Wednesday, 12 February 2025

दयानंद सरस्वती

स्वामी दयानंद सरस्वती (आर्य समाज)
प्रथम जनगणना के समय स्वामी दयानंद सरस्वती ने आगरा से देश के सभी आर्यसमाजियो को धर्म के खाने में सनातन धर्म लिखवाने के निर्देश दिए।

यूट्यूब लिंक

मनुष्य कृत ग्रंथों में ईश्वर और ऋषियों की निंदा है, ऋषिकृत ग्रंथों में नहीं किसी की निंदा नहीं। - गुरु विरजानंद की स्वामी दयानंद सरस्वती को अंतिम शिक्षा।

स्वामी दयानंद सरस्वती स्वयं ब्राह्मण समाज से होते हुए भी ब्राह्मणवाद एवं कर्मकांड विरोधी थे।
      आर्य समाज का प्रतीक चिह्न
          गुरु विरजानंद जी 
स्वामी दयानंद सरस्वती का जीवन परिचय -
जन्म - 12 फ़रवरी 1824
(फाल्गुन दशमी, विक्रमी संवत् 1881)
जन्म स्थान - टंकारा जिला राजकोट, गुजरात, (मोरबी रियासत)
नाम - मूलशंकर तिवारी
(जन्म राशि मूल नक्षत्र मे होने के कारण नाम मूलशंकर)
अन्य उपाधियां - 
1. स्वामी - गुरु विरजानंद द्वारा
2. दयानंद सरस्वती (यह उपाधि एवं नाम गुरु विरजानंद ने दीक्षा के समय दिया।)
3. महर्षि - आर्य समाज द्वारा
4. सनातन स्वामी - आम जन
5.सिन्धी मारहू
पिता - कृष्ण जी लाल जी तिवारी (शेव ब्राह्मण) 
पिता का व्यवसाय - कर-कलेक्टर, मोरबी
माता - यशोदा बाई (वैष्णव ब्राह्मण)
मृत्यु/हत्या - 30 अक्टूबर 1883 (दीपावली के दिन सन्ध्या के समय)
शांत स्थान - अजमेर, राजस्थान
गुरु/शिक्षक - विरजानन्द दण्डीश (इन्हें अंधा गुरु भी कहा जाता है।)
धर्म - वेदों के विद्वान स्वामी विरजानंद ने दीक्षा दी थी. स्वामी विरजानंद को मथुरा के अंधे गुरु के नाम से भी जाना जाता है.।
जाति - शेव ब्राह्मण
दर्शन - आधुनिक भारतीय वैदिक दर्शन, 
नारा
1. वेदों की ओर लौटो 
2. स्वराज्य (1876)
राष्ट्रीयता - ब्रिटिश भारत
संस्थाएं
1. आर्य समाज
2. गौ कृष्य सभा
3. परोपकारिणी सभा
सिद्धांत - कर्म सिद्धान्त, पुनर्जन्म एवं सन्यास  
वाक्यांश
1. संसार सत्य धर्म पर चलने के स्थान पर अज्ञान के गहरे गड्ढ़े में गिर रहा है। (हरिद्वार कुंभ मेला - 1867)
2. हर की पैड़ी पर नहाने से पाप नहीं धुलते। वैदिक मार्ग, सद्कर्म और परोपकार से सुख और मोक्ष मिलेगा। 
3. सद्ग्रन्थों पढ़ना - सुनना और सत्य धर्मात्माओं की संगति ही सच्चा तीर्थ है।
4. कृण्वन्तो विश्वमार्यम् (अर्थात सारे संसार को श्रेष्ठ मानव बनाओ)।
5. स्वामी जी के अन्तिम शब्द थे - "प्रभु! तूने अच्छी लीला की। आपकी इच्छा पूर्ण हो।"
6. वेद (द्वारा प्रदत्त मार्ग ) पर चला जाये तो भारत राष्ट्र पुनः विश्वगुरु गौरवशाली, वैभवशाली, शक्तिशाली, संपन्न, सदाचारी और महान बन जायेगा।
7. मनसा वाचा कर्मणा धर्मोथानम उत्थानम् उदिष्यति।

स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा लिखित पुस्तक - 
स्वामी दयानन्द सरस्वती ने कई धार्मिक व सामाजिक पुस्तकें लिखीं। प्रारम्भिक पुस्तकें संस्कृत में थीं, किन्तु समय के साथ उन्होंने कई पुस्तकों को आर्य भाषा (हिन्दी) में लिखीं। इसका कारण हिन्दी की पहुँच संस्कृत से अधिक होना था। उत्तम लेखन हेतु हिंदी भाषा में लिखने वाले स्वामी दयानन्द लगभग प्रारम्भिक व्यक्ति थे।
स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा लिखित साहित्य कृतियाँ -
1. सत्यार्थ प्रकाश
2. ऋग्वेदादि भाष्य भूमिका
3. ऋग्वेद भाष्य
4. यजुर्वेद भाष्य
5. चतुर्वेद विषय सूची
6. संस्कार विधि
7. पंचमहायज्ञ विधि
8. आर्याभिविनय
9. गो करुणानिधि
10. आर्योद्देश्य रत्नमाला
11. भ्रान्ति निवारण
12. अष्टाध्यायी भाष्य
13. वेदांग प्रकाश
14. संस्कृत वाक्य प्रबोध
15. व्यवहार भानु

1. सत्यार्थ प्रकाश - 
चौदह समुल्लासों में रचित सत्यार्थ प्रकाश स्वामी दयानंद की सर्वोत्तम कृति है जिसके प्रथम दस समुल्लासों में वैदिक धर्म का प्रतिपादन तथा अंतिम चार समुल्लासों में देशी-विदेशी मत मतान्तरों की समीक्षा की गई है। स्वामी जी ने अपनी पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश के माध्यम से समाज को आध्यात्म और आस्तिकता से परिचित करवाया। महर्षि दयानंद ने सत्यार्थ प्रकाश में वेद, उपनिषद, षडदर्शन, बाल्मीकि रामायण, गीता का सार लिखा है। स्वामी दयानंद सरस्वती ने लगभग आठ हजार पुस्तकों का अध्ययन कर सत्यार्थ प्रकाश की रचना की।
वेलेन्टाइन शिरोल (अंग्रेज लेखक) ने इंडियन अनरेस्ट पुस्तक में तो सत्यार्थ प्रकाश को ब्रिटिश साम्राज्य की जड़ें खोखली करने वाला और दयानन्द सरस्वती को भारतीय अशांति का जन्मदाता कहा है।
2. आर्योद्देश्य रत्नमाला - 
8 पृष्ठ की आर्योद्देश्य रत्नमाला पुस्तक का प्रकाशन 1873 हुआ जिसमें आम बोलचाल के रूढ़ अर्थ वाले सौ शब्दों की परिभाषा दी गई है।
3. गौ करुणानिधि - 
गौ रक्षा कार्य को आंदोलन का रूप देने हेतु इस पुस्तक का प्रकाशन सन 1881 में किया गया। इस पुस्तक में गोकृष्यादि रक्षा समिति के माध्यम से गायों की रक्षा एवं पालन के संबंध में लिखा है। इस पुस्तक में पशुओं बलि के स्थान पर उनका पालन करने से प्राप्त लाभों का वर्णन  किया गया है। गाय व पशु पालन के साथ ही व्यवसाय की समीक्षा, नियम व उपनियमो का उल्लेख किया है।
4. व्यवहार भानु - 
धर्म एवं व्यवहार से संबंधित दृष्टिकोण को प्रतिपादित करने वाली इस पुस्तक का प्रकाशन वैदिक समिति बनारस द्वारा सन 1880 में किया गया।
5. स्वीकार पत्र (वसीयत) - 
स्वामी दयानंद सरस्वती को हत्या के प्रयासों के कारण मृत्यु का पूर्वाभास हो गया, जिसके कारण एक वसीयत के माध्यम से स्वामी जी ने उनके मरणोपरांत तेईस व्यक्तियों को परोपकारिणी सभा के सहवृत जिम्मेदार के रूप में उल्लेखित किया। उदयपुर में 27 फ़रवरी 1883 को इसका प्रकाशन किया गया। इन 23 व्यक्तियों में महादेव गोविन्द रानडे का भी नाम है।  इसके प्रकाशन के कुछ छः माह पश्चात ही उनका देहान्त हो गया था।
6. संस्कृत वाक्य प्रबोध - 
संस्कृत भाषा सिखाने हेतु लघु वार्तालाप पुस्तिका जिसमें संस्कृत भाषा के लघु वाक्यों को सार्थ हिन्दी समझाया गया है।

महा शिवरात्रि बोध के दिन वास्तविक शिव का बोध - 
एक दिन श्रीकृषण (पिता) ने मूलशंकर (स्वामी जी) को महा शिवरात्रि के  दिन व्रत रखने को कहा। मूलशंकर ने व्रत रखा और शिव की आराधना हेतु रात्रि के समय शिव मंदिर में गए। वहां चूहे शिव लिंग पर उत्पात मचा रहे थे। मूलशंकर यह कहते हुए घर चले गए कि यह लिंग और मूर्ति वो शिव शंकर नहीं है जिसकी कथा सुनाई जाती है। इसके पश्चात शिव की खोज में रत हो गए और इस पुस्तक के माध्यम से वास्तविक शिव के स्वरूप पर प्रकाश डाला।

8. मूलशंकर का गृह त्याग और स्वामी दयानंद बनने का सफर - 
स्वामी दयानंद सरस्वती की छोटी बहन और चाचा की हैजे के कारण हुई मृत्यु हो गई। इस घटना जीवन - मरण के संबंध में उनके मन में विचारोद्वेलना उत्पन्न की। माता - पिता से जीवन और मृत्यु से संबंधित सूक्ष्म ज्ञान के  प्रश्न करने लगे। इस कारण परिजनों ने उनका विवाह करने की सोची। इसका पता चलते ही (फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष में) सन 1846 में बाइस वर्ष की आयु में सत्य की खोज में घर से निकल कर गुरु स्वामी विरजानन्द के पास पहुंच गए। मथुरा में गुरु विरजानंद के सानिध्य में उन्हेंने पाणिनी व्याकरण, पतंजली - योगसूत्र तथा वेद - वेदांग का अध्ययन किया। गुरु विरजानंद ने गुरु दक्षिणा मांगते हुए आदेश दिया कि मत मतांतरों की अविद्या को मिटा कर वेदों का वास्तविक प्रकाश जन सामान्य तक पहुंचा कर वैदिक धर्म का प्रचार करो।
सन 1867 में स्वामी दयानंद ने गुरु की आज्ञा से सनातन यात्रा प्रारंभ करते हुए हरिद्वार में कुंभ के अवसर पर पाखण्ड खण्डिनी पताका फहराई। वहां उपस्थित पंडितों से शास्त्रार्थ कर धर्म का वास्तविक अर्थ समझाया। वहां से केशवचन्द्र सेन तथा देवेन्द्र नाथ ठाकुर के निमंत्रण पर स्वामी जी कलकत्ता चले गए। कलकत्ता पहुंच कर उन्होंने पूरे वस्त्र पहनना तथा हिन्दी में बोलना व लिखना प्रारंभ किया। कलकत्ता में तत्कालीन वाइसराय द राइट ऑनरेबल अर्ल लार्ड कैनिंग से कहा - "विदेशियों का राज्य पूर्ण सुखदायक नहीं है। परंतु भिन्न-भिन्न भाषा, पृथक-पृथक शिक्षा, अलग-अलग व्यवहार का छूटना अति दुष्कर है। इसके भिन्नता के कारण बिना स्वराज का उद्देश्य प्राप्त होना कठिन है।

स्वामी दयानंद सरस्वती का वैचारिक आन्दोलन (शास्त्रार्थ व व्याख्यान) - 
वैदिक ज्ञान के प्रचार हेतु उन्होंने समस्त भारत का भ्रमण प्रारंभ किया। वेदों के अलावा अन्य धर्म ग्रन्थ अप्रमाणित हैं, इस विषय पर रूढ़िवादी पंडितों से शास्त्रार्थ (धार्मिक बहस) करना पड़ा। उनकी दलीलों के सामने पण्डित और विद्वान हार मानते गये। शुद्ध संस्कृत भाषा में तार्किक धारा प्रवाह बोल कर अपनी बात साबित करते थे। स्वामी जी ने वेदों के अलावा ईसाई और इस्लामिक धर्म ग्रन्थों का भी गहन अध्ययन किया।
स्वामी जी ने त्रिस्तरीय प्रचार प्रारंभ किया - 1. ईसाई मतावलंबियों से शास्त्रार्थ
2. मुस्लिम मतावलंबियों से शास्त्रार्थ 
3. रूढ़िवादी पंडितों से शास्त्रार्थ 
स्वामी जी योगी थे जिनका प्राणायाम पर विशेष बल था। वे सामाजिक पुनर्गठन में सभी वर्णों तथा स्त्रियों की भागीदारी के पक्षधर थे।

दयानन्द सरस्वती के समाज सुधार कार्य - 
 यज्ञोपवीत संस्कार के समय का चित्र
महर्षि दयानन्द ने तत्कालीन समाज में व्याप्त कुरीतियों, अन्धविश्वास, रूढियों व पाखण्ड विरोध करते हुए वैदिक धर्म के प्रचार किया। सन् 1867 में कुम्भ मेले (हरिद्वार) में वैदिक धर्म का प्रचार करने हेतु आये। यहां लाखों स्त्री-पुरुष इस आशा से कि गंगा स्नान से उनके पाप धुल कर दुःख व जन्म-मरण से मुक्ति मिल जायेगी। यहां पण्डे धर्म उपदेश के नाम पर पाखण्ड के माध्यम लोगों को लूट रहे थे। स्वामी जी ने पण्डों के पाखण्ड की पोल खोलने हेतु अपने निवास-स्थान के आगे पाखण्ड-खण्डिनी पताका लिख कर एक झंडी गाड़ दी। यहीं, मूर्ति-पूजा, श्राद्ध कार्य, काल्पनिक अवतार व पुराणों का विरोध व्याख्यानों के माध्यम से शुरू कर दिया।उस समय यह अति दुष्कर कार्य था। लोग उन्हें कलिकाल रोगी, कुछ विधर्मी और नास्तिक बताना शुरू कर दिया। इस उपहास पर भी स्वामी जी अडिग रहे और अपना काम करते रहे तो पंडितों ने उनके विरुद्ध भाषण देना आरंभ कर दिया। पंडित भाषण में उन्हें गालियाँ देने लगे, स्वामी जी अपने काम में रत रहे। इसके बाद कई पंडित उनसे शास्त्रार्थ करने आए परन्तु स्वामी जी की तार्किक बहस से निरुत्तर हो कर लौट जाते।

स्वामी दयानंद सरस्वती ने सामाजिक कुरीतियों का जमकर विरोध किया जिनमें
जातिवाद, छुआछूत, बाल विवाह, बहुविवाह, सती प्रथा, मृतक श्राद्ध, पशु बलि, नर बलि, पर्दा प्रथा, देवदासी प्रथा, वेश्यावृत्ति, शवों को दफनाना या नदी में बहाना, मृत बच्चों को दफनाना, समुद्र यात्रा का निषेध प्रथाओं का खंडन किया।
समाज सुधार के कार्य हेतु उन्होंने गुण - कर्म - स्वभाव आधारित वर्ण व्यवस्था का समर्थन किया। शुद्धि आन्दोलन, दलितोद्धार, विधवा विवाह, अंतरजातीय विवाह, सार्वभौमिक शिक्षा, शिक्षा सहित नारी सशक्तिकरण, वेद सबके लिए एवं गुरुकुल शिक्षा सब के लिए का पुरजोर समर्थन किया। स्वामीजी ने प्रथम सनातन अनाथालय एवं गौ शाला की स्थापना की।
उन्होंने स्वदेशी आन्दोलन एवं हिंदी भाषा का समर्थन किया।

स्वामी दयानंद सरस्वती की हत्या के षड्यन्त्र - 
     महाराजा जसवंत सिंह, जोधपुर
खुले रूप में अंग्रेज सरकार, कर्मकांड एवं पंडा समूह का विरोध करने पर स्थान - स्थान पर उनके शत्रु बन गए। सन 1863 (गुरु विरजानंद के पास अध्ययन पूर्ण होने के बाद) 1883 तक (बीस वर्षों में) उनकी हत्या व अपमान के लगभग 44 प्रयास हुए। जिसमें से 17 बार विभिन्न माध्यमों से विष दे कर हत्या के प्रयास शामिल हैं। लेकिन वो इन सब से बचते रहे। स्वामी दयानंद की मृत्यु जिन परिस्थितियों में हुई एक अनुमान के अनुसार इसमें अंग्रेज सरकार का षड्यन्त्र था। स्वामी जी की मृत्यु 30 अक्टूबर 1883 को दीपावली के दिन सन्ध्या के समय हुई जब स्वामी जी जोधपुर नरेश महाराज जसवन्त सिंह के निमन्त्रण पर जोधपुर आए हुए थे। वहां उनके नित्य ही प्रवचन होते थे। यदा- कदा महाराज जसवन्त सिंह भी उनके प्रवचन सुनते थे। महाराजा के महल में कई बार स्वामी जी का जाना हुआ, जहां उन्होंने नन्हीं नामक वेश्या का महाराज जसवन्त सिंह एवं राजकार्य पर अत्यधिक हस्तक्षेप एवं प्रभाव देखा। स्वामी जी को यह बहुत बुरा लगा। उन्होंने महाराज को इस बारे में समझाया तो उन्होंने विनम्रता से उनकी बात स्वीकार कर ली और नन्हीं से सम्बन्ध तोड़ लिए। इससे नन्हीं स्वामी जी की विरोधी बन गई। उसने स्वामी जी के रसोइए कालिया उर्फ जगन्नाथ को अपनी तरफ मिला कर उनके दूध में पिसा हुआ कांच डलवा दिया। थोड़ी ही देर बाद स्वामी जी के पास आकर अपना अपराध स्वीकार कर लिया और क्षमा मांगी। उदार-हृदय स्वामी जी ने उसे राह - खर्च और जीवन यापन हेतु पांच सौ रुपए देकर वहां से विदा कर दिया ताकि पुलिस उसे परेशान न करे। बाद में जब स्वामी जी को जोधपुर के अस्पताल में भर्ती करवाया गया तो वहां सम्बन्धित चिकित्सक भी शक के दायरे में रहा। उस पर आरोप था कि वह औषधि के नाम पर स्वामी जी को हल्का विष पिलाता रहा। बाद में जब स्वामी जी की तबियत बहुत खराब होने लगी तो उन्हें अजमेर के अस्पताल में लाया गया। मगर तब तक काफी विलम्ब हो चुका था। स्वामी जी को बचाया नहीं जा सका।
इस सम्पूर्ण घटनाक्रम में आशंका रही है कि वेश्या एवं चिकित्सक को साथ मिला कर, अंग्रेज अधिकारियों ने स्वामी जी की हत्या करवाई। बिना किसी प्रोत्साहन और संरक्षण के वैश्या एवं चिकित्सक का ऐसा दुस्साहस संभव नहीं था। अजमेर में ही उनका अंतिम संस्कार किया गया। स्वधर्म, स्वभाषा, स्वराष्ट्र, स्वसंस्कृति और स्वदेशोन्नति के अग्रदूत स्वामी दयानन्द सरस्वती अपने सिद्धान्त - कृण्वन्तो विश्वमार्यम् (अर्थात सारे संसार को श्रेष्ठ मानव बनाओ)। उनके अन्तिम शब्द थे - "प्रभु! तूने अच्छी लीला की। आपकी इच्छा पूर्ण हो।"

महर्षि दयानंद सरस्वती का जीवन चरित लेखन - 
          देवेन्द्र नाथ मुखर्जी  
       पुस्तक महर्षि दयानन्द चरित
दयानंद सरस्वती के जीवन के बारे में अनेकों व्यक्तियों ने लिखा है, जिनमें पण्डित लेखराम, सत्यानन्द आदि प्रमुख हैं। किन्तु बंगाली सज्जन बाबू श्री देवेन्द्र नाथ मुखर्जी ने लगभग 15 वर्ष तक सामग्री एकत्र कर प्रामाणिक और क्रमबद्ध जीवनी बंगाली भाषा में दयानन्द चरित पुस्तक में उनकी जीवनी अंकित की। दुर्भाग्य से देवेन्द्र नाथ मुखर्जी की असामायिक मृत्यु के कारण प्रकाशन नहीं हो पाया। यह कार्य पंडित लेखराम व सत्यानन्द द्वारा संग्रहित सामग्री की सहायता से पंडित घासीराम ने इसे पूर्ण किया। यह महर्षि की अत्यन्त प्रामाणिक जीवनी है। पण्डित लेखराम का अनुसंधान विशेषकर पंजाब, उत्तर प्रदेश. और राजस्थान तक ही सीमित रहा। मुम्बई और बंगाल प्रान्त में न उन्होने अधिक भ्रमण किया और न अधिक अनुसन्धान। अत: बंगाल और बंबई प्रान्तों की घटनाओं का उनके ग्रन्थ में अधिक वर्णन नहीं है। देवेन्द्रनाथ मुखर्जी की पुस्तक में मुम्बई और बंगाल का अधिक विस्तृत वर्णन है।

आर्य समाज संस्था की स्थापना - 
आर्य समाज की स्थापना - 
आर्य शब्द का अर्थ है श्रेष्ठ और समाज का अर्थ है समान उद्देश्यों एवं मान्यताओं के व्यक्तियों का समूह। अतः आर्य समाज का अर्थ हुआ समान उद्देश्य एवं मान्यताओं वाले श्रेष्ठ व्यक्तियों का समूह।
महर्षि दयानन्द ने 10 अप्रैल सन् 1875 (चैत्र सुदि 5 शनिवार,  शुक्ल प्रतिपदा संवत् 1932) में गिरगांव मुम्बई में आर्य समाज संस्था की स्थापना की। आर्य समाज के नियम और सिद्धांत प्राणि- मात्र के कल्याणार्थ हैं। शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति के साथ परोपकार, आर्य समाज का मुख्य उद्देश्य है। 10 अप्रैल शनिवार को शाम के समय, मोहल्ला गिरगांव में डाक्टर मानक जी के बागीचे में, श्री गिरधरलाल दयालदास कोठारी बी.ए., एल.एल.बी. की अध्यक्षता में सार्वजनिक सभा आयोजित की गई जिसमें आर्य समाज के 28 नियम पढ़ कर सुनाये गए। सभी ने सर्वसम्मति से इन नियमों को अंगीकार कर उसी दिन से आर्यस माज की की दीक्षा ली।
इसके बाद नियमों में पुनः सुधार हेतु एक समिति का गठन किया गया  जिसकी हर शनिवार शाम को बैठक होती रही। कुछ दिनों बाद यह सभा रविवार को होने लगी।
आन्दोलन पाश्चात्य प्रभावों की प्रतिक्रिया स्वरूप सनातन धर्म में सुधार हेतु प्रारम्भ हुआ। शुद्ध वैदिक परम्परा में विश्वास करते हुए, मूर्ति पूजा, अवतारवाद, बलि, झूठे कर्मकाण्ड,छुआछूत, जातिय भेदभाव व अन्धविश्वासों को अस्वीकार किया गया। आर्य समाज के अनुसार ज्योतिष, जादू-टोना, जन्मपत्री, श्राद्ध, तर्पण, व्रत, भूत-प्रेत, देवी जागरण, मूर्ति पूजा और तीर्थ यात्रा मनगढ़ंत एवं वेद विरुद्ध हैं। स्त्रियों एवं शूद्रों को यज्ञोपवीत (जनेऊ) धारण करने व वेद पढ़ने का अधिकार दिया गया। सत्यार्थ प्रकाश ग्रंथ आर्य समाज का मूल ग्रन्थ है। आर्य समाज का आदर्श वाक्य है कृण्वन्तो विश्वमार्यम् , जिसका अर्थ है - विश्व को आर्य बनाते चलो। आज आर्य समाज एक न्यास के रूप में स्थापित है जिसका मुख्यालय नई दिल्ली है।
मुम्बई के बाद लाहौर में आर्य समाज की शाखा स्थापित की गई। लाहौर में, मुम्बई में अंगीकृत 28 नियमों को संक्षिप्त कर इनकी संख्या 10 कर दी गई जिन्हें 08 सितम्बर, 1877 को प्रकाशित किया गया।उन्हें विज्ञापित भी कर दिया गया। आर्य समाज के आदर्श राम (मर्यादा पुरुषोत्तम) और कृष्ण (योगिराज) हैं। आर्य समाज वर्णव्यवस्था (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र) को जन्म आधारित ना मानकर को कर्म आधारित मानता है। आर्य समाज स्वदेशी, स्वभाषा, स्वसंस्कृति और स्वधर्म का पोषक है।
आर्य समाज सृष्टि की उत्पत्ति का समय चार अरब बत्तीस करोड़ वर्ष और इतना ही समय प्रलय काल का मानता है। योग से प्राप्त मुक्ति का समय वेदों के अनुसार 31 नील 10 खरब 40 अरब समय को एक परांत काल मानता है। आर्य समाज, वसुधैव कुटुम्बकम् की धारणा पर बल देते हुए भूमंडलीकरण को देश, समाज और संस्कृति के प्रति घातक मानता है। स्वामी दयानंद सरस्वती ने धर्म परिवर्तन कर चुके लोगों को पुन: धर्म ग्रहण करने हेतु प्रेरित करने के लिए शुद्धिकरण आंदोलन चलाया। आर्य समाज ने सनातन धर्म में नई चेतना का संचार किया। स्वतंत्रता से पूर्व समाज के नवजागरण और पुनरुत्थान आंदोलन के रूप में आर्य समाज सर्वाधिक शक्तिशाली आन्दोलन बना। यह पूरे पश्चिम और उत्तर भारत में सक्रिय था तथा सुप्त सनातन समाज को जागृत करने में रत रहा। आर्य समाज प्रचारक फिजी, मारीशस, गयाना, ट्रिनिडाड, दक्षिण अफ्रीका में बसे सनातन समाज को संगठित करने के उद्देश्य से वहां पहुँच गए। आर्य समाजियों का महत्वपूर्ण कार्य जाति व्यवस्था तोड़ कर सभी सनातनियों में समानता का भाव जागृत करने का किया।

नमस्ते शब्द का प्रयोग - 
भारत सहित विदेशों में अभिवादन का प्रयाय बन चुका नमस्ते शब्द आर्य समाज द्वारा प्रचलित किया गया। आज यह शब्द सरकालिक एवं सर्वव्यापी बन चुका है। आर्य समाज के लोगों ने परस्पर अभिवादन हेतु हाथ जोड़कर नमस्ते शब्द प्रचलित किया।

आर्य समाज और राज्य व्यवस्था - 
गांधी जी की रामराज्य (चक्रवर्ती आर्यावर्त) की अवधारणा आर्य समाज की ही अवधारणा है।
आर्य समाज वैदिक समाज की रचना एवं चक्रवर्ती आर्य राज्य स्थापित करने हेतु प्रयासरत है। इस समाज में मांस, अंडे, तंबाकू, शराब, चाय, मिर्च-मसाले आदि वेद-विरुद्ध माने गए हैं।

आर्य समाज के दस नियम
01. सब पदार्थ जो सत्य एवं विद्या से जाने जाते हैं उनका आदिमूल परमेश्वर है।
02. ईश्वर निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनंत, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वांतर्यामी, अजर- अमर, अभय, नित्य, पवित्र,  सच्चिदानन्दस्वरूप और सृष्टिकर्ता है वही उपासना करने योग्य है।
03. वेद सत्य विद्याओं का ग्रन्थ है। वेद पढ़ना, पढ़ाना, सुनना और सुनाना आर्यों का परम धर्म है।
04. सत्य ग्रहण करने और असत्य छोड़ने हेतु सदैव तत्पर रहना चाहिए।
05. सभी कार्य सत्य और असत्य (धर्मानुसार) पर विचार कर संपादित करने चाहिए।
06. विश्व - कल्याण (शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति) आर्य समाज का मुख्य उद्देश्य है।
07. सबसे प्रीतिपूर्वक, धर्मानुसार, यथायोग्य व्यवहार करना चाहिये।
08. अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि करनी चाहिये।
09. आर्य को स्वयं की उन्नति से संतुष्ट न रह कर सबकी उन्नति में अपनी उन्नति समझनी चाहिये।
10. आर्यों को सामाजिक, सर्वहितकारी नियमों की पालना में परतंत्र एवं स्व हितकारी नियमों की पालना में स्वतंत्र रहना चाहिए।

आर्य समाज एवं यज्ञ - 
दैनिक यज्ञ करना उसका प्रत्येक आर्य   कर्त्तव्य है। परमाणुओं अनादि काल से हैं जिनको न कोई निर्माण कर सकता है, न ही उसका विखंडन। इसी प्रकार एक परमात्मा और हम जीवात्माएं अनादि काल से हैं। परमात्मा परमाणुओं को गति दे कर सृष्टि की रचना कर आत्माओं को कर्म हेतु प्रेरित करता है। वहीं परमात्मा चार ऋषियों को 20678 वेद मंत्रों द्वारा अर्थ सहित ज्ञान प्रदान कर स्वयं का परिचय देता है। वेद, उपनिषद, षड् दर्शन, गीता व वाल्मीकि रामायण को भी आर्य समाज में मान्यता दी गई है। आर्य समाज पुराणों एवं संहिताओं को मान्यता नहीं देता है। 
कुछ वर्षों बाद ही आर्यसमाज की सम्पूर्ण भारत के प्रमुख शहरों में शाखायें स्थापित हो गईं। स्वामीजी के विद्वतापूर्ण व्याख्यानों ने युवाओं को आर्य समाज की ओर मोड़ा। अन्य समकालीन सामाजिक धार्मिक आंदोलनों की अपेक्षा आर्य समाज सही अर्थों में अधिक राष्ट्रवादी आंदोलन था। यह भारत में पनप रहे पश्चिमीकरण के विरूद्ध अधिक आक्रामक आंदोलन था। स्वामी दयानन्द सरस्वती ने आर्य समाज की स्थापना के पीछे उपर्युक्त सामाजिक नवजागरण को मुख्य आधार बनाया। उनका विश्वास था कि नवीन प्रबुद्ध भारत में, नवजागृत होते समाज में, नये भारत का निर्माण करना है तो समाज को बन्धनमुक्त करना प्रथम कार्य होना चाहिए। स्वयं ब्राह्मण होते हुए भी स्वामी जी ने ब्राह्मणों की सत्ता का खण्डन किया और धार्मिक अंधविश्वास व कर्मकाण्डों की तीव्र भर्त्सना की। अल्पकाल में ही वे भारत के समाज सुधार के क्षेत्र में नवीन ज्ञान-ज्योति के रूप में उदयीमान हुए। स्वामी दयानंद ने समाज में प्रचालित बुराइयों को उजागर किया। पुरोहितवाद पर करारा प्रहार करते हुए स्वामीजी ने माना था कि स्वार्थों और अज्ञानी पुरोहितों ने पुराणों जैसे ग्रंथो का सहारा लेकर सनातन धर्म को भ्रष्ट कर दिया है। इससे इन्होंने सुसुप्त भारतीय जनमानस को चेतन्य करने का अदभुत प्रयास किया। स्वामी जी ने संतानियों को हीन, पतित और कायरता के भाव से मुक्त कर आत्मविश्वास जागृत किया।

आर्य समाज एवं ईश्वर की अवधारणा - 
आर्य समाज राम और कृष्ण को आदर्श पुरुष (मर्यादा पुरुषोत्तम एवं योगिराज) मानते हैं ना कि ईश्वर। यह संस्था सच्चे ईश्वर की पूजा की पैरवी करती है जो वायु और प्रकाश की तरह सर्वव्यापी है। ईश्वर अवतार नहीं लेता। ईश्वर मनुष्य को कर्मफल अनुसार अगला जन्म देता है। ईश्वर का ध्यान (स्मरण) किसी भी एकांत स्थान पर हो सकता है। सामान्यतः सर्वशक्तिमान परमात्मा को ईश्वर का स्वरूप माना गया है जिसका सर्वोत्तम और निज नाम ओम् (ऊं) है। ईश्वर में अनन्त गुण होने के कारण उसके अनन्त नाम हैं जिसकी अलग-अलग नामों से मूर्ति पूजा ठीक नहीं है। 

आर्य समाज का स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान - 
सन 1857 की क्रांति में स्वामी दयानंद सरस्वती ने खुल कर भाग लिया। आर्य समाज शिक्षा, समाज-सुधार एवं राष्ट्रीयता का आन्दोलन था। स्वतंत्रता आंदोलन में जुड़े अधिकांश लोग आर्य समाजी थे। बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय एवं विपिनचंद्र सैन आर्य समाज से संबंधित थे। स्वदेशी आन्दोलन का मूल सूत्रधार आर्य समाज ही है। स्वराज का नारा सब से पहले दयानंद सरस्वती ने दिया। आर्य समाज ने भारत में नवजागरण
का कार्य करते हुए राष्ट्रवादी विचारधारा को आगे बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। कांग्रेस वास्तव में अप्रत्यक्ष रूप से आर्य समाज के प्रभाव एवं प्रभुत्व में रही। स्वयं गांधीजी इस से अछूते नहीं रहे सके। गांधी का रामराज्य, हरिजनोद्धार एवं स्वदेशी आंदोलन आर्य समाज के प्रभाव की ही देन है। भारतीय स्वतंत्रता का सशस्त्र आन्दोलन
सन् 1857 के पश्चात की भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के जन्मदाता महर्षि दयानन्द सरस्वती और उनके शिष्य श्याम जी कृष्ण वर्मा (क्रांतिकारियों के गुरु) थे। लाला हरदयाल, भाई परमानन्द, सेनापति बापट, मदनलाल ढींगरा, रामप्रसाद बिस्मिल इसी समाज की देन हैं। इंग्लैण्ड में भारत के लिए जितनी क्रांति हुई वह श्याम जी कृष्ण वर्मा के ‘इण्डिया हाउस’ से संचालित होती थीं। सरदार भगत सिंह तो जन्म से ही आर्य समाजी थे। इनके दादा सरदार अर्जुन सिंह आर्य समाजी थे और इनके पिता श्री किशन सिंह भी आर्य समाजी थे।

हिंदी भाषा के प्रसार में आर्य समाज की भूमिका - 
स्वामी दयानन्द ने हिंदी भाषा में सत्यार्थ प्रकाश पुस्तक तथा अनेक वेदभाष्यों की रचना कर उन्हें प्रकाशित किया।
वर्ष 1886 में लाहौर में स्वामी दयानंद के अनुयायी लाला हंसराज ने हिंदी माध्यम की दयानंद एंग्लो वैदिक कॉलेज की स्थापना की। वर्ष 1901 में स्वामी श्रद्धानन्द ने कांगड़ी में गुरुकुल विद्यालय की स्थापना की। आर्य समाज ने हिन्दी, इतिहास, विज्ञान और अन्य विषयों के कई उत्कृष्ट विद्वान दिये। आर्य समाजियों ने भारत की संस्कृति, भाषा, धर्म एवं शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय योगदान दिया। स्वामी दयानन्द की मातृभाषा गुजराती थी परन्तु वे धाराप्रवाह हिंदी एवं संस्कृत बोल सकते थे। केशव चन्द्र सेन की सलाह पर उन्होने सत्यार्थ प्रकाश की रचना हिन्दी में कर इस भाषा को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता दिलवाई। हिंदी भाषा को अर्य भाषा का रूप दे कर प्रत्येक  आर्यसमाजी को इसका ज्ञान लेना आवश्यक किया गया। दयानन्द सरस्वती ने वेदों का की व्याख्या संस्कृत के साथ-साथ हिन्दी में भी की। स्वामी श्रद्धानन्द ने अनेक पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन हिंदी भाषा व देवनागरी लिपि करवाया।
आर्य समाज के गुरुकुलों, डीएवी स्कूल और कॉलेजों में हिंदी भाषा को प्राथमिकता देते हुए नवीन पाठ्यपुस्तकों की रचना की गई। अन्य विषय विज्ञान, गणित, समाज शास्त्र, इतिहास आदि हिंदी में लिखे गए। विदेशों में भवानी दयाल सन्यासी, भाई परमानन्द, गंगाप्रसाद उपाध्याय, डॉ. चिरंजीव भारद्वाज, मेहता जैमिनी, आचार्य रामदेव, पंडित चमूपति आदि ने हिंदी भाषा का अप्रवासी भारतीयों में प्रचार किया। आर्य समाजीयों ने पंजाब, दक्षिण भारत में, बंगाल, असम एवं बर्मा तक हिंदी का प्रचार किया। न्यायालय में काम लेने हेतु कठिन हिंदी शब्दों के स्थान पर सरल हिंदी शब्द रचना की गई।

हिंदी भाषा के तत्कालीन आर्य समाजी विद्वान - 
आर्य समाज ने भारत को संस्कृत, हिन्दी, समाज विज्ञान, इतिहास, विज्ञान के हजारों विद्वान दिए जिन्होंने लेखन कार्य देवनागरी लिपि एवं हिंदी भाषा में किया। इनमें मुख्य नाम हैं - 
01. महाशय चिरंजीलाल 'प्रेम'
02. युधिष्ठिर मीमांसक, ब्रह्मदत्त 'जिज्ञासु'
03. पण्डित लेखराम आर्य
04. महात्मा हंसराज
05. लाला लाजपत राय
06. आचार्य रामदेव
07. स्वामी सोमदेव
08. गुरुदत्त विद्यार्थी
09. सत्यकेतु विद्यालंकार
10. गुरुदत्त
11. पद्मसिंह शर्मा
12. यशपाल
13. क्षेम चंद 'सुमन'
14. जयचन्द विद्यालंकार
15. अत्रिदेव विद्यालंकार
16. पंडित आर्यमुनि
17. सत्यप्रकाश सरस्वती
18. राजवीर शास्त्री
19. इन्द्र विद्यावाचस्पति
20. डॉ फतह सिंह
21. बुद्धदेव विद्यालंकार
22. शांति प्रकाश
23. ओम आनन्द सरस्वती
24. राम नारायण आर्य
25. महात्मा आनन्द स्वामी
26. स्वामी इन्द्रवेश
27. आचार्य सोमदेव शास्त्री
28. उदयवीर शास्त्री
29. स्वामी आनन्दबोध
30. आचार्य धर्मवीर
31. राजेन्द्र 'जिज्ञासु'
32. रामचन्द्र देहलवी
33. ठाकुर अमरसिंह
34. बुद्धदेव मीरपुरी
35. गंगाप्रसाद उपाध्याय
36. पंडित तुलसी स्वामी
37. पंडित गणपति शर्मा
38. रामदयालु शर्मा
39. पंडित भगवान स्वरूप
40. पण्डित देवदत्त शर्मा
41. लक्ष्मीदत्त आर्य 'मुसाफिर'
42. शुक्रराज शास्त्री
43. सत्यमित्र शास्त्री
44. मनसाराम वैदिक तोप
45. आत्माराम अमृतसरी
46. ठाकुर प्रसाद शास्त्री
47. लोकनाथ तर्कवाचस्पति
48. शिवशंकर शर्मा
49. गोपाल पत्रकार
50. चन्द्रमणि
51. राजाराम शास्त्री
52. विश्वबंधु शास्त्री
53. भगवद्दत्त रिसर्चस्कॉलर
54. स्वामी ब्रह्ममुनि
55. रामलाल
56. ओमप्रकाश शास्त्री
57. मुन्शीराम
58. हंसराज
59. श्री राम आर्य
60. जे. पी. चौधरी
61. पं. वेद भूषण
62. मुन्शी इंद्रमणि

आर्य समाज एवं समाज सुधार आंदोलन - 
भारत को जिस तरह ब्रिटिश सरकार का आर्थिक उपनिवेश और बाद में राजनीतिक उपनिवेश बना दिया गया था, उसके विरूद्ध भारतीयों की ओर से तीव्र प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक था। चूंकि भारत धीरे-धीरे पश्चिमी विचारों की ओर बढ़ने लगा था, अतः प्रतिक्रिया सामाजिक क्षेत्र से आना स्वाभाविक था। यह प्रतिक्रिया 19वीं शताब्दी में उठ खड़े हुए सामाजिक सुधार आन्दोलनों के रूप में सामने आई। ऐसे ही समाज सुधार आंदोलनों में आर्य समाज का नाम आता है। आर्य समाज ने पराधीनता का लबादा उतार फेंकने हेतु स्वयं में आंतरिक सुधार कर पुर्नजागरण आंदोलन को नई दिशा दी। भारतीयों में भारतीयता को अपनाने, प्राचीन संस्कृति को मौलिक रूप में स्वीकार करने, पश्चिमी प्रभाव को वेदों की ओर लौटो नारे के साथ समाप्त करने तथा सभी भारतीयों को एकमेव करने हेतु प्रेरित किया। 
1. आर्य समाज ने हरिजनोद्धार कार्यक्रम चलाया, 
2. लड़कियों एवं महिला शिक्षा पर बल दिया। 
3. वर्ण व्यवस्था को जन्म के स्थान पर न मानकर कर्म के आधार पर मानने पर बल दिया। 
4. जातिगत भेदभाव एवं छुआछूत का विरोध किया। 
5. अन्धविश्वास और धर्म के नाम पर कर्मकांड एवं अन्याय को समाप्त करने हेतु कार्य किया।
6. महिलाओं को समान अधिकार। 
7. बालविवाह का उन्मूलन, 
8. विधवा विवाह का समर्थन, 
9. नीच समझी जाने वाली जातियों को सामाजिक अधिकार।
10. बहु विवाह प्रथा का विरोध।
11. मूर्तिपूजा, कर्मकाण्ड, पुराणपंथी, तन्त्रवाद का विरोध।
12. आर्य समाज ने रामराज्य की अवधारणा दी।

आर्य समाज का शिक्षा के क्षेत्र में योगदान
स्वामी दयानन्द शिक्षा को मानव विकास का मूलमन्त्र मानते थे। उनके अनुसार जनता का विकास और प्रगति एवं अस्तित्व की रक्षा का सर्वोत्तम साधन शिक्षा है। आर्य समाज ने इस तथ्य को आत्मसात कर  शिक्षा में भारतीय नीतिशास्त्र और दर्शन को सर्वोपरि स्थान दिया।

आर्य समाज का विभाजन - 
वर्ष 1892 में आर्य समाज दो भागों में विभाजित हो गया। 
01. वैदिक आर्य समाज 
02. एंग्लो आर्य समाज 
एंग्लो आर्य समाज घटक ने पाश्चात्य शिक्षा का समर्थन किया जिसमें लाला हंसराज और लाला लाजपत राय प्रमुख थे। इन्होंने दयानन्द एंग्लो-वैदिक कॉलेज की स्थापना की। वैदिक आर्य समाज घटक ने पाश्चात्य शिक्षा का विरोध किया जिसके नेता स्वामी श्रद्धानन्द थे। उन्होंने 1902 में हरिद्वार (कांगड़ी) में गुरुकुल की स्थापना की। इस संस्था में वैदिक शिक्षा प्राचीन पद्धति से दी जाती थी। वर्तमान में इस घटक के 200 से अधिक गुरुकुल संचालित हैं, जिसमें ज्वालापुर, देहरादून, मेरठ, झज्जर, पौन्ध, लुधियाना, सुन्दरगढ़ (उड़ीसा) आदि विशेष उल्लेखनीय हैं। शिक्षा के क्षेत्र में गुरुकुल व डीएवी (दयानंद एंग्लो वैदिक) कालेज स्थापित कर आर्य समाज ने अग्रणी भूमिका निभाई। स्त्रीशिक्षा हेतु आर्य समाज की अमृतसर शाखा ने 1885 में दो महिला विद्यालयों की स्थापना की घोषणा की थी तथा तीसरा कटरा डुला में प्रस्तावित था। 1880 के दौरान लाहौर आर्यसमाज महिला शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी बना हुआ था। 1889 में फिरोजपुर आर्य समाज ने कन्या विद्यालय की स्थापना की।

आर्य समाज का हिंदी पत्रकारिता को बढ़ावा देने में योगदान - 
आर्य समाजीयों ने हिन्दी पत्रकारिता में देश को राष्ट्रीय संस्कृति, धर्म चिन्तन, स्वदेशी एवं स्व भाषा का पाठ पढ़ाया। स्वामी दयानन्द पत्रकारिता के माध्यम से धर्म का प्रचार व्यापक रूप से करना चाहते थे। वे स्वयं कोई पत्र नहीं निकाल सके परन्तु आर्य समाजियों को पत्र-पत्रिकाएँ निकालने हेतु प्रोत्साहित किया। विभिन्न संस्थाओं द्वारा प्रसारित होने वाली दैनिक, पाक्षिक एवं मासिक पत्र-पत्रिकाओं में  मुख्य नाम हैं - 
1. पवमान
2. आत्म शुद्धि पथ
3. वैदिक गर्जना
4. आर्य संकल्प
5. वैदिक रवि
6. विश्वज्योति
7. सत्यार्थ सौरभ
8. दयानन्द सन्देश
9. महर्षि दयानन्द स्मृति प्रकाश
11. तपोभूमि
12. नूतन निष्काम पत्रिका
13. आर्य प्रेरणा
14. आर्य संसार
15. सुधारक
16. टंकारा समाचार
17. अग्निदूत
18. आर्य सेवक
19. भारतोदय
20. आर्य मुसाफिर
21. आर्य सन्देश
22. आर्य मर्यादा
23. आर्य जगत
24. आर्य मित्र
25. आर्य प्रतिनिधि
26. आर्य मार्तण्ड
27. आर्य जीवन
28. परोपकारी
29. सम्वर्द्धिनी
30. आर्यावर्त
31. परोपकार

आर्य समाज का मुख्य अंग परोपकारिणी सभा - 
अजमेर परोपकारिणी सभा कार्यालय
स्वामी दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज के ग्रन्थों का मुद्रण एवं प्रकाशन निर्बाध गति से चलते रहने, देश - विदेश में धर्म आर्य समाज के प्रचार, अनाथ रक्षण, अबला उद्धार आदि के लोकोपकारी उद्देश्यों की पूर्ति हेतु परोपकारिणी सभा का मेरठ में 16 अगस्त 1880 में गठन कर पंजीकरण करवाया जिसका मुख्यालय अजमेर में है।
यह संस्था सम्पूर्ण भारत में गुरुकुल, गौशाला, पुस्तकालय, संग्रहालय, वैदिक यन्त्रालय, वानप्रस्थ एवं संन्यास आश्रम का संचालन करती है। संस्था परोपकारी नाम  से पाक्षिक पत्रिका एवं अन्य आर्य साहित्य का प्रकाशन एवं वितरण करती है। वेद - गोष्ठियो, वेद कण्ठस्थीकरण प्रतियोगिता, विद्वत् सम्मान, ऋषि मेले, वेद-प्रचार यात्रा, ध्यान-साधना शिविर, आर्य वीर एवं आर्य वीरांगना दल शिविर का आयोजन एवं पाण्डुलिपि संरक्षण कार्य करती है।
स्वामी दयानंद सरस्वती ने सहमति पत्र में लाहौर निवासी लाला मूलराज को प्रधान तथा आर्य समाज मेरठ के उप प्रधान लाला रामशरण दास को मंत्री नियुक्त किया। इसके सदस्यों की संख्या 18 थी। इस सभा को आर्य समाज की चल अचल संपत्ति का सर्वोपरि अधिकारी बनाया गया। इस संस्था में थियोसोफिकल सोसाइटी के संस्थापक कर्नल एच. एस. ऑलकाट तथा मैडम एच.सी. ब्लावट्स्की को सदस्य बनाया गया। स्वामी दयानन्द ने 1883 में उदयपुर प्रवास के समय द्वितीय सहमति पत्र के माध्यम से परोपकारिणी सभा का पुनर्गठन कर उदयपुर रियासत की प्रशासिका सभा महद्राज सभा में फाल्गुन कृष्णा पञ्चमी विक्रमी संवत 1829 (27 फरवरी 1883) के दिन पंजीकृत करवाया। सभा के इस पुनर्गठन में अधिकांश व्यक्ति मेवाड़ से थे। सभा का मंत्री कविराज श्यामलदास को बनाया गया एवं प्रधान मेवाड़ के महाराणा को नियुक्त किया गया। परोपकारिणी सभा का वास्तविक कार्य स्वामी दयानन्द की मृत्यु के बाद शुरू हुआ।
सभा साहित्य के संपादन का कार्य भक्त राम ने संभाला। सभा के अधिवेशन (नवम्बर 1909) में परोपकार पाक्षिक पत्र का प्रकाशन बंद कर दिया गया। लगभग अर्धशताब्दी के बाद नवम्बर 1959 से यह पत्र पुनः प्रारम्भ किया गया। तब से अब तक यह पत्र निरन्तर आर्य समाज व सिद्धान्तों की सेवा कर रहा है।
महर्षि दयानन्द बलिदान शताब्दी समारोह (1983) में डॉ. धर्मवीर परोपकारिणी सभा से जुड़े। उन्होंने परोपकारी पत्रिका के सम्पादन का कार्य संभाला और इसे आर्य जगत की सर्वोच्च पत्रिका बना दिया। उनके सम्पादन काल में परोपकारी पत्रिक के पाँच सौ से पन्द्रह हजार सदस्य हो गए। उनकी मृत्यु के पश्चात् सभा के संयुक्त मंत्री डॉ. दिनेशचंद्र शर्मा को सम्पादक नियुक्त किया गया जो वर्तमान में इस पत्रिका के सम्पादक का कार्यभार संभाल रहे हैं।

आर्य समाज एवं राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ
संघ शुरुआत से ही आर्य समाज के साथ गठजोड़ बनाने की कोशिश करता आ रहा है परन्तु आजादी के बाद कुछ वर्षों तक यह संभव नहीं हो सका। इसका कारण आर्य समाज और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ में मूलभूत अंतर हैं जो निम्नानुसार हैं- 
01. आर्य समाज सति प्रथा का विरोध करता है, RSS इसे धर्म का मुख्य अंग मान कर समर्थन करता है।
वर्ष 1999 में विश्व हिंदू परिषद के अंतर्राष्ट्रीय उपाध्यक्ष गिरिराज किशोर ने सती प्रथा का बचाव करते हुए कहा कि “यदि कोई महिला अपने मृत पति के साथ अग्नि में भस्म हो जाना चाहती है तो इसमें कोई हानि नहीं है.” दूसरी ओर वर्ष 1987 में स्वामी अग्निवेश ने 101 आर्य समाजियों के साथ सती प्रथा के विरुद्ध 18 दिन पद यात्रा की। अग्निवेश की इस यात्रा का सती प्रथा के समर्थकों ने विरोध किया।
02. RSS राम एवं कृष्ण को अवतार मानता है जबकि आर्य समाज इन्हें आदर्श पुरुष मानता है। आर्य समाज अवतारवाद का विरोधी है।
03. RSS मूर्ति पूजा का समर्थक है जबकि आर्य समाज मूर्ति पूजा का घोर विरोधी।
04. RSS हिंदुत्व की बात करता है जबकि आर्य समाज सनातन संस्कृति पर।
05 आर्य समाज बहु विवाह एवं बाल विवाह का विरोध करता है जबकि RSS इसका समर्थन करता है।
06. आर्य समाज कर्मकांड एवं पुरोहितवाद का विरोध करता है जबकि RSS इसका समर्थन करता है।
07. RSS मूर्ति स्थापित करता है जबकि आर्य समाज का चिह्न है।
08. आर्य समाजी स्वदेशी आंदोलन के समर्थक एवं अंग्रेज सरकार विरोधी रहे है जबकि RSS ने कई जगह अंग्रेजी सरकार से गठजोड़ किया है।
09. सन 1967 में स्वामी इंद्रवेश किसान - मजदूरों के आर्थिक और सामाजिक मुद्दों को लेकर राजनीति में आए तो संघ के मुख्यालय नागपुर से देवरस (बाला साहब) ने इसका विरोध किया। सन 1973 में सदाशिव गोलवलकर की मृत्यु के बाद देवरस संघ प्रमुख बने। अग्निवेश के अनुसार विरोध का कारण प्रगतिशील आर्य समाज और वैदिक समाजवाद का प्रचार करना था जिसका RSS विरोधी रहा है। 10 अप्रैल 1970 को उत्तर भारत के आर्य समाजियों ने आर्य सभा नाम से राजनीतिक दल बनाया जो RSS की तरह (पहले जनसंघ बाद में भारतीय जनता पार्टी) 1951 में ही बना लेनी चाहिए थी। इससे आर्य समाज प्रबलता से उभारा और RSS को उत्तर भारत से पीछे हटना पड़ा।
11. आर्य समाज के लोगों की राम मंदिर आंदोलन में कोई दिलचस्पी नहीं रही और न ही उस समय आर्य समाज ने कभी मंदिर निर्माण की वकालत की।
12. RSS स्थान और परिस्थितियों के अनुसार मुद्दे गढ़ता है जैसे उत्तर भारत में,गौरक्षा। यह मुद्दा आर्य समाज का रहा है परन्तु आज RSS ने उचक लिया। 
13. भारत को RSS हिन्दू राष्ट्र बनाना चाहता है जबकि आर्य समाज मिशन आर्यवर्त है, जिसका उद्देश्य देश के सभी निवासियों को आर्य समाजी बना कर वेदों का प्रचार करना है।
14. RSS सत्ता लोलुप है जबकि आर्य समाज, समाज सुधार आंदोलन है।

वर्तमान में आर्य समाज एवं RSS में एकता - 
गोलवलकर (गुरुजी), ने ग्रामीण आर्य समाजियों को RSS से जोड़ने हेतु प्रमुख ग्रामीण आर्य समाजियों के साथ हरियाणा के झज्जर गुरुकुल में भारत के विभाजन और मुसलमानों के कत्लेआम गुप्त बैठक की जिसका कोई परिणाम नहीं निकला। जिसका खुलासा बाद में झज्जर गुरुकुल के आचार्य भगवान देव ने हरियाणा के पत्रकार व लेखक मनोज कुमार के साथ एक इंटरव्यू में किया। उसी इंटरव्यू में भगवान देव ने कुमार को बताया कि गोलवलकर आर्य समाजियों को हथियार पहुंचाने का वादा कर के आए थे जो उन्होंने नहीं निभाया।
RSS आर्य समाज और इसकी संस्थाओं पर कब्जा करना चाहता है, जो आर्य समाजी उनकी नफरत की राजनीति के खिलाफ बोलता है उन पर ये लोग हमला करवाते हैं।संघ ने आर्य समाज से संबंध बनाने के औपचारिक प्रयास अक्टूबर 1951 में शुरू किये। भारतीय जनसंघ (स्थापना 21.10.195, जो आगे चलकर भारतीय जनता पार्टी बना)। पॉलिटिक्स ऑफ चौधर किताब के लेखक और हरियाणा के वरिष्ठ पत्रकार डॉ. सतीश त्यागी के अनुसार “नई दिल्ली के 15 हनुमान रोड पर स्थित आर्य समाज कार्यालय में RSS के सरसंघचालक गोलवलकर समेत संघ के बड़े नेताओं की बैठक चल रही थी। वहां आर्य समाज में पैठ रखने वाले और खुद को आर्य समाजी कहने वाले बलराज मधोक ने उत्तर भारत के प्रमुख आर्य समाजी नेताओं के साथ लगातार कई बैठकें कर दोनों के संबंधों को औपचारिक रूप देना चाहते थे। बलराज मधोक आर्य समाजी से RSS प्रचारक बने। जनसंघ और RSS के एजेंडों पर आर्य समाजियों के साथ मधोक की बातचीत सफल नहीं हो सकी पर इन बैठकों से जनसंघ शहरी तबके के बनिया, ब्राह्मण और अरोड़ा - खत्री जाति के आर्य समाजियों को अपनी ओर आकर्षित करने में सफल रहा। आज कल आर्य समाज और संघ के लोगों का मंच साझा करना आम बात हो गई है। इससे पहले भी कई बार उत्तर भारत में RSS के इंचार्ज इंद्रेश कुमार, आर्य समाज के मंचों पर दिखाई दिए हैं। अक्टूबर 2018 में दिल्ली में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय आर्य महासम्मेलन में इंद्रेश कुमार एवं गृहमंत्री राजनाथ सिंह एक साथ दिखे। RSS की तर्ज पर आर्य समाज ने यूथ विंग आर्यवीर दल का गठन किया है। जहां शस्त्र चलाने और युद्ध लड़ने की ट्रेनिंग बच्चों को दी जाती है. आर्यवीर दल के कार्यक्रमों में मुख्य अतिथि के तौर पर ज्यादातर बीजेपी और संघ के नेताओं को बुलाया जाता है। आज कल शोशल मीडिया पर आर्य समाजी RSS की प्रचार सामग्री काम में ले रहे हैं। राम मंदिर से लेकर हिंदुत्व वाले फेसबुक पोस्ट्स आर्य समाजियों द्वारा खूब फैलाए जाते हैं। गत वर्षों से आर्य समाजी RSS की भाषा में आरक्षण, समलैंगिक संबंधों, मुस्लिमों, सूफियों और ईसाइयों के खिलाफ घृणा और उग्र राष्ट्रवाद का समर्थन कर रहे हैं। कट्टर हिंदुत्ववादी कंटेंट के फैलाए जाने से मंदिर आंदोलन के बाद उत्तर भारत में ही नहीं पूरे देश के आर्य समाज पर गहरा प्रभाव पड़ा। आर्य समाजी लोग RSS की ओर आकर्षित हो रहे हैं। उत्तर भारत में आर्य कार्यकर्ताओं को अपने साथ जोड़ने हेतु पद का लालच देते हैं।

“विपक्षी दल इनके कट्टर हिंदुत्व का मुकाबला अपने सॉफ्ट या नरम हिंदुत्व से नहीं कर सकते। इनके खिलाफ वैचारिक मुकाबला हम आर्य समाजी ही कर सकते हैं." - स्वामी अग्निवेश, हरियाणा

आर्य समाज के कमजोर होने के कारण 
आर्य समाज दो हिस्सों में हमेशा बंटा हुआ है 
01. शहरी आर्य समाजी (एंग्लो आर्य समाजी)
02. ग्रामीण आर्य समाजी (वैदिक आर्य समाजी)
आर्य समाज पर RSS के प्रभाव का जिक्र करते हुए जेएनयू में प्रोफेसर नोनिका दत्त कहती हैं कि शुरुआत से ही आर्य समाज के दो हिस्से रहे हैं। शहरों में रहने वाले ब्राह्मण-बनिया जाति के आर्य समाजियों की शिक्षा डीएवी स्कूलों में हुई और ग्रामीण क्षेत्रों के जाटों-गुज्जरों की शिक्षा गुरुकुलों में हुई। इस कारण दोनों में अलगाव है। आर्य समाज का बड़ा हिस्सा गांव में है जो अब तक RSS की पकड़ से बाहर था परंतु 2014 के बाद ग्रामीण आर्य समाजी भी इसकी ओर आकर्षित हुए और भाजपा सशक्त हुई। यह गठजोड़ प्रैक्टिकल नहीं है, क्योंकि देहात के आर्य समाजी खेती - किसानी से जुड़े हुए हैं और उन्हें कृषि संकट से पैदा होने वाली समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। अतः RSS से उनकी बगावत की संभवानाएं स्पष्ट दृष्टिगोचर हैं। उत्तर भारत के शहरी आर्य समाजी RSS के प्रति शुरू से ही आकर्षित रहे हैं। पंजाब में पहली बार शाखा लगाने वाले देवदत्त खुल्लर बटाला आर्य समाजी थे और उन्होंने वर्ष 1937 में शहर के आर्य समाज मंदिर में शाखा लगाना शुरू किया।
शहरी आर्य समाजियों के पास धन की कमी नहीं थी पर उन्हें लोक समर्थन प्राप्त नहीं था। इधर उत्तर भारत के ग्रामीण इलाकों की किसान जातियों जैसे जाट, गुज्जर, अहीर व अन्य ने आर्य समाज को अपनाया। गांव-देहात के आर्य समाजी खेती-किसानी करने वाले थे,  इस कारण किसानी और मजदूरी के मुद्दे और मूर्ति पूजा के विरोध के कारण RSS के साथ उनका समझौता नहीं हो सका।

हरियाणा के आर्य समाजियों का RSS मिलन - 
हरियाणा के वरिष्ठ आर्य समाजी आचार्य संत कुमार बताते हैं, साल 1996 में भारतीय जनता पार्टी ने नरेन्द्र मोदी को हरियाणा का प्रभारी बनाकर यहां भेजा था, यहां आकर मोदी ने कुरुक्षेत्र गुरुकुल के प्रधानाचार्य (हाल हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल) आचार्य देवव्रत से मुलाकात की और उन्हें RSS में मिला कर किसान संघ का अध्यक्ष बना दिया। इस समय हरियाणा की गौशालाओं के ज्यादातर प्रधान (कभी अराजनीतिक आर्य समाजी हुआ करते थे) भाजपा/RSS के लोग जैसे श्रवण गर्ग, सत्यवान, संजय शर्मा, देवीलाल शर्मा, जयसिंह ठेकेदार बने हुए हैं।
हरियाणा महिला आयोग की अध्यक्ष प्रतिभा सुमन RSS/भाजपा की सक्रिय कार्यकर्ता, स्वयं को आर्य समाजी बताती हैं। श्रीमती सुमन की रोहतक के दयानंद मठ की जमीन पर आर्य प्रिंटिंग प्रेस नाम की संस्था, उनका ऑफिस आर्य समाज की जमीन पर कब्जा करने के कारण विवादों में रहा। आर्य समाज के पास उत्तर भारत में सबसे ज्यादा संस्थाएं और जमीनें हैं जिन पर RSS की नजर है। हरियाणा के कई शहरी ब्राह्मण, बनिए, अरोड़ा, एवं खत्री RSS की ओर मुड़े, जिनमें मौलीचन्द्र शर्मा और श्रीचंद गोयल, जन संघ के संस्थापक सदस्य भी रहे हैं। सरदार पटेल द्वारा आरएसएस पर प्रतिबंध लगाने के बाद हरियाणा के मौलीचन्द्र शर्मा ने ही सरदार पटेल और गोलवलकर की मीटिंग फिक्स करवाई थी। मौलीचन्द्र शर्मा बाद में जनसंघ के अध्यक्ष भी बने। आर्य समाजियों की गौरक्षा और मुस्लिम-ईसाई के प्रति नफरत की भावना का लाभ उठाते हुए RSS ने यह मुद्दा हथियाकर समाज को अपने वश में कर लिया है और यह काम 1996 में मोदी के यहां प्रभारी रहने के बाद खूब तेजी से हुआ।

आर्य समाजियों की कमजोरी के असर एक उदाहरण - (संत कुमार आर्य समाजी द्वारा बताए अनुसार)  - 
झज्जर के पास एक दादरी तोए गांव है जहां हम मंदिर आंदोलन से पहले काम करते थे। गांव में ज्यादातर सनातनी और कुछ मुस्लिम परिवार हैं. हमने वहां कई साल काम करके मूर्ति पूजा या मंदिर-मस्जिद के मुद्दों को गायब कर आपस में भाईचारा कायम किया। हमारी मेहनत की वजह से वहां आपस में दोनों धर्मों में ब्याह-शादियां भी हुईं, लेकिन मंदिर आंदोलन के बाद इतनी कट्टरता फैली कि वहां हिंदू-मुस्लिम के बीच शादियां बंद हो गईं और दोनों दोबारा धार्मिक अंध-विश्वासों की चपेट में आ गए।

स्वामी नित्यानंद आर्य समाजी हरियाणा के अनुसार - 
"इस समय हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हिमाचल, उत्तराखंड, दिल्ली और पंजाब में आर्य समाजी यदि खुद को RSS से अलग नहीं खड़ा करेगा तो भविष्य में आर्य समाज को RSS निगल जाएगा। 

आर्य समाज वर्तमान में - 
आज से 40 वर्ष पूर्व आर्य समाज गांव और शहर में प्रभावी था, जो लगातार समाप्ति की ओर है। मेरे देखने के अनुसार लगभग सभी क्षेत्रों में आर्य समाज के पूर्ण कालिक सदस्य शून्य के करीब हैं। राजस्थान में जाट समाज आर्य समाज की रीढ़ की हड्डी था जो अब अपनी मूल जड़ से पृथक हो कर RSS की शरण में जाने हेतु आतुर है।

शमशेर भालू खां 
9587243963

No comments:

Post a Comment