Tuesday, 21 October 2025

मदरसा मकतब

मकतब मदरसा एवं जामिया
 (आधुनिक शिक्षण केंद्र)
शिक्षा एवं शिक्षण की शुरुआत -
हम जानते हैं कि मानव ने सब से पहले पढ़ना, लिखना एवं लिखे हुए को सुरक्षित रखने की शुरुआत अरब क्षेत्र के बेबीलोन (मेसोपोटामिया) इराक से की थी। यहां मानव ने कीलाक्षर लिपि में मिट्टी को पट्टियों पर लिख कर उसे आग में तपा कर सुरक्षित किया। बाद में ताड़ पत्तों या अन्य माध्यमों पर लिख कर सुरक्षित करने की शुरुआत हुई। इस से पहले आदि मानव ने गुफाओं में भित्ति चित्रों के माध्यम से लिख कर संदेश पहुंचाने की शुरुआत की।
विश्व की प्राचीनतम भाषा इब्रानी (परिष्कृत रूप अरबी व फारसी) का प्रारंभ इसी क्षेत्र में हुआ। यहीं यहूदी, ईसाई एवं इस्लाम धर्म का उदय हुआ।
इस्लाम धर्म में शिक्षा का महत्व -
इस्लाम धर्म में शिक्षा को अति महत्व दिया गया है। कुरान में पहली आयात इकरा बिस्मी रब्बी कल्लजी ख़लक से हुई है। इस का अर्थ है पढ़ो अपने रब के नाम से। नबी मोहम्मद साहब ने हर मुस्लिम को पढ़ना चाहिए चाहे इसके लिए तुम्हें चीन तक जाना पड़े। इस्लाम में एक वाक्य गोद से गौर तक पढ़ो। अर्थात् पढ़ने की कोई उम्र नहीं होती। ज्ञान (इल्म) हासिल करना हर मर्द और औरत पर फ़र्ज़ किया गया। आज भी संसार का 90% मुसलमान अरबी पढ़ना जानता है जिसमें महिलाओं का % अधिक है। प्रारंभिक गणित अरेबियन अंक एवं एल्गोरिथम (अलजेब्रा) अरब क्षेत्र की देन है।
दारुलउलूम शब्द एवं अर्थ -
दारुलउलूम शब्द अरबी भाषा के तीन शब्दों के मेल से बना है 
- दार (दर का बहुवचन) - घर/केंद्र/संस्थान
- उल - (कारक) का 
- उलूम (इल्म का बहुवचन) - ज्ञान
इस शब्द का अर्थ हुआ शिक्षा का घर/ शिक्षण संस्थान/ शिक्षण केंद्र/ज्ञानालय
जैसे एक मदरसे का नाम है दारुलउलूम देवबंद तो इसका हिंदी में अर्थ है देवबंद शहर का शिक्षण संस्थान/ पाठशाला/स्कूल
ज्ञान और इस्लाम - 
इस्लाम में हर बात पढ़ने लिखने पर निर्भर है। 
- नबी मोहम्मद साहब की बेटी फातिमा हर दिन स्त्रियों को पढ़ाने हेतु उनके घर जाती या अपने घर बुलाती थीं।
- पहली जंग में जीत के बाद बंदी बनाए गए लोगों को हर कैदी को दस मुसलमानों को पढ़ाने की शर्त पर रिहा किया गया।
- मोहम्मद साहब ने मुस्लिम युवाओं को यहूदियों के पास छात्रवृति दे कर पढ़ने हेतु भेजा। 
- मुसलमानों को पढ़ाने वाले यहूदियों को कुछ छूट (सहूलियत) दी गईं।
- मस्जिद ए नबवी में बाकायदा पढ़ने - पढ़ाने की व्यवस्था की गई।
- मुस्लिम युवाओं को पढ़ने हेतु रोम एवं परसिया भेजा गया।
इस से यह साबित होता है कि इस्लाम धर्म में शिक्षा को अति महत्व दिया गया।
कुरान, हदीस, खुत्बा, एवं शरीयत सभी लिखने पढ़ने पर निर्भर हैं।
इस्लाम में लिखने पढ़ने हेतु *पांच स्तरीय* व्यवस्था की जाती है।
A. मस्जिद
B. दर्शगाह
C. मकतब
D. मदरसा
E. जामिया
A. मस्जिद (Academic Education Centre) -
अरबी भाषा के मस्जिद शब्द का अर्थ है सजदा करने का स्थान। अंग्रेजी में इसे MOSQUE कहा जाता है। मस्जिद पूजा (इबादत) स्थल के साथ - साथ सीखने - सिखाने का महत्वपूर्ण संस्थान रहा है। इबादतगाह में ही ज्ञान एवं सांस्कृतिक विकास के केंद्र को मस्जिद कहते हैं। मस्जिद से सामाजिक, धार्मिक और शैक्षिक गतिविधियों का संचालन किया जाता है। कुछ मस्जिदों ने विश्वविद्यालयों की स्थापना में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मस्जिद में उस स्थान के विकास एवं भलाई के कार्यों की योजना बनाई जाती है। मस्जिद सिर्फ नमाज के नहीं सम्पूर्ण विकास हेतु आपसी चर्चा के स्थान होते हैं।
यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि हर मस्जिद एक पाठशाला है।
B दर्शगाह (Litrecy Centre) - 
पीर - फकीर एवं सूफियों (हिंदी में ऋषि - मुनि) ने ज्ञान (इल्म) के प्रसारण हेतु दर्शगाह स्थापित किए। यहां पर किसी को भी सीखने हेतु आने की स्वतंत्रता थी। इन्हीं दर्शगाहों के कारण इस्लाम इतनी तेजी से सम्पूर्ण संसार में फैला।
प्राथमिक विद्यालय/ Primary School - इस्लाम धर्म में परिवार को प्राथमिक पाठशाला माना जाता है और मां को प्राथमिक शिक्षक। बालक को परिवारिक माहौल में जीवनोपयोगी शिक्षा की व्यवस्था माता द्वारा की जाती है। इसी लिए कहा जाता है कि मां हमारी पहली उस्ताद है और मां के पैरों के नीचे जन्नत है।
C. मकतब (Uppar Primary School/उच्च प्राथमिक विद्यालय)- 
मकतब अरबी शब्द है जिसका अर्थ है पाठशाला जिसे अंग्रेजी में SCHOOL कहते हैं। मकतब अरबी शब्द कतबा (लिखना) से बना है जिससे किताब/कुतुब (पुस्तक) शब्द प्रचलित हुआ। किताब शब्द का अर्थ है लिखा हुआ।
मकतब प्रारंभिक शिक्षा (Elementry Education) का केंद्र होता है। हर बस्ती में मस्जिद के साथ ही एक मकतब की स्थापना की जाती है। आज का मुस्लिम बच्चा अंग्रेजी माध्यम हो या अन्य माध्यम के स्कूल में जा कर सुबह या शाम को मकतब में जरूर जाता है। यहां अरबी/फारसी/उर्दू भाषाओं को पढ़ना - लिखना सीखता है। मकतब मुस्लिम जगत के प्राथमिक विद्यालय हैं जहाँ बच्चों को पढ़ना, लिखना (विशेषकर कुरान) सिखाया जाता है। यहां कुरान की तिलावत(वाचन/पठन) के साथ प्रारंभिक व्याकरण सिखाया जाता है। मकतब में जीवन का प्रारंभिक ज्ञान दिया जाता है ना कि केवल इस्लामिक पूर्व ज्ञान।
वर्मतमान में मकतब का उद्देश्य बच्चों को केवल धार्मिक शिक्षा प्रदान करना रह गया है जो इसके अर्थ को सही साबित नहीं करता है।
D. मदरसा (Senior Secondary school/ उच्च माध्यमिक विद्यालय) - 
मदरसा शब्द दरस शब्द से बना है जिसका मूल तदरीस है। तदरीस का अर्थ है ज्ञान देना। मदरसा माध्यमिक शिक्षा का केंद्र होता है। आधुनिक काल में हम इसे सीनियर सेकंडरी स्कूल कह सकते हैं। मदरसे में कुरान, हदीस और शरीयत (इस्लामी कानून) के साथ ही भाषा, विज्ञान एवं कला की शिक्षा भी दी जाती है। आमजन में अवधारणा है कि मदरसा केवल धार्मिक शिक्षा प्रदान करता है, इसके साथ अन्याय है।
मकतब और मदरसा में अंतर - 
- मकतब में बच्चे स्थानीय स्तर पर (घर के निकट) प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करते हैं जबकि मदरसा में माध्यमिक स्तर की शिक्षा प्रदान की जाती है। 
- मकतब शब्द का अर्थ है लिखना और मदरसा शब्द का अर्थ है ज्ञान का केंद्र।
- मकतब में कोई डिग्री नहीं दी जाती जबकि मदरसे में पढ़ाई पूरी करने पर डिग्री प्रदान की जाती है।
- मकतब शिक्षा के अनौपचारिक केंद्र होते हैं जिनकी व्यवस्था स्थानीय स्तर पर वास स्थान के निवासी करते हैं। जबकि मदरसे औपचारिक शिक्षा केंद्र होते हैं। 
हर बस्ती में मस्जिद के साथ मकतब अवश्य स्थापित होता है परन्तु हर मस्जिद के साथ मदरसा स्थापित हो यह आवश्यक नहीं। हां हर मदरसे में मस्जिद अवश्य हो सकती है।
E. जामिया (कॉलेज/यूनिवर्सिटी) व्यवस्था - 
जामिया शब्द की उत्पत्ति अरबी भाषा से हुई है, जिसका अर्थ है संगठन या सभा। जामिया शब्द का सही भावार्थ है विश्वविद्यालय जिसे अंग्रेजी में University कहते हैं। यह शब्द अरबी मूल के जमा (एकत्रित करना) से (संगठन/समूह बनाना) से संदर्भित है जिसका वास्तविक मूल अर्थ है सभा या समूह। जैसे किताबुल जामिया का अर्थ है किताबों का समूह, जामा मस्जिद (उस क्षेत्र की सभी मस्जिदों का केंद्र)।
शिक्षा और इस्लाम धर्म -
इस प्रकार से इस्लाम धर्म में मस्जिद से जामिया तक शिक्षा के विभिन्न क्षेत्र स्थानीय से वैश्विक केंद्र के रूप में काम करते हैं।
आजकल फैशन हो गया है कि हर कोई मुस्लिम को शिक्षित होने के प्रवचन करता है। इसके लिए जिम्मेदार मुस्लिम शिक्षा प्रणाली नहीं स्वयं मुस्लिम समाज है। 
मुस्लिम समाज ने उक्त पांचों केंद्रों को विस्तारित रुके स्थान पर संकुचित रूप में काम लेना शुरू कर दिया। धीरे -धीरे यह केंद्र सम्पूर्ण शिक्षा प्रणाली के स्थान पर धार्मिक शिक्षा के केंद्र बन कर रह गए।
यह स्थिति वही है जो प्राचीन भारत में ऋषिकुल एवं गुरु के आश्रम में शिक्षा व्यवस्था की रही जहां राजा का बेटा या ब्राह्मण ही शिक्षा ले सकता था अन्य नहीं। इसका नतीजा यह हुआ कि आज ऋषिकुल व्यवस्था लुप्तप्रायः हो गई है। 
मुसलमानों ने यदि समय रहते मकताब और मदरसा को (मजहब) धर्म के जाल से नहीं निकाला तो आने वाले समय में यही हालत इनकी होगी।
इसके बरअक्श (विपरीत) मिशनरी व्यवस्था ने अपने आप में परिवर्तन कर ऋषिकुल एवं मदरसा व्यवस्था में परिवर्तन कर (किंडर गार्डन, नर्सरी, मिशन स्कूल, यूनिवर्सिटी) की स्थापना कर लगभग सभी वैश्विक शिक्षा केंद्रों पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया है।
मिशनरीज ने व्यवस्था के स्थान पर सोच में बदलाव किया है। आज हर सनातनी, मुस्लिम, फारसी, चीनी, जैन, बौद्ध या सिक्ख अपने बच्चे को मिशनरी स्कूल में भेजना चाहता है। वहीं दूसरी ओर मदरसे या ऋषिकुल छात्रों के प्रवेश हेतु तरस रहे हैं। जो इनमें प्रवेश लेते हैं वो केवल धार्मिक (मजहबी) ज्ञान प्राप्त करने के उद्देश्य से आते हैं। साधारण आम मदरसों को आज केवल कायदा, कुरान या दीनी शिक्षा का केंद्र बना कर छोड़ दिया गया है जहां मौलवी हाफिज या मुफ्ती पैदा होते हैं। इसका पुराना स्वरूप था कि मदरसों में वैज्ञानिक, लेखक, समाजशास्त्री, चिंतक एवं विचारक पैदा होते है। दर्शगाह एवं मदरसे वो जगह हैं जहां से अल बरुनी व इब्ने बतुता, खुसरो, अब्दुल रहीम खान खाना, रसखान, डॉक्टर जाकिर हुसैन, डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद, लाल बहादुर शास्त्री, बृजनारायण चकबस्त, प्रेमचंद तैयार होते थे। मदरसे धार्मिक कट्टरता के नहीं सहिष्णुता के स्थान हुआ करते थे। आज मदरसा नाम आते ही मुस्लिम के अलावा अन्य समाज में एक अलग तस्वीर खींच जाती है। इस तस्वीर के लिए जिम्मेदार केवल और केवल मौलवी या धार्मिक कट्टर व्यक्ति हैं। 
मदरसों में शिक्षण व्यवस्था -
1. तालिब ए इल्म - (छात्र)
मकतब या मदरसों में पढ़ने वाले छात्रों को अरबी/उर्दू में तालिब ए इल्म कहते हैं। बहुत सारे मदरसे इन तालिब ए इल्म के रहने, खाने व अन्य आवासीय व्यवस्थाएं वहीं पढ़ने के स्थान पर करते हैं।
2. मदरिस
तदरीस का काम करने वाला (गुरु) को मदरिस कहते हैं। यहां तादरीस और शिक्षा (तालीम) में अंतर है। तदरिस क्या, क्यों और कैसे का जवाब देती है जबकि तालीम (शिक्षा) केवल पढ़ने - लिखने तक सीमित है। तदरिस के बाद आमदी इंसान बनता है जो प्रकृति के साथ आधुनिक जीवन को संकलित करता है। शिक्षा केवल जानकारी है। तदरीस जानकारी का जीवनोपयोग है।
*3. उस्ताद* (विशेषज्ञ शिक्षक/ लेक्चरर)- मदरिस बालक को आरंभिक ज्ञान प्रदान करता है। छात्र को विषय विशेष में महारत (पारंगत) हासिल करने हेतु उस्ताद के पास जाना होता है। उस्ताद अपने विषय के विशेषज्ञ होते हैं जैसे स्कूल में लेक्चरर।
मदरसों में डिग्रियां -
मदरसों में कई डिग्रियों के कोर्स उपलब्ध होते हैं जिनमें
1. मौलवी
2. आलिम
3. फाजिल
4. कामिल
5. हाफ़िज़ 
6. मुफ़्ती 
7. कारी
8. कुतुब
9. क़ाज़ी 
10. मुहद्दिश 
1. मौलवी/मुंशी (महिला - मोअल्लिमा)
मौलवी दसवीं स्कूल तक का पाठ्यक्रम पूर्ण करने के बाद मिलने वाली डिग्री को मौलवी की डिग्री कहते हैं।
2. आलिम (महिला - आलिमा)
मदरसों में आलिम की डिग्री इंटरमीडिएट (बारहवीं कक्षा) स्तर की पढ़ाई का प्रमाण पत्र कार्यक्रम है। 
3.फाजिल (महिला फाजिला) - 
यह B. A. (स्नातक) स्तर के पाठ्यक्रम को पूर्ण करने के बाद मिलने वाला प्रमाण पत्र है।
4. कामिल (महिला कामिला) -
कामिल शब्द का अर्थ है सामान्य विषयों में मास्टर (ज्ञाता/जानकार)। यह डिग्री (मास्टर डिग्री) (स्नातकोत्तर) पाठ्यक्रम पूर्ण करने पर दी जाती है।
मदरसों में धार्मिक शिक्षा के लिए कुरान, हदीस, फिकह और तफसीर की पढ़ाई कराई जाती है. 
यहां तक (इन चार डिग्रियों में) धर्मशास्त्र अनिवार्य विषय के रूप में पढ़ाया जाता है।
 इन डिग्रियों के करने के बाद छात्र को अरबी/उर्दू/फारसी साहित्य के साथ -साथ गणित, विज्ञान, होम साइंस, तर्क और दर्शन कोई एक अन्य भाषा की शिक्षा भी दी जाती है।
5. हाफ़िज़ (हाफिज़ा) -
हाफ़िज़ शब्द का अर्थ है सुरक्षित करने वाला। हाफ़िज़ की डिग्री विशेषज्ञता (विशेष योग्यता) की डिग्री है। इस डिग्री को प्राप्त करने हेतु कुरान के तीस पारे अक्षरशः याद (कंठस्थ) करने पड़ते हैं। यह डिग्री लगभग तीन वर्ष में पूर्ण हो जाती है।
6. मुफ़्ती -
फ़िकह का जानकार। मुफ्ती को फतवा जारी करने का अधिकार होता है। फतवा शब्द का अर्थ है कुरान और हदीश के संदर्भ में धर्मादेश या धर्म के अनुसार राय।
मुफ्ती एक इस्लामी विद्वान होता है जो इस्लामिक कानून (शरिया) की व्याख्या और विश्लेषण करता है और आधिकारिक कानूनी राय (फतवा) देने के योग्य होता है।
फतवा (कानूनी राय/ शरीयत के अनुसार)-
मुफ्ती आधिकारिक कानूनी राय (फतवा) देता है, जो किसी निजी व्यक्ति या मुंसिफ द्वारा की गई पूछताछ के जवाब में दी जाती है। मुफ्ती की डिग्री आलिम से उच्च होती है।
7. कारी -
इस्लाम में कारी शब्द का अर्थ है पढ़ने वाला। अर्थात् कुरान को सुंदर और सही तरीके से पढ़ने वाला। यह कोई डिग्री या पद नहीं है। इस्लाम में यह विशेष रूप से कुरान को सुंदर और सही तरीके से पढ़ने वाले व्यक्ति के लिए इस्तेमाल किया जाता है। बल्कि यह एक व्यक्ति की योग्यता और कौशल को दर्शाता है कारी कुरान को सही ढंग से पढ़ने और सुनाने में होती है। कोई भी व्यक्ति कुरान को अच्छी तरह से पढ़कर और सही तरीके से सुनाकर कारी बन सकता है।
8. कुतुब
इस्लाम में कुतुब शब्द के कई मतलब होते हैं। कुतुब शब्द का मतलब है धुरी/ ध्रुव।
कुतुब का मतलब आकाशीय गति भी हो सकता है।
सूफ़ीवाद में, कुतुब एक आदर्श इंसान होता है, जिसे अल-इंसान अल-कामिल यानी सार्वभौमिक मनुष्य'कहते है। उत्तर भारत में वर्तमान हरियाणा में चार कुतुब मशहूर हैं। कुतुबिज्म एक इस्लामी विचारधारा है, जो सूफिज्म का ही एक भाग है। सैय्यद कुतुब के ग्रंथों में कुतुबिज्म का वर्णन है।
9. क़ाज़ी
काजी का कोई कोर्स या डिग्री नहीं होती। इस पद के मनोनयन होता है, जो शहर के बुद्धिजीवी मजहबी विद्वान करते हैं। उन्होंने कहा कि काजी के जिम्मे जो काम हैं, उसके लिए आलिम, फाजिल, मुफ्ती होना जरूरी है और ये सब डिग्रियां हासिल करने में 25 साल की पढ़ाई करनी होती है। इन डिग्रियों के लिए न्यूनतम योग्यता अरबी जानना जरूरी है। मौलाना सैफुल्लाह ने फतावा आलमगीरी बहार-ए-शरीअत, 12वां हिस्सा, पेज नंबर 58 के हवाले से बताया कि इस्लामी हुकूमत वाले देश में बादशाह की ओर से जिस व्यक्ति को लोगों को लड़ाई-झगड़ों का फैसला करने के लिए नियुक्त किया जाता है। फतावा रजविया, फतावा अमजदिया फतावा फैजुर्रसूल के हवाले से उन्होंने कहा कि जहां इस्लामी हुकूमत नहीं है (या लोकतंत्र है), वहां उलमाए बलद (शहर के इस्लामी विद्वान) अपने में से वरिष्ठतम व्यक्ति का चुनाव कर काजी मुकर्रर करते हैं। इस हदीस से पता चलता है कि काजी का पद मनोनीत होता है। मुंबई के एक मदरसे दारुल उलूम निसवां में 30 औरतें काजी बनने के लिए जरूरी इस्लामिक ट्रेनिंग ले रही हैं। दारुल उलूम निसवां की ट्रस्टी जकिया सोमण और नूरजहां नियाजी का कहना है कि मुस्लिम औरतों के हितों की रक्षा के लिए जरूरी है कि औरतें भी काजी बनें। मदरसे में यह पहला बैच है, जिसमें मुस्लिम औरतों को कुरान की समझ के साथ इस्लामिक कानूनों और भारत के संविधान की जानकारियां दी जा रही हैं। उनका मानना है कि जब औरतें काजी होंगी तो तीन तलाक और हलाला का गलत इस्तेमाल नहीं होगा। भारत के प्रमुख मुस्लिम संगठन जमात-ए-इस्लामी हिंद ने कहा कि औरतों को काजी बनाए जाने पर विवाद गैरजरूरी है। 
10. मुहद्दिश
हदीश के जानकार (विशेषज्ञ) की डिग्री।

*कुतुबखाना (पुस्तकालय, Librery)-*
मदरसों में ज्ञान को सहेज कर रखा जाता है। हर मदरसे में सभी विषयों की पुरानी या नई सभी प्रकार की पुस्तके मिल जाती हैं। छात्र यहां इनका अध्ययन करते हैं।

भारत में आधुनिक शिक्षा से कदम मिलाते मुस्लिम शिक्षण संस्थान -
उन्होंने पत्थर-दर-पत्थर और बलिदान-दर-बलिदान जामिया मिलिया का निर्माण किया।
- भारत कोकिला सरोजिनी नायडू 
जामिया मीलिया इस्लामिया भारत के सबसे प्रगतिशील शैक्षणिक संस्थानों में से एक है।
- रवीन्द्र नाथ टैगोर
जामिया को चलना ही होगा। अगर आपको इसके वित्त की चिंता है, तो मैं भीख का कटोरा लेकर चलूंगा।
- महात्मा गांधी (जामिया मीलिया इस्लामिया के आर्थिक संकट के समय उद्बोधन)
जब उनके पास निर्माण करने की लालसा थी पर आर्थिक रूप से कमजोर थे तब मैं जामिया के साथ था।
- डॉक्टर जाकिर हुसैन (राष्ट्रपति बनने के बाद)
स्वतंत्रता पूर्व भारत में एक छोटे से संस्थान से नई दिल्ली में स्थित एक केंद्रीय विश्वविद्यालय बनने की कहानी -
1. जामिया मिलिया इस्लामिया
(ऑक्सफोर्ड ऑफ इंडियन मुस्लिम) - 
जामिया मिलिया इस्लामिया (राष्ट्रीय मुस्लिम विश्वविद्यालय) का नाम अरबी शब्द से लिया गया है। शब्द जामिया का अर्थ विश्वविद्यालय और मिलिया का अर्थ है राष्ट्रीय। यह विश्वविद्यालय मध्ययुगीन मदरसे से अलग होत है। आधुनिक विश्वविद्यालयों को मध्ययुगीन मदरसों से अलग करने के लिए जामिया शब्द का प्रयोग किया जाता है।
जामिया मिलिया इस्लामिया शुक्रवार 29 अक्टूबर 1920 में भारत के उत्तर प्रदेश के शहर अलीगढ़ में स्थापित संस्थान है। 22 नवंबर 1920 को हकीम अजमल खान को जामिया का पहला चांसलर चुना गया। मोहम्मद अली जौहर जामिया के पहले कुलपति बने। इसे 1988 में संसद ने अधिनियम पारित कर केंद्रीय विश्वविद्यालय के रूप में मान्यता दी जहां नर्सरी कक्षा से उच्च शिक्षा प्रदान की जाती है। यह विश्वविद्यालय उन लोगों के समर्पण, दृढ़ विश्वास और दूरदर्शिता का परिणाम है जिन्होंने अनेकों बाधाओं के बावजूद कदम साबित रखे। गुलाम भारत के राजनैतिक एवं सामाजिक परिदृश्य में सुधार हेतु पश्चिमी विश्वविद्यालयों में पढ़ कर आने वाले स्वतंत्रता आंदोलन के सैनिकों ने भारत के मुस्लिम समाज को मध्ययुगीन विचारधारा से पृथक कर आधुनिक शिक्षा पद्धति की स्थापना हेतु इस विश्वविद्यालय का निर्माण किया। इसके प्रेरक रहे महात्मा गांधी एवं खिलाफत आंदोलन। असहयोग आंदोलन के अंतर्गत ब्रिटिश सरकार द्वारा संचालित शिक्षण संस्थाओं के बहिष्कार के फलस्वरूप भारतीय संस्थानों की स्थापना में एक कड़ी थी जामिया मीलिया इस्लामिया, अलीगढ़।
इसके स्थापक सदस्य थे -
1. डॉ. मुख्तार अहमद अंसारी (दिल्ली)
2. मुफ़्ती कफ़ायतुल्लाह (दिल्ली)
3. मौलाना अब्दुल बारी फरंग महली (यूपी)
4. मौलाना सुलेमान नदवी (बिहार)
5. मौलाना शब्बीर अहमद उस्मानी (यूपी)
6. मौलाना हुसैन अहमद मदनी (यूपी)
7. चौधरी ख़लीक़-उज़-ज़मां (यूपी)
8. नवाब मोहम्मद इस्माइल खान
9. तसद्दुक हुसैन खान (यूपी)
10. डॉ. मोहम्मद इकबाल (पंजाब)
11. मौलाना सनाउल्लाह खान अमृतसरी (पंजाब)
12. डॉ. सैफुद्दीन किचलू (पंजाब)
13. मौलाना अबुल कलाम आज़ाद (बंगाल और बिहार)
15. डॉ. सैयद महमूद (बंगाल और बिहार)
16. सेठ अब्दुल्ला हारून कराचीवाले (सिंध, बॉम्बे और हैदराबाद)
17. अब्बास तैयबीजी (सिंध, बॉम्बे और हैदराबाद)
18. सेठ मियां मोहम्मद हाजी जाम छोटानी (सिंध, बॉम्बे और हैदराबाद)
19. मौलवी अब्दुल हक (सिंध, बॉम्बे और हैदराबाद)
जामिया मीलिया इस्लामिया के सदस्यों ने स्वतंत्रता आंदोलन बारडोली सत्याग्रह में बढ़ चढ़ कर भाग लिया। 1922 में गांधीजी ने असहयोग आंदोलन को वापस ले लिया और 1924 में मुस्तफा कमाल अतातुर्क ने खिलाफत की समाप्ति की घोषणा कर दी।
इस से खिलाफत द्वारा दी जाने वाली वित्तीय सहायता बंद हो गई। प्रमुख लोगों ने इसे छोड़ना शुरू कर दिया। वित्तीय एवं राजनैतिक सकंट से उबरने हेतु 1925 में जामिया करोल बाग दिल्ली में स्थानांतरित हो गया। जामिया ने आत्मनिर्भरता के लिए गांधीजी के रचनात्मक कार्यक्रम का अनुसरण किया और चरखा और तकली को अपना पसंदीदा पेशा बना लिया। कठिन समय में हकीम अजमल खान ने जामिया के अधिकांश खर्चों को अपनी जेब से वहन किया। डॉ. एमए अंसारी और अब्दुल मजीद ख्वाजा ने भारत और विदेश का दौरा किया, जामिया के महत्व को समझाया और जामिया के लिए धन इकट्ठा किया।
1. डॉ. जाकिर हुसैन (बर्लिन विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट)
2. डॉ. आबिद हुसैन ((बर्लिन विश्वविद्यालय से शिक्षा में डॉक्टरेट)
3. डॉ. मोहम्मद मुजीब ( ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से इतिहास एवं बर्लिन विश्वविद्यालय से मुद्रण में डॉक्टरेट)
वर्ष 1925 से जर्मनी में अध्ययन कर रहे तीनों दोस्त फरवरी 1926 में नॉर्डड्यूशर लॉयड स्टीमर, एसएस डेरफ्लिंगर द्वारा जामिया के लिए जर्मनी से चले गए। आबिद हुसैन और मोहम्मद मुजीब को 300 रुपए व जाकिर हुसैन को 100 मासिक वेतन की पेशकश की गई परन्तु इन्होंने 100 रुपए व जाकिर हुसैन ने 80 रुपए मासिक वेतन लिया। इन तीनों ने पहला कदम उठाया वयस्क शिक्षा हेतु सायं कालीन कक्षाएं लगाना। 1926 में जाकिर हुसैन इसके कुलपति बने। यहां के शिक्षकों ने डॉक्टर जाकिर हुसैन के नेतृत्व में 150 रुपए वेतन में काम शुरू रखा जो जामिया के आजीवन सदस्य बने। 
1928 में जामिया ने मुद्रण एवं प्रकाशन विभाग को तीन भाग 
1. जामिया प्रेस दरियागंज मुखिया प्रोफेसर मोहम्मद मुजीब
2. जामिया उर्दू अकादमी मुखिया डॉ. आबिद हुसैन 
3. मकतब ए जामिया मुखिया हामिद अली
वर्ष 1928 में हकीम अजमल खां की मृत्यु से पुनः वित्तीय संकट आ गया।
1 मार्च 1935 को दिल्ली के ओखला में नए भवन की आधारशिला रखी गई। वर्ष 1936 में जामिया प्रेस, मकतब और लाइब्रेरी को छोड़कर सभी विभाग नए भवन में स्थानांतरित हो गए। 1936 में डॉ. एम.ए. अंसारी का निधन हो गया। 
जामिया ने नवीन शिक्षा पद्धतियों के विकास पर ध्यान केन्द्रित करते हुए वर्ष 1938 में शिक्षक महाविद्यालय (उस्तादों का मदरसा) की स्थापना की। अक्टूबर 1938 में यह संस्थान इदारा-ए-तालीम-ओ-तरक्की बन गया। छात्रों की अधिकता के कारण हॉस्टल के और कमरे बनाने पड़े। 4 जून 1939 को जामिया मिलिया इस्लामिया को एक सोसायटी के रूप में पंजीकृत करवाया गया। 
वर्ष 1939 में डॉक्टर जाकिर हुसैन ने स्वतंत्रता सैनानी मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी (1872-1944) को शिक्षण हेतु जामिया में आमंत्रित किया जिन्होंने बैतुल हिकमा के नाम से इस्लामिक स्टडी सेंटर (स्कूल) शुरू किया। शिक्षा के क्षेत्र में अभिनव प्रयोगों के कारण जामिया में काम करने हेतु कई विदेशी शिक्षक आए जिनमें- 
1. हुसैन रऊफ बे (1933 मिस्र), 
2. डॉ. बेहदजत वाहबी (1934 काहिरा, मिस्र) 
3. हलीदे एडिब (1936, तुर्की) 
4. गेरडा फिलिप्सबोर्न, उपनाम आपा जान (1936, जर्मनी) (जामिया में ही दफन)
1942 में पुनः आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा।
1946 में जामिया के रजत जयंती समारोह में डॉ. जाकिर हुसैन (कुलपति) ने जिन्ना दंपत्ति, लियाकत अली खान, पंडित जवाहर लाल नेहरू, आसफ अली तथा सर सी राजगोपालाचारी को आमंत्रित किया गया। 1947 में विभाजन की त्रासदी ने जामिया लाइब्रेरी की सात लाख पुस्तकों को जलाकर खाक कर दिया। स्वतंत्रता के बाद यह भारत के तेजी से विकसित होते शिक्षण संस्थानों में से एक बना।
वर्ष की स्थापना की गई। वर्ष की स्थापना की गई।
जामिया ने इसके बाद 
(1)1967 में यहां स्कूल ऑफ सोशल वर्क।
(2) 1971 में जाकिर हुसैन इंस्टीट्यूट ऑफ इस्लामिक स्टडीज (1969 में मरणोपरांत डॉ. जाकिर हुसैन के सम्मान में)
(3) 1978 में सिविल इंजीनियरिंग (बीई कोर्स)
(4) 1981 में मानविकी और भाषा, प्राकृतिक विज्ञान, सामाजिक विज्ञान और राज्य संसाधन केंद्र।
(5) 1983 में मास कम्युनिकेशन रिसर्च सेंटर और 
(6) 1983 कोचिंग और करियर प्लानिंग सेंटर।
(7) 1985 में इसने इंजीनियरिंग व प्रौद्योगिकी संकाय
(8) 1985 विश्वविद्यालय कंप्यूटर केंद्र।
(9) 1987 - 1988 में अकादमिक स्टाफ कॉलेज
(10)1987 में तीसरी दुनिया अध्ययन अकादमी।
(11) 1989 में विधि संकाय की स्थापना की गई।
वर्तमान में स्नातक और स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के साथ जामिया में कई शिक्षण और शोध केंद्र स्थापित हैं जैसे - 
1.एजेके-मास कम्युनिकेशन रिसर्च सेंटर (एमसीआरसी), 
2. एकेडमी ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज आदि। 
3. जामिया सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) अपने उत्तम शिक्षण कार्यों के बदौलत आज जामिया आगे बढ़ रहा है।
जामिया की तरक्की का निरीक्षण करने हेतु आए विदेशी मेहमान - 
1. मार्शल टीटो (1954), 
2. राजा ज़ाहिर शाह (अफ
- रवीन्द्र नाथ टैगोर
जामिया को चलना ही होगा। अगर आपको इसके वित्त की चिंता है, तो मैं भीख का कटोरा लेकर चलूंगा।
- महात्मा गांधी (जामिया मीलिया इस्लामिया के आर्थिक संकट के समय उद्बोधन)
जब उनके पास निर्माण करने की लालसा थी पर आर्थिक रूप से कमजोर थे तब मैं जामिया के साथ था।
- डॉक्टर जाकिर हुसैन (राष्ट्रपति बनने के बाद)

स्वतंत्रता पूर्व भारत में एक छोटे से संस्थान से नई दिल्ली में स्थित एक केंद्रीय विश्वविद्यालय बनने की कहानी -
*1. जामिया मिलिया इस्लामिया*
(ऑक्सफोर्ड ऑफ इंडियन मुस्लिम) - 
जामिया मिलिया इस्लामिया (राष्ट्रीय मुस्लिम विश्वविद्यालय) का नाम अरबी शब्द से लिया गया है। शब्द जामिया का अर्थ विश्वविद्यालय और मिलिया का अर्थ है राष्ट्रीय। यह विश्वविद्यालय मध्ययुगीन मदरसे से अलग होत है। आधुनिक विश्वविद्यालयों को मध्ययुगीन मदरसों से अलग करने के लिए जामिया शब्द का प्रयोग किया जाता है।
जामिया मिलिया इस्लामिया शुक्रवार 29 अक्टूबर 1920 में भारत के उत्तर प्रदेश के शहर अलीगढ़ में स्थापित संस्थान है। 22 नवंबर 1920 को हकीम अजमल खान को जामिया का पहला चांसलर चुना गया। मोहम्मद अली जौहर जामिया के पहले कुलपति बने। इसे 1988 में संसद ने अधिनियम पारित कर केंद्रीय विश्वविद्यालय के रूप में मान्यता दी जहां नर्सरी कक्षा से उच्च शिक्षा प्रदान की जाती है। यह विश्वविद्यालय उन लोगों के समर्पण, दृढ़ विश्वास और दूरदर्शिता का परिणाम है जिन्होंने अनेकों बाधाओं के बावजूद कदम साबित रखे। गुलाम भारत के राजनैतिक एवं सामाजिक परिदृश्य में सुधार हेतु पश्चिमी विश्वविद्यालयों में पढ़ कर आने वाले स्वतंत्रता आंदोलन के सैनिकों ने भारत के मुस्लिम समाज को मध्ययुगीन विचारधारा से पृथक कर आधुनिक शिक्षा पद्धति की स्थापना हेतु इस विश्वविद्यालय का निर्माण किया। इसके प्रेरक रहे महात्मा गांधी एवं खिलाफत आंदोलन। असहयोग आंदोलन के अंतर्गत ब्रिटिश सरकार द्वारा संचालित शिक्षण संस्थाओं के बहिष्कार के फलस्वरूप भारतीय संस्थानों की स्थापना में एक कड़ी थी जामिया मीलिया इस्लामिया, अलीगढ़।
इसके स्थापक सदस्य थे -
1. डॉ. मुख्तार अहमद अंसारी (दिल्ली)
2. मुफ़्ती कफ़ायतुल्लाह (दिल्ली)
3. मौलाना अब्दुल बारी फरंग महली (यूपी)
4. मौलाना सुलेमान नदवी (बिहार)
5. मौलाना शब्बीर अहमद उस्मानी (यूपी)
6. मौलाना हुसैन अहमद मदनी (यूपी)
7. चौधरी ख़लीक़-उज़-ज़मां (यूपी)
8. नवाब मोहम्मद इस्माइल खान
9. तसद्दुक हुसैन खान (यूपी)
10. डॉ. मोहम्मद इकबाल (पंजाब)
11. मौलाना सनाउल्लाह खान अमृतसरी (पंजाब)
12. डॉ. सैफुद्दीन किचलू (पंजाब)
13. मौलाना अबुल कलाम आज़ाद (बंगाल और बिहार)
15. डॉ. सैयद महमूद (बंगाल और बिहार)
16. सेठ अब्दुल्ला हारून कराचीवाले (सिंध, बॉम्बे और हैदराबाद)
17. अब्बास तैयबीजी (सिंध, बॉम्बे और हैदराबाद)
18. सेठ मियां मोहम्मद हाजी जाम छोटानी (सिंध, बॉम्बे और हैदराबाद)
19. मौलवी अब्दुल हक (सिंध, बॉम्बे और हैदराबाद)
जामिया मीलिया इस्लामिया के सदस्यों ने स्वतंत्रता आंदोलन बारडोली सत्याग्रह में बढ़ चढ़ कर भाग लिया। 1922 में गांधीजी ने असहयोग आंदोलन को वापस ले लिया और 1924 में मुस्तफा कमाल अतातुर्क ने खिलाफत की समाप्ति की घोषणा कर दी।
इस से खिलाफत द्वारा दी जाने वाली वित्तीय सहायता बंद हो गई। प्रमुख लोगों ने इसे छोड़ना शुरू कर दिया। वित्तीय एवं राजनैतिक सकंट से उबरने हेतु 1925 में जामिया करोल बाग दिल्ली में स्थानांतरित हो गया। जामिया ने आत्मनिर्भरता के लिए गांधीजी के रचनात्मक कार्यक्रम का अनुसरण किया और चरखा और तकली को अपना पसंदीदा पेशा बना लिया। कठिन समय में हकीम अजमल खान ने जामिया के अधिकांश खर्चों को अपनी जेब से वहन किया। डॉ. एमए अंसारी और अब्दुल मजीद ख्वाजा ने भारत और विदेश का दौरा किया, जामिया के महत्व को समझाया और जामिया के लिए धन इकट्ठा किया।
1. डॉ. जाकिर हुसैन (बर्लिन विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट)
2. डॉ. आबिद हुसैन ((बर्लिन विश्वविद्यालय से शिक्षा में डॉक्टरेट)
3. डॉ. मोहम्मद मुजीब ( ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से इतिहास एवं बर्लिन विश्वविद्यालय से मुद्रण में डॉक्टरेट)
वर्ष 1925 से जर्मनी में अध्ययन कर रहे तीनों दोस्त फरवरी 1926 में नॉर्डड्यूशर लॉयड स्टीमर, एसएस डेरफ्लिंगर द्वारा जामिया के लिए जर्मनी से चले गए। आबिद हुसैन और मोहम्मद मुजीब को 300 रुपए व जाकिर हुसैन को 100 मासिक वेतन की पेशकश की गई परन्तु इन्होंने 100 रुपए व जाकिर हुसैन ने 80 रुपए मासिक वेतन लिया। इन तीनों ने पहला कदम उठाया वयस्क शिक्षा हेतु सायं कालीन कक्षाएं लगाना। 1926 में जाकिर हुसैन इसके कुलपति बने। यहां के शिक्षकों ने डॉक्टर जाकिर हुसैन के नेतृत्व में 150 रुपए वेतन में काम शुरू रखा जो जामिया के आजीवन सदस्य बने। 
1928 में जामिया ने मुद्रण एवं प्रकाशन विभाग को तीन भाग 
1. जामिया प्रेस दरियागंज मुखिया प्रोफेसर मोहम्मद मुजीब
2. जामिया उर्दू अकादमी मुखिया डॉ. आबिद हुसैन 
3. मकतब ए जामिया मुखिया हामिद अली
वर्ष 1928 में हकीम अजमल खां की मृत्यु से पुनः वित्तीय संकट आ गया।
1 मार्च 1935 को दिल्ली के ओखला में नए भवन की आधारशिला रखी गई। वर्ष 1936 में जामिया प्रेस, मकतब और लाइब्रेरी को छोड़कर सभी विभाग नए भवन में स्थानांतरित हो गए। 1936 में डॉ. एम.ए. अंसारी का निधन हो गया। 
जामिया ने नवीन शिक्षा पद्धतियों के विकास पर ध्यान केन्द्रित करते हुए वर्ष 1938 में शिक्षक महाविद्यालय (उस्तादों का मदरसा) की स्थापना की। अक्टूबर 1938 में यह संस्थान इदारा-ए-तालीम-ओ-तरक्की बन गया। छात्रों की अधिकता के कारण हॉस्टल के और कमरे बनाने पड़े। 4 जून 1939 को जामिया मिलिया इस्लामिया को एक सोसायटी के रूप में पंजीकृत करवाया गया। 
वर्ष 1939 में डॉक्टर जाकिर हुसैन ने स्वतंत्रता सैनानी मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी (1872-1944) को शिक्षण हेतु जामिया में आमंत्रित किया जिन्होंने बैतुल हिकमा के नाम से इस्लामिक स्टडी सेंटर (स्कूल) शुरू किया। शिक्षा के क्षेत्र में अभिनव प्रयोगों के कारण जामिया में काम करने हेतु कई विदेशी शिक्षक आए जिनमें- 
1. हुसैन रऊफ बे (1933 मिस्र), 
2. डॉ. बेहदजत वाहबी (1934 काहिरा, मिस्र) 
3. हलीदे एडिब (1936, तुर्की) 
4. गेरडा फिलिप्सबोर्न, उपनाम आपा जान (1936, जर्मनी) (जामिया में ही दफन)
1942 में पुनः आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा।
1946 में जामिया के रजत जयंती समारोह में डॉ. जाकिर हुसैन (कुलपति) ने जिन्ना दंपत्ति, लियाकत अली खान, पंडित जवाहर लाल नेहरू, आसफ अली तथा सर सी राजगोपालाचारी को आमंत्रित किया गया। 1947 में विभाजन की त्रासदी ने जामिया लाइब्रेरी की सात लाख पुस्तकों को जलाकर खाक कर दिया। स्वतंत्रता के बाद यह भारत के तेजी से विकसित होते शिक्षण संस्थानों में से एक बना।
वर्ष की स्थापना की गई। वर्ष की स्थापना की गई।
जामिया ने इसके बाद 
(1)1967 में यहां स्कूल ऑफ सोशल वर्क।
(2) 1971 में जाकिर हुसैन इंस्टीट्यूट ऑफ इस्लामिक स्टडीज (1969 में मरणोपरांत डॉ. जाकिर हुसैन के सम्मान में)
(3) 1978 में सिविल इंजीनियरिंग (बीई कोर्स)
(4) 1981 में मानविकी और भाषा, प्राकृतिक विज्ञान, सामाजिक विज्ञान और राज्य संसाधन केंद्र।
(5) 1983 में मास कम्युनिकेशन रिसर्च सेंटर और 
(6) 1983 कोचिंग और करियर प्लानिंग सेंटर।
(7) 1985 में इसने इंजीनियरिंग व प्रौद्योगिकी संकाय
(8) 1985 विश्वविद्यालय कंप्यूटर केंद्र।
(9) 1987 - 1988 में अकादमिक स्टाफ कॉलेज
(10)1987 में तीसरी दुनिया अध्ययन अकादमी।
(11) 1989 में विधि संकाय की स्थापना की गई।
वर्तमान में स्नातक और स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के साथ जामिया में कई शिक्षण और शोध केंद्र स्थापित हैं जैसे - 
1.एजेके-मास कम्युनिकेशन रिसर्च सेंटर (एमसीआरसी), 
2. एकेडमी ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज आदि। 
3. जामिया सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) अपने उत्तम शिक्षण कार्यों के बदौलत आज जामिया आगे बढ़ रहा है।
जामिया की तरक्की का निरीक्षण करने हेतु आए विदेशी मेहमान - 
1. मार्शल टीटो (1954), 
2. राजा ज़ाहिर शाह (अफ़गानिस्तान, 1955)
3. शाह फ़ैसल (सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस, 1955)
4. राजा रेज़ा शाह पहलवी (ईरान, 1956) 5. प्रिंस मुकर्रम जाह (ईरान 1960) शामिल हैं। इसके बाद तो यहां आने वालों का तांता लग गया।
जामिया मीलिया इस्लामिया दिल्ली को विश्वविद्यालय का दर्जा - 
वर्ष 1962 में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने जामिया को विश्वविद्यालय घोषित किया। 
जामिया को केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा - भारत की संसद ने विशेष अधिनियम द्वारा जामिया मिलिया इस्लामिया को दिसंबर 1988 में केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा दिया।
जामिया हमदर्द नई दिल्ली-
विश्वविद्यालय के संस्थापक जनाब हकीम अब्दुल हमीद ने 1953 में यूनानी प्रणाली के साथ मेडिकल कॉलेज शुरू किया। यह भारतीय विश्वविद्यालयों में शीर्ष 7 वें स्थान पर है। जुलाई 2012 में मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया ने इसे मेडिकल कॉलेज शुरू करने की अनुमति दी। इससे पहले विश्वविद्यालय ने पूर्व मजीदिया हॉस्पिटल का नाम हकीम अब्दुल हमीद (एचएएच) शताब्दी अस्पताल रखा जिसे नए परिसर हमदर्द इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज ऑफ रिसर्च (एचआईएमएसआर) से जोड़ दिया गया। इस अस्पताल में वर्तमान में 650 बिस्तर और एक रक्त बैंक संचालित है। यह दिल्ली के दिल्ली राजधानी क्षेत्र का छठा मेडिकल कॉलेज था। संस्थान कैंसर, मधुमेह और कार्डियोवैस्कुलर बीमारियों में अनुसंधान करता है। संस्थान ने ऑल इंडिया हार्ट फाउंडेशन और नेशनल हार्ट इंस्टीट्यूट, नई दिल्ली के सहयोग से निवारक कार्डियोलॉजी में एक साल का स्नातकोत्तर डिप्लोमा शुरू किया। यहां 550 बिस्तर की सुविधा उपलब्ध है। एक छत के नीचे चिकित्सा प्रदान करने हेतु हमदर्द इमेजिंग सेंटर की स्थापना की गई है। विश्वविद्यालय के छात्रों, शिक्षण और गैर-शिक्षण कर्मचारियों, उनके परिवार के सदस्यों और बहुत गरीब लोगों को मुफ्त ओपीडी सुविधाएं मुहैया कराई जाती हैं। पुराने मजीदिया अस्पताल को चिकित्सा फैकल्टी (यूनानी) के छात्रों के लिए प्रशिक्षण स्थान के रूप में विकसित किया जा रहा है। जामिया हमदर्द के छात्र हमदर्दियन कहलाते हैं।
जामिया हमदर्द को भारत के राष्ट्रीय आकलन और मान्यता परिषद द्वारा ए ग्रेड विश्वविद्यालय के रूप में मान्यता दी है। भारत में उच्च शिक्षा के प्रसार हेतु वर्ष 1989 में स्थापित किया गया संस्थान जामिया हमदर्द नई दिल्ली में स्थित हैं। फार्मेसी कार्य हेतु स्थापित जामिया हमदर्द भारत सरकार के विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा वित्त पोषित मानित विश्वविद्यालय है जहां आधुनिक चिकित्सा, फिजियोथेरेपी और व्यावसायिक थेरेपी में स्नातक (एमबीबीएस) एवं इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी, और कंप्यूटर अनुप्रयोगों के पुरस्कार और सूचना प्रौद्योगिकी, कंप्यूटर अनुप्रयोग, बिजनेस मैनेजमेंट, फिजियोथेरेपी, निवारक कार्डियोलॉजी और व्यावसायिक थेरेपी में स्नातकोत्तर कार्यक्रम संचालित होते हैं। यह संस्थान भारत में सबसे पुराने और सबसे प्रतिष्ठित फार्मेसी संस्थानों में स्कूल ऑफ फार्मास्यूटिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (पूर्व फार्मेसी फैकल्टी), स्कूल ऑफ़ फार्मेसी और फार्मास्युटिकल विज्ञान में डिप्लोमा, स्नातक, से एक है। इसे राष्ट्रीय संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा अपने राष्ट्रीय संस्थान रैंकिंग फ्रेमवर्क के माध्यम से वर्ष 2017 में भारत में नंबर एक रैंक से सम्मानित किया गया था। इस संस्थान ने अनुसंधान एवं दवा उद्योग हेतु कई उल्लेखनीय हस्तियां दी हैं।
जामिया हमदर्द की शाखाएं - 
1. हमदर्द इंजीनियरिंग विज्ञान और टेक्नोलॉजी
2. हमदर्द इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज एंड रिसर्च (एचआईएमएसआर)
3. एसोसिएटेड हकीम अब्दुल हमीद शताब्दी अस्पताल
4. यूनानी, चिकित्सा महाविद्यालय
5. नर्सिंग ट्रेनिंग सेंटर
6. हमदर्द इस्लामी अध्ययन और सामाजिक विज्ञान केंद्र
7. हमदर्द बायो टेक्नोलॉजी एवं बायो केमिस्ट्री केंद्र
8. बॉटनी (वनस्पति विज्ञान) विभाग
9. टॉक्सिकोलॉजी (ज़हरज्ञान) विभाग
10. केमिस्ट्री (रसायन विज्ञान) केंद्र
11. केंद्रीय इंस्ट्रुमेंटेशन सुविधा (सीआईएफ) क्लिनिकल रिसर्च केंद्र
12. फार्मेसी के फैकल्टी में सेंट्रल इंस्ट्रुमेंटेशन केंद्र
हमदर्द इंस्टीट्यूट में एचपीएलसी और मेटलर इलेक्ट्रॉनिक संतुलन (गामा-काउंटर, बीटा-काउंटर और डीएनए इलेक्ट्रो फोरोसिस सिस्टम, पेर्किन-एल्मर लैम्ब्डा -20 डबल-बीम यूवी-वीआईएस स्पेक्ट्रोफोटोमीटर, पेर्किन-एल्मर एलएस -50 लुमेनसेंस स्पेक्ट्रोमीटर, बायो-रेड एफटी-आईआर स्पेक्ट्रोमीटर और मिनी कंप्यूटर, जिसमें आठ कंप्यूटर, इंटरनेट, सीआईएफ और ई-मेल सुविधाएं शामिल हैं। हमदर्द इंस्टीट्यूट एम.फार्मा, एमएससी व अन्य कोर्स भी करवाती है। 
हमदर्द इंस्टीट्यूट पुस्तकालय - 
हमदर्द पुस्तकालयों में केंद्रीय पुस्तकालय हाकिम मोहम्मद सैयद सेंट्रल लाइब्रेरी सहित सात पुस्तकालय हैं जिनमें - 
1.विज्ञान
2.चिकित्सा
3.फार्मेसी
4.नर्सिंग
5.इस्लामी अध्ययन
6.प्रबंधन अध्ययन
7.सूचना टेक्नोलॉजी 
यहां के पुस्तकालय स्थापित हैं।
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय -
वर्ष 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की असफलता के बाद मानसिक रूप से टूट कर भारत के मुसलमान बिखर गए।
सर सैयद अहमद खान ने अपने शैक्षिक मिशन की शुरुआत की और 1875 में मुस्लिम एंग्लो ओरियंटल कॉलेज की स्थापना की जिसे बाद में 1920 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में शामिल कर लिया गया। हालांकि सर सैयद अहमद खान और उनके साथियों ने केवल एक कॉलेज की स्थापना की थी लेकिन उनके अलीगढ़ आंदोलन ने शिक्षा और ज्ञान का दीप रोशन किया।
सर सैयद अहमद खान के निधन के बाद भारत के प्रबुद्ध मुसलमानों ने उर्दू भाषा और शिक्षण विधियों को विकसित करने के उद्देश्य से आगरा में बज़्म-ए-इकबाल का गठन किया। उन्होंने 1939 में आगरा में जामिया उर्दू नामक एक संस्था की स्थापना की। जामिया उर्दू विभिन्न चरणों से गुज़री और बाद में एक कार्यकारी समिति का गठन किया गया जिसमें लेफ्टिनेंट कर्नल नवाब डॉ. सर अल्हाज हाफ़िज़ मोहम्मद अहमद सईद खान साहब बहादुर छतारी इसके मुखिया बने और सर तेज बहादुर सप्रू इसके चांसलर एवं मौलवी (डॉक्टर) अब्दुल हक़ प्रो-चांसलर बने। अल्हाज मौलवी अबुल हसन वाइस चांसलर और खान बहादुर अख्तर आदिल प्रो-वाइस चांसलर बने। पंडित राजनाथ आगरा को कोषाध्यक्ष बनाया गया और मोहम्मद ताहिर फ़ारूक़ी को रजिस्ट्रार नियुक्त किया गया। जल्द ही जामिया उर्दू की स्थापना की खबर दूर-दूर तक फैल गई। मदरसा आलिया, आगरा, तालीमी बोर्ड, अंजुमन तरक्की ए उर्दू ब्यावर, दारुल उलूम हमीदिया, भोपाल, इदारा-ए-सादिया टोंक, दारुल उलूम इस्लामिया, जयपुर और मदरसा-ए-इस्लामिया, अमरोहा जैसे मदरसों सहित विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों ने जामिया उर्दू परीक्षाओं के लिए छात्रों को तैयार करने के लिए कोचिंग कक्षाएं शुरू कीं। इस बीच सैयद जहीरुद्दीन अल्वी आगे आए और 1948 में जामिया उर्दू को अलीगढ़ स्थानांतरित कर दिया गया। यह 8 जनवरी 1960 से अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के नाम से वर्तमान भवन अलीगढ़ में संचालित है। सैयद जहीरुद्दीन अल्वी अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में लेक्चरर थे और कई प्रशासनिक गतिविधियों से जुड़े हुए थे। अलीगढ़ मैगजीन के मैनेजर होने के नाते वे प्रशासनिक और वित्तीय मामलों से अच्छी तरह वाकिफ थे। अलीगढ़ में कार्यकारिणी की पहली बैठक 13 सितंबर 1948 को हुई जिसमें निम्नलिखित पदाधिकारी चुने गए। भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन कुलपति बने और प्रो. रशीद अहमद सिद्दीकी प्रो-वाइस चांसलर, शिफाउल मुल्क हकीम अब्दुल लतीफ कोषाध्यक्ष और सैयद जहीरुद्दीन अल्वी रजिस्ट्रार चुने गए। इनके अलावा छतारी के नवाब अहमद सईद खान रेक्टर और श्री शांति स्वरुप भटनागर चांसलर बने जबकि पंडित राजनाथ कुंजरू प्रो-चांसलर बनाया गया। उनकी निस्वार्थ सेवाओं और समर्पण को देखते हुए सैयद जहीरुद्दीन अल्वी को जामिया उर्दू का पूरा प्रभार दिया गया। वर्ष 1939 में स्थापना के बाद से इसने साबित कर दिया है कि उर्दू केवल मुसलमानों की भाषा नहीं है, बल्कि यह भारत की भाषा है और भारत से प्यार करने वाला हर व्यक्ति उर्दू से प्यार करेगा और जामिया उर्दू को समर्थन देगा। भारत सरकार ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय को केंद्रीय (अल्पसंख्यक दर्जा प्राप्त) विश्वविद्यालय के रूप में मान्यता दी है।
मोहम्मद अली जोहर विश्वविद्यालय रामपुर उत्तर प्रदेश -
वर्ष 2006 में स्थापित यह संस्थान निजी विश्वविद्यालय है जो रामपुर में मोहम्मद अली जौहर ट्रस्ट, उत्तर प्रदेश में संचालित है जो यूजीसी द्वारा मान्यता प्राप्त है। इसके चांसलर आजम खान (समाजवादी पार्टी सरकार में पूर्व कैबिनेट मंत्री रहे) हैं। इस संस्थान को उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा वर्ष 2012 में विश्वविद्यालय का दर्जा प्रदान किया गया जिसे अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों हेतु राष्ट्रीय आयोग (NCMEI) द्वारा अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा मई 2013 में दिया गया।
हाल में जौहर यूनिवर्सिटी की जमीन को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा है। आरोप है कि आजम खां ने अपने ट्रस्ट के जरिए ग्रामीणों की जमीन का जबरन अधिग्रहण किया और यूनिवर्सिटी में शामिल कर लिया। वर्तमान उत्तर प्रदेश सरकार ने मामले की जांच कराई तो उसमें पता चला कि यूनिवर्सिटी की केवल साढ़े 12 एकड़ जमीन सही है शेष अवैध है। जिसे सरकार को वापस किया जाना चाहिए। हुआ यह कि वर्ष 2005 में उत्तर प्रदेश सरकार ने मौलाना मुहम्मद अली जौहर ट्रस्ट को 400 एकड़ भूमि की मंजूरी दी। इसमें साढ़े 12 एकड़ जमीन पर जौहर यूनिवर्सिटी बनाने के लिए मंजूरी कर दी गई। इसके अगले साल 45.1 एकड़ और 25 एकड़ अतिरिक्त जमीन की मंजूरी दी गई। बाद में वर्ष 2017 में योगी सरकार ने कहा कि यूनिवर्सिटी की साढ़े 12 एकड़ को छोड़कर बाकी जमीन का अधिग्रहण अवैध है, जिसे सरकार को वापस किया जाना चाहिए क्योंकि ट्रस्ट ने शर्तों का पालन नहीं किया। एसडीएम रामपुर ने जांच रिपोर्ट में ट्र्स्ट पर शर्तों के उल्लघंन का आरोप लगाया। कहा कि 24,000 वर्ग मीटर जमीन में ही निर्माण कार्य कराया जा रहा है। ट्रस्ट द्वारा शर्तों का उल्लंघन करने पर जमीन वापस राज्य सरकार को दी जानी चाहिए। एडीएम ने उक्त भूमि राज्य सरकार को लौटाने का आदेश जारी कर दिया। इसके विरुद्ध जौहर ट्रस्ट ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। अदालत ने साढ़े 12 एकड़ जमीन के अलावा शेष भूमि को राज्य सरकार को लौटाने के एडीएम वित्त के आदेश को सही ठहराते हुए कहा था कि अनुसूचित जाति की जमीन जिलाधिकारी की अनुमति के बिना अवैध रूप से ली गई थी। भूमि अधिग्रहण की शर्तों का उल्लंघन कर वहां शैक्षिक कार्य हेतु निर्माण के स्थान पर मस्जिद का निर्माण करवाया गया। ग्राम सभा की सार्वजनिक उपयोग की चक रोड की जमीन और नदी किनारे की सरकारी जमीन भी अधिग्रहीत की गई। किसानों से जबरन बैनामा करवाया गया इस हेतु रामपुर के 26 किसानों ने आजम खान के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज करवाई। ट्रस्ट ने हाईकोर्ट के इस आदेश के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की जिस पर उत्तर प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कैवियट लगाते हुए उसका पक्ष सुनने का आग्रह किया। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाते हुए उत्तर प्रदेश सरकार से जवाब मांगा। इस मामले में जेल में बंद आजम खान को जमानत मिल गई है।
इसके अलावा भारत में सैकड़ों की संख्या में जामिया (विश्वविद्यालय) के रूप में संस्थान कार्यरत हैं। इसमें हैदराबाद की मुस्लिम यूनिवर्सिटी एवं मारवाड़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी मुख्य हैं।
ओपन व ऑनलाइन शिक्षण संस्थान -
कुछ मदरसा शिक्षा संस्थानों के नाम जो ऑनलाइन शिक्षण सामग्री/सुविधा उपलब्ध करवाते हैं - 
1. अल-क़लम अकादमी
2. दारुल उलूम ऑनलाइन
3. ALIM यूनिवर्सिटी
शिक्षा केंद्रों का वित्तीय पोषण -
मदरसे अक्सर वक्फ (धर्मार्थ ट्रस्ट) द्वारा वित्त पोषित होते हैं।
भारत में वर्तमान में इस्लामी शिक्षा केंद्रों पर कसता शिकंजा -
वर्ष 2014 के बाद भारत में अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को भारत एवं अन्य राज्य सरकारों द्वारा हतोत्साहित किया जा रहा है। इसमें असम, मध्य प्रदेश एवं उत्तर प्रदेश की राज्य सरकारों की भूमिका अत्यधिक संदिग्ध है।
भारत में मदरसा बोर्ड -
भारत के लगभग सभी राज्यों में (कुछ राज्यों छोड़ कर) मदरसा शिक्षा को औपचारिक एवं नियमित शिक्षा से जोड़ने हेतु मदरसा बोर्ड का गठन किया गया है। यह बोर्ड अल्पसंख्यक मामलात विभाग द्वारा संचालित किए जाते हैं। उत्तर प्रदेश सरकार ने मदरसा बोर्ड एवं मदरसा शिक्षा को अवैधानिक करार देने की घोषणा की जिसे सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया।

*शमशेर भालू खां* 
जिगर चुरूवी 
9587243963

काफी की कहानी

डच व्यापारियों ने 1600 के दशक में यमन से कॉफ़ी के पौधे चुरा लिए और उन्हें इंडोनेशिया के जावा द्वीप में एक कठोर पर्यावरण में उगाने में सफलता हासिल कर ली। ये कठोर पर्यावरण के बागान यूरोप को असीमित कॉफ़ी बीन्स उपलब्ध कराते थे, जिससे पूरे महाद्वीप में कॉफ़ी का जुनून छा गया।

यह फ़सल इतनी सफल रही कि “जावा” यूरोप और अमेरिका में कॉफ़ी का दूसरा नाम बन गया औपनिवेशिक शोषण की एक विरासत भी, जो आज भी हमारी कितबों में मौजूद है।

यमन में पवित्र पेय से लेकर जावा में वैश्विक वस्तु तक, कॉफ़ी ने विश्व व्यापार और संस्कृति को नया रूप दिया। 

9वीं–10वीं सदी – इथियोपिया (काफ़ा क्षेत्र) में कॉफ़ी पौधे की खोज सबसे पहले ख़ालिद नाम के एक चरवाहे ने की थी, 11वीं सदी में ये कॉफ़ी अरब जगत (यमन) पहुँची और सूफ़ी संत इसे रातभर इबादत व ध्यान के लिए पीने लगे ताकी नींद ना आए।

15वीं सदी – यमन में मोचा (Mocha) बंदरगाह से कॉफ़ी का व्यापार शुरू हुआ।

16वीं सदी – मक्का, काहिरा, दमिश्क और इस्तांबुल तक कॉफ़ीहाउस ("क़हवा खाना") खुल गए,कॉफ़ी उस दौर में एक “पवित्र पेय” और सामाजिक मेलजोल का साधन थी।

1600 के दशक में डच व्यापारियों ने यमन से चोरी करके कॉफ़ी के पौधे बाहर निकाले और इस तरह 1616 पहली बार युरोप में कॉफ़ी लाई गई।

1650–1700 – इंग्लैंड, फ्रांस और इटली में कॉफ़ीहाउस खुलने लगे, वहां कॉफ़ीहाउस को "पैनी यूनिवर्सिटी" कहा जाता था क्योंकि यहाँ लोग एक पैनी देकर कॉफ़ी और ज्ञान दोनों लेते थे।

1600 से 1700 के दौर में डचों ने इंडोनेशिया (जावा) में कॉफ़ी की खेती करवाई और "Java" शब्द कॉफ़ी का पर्याय बना गया, 1720 में फ्रांसीसी उपनिवेशों (कैरेबियन, मार्टिनीक) में कॉफ़ी पहुँची।

1700s के अंत तक – ब्राज़ील कॉफ़ी उत्पादन का केंद्र बन गया और आगे चलकर दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक बना।

हमारा व्यवहार और करोना

          हमारा व्यवहार और करोना 
हम हमारा व्यवहार व कोरोना
आज चिकित्सीय कार्य हेतु घर से बाहर जाना हुआ। गांव में दुकानों के बाहर समूहों में लोग बैठे थे लगभग सभी के मास्क नहीं थे और एक निर्धारित दूरी भी नहीं बना रखी थी।
छोटे बच्चे इस बात से सावधानी बरत रहे हैं कि कहीं उस का हाथ किसी को छू ना ले। यह देख कर दिल को बहुत तसल्ली हुई कम से कम बड़ों से बच्चे ज्यादा सावधान हैं।

शहर में पहुंचने पर एक गली में 10-12 युवा लूडो खेलते मस्ती कर रहे थे। किसी के मुंह पर मास्क नहीं आगे चलने पर इसी तरह कम से कम 10 जगह यह माहौल देखा।
एक जगह रुक कर पूछा कि भाई आप इतने लोग एक जगह बिना मास्क बैठे हैं क्या महामारी चली गई। जवाब बड़ा सुंदर व मासूम था " भाई जी थे भी इन अफसर,नेता व डॉक्टर की बातों में आ गये। यह एक साजिश है बाकि कोरोना-फोरोन कुछ नहीं।" 
मैं अपराध बोध के साथ आगे बढ़ा कि पुलिस सायरन सुनाई दिया। पीछे मुड़ कर देखा एक भी युवक वहां नहीं था सब के सब घर में घुस गये।

मैं अवाक सन्न रह गया। यह वही युवा हैं जो व्हाट्सएप फ़ेसबुक ट्वीटर के साथ दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर पुलिस,डॉक्टर,सरकार व व्यवस्था को पानी पी-पी कर कोसते हैं असल में गलत कौन? 
काफी देर लगी डॉक्टर साहब की लिखी दवा ले कर उसी रास्ते से लौटा युवक वहीं जमे गेम खेल रहे थे। उनको देखकर लग रहा था इस इलाके में कहीं महामारी के लक्षण नहीं हैं इसलिये यह इतने निश्चिंत हैं। मैं भी ढीठता के साथ फिर उनके पास जाकर पूछ बैठा कि भाईयो इस मोहल्ले में शायद कोई पोसिटिव नहीं है इसलिये आप इतने बेफिक्र हैं जवाब सुनकर आश्चर्य हुआ कि इस क्षेत्र में काफी मौत हुई हैं एवं अभी काफी लोग पॉजिटिव हैं। आगे बिना कोई सवाल किये चलना ही बेहतर समझा।

यह हाल है आज के युवाओं के कंटोनमेंट एरिया होने के बावजूद भी घर में अंदर बैठना सजा समझते हैं दोष देते हैं सरकार को।

भारत की आबादी लगभग 130 करोड़ है। खुदानाखास्ता 1% आबादी पॉजिटिव हो जाये और इस तरह घर से बाहर झुंड में बैठने लगे तो आप सोच सकते हैं क्या हाल होगा? 
1% अर्थात एक करोड़ तीस लाख लोग प्रभावित होंगे क्या किसी भी सरकार के लिये स्थिति को संभालना मुमकिन है। और यह 130 लाख लोग औसत 10 लोगों को भी प्रसाद के रुप में बीमारी बांटेंगे तो क्या हाल होंगे। 

पहली व दूसरी लहर से उबरने की हालत में आये ही नहीं कि यह ब्लैक फंगस,व्हाइट फंगस का खतरा आ गया।

मज़ाक अपनी जगह मस्ती,घुमाई,खेलना यह सबको अच्छा लगता है पर किस क़ीमत पर।

तीसरी लहर की तैयारी सरकारों ने शुरू कर दी है इस पर काबू तब ही पाया जा सकता है जब हम खुद पर अंकुश लगायेंगे। 
दूसरा मामला यह है कि व्हाट्सएप फेसबुक अथवा अन्य सोशल मीडिया पर तरह तरह के उपाय बताये जा रहे हैं जिन की घरों में अत्यधिक प्रयोग में लिया जा रहा है। यह खतरनाक है। बहुत ज्यादा मात्रा में काढ़ा आदि का प्रयोग प्राणघातक हो सकता है।

प्रिय साथियो,
   अभी थोड़े दिन के लिये अपने आप को व अपने परिवार को बचाने के लिये घर के अन्दर ही रहें। अगर आपको यह सजा लगे तो सजा ही सही। अपनों को खोने का दुःख क्या होता है जिस पर बीती है उस से पूछें।

अंधविश्वास.

अंधविश्वास व सच एक नज़र

पीपल 24 घण्टे ऑक्सीजन नहीं छोड़ता :- 
हरित प्रणाम, इन दिनों दैनिक भास्कर में छपी एक फ़ोटो काफी वायरल हो रही है इस फ़ोटो में एक व्यक्ति पीपल के पेड़ पर कुर्सी लगाकर बैठा हुआ है इस फ़ोटो के साथ जो विवरण दिया हुआ है उसमें अखबार ने लिखा है कि पीपल 24 घंटे ऑक्सीजन देता है I इस खबर के अलावा भी हम अक्सर यह सुनते- पढ़ते हैं कि पीपल 24 घंटे ऑक्सीजन देता है बरगद के बारे में भी कई लोग ऐसा दावा करते हैं कुछ दिन पहलें राजस्थान के जालोर जिले से दैनिक भास्कर में ऐसी ही एक और खबर छपी जिसमें एक डॉक्टर कोरोना मरीजों को खेजड़ी के पेड़ के नीचे सुलाकर उनका ऑक्सीजन स्तर सुधारने की बात कह रहे हैं I इस खबर में भी अखबार ने दावा किया है कि खेजड़ी का पेड़ 24 घंटे ऑक्सीजन छोड़ता है हालांकि डॉक्टर के हवाले से यह दावा नहीं किया गया बल्कि अखबार ने अपनी तरफ से इसे लिखा है लेकिन डॉक्टर के हवाले से भी इस खबर में एक दूसरी बात लिखी गयी है, डॉक्टर ने यह दावा किया है कि खेजड़ी का पेड़ नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करता है इस कारण खेजड़ी अधिक ऑक्सीजन छोड़ती है I

अगर हम वैज्ञानिक आधार पर देखें तो ये तीनों ही बातें गलत और अवैज्ञानिक है क्योंकि इन तीनों दावों को एक भी वैज्ञानिक शोध प्रमाणित नहीं करता है I आज की पोस्ट में हम यह समझने का प्रयास करेंगे कि कोई भी पेड़ 24 घंटे ऑक्सीजन क्यों नहीं छोड़ सकता I

पेड़ हमारी तरह ही श्वसनक्रिया करते हैं यानि वे जब सांस लेते हैं तो ऑक्सीजन अंदर खींचते हैं व जब सांस छोड़ते हैं तो कार्बन डाइऑक्साइड बाहर निकालते हैं और वे ऐसा 24 घण्टे करते हैं यानि पेड़ कार्बनडाइऑक्साइड तो 24 घण्टे छोड़ता है जहां तक ऑक्सीजन छोड़ने की बात है तो पेड़ प्रकाश संश्लेषण की क्रिया द्वारा अपना भोजन बनाते है यह क्रिया सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में होती है यानि दिन के समय , इस क्रिया में पेड़ कार्बन डाइऑक्साइड अंदर खींचते हैं और जल के प्रकाशी अपघटन द्वारा (हिल रीऐक्शन) ऑक्सीजन को बाहर छोड़ देते हैं I पेड़-पौधे तीन तरह से प्रकाश संश्लेषण की क्रिया करते हैं ये तीन तरीके हैं - C3, C4 और CAM, अधिकांश पेड़-पौधे C3 व C4 मार्ग का इस्तेमाल करते हैं इन दोनों में भी C3 (Calvin cycle) ही ज्यादातर द्वारा इस्तेमाल किया जाता है I लेकिन रेगिस्तान में उगने वाले कुछ पादप जैसे कैक्टस व सकलेंट्स (खेजड़ी, जाल आदि नहीं) और epiphyte (ऐसे पादप जो किसी दूसरे पादप पर उगते हैं लेकिन परभक्षी नहीं होते ) वे CAM ( Crassulacean Acid Metabolism) मार्ग का अनुसरण करते हैं ये पादप दिन के समय अपने रन्ध्र बंद रखते हैं और रात के समय इन्हें खोलकर कार्बन डाइऑक्साइड को malate के रूप में फ़िक्स करते हैं व ज़रा सी ऑक्सीजन छोड़ते हैं I वे ऐसा इसलिए करते हैं ताकि दिन में सूर्य के प्रकाश के कारण होने वाली जल की क्षति को रोका जा सके I जो पौधे CAM मार्ग का अनुसरण करते हैं वे दिन में प्रकाश संश्लेषण की क्रिया नहीं करते हैं केवल सूर्योदय के समय व शाम ढलते समय ही उनके रन्ध्र खुले रहते हैं यानि वे दिन में ऑक्सीजन नहीं छोड़ते I इस प्रकार जो पादप C3 व C4 मार्ग का अनुसरण करते हैं वे दिन में ऑक्सीजन छोड़ते हैं और जो CAM मार्ग का अनुसरण करते हैं वे रात में व सूर्योदय-सूर्यास्त के समय कुछ देर के लिए I

अब बात करते हैं पीपल की - अगर पीपल का बीज किसी दूसरे पेड़ पर (कुँए या तालाब की मुंडेर पर नहीं ) ऊग जाता है तो जब तक उसकी जड़ें जमीन में नहीं पहुंच जाती तब तक वह epiphyte यानि अधिपादप का जीवन जीता है और इस दौरान वह CAM मार्ग का अनुसरण करता है यानि रात में रन्ध्र खोलकर कार्बन डाइऑक्साइड सोखता है और ऑक्सीजन छोड़ता है लेकिन दिन में नहीं I परन्तु जैसे ही उसकी जड़ें जमीन में पहुंच जाती है वह CAM मार्ग को छोड़कर C3 मार्ग पर आ जाता है यानि दिन में ही प्रकाश संश्लेषण करने लगता है I हमारे आस-पास जितने भी पीपल हैं उनमें से अधिकतर जमीन में लगे हुए हैं हम जो भी पीपल लगाते हैं वे सभी जमीन में ही लगाते हैं बाकी कुएं व तालाब आदि की मुंडेर पर भी अक्सर पीपल ऊगते रहते हैं लेकिन दूसरे पेड़ के ऊपर ऊगे हुए पीपल कम ही नजर आते हैं और जो ऊगते हैं वे भी दूसरे पेड़ के ऊपर ही विशाल वृक्ष नहीं बन जाते बल्कि थोड़े समय के लिए ही वे CAM मार्ग पर रह पाते हैं क्योंकि जैसे-जैसे वे बड़े होते हैं उनकी जड़ें जमीन में चली जाती हैं और वे C3 मार्ग पर आ जाते हैं I इस वैज्ञानिक प्रक्रिया को हम एक और चीज से भी समझ सकते हैं वो ये कि हमारे बुजुर्ग हमेशा ही रात में पीपल के पेड़ के नीचे सोने से मना करते रहे हैं वो ये कहते थे कि पीपल में भूत का वास होता है इसलिए रात को इसके नीचे नहीं सोना चाहिए दर असल रात में कार्बन छोड़ने के कारण पीपल के नीचे ऑक्सीजन की कमी से दम सा घुटने लगता है लेकिन ये भी केवल उसी पीपल नीचे होगा जो बेहद घना हो और व्यक्ति उसके एकदम अंदर सोए उसमें भी बहुत ज़्यादा दम नहीं घुटेगा बस हल्का सा आभास हो सकता है । चूँकि उनके पास किसी वैज्ञानिक शोध के नतीजे तो उपलब्ध थे नहीं इसलिए उन्होंने अनुमान लगाया कि ऐसा काम कोई भूत करता होगा जबकि वास्तव में यह भूत कार्बन डाइऑक्साइड थी I कुछ लोग यह भी कहते हैं कि पीपल चाँद की रोशनी में भी प्रकाश संश्लेषण करता है हालाँकि किसी भी पेड़ के सम्बंध में ऐसा कोई प्रामाणिक शोध उपलब्ध नहीं है।

अब अगर खेजड़ी की बात करें तो खेजड़ी की जड़ों में पाया जाने वाला जीवाणु जिसका नाम Ensifer sp. PC2 है वह जमीन के अंदर नाइट्रोजन स्थिरीकरण का काम करता है पहली बात तो यह कि नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने वाले अधिकतर जीवाणुओं को बेहद कम ऑक्सीजन या बिल्कुल ऑक्सीजन रहित वातावरण चाहिए वरना ये नाइट्रोजन स्थिरीकरण कर नहीं पाते इसलिए ये अपने आस-पास जमीन में मौजूद ऑक्सीजन को खत्म या कम करते हैं दूसरी बात यह कि नाइट्रोजन स्थिरीकरण की सारी प्रक्रिया जमीन के अंदर होती है उसका बाहर की ऑक्सीजन से कोई लेना- देना नहीं है I

निष्कर्ष यह है कि न तो पीपल या कोई भी दूसरा पेड़ 24 घंटे ऑक्सीजन छोड़ता है और न ही खेजड़ी की जड़ों में पाए जाने वाले जीवाणु की वजह से होने वाली नाइट्रोजन स्थिरीकरण की प्रक्रिया के कारण खेजड़ी के नीचे ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ती है अपितु उन डॉक्टर साहब की बात पढ़कर मुझे अफसोस हुआ कि उन्हें नाइट्रोजन स्थिरीकरण की सामान्य सी प्रक्रिया की भी जानकारी नहीं है I

अब दो सवाल पैदा होते हैं पहला तो यह कि जो कोरोना मरीज खेजड़ी या पीपल के पेड़ के नीचे लेटे हुए थे उनका ऑक्सीजन स्तर कैसे बढ़ा ? इस सवाल का जवाब बड़ा सीधा और स्पष्ट है- हमारे घर के अंदर के मुकाबले दिन के समय पेड़ों के नीचे ऑक्सीजन की मात्रा व शुद्धता दोनों ही ज्यादा होती है अब चाहे वो कौनसा भी पेड़ क्यों न हो इसलिए अगर आप शीशम, करंज, नीम, जाल आदि के नीचे लेटेंगे तो भी ऑक्सीजन स्तर सुधर जाएगा I दूसरा सवाल यह कि अगर ऐसी बात है तो फिर लोग 24 घण्टे वाली ऑक्सीजन की बात क्यों करते हैं ? दर असल जो व्यक्ति नैतिक रूप से कमजोर होता है वह अपनी वाह-वाही या अपने स्वार्थ के लिए अप्रमाणित बातों को फैलाता है अगर वह व्यक्ति किसी पद या प्रतिष्ठा धारण किए हुए होता है तो लोग उसकी बात को हाथों -हाथ लेते हैं और उसे आगे से आगे बढ़ा देते हैं I हमारे यहां पीपल के पेड़ में धर्मिक आस्था है कुछ लोगों ने इस धार्मिक आस्था से शरारत करते हुए अपनी वाह-वाही के लिए ये बकवास करनी शुरू कर दी कि पीपल का पेड़ 24 घंटे ऑक्सीजन देता है और लोग अपने बिना दिमाग़ लगाए इस बात को आगे बढ़ाने लगे I इस बात को आप कोरोना के इलाज के लिए गोबर स्नान और गौ मूत्र सेवन से भी समझ सकते हैं हम जैसे किसान समुदाय से सम्बन्ध रखने वाले लोगों के पूर्वज हजारों सालों से गाय पालते आ रहे हैं लेकिन उन्होंने गाय का दूध पीया, घी खाया पर गोबर से नहीं नहाए और न ही मूत पीया परन्तु ऐसे लोग जिन्होंने हमारे जितनी तादाद में इतिहास के किसी भी दौर में गायों को नहीं पाला वे लोग हमें गाय का मूत पीने और गोबर लपेटने की सलाह दे रहे हैं और हमारे भी कुछ नासमझ बहन-भाई उनकी हां में हां भी मिला रहे हैं अगर आने वाले सालों में ये सिलसिला ऐसे ही चलता रहा तो इन बातों की सेंधमारी इतनी ज्यादा हो जाएगी कि किसी दिन कोई व्यक्ति आकर मंच पर खड़ा होकर बड़ी कुटिलता और बेशर्मी से यह कहेगा कि आपके पूर्वज गोबर और गौ मूत्र का सेवन करते थे और हम कहेंगे कि हां जी करते थे, इसलिए निवेदन है कि तर्कशील बनें और बिना जांच-पड़ताल के हर तरह की बात को अपने गले का हार बनाने से बचें I

लघुकथा -जो जिसके काम आए

    लघुकथा - जो जिसके काम आए - 
            "जो जिसके काम आए" - 
बात बहुत पुरानी है। एक गांव में भले और मेहनती लोग रहा करते थे। गांव का ठाकुर हुकुम सिंह खूब रसूखदार और बड़ा जमींदार था।
गांव में किसी के कोई काम होता तो वो हमेशा लवाजमे के साथ घोड़े पर सवार हो कर आता, परिवार के सदस्यों को बाहर से ही जोर से पुकारता और कहता कि मेरे लायक कोई काम हो तो ज़रूर बताना।
लोग ठीक है ठाकुर हुकुम कह कर मुजरा करते।
गांव के एक किसान राधे की मां का देहांत हुआ, ठाकुर हुकुम सिंह वही घोड़े पर सवार हो कर आए, वही पहले वाली बात दोहराई।
राधे ने अन्य गांव वालों की तरह जी हुकुम कह कर अर्थी का काम करने लगा।
थोड़े दिन बीते ठाकुर साहब की मां का निधन हो गया।
गांव वालों को यह सूचना मिली तो सब राधे के घर इकट्ठे हुए।
राधे थोड़ा पढ़ा - लिखा किसान था।
उसने गांव के लोगों से कहा, यह ठाकुर साहब हमारे किसी भी काम पर आते हैं, बाहर ड्योढ़ी से ही किसी काम के बारे में पूछ कर चले जाते हैं। इन्हें सबक़ सिखाना चाहिए।
निहंग सिंह ने राधे की हां में हां मिलाते हुए उसका समर्थन किया।
ठाकुर को उसी की भाषा में सबक़ सिखाया जाना चाहिए, पर कैसे ? यह प्रश्न सभी को चिंतित कर रहा था।
कर्माराम ने कहा, क्यों ना हम कहीं से किराए के घोड़े मंगवा कर ठाकुर के घर चलें।
यह सुझाव सब को पसंद आया। 
तुरंत गांव का एक आदमी शहर गया और तीस - चालीस घोड़े ले आया।
गांव के बुजुर्ग और नौजवान घोड़ों पर सवार हो कर पहुंच गए ठाकुर साहब की हवेली पर।
ठाकुर हुकुम!
ठाकुर हुकुम!
ड्योढ़ी पर बैठे ठाकुर साहब लोगों का इंतजार कर रहे थे कि कब वो आएं, अर्थी का काम करें। 
सुबह के समय मां का देहांत हुआ था, शाम होने के करीब है, पर अर्थी नहीं सजी।
हुकुम सिंह ने सभी को आकर जल्दी अर्थी सजाने का काम करने का अनुरोध किया।
राधे, हरनाम, कर्माराम, चेतन, पल्लव, चरण सिंह ने एक साथ जोर से जवाब दिया!
ठाकुर साहब हमारे लायक कोई काम हो तो बताना और पलट कर घोड़ों को मोड़ दिया।
ठाकुर घिघयाने लगा, ऐसा मत करो, मैं अपनी मां की अर्थी अकेले कैसे बनाऊं।
लोगों तपाक से जवाब दिया, ठाकुर साहब आपने जितना किया उतना हमने कर दिया।
आपने कितनों की मां की अर्थी सजाई है जो हम आपकी मां की अर्थी सजाएं।
अब ठाकुर समझ गया, उसने सब से माफी मांगते हुए पछतावा जाहिर किया।
गांव वालों ने ठाकुर को सबक सिखाया।

शिक्षा - हम जिसके जितने काम आते हैं लोग उतना ही हमारे काम आएंगे।
#जिगर_चूरुवी

Thursday, 16 October 2025

कहानी - कश्मीर में पढ़ने वाले छात्र की

#कहानी #कश्मीर_आंदोलन_की
राजस्थान से बाहर कश्मीर में 21 दिन के सफल आंदोलन की कहानी, साल- 2007
नंदऋषी कालेज बड़गांव श्रीनगर में अक्टूबर माह की सुबह का तकरीबन 10:00 बजे का वक़्त, कॉलेज के सभी साथी क्लासेज की तैयारी कर रहे थे, हम उसी कैंपस के होस्टल में रहते थे कि मेरा दोस्त दौड़ता हुआ आया के आज मेडम ने फाइन जमा करवा कर ही क्लास लेने को कहा है। 
हम 20-25 साथी मैडम से पूछने गये कि फाइन किस बात का ,जवाब आया मेरा बस चले तो तुम लोगों के सांस लेने पर भी फाइन लगा दूँ।
अक्सर शांत रहने वाला मैं, न जाने क्या हुआ, यकायक मेडम ओर स्टाफ से उलझ गया और विरोध शुरू कर दिया।
भानू प्रताप भागा-भागा आया के पूजा (जयपुर से B. Ed. साथी) को लेबर पैन शुरू हो गया है। मैं उस के लिए रिक्शा लेने दौड़ा। रिक्शा आ गया पर मेडम ने किसी को भी बाहर जाने की सख्त मनाही कर दी। हम ने उनसे कहा आप जितना चाहो हम से फाइन ले लो लेकिन अभी हमारी बहन को हस्पताल ले जाने दो, लेकिन वो पत्थर दिल ना पिघली हम लाख मन्नत करते रहे ,आखिर वो बेहोश हो गयी ओर खून बहने लगा, हम मन्नत पर मन्नत कर रहे थे पर मैडम ना मानी और पूजा का बच्चा उस के गर्भ में खत्म हो गया । मैने पूजा को जबरदस्ती ऑटो में डाल कर लाल डैड हॉस्पिटल श्रीनगर में भर्ती करवाया।
हमारा गुस्सा 7वें आसमा पर था, कुछ साथियों को हस्पताल छोड़ कर मैडम के केबिन में घुस गया और घरने व अनशन का एलान कर दिया।
वक़्त करीब शाम के 6:00-6:30 रहा होगा हम साथियों के साथ बड़गांव पुलिस स्टेशन पहुंचे और अनशन की प्रथम सूचना दी। बड़गांव पुलिस थाने के C. I. साहब को पूरी बात बताकर बड़गांव के चौराहे पर छात्र संघर्ष समिति के बैनर तले 11 सुत्री मांग पत्र के पूरे होने तक अनिश्चचित काल के लिए अनशन पर बैठ गए।
एक दिन कुछ खास न हुआ, दूसरे दिन C.I. साहब हमें लेकर कॉलेज गये, वार्ता करवाई पर सफलता नही मिली। इस दौरान वहां की सरकार, भारत सरकार, यूनिवर्सिटी प्रशासन, ज़िला प्रशासन बड़गांव, राजस्थान सरकार, हिमाचल सरकार, पंजाब व हरयाणा सरकार को भी ई मेल और फैक्स के माध्यम से सूचित कर दिया गया।
दो दिन बाद श्रीनगर यूनिवर्सिटी के डीन साहब लवाजमे के साथ आ पहुंचे असफल वार्ता के कारण वो थोड़ा गुस्सा दिखाकर चले गए, इस तरह 9 दिन बीत गए, साथी हिम्मत हारने लगे, हम कुछ लोग दिन में अनशन पर ओर रात को दूसरे कॉलेजों में जाकर लोगों को 11 सुत्री मांग पत्र के समर्थन के लिए मिलते रहे। 
अज़ीज, राजू, आशीष, भानु, जीतू, मदन, मांगीलाल, देव, रमाकांत, रणवीर, जाखड़, मुरली, पंडित जी जैसे लोग मेरे सुरक्षा के लिए मुस्तेद रहते थे इस कि वजह थी मैडम की धमकियां। 
अब उन लोगो ने जब डराने धमकाने से काम नही चलता देखा तो रात करीब 10:00 बजे हमें वार्ता के लिए बुलाया। वार्ता की पर हम अपनी मांगों पर अड़े रहे, अचानक मेडम ने एक थैला मेरे सामने रख दिया, पूछने पर बताया कि उस मे 20 लाख रुपये है जो मेरे लिए आंदोलन खत्म करने पर सारे कॉलेज वालों ने इक्कठे किये है और मेरे 18 साथियों की पूरी फीस माफ करने का भी इरादा जताया। वर्ना दूसरा रास्ता भी होने की धमकियां देने लगे। मैं टॉयलेट के बहाने से वहां से निकला और पूरी बात साथियों को बताई। 
आंदोलन को तकरीबन 15 दिन हो गए थे मेरी हालत बिगड़ने लगी थी साथी जिद छोड़ कर समझौते के लिए मनाने लगे पर हम कब मानने वाले थे। कुछ साथी मज़बूत थे और आंदोलन चलता रहा।
21वें दिन यूनिवर्सिटी डीन व कश्मीर के लोकल MLA साहब अच्छे इंसान थे, के साथ हमारी वार्ता हुई जिस में - 
1. 50 स्टूडेंट्स को 50000 रुपये प्रति स्टूडेन्ट स्कॉलरशिप।
2. पूजा को कंपनसेशन।
3. सभी तरह का फाइन माफ।
4. 25 रुपये का लिफाफा मय एडरेस लेकर छात्रों की मार्कशीट उन के घर पहुंचाना।
5. यूनिवर्सिटी द्वारा तय फीस से तकरीबन 24 करोड़ रुपये ज्यादा ली गई फीस 7 दिन में वापस करना।
6. श्रीनगर यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले छात्रों को किसी तरह परेशान नहीं करना।
7. प्रिंसिपल मैडम को हटा कर दूसरा प्रिंसिपल लगाना।
जैसी मांगे मान ली गईं और हमने आंदोलन समाप्त करने की घोषणा कर दी।
पांच दिन बाद सभी स्टूडेंट्स से 14 हजार से 25 हजार रुपए फाइन के रूप में लिए गए पैसे कैंप लगा कर वापस किए गए। हमने रेजगी (खुल्ले रुपए) भी उनमें नहीं छोड़े। मैडम कट्टे भर भर कर रुपए लाई। हमने सभी स्टूडेंट्स को पूरी राशि मिलने के बाद अंत में अपने 16557 रुपए प्राप्त किए।
इस तरह हमारा तीसरा व राजस्थान से बाहर पहला 21 दिन चला आंदोलन सफलता पूर्वक पूरा हुआ।
"हक़ के लिए लड़ाई लड़ना गुनाह नहीं"
 ठाकुर शमशेर भालू खान

Saturday, 4 October 2025

लघुकथा - भाई -भाई

लघुकथा - भाई भाई की लड़ाई
सुंदर वन में हरियल चिड़िया का घोंसला था। हरियल के दो बेटे थे, एक का नाम गोलू और दूसरे का नाम ढोलू था। दोनों में बहुत प्रेम था। माता - पिता का लाया दाना आपस में दोनों भाई प्रेम से बांट कर खाते।
उसी जंगल में दुष्ट नाम का सांप और झपकी बिल्ली भी रहते थे।
दोनों की नजर सुंदर गोलू - ढोलू को चारा बनाने की थी। वो हर समय उनको झपटने की ताक में रहते। हरियल और उसकी पत्नी यह जानते थे कि उनके बच्चों पर दुष्ट और झपकी की नजर है।
एक दिन दुष्ट घोंसले तक पहुंच गया। दोनों भाई जोर - जोर से चींचीं करने लगे। आस - पास के सभी चीड़ा - चीड़ी इकठ्ठे हो गए। सब ने एक साथ चोंच से दुष्ट पर आक्रमण कर दिया। घायल सांप पेड़ कांटों में गिरा और मारा गया। 
बच्चे अब बड़े हो गए। एक दिन दिनों ने पिता हरियल से कहा कि वो अपना अलग घोंसला बना कर घर बसाना चाहते हैं। हरियल खुश हुआ। हरियल और उसकी पत्नी ने दोनों बेटों के घोंसले बनाने में सहायता की।
समय बीतता गया। दोनों भाइयों के भी बच्चे हो गए।
एक दिन गोलू की पत्नी ने कहा, ढोलू के बच्चे हम जो दाना चुग कर लाते हैं उन में से खा जाते हैं। आप अपने भाई से कहें अपने बच्चों के लिए खुद दाना लाएं, हमारा दाना ना चुगें। गोलू ने, "ठीक है मैं कह दूंगा" कहते हुए बात टाल दी।
बच्चे तो आखिर बच्चे हैं, आपस में एक साथ दाना चुगते, खेलते और लड़ते। गोलू की पत्नी को यह बिल्कुल पसंद नहीं था। इस बात को लेकर दोनों देवरानी - जेठानी में बार - बार तकरार होने लगी। बाहर से आने पर दोनों अपने - अपने पतियों को दिन भर में क्या हुआ, बढ़ा - चढ़ा कर सुनाती। दोनों हंसी - हंसी में सुनकर टाल देते।
एक दिन गोलू की पत्नी ढोलु के घोंसले में आई, बच्चों को मारा और ढोलू की पत्नी के पंख नोच डाले। ढोलू धार्मिक आदमी था, दस दिन के लिए तीर्थ पर गया हुआ था।
पत्नी ने संदेश भेजा तो उसने कहलवाया कि "ठीक है एक बार तुम शांत रहो मैं आकर बात करूंगा।"
ढोलू आया उसने गोलू को भाभी की हरकत पर उलाहना दिया। अब गोलू वो भाई नहीं रहा, पत्नी की बातें सुन - सुनकर बदल चुका था। दोनों में तकरार शुरू हो गई। पड़ोसी घोंसले वाले सब देख रहे थे, पर उन्हें छुड़वाने की हिम्मत किसी में नहीं थी।
दोनों कहासुनी के थोड़ी देर में गुत्थमगुथी हो गए। 
लड़ते - लड़ते घोंसले से सड़क पर कब आ गए पता ही नहीं चला।
झपकी बिल्ली इसी मौके की तलाश में थी। वो लड़ते गोलू - ढोलू पर झपटी, मुंह में दबाया और चलती बनी।
शिक्षा 
- लड़ाई का अंत स्वयं के अंत के साथ होता है।
- लड़ाई समाधान नहीं अंत है।
जिगर चुरूवी (शमशेर भालू खां)