़ने के कारण दूसरे देश के व्यापारी से अनुबंध का टूटना।
शून्य संविदा (अनुबंध) का प्रभाव -चूंकि शून्य अनुबंध का कानून में कोई मोल नहीं होता, इसलिए यदि कोई पक्ष अपना वादा पूरा नहीं करता, तो दूसरा पक्ष अदालत में मुकदमा नहीं कर सकता। हालांकि, धारा 65 के तहत यदि किसी पक्ष ने कोई लाभ प्राप्त किया है, तो उसे वह लाभ दूसरे पक्ष को लौटाना पड़ सकता है।
शून्यकरणीय अनुबंध (Voidable Contract) - एक ऐसा समझौता जो कानून की नजर में तब तक वैध रहता है जब तक कि पीड़ित पक्ष उसे अदालत में चुनौती देकर रद्द न करवा दे।
संविदा अधिनियम 1872 की धारा 2(i) के अनुसार - ऐसा समझौता जो एक या अधिक पक्षों के विकल्प पर तो कानूनन लागू हो, किंतु दूसरे पक्ष या पक्षों के विकल्प पर नहीं, शून्यकरणीय संविदा कहलाता है।
सरल शब्दों में, इसमें एक पक्ष के पास यह अधिकार होता है कि वह अनुबंध को जारी रखे या उसे खत्म कर दे।
शून्यकरणीय अनुबंध की स्थिति - यह स्थिति तब बनती है जब अनुबंध हेतु ली गई सहमति स्वतंत्र नहीं होती। मुख्य रूप से निम्नलिखित स्थितियों में अनुबंध शून्यकरणीय हो जाता है:
1. उत्पीड़न (धारा 15) - जब किसी को डरा-धमका कर या शारीरिक बल का प्रयोग करके अनुबंध पर हस्ताक्षर करवाए जाएं।
2. अनुचित प्रभाव (धारा 16) - जब एक पक्ष ऐसी स्थिति में हो कि वह दूसरे की इच्छा पर हावी हो सके (जैसे डॉक्टर-मरीज या गुरु-शिष्य) और उसका गलत फायदा उठाए।
3. धोखाधड़ी (धारा 17) - जब जान बूझकर, झूठ बोलकर या तथ्य छिपाकर किसी को अनुबंध में फंसाया जाए।
4. मिथ्या वर्णन (धारा 18) - जब बिना किसी बुरे इरादे के, गलती से कोई गलत जानकारी सच समझकर दी जाए।
शून्यकरणीय अनुबंध के परिणाम -
1. पुष्टि - यदि पीड़ित पक्ष चाहे, तो वह अनुबंध को स्वीकार कर सकता है और वह वैध बना रहेगा।
2. रद्दीकरण - यदि पीड़ित पक्ष अनुबंध को रद्द करने का विकल्प चुनता है, तो वह शून्य हो जाता है।
3. लाभ की वापसी - यदि अनुबंध रद्द किया जाता है, तो जिस पक्ष ने कोई लाभ (पैसा या सामान) प्राप्त किया है, उसे वह वापस करना होगा।
उदाहरण - मान लीजिए A बंदूक की नोक पर B को मजबूर करता है कि वह अपनी ₹10 लाख की कार A को ₹1 लाख में बेच दे। यहाँ B की सहमति स्वतंत्र नहीं है। अब B के पास दो विकल्प हैं -
I. वह डर के मारे चुप रहे (तब अनुबंध वैध रहेगा)।
II. वह अदालत जाए और बताए कि सहमति दबाव में ली गई थी। जैसे ही वह अदालत में इसे साबित कर देगा, अनुबंध शून्यकरणीय हो जाएगा और रद्द कर दिया जाएगा।
शून्य व शून्यकरणीय संविदा में अंतर -
शून्य अनुबंध = शून्यकरणीय अनुबंध
1. प्रवर्तनीयता - इसे कभी भी लागू नहीं किया जा सकता = पीड़ित पक्ष की इच्छा पर लागू या रद्द होता है।
2. कारण - कानूनी अयोग्यता या असंभव कार्य = सहमति का स्वतंत्र न होना (दबाव, धोखा आदि)।
3. अधिकार - किसी भी पक्ष को कोई अधिकार नहीं - पीड़ित पक्ष को अनुबंध रद्द करने का अधिकार
निष्पादित अनुबंध (Executed Contract) वह अनुबंध जिसमें दोनों पक्षों ने अपने-अपने हिस्से के वादे या कानूनी दायित्वों को पूरी तरह से निभा दिया है। जब अनुबंध की शर्तें पूरी हो जाती हैं और अब कुछ भी शेष नहीं रहता, तो उसे निष्पादित माना जाता है। संविदा अधिनियम के अनुसार निष्पादित अनुबंध अनुबंध की पूर्णता को दर्शाता है।
निष्पादित अनुबंध विशेषताएं -
1. दायित्वों की समाप्ति - दोनों पक्ष अपने कर्तव्यों से मुक्त हो जाते हैं क्योंकि उन्होंने वह काम कर दिया है जिसके लिए वे सहमत हुए थे।
2. लेनदेन का अंत - यह एक बीत चुका सौदा होता है।
3. तत्काल क्रिया - अधिकांश नकद लेनदेन निष्पादित अनुबंध के उत्तम उदाहरण हैं।
उदाहरण - मान लीजिए आपने किराने की दुकान पर जा कर दुकानदार से 10 रुपये का बिस्कुट का पैकेट मांगा। दुकानदार ने आपको पैकेट थमा दिया (उसका हिस्सा पूरा हुआ)। अब आपने उसे 10 रुपये दे दिए (आपका काम पूरा हुआ)।
यहाँ दोनों पक्षों ने अपना-अपना काम उसी समय पूरा कर दिया। यही निष्पादित अनुबंध कहलाता है।
निष्पादनीय अनुबंध (Executory Contract) - वह अनुबंध है जिसमें अनुबंध के दोनों पक्षों या कम से कम एक पक्ष द्वारा अपने हिस्से का वादा पूरा करना अभी बाकी (Pending) है। इसमें कानूनी दायित्वों का निष्पादन भविष्य में किसी निश्चित समय पर किया जाना तय होता है।
निष्पादनीय संविदा अर्थात भविष्य के लिए किया गया वादा कह सकते हैं।
मुख्य विशेषताएं -
1. भविष्य का प्रदर्शन - अनुबंध की शर्तें तुरंत पूरी नहीं की जातीं, बल्कि आने वाले समय में की जानी होती हैं।
2. निरंतर दायित्व - जब तक काम पूरा नहीं हो जाता, दोनों पक्ष एक-दूसरे के प्रति कानूनी रूप से बंधे रहते हैं।
3. प्रकार - यह एकपक्षीय या द्विपक्षीय हो सकता है।
निष्पादनीय अनुबंध के रूप
1. एकपक्षीय निष्पादनीय - जब अनुबंध के एक पक्ष ने अपना हिस्सा पूरा कर दिया हो, लेकिन दूसरे पक्ष का कार्य अभी शेष हो।
उदाहरण - आपने एक दुकान से उधार पर मोबाइल खरीदा। दुकानदार ने मोबाइल आपको दे दिया (उसका काम पूरा), लेकिन आपने अभी पैसे नहीं दिए हैं (आपका काम बाकी है)।
द्विपक्षीय निष्पादनीय - जब दोनों ही पक्षों ने अभी तक अपना वादा पूरा नहीं किया हो।
उदाहरण 1 - आपने अपने दोस्त से कहा कि आप अगले रविवार को उसकी पुरानी बाइक ₹20,000 में खरीदेंगे। दोस्त ने भी अगले रविवार को बाइक देने का वादा किया। अभी न तो बाइक दी गई है और न ही पैसे।
उदाहरण 2 - मोबाइल पर दो साल की गारंटी है, अब दो साल तक किसी प्रकार की गड़बड़ी होती है तो गारंटी अवधि दुकानदार द्वारा निष्पादनीय संविदा है। इसी प्रकार से रकम को किश्तों में चुकाना है तो अंतिम किश्त तक संविदा निष्पादनीय है।
उदाहरण 3 - मान लीजिए आप एक ऑनलाइन शॉपिंग वेबसाइट से किताब ऑर्डर करते हैं और कैश ऑन डिलीवरी का विकल्प चुनते हैं -
∆. वेबसाइट ने अभी किताब नहीं भेजी है ∆. आपने अभी पैसे नहीं दिए हैं
∆. जब तक किताब आपके पास पहुँच नहीं जाती और आप भुगतान नहीं कर देते, तब तक यह एक निष्पादनीय अनुबंध कहलाएगा।
निष्पादित और निष्पादनीय में अंतर
निष्पादित = निष्पादनीय
1. कार्य की स्थिति - कार्य संपन्न हो चुका है = कार्य भविष्य में किया जाना है।
2. दायित्व - दोनों पक्ष अपने दायित्वों से मुक्त = पक्ष अभी भी दायित्वों से बंधे हैं।
3. समय - यह पूर्ण हो चुका सौदा है = यह प्रक्रिया में चल रहा सौदा है।
संविदा अधिनियम की दृष्टि में निष्पादनीय अनुबंध महत्वपूर्ण होते हैं क्योंकि यदि भविष्य में कोई पक्ष अपना वादा पूरा करने से मुकर जाता है, तो इसे अनुबंध का उल्लंघन (Breach of Contract) माना जाता है और पीड़ित पक्ष मुआवजे के लिए दावा कर सकता है।
संविदा भंग (Breach of Contract) - संविदा भंग का अर्थ है किसी वैध समझौते या अनुबंध की शर्तों को पूरा न करना। जब दो पक्षों के बीच कोई कानूनी समझौता होता है और उनमें से एक पक्ष अपनी जिम्मेदारी निभाने में विफल रहता है, तो उसे संविदा भंग कहा जाता है।
संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 73, 74 और 75 इसके परिणामों और उपचारों के बारे में बताती हैं।
संविदा भंग के प्रकार -
1. वास्तविक संविदा भंग - जब प्रदर्शन की नियत तिथि पर कोई पक्ष काम करने से मना कर दे या अधूरा काम करे।
2. अग्रिम संविदा भंग - जब कोई पक्ष काम की समय सीमा आने से पहले ही यह स्पष्ट कर दे कि वह अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं करेगा।
संविदा भंग होने पर उपचार - जब एक पक्ष अनुबंध तोड़ता है, तो पीड़ित पक्ष के पास निम्नलिखित कानूनी विकल्प होते हैं - 1. क्षतिपूर्ति - पीड़ित पक्ष आर्थिक नुकसान की भरपाई के लिए न्यायालय से हर्जाने की मांग कर सकता है।
2. संविदा का विखंडन - पीड़ित पक्ष अनुबंध को रद्द कर सकता है और अपनी ओर से किसी भी आगे के प्रदर्शन से मुक्त हो सकता है।
3. विनिर्दिष्ट अनुपालन - कभी-कभी अदालत आदेश देती है कि दोषी पक्ष को वही काम करना होगा जिसका उसने वादा किया था (यदि केवल पैसा नुकसान की भरपाई न हो)।
4. व्यादेश (स्टे) - अदालत दोषी पक्ष को कोई विशेष कार्य करने से रोकने का आदेश दे सकती है।
5. अर्ध-अनुबंधात्मक भुगतान - इसका अर्थ है उतना भुगतान जितना काम किया गया है। यदि पीड़ित पक्ष ने कुछ काम पहले ही कर लिया है, तो वह उसके बदले उचित भुगतान का हकदार है।
उदाहरण - मान लीजिए A ने B से वादा किया कि वह 10 तारीख को 100 बोरी गेहूं की आपूर्ति करेगा। यदि 10 तारीख को A गेहूं नहीं भेजता, तो यह वास्तविक संविदा भंग है। यदि A 5 तारीख को ही कह दे कि वह गेहूं नहीं दे पाएगा, तो यह अग्रिम संविदा भंग कहलाएगा।
प्रस्ताव (Proposal/offer) - संविदा अधिनियम, 1872 के तहत प्रस्ताव किसी भी अनुबंध की पहली सीढ़ी है। जब तक कोई प्रस्ताव नहीं होगा, तब तक कोई अनुबंध अस्तित्व में नहीं आ सकता।
अधिनियम की धारा 2(a) में प्रस्ताव को परिभाषित किया गया है के अनुसार - जब एक व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति के समक्ष अपनी इच्छा इस उद्देश्य से प्रकट करता है कि उस दूसरे व्यक्ति की सहमति उस कार्य को करने या न करने के संबंध में प्राप्त हो, तो कहा जाता है कि उसने 'प्रस्ताव' किया है।
(I). प्रस्ताव के मुख्य तत्व - वैध प्रस्ताव में निम्न बातों का होना आवश्यक है -
1. दो पक्ष - प्रस्ताव देने वाला और जिसके सामने प्रस्ताव रखा गया है, प्रस्तावक एवं प्रस्ताविती।
2. सहमति प्राप्त करने का उद्देश्य - केवल अपनी इच्छा बताना काफी नहीं है, उद्देश्य दूसरे व्यक्ति की हाँ प्राप्त करना होना चाहिए।
3. निश्चितता - प्रस्ताव की शर्तें स्पष्ट और निश्चित होनी चाहिए। यदि आप कहें कि मैं आपको कुछ तेल बेचूँगा, तो यह वैध प्रस्ताव नहीं है क्योंकि तेल का प्रकार और मात्रा निश्चित नहीं है।
4. संसूचना - प्रस्ताव उस व्यक्ति तक पहुँचना चाहिए जिसे वह दिया गया है। जब तक सामने वाले को प्रस्ताव का पता नहीं चलेगा, वह उसे स्वीकार नहीं कर सकता।
(II)प्रस्ताव के प्रकार -
1. विशिष्ट प्रस्ताव - जो किसी विशेष व्यक्ति या समूह को दिया जाता है। इसे केवल वही व्यक्ति स्वीकार कर सकता है।
2. सामान्य प्रस्ताव - जो पूरी दुनिया या जनता के लिए होता है। कोई भी व्यक्ति शर्तों को पूरा करके इसे स्वीकार कर सकता है।
(कार्लिल बनाम कार्बोलिक स्मोक बॉल कंपनी)।
3. प्रति-प्रस्ताव (Counter Offer) - जब सामने वाला मूल प्रस्ताव को स्वीकार करने के बजाय उसमें बदलाव कर देता है। इससे मूल प्रस्ताव खत्म हो जाता है।
4. क्रॉस प्रस्ताव (Cross Offer) - जब दो पक्ष एक-दूसरे को अनजान रहते हुए एक जैसा प्रस्ताव एक ही समय पर भेजते हैं।
प्रस्ताव का निमंत्रण - प्रस्ताव का निमंत्रण को गलती से प्रस्ताव समझ लिया जाता है। भारतीय संविदा अधिनियम के तहत इन दोनों में स्पष्ट अंतर है।
प्रस्ताव का निमंत्रण में जब कोई व्यक्ति अपनी इच्छा व्यक्त करता है कि वह दूसरों से प्रस्ताव प्राप्त करना चाहता है, तो उसे प्रस्ताव का निमंत्रण कहते हैं। यहाँ व्यक्ति अनुबंध करने के लिए तैयार नहीं है, बल्कि वह दूसरों को आमंत्रित कर रहा है कि वे आकर उसे ऑफर दें।
उदाहरण -
1. दुकान में सामान का प्रदर्शन - जब आप किसी मॉल या दुकान में जाते हैं और वहां सामान पर Price Tag लगा देखते हैं, तो वह प्रस्ताव नहीं है। वह केवल दुकानदार की ओर से एक निमंत्रण है। जब आप उस सामान को काउंटर पर ले जाते हैं, तब आप उसे खरीदने का प्रस्ताव देते हैं।
2. निविदा - जब सरकार किसी काम के लिए टेंडर निकालती है, तो वह निमंत्रण होता है। ठेकेदार जब अपनी कीमतें जमा करते हैं, तो वे प्रस्ताव देते हैं।
3. नीलामी - नीलामी की घोषणा करना निमंत्रण है। वहां मौजूद लोगों द्वारा बोली लगाना (Bidding) प्रस्ताव है।
शेयर प्रोस्पेक्टस - कंपनी जब जनता को शेयर खरीदने के लिए आमंत्रित करती है, तो वह प्रस्ताव का निमंत्रण होता है।
कानूनी महत्व
यह अंतर इसलिए जरूरी है क्योंकि यदि कोई दुकानदार किसी वस्तु पर गलत कीमत लिख दे, तो आप उसे उसी कीमत पर सामान बेचने के लिए मजबूर नहीं कर सकते। कानूनन, वह केवल एक निमंत्रण था और दुकानदार या ग्राहक को आपका प्रस्ताव स्वीकार या अस्वीकार करने का अधिकार है।
प्रस्ताव और निमंत्रण में अंतर -
प्रस्ताव (Offer) - में जब आप सीधे कहते हैं, क्या आप मेरी कार 2 लाख में खरीदेंगे? (यहाँ स्वीकृति मिलते ही समझौता हो जाता है)।
प्रस्ताव का निमंत्रण - में जब आप कार पर For Sale का बोर्ड लगाते हैं। यहाँ आप लोगों को बुला रहे हैं कि वे आएं और अपनी कीमत बताएं।
प्रस्ताव = प्रस्ताव का निमंत्रण
1. उद्देश्य - अनुबंध करना = दूसरों से प्रस्ताव प्राप्त करना।
2. क्रम - यह अंतिम चरण है = यह प्रस्ताव से पहले का चरण है। |
3. स्वीकृति - इसकी स्वीकृति से अनुबंध बन जाता है = इसकी स्वीकृति से केवल एक प्रस्ताव बनता है।
(केस लॉ- Harvey vs. Facey,1893)
मामले में वादी ने टेलीग्राम से पूछा - क्या आप हमें बम्पर हॉल पेन बेचेंगे? सबसे कम कीमत बताएं। प्रतिवादी ने जवाब दिया - सबसे कम कीमत £900 है। वादी ने इसे स्वीकार कर लिया। लेकिन कोर्ट ने कहा कि £900 बताना केवल सूचना देना (प्रस्ताव का निमंत्रण) था, उसे प्रस्ताव नहीं माना जा सकता।
प्रस्ताव का खंडन (प्रतिसंहरण) (Revocation of Offer) - प्रस्ताव के खंडन का अर्थ है किसी प्रस्ताव को स्वीकार किए जाने से पहले उसे वापस लेना या रद्द करना। संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 5 और धारा 6 में इसके नियमों का विस्तार से वर्णन किया गया है।
मुख्य सिद्धांत यह है कि एक बार जब प्रस्ताव स्वीकार हो जाता है, तो वह एक वादा बन जाता है जिसे वापस नहीं लिया जा सकता। इसलिए, खंडन हमेशा स्वीकृति से पहले होना चाहिए।
प्रस्ताव का खंडन कब (धारा 5) - एक प्रस्तावक अपने प्रस्ताव को किसी भी समय वापस ले सकता है, लेकिन शर्त यह है कि स्वीकृति की सूचना प्रस्तावक के विरुद्ध पूरी होने से पहले ऐसा किया जाना चाहिए।
उदाहरण - A ने B को पत्र भेजकर घर बेचने का प्रस्ताव दिया। B ने स्वीकृति का पत्र डाक में डाला। A अपना प्रस्ताव केवल तब तक वापस ले सकता है जब तक B ने पत्र डाक में नहीं डाला है। एक बार पत्र डाक में गया, तो A उसे रद्द नहीं कर सकता।
प्रस्ताव के खंडन के तरीके (धारा 6) -
धारा 6 के तहत प्रस्ताव निम्नलिखित परिस्थितियों में समाप्त या रद्द माना जाता है -
1. सूचना द्वारा - प्रस्तावक द्वारा दूसरे पक्ष को प्रस्ताव वापस लेने की स्पष्ट सूचना देने पर।
2. समय बीत जाने पर - यदि प्रस्ताव में कोई समय सीमा तय थी और वह समाप्त हो गई हो। यदि समय तय नहीं था, तो एक उचित समय बीत जाने पर प्रस्ताव स्वत रद्द हो जाता है।
3. शर्त पूरी न करने पर - यदि प्रस्ताव के साथ कोई शर्त जुड़ी थी (जैसे - एडवांस जमा करना) और स्वीकार करने वाले ने उसे पूरा नहीं किया।
4. मृत्यु या पागलपन - यदि प्रस्तावक की मृत्यु हो जाए या वह मानसिक रूप से अस्वस्थ हो जाए और इसकी जानकारी दूसरे पक्ष को स्वीकृति देने से पहले मिल जाए।
5. प्रति-प्रस्ताव - यदि सामने वाला व्यक्ति मूल प्रस्ताव में बदलाव कर दे (जैसे- 100 रुपये की चीज़ के 80 रुपये मांगे), तो मूल प्रस्ताव रद्द हो जाता है।
महत्वपूर्ण बिंदु - डाक द्वारा खंडन - डाक के मामले में खंडन तब प्रभावी माना जाता है जब। -
1. प्रस्तावक के लिए - जब वह खंडन का पत्र डाक में डाल देता है।
2. स्वीकार करने वाले के लिए - जब वह पत्र उसे प्राप्त हो जाता है।
विशेष नोट - यदि कोई व्यक्ति प्रस्ताव को 10 दिनों तक खुला रखने का वादा करता है, तब भी वह उसे 2 दिन में वापस ले सकता है, बशर्ते उसे इसके बदले कोई प्रतिफल न मिला हो।
स्वीकृति का खंडन (Revocation of Acceptance) - स्वीकृति के खंडन का अर्थ है पहले दी गई सहमति को वापस लेना। संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 5 के अनुसार जिस तरह एक प्रस्ताव को वापस लिया जा सकता है, उसी तरह एक स्वीकृति को भी रद्द किया जा सकता है, लेकिन इसके लिए समय की सीमा बहुत सख्त है।
स्वीकृति का खंडन कब - स्वीकृति को किसी भी समय खंडित किया जा सकता है, लेकिन केवल तब तक जब तक कि स्वीकृति की सूचना प्रस्तावक तक पहुँच न जाए। यदि स्वीकृति की सूचना प्रस्तावक तक पहुँच गई, तो अनुबंध बन जाता है और फिर उसे वापस नहीं लिया जा सकता।
उदाहरण (डाक द्वारा स्वीकृति का खंडन) - A ने B को घर खरीदने का प्रस्ताव दिया।
B ने स्वीकृति का पत्र लिखकर 1 तारीख को डाक में डाल दिया। वह पत्र A को 5 तारीख को प्राप्त होना है। B अपनी स्वीकृति को 5 तारीख से पहले (जब तक पत्र A के हाथ में न पहुँचे) कभी भी वापस ले सकता है। इसके लिए B को टेलीग्राम या फोन जैसे तेज़ माध्यम का उपयोग करना होगा ताकि खंडन की सूचना मूल स्वीकृति पत्र से पहले पहुँच जाए।
स्वीकृति के खंडन के नियम -
1. समय का महत्व - स्वीकृति का खंडन प्रभावी होने के लिए यह अनिवार्य है कि खंडन की सूचना, स्वीकृति की सूचना से पहले या उसके साथ पहुँचे। यदि स्वीकृति पत्र पहले पहुँच गया और खंडन बाद में, तो खंडन मान्य नहीं होगा और अनुबंध वैध माना जाएगा।
2. सूचना का माध्यम - खंडन की सूचना स्पष्ट होनी चाहिए। यदि प्रस्तावक को यह पता चल जाए कि स्वीकार करने वाले ने अपना मन बदल लिया है और उसने इसकी सूचना भेज दी है, तो स्वीकृति समाप्त मानी जाती है।
क्या होगा यदि स्वीकृति और खंडन दोनों एक साथ पहुँचें -
यह एक दिलचस्प कानूनी स्थिति है। यदि प्रस्तावक को स्वीकृति का पत्र और खंडन का टेलीग्राम एक साथ मिलते हैं, तो यह देखा जाता है कि उसने पहले किसे पढ़ा गया -
I. यदि उसने पहले खंडन पढ़ा, तो स्वीकृति रद्द मानी जाएगी।
II. यदि उसने पहले स्वीकृति पढ़ी, तो खंडन रद्द हो कर स्वीकृति मानी जाएगी और अनुबंध बन जाएगा।
III. (व्यावहारिक रूप से ऐसे मामलों में खंडन को प्राथमिकता दी जाती है क्योंकि वह व्यक्ति की अंतिम इच्छा को दर्शाता है)।
प्रति-प्रस्ताव (Counter Offer) - प्रति प्रस्ताव संविदा कानून की एक ऐसी स्थिति है जहाँ मूल प्रस्ताव को स्वीकार करने के बजाय, सामने वाला पक्ष उसमें कुछ बदलाव या नई शर्तें जोड़ देता है।
कानून की नजर में, जैसे ही कोई प्रति-प्रस्ताव दिया जाता है, मूल प्रस्ताव तुरंत समाप्त हो जाता है। अब मूल प्रस्तावक उस पुराने प्रस्ताव से बंधा हुआ नहीं रहता।
प्रति प्रस्ताव की विशेषताएँ -
1. मूल प्रस्ताव का अंत - प्रति-प्रस्ताव पिछले प्रस्ताव को कानूनी रूप से मार देता है। यदि बाद में आप पुराने प्रस्ताव पर वापस आना चाहें, तो आप ऐसा तब तक नहीं कर सकते जब तक प्रस्तावक फिर से वही प्रस्ताव न दे।
II. नया प्रस्ताव - प्रति-प्रस्ताव वास्तव में एक नया प्रस्ताव होता है, जिसे अब पहले पक्ष को स्वीकार करना होता है।
III. शर्त रहित स्वीकृति का अभाव - वैध अनुबंध के लिए स्वीकृति पूर्ण और बिना शर्त होनी चाहिए। प्रति-प्रस्ताव में शर्त जुड़ जाती है, इसलिए यह स्वीकृति नहीं कहलाती।
उदाहरण - मान लीजिए, A और B के बीच बातचीत हो रही है -
∆. A का मूल प्रस्ताव - मैं अपना प्लॉट आपको ₹10 लाख में बेचना चाहता हूँ।
∆. B का प्रति-प्रस्ताव - मैं इसे ₹8 लाख में खरीदूँगा।
∆. कानूनी परिणाम - जैसे ही B ने ₹8 लाख कहा, A का ₹10 लाख वाला प्रस्ताव खत्म हो गया।
∆. अब यदि B थोड़ी देर बाद कहे - ठीक है, मैं ₹10 लाख में ही ले लेता हूँ, तो A कानूनी रूप से बेचने के लिए मजबूर नहीं है। अब यह A की मर्जी है कि वह बेचे या न बेचे, क्योंकि पुराना प्रस्ताव खत्म हो चुका है।
प्रति-प्रस्ताव व पूछताछ में अंतर -
कभी-कभी लोग केवल जानकारी माँगते हैं (पूछताछ करते हैं) उसे प्रति-प्रस्ताव नहीं माना जाता।
पूछताछ - ग्राहक दुकानदार से पूछताछ करते हुए कहे कि - क्या आप इस कीमत में कुछ छूट दे सकते हैं? (यहाँ प्रस्ताव खत्म नहीं होता)।
प्रति-प्रस्ताव - "मैं इस पेन के ₹8 दे सकता हूं, (यहाँ प्रस्ताव खत्म हो जाता है)।
केस लॉ- हाइड बनाम रेंच 1840)
इस मामले में प्रतिवादी ने अपना फार्म £1,000 में बेचने का प्रस्ताव दिया। वादी ने कहा कि वह £950 देगा। जब प्रतिवादी ने मना कर दिया, तो वादी £1,000 देने को तैयार हो गया। अदालत ने फैसला सुनाया कि कोई अनुबंध नहीं हुआ क्योंकि £950 के प्रति-प्रस्ताव ने मूल £1,000 के प्रस्ताव को समाप्त कर दिया था।
क्रॉस प्रस्ताव - यह तब होता है जब दो पक्ष, एक-दूसरे के इरादे से अनजान, एक - दूसरे को बिल्कुल समान प्रस्ताव भेजते हैं।
A ने B को प्रस्ताव भेजता है और उसी समय B भी A को वही प्रस्ताव भेजता है, और दोनों को एक-दूसरे के प्रस्ताव के बारे में पता नहीं होता, तो इन्हें क्रॉस प्रस्ताव कहते हैं।
क्रॉस प्रस्ताव की विशेषताएँ -
1. समान विषय - दोनों पक्षों के प्रस्ताव में वस्तु, कीमत और शर्तें बिल्कुल एक जैसी होनी चाहिए।
2अज्ञानता - जब एक पक्ष प्रस्ताव भेज रहा हो, तो उसे दूसरे पक्ष द्वारा भेजे गए प्रस्ताव की जानकारी नहीं होनी चाहिए।
3. एक ही समय - ये प्रस्ताव लगभग एक ही समय पर एक-दूसरे को भेजे जाते हैं।
क्रॉस प्रस्ताव का अनुबंध बनना - नहीं, कानूनी दृष्टि से क्रॉस प्रस्तावों के आदान-प्रदान से कोई वैध अनुबंध नहीं बनता है।
इसका कारण यह है कि एक वैध अनुबंध के लिए एक प्रस्ताव और उस पर दूसरे पक्ष की स्वीकृति होना अनिवार्य है। क्रॉस प्रस्ताव के मामले में केवल दो प्रस्ताव होते हैं, लेकिन किसी भी पक्ष ने दूसरे के प्रस्ताव को स्वीकृत नहीं किया होता है।
कानूनी सिद्धांत - एक प्रस्ताव दूसरे प्रस्ताव की स्वीकृति नहीं हो सकता। अनुबंध पूरा करने के लिए किसी एक पक्ष को प्राप्त हुए प्रस्ताव पर अपनी स्पष्ट सहमति देनी होगी।
उदाहरण - A ने B को पत्र लिखा कि मैं अपनी कार तुम्हें 5 लाख रुपये में बेचना चाहता हूँ। उसी दिन, B ने (A का पत्र मिलने से पहले) A को पत्र लिखा कि मैं तुम्हारी कार 5 लाख रुपये में खरीदना चाहता हूँ। यहाँ दोनों के विचार समान हैं, यह एक क्रॉस प्रस्ताव है। कानूनन यहाँ कोई समझौता नहीं हुआ है। यदि B चाहता है कि कार खरीदी जाए, तो उसे A का पत्र मिलने के बाद उसे औपचारिक रूप से स्वीकार करना होगा।
(केस लॉ-Tinn vs. Hoffman,1873)
इस मामले में न्यायालय ने यह स्पष्ट किया था कि क्रॉस प्रस्तावों से कोई कानूनी बंधन पैदा नहीं होता। अदालत ने कहा कि जब तक कोई एक पक्ष दूसरे के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं कर लेता, तब तक उनके बीच कोई संविदा (Contract) अस्तित्व में नहीं आती।
प्रस्तावक - संविदा कानून में प्रस्तावक (Offeror या Proposer) वह व्यक्ति या पक्ष होता है जो अनुबंध की शुरुआत करता है। जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे के सामने कोई काम करने या न करने का प्रस्ताव रखता है, तो उसे कानूनी शब्दावली में प्रस्तावक कहा जाता है।
संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 2(c) के अनुसार - प्रस्ताव करने वाले व्यक्ति को वचनदाता कहा जाता है, और प्रस्ताव स्वीकार करने वाले व्यक्ति को वचनग्रही कहा जाता है।
प्रस्तावक की भूमिका और जिम्मेदारियां -
1. इच्छा प्रकट करना - प्रस्तावक का पहला काम अपनी स्पष्ट इच्छा को दूसरे पक्ष के सामने रखना है।
2. सहमति प्राप्त करने का उद्देश्य - प्रस्तावक का इरादा केवल सूचना देना नहीं, बल्कि दूसरे पक्ष की मंजूरी हासिल करना होना चाहिए।
3. शर्तें तय करना - अनुबंध की प्राथमिक शर्तें प्रस्तावक द्वारा ही निर्धारित की जाती हैं। प्रस्तावक यह तय कर सकता है कि प्रस्ताव कितने समय तक वैध रहेगा और उसे स्वीकार करने का तरीका (जैसे ईमेल या लिखित) क्या होगा।
4. संसूचना (Communication) - यह प्रस्तावक की जिम्मेदारी है कि उसका प्रस्ताव उस व्यक्ति तक सही ढंग से पहुँचे जिसे वह देना चाहता है। जब तक प्रस्ताव सामने वाले के ज्ञान में नहीं आता, वह प्रभावी नहीं होता।
प्रस्तावक के अधिकार -
1. प्रस्ताव वापस लेना - प्रस्तावक को यह अधिकार है कि वह स्वीकृति मिलने से पहले किसी भी समय अपना प्रस्ताव वापस ले सकता है।
2. शर्तें निर्धारित करना - प्रस्तावक यह कह सकता है कि उसका प्रस्ताव तभी मान्य होगा जब उसे एक विशिष्ट तरीके से स्वीकार किया जाए।
उदाहरण - मान लीजिए शमशेर भालू खां अपने किसी साथी राजेश से कहते हैं कि मैं अपनी कानून की पुरानी किताबें आपको ₹2,000 में बेचना चाहता हूँ। यहाँ शमशेर भालू खां (प्रस्तावक) हैं। उनका साथी राजेश, प्रस्ताविती है।
यदि वह साथी राजेश इसे स्वीकार कर लेता है, तो शमशेर भालू खां कानूनी रूप से वचनदाता बन जाएंगे और किताबें देना उनकी कानूनी जिम्मेदारी होगी।
विशेष - एक प्रस्तावक के रूप में यह बहुत महत्वपूर्ण है कि प्रस्ताव निश्चित हो। यदि प्रस्ताव अस्पष्ट है, तो वह अदालत में टिक नहीं पाएगा।
प्रस्ताव का संवहन (सूचना) (Communication of Offer) - इसका अर्थ है कि प्रस्ताव तभी कानूनी रूप से प्रभावी होता है जब वह उस व्यक्ति की जानकारी (Knowledge) में आ जाए जिसे वह दिया गया है। संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 4 के अनुसार - प्रस्ताव का संवहन तब पूरा होता है जब वह उस व्यक्ति के ज्ञान में आ जाता है जिसके प्रति वह किया गया है।
संवहन की आवश्यकता - बिना संवहन के कोई भी व्यक्ति किसी प्रस्ताव को स्वीकार नहीं कर सकता। यदि कोई व्यक्ति किसी प्रस्ताव के बारे में जाने बिना ही वह कार्य कर देता है जो प्रस्ताव की शर्त थी, तो वह किसी पुरस्कार या अनुबंध का हकदार नहीं होता।
लालमन शुक्ला vs.गौरी दत्त (1913)
तथ्य- गौरी दत्त का भतीजा खो गया, उसने अपने मुनीम लालमन शुक्ला को उसे खोजने भेजा। लालमन के जाने के बाद गौरी दत्त ने घोषणा की कि जो कोई भी मेरे भतीजे को खोजेगा, उसे ₹500 का इनाम दिया जाएगा।
घटना- लालमन ने भतीजे को ढूंढ लिया और वापस ले आया। वापस आने के बाद उसे इनाम की घोषणा का पता चला और उसने इनाम माँगा। जिसे गौरीदत्त ने देने से मना कर दिया। लालमन कोर्ट गया।
अदालत का फैसला - अदालत ने कहा कि लालमन इनाम का हकदार नहीं है, क्योंकि जब उसने भतीजे को ढूँढा, तब उसे इनाम वाले प्रस्ताव की जानकारी नहीं थी। प्रस्ताव का संवहन लालमन तक नहीं हुआ था, इसलिए कोई अनुबंध नहीं बना।
संवहन के माध्यम -
1. प्रत्यक्ष (Direct) - आमने-सामने बोलकर या फोन पर।
2. लिखित (Written) - पत्र, ईमेल, टेलीग्राम या सोशल मीडिया संदेश के माध्यम से।
आचरण द्वारा (By Conduct) - जैसे बस का किसी रूट पर चलना एक मूक प्रस्ताव है जिसका संवहन जनता को उसके आचरण से होता है।
पत्र द्वारा संवहन की स्थिति -
जब प्रस्ताव डाक (Post) द्वारा भेजा जाता है, तो संवहन उस समय पूरा माना जाता है जब वह पत्र उस व्यक्ति को मिल जाता है और वह उसे पढ़ लेता है।
उदाहरण - A ने 1 जनवरी को पत्र लिख कर B को घर बेचने का प्रस्ताव दिया। B को वह पत्र 3 जनवरी को मिला। यहाँ प्रस्ताव का संवहन 3 जनवरी को पूरा हुआ।
संवहन से संबंधित महत्वपूर्ण नियम -
1. अपूर्ण संवहन - यदि पत्र रास्ते में खो जाए या गलत पते पर चला जाए, तो संवहन पूरा नहीं माना जाता।
2. प्रस्ताविती का ज्ञान - यदि प्रस्ताविती (Offeree) को प्रस्ताव के बारे में किसी तीसरे व्यक्ति से पता चलता है, तो कुछ मामलों में उसे वैध संवहन नहीं माना जाता, यह प्रस्तावक की ओर से ही होना चाहिए।
एक प्रस्ताव तब तक कानूनन प्रस्ताव नहीं बनता जब तक वह दूसरे पक्ष के संज्ञान में न आए।
प्रस्ताव के संवहन (संज्ञान) की तरह ही स्वीकृति का संवहन आवश्यक है।
मानक प्रपत्र अनुबंध (Standard Form Contract) - जिसे आमतौर पर 'लॉ ऑफ एडहेसन' (Adhesion Contract) या जैसे है वैसे ही स्वीकार करो अनुबंध भी कहा जाता है, आज के आधुनिक व्यापारिक युग की एक वास्तविकता है।
इसमें एक पक्ष (अक्सर बड़ी कंपनियां) पहले से ही एक विस्तृत अनुबंध तैयार रखता है, जिसमें नियम और शर्तें छपी होती हैं। दूसरे पक्ष (ग्राहक) के पास इन शर्तों पर बातचीत करने या उन्हें बदलने का कोई विकल्प नहीं होता; उसे या तो पूरी तरह स्वीकार करना होता है या अनुबंध छोड़ना होता है।
मानक अनुबंध की विशेषताएं -
1. मोल-भाव का अभाव - ग्राहक शर्तों में बदलाव नहीं करवा सकता। इसे Take it or Leave it (मानो या छोड़ो) अनुबंध कहा जाता है।
2. असमान सौदेबाजी की शक्ति - एक तरफ बड़ी कंपनी (जैसे बैंक, बीमा कंपनी या एयरलाइंस) होती है और दूसरी तरफ साधारण ग्राहक।
मुद्रित शर्तें (Printed Terms) - शर्तें पहले से ही एक निश्चित प्रारूप (Form) में छपी होती हैं।
उदाहरण -
1. बीमा पॉलिसी - जब आप बीमा लेते हैं, तो आपको कंपनी द्वारा दिए गए फॉर्म पर हस्ताक्षर करने होते हैं। आप उसकी शर्तों को नहीं बदल सकते।
2. ट्रेन, बस या हवाई जहाज की टिकट - टिकट के पीछे कई नियम और शर्तें बारीक अक्षरों में लिखी होती हैं। टिकट खरीदना उन शर्तों की स्वीकृति माना जाता है।
3. मोबाइल ऐप/सॉफ्टवेयर - I Agree का बटन पर क्लिक करना एक मानक प्रपत्र अनुबंध है।
4. बैंक खाता खोलना - बैंक द्वारा दिए गए फॉर्म की शर्तों को आपको अनिवार्य रूप से मानना पड़ता है।
मानक अनुबंध में ग्राहकों की सुरक्षा के लिए कानूनी उपाय - चूंकि इसमें ग्राहकों का शोषण होने की संभावना अधिक होती है, इसलिए अदालतों ने कुछ सुरक्षा उपाय विकसित किए हैं -
1. उचित सूचना - कंपनी की जिम्मेदारी है कि वह ग्राहक का ध्यान शर्तों की ओर आकर्षित करे। यदि शर्तें टिकट के पीछे छिपी हैं और सामने कोई संकेत नहीं है, तो वे बाध्यकारी नहीं हो सकतीं।
2. अनुबंध के समय सूचना - शर्तें अनुबंध करने के समय या उससे पहले बताई जानी चाहिए। अनुबंध पूरा होने के बाद दी गई नई शर्तें मान्य नहीं होतीं।
3. अत्यंत कठोर शर्तें - यदि कोई शर्त बहुत ही अनुचित या प्राकृतिक न्याय के विरुद्ध है, तो अदालत उसे खारिज कर सकती है।
4. स्पष्टता की कमी - यदि अनुबंध की किसी शर्त के दो अर्थ निकलते हों, तो अदालत हमेशा वह अर्थ निकालेगी जो ग्राहक के पक्ष में हो और कंपनी के खिलाफ।
केस लॉ- ओलवे vs.मार्लबोरो कोर्ट लिमिटेड
इस मामले में एक होटल के कमरे के पीछे लिखा था कि होटल सामान की चोरी के लिए जिम्मेदार नहीं होगा। ग्राहक का सामान चोरी हो गया। अदालत ने कहा कि चूंकि ग्राहक ने यह शर्त कमरा बुक करने के बाद (कमरे के अंदर) देखी, इसलिए होटल अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता। सूचना अनुबंध के समय मिलनी चाहिए थी।
ई-अनुबंध (E/Digital Contract) या इलेक्ट्रॉनिक अनुबंध - वह डिजिटल समझौता है जो कागज और पेन के बजाय कंप्यूटर, स्मार्टफोन या इंटरनेट के माध्यम से किया जाता है। जब दो या दो से अधिक पक्ष डिजिटल माध्यमों (जैसे ईमेल या वेब फॉर्म) का उपयोग करके अनुबंध की शर्तें तय करते हैं और उन पर अपनी सहमति देते हैं, तो उसे ई-अनुबंध कहा जाता है।
भारत में ई-अनुबंधों को सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000) के तहत कानूनी मान्यता दी गई है।
ई-अनुबंध के प्रकार - ई-अनुबंध तीन प्रकार के होते हैं, जिन्हें हम अपनी डिजिटल लाइफ में रोज देखते हैं -
1. क्लिक-रैप अनुबंध (Click-Wrap)-
जब आप किसी वेबसाइट या ऐप पर I Agree या मैं सहमत हूँ बटन पर क्लिक करते हैं। यह सबसे आम प्रकार है।
2. ब्राउज़-रैप अनुबंध (Browse-Wrap) - इसमें अनुबंध की शर्तें वेबसाइट के Terms of Service या Privacy Policy लिंक में छिपी होती हैं। वेबसाइट का उपयोग जारी रखना ही आपकी मौन सहमति मानी जाती है।
3. श्रिंक-रैप अनुबंध (Shrink-Wrap) - यह सॉफ्टवेयर सीडी या हार्डवेयर के साथ आता है। जब आप उस बॉक्स की प्लास्टिक पैकेजिंग (Shrink Wrap) खोलते हैं, तो आप उसकी शर्तों से बंध जाते हैं।
4. कानूनी वैधता (Legal Validity) -
भारत में ई-अनुबंध दो कानूनों के मेल से चलते हैं -
I. अनुबंध अधिनियम, 1872 - यह अनुबंध के बुनियादी सिद्धांतों (जैसे प्रस्ताव, स्वीकृति और प्रतिफल) को लागू करता है।
II. IT अधिनियम, 2000 की धारा 10A - यह स्पष्ट रूप से कहता है कि यदि प्रस्ताव, स्वीकृति और संवहन इलेक्ट्रॉनिक रूप में किए जाते हैं, तो वह अनुबंध केवल इस आधार पर अवैध नहीं होगा कि वह डिजिटल है।
ई-अनुबंध के मुख्य तत्व -
1. डिजिटल हस्ताक्षर (Digital Signature) - पक्षों की पहचान सुनिश्चित करने के लिए ई-हस्ताक्षर का उपयोग किया जाता है।
2. इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड - ईमेल या डेटा लॉग्स को साक्ष्य के रूप में रखा जाता है।
3. संसूचना (Communication) - जैसे ही आप Send बटन दबाते हैं या सर्वर से पुष्टि प्राप्त होती है, संवहन पूरा माना जाता है।
भारत में अचल संपत्ति की बिक्री और वसीयत (Will) जैसे मामलों में आज भी ई-अनुबंध पूरी तरह से प्रभावी नहीं हैं, इनके लिए भौतिक कागजी कार्रवाई और पंजीकरण अनिवार्य है।
डिजिटल हस्ताक्षर - इसकी की वैधता का अर्थ उसकी कानूनी स्वीकार्यता से है। जिस प्रकार भौतिक दस्तावेजों पर आपके हाथ से किए गए हस्ताक्षर आपकी पहचान और सहमति को प्रमाणित करते हैं, उसी प्रकार डिजिटल दुनिया में डिजिटल सिग्नेचर पहचान और डेटा की अखंडता सुनिश्चित करते हैं। भारत में डिजिटल हस्ताक्षर की वैधता मुख्य रूप से सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 द्वारा लागू/ शासित होती है।
डिजिटल हस्ताक्षर की कानूनी आधार -
1. IT अधिनियम की धारा 3 - यह धारा डिजिटल हस्ताक्षरों को प्रमाणित करने के लिए असममित क्रिप्टोसिस्टम और हैश फंक्शन के उपयोग का प्रावधान करती है।
2. IT अधिनियम की धारा 5 - यह सबसे महत्वपूर्ण धारा है जो डिजिटल हस्ताक्षरों को कानूनी मान्यता देती है। यह स्पष्ट करती है कि जहाँ कहीं भी कानूनन हस्ताक्षर की आवश्यकता है, वहाँ डिजिटल हस्ताक्षर का उपयोग किया जा सकता है और उसे हाथ से किए गए हस्ताक्षर के बराबर माना जाएगा।
3. भारतीय साक्ष्य अधिनियम - इस अधिनियम में संशोधन करके डिजिटल हस्ताक्षरों को अदालतों में साक्ष्य के रूप में स्वीकार्य बनाया गया है।
डिजिटल हस्ताक्षर की वैधता - डिजिटल हस्ताक्षर केवल स्कैन किया हुआ फोटो नहीं है, बल्कि यह तीन मुख्य सिद्धांतों पर काम करता है-
1. प्रमाणीकरण - यह सुनिश्चित करता है कि संदेश या दस्तावेज वास्तव में उसी व्यक्ति ने भेजा है जिसका दावा किया गया है।
2. अखंडता - यह गारंटी देता है कि हस्ताक्षर करने के बाद दस्तावेज में कोई बदलाव या छेड़छाड़ नहीं की गई है। यदि एक अक्षर भी बदलता है, तो हस्ताक्षर अमान्य हो जाता है।
3. अस्वीकरण का अभाव - हस्ताक्षर करने वाला व्यक्ति बाद में यह नहीं कह सकता कि उसने हस्ताक्षर नहीं किए थे, क्योंकि उसकी निजी कुंजी (Private Key/password) केवल उसके पास होती है।
डिजिटल हस्ताक्षर वैधता हेतु अनिवार्य शर्तें - किसी भी डिजिटल हस्ताक्षर को कानूनी रूप से वैध मानने हेतु निम्नलिखित शर्तें पूरी होनी चाहिए -
1. लाइसेंस प्राप्त CA द्वारा जारी - हस्ताक्षर मान्यता प्राप्त प्रमाणन प्राधिकरण (CA) द्वारा जारी किया जाना चाहिए।
2. वैधता अवधि - डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण- पत्र (DSC) अपनी वैधता अवधि के भीतर होना चाहिए (आमतौर पर 1 से 3 वर्ष)।
3. सुरक्षित निर्माण - इसे सुरक्षित तरीके से बनाया जाना चाहिए ताकि कोई दूसरा इसकी नकल न कर सके।
डिजिटल हस्ताक्षर कहाँ मान्य नहीं -
आईटी अधिनियम की पहली अनुसूची के अनुसार, कुछ दस्तावेजों पर डिजिटल हस्ताक्षर अकेले पर्याप्त नहीं होते, उनके लिए भौतिक प्रक्रिया जरूरी है -
1. अचल संपत्ति की बिक्री या हस्तांतरण के दस्तावेज।
2. वसीयत।
3. पावर ऑफ अटॉर्नी।
4. परक्राम्य लिखत (Negotiable Instruments) जैसे चेक (सिवाय कुछ बैंकिंग नियमों के)।
डिजिटल हस्ताक्षर का व्यावहारिक उपयोग - आजकल डिजिटल हस्ताक्षर का उपयोग आयकर रिटर्न (ITR) फाइल करने, ई-टेंडरिंग, कंपनी पंजीकरण (MCA) और अदालती दस्तावेजों को प्रमाणित करने में अनिवार्य रूप से किया जा रहा है।
डिजिटल हस्ताक्षर Legal Maxims) - Omnia praesumuntur rite et solemniter esse acta
अर्थ - सभी कार्य उचित रीति से किए गए माने जाते हैं के सिद्धांत को डिजिटल दुनिया में मजबूती प्रदान करते हैं।
UNIT II
प्रतिफल (Consideration)-
प्रतिफल का अर्थ - कुछ के बदले कुछ, इस हाथ दे उस हाथ ले, बातों के पैसे लगते हैं जैसे उदाहरणों से प्रतिफल को समझा जा सकता है। संविदा दो या दो से अधिक पक्ष किसी काम को करने या न करने के लिए करते हैं, दोनों ही पक्ष किसी न किसी रूप में कुछ न कुछ प्राप्त करते हैं। इसे हम बदला भी कह सकते हैं।
भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 2(d) में प्रतिफल को परिभाषित किया गया है। प्रतिफल का अर्थ है वादे के बदले में कुछ (Something in return)।
जब दो पक्ष कोई समझौता करते हैं, तो एक पक्ष दूसरे को जो लाभ या मूल्य प्रदान करता है, वही प्रतिफल है। बिना प्रतिफल के किया गया अनुबंध सामान्यतः शून्य होता है।
संविदा अधिनियम 1872 के अनुसार परिभाषा (धारा 2(d)) - जब वचनदाता की इच्छा पर, वचनग्रहीता या कोई अन्य व्यक्ति -
1. कुछ कर चुका है या करने से विरत (अलग) रहा है (भूतकाल),
2. कुछ करता है या करने से विरत रहता है (वर्तमान),
3. कुछ करने या करने से विरत रहने का वचन देता है (भविष्य),
इन तीनों परिस्थितियों में ऐसा कार्य या विरति उस वचन के लिए प्रतिफल होती है।
प्रतिफल की विशेषताएँ -
1. वचनदाता की इच्छा पर - प्रतिफल हमेशा उस व्यक्ति की इच्छा पर होना चाहिए जो वादा कर रहा है। यदि कोई अपनी मर्जी से कुछ करता है, तो वह प्रतिफल नहीं माना जाएगा।
2. वचनग्रहीता या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा - भारत में प्रतिफल कोई तीसरा व्यक्ति भी दे सकता है (इसे 'Privity of Consideration' कहते हैं)।
3. प्रतिफल सकारात्मक या नकारात्मक हो सकता है - यह कुछ करने (Act) के लिए भी हो सकता है और कुछ न करने के लिए भी।
4. प्रतिफल का पर्याप्त होना जरूरी नहीं - कानून यह नहीं देखता कि वस्तु की कीमत सही है या नहीं। यदि आप अपनी 1 लाख की कार 1000 रुपये में बेचने को तैयार हैं, तो 1000 रुपये वैध प्रतिफल माना जाएगा।
4. प्रतिफल वास्तविक होना चाहिए - यह काल्पनिक, अनिश्चित या असंभव नहीं होना चाहिए।
5. वैध होना चाहिए - प्रतिफल अनैतिक या कानून के विरुद्ध नहीं होना चाहिए।
उदाहरण - अ अपना घर ब को 50 लाख रुपये में बेचने का वादा करता है। यहाँ अ के लिए 50 लाख रुपये एवं ब के लिए घर प्रतिफल है।
अपवाद - बिना प्रतिफल के भी संविदा या करार मान्य होता है, संविदा अधिनियम 1872 की धारा 25 के अनुसार, कुछ स्थितियों में बिना प्रतिफल के भी अनुबंध वैध होता है -
1. स्वाभाविक प्रेम और स्नेह - यदि अनुबंध लिखित, पंजीकृत हो और निकट संबंधियों के बीच हो। (Release deed)
2. स्वेच्छा से की गई सेवा की क्षतिपूर्ति - यदि किसी ने पहले आपके लिए कुछ किया है और अब आप उसे भुगतान का वादा करते हैं।
3. काल-बाधित ऋण - समय सीमा समाप्त हो चुके कर्ज को चुकाने का लिखित वादा।
प्रतिफल का महत्व -
लैटिन भाषा में इसे Quid Pro Quo कहा जाता है, जिसका अर्थ है - कुछ के बदले में कुछ।
संविदा कानून में प्रतिफल को अनुबंध की आधारशिला या प्राणवायु माना जाता है। इसके बिना कोई भी समझौता खोखला वादा होता है, जिसे कानून लागू नहीं करवा सकता।
प्रतिफल के महत्व के बिंदु -
1. अनुबंध को कानूनी रूप से बाध्यकारी बनाना - प्रतिफल वह मुख्य तत्व है जो एक 'वादे' और 'अनुबंध' के बीच अंतर पैदा करता है।
I. नियम - बिना प्रतिफल के समझौता शून्य है, (Ex Nudo Pacto Non Oritur Actio)।
II. महत्व - यह सुनिश्चित करता है कि पक्षकार केवल बातों में नहीं, बल्कि गंभीरता से कानूनी बंधन में बंध रहे हैं।
2.. पक्षों के हितों की रक्षा - प्रतिफल यह सुनिश्चित करता है कि अनुबंध में दोनों पक्षों को कुछ न कुछ प्राप्त हो रहा है। यह एकतरफा समझौतों को रोकता है जहाँ एक पक्ष का शोषण हो सकता है। यह पारस्परिकता के सिद्धांत पर कार्य करता है।
3. प्रतिफल में उपहार' और 'व्यापारिक लेनदेन' में अंतर - कानून हर वादे को लागू नहीं करता। यदि आप किसी को उपहार देने का वादा करते हैं और नहीं देते, तो वह व्यक्ति आप पर मुकदमा नहीं कर सकता। लेकिन यदि लेनदेन में प्रतिफल शामिल है, तो वह एक व्यावसायिक सौदा बन जाता है जिसे अदालत के माध्यम से लागू कराया जा सकता है।
4. प्रतिफल का पर्याप्त होना आवश्यक नहीं - कानून व्यक्तियों को अपनी शर्तों पर सौदा करने की स्वतंत्रता देता है। यदि पक्षकारों की सहमति स्वतंत्र है, तो प्रतिफल चाहे कम हो या ज्यादा, कानून उसे वैध मानता है। यह व्यापारिक स्वतंत्रता को बढ़ावा देता है।
5. धोखाधड़ी और अनुचित दबाव से बचाव - प्रतिफल की मौजूदगी अक्सर इस बात का प्रमाण होती है कि दोनों पक्षों ने सोच-समझकर निर्णय लिया है। यदि किसी अनुबंध में प्रतिफल बिल्कुल भी नहीं है या बहुत ही संदिग्ध है, तो अदालत उसे अनुचित प्रभाव या धोखाधड़ी के चश्मे से देख सकती है।
6. सामाजिक और नैतिक व्यवस्था - यह समाज में इस भावना को पुख्ता करता है कि कुछ पाने के लिए कुछ देना पड़ता है। यह लोगों को अपने वादों के प्रति जिम्मेदार बनाता है क्योंकि वे जानते हैं कि उन्होंने इसके बदले में कुछ स्वीकार किया है।
संक्षेप में - बिना प्रतिफल के अनुबंध उस शरीर की तरह है जिसमें आत्मा नहीं है। जैसा कि
प्रतिफल की परिभाषा -
1. सर पोलक ने कहा है- प्रतिफल वह कीमत है, जिसके बदले में दूसरे का वचन खरीदा जाता है।
2. भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 2(d) -
∆. जब वचनदाता की इच्छा पर, वचन ग्रहीता या किसी अन्य व्यक्ति ने:
∆. कुछ किया है या करने से विरत रहा है
∆. कुछ करता है या करने से विरत रहता है
∆. कुछ करने या करने से विरत रहने का वचन देता है।
∆. तो ऐसा कार्य,विरति या वचन उस वचन के लिए प्रतिफल कहलाता है।
इस परिभाषा का विश्लेषण -
1. वचनदाता की इच्छा पर - कार्य केवल तभी प्रतिफल माना जाएगा जब वह उस व्यक्ति के कहने पर किया गया हो जिसने वादा किया है।
2. वचनग्रहीता या कोई अन्य व्यक्ति - यह जरूरी नहीं कि प्रतिफल केवल वही व्यक्ति दे जिससे वादा किया गया है; कोई तीसरा व्यक्ति भी प्रतिफल दे सकता है।
3. कार्य या विरति - प्रतिफल का मतलब केवल 'कुछ करना' ही नहीं, बल्कि कुछ करने से रुकना (जैसे - केस न करने के बदले पैसे लेना) भी प्रतिफल है।
4. प्रतिफल तीनों काल (Past, Present, Future) - भारतीय कानून में प्रतिफल भूतकाल (बीता हुआ), वर्तमान या भविष्य का हो सकता है।
विद्वानों के अनुसार परिभाषा -
सर पोलक - प्रतिफल वह कीमत है जिसके बदले में दूसरे का वचन खरीदा जाता है और इस प्रकार मूल्य के बदले दिया गया वचन कानूनी रूप से प्रवर्तनीय होता है।
न्यायमूर्ति पैटरसन - प्रतिफल का अर्थ वह मूल्य है जो वादे के बदले दिया जाता है, यह वचनग्राही के लिए कोई लाभ या वचनदाता के लिए कोई हानि या उत्तरदायित्व हो सकता है।
प्रतिफल के प्रकार - भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 के तहत प्रतिफल को समय और प्रकृति के आधार पर मुख्य रूप से तीन प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है।
धारा 2(d) की परिभाषा - कुछ किया है, करता है, या करने का वचन देता है, से ही ये तीन प्रकार निकलकर आते हैं -
1. भूतकालीन प्रतिफल - जब वचनदाता द्वारा वादा किए जाने से पहले ही वचन ग्रहीता ने कोई कार्य कर दिया हो, तो उसे भूतकालीन प्रतिफल कहते हैं।
विशेषता - इसमें कार्य पहले होता है और उसके बदले भुगतान या प्रतिफल का वादा बाद में किया जाता है।
भारतीय स्थिति - भारत में भूतकालीन प्रतिफल वैध है।
उदाहरण - अ का खोया हुआ कुत्ता ब ने ढूंढ निकाला। इसके बाद अ ने ब को ₹500 देने का वादा किया। यहाँ ब द्वारा कुत्ता ढूंढना अ के वादे के लिए भूतकालीन प्रतिफल है।
2. वर्तमान या निष्पादित प्रतिफल - जब प्रस्ताव की स्वीकृति के साथ ही प्रतिफल का भुगतान भी तुरंत कर दिया जाता है, तो उसे वर्तमान प्रतिफल कहते हैं।
विशेषता - इसमें एक पक्ष अपनी जिम्मेदारी तुरंत पूरी कर देता है।
उदाहरण - नकद खरीदारी (Cash Sale)। जब आप दुकान से पेन खरीदते हैं और तुरंत पैसे देते हैं, तो पेन के बदले पैसा देना वर्तमान प्रतिफल है।
3. भविष्यकालीन या निष्पादनीय प्रतिफल - जब दो पक्ष भविष्य में एक-दूसरे के प्रति अपनी जिम्मेदारियां निभाने का वादा करते हैं, तो उसे भविष्यकालीन प्रतिफल कहते हैं।
विशेषता - इसमें दोनों पक्षों की ओर से कार्य किया जाना अभी बाकी होता है। इसे वचन के बदले वचन भी कहा जाता है।
उदाहरण - अ 10 तारीख को गेहूं देने का वादा करता है और ब उसी दिन भुगतान करने का वादा करता है।
प्रतिफल के अन्य कानूनी रूप (प्रकृति के आधार पर) - इसके अलावा, कानून में प्रतिफल की प्रकृति ऐसी भी हो सकती है - A. सकारात्मक प्रतिफल - कुछ कार्य करना (जैसे - घर बनाना, सामान बेचना)।
B. नकारात्मक प्रतिफल - कुछ कार्य न करना या विरति (जैसे किसी के खिलाफ मुकदमा न करने के बदले पैसे लेना)।
प्रतिफल के अपवाद -
प्रतिफल का नियम यह है कि बिना प्रतिफल के समझौता शून्य होता है (Ex Nudo Pacto Non Oritur Actio)। लेकिन भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 25 में कुछ ऐसी स्थितियाँ बताई गई हैं जहाँ प्रतिफल न होने पर भी अनुबंध पूरी तरह वैध और कानूनी रूप से लागू करने योग्य होता है।
प्रतिफल के अपवाद -
1. स्वाभाविक प्रेम और स्नेह - यदि कोई समझौता प्रेम और स्नेह के कारण किया गया है, तो वह बिना प्रतिफल के भी मान्य होगा, यदि वह निम्नलिखित शर्तें पूरी करता हो -
I. पक्षकारों के बीच निकट संबंध हो (जैसे पिता-पुत्र, पति-पत्नी)।
II. समझौता लिखित होना चाहिए।
III. समझौते का पंजीकरण कानून के तहत हुआ हो।
IV. वह स्वाभाविक प्रेम और स्नेह पर आधारित हो।
2. स्वेच्छा से की गई सेवाओं की क्षतिपूर्ति - यदि किसी व्यक्ति ने भविष्य में किसी प्रतिफल की आशा किए बिना, स्वेच्छा से आपके लिए कोई काम किया है और बाद में आप उसे उस सेवा के लिए भुगतान करने का वादा करते हैं, तो यह एक वैध अनुबंध है।
उदाहरण - आपको सड़क पर किसी का बटुआ मिला और आपने उसे वापस कर दिया। मालिक ने खुश होकर आपको ₹500 देने का वादा किया। यह वादा बिना नए प्रतिफल के भी लागू होगा।
3. काल-बाधित ऋण - कानून के अनुसार, यदि किसी कर्ज को वसूलने की समय सीमा (आमतौर पर 3 वर्ष) निकल जाए, तो उसे काल-बाधित ऋण कहते हैं।
I. यदि कर्जदार ऐसे ऋण को चुकाने का लिखित और हस्ताक्षरित वादा करता है, तो वह बिना किसी नए प्रतिफल के भी कानूनी रूप से बाध्यकारी होगा।
4. एजेंसी - भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 185 स्पष्ट रूप से कहती है कि एजेंसी स्थापित करने के लिए किसी प्रतिफल की आवश्यकता नहीं होती है। यदि कोई व्यक्ति किसी दूसरे का एजेंट बनने के लिए तैयार होता है, तो वह समझौता बिना पैसे या प्रतिफल के भी वैध है।
5. पूर्ण उपहार - बिना प्रतिफल के समझौता शून्य है का नियम पूर्ण हो चुके उपहारों पर लागू नहीं होता। यदि आपने किसी को कोई संपत्ति या वस्तु उपहार में दे दी है और वह प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, तो उसे इस आधार पर वापस नहीं मांगा जा सकता कि उसके बदले में कुछ नहीं मिला।
6. दान - यदि कोई व्यक्ति दान देने का वादा करता है और उस वादे के आधार पर संस्था ने कोई वित्तीय दायित्व (जैसे निर्माण कार्य शुरू करना) उठा लिया है, तो उस वादे को लागू करवाया जा सकता है।
अनुबंध करने की योग्यता - भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 11 स्पष्ट करती है कि हर व्यक्ति अनुबंध करने के योग्य नहीं होता। वैध अनुबंध हेतु पक्षकारों में अनुबंध करने की क्षमता होना अनिवार्य है।
यहाँ नाबालिग, मानसिक रूप से अस्वस्थ और कानूनी रूप से अक्षम व्यक्तियों के साथ किए गए समझौतों की प्रकृति और उनके कानूनी प्रभावों का विस्तृत विवरण है:
1. नाबालिग - भारतीय वयस्कता अधिनियम, 1875 के अनुसार, जिस व्यक्ति ने 18 वर्ष की आयु पूरी नहीं की है, वह नाबालिग है।
समझौते की प्रकृति - नाबालिग के साथ किया गया समझौता शुरुआत से ही शून्य (Void-ab-initio) होता है।
केस लॉ- मोहरी बीबी बनाम धर्मोदास घोष (1903)
इस मामले में प्रिवी काउंसिल ने तय किया कि नाबालिग द्वारा किया गया कोई भी अनुबंध कानूनन अस्तित्वहीन है।
नाबालिग से संविदा नहीं कर सकने के प्रभाव -
I. पुष्टिकरण नहीं - वयस्क होने पर भी नाबालिग पुराने समझौते को वैध नहीं कर सकता।
II. वचन विबंध का अभाव (No Estoppel) - यदि नाबालिग अपनी उम्र गलत बताकर अनुबंध करता है, तब भी उसे अपनी सही उम्र बताने और अनुबंध से बचने से नहीं रोका जा सकता।
III. आवश्यकताओं के लिए उत्तरदायी- यदि किसी ने नाबालिग को जीवन की आवश्यक वस्तुएं (रोटी, कपड़ा, शिक्षा और चिकित्सा) प्रदान की हैं, तो वह नाबालिग की संपत्ति से वसूली कर सकता है, लेकिन इस हेतु नाबालिग व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी नहीं होगा (धारा 68)।
2. अस्वस्थ मस्तिष्क वाले व्यक्ति - धारा 12 के अनुसार, अनुबंध के समय व्यक्ति का मस्तिष्क ऐसा होना चाहिए कि वह अनुबंध की शर्तों को समझ सके और अपने हितों पर उसके प्रभाव का तर्क संगत निर्णय ले सके।
I. पागल - पागल वह व्यक्ति है जिसका मानसिक संतुलन कभी ठीक रहता है और कभी खराब।
प्रकृति - जब वह स्वस्थ हो तब अनुबंध कर सकता है। लेकिन जब वह पागलपन की स्थिति में हो, तब किया गया अनुबंध शून्य होगा।
II. जड़बुद्धि - जड़बुद्धि वह व्यक्ति है जिसकी सोचने-समझने की शक्ति जन्मजात रूप से बिल्कुल नहीं होती।
प्रकृति - इसके साथ किया गया समझौता हमेशा शून्य होता है।
III. नशे में धुत व्यक्ति - यदि कोई व्यक्ति अत्यधिक नशे में है कि वह समझौते की प्रकृति को नहीं समझ पा रहा।
प्रकृति - नशे की स्थिति में किया गया अनुबंध लागू नहीं किया जा सकता।
3. कानूनी रूप से अक्षम व्यक्ति - कुछ व्यक्तियों को उनकी स्थिति के कारण कानून ने अनुबंध करने से वर्जित किया है:
I. विदेशी शत्रु - युद्ध के दौरान दुश्मन देश के नागरिक के साथ अनुबंध नहीं किया जा सकता।
II. सजायाफ्ता अपराधी - जेल की सजा काटते समय अपराधी अनुबंध करने की क्षमता नहीं रखता।
III. दिवालिया - एक घोषित दिवालिया अपनी संपत्ति के संबंध में अनुबंध नहीं कर सकता (जब तक उसे अदालत से डिस्चार्ज न मिल जाए)।
IV. विदेशी संप्रभु और राजदूत - इनके पास विशेष अधिकार होते हैं, इन पर भारतीय अदालतों में मुकदमा चलाने के लिए केंद्र सरकार की अनुमति चाहिए होती है।
निष्कर्ष - अनुबंध की क्षमता का उद्देश्य समाज के कमजोर या अक्षम वर्गों को उनके अनुभवहीनता या मानसिक स्थिति के कारण होने वाले नुकसान से बचाना है। नाबालिग या पागल के साथ किया गया अनुबंध उन्हें लाभ तो दे सकता है (जैसे उन्हें संपत्ति का हस्तांतरण), लेकिन उन पर कोई बोझ या दायित्व नहीं डाल सकता।
केस लॉ- मोहरी बीबी केस
स्वतंत्र सहमति -
भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 10 के अनुसार वैध अनुबंध के लिए पक्षकारों की स्वतंत्र सहमति होना अनिवार्य है।
सहमति और स्वतंत्र सहमति में अंतर
सहमति (धारा 13) - जब दो या दो से अधिक व्यक्ति एक ही बात पर एक ही भाव में सहमत हों (Consensus ad-idem)।
स्वतंत्र सहमति (धारा 14) - सहमति तब स्वतंत्र मानी जाती है जब वह नीचे दिए गए पांच कारकों में से किसी से प्रभावित न हो।
स्वतंत्र सहमति को दूषित करने वाले कारक -
धारा 15 - उत्पीड़न - शून्यकरणीय
धारा 16 - अनुचित प्रभाव- शून्यकरणीय
धारा 17 - कपट - शून्यकरणीय
धारा 18 - मिथ्या वर्णन - - शून्यकरणीय
धारा 20 - तथ्य की भूल - शून्य (Void)
धारा 21 - कानून की भूल - (भारतीय कानून) - शून्य
धारा 22 - विदेशी कानून की भूल - शून्यकरणीय
उपरोक्तानुसार की गई संविदा/अनुबंध अनुबंध शून्यकरणीय होता है (यानी पीड़ित पक्ष चाहे तो उसे रद्द कर सकता है) -
1. उत्पीड़न धारा 15 - जब किसी व्यक्ति को अनुबंध करने के लिए मजबूर करने के उद्देश्य से कोई ऐसा कार्य किया जाता है जो भारतीय दंड संहिता (IPC) द्वारा वर्जित है, या संपत्ति को रोकने की धमकी दी जाती है।
उदाहरण - A ने B को गोली मारने की धमकी देकर उसकी जमीन अपने नाम करवा ली।
प्रभाव - अनुबंध शून्यकरणीय है।
2. अनुचित प्रभाव (Undue Influence) धारा 16 - जब पक्षकारों के बीच ऐसा संबंध हो कि एक पक्ष दूसरे की इच्छा पर हावी होने की स्थिति में हो और वह उस स्थिति का अनुचित लाभ उठाए। यह अक्सर विश्वास वाले रिश्तों में होता है।
उदाहरण - डॉक्टर और मरीज, वकील और मुवक्किल, आध्यात्मिक गुरु और शिष्य।
प्रभाव - अनुबंध शून्यकरणीय है।
3. कपट / धोखाधड़ी (Fraud) धारा 17 - जब कोई पक्ष दूसरे को धोखा देने के इरादे से जानबूझकर झूठी बात बोलता है, तथ्यों को छिपाता है या ऐसा वादा करता है जिसे निभाने का उसका इरादा नहीं है।
प्रभाव - अनुबंध शून्यकरणीय है और पीड़ित पक्ष हर्जाने का दावा भी कर सकता है।
4. मिथ्या वर्णन धारा 18 - जब कोई व्यक्ति बिना किसी धोखा देने के इरादे से, गलती से किसी गलत तथ्य को सच मानकर दूसरे को बताता है। यहाँ नीयत साफ होती है लेकिन जानकारी गलत होती है।
उदाहरण - A अपनी कार B को यह कहकर बेचता है कि उसका इंजन नया है (वह वास्तव में ऐसा मानता है), लेकिन बाद में पता चलता है कि इंजन पुराना था।
प्रभाव: अनुबंध शून्यकरणीय है।
5. गलती / भूल (Mistake) धारा 20 से 22 - जब पक्षकार किसी महत्वपूर्ण तथ्य को समझने में गलती कर देते हैं।
I. तथ्य की गलती - यदि दोनों पक्ष अनुबंध के आवश्यक तथ्य को लेकर गलती पर हों, तो अनुबंध शून्य होता है।
II. कानून की गलती - कानून की अनभिज्ञता में भारत के कानून की अनभिज्ञता का कोई बचाव नहीं है (गजट में प्रकाशित होने के बाद यह माना जाता है कि इस कानून की जानकारी समस्त नागरिकों को है। लेकिन विदेशी कानून की गलती को तथ्य की गलती माना जाता है।
अनुबंध की स्वतंत्रता की सीमाएं - (सहमति के अपवाद) - भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 पक्षकारों को आपसी शर्तों पर अनुबंध करने की जो स्वतंत्रता देता है वो स्वतंत्रता एवं असीमित नहीं है। धारा 23 और धारा 24 उन सीमाओं को निर्धारित करती हैं जहाँ कानून हस्तक्षेप करता है और समझौतों को अवैध या शून्य घोषित कर देता है।
1. गैर-कानूनी समझौते धारा 23 -
किसी भी अनुबंध का उद्देश्य और प्रतिफल कानूनी होना चाहिए। धारा 23 के अनुसार, प्रतिफल या उद्देश्य गैर-कानूनी माना जाता है यदि -
I. विधि द्वारा निषिद्ध - कोई कार्य भारत के किसी भी कानून के विरुद्ध हो (जैसे चोरी या तस्करी का समझौता)।
II. कानून के प्रावधानों को विफल करने वाला हो - यदि वह प्रत्यक्ष रूप से गैर-कानूनी न हो, लेकिन उसका पालन करने से किसी कानून का उद्देश्य समाप्त हो जाए।
III. कपटपूर्ण - समझौते का उद्देश्य किसी तीसरे पक्ष के साथ धोखाधड़ी करना हो।
IV. क्षति कारक - दूसरे की संपत्ति या शरीर को क्षति पहुँचाने वाला अनुबंध, किसी व्यक्ति को पीटने या उसकी संपत्ति नष्ट करने का अनुबंध।
V. अनैतिक - जिसे अदालत समाज की नैतिकता के विरुद्ध माने (जैसे वैश्यावृत्ति से संबंधित समझौते)।
2. सार्वजनिक नीति के विरुद्ध -अदालतें ऐसे समझौतों को लागू नहीं करतीं जो समाज के कल्याण या सार्वजनिक हित के विरुद्ध हों।
I. शत्रु देश के साथ व्यापार धारा 23 - युद्ध के दौरान दुश्मन देश के नागरिक से अनुबंध करना।
II. अपराध के अभियोजन को रोकना - किसी अपराधी के खिलाफ कानूनी कार्यवाही को पैसे लेकर बंद करने का समझौता।
III. न्याय में हस्तक्षेप धारा 25- गवाहों को खरीदने या न्याय की प्रक्रिया को बाधित करने के समझौते।
IV. विवाह में बाधा डालना धारा 26 - किसी व्यक्ति को शादी करने से रोकने वाले समझौते।
V. व्यापार में बाधा डालना धारा 27 - किसी व्यक्ति को उसकी कानूनी आजीविका चलाने से रोकना।
VI. पदों और उपाधियों की बिक्री - सरकारी नौकरियों या पुरस्कारों को खरीदने-बेचने का अनुबंध।
3. आंशिक रूप से गैर-कानूनी प्रतिफल और उद्देश्य धारा 24 - कभी-कभी एक ही समझौते में कई उद्देश्य या प्रतिफल होते हैं, जिनमें से कुछ कानूनी होते हैं और कुछ गैर-कानूनी।
नियम - यदि गैर-कानूनी हिस्सा कानूनी हिस्से से अलग नहीं किया जा सकता, तो पूरा अनुबंध शून्य होगा।
उदाहरण - A एक घर किराये पर लेता है। वह वादा करता है कि वह घर के रहने के लिए ₹5000 देगा और वहां गैर-कानूनी सट्टा चलाने के लिए अलग से-₹2000 देगा। यहाँ यदि सट्टे और रहने के किराए को अलग नहीं किया जा सकता, तो पूरा समझौता शून्य हो जाएगा। इस हेतु अदालत कोई सहायता नहीं करेगी। |
समझौतों की प्रकृति और कानूनी शून्य प्रभाव -
1. गैर-कानूनी उद्देश्य
2. सार्वजनिक नीति के विरुद्ध - यह अनुबंध कानून की दृष्टि में अस्तित्वहीन है।
3. अविभाज्य गैर-कानूनी हिस्सा - पूर्णतः शून्य, पूरा समझौता रद्द माना जाएगा।
निष्कर्ष - अनुबंध की स्वतंत्रता केवल तभी तक सुरक्षित है जब तक वह कानून के दायरे में और समाज के व्यापक हितों के अनुकूल है। यदि पक्षकार कानून को दरकिनार करने या समाज को नुकसान पहुँचाने का प्रयास करते हैं, तो संविदा अधिनियम उन्हें सुरक्षा प्रदान करने से इनकार कर देता है।
कानूनन शून्य अनुबंध - धारा 36 से 40
भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 के अंतर्गत कुछ ऐसे समझौते होते हैं जिन्हें कानूनन शून्य माना जाता है। इसका अर्थ है कि इन्हें न्यायालय में लागू नहीं करवाया जा सकता।
1. प्रतिफल के बिना समझौता- धारा 25 के अनुसार, बिना प्रतिफल (बिना कुछ बदले में दिए) किया गया समझौता शून्य होता है। "कुछ के बदले कुछ" (Quid Pro Quo) अनुबंध का एक अनिवार्य तत्व है।उदाहरण - यदि A बिना किसी कारण के B को ₹5,000 देने का वादा करता है, तो यह कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है।अपवाद - प्राकृतिक प्रेम और स्नेह, स्वेच्छा से की गई सेवा का मुआवजा, या समय-बाधित ऋण के मामलों में यह मान्य हो सकता है।
2. विवाह में अवरोध डालने वाले समझौते - धारा 26 के अनुसार, यदि कोई समझौता किसी व्यक्ति की शादी करने की स्वतंत्रता को रोकता है, तो वह शून्य है। भारतीय कानून के अनुसार प्रत्येक वयस्क को अपनी इच्छा से विवाह करने का अधिकार है।
उदाहरण -A एक समझौता करता है कि वह B को ₹1 लाख देगा यदि B कभी शादी न करे। यह समझौता शून्य है।
नोट - यह नियम केवल वयस्कों पर लागू होता है; नाबालिगों के विवाह को रोकने वाले समझौते वैध हो सकते हैं।
3. व्यापार में अवरोध डालने वाले समझौते - धारा 27 कहती है कि कोई भी व्यक्ति किसी को वैध व्यवसाय, व्यापार या पेशा करने से नहीं रोक सकता। सार्वजनिक नीति के तहत व्यापार की स्वतंत्रता को बाधित करने वाले समझौते शून्य होते हैं।
उदाहरण - एक दुकानदार अपने पड़ोसी को पैसे देकर यह समझौता करता है कि वह उसी इलाके में दुकान नहीं खोलेगा। यह शून्य है।
अपवाद - गुडविल की बिक्री के मामले में उचित सीमा तक व्यापार पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है।
4. कानूनी कार्यवाही में अवरोध डालने वाले समझौते - धारा 28 के अनुसार, यदि कोई समझौता किसी व्यक्ति को अपने कानूनी अधिकारों को लागू करने के लिए अदालत जाने से रोकता है, तो वह शून्य है।
उदाहरण - यदि अनुबंध में लिखा हो कि विवाद होने पर कोई भी पक्ष कोर्ट नहीं जाएगा, तो ऐसी शर्त अवैध है।
अपवाद - विवाद को मध्यस्थता के जरिए सुलझाने का समझौता वैध माना जाता है।
5. बाजी या दांव के समझौते - धारा 30 के अनुसार, बाजी या दांव (सट्टा) के समझौते शून्य होते हैं। इसमें जीत या हार किसी अनिश्चित घटना पर निर्भर करती है और पक्षों का उद्देश्य केवल पैसा जीतना या हारना होता है।
उदाहरण - भारत और ऑस्ट्रेलिया के मैच पर जीत-हार की शर्त लगाना।
अपवाद: घुड़दौड़ हेतु पुरस्कार (निश्चित राशि से ऊपर) या कुछ कौशल आधारित खेलों के पुरस्कार इसमें शामिल नहीं होते।
UNIT III
समाश्रित अनुबंध (Contingent Contract)
समाश्रित अनुबंध संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 31 के तहत परिभाषित है। सरल शब्दों में, यह एक ऐसा अनुबंध है जिसका पाल भविष्य की किसी अनिश्चित घटना के होने या न होने पर निर्भर करता है।
समाश्रित अनुबंध की विशेषताएं -
I. घटना पर निर्भरता (जैसे बीमा) - अनुबंध का निष्पादन किसी ऐसी घटना पर टिका होता है जो भविष्य में होने वाली है। धारा 32 घटना होने पर अनुबंध तब लागू होता है जब वह विशिष्ट घटना घट जाए। यदि घटना असंभव हो जाए, तो अनुबंध शून्य हो जाता है। धारा 33 में घटना न होने पर अनुबंध तब लागू होता है जब उस घटना का होना असंभव हो जाए।
II. अनिश्चित घटना - वह घटना निश्चित नहीं होनी चाहिए (जैसे मृत्यु निश्चित है, लेकिन किसी खास तारीख पर मृत्यु होना अनिश्चित है)। धारा 35 के अनुसार निश्चित समय के भीतर यदि समय तय है, तो उस समय के अंदर घटना होने (या न होने) पर ही अनुबंध वैध रहता है। |
उदाहरण -
A. पार्श्व घटना - वह घटना अनुबंध का मुख्य हिस्सा नहीं, बल्कि उससे जुड़ी हुई (सहायक) होनी चाहिए।
B. मानवीय आचरण - कभी-कभी यह किसी व्यक्ति के भविष्य के आचरण पर भी निर्भर हो सकता है।
C. बीमा अनुबंध - मान लीजिए अ अपनी कार का बीमा करवाता है। बीमा कंपनी उसे पैसे देने का वादा तभी करती है जब उस कार का एक्सीडेंट (अनिश्चित घटना) होगा। यदि एक्सीडेंट नहीं होता, तो कंपनी पैसे देने के लिए उत्तरदायी नहीं है।D. व्यापारिक शर्त - क कहता है कि वह ख का माल खरीदेगा, यदि ख का जहाज सुरक्षित बंदरगाह पर लौट आता है। यहाँ जहाज का लौटना एक समाश्रित घटना है।
बाजी/सट्टा व समाश्रित अनुबंध में अंतर - समाश्रित अनुबंध कानूनी रूप से वैध होते हैं (जैसे बीमा), जबकि बाजी के अनुबंध (जैसे सट्टा) शून्य होते हैं। समाश्रित अनुबंध में पक्षकारों का वास्तविक हित होता है, जबकि बाजी में केवल हार-जीत का मकसद होता है।
अनुबंध का निष्पादन (Performance of Contract) -
भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 के अध्याय IV (धारा 37 से 67) के अनुसार जब अनुबंध के पक्षकार अपने-अपने कानूनी वादों और जिम्मेदारियों को पूरा कर देते हैं, तो उसे अनुबंध का निष्पादन कहा जाता है। यह अनुबंध के जीवन चक्र का अंतिम चरण होता है, जिसके बाद पक्षकार अपनी देनदारियों से मुक्त हो जाते हैं।
1. निष्पादन के प्रकार -
I. वास्तविक निष्पादन - जब दोनों पक्षकार अनुबंध की शर्तों के अनुसार अपना काम पूरा कर देते हैं। (जैसे: आपने पैसे दिए और दुकानदार ने सामान दे दिया)।
II. प्रस्तावित निष्पादन - जब एक पक्षकार अपना काम करने को तैयार है और प्रस्ताव देता है, लेकिन दूसरा पक्षकार उसे स्वीकार करने से मना कर देता है। इसे निविदा (Tender) भी कहते हैं।
2. अनुबंध का निष्पादन कर्ता -
I. स्वयं वचनदाता धारा 40 - यदि अनुबंध व्यक्तिगत कौशल (जैसे चित्रकारी या गायन) पर आधारित है, तो उसे स्वयं वचनदाता को ही करना होगा।
II. एजेंट - यदि व्यक्तिगत कौशल की आवश्यकता नहीं है, तो वचनदाता की ओर से उसका एजेंट कार्य कर सकता है।
III. कानूनी प्रतिनिधि - यदि वचनदाता की मृत्यु हो जाती है, तो उसके उत्तराधिकारी अनुबंध पूरा करने हेतु उत्तरदायी होते हैं (जब तक कि वह व्यक्तिगत कौशल वाला काम न हो)।
IV. तृतीय पक्ष धारा 41 - यदि वचनग्रही किसी तीसरे व्यक्ति द्वारा किए गए कार्य को स्वीकार कर लेता है, तो वह बाद में मुख्य वचनदाता से काम की मांग नहीं कर सकता।
3. समय, स्थान और तरीका -
अनुबंध का निष्पादन कब और कहाँ होगा, इसके लिए कुछ नियम हैं -
I. यदि समय तय है, तो निर्धारित समय पर।
II. यदि स्थान तय नहीं है, तो वचनदाता को वचनग्रही से उचित स्थान पूछना चाहिए।III. यदि कोई समय तय नहीं है, तो निष्पादन उचित समय के भीतर होना चाहिए।
4. संयुक्त अधिकार और दायित्व - जब दो या दो से अधिक लोग मिलकर कोई वादा करते हैं -
I. धारा 42 संयुक्त दायित्व - सभी वचनदाता मिलकर काम पूरा करने के लिए उत्तरदायी हैं। यदि एक की मृत्यु हो जाए, तो उसके प्रतिनिधि और जीवित साथी मिलकर उत्तरदायी होंगे।
II. धारा 43 किसी एक को बाध्य करना - वचनग्रही किसी भी एक संयुक्त वचनदाता को पूरा काम करने या पूरा पैसा देने के लिए मजबूर कर सकता है। बाद में वह व्यक्ति अपने अन्य साथियों से उनका हिस्सा वसूल सकता है।
5. पारस्परिक वादे धारा 51 से 54- ऐसे अनुबंध जहाँ दोनों पक्षकारों को एक साथ या एक के बाद एक काम करना होता है। उदाहरण के लिए, जब तक आप पैसे नहीं देंगे, विक्रेता सामान नहीं देगा।
I. साथ-साथ निष्पादन - जहाँ दोनों पक्षकारों को एक ही समय पर अपना कार्य करना हो (जैसे नकद सामान खरीदना)।
II. निष्पादन का क्रम - यदि अनुबंध में कार्य का क्रम तय है (जैसे पहले घर बनेगा फिर भुगतान होगा), तो उसी क्रम का पालन करना अनिवार्य है।
III. एक पक्ष द्वारा बाधा - यदि एक पक्ष दूसरे को कार्य करने से रोकता है, तो अनुबंध पीड़ित पक्ष की इच्छा पर शून्यकरणीय हो जाता है।
6. संयुक्त अधिकार - यदि वादा कई व्यक्तियों को संयुक्त रूप से किया गया है, तो वे सभी मिलकर उस वादे को निभाने की मांग कर सकते हैं।
7. निष्पादन का समय, स्थान और तरीका - अनुबंध कहाँ और कब पूरा होगा, इसके लिए धारा 46 से 50 में नियम दिए गए हैं:
समय - यदि कोई समय तय नहीं है, तो कार्य उचित समय के भीतर होना चाहिए, यदि दिन तय है लेकिन समय नहीं, तो कार्य व्यावसायिक घंटों के दौरान होना चाहिए।
स्थान - यदि स्थान तय नहीं है, तो वचनदाता का कर्तव्य है कि वह वचनग्रही से आवेदन करे कि वह निष्पादन के लिए एक उचित स्थान तय करे।
तरीका - निष्पादन उसी तरीके या ढंग से होना चाहिए जैसा वचनग्रही ने निर्धारित किया हो। यदि उसने चेक माँगा है, तो नकद देना उचित निष्पादन नहीं माना जा सकता जब तक वह स्वीकार न कर ले।
कानूनी भाषा में इसे समाश्रित अनुबंध कहा जाता है, जिसे भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 31 में परिभाषित किया गया है। यह ऐसा समझौता है जिसमें काम करने की जिम्मेदारी तभी पैदा होती है जब भविष्य में कोई अनिश्चित घटना या तो घट जाए या न घटे।
1. घटना के घटने पर निर्भर अनुबंध - धारा 32 के अनुसार, यदि अनुबंध किसी भविष्य की अनिश्चित घटना के घटने पर आधारित है, तो उसे तब तक लागू नहीं किया जा सकता जब तक वह घटना घट न जाए।
नियम - यदि वह घटना असंभव हो जाती है, तो अनुबंध शून्य हो जाता है।
उदाहरण - अ वादा करता है कि यदि ब का खोया हुआ कुत्ता मिल जाता है (घटना का घटना), तो वह उसे 500 रुपये देगा। यदि कुत्ता मर जाता है (घटना असंभव हो गई), तो अनुबंध खत्म हो जाएगा।
2. घटना के न घटने पर निर्भर अनुबंध - धारा 33 के अनुसार, यदि अनुबंध इस बात पर निर्भर है कि कोई भविष्य की घटना नहीं घटेगी, तो इसे तब लागू किया जा सकता है जब उस घटना का घटित होना असंभव हो जाए।
नियम - जब तक घटना के घटने की संभावना बनी रहती है, तब तक इसे लागू नहीं किया जा सकता।
उदाहरण क वादा करता है कि यदि ख का समुद्री जहाज वापस नहीं लौटा (घटना का न घटना), तो वह उसे हर्जाना देगा। यदि जहाज समुद्र में डूब जाता है, तो अब उसका लौटना असंभव है। इस स्थिति में अनुबंध लागू हो जाएगा।
कानूनी शर्तें -
1. अनिश्चितता - घटना का होना या न होना अनिश्चित होना चाहिए। यदि घटना निश्चित है (जैसे सूरज का उगना), तो वह समाश्रित अनुबंध नहीं है।
2. पार्श्व घटना - घटना अनुबंध का मुख्य हिस्सा नहीं, बल्कि उससे जुड़ी हुई होनी चाहिए।
4. समय की पाबंदी -
I. यदि कहा जाए कि घटना 1 साल के भीतर घटनी चाहिए, और वह नहीं घटती, तो अनुबंध शून्य हो जाएगा।
II. यदि कहा जाए कि घटना 1 साल के भीतर नहीं घटनी चाहिए, और वह समय बीत जाता है, तो अनुबंध वैध हो जाएगा।
व्यावहारिक उदाहरण (बीमा और गारंटी)
सभी बीमा अनुबंध इसी सिद्धांत पर काम करते हैं।
III. अग्नि बीमा - पैसा तभी मिलेगा जब आग लगेगी (घटना का घटना)।
IV. जीवन बीमा - पैसा तब मिलेगा जब व्यक्ति की मृत्यु होगी (समय या स्थिति के आधार पर)।
मानवीय आचरण (Human Conduct) से अनुबंध -
भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 34 मानवीय आचरण से जुड़ी घटनाओं पर आधारित समाश्रित अनुबंधों की व्याख्या करती है। जब किसी अनुबंध का निष्पादन इस शर्त पर टिका हो कि कोई व्यक्ति भविष्य में किसी निश्चित समय पर एक विशिष्ट तरीके से कार्य करेगा, तो वह मानवीय आचरण से जुड़ी घटना कहलाती है।
यदि अनुबंध इस शर्त पर है कि कोई व्यक्ति किसी कार्य को कैसे करेगा, तो वह घटना तब असंभव मान ली जाती है जब वह व्यक्ति कुछ ऐसा कर देता है जिससे वह निर्धारित कार्य उस रूप में या निर्धारित समय के भीतर करना नामुमकिन हो जाए।
भले ही बाद में वह स्थिति फिर से ठीक हो जाए, लेकिन यदि उसने एक बार उसे असंभव बना दिया, तो अनुबंध शून्य माना जा सकता है।
उदाहरण -
1. विवाह की शर्त - अ वादा करता है कि यदि ब, स से विवाह कर लेगी, तो वह ब को 10,000 रुपये देगा। लेकिन, स किसी और महिला द से विवाह कर लेता है।
अब ब और स का विवाह असंभव माना जाएगा (भले ही भविष्य में द की मृत्यु हो जाए या स उसे तलाक दे दे, फिर भी फिलहाल वह घटना असंभव हो गई है)।
2. व्यावसायिक शर्त - क वादा करता है कि वह ख को अपना घर बेचेगा, ख प्रसिद्ध वकील ग के साथ साझेदारी में क का घर खरीद लेता है। ग वकालत छोड़कर सन्यास ले लेता है या किसी और के साथ आजीवन अनुबंध कर लेता है।
यहाँ ग के आचरण ने अनुबंध की शर्त को पूरा करना असंभव बना दिया है।
कानूनी बारीकियां -
I. नियंत्रण - यहाँ घटना पूरी तरह से किसी तीसरे व्यक्ति या पक्षकार के हाथ में होती है।
II. समय - यदि कोई समय सीमा तय नहीं है, तो भी यदि व्यक्ति का आचरण उसे अनिश्चित काल के लिए टाल देता है, तो उसे असंभव माना जाता है।
III. शून्यता - एक बार जब व्यक्ति का आचरण शर्त के विपरीत हो जाता है, तो सामने वाला पक्ष अनुबंध को रद्द मान सकता है।
अनुबंध की समाप्ति (Discharge of Contract) -
अनुबंध की समाप्ति का अर्थ है कि अनुबंध के तहत पक्षकारों के बीच बना कानूनी संबंध अब खत्म हो गया है और वे अपने दायित्वों से मुक्त हो गए हैं। भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 के तहत इसकी प्रमुख विधियां हैं -
1. निष्पादन द्वारा समाप्ति - यह अनुबंध समाप्त करने का सबसे स्वाभाविक तरीका है। जब दोनों पक्षकार अपने-अपने वादे पूरे कर देते हैं, तो अनुबंध समाप्त हो जाता है।
I. वास्तविक निष्पादन: जब काम पूरा हो जाए और पैसे का भुगतान हो जाए।
II. प्रस्तावित निष्पादन (Tender): जब एक पक्ष काम करने को तैयार है, लेकिन दूसरा स्वीकार नहीं करता।
2. समझौते द्वारा समाप्ति - पक्षकार आपसी सहमति से पुराने अनुबंध को खत्म कर सकते हैं -
I. नवीनीकरण - पुराने अनुबंध की जगह एक बिल्कुल नया अनुबंध बनाना। इसमें पक्षकार बदल सकते हैं या शर्तें भी।
II. परिवर्तन - अनुबंध की कुछ शर्तों को बदल देना।
III. छूट - कम भुगतान स्वीकार कर लेना या दायित्व को माफ कर देना।
3. असंभवता का सिद्धांत - इसे 'निराशा का सिद्धांत' भी कहते हैं। धारा 56 के अनुसार, यदि अनुबंध करना असंभव या गैर-कानूनी हो जाए, तो वह समाप्त हो जाता है।
I. प्रारंभिक असंभवता - जो शुरू से ही असंभव हो (जैसे चाँद तोड़कर लाना)।
II. पश्चावर्ती असंभवता - अनुबंध के बाद कुछ ऐसी घटना घट जाए जिससे काम असंभव हो जाए (जैसे गायक की मृत्यु हो जाना या युद्ध छिड़ जाना)।
4. कानून के संचालन द्वारा समाप्ति -
यहाँ पक्षकारों की इच्छा के बिना कानून स्वयं अनुबंध समाप्त कर देता है:
I. मृत्यु - व्यक्तिगत कौशल वाले मामलों में।
II. दिवालियापन - यदि कोई पक्षकार कोर्ट द्वारा दिवालिया घोषित कर दिया जाए।
III. विलय - जब एक छोटा अधिकार बड़े अधिकार में मिल जाए (जैसे किराएदार ने वही घर खरीद लिया)।
5. उल्लंघन द्वारा समाप्ति -
जब कोई एक पक्षकार अपना वादा निभाने से मना कर देता है -
I. वास्तविक उल्लंघन - निष्पादन की तारीख पर मना करना।
II. प्रत्याशित उल्लंघन - काम पूरा होने की तारीख से पहले ही सूचित कर देना कि वह काम नहीं करेगा।
6. नवीनीकरण द्वारा समाप्ति - जैसा कि समझौते के बिंदु में बताया गया है, जब पुराने अनुबंध को पूरी तरह रद्द करके नया अनुबंध लाया जाता है, तो पुराना अनुबंध अपने आप समाप्त हो जाता है।
अर्ध अनुबंध (Quasi-Contract) -
भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 68 से 72 तक अर्ध-अनुबंध के बारे में प्रावधान दिए गए हैं। यह वास्तव में कोई अनुबंध नहीं होता, बल्कि कानून द्वारा थोपा गया एक दायित्व है। साधारण अनुबंध में पक्षकारों के बीच आपसी सहमति होती है, लेकिन अर्ध-अनुबंध में पक्षकारों के बीच कोई समझौता नहीं होता, फिर भी कानून उन्हें ऐसे बांध देता है जैसे उनके बीच कोई अनुबंध हुआ हो।
अर्ध अनुबंध की अवधारणा - अर्ध-अनुबंध साम्य और न्याय के सिद्धांत पर आधारित है। इसका मुख्य आधार यह कानूनी सूत्र है -
किसी भी व्यक्ति को दूसरे की हानि पर स्वयं को अनुचित रूप से धनी बनाने का अधिकार नहीं है।
(No man should grow rich out of another persons loss).
अर्ध अनुबंध का वर्गीकरण -
भारतीय अनुबंध अधिनियम के अनुसार यह 5 प्रकार के होते हैं -
1. अक्षम व्यक्तियों को आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति धारा 68 - यदि कोई व्यक्ति किसी ऐसे व्यक्ति को (जैसे नाबालिग या मानसिक रूप से अस्वस्थ) जीवन की आवश्यक वस्तुएं प्रदान करता है जो अनुबंध करने में अक्षम है, तो वह उसकी संपत्ति से पुनर्भुगतान पाने का हकदार है।
2. हितबद्ध व्यक्ति द्वारा भुगतान धारा 69 - यदि कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति के कानूनी देय का भुगतान करता है (क्योंकि उसमें उसका अपना हित जुड़ा है), तो वह उस व्यक्ति से पैसा वापस पाने का हकदार है।
उदाहरण - यदि कोई किराएदार अपने मकान मालिक का सरकारी टैक्स भर देता है ताकि घर नीलाम न हो, तो वह मालिक से यह पैसा वसूल सकता है।
3. गैर-अनुग्रहकारी कार्य का लाभ धारा 70 - यदि कोई व्यक्ति किसी के लिए स्वेच्छा से (मुफ्त में नहीं) कोई कार्य करता है और दूसरा व्यक्ति उसका लाभ उठाता है, तो उसे उस कार्य के लिए भुगतान करना होगा।
4. माल पाने वाले का दायित्व धारा 71 - यदि किसी व्यक्ति को रास्ते में किसी का खोया हुआ सामान मिलता है, तो उसके दायित्व वही होते हैं जो एक निक्षेपी के होते हैं। उसे सामान की रक्षा करनी चाहिए और उसके असली मालिक को खोजने का प्रयास करना चाहिए।
5. गलती या दबाव में दिया गया भुगतान धारा 72 - यदि किसी व्यक्ति को गलती से या डरा-धमका कर कोई पैसा या सामान दे दिया गया है, तो उसे वह वापस करना होगा।
अर्विध अनुबंध की शेषताएं -
1. यह आपसी सहमति से नहीं बल्कि कानून के संचालन द्वारा उत्पन्न होता है।
2. यह हमेशा पैसे के भुगतान के रूप में होता है।
3. यह अधिकार किसी विशेष व्यक्ति के विरुद्ध होता है, पूरी दुनिया के विरुद्ध नहीं।
संविदा भंग के उपचार धारा 73 से 75 - जब कोई पक्षकार अनुबंध की शर्तों को पूरा करने में विफल रहता है, तो उसे संविदा भंग कहा जाता है। भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 73 से 75 में पीड़ित पक्ष को मिलने वाले उपचारों का विस्तृत वर्णन है।
1. क्षतिपूर्ति या हर्जाना - यह सबसे सामान्य उपचार है। इसका उद्देश्य पीड़ित पक्ष को उसी वित्तीय स्थिति में पहुँचाना है जिसमें वह अनुबंध पूरा होने पर होता।
I. सामान्य हर्जाना - जो उल्लंघन से प्रत्यक्ष रूप से उत्पन्न होता है।
II. विशेष हर्जाना - जो किसी विशेष परिस्थिति के कारण होता है, जिसकी सूचना अनुबंध के समय दी गई हो।
III. दंडात्मक हर्जाना - यह बहुत कम मामलों में दिया जाता है (जैसे शादी करने के वादे को तोड़ना या बैंक द्वारा गलती से चेक बाउंस करना)।
2. क्षति की दूरस्थता - अप्रत्यक्ष या बहुत दूर के नुकसान के लिए हर्जाना नहीं मिलता। हैडली बनाम बैक्सेंडेल के मामले के अनुसार, केवल वही हर्जाना मांगा जा सकता है जो -
I. स्वभाविक रूप से उल्लंघन से उत्पन्न हुआ हो।
II. जिसकी कल्पना दोनों पक्षों ने अनुबंध के समय की थी।
3. क्षति का न्यूनीकरण - पीड़ित पक्ष का यह कानूनी कर्तव्य है कि वह उल्लंघन के बाद होने वाले नुकसान को कम करने के लिए उचित कदम उठाए। वह जानबूझकर नुकसान को बढ़ने नहीं दे सकता और फिर उसकी भरपाई की मांग नहीं कर सकता।
4. निर्धारित हर्जाना बनाम शास्ति -
I. निर्धारित हर्जाना - अनुबंध के समय तय की गई वह राशि जो संभावित नुकसान का एक वास्तविक अनुमान (Genuine pre-estimate) होती है।
II. शास्ति - एक बहुत बड़ी राशि जो केवल दूसरे पक्ष को डराने या सजा देने के लिए तय की जाती है। भारतीय कानून में अदालत केवल उचित मुआवजे की अनुमति देती है, भले ही राशि कितनी भी बड़ी तय की गई हो।
5. अन्य कानूनी उपचार
I. अनुबंध का विखंडन - पीड़ित पक्ष अनुबंध को रद्द कर सकता है और आगे के दायित्वों से मुक्त हो सकता है।
II यथावश्यक भुगतान - जितना काम उतना दाम। यदि अनुबंध बीच में टूट जाता है, तो पक्षकार अपने द्वारा किए गए कार्य के अनुपात में भुगतान मांग सकता है।
III. विशिष्ट निष्पादन - जब पैसों से नुकसान की भरपाई संभव न हो (जैसे कोई दुर्लभ वस्तु या जमीन), तो कोर्ट आदेश दे सकता है कि अनुबंध को ही पूरा किया जाए।
IV. निषेधाज्ञा - कोर्ट किसी पक्ष को वह काम करने से रोक सकता है जिसे न करने का उसने अनुबंध में वादा किया था।
UNIT IV
विनिर्दिष्ट अनुतोष (Specific Relief)
विनिर्दिष्ट अनुतोष का अर्थ है वह कानूनी उपचार जिसमें न्यायालय किसी पक्षकार को वही कार्य करने का आदेश देता है जिसका उसने अनुबंध में वादा किया था।
साधारण मामलों में, अनुबंध टूटने पर न्यायालय केवल हर्जाना (पैसे) दिलाने का आदेश देता है। लेकिन कई बार पैसा नुकसान की भरपाई के लिए काफी नहीं होता। ऐसी स्थिति में विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 के तहत विनिर्दिष्ट पालन का सहारा लिया जाता है।
अनुबंधों का विनिर्दिष्ट पालन - इसका मतलब है अनुबंध की शर्तों को अक्षरशः (As it is) लागू करवाना। यह न्यायालय का विवेकाधीन अधिकार है।
1. विनिर्दिष्ट पालन - न्यायालय इन स्थितियों में इसका आदेश दे सकता है -
I. जब नुकसान का आकलन संभव न हो - यदि अनुबंध टूटने से होने वाले वास्तविक नुकसान को पैसों में मापना असंभव हो।
II. जब पैसा पर्याप्त राहत न हो - जब वस्तु इतनी दुर्लभ या अद्वितीय हो कि उसे बाजार से पैसे देकर दोबारा नहीं खरीदा जा सकता।
उदाहरण - पूर्वजों की कोई पुरानी पेंटिंग, कोई खास ऐतिहासिक वस्तु, या किसी विशिष्ट स्थान की जमीन।
2. अचल संपत्ति के मामले - कानून यह मानकर चलता है कि जमीन या मकान के हस्तांतरण के अनुबंध के उल्लंघन की भरपाई केवल पैसों से नहीं की जा सकती। इसलिए, जमीन की खरीद-बिक्री के मामलों में न्यायालय अक्सर विनिर्दिष्ट पालन का आदेश देता है।
3. विनिर्दिष्ट पालन कब नहीं (धारा 14) - न्यायालय कुछ स्थितियों में इसे लागू करने से मना कर सकता है -
I. व्यक्तिगत कौशल - जहाँ काम व्यक्ति के हुनर पर निर्भर हो (जैसे किसी को गाना गाने या चित्र बनाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता)।
II. निरंतर निगरानी - जहाँ अनुबंध के पालन के लिए न्यायालय को लगातार निगरानी करनी पड़े (जैसे निर्माण कार्य)।
III. शून्यकरणीय अनुबंध - जो अनुबंध स्वभाव से ही खत्म होने वाले हों।
प्रमुख सुधार (2018 का संशोधन)
2018 के संशोधन के बाद, विनिर्दिष्ट पालन अब न्यायालय का केवल विवेकाधीन अधिकार नहीं रह गया है, बल्कि यह अनिवार्य बना दिया गया है। यानी अब अदालतों को विशेष परिस्थितियों को छोड़कर विनिर्दिष्ट पालन की अनुमति देनी ही होगी।
विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम Specific Relief Act 1963 की पालना -
विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम यह स्पष्ट करता है कि किन परिस्थितियों में कोर्ट अनुबंध को लागू करने का आदेश दे सकता है और किन मामलों में वह ऐसा करने से मना कर सकता है। यहां हम दोनों बिंदुओं की विस्तृत चर्चा करेंगे -
1. धारा 14 - अनुबंध जिन्हें विनिर्दिष्ट रूप से लागू नहीं किया जा सकता। इस धारा के अनुसार, निम्नलिखित अनुबंधों का विनिर्दिष्ट पालन नहीं करवाया जा सकता -
I. प्रतिस्थापित निष्पादन - यदि पीड़ित पक्ष ने धारा 20 के तहत किसी तीसरे पक्ष से वह काम करवा लिया है, तो वह मूल वचनदाता से उसे पूरा करने की मांग नहीं कर सकता।
II. व्यक्तिगत कौशल या हुनर - जहाँ अनुबंध की प्रकृति ऐसी है कि वह वचनदाता के व्यक्तिगत कौशल, विश्वास या इच्छा पर निर्भर करती है (जैसे - गाना गाना, शादी करना, या पेंटिंग बनाना)। कोर्ट किसी को कलात्मक कार्य के लिए मजबूर नहीं कर सकता।
III. निरंतर कर्तव्य - जहाँ अनुबंध के पालन के लिए ऐसे कार्य शामिल हैं जिन्हें न्यायालय लगातार मॉनिटर या सुपरवाइज नहीं कर सकता (जैसे: एक जटिल निर्माण कार्य जो सालों तक चलना है)।
IV. परिवर्तनीय प्रकृति - ऐसा अनुबंध जिसे कोई भी पक्षकार अपनी इच्छा से कभी भी समाप्त कर सकता है (जैसे - इच्छाधीन साझेदारी)।
2. विनिर्दिष्ट अनुबंधों को लागू करने वाले पक्ष - धारा 15 उन व्यक्तियों की सूची देती है जो कोर्ट जाकर अनुबंध के विनिर्दिष्ट पालन की मांग करने का कानूनी अधिकार रखते हैं:
I. अनुबंध का कोई भी पक्षकर - अनुबंध करने वाला कोई भी व्यक्ति (जैसे खरीदार या विक्रेता)।
II. हितों का प्रतिनिधि - यदि किसी पक्षकार की मृत्यु हो जाती है, तो उसका कानूनी वारिस या प्रतिनिधि। (बशर्ते अनुबंध व्यक्तिगत कौशल पर आधारित न हो)।
III. लाभार्थी - जहाँ अनुबंध किसी पारिवारिक समझौते के तहत किसी व्यक्ति के लाभ के लिए किया गया हो, भले ही वह अनुबंध का सीधा पक्षकार न हो।
IV. मर्ज के बाद बनी नई कंपनी - यदि दो कंपनियां आपस में मिल जाती हैं, तो नई बनने वाली कंपनी पुराने अनुबंधों को लागू करवा सकती है।
V. सीमित देयता भागीदारी (LLP) - यदि किसी फर्म को LLP में बदल दिया गया है, तो वह LLP उन अनुबंधों को लागू करवा सकती है जो पुरानी फर्म ने किए थे।
मुख्य अंतर: अधिकार और सीमा
घोषणात्मक वाद (Declaratory Suit)
घोषणात्मक वाद विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 की धारा 34 और 35 के तहत एक महत्वपूर्ण कानूनी उपचार है। यह एक ऐसा मुकदमा है जिसमें वादी कोर्ट से केवल यह प्रार्थना करता है कि न्यायालय उसके किसी कानूनी अधिकार या संपत्ति में अधिकार की आधिकारिक घोषणा कर दे। जब किसी व्यक्ति के कानूनी दर्जे या संपत्ति के हक पर कोई दूसरा व्यक्ति संदेह करता है या उसे चुनौती देता है, तो उस स्थिति को स्पष्ट करने के लिए घोषणात्मक वाद लाया जाता है।
1. घोषणात्मक वाद की शर्तें - धारा 34 के अनुसार, न्यायालय ऐसी घोषणा तभी करेगा जब -
I. कानूनी चरित्र - वादी के पास कोई कानूनी दर्जा या अधिकार हो (जैसे - दत्तक पुत्र होना, वैध उत्तराधिकारी होना, या किसी पद का हकदार होना)।
II. संपत्ति में अधिकार - वादी का किसी विशिष्ट संपत्ति में कोई कानूनी हक हो।
III. प्रतिवादी द्वारा इनकार - प्रतिवादी उस अधिकार का खंडन कर रहा हो या उसे नकारने की कोशिश कर रहा हो।
IV. अतिरिक्त अनुतोष - यदि वादी केवल घोषणा के अलावा कुछ और भी मांग सकता था (जैसे संपत्ति का कब्जा), तो उसे वह भी मांगना चाहिए। यदि वह केवल घोषणा मांगता है और कब्जा नहीं, तो कोर्ट डिक्री देने से मना कर सकता है।
2. धारा 35 - घोषणा का प्रभाव -
न्यायालय द्वारा दी गई घोषणा केवल निम्नलिखित पर बाध्यकारी होती है -
I. मुकदमे के पक्षकारों पर।
II. उन व्यक्तियों पर जो उन पक्षकारों के माध्यम से दावा करते हैं (जैसे उनके कानूनी प्रतिनिधि)।
III. यदि पक्षकार कोई ट्रस्टी है, तो उन व्यक्तियों पर जिनके लिए वह ट्रस्टी है।
विशेष - यह घोषणा पूरी दुनिया के विरुद्ध (Right in Rem) नहीं होती, बल्कि केवल संबंधित पक्षकारों के बीच (Right in Personam) प्रभावी होती है।
3. घोषणात्मक वाद के उदाहरण -
I. उत्तराधिकार की घोषणा - यह घोषित करना कि अ ही ब की संपत्ति का कानूनी वारिस है।
II. दत्तक ग्रहण - यह घोषित करना कि किसी बच्चे का गोद लिया जाना कानूनी रूप से वैध है।
III. वैधता - किसी व्यक्ति के जन्म की वैधता घोषित करवाना।
IV. पद का अधिकार - यह घोषणा करना कि कोई व्यक्ति किसी संस्था के अध्यक्ष पद का कानूनी हकदार है।
4. न्यायालय का विवेकाधिकार - घोषणात्मक डिक्री देना न्यायालय का विवेकाधीन अधिकार है। वादी इसे अधिकार के रूप में नहीं मांग सकता। यदि न्यायालय को लगता है कि घोषणा करने से कोई वास्तविक लाभ नहीं होगा या मामला संदिग्ध है, तो वह इनकार कर सकता है।
महत्वपूर्ण केस लॉ-
1. कार्लिल बनाम कार्बोलिक स्मोक बॉल कंपनी
यह मामला सामान्य प्रस्ताव और स्वीकृति के सिद्धांतों को स्थापित करता है।
मामले के तथ्य -
I. विज्ञापन - कार्बोलिक स्मोक बॉल कंपनी ने एक विज्ञापन निकाला जिसमें दावा किया गया कि उनकी स्मोक बॉल का निर्देशानुसार उपयोग करने पर किसी को भी इन्फ्लुएंजा (फ्लू) नहीं होगा।
II. ईनाम की घोषणा - कंपनी ने घोषणा की कि यदि कोई उनकी दवा का उपयोग करने के बाद भी बीमार पड़ता है, तो उसे 100 पाउंड का ईनाम दिया जाएगा।
III. गंभीरता का प्रमाण - कंपनी ने अपनी ईमानदारी दिखाने के लिए 1000 पाउंड अलायंस बैंक में जमा करा दिए।
श्रीमती कार्लिल - श्रीमती कार्लिल ने विज्ञापन पढ़कर दवा खरीदी और निर्देशों के अनुसार उपयोग किया, लेकिन फिर भी उन्हें इन्फ्लुएंजा हो गया। उन्होंने कंपनी से 100 पाउंड के ईनाम का दावा किया।
कंपनी का इनकार - कंपनी ने भुगतान करने से यह कहकर मना कर दिया कि उनका विज्ञापन केवल एक विज्ञापनी गप (Puffery) था और उनके बीच कोई औपचारिक अनुबंध नहीं हुआ था।
न्यायालय के मुख्य निर्णय - न्यायालय ने श्रीमती कार्लिल के पक्ष में फैसला सुनाया और निम्नलिखित कानूनी सिद्धांत स्थापित किए -
1. सामान्य प्रस्ताव - न्यायालय ने कहा कि प्रस्ताव पूरी दुनिया को दिया जा सकता है। इसे सामान्य प्रस्ताव कहते हैं। जो भी व्यक्ति प्रस्ताव की शर्तों को पूरा करता है, वह इसे स्वीकार कर लेता है।
2. स्वीकृति की सूचना - सामान्य तौर पर स्वीकृति की सूचना देना अनिवार्य है, लेकिन सामान्य प्रस्ताव के मामलों में, शर्तों का पालन करना ही स्वीकृति मान ली जाती है। इसके लिए अलग से सूचना देने की आवश्यकता नहीं होती।
3. प्रतिफल - कंपनी को दवा की बिक्री से लाभ हो रहा था और श्रीमती कार्लिल को दवा के उपयोग से असुविधा हुई, जो कि एक वैध प्रतिफल है।
4. गंभीर इरादा - बैंक में 1000 पाउंड जमा करना यह दर्शाता था कि कंपनी का इरादा केवल मजाक करना नहीं, बल्कि एक गंभीर कानूनी अनुबंध करना था।
निष्कर्ष - यह मामला यह सिद्ध करता है कि यदि कोई विज्ञापन विशिष्ट शर्तों के साथ ईनाम का वादा करता है, तो वह केवल एक विज्ञापन नहीं बल्कि एक कानूनी प्रस्ताव बन जाता है।
2. भगवानदास बनाम गिरधारी लाल एंड कंपनी, AIR 1966, SC 543
टेलीफोन पर किए अनुबंधों में प्रस्ताव और स्वीकृति के स्थान व समय को निर्धारित करता है।
मामले के तथ्य -
1. घटना - वादी (गिरधारी लाल एंड कंपनी) ने अहमदाबाद से टेलीफोन के माध्यम से प्रतिवादी (भगवानदास केडिया) को, जो खमगाँव में थे, कपास के बीज के तेल की आपूर्ति के लिए एक प्रस्ताव दिया।
2. स्वीकृति - प्रतिवादी ने टेलीफोन पर ही इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया।
3. विवाद - बाद में अनुबंध का उल्लंघन हुआ और अहमदाबाद की अदालत में मुकदमा दायर किया गया।
4. प्रतिवादी की आपत्ति - प्रतिवादी ने तर्क दिया कि अहमदाबाद की अदालत के पास अधिकार क्षेत्र नहीं है, क्योंकि अनुबंध खमगाँव में पूरा हुआ था, जहाँ स्वीकृति बोली गई थी।
5. कानूनी प्रश्न - क्या तात्कालिक संचार माध्यम (टेलीफोन) से किए गए अनुबंधों में स्वीकृति वहां पूरी मानी जाती है जहाँ वह बोली गई है, या वहां जहाँ वह सुनी गई है?
6. निर्णय - तीन जज की बेंच ने 2:1 के बहुमत से यह निर्णय दिया कि -
I. सुनना अनिवार्य है - टेलीफोन पर अनुबंध तभी पूर्ण होता है जब स्वीकृति की सूचना प्रस्ताव देने वाले व्यक्ति द्वारा सुन ली जाए।
II. अनुबंध का स्थान - अनुबंध उसी स्थान पर हुआ माना जाता है जहाँ स्वीकृति सुनी गई (अर्थात अहमदाबाद में), इसलिए अहमदाबाद की अदालत के पास सुनवाई का क्षेत्राधिकार था।
III. डाक नियम बनाम टेलीफोन नियम - न्यायालय ने स्पष्ट किया कि डाक द्वारा भेजे गए पत्रों के लिए लागू होने वाला नियम (जहाँ पत्र पोस्ट करते ही अनुबंध पूरा हो जाता है) टेलीफोन पर लागू नहीं होता। टेलीफोन आमने-सामने की बातचीत की तरह है।
7. अल्पमत की राय - न्यायमूर्ति हिदायतुल्लाह ने बहुमत से असहमति जताई। उनका मानना था कि भारतीय अनुबंध अधिनियम की धारा 4 के शब्दों को व्यापक रूप से लागू किया जाना चाहिए, जिससे अनुबंध वहां पूरा माना जाता जहाँ से स्वीकृति प्रसारित की गई थी।
प्रमुख सिद्धांत -
I. तात्कालिक संचार (टेलीफोन, टेलेक्स) के मामलों में स्वीकृति तब तक पूर्ण नहीं होती जब तक वह प्रस्तावक को प्राप्त न हो जाए।
II. स्वीकृति सुनने वाले के स्थान पर ही अनुबंध का स्थान निर्धारित होता है।
3. मोतीलाल पदमपत शुगर मिल्स बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, AIR, 1979 SC 621
यह वचनात्मक विबंध के सिद्धांत को स्थापित करने वाला सबसे मामला है।
मामले के तथ्य -
1. सरकारी आश्वासन - उत्तर प्रदेश सरकार ने एक समाचार विज्ञप्ति के माध्यम से घोषणा की कि राज्य में नए उद्योग लगाने वाले उद्यमियों को तीन साल के लिए बिक्री कर से छूट दी जाएगी।
2. कंपनी का कदम - इस आश्वासन के आधार पर, मोतीलाल पदमपत शुगर मिल्स ने वनस्पति घी का प्लांट लगाने के लिए भारी कर्ज लिया और काम शुरू कर दिया।
3. सरकार का पलटना - बाद में जब प्लांट लगभग तैयार हो गया, सरकार ने नीति बदल दी और टैक्स छूट देने से इनकार कर दिया।
4. विवाद - कंपनी ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और तर्क दिया कि सरकार अपने वादे से पीछे नहीं हट सकती, क्योंकि कंपनी ने उस वादे के आधार पर निवेश किया है।
5. न्यायालय का निर्णय - सुप्रीम कोर्ट ने न्यायमूर्ति पी.एन. भगवती के नेतृत्व में ऐतिहासिक फैसला सुनाया -
I. सरकार बाध्य है - कोर्ट ने कहा कि यदि सरकार ने कोई वादा किया है और किसी व्यक्ति ने उस वादे पर विश्वास करके अपनी स्थिति बदल ली है (जैसे निवेश किया), तो सरकार उस वादे से पीछे नहीं हट सकती।
II. प्रतिफल की आवश्यकता नहीं - वचनात्मक विबंध लागू होने के लिए किसी नए प्रतिफल की आवश्यकता नहीं है। केवल वादे पर किया गया भरोसा ही काफी है।
III. लोकहित का अपवाद - सरकार केवल तभी पीछे हट सकती है जब वह यह साबित कर दे कि वादे को निभाना लोकहित के विरुद्ध होगा, लेकिन केवल राजस्व की हानि को आधार बनाकर वादा नहीं तोड़ा जा सकता।
वचनात्मक विबंध (Promissory Estoppel) क्या है - यह एक न्यायसंगत सिद्धांत है जो कहता है कि - यदि पक्षकार A ने पक्षकार B को कोई स्पष्ट वादा किया है, और B ने उस पर भरोसा करके कोई कदम उठाया है, तो A बाद में यह नहीं कह सकता कि उनके बीच कोई औपचारिक अनुबंध नहीं था।
निष्कर्ष - इस मामले ने भारत में प्रशासनिक कानून को नई दिशा दी। इसने नागरिकों को सरकार के मनमाने फैसलों से सुरक्षा प्रदान की और शासन के न्याय को सर्वोपरि रखा।
4. मोहरी बीबी बनाम धर्मोदास घोष 1903 -
यह मामला नाबालिग (Minor) द्वारा किए गए अनुबंधों की कानूनी स्थिति को स्पष्ट करता है।
मामले के तथ्य -
1. ऋण और बंधक - धर्मोदास घोष, जो एक नाबालिग था, ने अपनी संपत्ति गिरवी रखकर एक साहूकार (ब्रह्मदत्त) से 20,000 पाउंड का ऋण लिया।
2. नाबालिग होने की जानकारी - ऋण देते समय साहूकार के एजेंट को यह पता था कि धर्मोदास घोष अभी नाबालिग है।
3. मुकदमा - बाद में धर्मोदास घोष ने अपनी माता के माध्यम से कोर्ट में अर्जी दी कि चूँकि वह अनुबंध के समय नाबालिग था, इसलिए गिरवीनामा रद्द किया जाए।
4. साहूकार का तर्क - साहूकार (जिसकी मृत्यु के बाद उसकी पत्नी मोहरी बीबी ने केस लड़ा) ने तर्क दिया कि यदि अनुबंध रद्द होता है, तो भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 64 और 65 के तहत नाबालिग को लिए गए पैसे वापस करने चाहिए।
5. प्रिवी काउंसिल का निर्णय - लॉर्ड नॉर्थ ने प्रिवी काउंसिल की ओर से निम्नलिखित निर्णय सुनाया -
I. पूर्णत शून्य (Void-ab-initio) - न्यायालय ने स्पष्ट किया कि नाबालिग के साथ किया गया कोई भी अनुबंध केवल शून्यकरणीय नहीं, बल्कि शुरू से ही शून्य होता है। कानून की नजर में इसकी कोई अहमियत नहीं होती।
II. धारा 64 और 65 लागू नहीं - चूँकि अनुबंध शुरू से ही शून्य था, इसलिए पैसे वापस करने का कोई कानूनी दायित्व नाबालिग पर नहीं बनता। धारा 65 केवल उन अनुबंधों पर लागू होती है जो शुरू में वैध थे लेकिन बाद में शून्य हुए।
III. विबंध का सिद्धांत (Rule of Estoppel) - नाबालिग के विरुद्ध विबंध का सिद्धांत लागू नहीं होता। यदि नाबालिग अपनी उम्र के बारे में झूठ भी बोलता है, तब भी उसे अनुबंध के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
7. प्रमुख सिद्धांत -
I. नाबालिग अनुबंध करने के लिए सक्षम नहीं है।
II. नाबालिग के साथ किया गया समझौता कानूनन अस्तित्वहीन होता है।
III. नाबालिग को अनुबंध के तहत मिले लाभ को लौटाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता (सिवाय उन मामलों के जहाँ लागू हो और नाबालिग ने छल किया हो, लेकिन इस केस में एजेंट को उम्र पता थी)।
5. सत्यव्रत घोष बनाम मुगनीराम बांगुर एंड कंपनी व अन्य, AIR 1954
यह मामला भारतीय अनुबंध अधिनियम की धारा 56 (Section 56) और 'असंभवता के सिद्धांत' (Doctrine of Frustration) की व्याख्या करने वाला सबसे महत्वपूर्ण सुप्रीम कोर्ट केस है।
मामले के तथ्य -
1. अनुबंध - मुगनीराम बांगुर एंड कंपनी ने एक प्लॉट को विकसित करने और उसे बेचने का अनुबंध किया था। सत्यव्रत घोष उस जमीन के खरीदार थे।
2. कंपनी का वादा - कंपनी ने वादा किया था कि वे जमीन पर सड़कें बनाएंगे और नालियों का निर्माण करेंगे।
3. युद्ध की स्थिति - द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, सरकार ने उस जमीन के एक बड़े हिस्से को सैन्य उद्देश्यों के लिए अधिग्रहित कर लिया।
4. कंपनी का तर्क - कंपनी ने तर्क दिया कि सरकार द्वारा जमीन लेने के कारण अब विकास कार्य करना असंभव हो गया है, इसलिए अनुबंध निष्फल होकर समाप्त हो गया है।
5. सुप्रीम कोर्ट का निर्णय - न्यायमूर्ति बी.के. मुखर्जी ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कंपनी के तर्क को खारिज कर दिया और निम्नलिखित सिद्धांत दिए -
I. असंभव' शब्द का व्यापक अर्थ - न्यायालय ने कहा कि धारा 56 में असंभव शब्द का अर्थ केवल शारीरिक असंभवता नहीं है। इसका अर्थ व्यावहारिक असंभवता भी है। यदि अनुबंध का मूल आधार ही खत्म हो जाए, तो उसे असंभव माना जाएगा।
II. अस्थाई बाधा - कोर्ट ने पाया कि सेना द्वारा जमीन का अधिग्रहण केवल अस्थाई था। अनुबंध में कोई निश्चित समय सीमा नहीं थी। अतः, युद्ध के बाद काम पूरा किया जा सकता था। केवल काम में देरी होना या काम का कठिन हो जाना नहीं कहलाता।
III. खारिज (खंडन) का सिद्धांत - अनुबंध तभी समाप्त माना जाएगा जब कोई ऐसी घटना घटे जो अनुबंध के मूल उद्देश्य को ही नष्ट कर दे।
निष्कर्ष - इस केस ने यह स्पष्ट कर दिया कि अनुबंध से बचने के लिए केवल 'कठिनाई' का बहाना नहीं बनाया जा सकता। जब तक अनुबंध का पालन करना पूरी तरह से नामुमकिन न हो जाए, तब तक पक्षकार अपने दायित्वों से मुक्त नहीं होते।
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नोट्स - LLB सेमेस्टर प्रथम
द्वारा - शमशेर भालू खां
छात्र - LLB प्रथम सेमेस्टर 2025
296 सदफ आशियाना, कायमखानी बस्ती, सहजूसर (चूरू)
9587243963
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संदर्भ एवं स्त्रोत -
I. पुस्तक - संविदा - I एवं विर्निदिष्ट अनुतोष अधिनियम
प्रकाशक - सेंट्रल लॉ एजेंसी, प्रयागराज
II. Dr. अनिल कुमार - व्याख्याता राजकीय लॉ कॉलेज चूरू (संविदा विधि) राजकीय विधि महाविद्यालय, चूरू
III. एडवोकेट अंजलि
IV. भारत का संविधान
V. विभिन्न आलेख एवं पत्रिकाएं
VI. ऑनलाइन प्लेटफॉर्म
VII. गूगल जैमिनाई
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