भारतीय न्याय तंत्र (Indian Judicial System) -
वर्तमान भारतीय न्याय तंत्र विश्व के सबसे बड़ी और सबसे पुरानी एकीकृत और श्रेणीबद्ध न्याय प्रणालियों में से एक है। जिसमें शीर्ष अदालत द्वारा दिया गया निर्णय निचली सभी अदालतों पर बाध्यकारी होता है।
प्राचीन भारत में न्याय की अवधारणा कानून के स्थान धर्म के सिद्धांत पर आधारित थी। तब न्याय का अर्थ था व्यवस्था को बनाए रखने हेतु राजा और रंक द्वारा कर्तव्यों का पालन करना।
प्राचीन भारतीय न्याय प्रणाली की विशेषताएं और संस्थाएं -
1.धर्म - यहां धर्म संकीर्ण अर्थ में नहीं व्यापक अर्थ में काम करता है। धर्म का अर्थ संप्रदाय नहीं, बल्कि नैतिक कर्तव्य और सामाजिक व्यवस्था था।
संस्कृत में धर्म शब्द का अर्थ एवं परिभाषा -
धृति क्षमा दमोस्त्यं सोचमिंद्रियनीग्रह
धीर विद्या सत्यं अक्रोध दसकं धर्म लक्षणं।
एक अन्य सूत्र - यतो धर्मस्ततो जय अर्थात जहाँ धर्म है, वहीं विजय है। न्याय का मुख्य उद्देश्य धर्म की स्थापना करना था।
राजा का कर्तव्य (राजधर्म) - राजा को धर्म का रक्षक माना जाता था। यदि राजा न्याय नहीं करता था, तो वह अपने पद का अनर्थ करता था।
प्राचीन भारत में न्यायपालिका की संरचना (संस्थाएं) -
प्राचीन भारत में न्याय हेतु सुव्यवस्थित श्रेणीबद्ध प्रणाली होती थी। बृहस्पति स्मृति के अनुसार, न्याय की चार मुख्य श्रेणियां थीं -
1. कुल - परिवार या गोत्र के बुजुर्गों का समूह, जो पारिवारिक विवाद सुलझाते थे।
2. श्रेणी - एक ही व्यवसाय (जैसे व्यापारियों या शिल्पकारों) के लोगों की परिषद।
3. गण/पुग - एक ही स्थान या गाँव में रहने वाले विभिन्न जातियों के लोगों का समूह।
4. दरबार - राजकीय न्यायालय (राजदरबार) - राजा एवं उसके द्वारा नियुक्त न्यायाधीशों (राजपुरोहित/दंडाधिकारी) की अदालत, जहाँ अंतिम अपील (फरियाद/ गुहार) सुनी जाती थी। राजा का निर्णय ही अंतिम फैसला होता था। प्राचीन भारत की न्याय प्रणाली अत्यंत विकसित और विकेंद्रीकृत थी, जहाँ स्थानीय विवादों को स्थानीय स्तर पर सुलझाने पर बल दिया जाता था।
प्राचीन भारत में न्याय के स्रोत -
न्याय के चार आधार -
1. धर्म - वेदों और स्मृतियों में लिखे नैतिक नियम।
2. व्यवहार - साक्ष्य और गवाहों के आधार पर कानूनी प्रक्रिया।
3. चरित्र - प्रथाएं, परंपराएं और रीति-रिवाज।
4. राजशासन - राजा द्वारा जारी किए गए आदेश या कानून (फरमान)।
प्राचीन भारत में न्यायिक प्रक्रिया के चार चरण -
1. पूर्वपक्ष (वादी) - शिकायतकर्ता द्वारा अपनी शिकायत दर्ज करना।
2. उत्तरपक्ष - प्रतिवादी द्वारा सफाई पेश करना।
3. क्रिया - सबूत और गवाह पेश करना। इसमें मानवीय साक्ष्य (दस्तावेज, गवाह) और दैवीय साक्ष्य (अग्नि परीक्षा आदि) दोनों शामिल थे। (केवट द्वारा सीता पर चरित्रहनन का आरोप लगाने पर राम द्वारा सीता से अग्नि परीक्षा लेना)
4. निर्णय - साक्ष्यों के आधार पर अंतिम फैसला।
कौटिल्य (चाणक्य) का अर्थशास्त्र और न्याय - मौर्य काल में कौटिल्य ने दो प्रकार के न्यायालयों का उल्लेख किया है -
1. धर्मस्थीय - वो न्यायालय जो दीवानी मामलों (Civil matters) जैसे संपत्ति, विवाह और उत्तराधिकार को देखते थे।
2. कंटकशोधन - वो न्यायालय जो फौजदारी मामलों (Criminal matters) और असामाजिक तत्वों के दमन से संबंधित थे।
3. स्वर्ग - नर्क का सिद्धांत - मानव असामाजिक जीव को सामाजिक एवं नैतिक मूल्यों बांधने के साथ ही उसे धर्म के अनुसार आचरण के कारण बैकुंड में देवताओं के साथ सुख प्राप्त होने और दुराचरण करने पर राक्षसों के साथ यातना भोगने का भय दिखाया गया। यही कारण है कि शुरुआती मानव बंधनों में बंध सका।
प्राचीन भारत में न्याय संहिताएं - प्राचीन भारत में न्याय के स्त्रोत में धर्मशास्त्रों और स्मृतियां मुख्य हैं जो कानून के साथ - साथ सामाजिक, नैतिक और नागरिक कर्तव्यों के चार्टर थे। प्राचीन भारत में विधि का स्रोत ईश्वर और ऋषियों के ज्ञान को माना जाता था।
A. मनुस्मृति -
I. विषय - समाज के विभिन्न वर्गों के कर्तव्य, राजा के धर्म और न्याय प्रशासन का वर्णन है। वर्ण व्यवस्था के अनुसार कर्म करने के नियम। मनु स्मृति आशिक कठोर है। वर्तमान में यह सामाजिकता के सिद्धांत से कुछ परे है।
II. विधिक प्रावधान (अष्टादश विवादपद) - मनु ने न्याय के 18 शीर्षकों का उल्लेख किया है। मनुस्मृति में राजा या न्यायाधीश को विवादों का निपटारा करने हेतु अपराध को 18 श्रेणियों में विभाजित करना चाहिए। यही शीर्षक वर्तमान सिविल और क्रिमिनल कानूनों के प्राचीन स्त्रोत हैं।
मनु इन शीर्षकों के माध्यम से समाज का हर संभावित विवाद कानून के दायरे में लाने का प्रयास किया है। इनमें से प्रारंभिक 10 शीर्षक दीवानी (Civil) अंतिम 8 शीर्षक फौजदारी (Criminal) एवं सामाजिक व्यवस्था से संबंधित हैं।
III. मनु के न्यायिक अष्टादस विवादपद -
1. ऋणादान (Recovery) ऋण वसूली - लिए गए ऋण को वापस न करने से संबंधित विवाद।
2. निक्षेप (Deposits) - किसी के पास धरोहर या अमानत के रूप में रखी गई वस्तु को वापस न लौटाना।
3. अस्वामी-विक्रय (Sale without Ownership) कब्जा कर अवैध बेचान- बिना स्वामित्व या अधिकार के किसी दूसरे की वस्तु को बेच देना।
4. संभूय-समुत्थान (Partnership) साझेदारी - व्यापार या साझेदारी में होने वाले विवाद।
5. दत्तस्यानपकरण (Resumption of Gifts) उपहारों की अवैध वापसी - दिए गए दान/उपहार को अनुचित तरीके से वापस लेना।
6. वेतनस्य दान (Non-payment of Wages) दिहाड़ी - श्रमिकों या सेवकों को उनके कार्य का वेतन न देना।
7. संविदव्यतिक्रम (Breach of Contract) संविदा भंग - किसी समझौते, नियम या संविदा का उल्लंघन करना।
8. क्रय-विक्रयानुशय (Rescission of Sale or Purchase) उपभोक्ता विवाद - वस्तु खरीदने या बेचने के बाद उसमें दोष निकलने पर होने वाला विवाद।
9. सीमा-विवाद (Boundary Disputes) - दो गांवों, खेतों या घरों के बीच की सीमा (मेड़) को लेकर होने वाले झगड़े।
10. स्वामी-पाल-विवाद (Dispute between Master and Herdsman) - पशुओं के मालिक और उनकी देखभाल करने वाले चरवाहे के बीच विवाद।
11. वाक्पारुष्य (Defamation/Libel) मानहानि - कठोर शब्द बोलना, गाली-गलौज करना या मानहानि करना।
12. दंडपारुष्य (Assault/Violence) मारपीट - शारीरिक चोट पहुँचाना या मारपीट करना।
13. स्तेय (Theft) - चोरी से संबंधित अपराध।
14. साहस (Robbery/Violence) - बलपूर्वक या जबरदस्ती किया गया अपराध (जैसे डकैती)।
15. स्त्री-संग्रहण (Adultery/Crimes against Women) - स्त्रियों के विरुद्ध अपराध या अनैतिक संबंध।
16. स्त्री-पुंधर्म (Duties of Husband and Wife) - पति-पत्नी के आपसी अधिकारों और कर्तव्यों से जुड़े विवाद (जैसे तलाक या भरण-पोषण)।
17. विभाग (Partition of Inheritance) बंटवारा - पैतृक संपत्ति के बँटवारे या उत्तराधिकार से संबंधित विवाद।
18. द्यूत-समाह्वय (Gambling and Betting) - जुए या दांव लगाने से उत्पन्न होने वाले विवाद।
महत्व:
विशेषता - इसमें साक्ष्य और गवाहों की योग्यता पर बहुत बल दिया गया है।
B. याज्ञवल्क्य स्मृति - याज्ञवल्क्य स्मृति पर आधारित मिताक्षरा टीका (विज्ञानेश्वर द्वारा रचित) आज भी आधुनिक हिंदू उत्तराधिकार कानून का एक आधार है। यह मनुस्मृति से अधिक व्यवस्थित और संक्षिप्त विधिक स्रोत है।
याज्ञवल्क्य स्मृति को हिंदू कोड बिल का आधार माना जाता है। -
याज्ञवल्क्य स्मृति के भाग - इसके तीन भाग हैं -
I. आचार (Conduct/Social Rules) (कार्य) - यह भाग मनुष्य के सामाजिक और नैतिक कर्तव्यों से संबंधित है। इस स्मृति का आचार अध्याय जीवन जीने की पद्धति, सामाजिक व्यवहार और नैतिक नियमों का विस्तृत संकलन है। इसमें कुल 13 प्रकरण हैं, जो व्यक्ति के जन्म से लेकर उसकी सामाजिक जिम्मेदारियों तक को कवर करते हैं।
1. उपोद्घात प्रकरण (Introduction) -
इसमें स्मृति की भूमिका और धर्म के स्रोतों का वर्णन करते हुए बताया गया है कि सदाचार, वेद, स्मृतियाँ और अंतरात्मा की संतुष्टि धर्म के आधार हैं।
2. ब्रह्मचारी प्रकरण (Studenthood) - यह छात्र जीवन और शिक्षा से संबंधित है। इसमें उपनयन संस्कार, गुरु-शिष्य संबंध, वेदों के अध्ययन के नियम और ब्रह्मचारी के लिए पालन किए जाने वाले कठोर अनुशासन का वर्णन है।
3. विवाह प्रकरण (Marriage) - इसमें (जीवनसाथी) के चयन के मापदंड, अंतर्जातीय विवाह के नियम और सपिंड (रिश्तेदारी) के प्रतिबंधों की व्याख्या है। याज्ञवल्क्य स्मृति में विवाह को पवित्र संस्कार माना गया है और समाज में प्रचलित पद्धतियों के आधार पर इन्हें आठ प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है। इन्हें दो भाग, प्रशस्त (उत्तम) और अप्रशस्त (अधम) और आठ प्रकार में बांटा गया है।
∆. प्रथम भाग - प्रशस्त विवाह (धर्मसम्मत/उत्तम) - यह विवाह समाज में प्रतिष्ठित माने जाते थे और इनमें पिता की सहमति व धार्मिक विधि मुख्य होती थी।
I. ब्राह्म विवाह - यह सबसे उत्तम कोटि का विवाह है। इसमें पिता स्वयं सुयोग्य, विद्वान और चरित्रवान वर को आमंत्रित करता है और अपनी पुत्री को वस्त्राभूषणों से सुसज्जित कर उसे दान (कन्यादान) देता है।
II. दैव विवाह - इस विधि के अनुसार वधु का पिता एक यज्ञ का आयोजन करता है और उस यज्ञ को विधिपूर्वक संपन्न करने वाले ऋत्विक (पुरोहित) को अपनी पुत्री दान में देता है।
III. आर्ष विवाह - इसमें वर पक्ष कन्या के पिता को धर्म कार्य (खेती, यज्ञ आदि) हेतु एक जोड़ी गाय और बैल भेंट करता है। यहाँ यह शुल्क नहीं बल्कि एक प्रतीक माना जाता था।
IV. प्राजापत्य विवाह - यह ब्राह्म विवाह के समान ही है, लेकिन इसमें पिता वर-वधू को आशीर्वाद देते हुए कहता है कि तुम दोनों साथ मिलकर सामाजिक और धार्मिक कर्तव्यों का पालन करो।
∆. द्वितीय भाग - अप्रशस्त विवाह (अधम/कम वांछनीय) -
ये विवाह विशेष परिस्थितियों या मानवीय प्रवृत्तियों (प्रेम, बल, धन) पर आधारित होते थे, जिन्हें समाज में उच्च स्थान प्राप्त नहीं था।
V. असुर विवाह - इसमें वर पक्ष कन्या के परिवार या पिता को धन (शक्ति शुल्क) देकर कन्या को प्राप्त करता है। यह एक प्रकार से कन्या का क्रय (खरीदना) माना जाता था।
VI. गंधर्व विवाह - यह वर्तमान के प्रेम विवाह (Love Marriage) के समान है। इसमें माता-पिता की सहमति के बिना, कन्या और वर आपसी प्रेम और इच्छा से एक-दूसरे को स्वीकार करते हैं।
VII. राक्षस विवाह - इसमें कन्या की इच्छा के विरुद्ध, बल प्रयोग करके या अपहरण करके उससे विवाह किया जाता है। युद्धों में जीती गई स्त्रियों के साथ अक्सर ऐसा होता था।
VIII. पैशाच विवाह - यह सबसे निम्न और निकृष्ट श्रेणी का विवाह है। इसमें सोती हुई, मदहोश, मानसिक रूप से अस्वस्थ या विवश स्त्री के साथ छल-कपट से संबंध बनाकर विवाह किया जाता है।
याज्ञवल्क्य स्मृति के विधिक बिंदु (Legal Points) -
विवाह की वैधता - याज्ञवल्क्य ने गंधर्व विवाह को क्षत्रियों के लिए और असुर विवाह को वैश्यों/शूद्रों के लिए कुछ हद तक स्वीकार्य माना था, लेकिन ब्राह्म विवाह को सभी के लिए श्रेष्ठ बताया है।
आधुनिक संदर्भ - हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 ने इन सभी श्रेणियों को समाप्त कर दिया है। अब केवल कानूनी शर्तों (उम्र, सहमति, सपिंड न होना) के आधार पर विवाह को मान्यता दी जाती है, हालांकि ब्राह्म विवाह के संस्कार (सप्तपदी) आज भी प्रचलित हैं।
4. वर्ण-जाति विवेक प्रकरण (Caste and Classes) - इसमें समाज के चार वर्णों
I. ब्राह्मण
II. क्षत्रिय
III. वैश्य
IV. शूद्र
के बीच के अंतर्संबंधों से उत्पन्न होने वाली विभिन्न जातियों व उप-जातियों के सामाजिक स्थान का विवरण है।
5. गृहस्थ प्रकरण (Householder) - गृहस्थ व्यक्ति के दैनिक कर्तव्यों, पंच महायज्ञों और अतिथि सत्कार का वर्णन किया गया है। इसे जीवन का सबसे महत्वपूर्ण आश्रम माना गया है क्योंकि यह अन्य सभी का भरण-पोषण करता है।
6. भक्ष्य-अभक्ष्य प्रकरण (Dietary Rules) - इसमें खान-पान के शुद्धता संबंधी नियम दिए गए हैं—कौन से पदार्थ खाने योग्य हैं और कौन से वर्जित। यह स्वच्छता और स्वास्थ्य की प्राचीन अवधारणा पर आधारित है।
7. द्रव्य शुद्धि प्रकरण (Purification of Objects) - यह खंड भौतिक वस्तुओं (जैसे बर्तन, वस्त्र, भूमि, जल) की शुद्धि के तरीकों से संबंधित है। यदि कोई वस्तु अपवित्र हो जाए, तो उसे शास्त्रानुसार कैसे शुद्ध किया जाए, इसका विवरण यहाँ मिलता है।
8. दान प्रकरण (Charity) - दान देने की महिमा, उपयुक्त पात्र (किसे दान देना चाहिए), दान के समय और दान की जाने वाली वस्तुओं के फल का वर्णन है।
9. श्राद्ध प्रकरण (Ancestral Rites) -
पितरों के प्रति कर्तव्यों और श्राद्ध कर्म की विधि का विस्तृत वर्णन है। यह परिवार की निरंतरता और पूर्वजों के सम्मान को दर्शाता है।
10. गणपति कल्प प्रकरण - विघ्नहर्ता गणेश की पूजा और बाधाओं को दूर करने के लिए विशेष अनुष्ठानों का विवरण है। यह दर्शाता है कि उस समय भी गणेश पूजा का कितना महत्व था।
11. ग्रह शांति प्रकरण - ग्रहों के अशुभ प्रभाव को शांत करने के लिए किए जाने वाले अनुष्ठानों और शांति पाठ का वर्णन।
12. राजधर्म प्रकरण - यह शासन और न्याय से जुड़ा खंड है। इसमें राजा के गुण, दंड देने की शक्ति, मंत्रियों की नियुक्ति, युद्ध के नियम और प्रजा की सुरक्षा के कर्तव्यों का उल्लेख है।
13. आपद्धर्म प्रकरण (Rules for Distress) आपातकाल के नियम - विशेष या आपातकालीन परिस्थितियों (जैसे अकाल/युद्ध) में जब सामान्य नियमों का पालन संभव न हो, तब किन नियमों का पालन किया जा सकता है, इसकी छूट दी गई है।
II. व्यवहार अध्याय (Law and Procedure) - यह याज्ञवल्क्य स्मृति के इस भाग को आधुनिक विधि माना जा सकता है। इसमें 25 प्रकरण हैं।
I. न्यायपालिका - राजा को सलाह दी गई है कि वह योग्य ब्राह्मणों और मंत्रियों की सहायता से न्याय करे।
न्याय के 18 शीर्षक - याज्ञवल्क्य ने भी मनु की तरह विवादों के 18 शीर्षकों का वर्णन किया है, लेकिन उनकी व्याख्या अधिक कानूनी है।
याज्ञवल्क्य स्मृति – व्यवहार अध्याय के 18 नियम -
1. ऋणादान (ऋण का लेन-देन)
2. निक्षेप (धरोहर/अमानत)
3. असामीसंवृत्ति (भागीदारी/साझेदारी)
4. दत्ताप्रदानिक (दान से संबंधित विवाद)
5. क्रीत-विक्रय (खरीद-फरोख्त)
6. संविद्व्यतिक्रम (अनुबंध का उल्लंघन)
7. वेतनानपाकर्म (मजदूरी/वेतन का विवाद)
8. सीमाविवाद (भूमि की सीमा का विवाद)
9. स्वामिपालविवाद (मालिक-पालक/स्वामी-सेवक विवाद।
10. स्तेय (चोरी)
11. साहस (हिंसा, बलपूर्वक अपराध)
12. वाक्पारुष्य (मौखिक अपमान/गाली-गलौज)
13. दण्डपारुष्य (शारीरिक चोट/मारपीट)
14. स्त्रीसंग्रहण/परस्त्रीगमन (व्यभिचार)
15. द्यूत-समाह्वय (जुआ और सट्टा)
16. पणदूषण (माप-तौल में धोखा/मिलावट)
17. अभ्युपेत्यशुश्रूषा (सेवा का त्याग/कर्तव्यभंग)
18. दायभाग (उत्तराधिकार/विरासत)
यह 18 नियम उस समय की न्याय व्यवस्था, सामाजिक अनुशासन और आर्थिक व्यवहार का आधार थे और बाद में मिताक्षरा टीका तथा भारतीय विधि पर इनका गहरा प्रभाव पड़ा।
2. साक्ष्य (Evidence) - उन्होंने साक्ष्य को तीन श्रेणियों में बांटा -
3. लिखित (Documentary) - सरकारी या निजी दस्तावेज।
4. साक्षी (Witnesses) - गवाहों के बयान।
5. भुक्ति (Possession) - यदि कोई व्यक्ति लंबे समय से किसी संपत्ति का भोग कर रहा है, तो वह उसका स्वामी माना जाएगा।
3. प्रायश्चित अध्याय (Expiation /Penance) - यह भाग अपराधों के आध्यात्मिक और सामाजिक सुधार से संबंधित है। इसमें 5 प्रकरण हैं।
I. पाप और दंड - यदि कोई व्यक्ति अनैतिक कार्य करता है, तो उसे समाज में पुनः स्थान पाने के लिए क्या प्रायश्चित करना चाहिए, इसका वर्णन है।
II. अशौच - मृत्यु और जन्म के समय के नियमों का विवरण।
III. सजा - यह भाग आधुनिक दण्ड शास्त्र (Penology) जैसा है, जहाँ अपराध की गंभीरता के आधार पर प्रायश्चित या शारीरिक दंड का प्रावधान है।
याज्ञवल्क्य स्मृति का विधिक महत्व -
मिताक्षरा - (विज्ञानेश्वर द्वारा रचित टिका) बंगाल और असम को छोड़कर पूरे भारत में हिंदू उत्तराधिकार कानून का आधार।
दायभाग - (जीमूतवाहन द्वारा रचित टिका) मुख्य रूप से बंगाल और असम में प्रभावी।
मुख्य विशेषताएँ -
तर्क पर जोर - याज्ञवल्क्य ने कहा कि यदि दो स्मृतियों में विरोध हो, तो न्याय और तर्क (Reasoning) के आधार पर निर्णय लेना चाहिए।
प्रगतिशील विचार - इन्होंने संपत्ति के अधिकारों, विशेषकर विधवाओं के संपत्ति के अधिकार को मनु की तुलना में अधिक मान्यता दी।
निष्कर्ष - याज्ञवल्क्य स्मृति को आज के हिंदू कोड बिल की नींव माना जा सकता है। इसमें कानून को धर्म से अलग एक स्वतंत्र पहचान देने की कोशिश की गई थी।
C. नारद स्मृति - याज्ञवल्क्य स्मृति धार्मिक और कानूनी पहलुओं का मिश्रण है, वहीं नारद स्मृति भारतीय कानून के इतिहास में एक क्रांतिकारी मोड़ मानी जाती है। नारद स्मृति प्राचीन भारत का पहला ऐसा विधिक ग्रंथ है जो पूरी तरह से व्यवहार (कानून और प्रक्रिया) पर केंद्रित है। इसमें याज्ञवल्क्य स्मृति की तरह आचार (धर्म) या प्रायश्चित (शुद्धि) पर चर्चा नहीं की गई है, बल्कि यह विशुद्ध रूप से न्याय प्रशासन की बात करती है।
नारद स्मृति की विशेषताएं -
1. शुद्ध कानूनी प्रकृति - नारद स्मृति अन्य स्मृतियों से अलग है क्योंकि इसमें धार्मिक कर्मकांडों को छोड़ दिया गया है। यह केवल इस बात पर ध्यान केंद्रित करती है कि अदालत कैसे चलनी चाहिए, गवाह कैसे होने चाहिए और फैसले कैसे दिए जाने चाहिए।
2. राजा के अधिकार और कानून -
राजशासनं धर्मशास्त्रान्नियच्छति - अर्थात, यदि धर्मशास्त्र और राजा के आदेश में विरोधाभास हो, तो राजा का आदेश मान्य होगा। यह न्याय शास्त्र में सकारात्मक विधि की ओर बड़ा कदम था।
3. न्याय के 18 शीर्षक (Titles of Law) - नारद ने भी मनु की तरह विवादों को 18 शीर्षकों में बांटा है, लेकिन उन्होंने इनके अंतर्गत 132 उप-विभाजन (Sub-titles) किए हैं, जो उनकी कानून की सूक्ष्म समझ को दर्शाता है।
4. साक्ष्य और गवाह (Evidence and Witnesses) - नारद स्मृति में साक्ष्य के नियमों पर बहुत विस्तार से चर्चा की गई है। साक्ष्य को उन्होंने दो श्रेणियों में बांटा -
I. मानुष (Human) - लिख्या (दस्तावेज), साक्षी (गवाह) और भुक्ति (कब्जा)।
II. दैवीय (Divine) - कठिन परीक्षाओं के माध्यम से सत्य का पता लगाना (जैसे अग्नि परीक्षा), लेकिन नारद ने मानवीय साक्ष्य को अधिक प्राथमिकता दी है।
5. अदालती प्रक्रिया के चार चरण
नारद ने वाद को चार चरणों में विभक्त किया है -
I. प्रतिजना (भाषा/आरोप) - वादी द्वारा शिकायत दर्ज करना।
II. उत्तर (प्रतिवाद) - प्रतिवादी का उत्तर।
III. प्रत्यकलिका (क्रिया) - सबूतों की जाँच और बहस।
निर्णय (न्यायिक फैसला) - अंतिम फैसला।
6. सामाजिक लचीलापन - नारद स्मृति अन्य स्मृतियों की तुलना में अधिक लचीली है। उदाहरण, नारद ने विशेष परिस्थितियों में स्त्रियों के पुनर्विवाह (जैसे पति के लापता होने या नपुंसक होने पर) की अनुमति दी है, जो उस समय के समाज के हिसाब से काफी प्रगतिशील विचार था।
निष्कर्ष - नारद स्मृति को आधुनिक दीवानी प्रक्रिया संहिता (CPC) का प्राचीन रूप माना जा सकता है। इसमें कानून की प्रक्रिया (Procedure) पर इतना जोर दिया गया है कि इसे विधिक मैन्युअल कहा जाता है। नारद स्मृति पूर्णतः व्यवहार यानी कानूनी प्रक्रियाओं और न्याय प्रशासन पर केंद्रित है।
विशेषता - नारद स्मृति में राजा के आदेश को धर्म से ऊपर रखा गया है (यदि दोनों में विरोध हो)।
न्यायिक प्रक्रिया- इसमें मुकदमेबाजी, गवाही और अदालती फैसलों की सूक्ष्म व्याख्या की गई है।
4. कौटिल्य का अर्थशास्त्र - कौटिल्य का अर्थशास्त्र राजनीति विज्ञान का ग्रंथ है, लेकिन इसमें न्याय प्रशासन की एक उत्कृष्ट व्याख्या भी दी गई है।
I. न्यायालय - कौटिल्य ने दो प्रकार के न्यायालयों का वर्णन किया है -
A. धर्मस्थीय - दीवानी (Civil) कोर्ट्स।
B. कंटकशोधन - फौजदारी Criminal कोर्ट्स।
II. अपराध और दंड - इसमें दंड को नीति का आधार माना गया है ताकि समाज में भय और अनुशासन बना रहे।
5. अन्य महत्वपूर्ण संहिताएं -
बृहस्पति स्मृति - इसने गवाहों और दस्तावेजों के आधार पर साक्ष्य की महत्ता को विस्तार दिया।
कात्यायन स्मृति - यह आर्थिक कानूनों और संपत्ति विवादों पर विशेष रूप से केंद्रित थी।
निष्कर्ष - प्राचीन भारत की ये न्याय संहिताएं दर्शाती हैं कि उस समय भी कानूनी ढांचा अत्यंत विकसित था। आज के आधुनिक कानूनों (विशेषकर हिंदू विधि) की जड़ें इन्हीं संहिताओं, विशेषकर याज्ञवल्क्य और मनु की व्याख्याओं में मिलती हैं।
मध्यकालीन भारत में न्याय तंत्र - मध्यकालीन भारत में न्याय तंत्र का स्वरूप प्राचीन काल की तुलना में काफी बदल गया था। इस युग में न्याय मुख्य रूप से इस्लामी कानून (शरिया) और शासक की इच्छा पर आधारित था, हालांकि ग्रामीण स्तर पर प्राचीन हिंदू परंपराएं भी बनी रहीं।
मध्यकालीन न्याय व्यवस्था को मुख्य रूप से दो भागों में समझा जा सकता है
1. दिल्ली सल्तनत
2. मुगल काल
1. सल्तनत काल में न्याय (1206–1526) - सल्तनत काल में सुल्तान न्याय का सर्वोच्च अधिकारी होता था। न्याय प्रशासन के चार मुख्य विभाग थे -
I. दीवान-ए-कजा - यह सामान्य दीवानी और फौजदारी मामलों का मुख्य विभाग था। इसका प्रमुख काजी-उल-कजात (मुख्य काजी) होता था।
II. दीवान-ए-मजालिम - यहाँ सुल्तान स्वयं उन मामलों की सुनवाई करता था जो नौकरशाहों या अधिकारियों के विरुद्ध होते थे।
III. अमीर-ए-दाद - यह अधिकारी बड़े शहरों में कानून-व्यवस्था बनाए रखता था और काजी के फैसलों को लागू करवाता था।
IV. मुफ्ती - ये कानून के व्याख्याकार होते थे जो काजी को कुरान और हदीस के आधार पर राय (फतवा) देते थे।
2. मुगल काल में न्याय (1526–1857) - मुगल काल में न्याय प्रणाली अधिक संगठित और विस्तृत हो गई। सम्राट को न्याय का जीवित स्रोत माना जाता था।
मुगल काल में प्रशासनिक विभाजन और न्यायिक अधिकारी -
केंद्र स्तर - सम्राट सबसे बड़ी अदालत था। वह प्रत्येक बुधवार को न्याय के लिए बैठता था। मुख्य काजी (काजी-उल-कजात) धार्मिक और कानूनी मामलों का प्रमुख होता था।
II. प्रांतीय (सूबा) स्तर- सूबेदार (गवर्नर) और प्रांतीय काजी न्याय करते थे।
III. जिला स्तर (सरकार) - यहाँ फौजदार शांति व्यवस्था और काजी कानूनी विवाद देखता था।
IV. परगना और गाँव - परगना स्तर पर मुंसिफ और गाँव स्तर पर पंचायत सक्रिय थीं। मुगल शासकों ने गाँवों के पारंपरिक न्याय तंत्र में बहुत कम हस्तक्षेप किया।
3. मुगलकालीन न्याय की अनूठी विशेषताएँ -
I. न्याय की जंजीर - जहाँगीर ने आगरा के किले में एक सोने की जंजीर लगवाई, जिसे कोई भी पीड़ित सीधे सुल्तान को पुकारने के लिए बजा सकता था।
II.दण्ड का स्वरूप - मध्यकाल में दंड अत्यंत कठोर थे। इसमें मृत्युदंड, अंग-भंग, कोड़े मारना और जुर्माना शामिल था।
III. समानता का अभाव (व्यक्तिगत कोड लागू- कानून मुख्य रूप से मुस्लिम नागरिकों के लिए शरिया पर आधारित था, जबकि हिंदुओं के व्यक्तिगत मामले (शादी, उत्तराधिकार) उनके अपने शास्त्रों और पंचायतों के माध्यम से सुलझाए जाते थे।
4. कानून के स्रोत - मध्यकालीन न्याय मुख्य रूप से चार स्रोतों पर टिका था -
I. कुरान - सर्वोच्च स्रोत।
II. हदीस - पैगंबर के वचन और कार्य।
III. इज्मा - कानूनविदों की आम सहमति।
IV. फ़िकाह एवं कयास - तर्क और सादृश्य के आधार पर व्याख्या।
V. फतवा-ए-आलमगीरी - फतवा-ए-आलमगीरी मध्यकालीन भारत के कानूनी इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण और विशाल दस्तावेज है। यह मुगल सम्राट औरंगजेब (आलमगीर) के आदेश पर तैयार किया गया, जिसका उद्देश्य पूरे साम्राज्य के लिए एक समान और स्पष्ट कानूनी संहिता उपलब्ध कराना था।
फतवा ए आलमगीर की विशेषताएं -
1. निर्माण और उद्देश्य - इसका संकलन 1667 से 1675 के बीच किया गया औरंगजेब ने शेख निजाम के नेतृत्व में इस हेतु लगभग 50 प्रख्यात इस्लामी (उल्मा) कानूनविदों की समिति बनाई।
फतवा ए आलमगीर का उद्देश्य - उस समय इस्लामी कानून विभिन्न ग्रंथों और व्याख्याओं में बिखरा हुआ था। औरंगजेब चाहता था कि न्यायाधीशों (काजियों) के पास एक ऐसी प्रमाणित किताब हो जिससे वे बिना किसी भ्रम के फैसले दे सकें।
2. फतवा ए आलमगीर की विषय-वस्तु - फतवा-ए-आलमगीरी मुख्य रूप से हनफी स्कूल के इस्लामी न्यायशास्त्र पर आधारित है। इसे अरबी भाषा में लिखा गया था (बाद में इसका फारसी और अन्य भाषाओं में अनुवाद हुआ)। इसमें निम्नलिखित विषयों पर विस्तृत निर्देश हैं -
I. राज्य का प्रशासन - शासन व्यवस्था और सुल्तान के अधिकार।
II. दीवानी कानून - विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, वसीयत और गोद लेना।
III. व्यापारिक कानून - ऋण, अनुबंध, साझेदारी और संपत्ति के विवाद।
IV. फौजदारी कानून - अपराध और उनके लिए निर्धारित दंड (जैसे हुदूद और ताज़ीर)।
V. कर व्यवस्था - जज़िया, जकात और भूमि राजस्व से संबंधित नियम।
3. फतवा ए आलमगीर का ऐतिहासिक और कानूनी महत्व -
I. संहिताकरण - यह भारत में कानूनों को संहिताबद्ध करने का पहला बड़ा प्रयास था, जैसे आज की IPC या BNS है।
II. न्यायपालिका के लिए मार्गदर्शिका - इसने काजियों की मनमानी को कम किया क्योंकि अब उनके पास फैसलों के लिए एक मानक लिखित आधार था।
III. ब्रिटिश काल में प्रभाव - जब अंग्रेज भारत आए, तो उन्होंने शुरुआती वर्षों में मुस्लिम पर्सनल लॉ को समझने के लिए इसी ग्रंथ का सहारा लिया। |
4. आलोचनात्मक दृष्टिकोण - जहाँ यह प्रशासनिक दृष्टि से उपलब्धि थी, वहीं इसके कुछ पहलुओं की आलोचना भी की जाती है -
I. कठोरता - इसमें दंड के प्रावधान काफी सख्त थे।
II. धार्मिक पक्ष - यह मुख्य रूप से इस्लामी सिद्धांतों पर केंद्रित था, जिससे गैर-मुस्लिम प्रजा के लिए व्यक्तिगत कानूनों में जटिलताएं पैदा हुईं।
एक रोचक तथ्य - मुगल काल की इस कानूनी डिक्शनरी का प्रभाव इतना गहरा था कि 18वीं और 19वीं शताब्दी तक भारतीय अदालतों में इसे एक अंतिम संदर्भ के रूप में उपयोग किया जाता रहा।
निष्कर्ष - मध्यकालीन न्याय प्रणाली केंद्रीकृत थी जहाँ काजी और सुल्तान की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण थी। हालांकि यह प्रणाली कठोर थी, लेकिन औरंगजेब जैसे शासकों के समय लिखित संहिताओं के प्रयास भी हुए।
ब्रिटिश शासन काल (1757-1947) - इस दौरान भारत में नई न्याय व्यवस्था की नींव रखी गई, जिसने प्राचीन और मध्यकालीन प्रणालियों को पूरी तरह बदल दिया। आज की हमारी आधुनिक न्यायिक प्रणाली (सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट, IPC, CrPC) काफी हद तक इसी काल की देन है।
ब्रिटिश काल में न्याय तंत्र के विकास के तीन चरण -
1. ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन, प्रारंभिक चरण -
शुरुआत में अंग्रेजों ने स्थानीय कानूनों में कम हस्तक्षेप किया, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने अपनी अदालतें स्थापित कीं।
मेयर कोर्ट (1726) - मद्रास, बॉम्बे और कलकत्ता (प्रेसीडेंसी में स्थापित किए गए।
वारेन हेस्टिंग्स के सुधार (1772) - हेस्टिंग्स ने प्रत्येक जिले में दो अदालतें बनाईं -
I.दीवानी अदालत - नागरिक मामलों के लिए (कलेक्टर के अधीन)।
II. फौजदारी अदालत - आपराधिक मामलों के लिए (भारतीय काजी और मुफ्ती की सहायता से)।
III. रेगुलेटिंग एक्ट (1773) - इसके तहत 1774 में कलकत्ता में सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना हुई। सर एलिजा इम्पे इसके पहले मुख्य न्यायाधीश बने।
2. लॉर्ड कॉर्नवालिस के सुधार (1787–1793) - कॉर्नवालिस ने शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत अपनाते हुए कलेक्टरों से न्यायिक शक्तियां प्रत्याहारित कर पृथक से दीवानी न्यायालयों की स्थापना की। इसे कॉर्नवालिस कोड (1793) के नाम से जाना जाता है। कार्नवालिस ने न्याय प्रशासन को लिखित नियमों के आधार पर व्यवस्थित किया।
कार्नवालिस कोड - उन्होंने चार सर्किट कोर्ट (प्रान्तीय न्यायालय) स्थापित किए ताकि न्याय लोगों के करीब पहुँच सके।
3. कानूनों का संहिताकरण - 1833 के चार्टर एक्ट के बाद भारतीय न्याय तंत्र में क्रांतिकारी बदलाव आया।
I. प्रथम विधि आयोग - लॉर्ड मैकाले की अध्यक्षता में प्रथम विधि आयोग का गठन हुआ। इसका उद्देश्य पूरे भारत में समान कानून बनाना था। इसके परिणामस्वरूप प्रमुख संहिताओं का जन्म हुआ -
अ. भारतीय दंड संहिता (IPC), 1860
ब. दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC), 1861
स. भारतीय साक्ष्य अधिनियम , 1872
द. इंडियन हाई कोर्ट एक्ट, 1861
4. इंडियन हाई कोर्ट एक्ट, 1861 - इसके तहत कलकत्ता, मद्रास और बॉम्बे में उच्च न्यायालयों की स्थापना हुई और पुराने सुप्रीम कोर्ट को खत्म कर दिया गया।
5. संघीय न्यायालय (Federal Court, 1937) - भारत सरकार अधिनियम, 1935 के तहत 1937 में दिल्ली में संघीय न्यायालय (वर्तमान सुप्रीम कोर्ट) स्थापित किया गया। उस समय अंतिम अपील इंग्लैंड की प्रिवी काउंसिल में की जाती थी।
ब्रिटिश न्याय तंत्र की विशेषताएं और प्रभाव -
सकारात्मक प्रभाव -
I. कानून का शासन जाति या धर्म के बजाय लिखित कानून को प्राथमिकता।
II. एकीकृत ढांचा - पूरे भारत के लिए एक समान न्यायिक व्यवस्था।
III. व्यक्तिगत स्वतंत्रता - बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) जैसे सिद्धांतों का परिचय।
नकारात्मक प्रभाव -
I. महंगी और लंबी प्रक्रिया - सामान्य भारतीय के लिए न्याय पाना असंभव हो गया।
II. विदेशी भाषा - अदालतों की भाषा अंग्रेजी होने से जनता और न्याय के बीच दूरी बढ़ गई।
III. औपनिवेशिक हित - कानून का उपयोग अक्सर भारतीयों को दबाने के लिए किया गया।
निष्कर्ष - ब्रिटिश काल ने भारत को व्यवस्थित एवं लिखित न्याय प्रणाली दी, लेकिन इसने स्थानीय पंचायत व्यवस्था को लगभग नष्ट कर दिया। वर्तमान सरकार ने BNS (2023) जैसे कानून लागू किए हैं, उनका मुख्य उद्देश्य इसी ब्रिटिशकालीन दंडात्मक मानसिकता को बदलकर न्याय आधारित व्यवस्था बनाना है। सुप्रीम कोर्ट एवं हाई कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
आधुनिक भारत में वर्तमान न्याय तंत्र -
1. न्यायपालिका की संरचना (Hierarchy) - भारतीय न्याय प्रणाली एक पिरामिड की तरह काम करती है -
I. उच्चतम न्यायालय - यह भारत का सर्वोच्च न्यायालय है। इसके फैसले पूरे देश में बाध्यकारी होते हैं। यह संविधान का रक्षक और अंतिम व्याख्याकार (Interpreter) है। यह देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था है, जो नई दिल्ली में स्थित है।
SC के अधिकार - इसके पास मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए रिट जारी करने, केंद्र-राज्य विवादों को सुलझाने और निचली अदालतों के फैसलों पर अपील सुनने का अधिकार है। संविधान के अनुच्छेद 124 के अंतर्गत इसकी स्थापना की गई।
II. उच्च न्यायालय - प्रत्येक राज्य या राज्यों के समूह के लिए एक उच्च न्यायालय होता है। वर्तमान में भारत में 25 उच्च न्यायालय हैं। ये राज्य के अधिकार क्षेत्र में आने वाले दीवानी और फौजदारी मामलों की सुनवाई करते हैं। इनके पास अधीनस्थ न्यायालयों के कामकाज पर अधीक्षण की शक्ति होती है।
III. अधीनस्थ न्यायालय - ये जिला और तहसील स्तर पर कार्य करते हैं। इन्हें मुख्य रूप से दो भागों में बांटा जाता है -
अ. जिला अदालत - यहाँ संपत्ति, विवाह और अनुबंध जैसे दीवानी मामलों की सुनवाई होती है। यहाँ के मुख्य न्यायाधीश को 'जिला न्यायाधीश' कहा जाता है।
ब. सत्र अदालत - यहाँ हत्या, चोरी और डकैती जैसे आपराधिक मामलों की सुनवाई होती है। यहाँ के मुख्य न्यायाधीश को सत्र न्यायाधीश (Sessions Judge) कहा जाता है।
2. अन्य विशेष न्यायिक और अर्ध - न्यायिक संस्थाएं एवं संवैधानिक संस्थाएं
I. न्यायाधिकरण (Tribunals) - विशिष्ट विषयों के त्वरित समाधान हेतु भारत में कई ट्रिब्यूनल और विशेष अदालतें बनाई गई, जिसका उद्देश्य अदालतों का बोझ कम करना और तकनीकी मामलों में विशेषज्ञों के माध्यम से न्याय देना। जैसे केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (CAT): सरकारी कर्मचारियों के सेवा संबंधी विवादों के लिए। सेना, नौसेना और वायु सेना के कर्मियों के लिए।सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (AFT)।
II. राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) - पर्यावरण से संबंधित मुद्दों के लिए।
III. उपभोक्ता अदालतें (Consumer Courts) - उपभोक्ताओं के अधिकारों की रक्षा के लिए।
IV. लोक अदालत - आपसी समझौते के आधार पर लंबित मामलों को निपटाने के लिए। गांधीवादी दर्शन पर आधारित इस संस्था को वैकल्पिक विवाद निस्तारण (ADR) का भाग माना जाता है।
विशेषता - यहाँ कोई अदालती शुल्क नहीं लगता और इसके फैसले के खिलाफ कोई अपील नहीं होती क्योंकि यह आपसी सहमति से होता है। लोक अदालतें एक ही दिन में लाखों लंबित मामलों का निपटारा करती हैं।
V. ग्राम न्यायालय - ग्रामीण स्तर पर त्वरित और सस्ता न्याय सुनिश्चित करने के लिए। ग्रामीण क्षेत्रों में जमीनी स्तर पर न्याय पहुँचाने के लिए 2008 में अधिनियमित किया गया।
VI. विधि आयोग - कानूनों में सुधार के लिए सरकार को सुझाव देना।
VII. नालसा (NALSA) - अनुच्छेद 39A के तहत समाज के गरीब और कमजोर वर्गों को मुफ्त कानूनी सहायता प्रदान करना। राजस्थान में RALSA। और जिले में DLA।
VIII. . पारिवारिक न्यायालय (Family Courts) - पारिवारिक न्यायालय अधिनियम, 1984 के अंतर्गत गठित फैमिली कोर्ट में विवाह, तलाक, बच्चों की कस्टडी, भरण-पोषण और पारिवारिक विवादों का समाधान किया जाता है। इसका मूल उद्देश्य काउंसलर्स और समाजशास्त्रियों के माध्यम से आपसी सहमति एवं सुलह करवाना है।
IX. फास्ट ट्रैक कोर्ट (FTC) - जघन्य अपराधों (जैसे बलात्कार) के मामलों में त्वरित सुनवाई और फैसले के लिए।
X. विशेष अदालतें (Special Courts) - भ्रष्टाचार (CBI Court) या बच्चों के खिलाफ अपराध (POCSO Court) जैसे विशिष्ट विषयों के लिए।
XI. आयोग (Commissions) -आयोग मुख्य रूप से अधिकारों के संरक्षण, जाँच और सरकार को परामर्श देने का कार्य करते हैं।
I. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC)
II. महिला आयोग (NCW)
III. विधि आयोग - यह एक गैर-सांविधिक संस्था है जो पुराने कानूनों की समीक्षा और नए सुधारों का सुझाव देती है।
XII. अनौपचारिक घरेलू पंचायतें - सामाजिक या सामुदायिक रूप से आज भी भारत में अधिकांश मामले आपसी पंचायती से निपट जाते हैं। इन आपसी निपटारों की संख्या न्यायालयों में जाने वाले मामलों से अधिक होती है।
XIII. कज़ात एवं पर्सनल लॉ बोर्ड- आज भी मुस्लिम समाज में सामान्य एवं पारिवारिक मामले सरकारी अदालत में जाने की बजाय धार्मिक न्यायाधीश (काज़ी) के पास अधिक जाते हैं।
इन औपचारिक एवं अनौपचारिक संस्थाओं का महत्व -
I. विशेषज्ञता - न्यायाधिकरणों में कानून के साथ-साथ संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ भी होते हैं।
II. लचीलापन - ये संस्थाएं 'सिविल प्रक्रिया संहिता' (CPC) के कड़े नियमों से बंधी नहीं होतीं, बल्कि 'प्राकृतिक न्याय' (Natural Justice) के सिद्धांतों पर चलती हैं।
III. सस्ता न्याय - लोक अदालत और ग्राम न्यायालय जैसे मंच गरीब नागरिकों के लिए वरदान साबित होते हैं।
न्यायिक विधि के प्रकार - न्याय तंत्र दो श्रेणियों में मामलों की सुनवाई करता है -
I. दीवानी मामले - यह व्यक्तियों के अधिकारों के उल्लंघन से संबंधित है। जैसे जमीन-जायदाद के विवाद, किराया, शादी-तलाक और अनुबंध।
II. फौजदारी मामले - यह ऐसे अपराधों से संबंधित है जिन्हें समाज के खिलाफ माना जाता है। जैसे चोरी, हत्या, दहेज उत्पीड़न और धोखाधड़ी। इसमें FIR दर्ज की जाती है और सजा का प्रावधान होता है।
भारतीय न्याय तंत्र की विशेषताएँ -
I. स्वतंत्र न्यायपालिका - भारत में न्यायपालिका कार्यपालिका (Executive/अफसर) और विधायिका (Legislature/जन प्रतिनिधि) के नियंत्रण से स्वतंत्र है।
II. न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review) - न्यायालयों के पास संसद द्वारा बनाए गए कानूनों की समीक्षा करने की शक्ति है। यदि कोई कानून संविधान के मूलभूत ढांचे के खिलाफ हो, तो उसे रद्द किया जा सकता है।
III. जनहित याचिका (PIL) - कोई भी नागरिक जनहित के मुद्दों (जैसे प्रदूषण, मानवाधिकार) के लिए सीधे अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है।
हालिया बदलाव, भारतीय न्याय संहिता (BNS) - हाल ही में भारत सरकार ने पुराने कानूनों (IPC, CrPC, और Evidence Act) को बदलकर नए कानून लागू किए हैं -
I. भारतीय न्याय संहिता (BNS) - (IPC की जगह)।
II. भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) - (CrPC की जगह)।
III. भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) - (Evidence Act की जगह)।
यह कदम न्याय प्रक्रिया को अधिक आधुनिक और सुलभ बनाने के लिए उठाया गया है।
भारतीय न्यायिक प्रणाली कमियाँ और चुनौतियाँ -
I. मुकदमों का भारी बोझ और देरी -
यह भारतीय न्यायपालिका की सबसे बड़ी आलोचना है। भारत में करोड़ों मामले अदालतों में लंबित हैं। एक औसत मामले को अंतिम फैसले तक पहुँचने में कई साल, और कभी-कभी दशक लग जाते हैं।
"न्याय में देरी, न्याय न मिलने के बराबर है" (Justice delayed is justice denied)।
II. विचाराधीन कैदी (Undertrials) - लंबी अवधि से जेलों में बंद अधिकांश कैदी वे हैं जिनका दोष अभी सिद्ध नहीं हुआ है, कुछ कैदी सजा से अधिक सजा काट चुके हैं।
III. महंगी न्याय प्रक्रिया - आम नागरिक के लिए कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाना आर्थिक रूप से भारी पड़ता है। वकीलों की भारी फीस (नामी वकीलों की फीस चालीस से पचास लाख रुपए) की भरपाई, कागजों की टाइपिंग और महंगी स्टाम्प ड्यूटी के कारण आम आदमी जहां तक संभव हो न्यायालय की ओर मुंह करने की सोच ही नहीं सकता।
II. पारदर्शिता की कमी और नियुक्ति प्रक्रिया (Collegium System) - उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति की कॉलेजियम प्रणाली हमेशा विवादों में रहती है। माना है कि न्यायाधीशों द्वारा ही न्यायाधीशों को चुनने की प्रक्रिया बंद कमरों में होती है, जिससे भाई-भतीजावाद की संभावना बनी रहती है।
III. जवाबदेही का अभाव - न्यायपालिका में आंतरिक जवाबदेही तय करने के लिए कोई मजबूत स्वतंत्र तंत्र नहीं है। कुछ लोग न्यायपालिका पर भी सरकार के दबाव में निर्णय देने के आरोप लगाते रहते हैं, खास तौर से अल्पसंख्यक समाज।
IV. बुनियादी ढांचे एवं संसाधनों का अभाव - कई अदालतों में पर्याप्त कमरे, डिजिटल उपकरण, यहाँ तक कि रिकॉर्ड रखने के लिए सही जगह और शौचालयों जैसी बुनियादी सुविधाओं का भी अभाव है। निचली अदालतों की स्थिति अधिक दयनीय है।
V. डिजिटलीकरण की धीमी गति - ई-कोर्ट जैसी योजनाओं के बावजूद, ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी कागजी काम का ही बोलबाला है।
VI. जटिल कानूनी भाषा- भारतीय कानूनों की भाषा आज भी औपनिवेशिक (Colonial) और कठिन अंग्रेजी पर आधारित है जोसामान्य व्यक्ति की समझ से बाहर है। मुवक्किल को पता ही नहीं चलता कि उसके मामले में अदालत में क्या बहस हुई और क्या फैसला दिया गया। न्याय की भाषा का स्थानीय न होना एक बड़ी समस्या है।
V. कार्यपालिका के साथ टकराव और न्यायिक सक्रियता - कभी-कभी अदालतों पर आरोप लगता है कि वे अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर नीति निर्माण (Policy making) में हस्तक्षेप Judicial Overreach करते हैं, जिससे विधायिका और न्यायपालिका के बीच संतुलन बिगड़ता है।
VI. भ्रष्टाचार की शिकायतें - उच्य एवं निम्न स्तर पर न्यायपालिका की छवि में हाल के दिनों में बट्टा लगा है। सुप्रीम कोर्ट के जज के घर मिली जलाई गई अथाह राशि ने आग में घी का काम किया। वास्तविकता यह है कि वादी माननीय जज से मिलीभगत कर निर्णयों को प्रभावित करते हैं।
भारतीय न्याय तंत्र में सुधार हेतु उपाय - भारतीय न्याय तंत्र की कमियों को दूर करने और इसे अधिक जन-केंद्रित बनाने हेतु विशेषज्ञों, विधि आयोगों और समितियों (जैसे मलिमथ समिति) द्वारा समय-समय पर कई महत्वपूर्ण सुधारों के सुझाव दिए गए हैं -
1. प्रशासनिक एवं ढांचागत सुधार -
I. न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि- भारत में प्रति दस लाख जनसंख्या पर न्यायाधीशों की संख्या वैश्विक औसत से बहुत कम है। इस अनुपात को बढ़ाना प्राथमिकता होनी चाहिए।
II. अखिल भारतीय न्यायिक सेवा (AIJS) का गठन - यूपीएससी की तर्ज पर केंद्रीय सेवा शुरू की जानी चाहिए ताकि जिला स्तर पर उच्च गुणवत्ता वाले न्यायाधीशों की नियुक्ति हो सके।
बुनियादी ढांचे का आधुनिकीकरण - निचली अदालतों में पर्याप्त भवन, डिजिटल रिकॉर्ड रूम और न्यायाधीशों हेतु शोध सहायता की व्यवस्था की जानी चाहिए।
2. तकनीकी सुधार: ई-न्यायपालिका (E-Judiciary) - तकनीक के माध्यम से पारदर्शिता और गति बढ़ाई जा सकती है:
I. वर्चुअल हियरिंग - छोटे और तकनीकी मामलों की सुनवाई ऑनलाइन की जानी चाहिए ताकि वकीलों और मुवक्किलों का समय और पैसा बचे।
केस मैनेजमेंट सिस्टम - हर केस की ट्रैकिंग के लिए AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) का उपयोग, जो स्वतः ही अगली तारीख तय करे और देरी के कारणों को चिह्नित करे।
डिजिटल साक्ष्य - दस्तावेजों और गवाहों के बयानों को डिजिटल रूप में सुरक्षित रखना ताकि फाइलों के खोने या फटने का डर न रहे।
3. प्रक्रियात्मक सुधार - न्यायिक प्रक्रियाओं को सरल और त्वरित बनाने हेतु -
I. तारीखों पर लगाम - स्थगन या अगली तारीख देने की प्रवृत्ति पर कड़ा अंकुश लगाया जाना चाहिए। एक मामले में अधिकतम 2-3 से अधिक स्थगन न दिए जाएं। तारीख पे तारीख, तारीख पे तारीख के अधरझूल में कई वादी ईश्वर को प्यारे हो जाते हैं।
II. सरल कानूनी भाषा - कानूनों और फैसलों को स्थानीय भाषाओं में उपलब्ध कराया जाना चाहिए। न्याय की भाषा वही होनी चाहिए जो पीड़ित समझ सके।
III. फौजदारी न्याय प्रणाली में बदलाव - आपराधिक मामलों में प्ली बारगेनिंग को बढ़ावा देना और साक्ष्य अधिनियम में सुधार किया जाना चाहिए।
4. वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR Reforms) - अदालत के बाहर विवादों को सुलझाने पर अधिक बल देने हेतु -
I. अनिवार्य मध्यस्थता - व्यावसायिक और पारिवारिक विवादों के लिए अदालत जाने से पहले मध्यस्थता को अनिवार्य कर देना चाहिए।
II. लोक अदालतों का सशक्तीकरण - लोक अदालतों को अधिक कानूनी शक्तियाँ देना और उन्हें नियमित आधार पर आयोजित करना।
III. ग्राम न्यायालयों का विस्तार - न्याय को गाँव की दहलीज तक पहुँचाने के लिए ग्राम न्यायालय अधिनियम को प्रभावी ढंग से लागू करना।
5. पारदर्शिता और जवाबदेही -
I. कॉलेजियम प्रणाली में सुधार - न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाना और इसमें एक निश्चित मापदंड तय करना।
II. न्यायिक जवाबदेही कानून - न्यायाधीशों के आचरण और उनके विरुद्ध शिकायतों की जाँच हेतु एक स्वतंत्र संवैधानिक तंत्र का होना।
निष्कर्ष - भारतीय न्याय प्रणाली अपने प्राचीन धर्म और न्याय के आदर्शों से विकसित होकर आज आधुनिक, स्वतंत्र और एकीकृत त्रिआयामी ढांचे के रूप में खड़ी है -
1. संतुलन और स्वायत्तता - भारतीय न्यायपालिका लोकतंत्र का वह स्तंभ है जिसने संविधान की सर्वोच्चता को बनाए रखा है। चाहे वह बुनियादी ढांचे का सिद्धांत हो या नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा, न्यायपालिका ने कार्यपालिका और विधायिका के बीच एक अनिवार्य संतुलन बनाए रखा है।
2. अनुकूलनशीलता - समय के साथ न्याय तंत्र ने खुद को बदला है। पारंपरिक अदालतों के बोझ को कम करने के लिए न्यायाधिकरणों, पारिवारिक न्यायालयों और लोक अदालतों जैसी संस्थाओं का उदय इसकी गतिशीलता को दर्शाता है। हाल ही में भारतीय न्याय संहिता (BNS) जैसे नए कानूनों का आगमन औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति और आधुनिकता की ओर बढ़ता कदम है।
3. भविष्य की चुनौतियाँ और सुधार -
∆. निष्कर्ष यह भी स्पष्ट करता है कि केवल स्वतंत्र होना काफी नहीं है, न्याय का सुलभ और त्वरित होना भी अनिवार्य है।
∆. न्यायिक विलंब और महँगी कानूनी प्रक्रिया आज भी आम नागरिक और न्याय के बीच की सबसे बड़ी दीवार है।
∆. भविष्य में ई-कोर्ट, एआई (AI) का उपयोग और स्थानीय भाषाओं में न्याय जैसे सुधार ही इस व्यवस्था को जन-जन तक पहुँचा सकते हैं।
हम कह सकते हैं कि- प्राचीन भारत की कुल और श्रेणी जैसी संस्थाओं से लेकर आज के सर्वोच्च न्यायालय तक का सफर यह बताता है कि समाज कितना भी बदल जाए, न्याय की अवधारणा हमेशा सत्य और नैतिकता पर टिकी रहती है।
मेरी नजर में - गांव में एक कहावत है, दे र पांड्या आशीष, मं के द्यूं मेरी आंतड़ि देसी। अर्थात जब किसी को न्याय मिलता है तो वह कानून की किताबों में नहीं, बल्कि पीड़ित की आँखों में दिखने वाली संतुष्टि से पता चल जाता है।
इंसाफ की कुर्सी पर बैठा व्यक्ति ईश्वर का प्रतिनिधि माना जाता है। यदि प्रक्रिया सरल हो जाए, तो आम आदमी का विश्वास इस व्यवस्था में और गहरा होगा।
शमशेर भालू खां