Tuesday, 6 January 2026

प्रादेशिक क्षेत्रीयता का सिद्धांत -

प्रादेशिक क्षेत्रीयता का सिद्धांत - 
Theory of Nexus Territory - 
प्रादेशिक क्षेत्रीयता के सिद्धांत की अवधारणात्मक उत्पत्ति और आवश्यकता  - 
प्रादेशिक क्षेत्रीयता का सिद्धांत इस धारणा पर आधारित है कि कानून केवल भौगोलिक बिंदुओं पर लागू नहीं होते, बल्कि वे उन व्यक्तियों, संपत्तियों और गतिविधियों पर लागू होते हैं जिनका राज्य के साथ कोई कार्यात्मक संबंध होता है 。 यह सिद्धांत मूलतः औपनिवेशिक काल के दौरान विकसित हुआ और भारत सरकार अधिनियम, 1935 की धारा 99 से इसकी प्रेरणा ली गई है।
संघीय ढांचे में, यह सिद्धांत राज्यों को अपने आर्थिक और सामाजिक हितों की रक्षा करने की अनुमति देता है, भले ही संबंधित व्यक्ति या संपत्ति भौतिक रूप से राज्य के बाहर स्थित हो। उदाहरण के लिए, यदि कोई कंपनी किसी राज्य के भीतर भारी मुनाफा कमा रही है लेकिन उसका मुख्यालय दूसरे राज्य में है, तो कराधान के उद्देश्यों के लिए राज्य उस कंपनी के साथ अपने संबंध का दावा कर सकता है। बिना इस सिद्धांत के, राज्य की सीमाओं का उपयोग कानून से बचने के लिए एक 'सुरक्षित पनाहगाह' के रूप में किया जा सकता था।
पर्याप्त संबंध के निर्धारण के लिए द्वि-स्तरीय परीक्षण - 
न्यायपालिका ने वर्षों के शोध से दो बुनियादी शर्तें स्थापित की हैं जिन्हें किसी भी कानून को नेक्सस के आधार पर वैध होने के लिए पूरा करना आवश्यक है।
(01). संबंध वास्तविक होना चाहिए (Real and not Illusory) - 
राज्य और विनियमित विषय (व्यक्ति, वस्तु या घटना) के बीच का संबंध ठोस और प्रत्यक्ष होना चाहिए। केवल कल्पना या अत्यंत दूर के संबंध के आधार पर क्षेत्राधिकार का विस्तार नहीं किया जा सकता।
(02). दायित्व संबंध के प्रासंगिक होना चाहिए (Liability pertinent to the connection) - 
जिस व्यक्ति या वस्तु पर कानून लागू किया जा रहा है, उस पर डाला गया बोझ या दायित्व (जैसे कर या दंड) सीधे उस संबंध से जुड़ा होना चाहिए जो राज्य और उस विषय के बीच मौजूद है।
इन दोनों शर्तों की पूर्ति का निर्धारण करना पूर्णतः तथ्यों का प्रश्न है और न्यायालय प्रत्येक मामले की परिस्थितियों के अनुसार इसकी जांच करता है।

भारत के संविधान में प्रादेशिक क्षेत्रीयता का सिद्धांत: एक विस्तृत विश्लेषण - (भाग XI, अनुच्छेद 245)
भारतीय संवैधानिक व्यवस्था की आधारशिला संघवाद के उन सिद्धांतों पर टिकी है जो केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों के एक स्पष्ट और न्यायसंगत विभाजन की वकालत करते हैं। इस ढांचे में, विधायी शक्तियों का वितरण न केवल विषय-वस्तु के आधार पर किया गया है, बल्कि क्षेत्रीय विस्तार के आधार पर भी इसे सावधानीपूर्वक रेखांकित किया गया है । 'प्रादेशिक क्षेत्रीयता का सिद्धांत' (Doctrine of Territorial Nexus) भारतीय संविधान के अनुच्छेद 245 की व्याख्या से उपजा एक अत्यंत महत्वपूर्ण न्यायिक सिद्धांत है। यह सिद्धांत उस प्रश्न का उत्तर देता है कि क्या और किन परिस्थितियों में किसी राज्य विधानमंडल द्वारा बनाया गया कानून उस राज्य की भौगोलिक सीमाओं के बाहर प्रभावी हो सकता है । 
विधायी संबंधों का संवैधानिक आधार और क्षेत्रीय विस्तार - 
भारतीय संविधान का भाग XI केंद्र और राज्यों के बीच विधायी और प्रशासनिक संबंधों को समर्पित है। इस भाग का अनुच्छेद 245 विधायी शक्तियों के क्षेत्रीय विस्तार की सीमाओं को निर्धारित करता है, जबकि अनुच्छेद 246 विषय-वस्तु के आधार पर इन शक्तियों के वितरण को स्पष्ट करता है । अनुच्छेद 245(1) के अनुसार, संसद भारत के संपूर्ण क्षेत्र या उसके किसी भाग के लिए कानून बना सकती है, जबकि किसी राज्य का विधानमंडल केवल उस विशिष्ट राज्य के लिए कानून बनाने के लिए सक्षम है । 
क्षेत्रीयता का यह सामान्य नियम अत्यंत स्पष्ट है। एक राज्य कानून की शक्ति उस राज्य की सीमाओं पर समाप्त हो जाती है। हालांकि, आधुनिक शासन और जटिल आर्थिक गतिविधियों के युग में, एक राज्य के भीतर होने वाली घटनाओं का प्रभाव अक्सर दूसरे राज्यों पर पड़ता है। यहीं पर प्रादेशिक क्षेत्रीयता का सिद्धांत एक अपवाद के रूप में उभरता है। यह सिद्धांत यह प्रतिपादित करता है कि यदि किसी कानून के विषय-वस्तु और उस राज्य के बीच एक पर्याप्त और वास्तविक संबंध (Sufficient and Real Nexus) मौजूद है, तो वह कानून अपनी क्षेत्रीय सीमाओं के बाहर भी वैध माना जा सकता है।
संसद बनाम राज्य विधानमंडल - 
क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र का तुलनात्मक विश्लेषण
संविधान निर्माता केंद्र और राज्यों की क्षेत्रीय शक्तियों के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर को लेकर स्पष्ट थे। अनुच्छेद 245(2) स्पष्ट रूप से घोषित करता है कि संसद द्वारा बनाया गया कोई भी कानून केवल इस आधार पर अमान्य नहीं ठहराया जा सकता कि उसका प्रचालन 'अतिरिक्त-क्षेत्रीय' (Extra-territorial) है । इसका अर्थ है कि संसद के पास भारत की सीमाओं के बाहर भी कानून लागू करने की संप्रभु शक्ति है, बशर्ते उसका भारत के साथ कोई संबंध हो । इसके विपरीत, राज्यों के पास ऐसी कोई स्पष्ट संवैधानिक सुरक्षा नहीं है । राज्यों के लिए, अतिरिक्त-क्षेत्रीय प्रचालन की वैधता केवल 'नेक्सस' या संबंध की पर्याप्तता पर निर्भर करती है।

ऐतिहासिक न्यायिक विकास और प्रमुख वाद - 
प्रादेशिक क्षेत्रीयता के सिद्धांत का विकास भारतीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए कई ऐतिहासिक निर्णयों के माध्यम से हुआ है। ये मामले न केवल सिद्धांत की व्याख्या करते हैं, बल्कि इसकी व्यावहारिक सीमाओं को भी रेखांकित करते हैं।

वॉलेस ब्रदर्स एंड कंपनी लिमिटेड बनाम आयकर आयुक्त (1948)
यह मामला इस सिद्धांत की शुरुआती और सबसे प्रभावशाली व्याख्याओं में से एक है

01. प्रिवी काउंसिल का निर्णय - 
प्रिवी काउंसिल के समक्ष मुख्य विवाद एक ऐसी कंपनी के कराधान से संबंधित था जो इंग्लैंड में पंजीकृत थी और वहां से अपना व्यवसाय संचालित करती थी। हालांकि, उस कंपनी ने संबंधित वित्तीय वर्ष के दौरान भारत (तत्कालीन ब्रिटिश भारत) में एक स्थानीय फर्म के स्लीपिंग पार्टनर के रूप में अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा अर्जित किया।
प्रिवी काउंसिल ने यह निर्धारित किया कि किसी विदेशी कंपनी पर भारत में आय कर लगाना वैध है यदि उस आय का स्रोत भारत में है। न्यायालय ने तर्क दिया कि कंपनी द्वारा भारत से अर्जित किया गया भारी मुनाफा उसे भारत में घर जैसा (at home in India) बनाने के लिए पर्याप्त था। इस आर्थिक नेक्सस ने भारतीय आयकर अधिकारियों को उस कंपनी की पूरी आय पर कर लगाने का अधिकार दिया। 

बॉम्बे राज्य V. RMD चमारबागवाला (1957)
यह भारत के संवैधानिक इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण मामलों में से एक है, जिसने नेक्सस सिद्धांत को कर और जुआ कानूनों के संदर्भ में दृढ़ता से स्थापित किया।
तथ्य और विवाद - 
प्रतिवादी मैसूर राज्य (वर्तमान कर्नाटक) निवासी RMD चमारबागवाला मैसूर से स्पोर्टिंग स्टार नामक साप्ताहिक समाचार पत्र प्रकाशित करते थे, जिसमें  RMD Cross ward नाम से एक इनामी प्रतियोगिता का प्रकाशन करते थे। यद्यपि प्रकाशन और प्रकाशक बॉम्बे राज्य की सीमाओं के बाहर थे, लेकिन समाचार पत्र का बॉम्बे में व्यापक प्रसार था । बॉम्बे राज्य के भीतर उन्होंने प्रविष्टि फॉर्म और शुल्क एकत्र करने के लिए कई डिपो स्थापित किए थे, स्थानीय एजेंट नियुक्त किए और विज्ञापन के माध्यम से बॉम्बे के नागरिकों को भाग लेने हेतु प्रेरित किया। बॉम्बे सरकार ने बॉम्बे लॉटरी और इनामी प्रतियोगिता नियंत्रण और कर अधिनियम, 1948 के तहत आयोजनों पर कर लगा दिया, जिसे क्षेत्राधिकार के आधार पर चुनौती दी गई।
सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय - 
सर्वोच्च न्यायालय ने नेक्सस के सिद्धांतों को लागू करते हुए बॉम्बे राज्य के पक्ष में निर्णय दिया। न्यायालय ने उन विशिष्ट तथ्यों की पहचान की जो पर्याप्त क्षेत्रीय संबंध बनाते थे।
क. समाचार पत्र का बॉम्बे में व्यापक प्रसार और वहां के नागरिकों का लक्षित पाठक वर्ग होना 
. बॉम्बे के भीतर संग्रह डिपो और स्थानीय एजेंटों की भौतिक उपस्थिति 
. वह तथ्य कि प्रतियोगिता के लिए आवश्यक सभी गतिविधियाँ (फॉर्म भरना, शुल्क देना) बॉम्बे के भीतर ही पूर्ण की जा रही थीं।
के आधार पर न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि चूंकि प्रतियोगिता का सार और उसकी व्यावसायिक सफलता बॉम्बे के भीतर की गतिविधियों पर निर्भर थी, इसलिए राज्य को उस पर कर लगाने का पूर्ण अधिकार था। यह भी स्पष्ट किया गया कि चूंकि कर केवल बॉम्बे से एकत्र की गई राशियों पर लगाया गया था, इसलिए यह कानून क्षेत्राधिकार से बाहर नहीं था।

बिहार राज्य बनाम श्रीमती चारुशिला दासी (1959) - 
यह मामला धार्मिक बंदोबस्ती और राज्य की नियामक शक्ति के बीच संबंधों को स्पष्ट करता है। बिहार विधानमंडल ने हिंदू धार्मिक ट्रस्टों के बेहतर प्रशासन के लिए एक कानून बनाया था, जिसे एक ऐसे ट्रस्ट पर लागू किया गया जिसका मुख्य केंद्र बिहार में था, लेकिन उसकी संपत्तियां कलकत्ता में भी थीं।
विवाद - 
श्रीमती चारुशिला दासी ने तर्क दिया कि बिहार का कानून कलकत्ता (पश्चिम बंगाल) में स्थित उनकी अचल संपत्तियों को विनियमित नहीं कर सकता, क्योंकि बिहार की विधायी शक्ति राज्य की सीमाओं तक सीमित है।
न्यायालय का विश्लेषण - 
सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि नेक्सस का सिद्धांत मात्र कराधान तक सीमित नहीं है। न्यायालय ने पाया कि चूंकि ट्रस्ट की स्थापना बिहार में हुई, उसके देवता बिहार के एक मंदिर में स्थापित थे, और ट्रस्ट के प्रबंधक (सेबियत) बिहार में रहकर कार्य कर रहे थे, इसलिए ट्रस्ट और राज्य के बीच एक अविभाज्य संबंध था । न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अधिनियम का मुख्य उद्देश्य ट्रस्ट का प्रशासन है, न कि भौतिक संपत्ति पर कब्जा करना। चूंकि ट्रस्ट का प्रशासन बिहार में केंद्रित था, इसलिए कलकत्ता की संपत्तियां भी इस कानून के दायरे में होंगी।

कराधान कानूनों में सिद्धांत का व्यापक प्रभाव - 
कर कानूनों के क्षेत्र में प्रादेशिक क्षेत्रीयता का सिद्धांत राज्य की वित्तीय संप्रभुता को बनाए रखने का एक सशक्त माध्यम है। राज्य अक्सर स्रोत-आधारित कराधान (Source-based taxation) का उपयोग करते हैं, जहाँ कर लगाने का अधिकार उस स्थान पर होता है जहाँ आय उत्पन्न होती है या जहाँ संपत्ति स्थित होती है।
इस आधार के मामले - कर का प्रकार नेक्सस का आधार न्यायिक निष्कर्ष 
कंपनी  V. सरकार  वर्ष      विवाद 
TISCO   बिहार  1958  बिक्री कर
इस मामले में कच्चे माल की उपलब्धता और उत्पादन बिहार में हो रहा था इसलिए यह कराधान (उत्पादन का स्थान पर्याप्त नेक्सस) के आधार पर वैध है।
बिहार बनाम शंकर वायर (1969) विनिर्माण और सत्यापन शुल्क बाट और माप का निर्माण बिहार में होने (निर्माण का बिंदु उपभोक्ता सुरक्षा के लिए नेक्सस है) के आधार पर कराधान वैध माना गया। 
मलयालम प्लांटेशन बनाम उपायुक्त (1964)  बिक्री कर उपभोग के लिए माल की डिलीवरी का स्थान अनुच्छेद 286 नेक्सस सिद्धांत को पूरी तरह बाहर नहीं करता।
इन न्यायिक दृष्टांतों से स्पष्ट है कि आधुनिक वाणिज्य में, जहाँ लेनदेन कई राज्यों में फैले होते हैं, राज्य उस कड़ी को पकड़ने का प्रयास करते हैं जो उनके क्षेत्र से जुड़ी होती है।  उदाहरण के लिए, माल एवं सेवा कर (GST) के पूर्व दौर में, राज्यों के बीच उद्गम (Origin) बनाम गंतव्य (Destination) के आधार पर कर लगाने के विवाद अक्सर नेक्सस सिद्धांत द्वारा ही सुलझाए जाते थे।

व्यक्तिगत और सामाजिक कानूनों में सिद्धांत की सीमाएं - 
यद्यपि कर और आर्थिक कानूनों में नेक्सस सिद्धांत को उदारतापूर्वक लागू किया गया है, लेकिन जब बात व्यक्तिगत संबंधों या सामाजिक अपराधों की आती है, तो न्यायालय अत्यंत सतर्क रहते हैं।

सोंदुर गोपाल बनाम सोंदुर रजनी (2013) - 
इस मामले ने यह स्पष्ट किया कि अधिवास (Domicile) व्यक्तिगत कानूनों के लिए प्राथमिक नेक्सस है। एक हिंदू जोड़ा जो भारत छोड़कर विदेश चला गया, उनके बीच तलाक का मामला मुंबई की एक अदालत में दायर किया गया। पति ने तर्क दिया कि चूंकि वे अब भारत में नहीं रहते इसलिए भारतीय अदालतों का अधिकार क्षेत्र समाप्त हो गया है। सर्वोच्च न्यायालय ने हिंदू विवाह अधिनियम के अतिरिक्त क्षेत्रीय प्रभाव का विश्लेषण करते हुए कहा कि चूंकि जोड़ा अब भी भारतीय अधिवास (Indian Domicile) रखता है, इसलिए भारत और उनके बीच का नेक्सस बना हुआ था। न्यायालय ने इस विचार को खारिज कर दिया कि यह कानून दुनिया के सभी हिंदुओं पर लागू होता है; यह केवल उन पर लागू होता है जिनका भारत के साथ अधिवास के माध्यम से संबंध है।

उत्तराखंड समान नागरिक संहिता (UCC) का उदाहरण - 
इन चर्चाओं में उत्तराखंड राज्य की समान नागरिक संहिता को इसके अतिरिक्त क्षेत्रीय प्रभाव के लिए आलोचनात्मक रूप से देखा गया है। संहिता में प्रावधान है कि यह उत्तराखंड के उन 'निवासियों' पर भी लागू होगी जो राज्य के बाहर रह रहे हैं। कानूनी विशेषज्ञों का तर्क है कि निवासी का दर्जा स्वयं में पर्याप्त नेक्सस नहीं हो सकता है कि वह राज्य के बाहर किए गए विवाह या लिव-इन संबंधों को विनियमित करे । यह सिद्धांत कि अपराध स्थानीय है (Crime is Local), यहाँ महत्वपूर्ण हो जाता है। यदि कोई निवासी दिल्ली में लिव-इन संबंध में रहने का पंजीकरण नहीं कराता है, तो उत्तराखंड राज्य उसे दंडित करने का अधिकार नहीं रख सकता, क्योंकि उस कृत्य का उत्तराखंड के साथ कोई कार्यात्मक संबंध नहीं है।

विफलता के मामले - जब नेक्सस अपर्याप्त पाया गया - 
हर वह कानून जो क्षेत्रीय सीमाओं को पार करने का प्रयास करता है, उसे नेक्सस सिद्धांत के तहत सुरक्षा नहीं मिलती। कुछ मामलों में न्यायालयों ने स्पष्ट रूप से पाया कि प्रस्तावित संबंध काल्पनिक या अवैध था।

बॉम्बे राज्य बनाम नारायणदास मंगीलाल दयामे (1957) - 
बॉम्बे उच्च न्यायालय की एक पूर्ण पीठ ने एक ऐसे प्रावधान को अवैध घोषित किया जिसने बॉम्बे के उन निवासियों को दंडित करने का प्रयास किया जिन्होंने राज्य के बाहर (बीकानेर में) दूसरा विवाह किया था। न्यायालय ने तर्क दिया कि: 
विवाह का अनुबंध बीकानेर में हुआ था, जो वहां के कानून के अनुसार वैध था।
बॉम्बे राज्य के पास अन्य संप्रभु क्षेत्रों (जैसे तत्कालीन रियासतें) में होने वाली घटनाओं को अपराध घोषित करने की विधायी क्षमता नहीं थी।
केवल 'निवास' एक ऐसा नेक्सस नहीं हो सकता जो राज्य को अपनी सीमाओं के बाहर दंडात्मक कानून लागू करने की अनुमति दे। न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि सामाजिक सुधार के नाम पर भी एक राज्य दूसरे राज्य की विधायी स्वायत्तता का उल्लंघन नहीं कर सकता। यदि पूरे देश में एकरूपता की आवश्यकता है, तो वह केंद्र सरकार (संसद) का विषय है।

शंकरराव बनाम महाराष्ट्र राज्य (1980)
महाराष्ट्र कृषि भूमि (सीमा निर्धारण) अधिनियम में एक संशोधन के माध्यम से यह प्रावधान किया गया कि महाराष्ट्र में रहने वाले किसानों की भूमि की अधिकतम सीमा तय करते समय उनके द्वारा भारत के अन्य राज्यों में रखी गई जमीन को भी जोड़ा जाएगा। उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ ने या भारत के किसी अन्य भाग में वाक्यांश को इस आधार पर रद्द कर दिया कि यह अतिरिक्त-क्षेत्रीय था, न्यायालय ने पाया कि महाराष्ट्र विधानमंडल दूसरे राज्यों की भूमि को विनियमित करने या उसे दंडित करने का अधिकार नहीं रखता है, और ऐसा करना अन्य राज्यों की विधायी क्षमता का अतिक्रमण है।
संसदीय संप्रभुता और नेक्सस की आवश्यकता
यद्यपि अनुच्छेद 245(2) संसद को अतिरिक्त-क्षेत्रीयता के आधार पर अमान्यता से सुरक्षा प्रदान करता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि संसद बिना किसी कारण के पूरी दुनिया के लिए कानून बना सकती है। 
GVK इंडस्ट्रीज लिमिटेड बनाम आयकर अधिकारी (2011) - 
के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने संसद की शक्तियों पर भी एक तार्किक सीमा लगाई।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि संसद द्वारा बनाया गया कानून 'भारत के लिए' होना चाहिए । यदि संसद कोई ऐसा कानून बनाती है जिसका भारत के लोगों, उसके क्षेत्र, उसकी अर्थव्यवस्था या उसकी सुरक्षा के साथ दूर-दूर तक कोई संबंध (नेक्सस) नहीं है, तो वह कानून अल्ट्रा-वायर्स और अमान्य होगा। न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 245(2) केवल एक सुरक्षात्मक कवच है, यह स्वतंत्र विधायी शक्ति का स्रोत नहीं है। निर्णय न्यायिक सीमा का निर्धारण, बिना नेक्सस के विदेशी मामलों में हस्तक्षेप वर्जित है।
संसद की विधायी शक्ति की सीमाएं - 
  व्याख्या | निहितार्थ 
. अनुच्छेद 245(1) संसद भारत के लिए कानून बना सकती है परंतु कानून का उद्देश्य भारत की भलाई होना चाहिए।
. अनुच्छेद 245(2) अतिरिक्त-क्षेत्रीय कानून की वैधता केवल तभी वैध यदि कोई प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष नेक्सस मौजूद हो।

आज के डिजिटल युग और साइबर क्षेत्राधिकार में सिद्धांत की प्रासंगिकता 
आज के दौर में, जहाँ डेटा को नया तेल माना जाता है और डिजिटल सीमाएं भौतिक सीमाओं को चुनौती दे रही हैं, प्रादेशिक क्षेत्रीयता का सिद्धांत नई चुनौतियों का सामना कर रहा है। इंटरनेट पर होने वाली गतिविधियाँ, ई-कॉमर्स और साइबर अपराध किसी भौगोलिक सीमा के अधीन नहीं होते।
उभरते हुए क्षेत्र और नेक्सस - 
डेटा संप्रभुता - 
यदि किसी विदेशी सर्वर पर भारतीय नागरिकों का डेटा संग्रहीत है, तो क्या भारतीय कानून उस पर लागू हो सकते हैं? यहाँ डेटा की उत्पत्ति' और 'उपभोक्ता का निवास' एक शक्तिशाली नेक्सस प्रदान करते हैं।
साइबर अपराध - 
यदि कोई हैकर विदेश से भारतीय बैंकिंग प्रणाली पर हमला करता है, तो प्रभाव का स्थान (Place of Impact) नेक्सस का आधार बनता है, जिससे भारत को उस पर कार्यवाही करने का अधिकार मिलता है।
ई-कॉमर्स और कर - 
ऑनलाइन सेवाओं के मामले में, जहाँ सेवा प्रदाता विदेश में है लेकिन उपभोग भारत में हो रहा है, उपभोग का स्थान (Place of Consumption) आधुनिक कर कानूनों में नेक्सस का प्रमुख आधार बन गया है।

सिद्धांत का संघीय महत्व और भविष्य का परिदृश्य - 
प्रादेशिक क्षेत्रीयता का सिद्धांत भारतीय संघवाद के सुचारू संचालन के लिए एक आवश्यक सुरक्षा वाल्व (Safety Valve) के रूप में कार्य करता है। यह राज्यों को अपनी सीमाओं के भीतर स्वायत्तता प्रदान करता है, साथ ही उन्हें उन बाहरी प्रभावों से निपटने की शक्ति भी देता है जो उनके आंतरिक कल्याण को बाधित करते हैं।
भविष्य की चुनौतियां और दृष्टिकोण
आने वाले समय में, जैसे-जैसे राज्यों के बीच और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहयोग बढ़ेगा, नेक्सस के मानकों को और अधिक स्पष्ट करने की आवश्यकता होगी।

विशेष रूप से निम्न क्षेत्रों में अधिक न्यायिक स्पष्टता की आवश्यकता है - 
पर्यावरण कानून: 
यदि एक राज्य में उद्योगों से होने वाला प्रदूषण दूसरे राज्य की नदियों को प्रभावित करता है, तो नेक्सस का विस्तार कैसे होगा।
बहु-राज्यीय व्यापार - 
जीएसटी के युग में, राज्यों के बीच कर संग्रह के विवादों को सुलझाने के लिए नेक्सस की भूमिका और अधिक जटिल हो गई है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) - 
एआई द्वारा उत्पन्न होने वाली कानूनी देनदारियों के मामले में क्षेत्राधिकार तय करने हेतु केवल ही एकमात्र मार्गदर्शक होगा।

निष्कर्ष और संश्लेषण
प्रादेशिक क्षेत्रीयता का सिद्धांत केवल एक कानूनी बारीकी नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक संवैधानिक दूरदर्शिता का हिस्सा है जो भारत जैसे विविधतापूर्ण और संघीय राष्ट्र की शासन व्यवस्था को बनाए रखती है। यह सिद्धांत स्पष्ट रूप से स्थापित करता है कि क्षेत्रीय सीमाओं को कानूनी न्याय के मार्ग में बाधा नहीं बनना चाहिए, लेकिन साथ ही यह राज्यों को असीमित शक्तियां प्राप्त करने से भी रोकता है।
जहाँ अनुच्छेद 245 संसद को अतिरिक्त-क्षेत्रीयता के लिए एक व्यापक कैनवास प्रदान करता है, वहीं राज्यों के लिए यह पर्याप्त संबंध की कठोर शर्तों के अधीन है। वॉलेस ब्रदर्स से लेकर GVK इंडस्ट्रीज तक की न्यायिक यात्रा यह दर्शाती है कि भारतीय न्यायपालिका ने हमेशा रूप (Form) के बजाय सार (Substance) को प्राथमिकता दी है।
अंततः, इस सिद्धांत की सफलता इसकी लचीलापन और तर्कसंगतता में निहित है। यह सुनिश्चित करता है कि कानून का शासन उन सीमाओं से परे भी अपना प्रभाव बनाए रखे जहाँ से उसे वास्तविक जीवन में पोषण प्राप्त होता है। आधुनिक युग की जटिलताओं के बीच, यह सिद्धांत एक प्रकाश स्तंभ के रूप में कार्य करता रहेगा, जो यह तय करेगा कि संप्रभुता की दीवारें कहाँ समाप्त होती हैं और न्याय का अधिकार क्षेत्र कहाँ से शुरू होता है। 

शमशेर भालू खां 
जिगर चूरूवी 

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