Wednesday, 10 May 2023

चौधरी कुंभाराम आर्य

   
                  चौधरी कुम्भाराम आर्य
कुंभाराम (कुरडा राम) की माता श्री जीवनी देवी

           कुंभाराम राम आर्य लिफ्ट केनाल

नाम - कुंभाराम आर्य (पिता के देहावसान के बाद चौधरी कुंभाराम आर्य)

जन्म - 10 मई 1914 खेरा छोटी पटियाला

दादा का नाम  : चौधरी नन्दराम सुंडा

भैराराम के दो पुत्र हुए जो ईश्वर को प्यारे हो गए थे। उसी तीसरे लड़के का नाम कुरड़ा रखा। एक बड़ी बहन का नाम महकां था जो करावन फतेहाबाद के पालाराम श्योराण के यहां ब्याही गई थी।

मृत्यु - 26 अक्टूबर 1995

पिता का नाम - भेरा राम जाति जाट गोत्र सुंडा (पैतृक निवास कूदन जिला सीकर) परिवार पहले श्योदनपुरा चूरू बसा बाद में फेफाना तहसील नोहर जिला हनुमानगढ़ में बस गया। भैराराम जी की मृत्यु अल्पायु में 1919 में हो गई।

माता का नाम - जीवनी देवी

जन्म स्थान -खेरा छोटी (तत्कालीन पटियाला रियासत) पंजाब

विवाह - 1928 भूरी देवी सिंवर गोत्र किडावन फतेहाबाद हरियाणा 

पुत्र : 1. विजयपाल आर्य पत्नी श्रीमती सुचार आर्य, 2. अजित कुमार आर्य पत्नी शालिनी आर्य

पुत्रियाँ : 1.श्रीमती अभय आर्य पत्नी श्री राधा कृष्ण चौधरी, 2.श्रीमती विजय चौधरी पत्नी श्री मुखराम, 3.शारदा पत्नी हरफूल सिंह, 4.इंदू वर्मा पत्नी मोहन वर्मा, 5.मंजू (अविवाहित

शिक्षा - फेफाना प्रारंभिक शिक्षा (मेट्रिक) 1920 में प्रथम कक्षा में प्रवेश के समय नाम कुरडा से कुंभाराम अध्यापकों ने रखा। 1924 में चौथी कक्षा में पूरे बीकानेर राज्य में प्रथम स्थान आया। रियासत से आगे पढ़ाई के लिए 2 रुपए महीना वजीफा मिला पर गरीबी के कारण आगे पढ़ाई नहीं कर पाए।

स्थायी पता: -

आर्य निवास, दुर्गा पुरा, जयपुर, राजस्थान।

व्यवसाय

1 खेती

2 1928 में वन विभाग में नौकरी शुरू की आयु 14 वर्ष 1930 में बरखास्त। 1930 में बीकानेर स्टेट ने नाबालिग को नौकरी पर ना रखने के आदेश किए जिसके कारण 1931 को उन्हें नौकरी से हटा दिया गया।

3. 7 जनवरी 1932 को क्लार्क के रूप में पुलिस सेवा में शामिल हुए और इंस्पेक्टर पद तक प्रमोशन 1944 में हुआ। पुलिस से स्वतंत्रता आंदोलन के समर्थन के कारण 13 मार्च 1946 को उन पर दुराचार और अपमानजनक व्यवहार का आरोप लगाते हुए उन्हें नौकरी से बर्खास्त कर दिया।

सामांजिक कार्य - 

1. स्वामी दयानंद सरस्वती से प्रभावित लोग ग्रामीण क्षेत्रों में आर्य समाज की गतिविधियों का प्रसार कर रहे थे। समाज में व्याप्त ब्राह्मणवादी वर्चस्व और छुआछूत के कारण कुंभाराम भी कुंभाराम आर्य बन गए।

कुंभाराम राजनीति में केसे आए :-

आजादी के आंदोलन में भाग लेने के लिए आर्य द्वारा सेवा से त्यागपत्र दिया गया। इस प्रार्थना पत्र को बैक-डेट में अस्वीकार कर दिया गया और उनके खिलाफ संगीन मामले में गैर जमानती नोटिस जारी किए। आर्य को जाल में फंसाने के लिए पुलिस महानिरीक्षक के कार्यालय से सन् 1946 में नोटिस जारी किया गया कि - "कुंभाराम नाम का मुजरिम फरार है, उसे जो भी व्यक्ति पकड़वायेगा उसे ₹100 का इनाम दिया जाएगा। मुजरिम का रंग कन्दूम, गोल चेहरा, हट्टा -कट्टा, चौड़ाई 5 फुट 7 इंच और बाएं हाथ पर कुंभाराम नाम खुदा है। अब आर्य की पुलिस सेवा से बर्खास्तगी का समाचार जनता में आग की तरह फैल गया। जनता ने कुंभाराम आर्य को अपनी पलकों पर बिठा लिया। किसान समुदाय ने आर्य को पग-पग पर सहयोग देने का वचन दिया। कुंभाराम अब पूर्ण रूप से राजनीति के मंच पर आ गए।

राजनीतिक जीवन - 

1.1930 में कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में शामिल हुए जिसके कारण वन विभाग की नौकरी से हाथ धोना पड़ा।

2. पुलिस विभाग में नौकरी के समय मुक्ता प्रसाद वकील और रघुवर दयाल गोयल से संपर्क हुआ उनकी मदद से एक राजनीतिक संगठन प्रजा परिषद का गठन किया।

3.गांधी जी के स्वतंत्रता आंदोलन के समर्थन में पुलिस की नौकरी से इस्तीफा दे दिया। सेलिए पुलिस सेवा से इस्तीफा दे दिया और राजनीति में सक्रिय हो गए।

3. 1945 में अखिल भारतीय देशी राज्य परिषद अधिवेशन में भाग लिया।

4. बीकानेर रियासत के किसानों को जागीरदारों के खिलाफ एक किया। उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया 1946 में रिहा हुए। यहां किसान भूमि के किरायेदार थे और उनकी स्थिति जागीरदारों, जमींदारों और बिशवेदरों आदि कहे जाने वाले जमींदारों के शोषण के कारण दयनीय थी। काश्तकार का उसके द्वारा खेती की गई भूमि पर कोई अधिकार नहीं था। काश्तकार की जमीन आंदोलन की मांग के दबाव के फलस्वरूप सरकार ने राजस्थान काश्तकार संरक्षण अध्यादेश, 1949 पारित किया। राजस्थान भूमि सुधार और जागीरों की बहाली अधिनियम, 1952 राजस्थान में भूमि सुधारों के कानूनी इतिहास में मील के पत्थर बने। राजस्थान काश्तकारी अधिनियम, 1955 लागू हुआ। उन्होंने किसानों के पक्ष में पेड़ों की कटाई के नियमों में भी संशोधन किया। अपनी जमीन से पेड काटने हेतु किसान को अपने स्वयं के उपयोग के लिए अपनी स्वामित्व वाली भूमि से पेड़ काटने की अनुमति देने के लिए नियमों में सरकार ने संशोधन किया। 

राजस्थान में पहली सरकार1949 में श्री हीरालाल शास्त्री के नेतृत्व में गठित हुई। 1951 में जयनारायण व्यास के नेतृत्व में नई सरकार बनी। इसमें चौधरी कुंभाराम आर्य को गृह मंत्री बनाया गया था। बाद में 1954 में मोहनलाल सुखाडिया सरकार में और 1964 में भी वे दो बार स्वास्थ्य मंत्री रहे। उन्होंने पंचायत राज संघ का गठन किया, जिसके वे 1957-1958 तक अध्यक्ष रहे। वे राजस्थान में पंचायत राज के संस्थापक सदस्य हैं। राजस्थान के पंचायत राज के नियम देश में आदर्श माने जाते हैं। वे 1960-1964 तक राज्य सभा के सदस्य रहे। 1966 में उन्होंने कांग्रेस सरकार से इस्तीफा दे दिया और एक नई राजनीतिक पार्टी "जनता पार्टी" बनाई। 1968 में वे राज्यसभा के लिए चुने गए और 1968-74 तक राज्यसभा के सदस्य रहे। वह लोकदल पार्टी से सीकर (1980-84) से चुने गए संसद सदस्य थे।

चौधरी कुंभाराम आर्य ने 1974 में किसानों के हित में किसान यूनियन का गठन किया। उनका मानना ​​था कि ग्रामीण विकास की सफलता की कुंजी पंचायती राज और सहकारिता आंदोलन में है। वे राजस्थान में सहकारिता आन्दोलन के संस्थापक थे। वह राजस्थान एपेक्स सहकारी बैंक के अध्यक्ष थे। वह राजस्थान मार्केटिंग फेडरेशन "राजफेड" के अध्यक्ष थे। वे राजस्थान सहकारी संघ के अध्यक्ष थे। राजस्थान में सहकारिता आन्दोलन में उनकी भूमिका अद्वितीय थी।

1 अखिल भारतीय देसी लोक परिषद पार्टी

 2 राष्ट्रीय कांग्रेस, 

3 जनता पार्टी 1967

4 भारतीय क्रांतिदल, 

5 भारतीय लोकदल और

6 जनता पार्टी

7 जनता दल एस (1980) सांसद सीकर से

विभिन्न पार्टियों से लगभग 50 वर्षों तक सेवा की।

पद :-

 1 मंत्री बीकानेर राज्य, 1948, 

2 मंत्री राजस्थान सरकार स्वास्थ्य, पुलिस, खनिज और उद्योग 

3 मंत्री 1951, स्वास्थ्य और स्थानीय स्वशासन 

4 मंत्री 1954-55 और राजस्व मंत्री, 

5 1964-67 राजस्थान सरकार,

6 संस्थापक राजस्थान पंचायत राज संघ 1957-58

 7 उपाध्यक्ष अखिल भारतीय पंचायत परिषद l957-58, 

8 सदस्य, (i) राजस्थान विधानसभा, 1952-57, 1964-66, (ii) राज्यसभा, 1960-64 और फिर, 1969-74

 9 सन 1966 में उन्होंने कांग्रेस सरकार से इस्तीफा दे दिया और एक नई राजनीतिक पार्टी जनता पार्टी बनाई। 1968 में वे राज्यसभा के लिए चुने गए और 1968-74 तक राज्यसभा के सदस्य रहे। वह लोकदल पार्टी से सीकर (1980-84) से संसद सदस्य रहे।

10 आर्य ने 1974 में किसानों के हित में किसान यूनियन का गठन किया और राजस्थान में सहकारिता आन्दोलन के संस्थापक थे। राजस्थान एपेक्स सहकारी बैंक के अध्यक्ष बने। वह राजस्थान मार्केटिंग फेडरेशन "राजफेड" के अध्यक्ष बने। राजस्थान सहकारी संघ के अध्यक्ष बने। राजस्थान में सहकारिता आन्दोलन में उनकी भूमिका अद्वितीय रही।

आर्य समाज विचारक

चौधरी कुंभाराम आर्य एक महान समाज सुधारक और क्रांतिकारी विचारक थे। उनकी विचारधारा परंपराओं पर आधारित नहीं थी। और आर्य समाज के प्रबल समर्थक थे । कुंभाराम आर्य जीवन भर समाज से सामाजिक कुरीतियों को दूर करने का प्रयास किया। उन्होंने अस्पृश्यता का डटकर विरोध किया दलित को खाना बनाने हेतु व ड्राइवर राजपूत को नियुक्त किया। इसी राजपूत ड्राइवर के साथ मुस्लिम लड़की को बहन के रूप में अपनाने के बाद शादी कर दी।

लेखन :-

1 किसान यूनियन क्यों

2 वर्ग चेतना

3 हिंदी पत्रिका किसान (1978)

दो पुस्तकें लिखीं। 

शिक्षा के क्षेत्र में कार्य :-

उन्होंने बीकानेर क्षेत्र में लड़कियों के लिए कई स्कूल और छात्रावास शुरू किए। 

विदेश यात्रा: जर्मनी, रूस और ब्रिटेन

प्रज परिषद का प्रचार प्रसार और जेल यात्रा 

प्रजापरिषद का प्रचार प्रसार करने के एवज में आर्य को सरकार ने जेल में डाल दिया। कुछ समय बाद जेल से मुक्त होने पर उनके हाथों में परिषद की कमान आ गई।सरकार से दो-दो हाथ करने का मन बना लिया। आपने गांव-गांव ढाणी-ढाणी जाकर अलख जगाने का बीड़ा उठाया। अलख जन के लिए सर्वप्रथम नोहर तहसील के तलाना गांव में बुला लिया गया। सैकड़ों किसान इस फॉर्म में आए। कुंभाराम का साथ देने की सौगंध बे। तत्पश्चात लोहा चूरू में सभा की। लोहा गांव में सामंतों के डर से कुछ लोग मिलाएँ। सभा मंच से सामंतवाद के खिलाफ क्रांतिकारी गाने गाए।

देश बहिष्कार (देश निकाला)

कुंभाराम आर्य को बीकानेर स्टेट ने राजद्रोह के आरोपों में गिरफ्तार कर नजरबंद कर दिया, फिर देश बहिष्कार दे दिया। इस दौरान कुंभाराम आर्य लुहारू हरियाणा के आर्य मंदिर में रहें। बीकानेर नरेश के आग्रह पर लुहारु नवाब ने आर्य को गिरफ्तार कर लिया पर जनता के दबाव से रिहा करना पड़ा।आर्य मंदिर से ही किसान आंदोलन को गति प्रदान की। आर्य अपना मजबूत संघ बनाने में सफल रहे। समय-समय पर जाट बोर्डिंग झुंझुनूं में आने वाले किसानों के लिए अभियोग की कमी और सामंत शाही के खिलाफ पुर जोर तरीके से आह्वान करते रहे।शेखावाटी के किसानों के समूहों में भी आर्य के प्रति गहरी श्रद्धा थी। बीकानेर स्टेट के प्रशासन की निगाहों में धूल झोंककर वह चोरी-छुपे बीकानेर का का दौरा कर जनता को क्रांति के लिए जागृत करते रहे।

संपत्ति कुर्क : 

महाराजा सार्दुल सिंह ने आदेश दिया कि कुंभाराम की पूरी संपत्ति कुर्क कर ली जावे। सरकारी आदेश के अनुसार फेफाना गांव में कुंभाराम की संपत्ति एक झोंपड़ी,एक गाय और कुछ समान कुर्क कर ली गई।

दुधवाखारा चूरू और कांगड़ रतनगढ़ कालरी राजगढ़ किसान आंदोलन : 

दुधवखारा में किसान नेता हनुमान सिंह बुडानिया के नेतृत्व में आंदोलन शुरू किया गया।मार्च और अप्रैल 1946 में राजशाही के जुल्म में बढ़ोतरी हुई। जगह-जगह किसानों में असंतोष था। को 20 मार्च 1946 को हनुमानसिंह बुडानिया को गिरफ्तार कर अज्ञात स्थान पर ले जा कर उनकी खूब पिटाई की गई। गांव के मुखिया गोरधनराम को रस्सी से बांधकर ऊंट के साथ गर्मी में दौड़ाया गया। जिससे वह बेहोश होकर गिर पड़ा। 

 कांगड़ में आंदोलन को दबाने के लिए जागीरदार गोप सिंह ने बीकानेर से सेना बुला ली। खूब जुल्म के बावजूद क्रांतिकारियों का पता नहीं बताया। कांगड़ जाने वाले स्वतन्त्रता सेनानियों में गंगादत्त रंगा, स्वामी सच्चिदानंद, हंसराज आर्य, मास्टर दीप चंद, केदारनाथ, मौजीराम और रूपराम आदि जागीरदार से वार्ता करने हेतु कांगड़ आए। गांव वालों की दारुण गाथा सुनकर क्रांतिकारी रो पड़े। सामंत के ने सिपाहियों ने इन क्रांतिकारियों को भी पकड़ लिया उन्हें पीटा गया। 

सामंतों के इन जुल्मों के खिलाफ गांव की कालरी राजगढ़ में विरोध उत्पन्न हो गया। कालरी के क्रांतिकारी स्वामी कर्मानंद आर्य को घेर कर गिरफ्तार कर लिया गया। स्वामी कर्मानंद ने गिरफ्तारी के खिलाफ जेल में भूख हड़ताल शुरू कर दी।

चौधरी कुंभाराम की गिरफ्तारी और स्वामी कर्मानंद की जेल में भूख हड़ताल को सुनकर गांव-गांव में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए।। 9 मई 1946 को बीकानेर शहर में एक बड़ा आंदोलन हुआ जिसमें पुलिस ने लाठीचार्ज किया और लोगों को गिरफ्तार भी किया। इस पर 10 मई 1946 को  में किसानों ने एक बड़ा आंदोलन शुरू कर दिया। पुलिस ने फिर जमकर लाठीचार्ज किया जिसमें करीब 25 प्रदर्शनकारी गंभीर रूप से घायल हो गए। इसी समय 15 मई 1946 को हमीरवास राजगढ़ में किसानों पर लाठीचार्ज हुआ। इसी समय फेफाना में भी आंदोलन किया गया जिसमें खास तौर से महिलाओं ने तिरंगे झंडे लेकर राष्ट्रीय नारे लगाए। इसके बाद जागीरदारों के खिलाफ जगह जगह सभा होने लगी। चूरू,रतनगढ़ भादरा ,नोहर , गंगानगर, बांय, सांखू करनपुर ,पदमपुर और रायसिंहनगर में आंदोलन भड़के।बीकानेर रियासत का पुलिस विभाग किसान आंदोलन को कुचलने में लग गया, इसी दौरान 1 जुलाई 1946  ई. को रायसिंहनगर में बीकानेर प्रजा परिषद के राजनीतिक सम्मेलन में पुलिस की गोली से तिरंगे झंडे की रक्षा करते हुए बीरबलसिंह शहीद हो गए। इस बलिदान ने आग में घी का काम किया। प्रजा परिषद की ओर से 6 जुलाई 1946 को राज्य में किसान दिवस मनाया गया जहां जगह-जगह सभाओं के आयोजन हुए। जाटों के विरोध को देखते हुए बीकानेर महाराजा सादुल सिंह ने किसी जाट नेता को अपने साथ रखने की चाल चली और प्रजा परिषद से अलग कर प्रजा परिषद को कमजोर करना चाहा। इस कार्य के लिए उन्हें प्रजा काउंसिल नेता एडवोकेट ख्यालीसिंह गोदारा उपयुक्त व्यक्ति मिल गए। ख्यालीराम गोदारा ने महाराजा बीकानेर को आश्वस्त किया कि वह जाट हाउस में रहने वाले जाटों को प्रजा परिषद से अलग कर देंगे। इस पर महाराजा ने एक नीति के तहत सर्वप्रथम 27 जुलाई 1946 चौधरी कुंभाराम सहित 7 राजबंदियों रघुवरदयाल , हनुमान सिंह , गणपत सिंह , वैद्य मगाराम, किशनगोपाल व रामनारायण को रिहा कर दिया। तथा 1 अगस्त 1946 को चौधरी ख्याली राम गोदारा को ग्राम सुधार मंत्री नियुक्त कर आंदोलन को कमजोर करने का प्रयास किया परंतु उपायों का आंदोलन पर कोई असर नहीं हुआ। 9 अगस्त 1946 को प्रजा परिषद की एक बैठक गंगानगर में हुई जिसमें रायसिंहनगर में शहीद बीरबल सिंह की पत्नी ने झंडारोहण किया। इस में चौधरी ख्याली सिंह गोदारा मंत्री की हैसियत से आए जिन्हे काले झंडे दिखाये गए। इसके बाद 3 सितंबर 1946 को गोगामेड़ी में आयोजित प्रजा-परिषद की विशाल सभा में जहां चौधरी कुंभाराम ने जागीरदारों के अत्याचारों की भारी आलोचना की वहां रामचंद्र जैन ने जागीरदारी प्रथा समाप्त करने की मांग की।  इस सभा में चौधरी हरदत्त सिंह तत्कालीन मुंसिफ मजिस्ट्रेट हनुमानगढ़ भी शामिल हुए और अपने पद से इस्तीफा दे कर प्रजा परिषद में शामिल हो गए। चौधरी कुंभाराम आर्य, हरदत्त सिंह , हनुमानसिंह , स्वामी कर्मानन्द आर्य आदि नेता नहरी क्षेत्र में विभिन्न स्थानों पर सभाएं आयोजित कर किसानों को संगठित किया। इस पर बीकानेर सरकार ने 2 अक्टूबर 1946 को चौधरी कुंभाराम सहित हरदत्त सिंह, गुरुदयाल सिंह , मोहर सिंह, जीवनदत्त , नाथूराम आदि जाट नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। इस पर चारों ओर किसानों में फिर से असंतोष फैल गया। इसी बीच 1 नवंबर 1946 को भयंकर कांगड़ कांड हुआ जिसमें कांगड़ गांव के जागीरदार गोपसिंह ने प्रजा परिषद के सात नेताओं स्वामी सच्चिदानंद, केदारनाथ, हंसराज आर्य , मास्टर दीपचंद, चौधरी मौजीराम , गंगादत्त रंगा, तथा चौधरी रूपाराम को गिरफ्तार कर पिटाई की ओर गंभीर घायल कर दिया।इस घटना से पूरे राज्य में भारी असंतोष पैदा हुआ। बीकानेर सरकार को स्थिति बिगड़ती देख कर बड़े शहरों को छोड़कर रियासत भर में 3 माह के लिए धारा 144 लगानी पड़ी और उसे लंबे समय तक 3-3 माह के बाद बढ़ानी पड़ी। सन 1947 बीकानेर राज्य प्रजा परिषद के अध्यक्ष पद पर किसान नेता स्वामी कर्मानंद आर्य के निर्वाचन से जुड़े किसान नेताओं ने जागीरी जुल्म के विरोध में जागीरदारी प्रथा को ही समाप्त करने का नारा लगाया। इसके किसान व्यापक रूप से प्रभावित हुए और वे जागीदार उनके विरुद्ध अधिक सक्रिय हो गए। उर जागीदार वर्ग भी किसानों का अधिक दमन करने लगा। चौधरी कुंभाराम और अन्य जाट नेताओं के सतत प्रयास, व्यापक जनसंपर्क, कुशल नेतृत्व और अदम्य साहस का ही फल था कि 1947 तक बीकानेर में किसानों का संगठन इतना शक्तिशाली हो गया था कि कुछ जगहों पर वे जागीरदारों को न केवल लगान देना बंद कर दिया। इस प्रकार सदियों से पीड़ित और प्रताड़ित किसानों को बहुत पहली बार में गहरी नींद से उठकर कर संगठित हो कर जागीरदारों के शोषण और उत्पीड़न के खिलाफ एकता का परिचय दिया। अंततोगत्वा बीकानेर महाराजा सादुल सिंह को किसान शक्ति के सामने झुकना पड़ा। चौधरी कुंभाराम आर्य को जेल से मुक्त कर समझौता करना पड़ा। 18 मार्च 1948 को एक समझौते के तहत बीकानेर महाराजा ने 10 सदस्यों का एक प्रबंध मंत्रिमंडल बनाया जिसमें चौधरी हरदत्त सिंह को उप प्रधान मंत्री व गृहमंत्री और चौधरी कुंभाराम को राजस्व मंत्री नियुक्त किया गया।  उस समय उनकी आयु लगभग 34 वर्ष की

स्वतंत्रता आंदोलन में भाग :-

पुलिस विभाग में सेवा के दौरान वे लोकतांत्रिक सोच के दो राजनेताओं मुक्ता प्रसाद वकील और रघुवर दयाल गोयल के संपर्क में आए। गांधीजी द्वारा द्वारा शुरू किए गए स्वतंत्रता आंदोलन का समर्थन करने के लिए पुलिस सेवा से इस्तीफा दे दिया । वे राजनीति में सक्रिय हो गए और राजनीतिक आंदोलनों में भाग लेने लगे। उन्होंने 1945 में अखिल भारतीय देशी राज्य परिषद अधिवेशन में भाग सानों के लिए सुधारवादी कदम उठाए। रियासत के किसानों को एक किया । उन्हें बीकानेर के शासक ने 1 मई 1946 को संगरिया हनुमानगढ़ से उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और 27 जुलाई 1946 तक कैद में रखा।

कुंभाराम जी के साथी एवं संबंध :-

रावतराम आर्य(भारत के प्रथम मेघवाल जिला प्रमुख), दौलतराम सारण, पत्रकार महावीर पुरोहित, स्वतंत्रता सेनानी हीरालाल शर्मा, दैनिक समाचार पत्र राष्ट्रदूत के संस्थापक एवं संपादक स्व. पंडित हजारीलालरा, ष्ट्रीय राजनीति में जाने के कारण आर्य से ऐसे कई नेताओं के रिश्ते बने हुए भैरोंसिंह शेखावत, ज्ञानी जैलसिंह, प्रतापसिंह केरो ,चौधरी देवीलाल,हेमवती नंदन बहुगुणा, गुलजारी नंदा, चौधरी चरण सिंह, मोरारजी देसाई , चंद्रशेखर, लाल बहादुर शास्त्री, जवाहरलाल नेहरू,इंदिरा गांधी, कर्पूरी ठाकुर, अजय मुखर्जी, महामाया प्रसाद सिंह, मधुर लिमए, जॉर्ज फर्नांडीस, रवि राय आदि प्रमुख थे। आर्य हमेशा ही राज्य में किसान हित एवं देश हित के मुद्दे आए थे।

एक संस्मरण :  

स्व.भैरोंसिंहावत के शासन काल में एक बार चौधरी कुम्भाराम आर्य किसी बात को लेकर एक दिन सुबह सुबह उनके आवास के सामने भूख हड़ताल पर बैठे थे। दोपहर एक बजे खाने का समय होते ही रतन कँवर घर से निकलकर धरना स्थल पर आई और भूख हड़ताल पर बैठे चौधरी कुम्भाराम जी के चरण स्पर्श कर भोजन करने हेतु कहा। बाबा भोजन तैयार है, घर के अंदर खाना बना है। चौधरी कुम्भाराम ने आशीर्वाद देते हुए कहा- बाईसा,मैं भूख हड़ताल पर बैठा हूँ सो अन्न जल कैसे ग्रहण कर सकता हूँ ? पर रतन कंवर ने हठ करते हुए कहा - बाबा, जब तक आप खाना नहीं खाएंगे तब तक घर का हर सदस्य भूखा रहेगा। आप घर के आगे भूखे बैठे हैं तो हम भोजन कैसे कर सकते हैं? रतन कंवर बाईसा द्वारा भोजन के लिए आग्रह किया गया और उनका संस्कार देखकर चौधरी कुम्भाराम जी गहरी सोच में पड़ गए। एक तरफ उनकी भूख हड़ताल का फैसला और दूसरी और बाईसा रतन कंवर द्वारा स्नेह नजर आने लगा। कुछ देर सोच कर नेता चौधरी कुम्भाराम उठकर रतन कंवर बाईसा के पीछे भूख हड़ताल छोड़कर भोजन करने चल पड़े।

     चौधरी चरण सिंह जी के साथ कुंभाराम आर्य

एक महान व्यक्तित्व को सलाम अंत में मेरा मानना है कि इस हस्ती को एक जाति या समाज विशेष के बंधन में बंधना अन्याय होगा। कुंभाराम जी सर्व समाज के नेता थे, हैं और रहेंगे।

शमशेर भालू खान गांधी

जिगर चुरुवी

9587243963

Thursday, 4 May 2023

ज्योतिबा फुले - सावित्री बाई फुले

ज्योतिबा फुले एवं सावित्री बाई फुले जीवन परिचय एवं इतिहास 
                         महात्मा ज्योतिबा फुले
              11अप्रैल 1827 से 19 नवंबर 1890


सन 1870, सावित्री बाई फूले और फ़ातिमा शेख़ 
मिलकर महाराष्ट्र के इलाक़े में लड़कियों का पहला स्कूल खोला था और इसका बहुत सकारात्मक असर इस इलाक़े में दिखा था बड़ी संख्या में लड़कियाँ पढ़ने स्कूल जाने लगीं ।

"ज्योतिबा फुले असली महात्मा थे।"
महात्मा गांधी
25 नवम्बर 1949 में दीनबन्धु समाचार पत्र के महात्मा फुले विशेषांक में प्रकाशित हुए थे।

                          ज्योतिबा फुले 

महात्मा जोतिराव गोविंदराव फुले भारतीय समाज सुधारक, समाज प्रबोधक, विचारक, समाजसेवी, लेखक, दार्शनिक तथा क्रान्तिकारी कार्यकर्ता थे।
इन्हें महात्मा फुले या जोतिबा फुले के नाम से भी जाना जाता है। 
सितम्बर 1873 में इन्होने महाराष्ट्र में सत्य शोधक समाज नामक संस्था का गठन किया।
महाराष्ट्र में सर्वप्रथम अछूतोद्धार और महिला शिक्षा का काम आरंभ किया।
समाज के सभी वर्गो को शिक्षा प्रदान करने के ये प्रबल समथर्क थे। वे भारतीय समाज में प्रचलित जाति पर आधारित विभाजन और भेदभाव के विरुद्ध थे।


महात्मा जोतिराव गोविंदराव फुले

पूरा नाम - ज्योतिराव गोविंदराव फुले
अन्य नाम - महात्मा फुले 
जन्म - 11 अप्रॅल, 1827
जन्म स्थान - खानवाडी पुणे, महाराष्ट्र
मृत्यु - 28 नवम्बर, 1890 पुणे महाराष्ट्र
(वृहस्पतिवार 27 नवम्बर 1890 को महात्मा ज्योतिबा जी का गिरा हुआ स्वास्थ्य उनके महाप्रयाण का संकेत देने लगा। ज्योतिबा फुले जी ने लगभग शाम 5 बजे अपने परिवार के लोगों को अपनी चारपाई के पास बुलाया। महातम ज्योतिबा फुले जी ने सभी को स्वार्थहीन तथा सात्विक ढंग से अपने कर्तव्यों के पालन का उपदेश दिया। रात्रि 2 बजाकर 20 मिनिट पर अंतिम विदा ली।
पिता- गोविंदराव 
माता - विमला बाई (ज्योतिबा के जन्म के एक वर्ष बाद 1828 में देहांत हो गया इस कारण लालन पालन एक बाई सगुन बाई ने किया इनका परिवार सतारा में फूलों का काम (माली) करता था इस कारण ज्योतिबा को फूले उपनाम मिला) 
              ज्योतिबा फुले और सावित्री बाई फुले

पत्नी - सावित्री बाई फुले 
(विवाह के समय ज्योतिबा की आयु 13 वर्ष सावित्री बाई की आयु 9 वर्ष)
संतान - यशवंत फुले
कर्म भूमि - महाराष्ट्र 
भाषा - मराठी
संस्था - सत्य शोधक समाज
विशेष - फुले ने ब्राह्मण-पुरोहित के बिना ही विवाह-संस्कार आरंभ कराया जिसे मुंबई हाईकोर्ट से मान्यता मिली।
विवाह - 1840 में सावित्री बाई से हुआ था।
कुल आयु 63 वर्ष 7 माह 17 दिन
व्यवसाय - एक अंग्रेजी मिशनरी स्कूल में अध्यापन का कार्य किया।
रुचि - पढ़ना -पढ़ाना
प्रशंसक - लोकमान्य बालगंगाधर तिलक के
शिष्य - भीमराव अम्बेडकर, सावित्रि बाई फुले और फातिमा शेख

                   ज्योतिबा फुले का स्मारक

उपाधियां - 
1 ब्रिटिश सरकार द्वारा 1883 में स्त्रियों को शिक्षा प्रदान कराने के महान कार्य के लिए उन्हें तत्कालीन ब्रिटिश सरकार द्वारा "स्त्री शिक्षण के आद्यजनक"  की उपाधि प्रदान की।
2 1888 में मुंबई में एक सभा में महात्मा की उपाधि प्रदान की।

शिक्षा 
मराठी माध्यम से पढ़ाई शुरू की पर अध्ययन कार्य बीच में ही छोड़ दी। बाद में 21 वर्ष की उम्र में अंग्रेजी माध्यम से 7 वीं कक्षा उत्तीर्ण की।

लेखन -
अपने जीवन काल में उन्होंने कई पुस्तकें लिखीं-
1 गुलामगिरी  सन 1873
(इस पुस्तक गुलामगिरी का प्रकाशन भी हुआ। सत्य शोधक समाज की स्थापना और इस पुस्तक का प्रकाशन दोनों ही घटनाओं ने लोगों को बहुत प्रभावित किया। इस पुस्तक में पुस्तक बहुत कम पृष्ठ है परंतु इसमें बताये गये विचारों के आधार पर पश्चिमी और दक्षिणी भारत में बहुत सारे आंदोलन चले। उत्तर प्रदेश में चल रही दलित अस्मिता की लड़ाई के बहुत सारे सूत्र गुलामगिरी में ढूंढ़े जा सकते हैं।)
2 तृतीय रत्न
3 छत्रपति शिवाजी
4 राजा भोसला का पखड़ा
5 किसान का कोड़ा
6 अछूतों की कैफियत
7 सीक्रेट राइटिंग्स ऑफ ज्योतिराव फुले
8 Slavery 

कार्य -
मूल उद्देश्य 
1 स्त्रियों को शिक्षा का अधिकार प्रदान करना, 
2 बाल विवाह का विरोध, 
3 विधवा विवाह का समर्थन 
4 कुप्रथा, अंधश्रद्धा मुक्त समाज की स्थापना
 करना चाहते थे।
5 जनता को अधिकारों के प्रति जागरूक करना
 6 स्त्री-पुरुष भेदभाव मिटाना
7 महात्मा ज्योतिबा व उनके संगठन के संघर्ष के कारण सरकार ने ‘एग्रीकल्चर एक्ट’ पास किया।
8 बिना ब्राह्मण के विवाह (मुंबई हाई कोर्ट से मान्यता)
9 अनपढ़ महिला साक्षरता की कक्षाएं  (रात्रि स्कूल) की शुरूआत।
10 पति के गुजर जाने पर विधवा हुई महिलाओं का मुंडन कर दिया जाता था। इस अपमानजनक प्रथा के खिलाफ उन्होंने नाईयों को प्रेरित किया। एक ऐसे आश्रम की स्थापना की, जिसमें सभी जातियों की तिरस्कृत विधवाएं सम्मान के साथ रह सकें। उन नवजात शिशु कन्याओं के लिए भी एक घर बनाया, जो अवैध संबंधों से पैदा हुई थीं और जिनका सड़क या घूरे पर फेंक दिया जाना निश्चित था।

कार्य क्षेत्र :-
बा ने बालिकाओं के लिए भारत देश की पहली पाठशाला पुणे में 1848 में शुरू की। उन्होंने अपनी धर्मपत्नी सावित्री बाई फुले को स्वयं शिक्षा प्रदान कर उन्हें भारत की प्रथम महिला शिक्षिका बनाया। इस कार्य में उनको बहुत विरोध का सामना करना पड़ा।
पिता पर दबाब डालकर पति-पत्नी को घर से निकालवा दिया इससे कुछ समय के लिए उनका काम रुका अवश्य, पर 1854 में एक के बाद एक बालिकाओं के तीन स्कूल खोल दिए। उन्होंने कुल 18 स्कूल शुरू किए।

अछूतोद्धार के कारण जाति से बहिष्कृत :-
अछूतोद्धार के लिए ज्योतिबा ने अछूत बच्चों को अपने घर पर पाला और अपने घर की पानी की टंकी उनके लिए खोल दी। परिणामस्वरूप उन्हें जाति से बहिष्कृत कर दिया गया। कुछ समय तक एक मिशन स्कूल में अध्यापक का काम मिलने से ज्योतिबा का परिचय पश्चिम के विचारों से भी हुआ, पर ईसाई धर्म ने उन्हें कभी आकृष्ट नहीं किया। 
सन 1853 में पति-पत्नी ने अपने मकान में प्रौढ़ों के लिए रात्रि पाठशाला खोली। इन सब कामों से उनकी बढ़ती ख्याति देखकर प्रतिक्रियावादियों ने एक बार दो हत्यारों को उन्हें मारने के लिए तैयार किया था, पर वे ज्योतिबा की समाज सेवा की भावना से उनके शिष्य बन गए।
पिछड़े लोगो के लिए काम करते हुए उन्होंने ही उनके लिए दलित शब्द का प्रयोग किया।
फुले दंपति घर से निकाले जाने के बाद उस्मान शेख और फातिमा शेख भाई बहन के घर में रहे और यहीं से 1848 में प्रथम स्कूल शुरू किया।

फुले ऐसे समाजशास्त्री और मानवतावादी थे जिन्होंने ऐसे साहसिक विचार प्रस्तुत किए। फुले ऐसी सामाजिक व्यवस्था के आमूलचूल परिवर्तन के पक्षधर थे, जिसमें शोषण करने के लिए कुछ लोगों को जानबूझकर दूसरों पर निर्भर, अनपढ़, अज्ञानी और गरीब बना दिया जाता है। उनके अनुसार व्यापक सामाजिक -आर्थिyक परिवर्तन के लिए अंधविश्वास उन्मूलन एक हिस्सा है। परामर्श, शिक्षा और रहने के वैकल्पिक तरीकों के साथ-साथ शोषण के आर्थिक ढांचे को समाप्त करना भी बेहद जरूरी है। 28नवंबर, 1890 को उनका देहांत हो गया तो सावित्रीबाई फुले ने सत्यशोधक समाज की बागडोर संभाली।

सत्य शोधक समाज की स्थापना :-
अध्यक्ष - ज्योतिबा फुले
महिला अध्यक्ष - सावित्री बाई फुले
निर्धन तथा निर्बल वर्ग को न्याय दिलाने के लिए ज्योतिबा ने सत्यशोधक समाज' 1873 मे स्थापना की।
ज्योतिबा ने ब्राह्मण-पुरोहित के बिना ही विवाह-संस्कार आरम्भ कराया और इसे मुंबई उच्च न्यायालय से भी मान्यता मिली। वे बाल-विवाह विरोधी और विधवा-विवाह के समर्थक थे। ज्योतिबा की मृत्यु के बाद सावित्रीबाई ने संस्था का भार संभाला।

कुछ रोचक तथ्य:-
1 दलितों के लिए लड़ने की प्रेरणा :-
ज्योतिबा फुले को दलितों के लिए काम करने की प्रेरणा उनके एक ब्रह्मण दोस्त की शादी में 1948 में मिली। 
वहां पर उन्हें हिंदू धर्म के अनुसार सबसे निचले वर्ण शुद्र में होने के कारण उनका अपमान किया गया जिसके बाद उन्होंने दलितों के लिए काम करने की ठानी और इस सामाजिक बुराई और भेदभाव को दूर करने का निर्णय लिया। 
2  विधवाओं के लिए आश्रम के साथ नवजात शिशुओं के लिए आश्रम और कन्या भ्रूण हत्या पर रोक के प्रयास।
3 जिस प्रकार बाल काटना नाई का धर्म नहीं, धंधा है। चमड़े की सिलाई करना मोची का धर्म नहीं, धंधा है। उसी प्रकार पूजा-पाठ करना ब्राह्मण का धर्म नहीं धंधा है।

आध्यात्मिक विचार :- 
मूर्ति पूजा का विरोध किया और जाति व्यवस्था की निंदा की। सत्य शोधक समाज ने तर्कसंगत सोच पर बल देते हुए शैक्षिक और धार्मिक नेताओं के रूप में ब्राह्मणों एवं पुरोहितों की जरूरत को खारिज कर दिया। उनका दृढ़ विश्वास था कि अगर आप स्वतंत्रता, समानता, भाईचारे, मानवीय गरिमा, आर्थिक न्याय जैसे मूल्यों पर आधारित नई सामाजिक व्यवस्था की स्थापना करना चाहते हैं तो सड़ी-गली, पुरानी, असमान व शोषणकारी सामाजिक व्यवस्था और मूल्यों को उखाड़ फेंकना होगा।
यह अच्छी तरह से जानने के बाद उन्होंने धार्मिक पुस्तकों और भगवान के नाम पर परोसे जाने वाले अंधविश्वास पर हमला किया। उन्होंने महिलाओं और शूद्रों के मन में बैठी मिथ्या धारणाओं को समाप्त करने का प्रयास किया। 
फुले ने महिलाओं, शूद्रों व समाज के अगड़े तबकों में अंधविश्वास को जन्म देने वाली आर्थिक और सामाजिक बाधाओं को हटाने के लिए अभियान चलाए।
फुले ऐसे समाजशास्त्री और मानवतावादी थे जिन्होंने ऐसे साहसिक विचार प्रस्तुत किए। फुले ऐसी सामाजिक व्यवस्था के आमूलचूल परिवर्तन के पक्षधर थे, जिसमें शोषण करने के लिए कुछ लोगों को जानबूझकर दूसरों पर निर्भर, अनपढ़, अज्ञानी और गरीब बना दिया जाता है। उनके अनुसार व्यापक सामाजिक -आर्थिyक परिवर्तन के लिए अंधविश्वास उन्मूलन एक हिस्सा है। परामर्श, शिक्षा और रहने के वैकल्पिक तरीकों के साथ-साथ शोषण के आर्थिक ढांचे को समाप्त करना भी बेहद जरूरी है। 28नवंबर, 1890 को उनका देहांत हो गया तो सावित्रीबाई फुले ने सत्यशोधक समाज की बागडोर संभाली।

                        सावित्री बाई फुले 

                सावित्री बाई फुले का स्मारक

जन्म - 3 जनवरी 1831, नायगाँव
मृत्यु - 10 मार्च 1897, पुणे (प्लेग के कारण)
माता- लक्ष्मीबाई
पिता: खन्दोजी नेवसे पाटिल
शिक्षा - अनपढ़ पति ज्योतिबा फुले ने तीसरी कक्षा तक पढ़ाया।
सावित्री बाई का सपना था कि वह पढ़े लिखें, लेकिन उस समय दलितों के साथ काफी भेदभाव किया जाता था। सावित्री बाई ने एक दिन अंग्रेजी की एक किताब हाथ मे ले रखी थी तभी उनके पिता ने देख लिया और किताब को लेकर फेंक दिया। इसके बाद उनके पिता ने कहा कि शिक्षा सिर्फ उच्च जाति के पुरुष ही ग्रहण कर सकते हैं। दलित और महिलाओं को शिक्षा ग्रहण करने की इजजात नहीं है, क्योंकि उनका पढ़ना पाप है। इसके बाद सावित्रीबाई फूले अपनी किताब वापस लेकर आ गईं। उन्होंन प्रण लिया कि वह जरूर शिक्षा ग्रहण करेंगी चाहे कुछ भी हो जाए।
सावित्रीबाई फुले ने सभी बाधाओं के बाद भी पढ़ाई करना शुरू कर दीं। बताया जाता है कि जब वह पढ़ने के लिए स्कूल जाती थीं, तो लोग उन्हें पत्थर से मारते थे। यही नहीं लोग उनके ऊपर कूड़ा और कीचड़ भी फेंकते थे। 
साहित्य - मराठी कवियत्री (आदिकवियत्री के रूप में भी जाना जाता था।)

सामाजिक मुश्किलें -
वे स्कूल जाती थीं, तो ब्राह्मण लोग उनपर पत्थर मारते थे। उन पर गंदगी फेंक देते थे। आज से 191 साल पहले बालिकाओं के लिये स्कूल खोलना पाप माना जाता था।
सावित्रीबाई पूरे देश की महानायिका हैं। सावित्रीबाई कन्याओं को पढ़ाने के लिए जाती तो एक साड़ी अपने थैले में लेकर चलती थीं और स्कूल पहुँच कर गंदी कर दी गई साड़ी बदल लेती।
5 सितंबर 1848 में पुणे में अपने पति के साथ मिलकर विभिन्न जातियों की नौ छात्राओं के साथ महिलाओं के लिए विद्यालय की स्थापना की। 
एक वर्ष में सावित्रीबाई और महात्मा फुले पाँच नये विद्यालय खोलने में सफल हुए। 
तत्कालीन सरकार ने इन्हे सम्मानित किया। एक महिला के लिये सन उस समय बालिका विद्यालय चलाना कितना मुश्किल रहा होगा इसकी कल्पना शायद आज नहीं की जा सकती। सावित्रीबाई फुले उस दौर में न सिर्फ खुद पढ़ीं, बल्कि दूसरी लड़कियों के पढ़ाया भी।
1897 में प्लेग महामारी में एक प्लेग के छूत से प्रभावित बच्चे की सेवा करने के कारण इनको भी छूत लग गया। और इसी कारण से उनकी मृत्यु हुई।
लड़कियों के लिए एक दो नहीं बल्कि 18 स्कूलों का निर्माण कराया। 

                            फातिमा शेख

फ़ातिमा शेख़ :-
फातिमा शेख सामाज सुधारक ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले की सहयोगी थी  शिक्षक थीं।
जन्म - 9 जनवरी 1831पुणे, महाराष्ट्र 
कार्य - बालिका शिक्षा ,सावित्री बाई फुले के साथ
(आधुनिक भारत की पहली मुस्लिम शिक्षिका)
भाई -  उस्मान शेख  (जिनके घर में ज्योतिबा और सावित्रीबाई फुले ने निवास किया था जब फुले के पिता ने उनके परिवार को घर से निकाल दिया।)
 
फ़ातिमा शेख़ ने सावित्रीबाई फुले के साथ मिलकर महिलाओं और उत्पीड़ित जातियों के लोगों को शिक्षा देना शुरू किया। उनके भाई उस्मान शेख ने फुले दम्पत्ती को अपने घर के खाली परिसर में स्कूल चलाने पर सहमति व्यक्त की। 1848 में उस्मान शेख और उसकी बहन फातिमा शेख के घर में एक स्कूल खोला गया था।
फ़ातिमा और सावित्रीबाई फुले ने मिलकर समाज ने शिक्षा के प्रचार प्रसार के लिए काम किया। यह फातिमा शेख थी जिन्होंने हर संभव तरीके से सावित्रीबाई का दृढ़ता से समर्थन किया।
फातिमा शेख ने सावित्रीबाई फुले के साथ उसी स्कूल में पढ़ना शुरू किया। सावित्रीबाई और फातिमा सागुनाबाई के साथ थे।
उनको श्रद्धा सुमन अर्पित करने के लिए राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने 11 अप्रैल के दिन सार्वजनिक अवकाश की घोषणा 10 अप्रैल 2023 के दिन की।


जिगर चुरुवी
शमशेर भालू खान
9587243963

डॉ. भीमराव अंबेडकर जीवन परिचय

भीमराव अंबेडकर की चांदी की प्रतिमा

बाबा साहब भीमराव अंबेडकर 

अंबेडकर रचित 22 प्रतिज्ञाएँ
अम्बेडकर ज्ञान के सागर के रूप में

बाबा साहब का अंतिम चित्र

ओबीसी समाज, धरने में बाबा साहब 

डॉ भीम राव अम्बेडकर एक परिचय :-
पूरा नाम :- भीमराव रामजी सकपाल(भीमा)
विद्यालय में नाम :- भीमराव रामजी अम्बवडेकर (जिसे गुरु कृष्ण केशव ने बाद में सरलीकृत कर भीमराव ने अम्बेडकर कर दिया,परन्तु इस बात पर गुरु केशव ने नाम बदला विद्वानों के मत भिन्न हैं।)
जन्म ;-  14 अप्रैल 1891 (अम्बेडकर जयन्ति)
जन्म स्थान- मध्य प्रदेश राज्य इंदौर के पास महू छावनी  में हुआ था। (वर्तमान में अंबेडकर नगर)
मृत्यु :- 6 दिसम्बर 1956 उम्र  65 वर्ष वर्तमान में डॉ॰ आम्बेडकर राष्ट्रीय स्मारक, नयी दिल्ली
समाधि स्थल :- चैत्य भूमि मुंबई महाराष्ट्र
मूल निवासी :-
1 महाराष्ट्र के रत्नागिरि का अम्बवडे गांव
2 महू मध्यप्रदेश
3 1897 में बम्बई (पिता का स्थानांतरण)
पिता का नाम- रामजी मोलाजी सकपाल था।  पिता का निधन 2 फरवरी 1913 को बम्बई में।
माता का नाम- भीमा बाई  1896 में मृत्यु (14वीं सन्तान अम्बेडकर की आयु 5 वर्ष)
पिता का व्यवसाय- महू छावनी में सेना मैं सूबेदार पुश्तेनी कार्य ।  
दादा का नाम :-  केलूसकर सकपाल (सैनिक)
जाति- कबीर पंथी महार शुद्र वर्ण (सकपाल उप जाति) कोंकणी मराठा मूल
नीजि सहायक का नाम - नानक चंद रत्तु
पालतू कुत्ते का नाम - टोबी

विवाह :-
 1 बाल विवाह रमाबाई आम्बेडकर 9 साल की आयु (भीमराव की आयु 15 साल पांचवी कक्षा में अध्ययनरत) में विवाह 1906  जिनका 1935 में लंबी बिमारी से निधन हो गया। रमाबाई ने अंबेडकर की शिक्षा के लिये कठोर तपस्या की।
2 रमाबाई की मृत्यु के 13 साल बाद डॉ॰ सविता आम्बेडकर से विवाह 1948 में जिनका वर्ष 2003 में निधन हुआ।
15 अप्रेल 1948 में दूसरी पत्नी के रूप में सविता आम्बेडकर (डॉ. शारदा कबीर) के साथ घर पर विवाह किया।
पत्नी की मृत्यु के बाद नींद की कमी,पैरों में दर्द व सूजन (न्यूरोपैथिक) व सुगर रोग का पहले होमियोपैथी इलाज़ ले रहे थे पर आराम नहीं मिलने पर उपचार के लिए बॉम्बे (मुम्बई) की डॉक्टर शारदा कबीर से मिले।
 डॉ. सविता आम्बेडकर (माई साहेब) का 93 साल की उम्र में 29 मई 2003 को नई दिल्ली के निधन हुआ।

सन्तान:-
पत्नी रमाबाई से कुल पाँच सन्तान 4 बेटे एक बेटी चार की मृत्यु बचपन में ही हो गई।
1 यशवंत
2 रमेश
3 गंगाधर
4 राजरत्न
5 इन्दु  

यशवंत अम्बेडकर की सन्तान
1 प्रकाश
2 रमाबाई
3 आनंदराज
4 भीमराव 
यह चारों यशवंत आम्बेडकर की संताने हैं। यशवंत अम्बेडकर के पुत्र व डॉ. आम्बेडकर के पौत्र, प्रकाश आम्बेडकर, भारिपा बहुजन महासंघ का नेतृत्व करते हैऔर भारतीय संसद के दोनों सदनों मे के सदस्य रह चुके है। परिवार मुंबई में निवास करता है।

मृत्यु:-
मधुमेह, अल्पदृष्टि, जोड़ों के दर्द व अन्य बीमारियों के कारण 64 वर्ष 7 माह की आयु पूर्ण कर डॉ.आम्बेडकर 6 दिसम्बर 1956 को नई दिल्ली में इस दुनिया को अलविदा कह गये। वहाँ से पार्थिव देह को मुंबई लाया गया और शाम के 6 बजे दादर चौपाटी श्मशान भूमि (अब चैत्यभूमि) में बौद्ध शैली से अंतिम संस्कार किया गया। उनका एक स्मारक आम्बेडकर के दिल्ली स्थित घर 26 अलीपुर रोड में स्थापित किया गया है। आम्बेडकर जयंती पर सार्वजनिक अवकाश रखा जाता है।

अंबेडकर उत्सव व जयंती 
1 14 अप्रैल महापरिनिर्वाण यानी पुण्यतिथि 
2 6 दिसम्बर और धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस 
14 अक्टूबर) को चैत्यभूमि (मुंबई), दीक्षाभूमि (नागपूर) तथा भीम जन्मभूमि (महू) में उन्हें अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए इकट्ठे होते हैं।

शिक्षा दीक्षा :- 
नवम्बर 7, 1900 (7 नवम्बर महाराष्ट्र में विद्यार्थी दिवस) में प्रथम कक्षा में प्रवेश क्रमांक 1914 पर गवर्नमेंट हाई स्कूल सतारा(प्रताप राय हाई स्कूल) के अंग्रेजी विद्यालय में हुआ।
उसे कक्षा के बाहर बैठाया जाता ऊपर से पानी पिलाया जाता था।
 आगे चलकर एल्फिंस्टोन रोड पर स्थित गवर्न्मेंट हाईस्कूल में आगे कि शिक्षा प्राप्त की जहाँ से 1907 में मेट्रिक पास की। 
बम्बई विश्विद्यालय में प्रवेश लेने वाले प्रथम दलित बने 1912 में स्नातक विषय राजनीति विज्ञान,समाजशास्त्र,दर्शनशास्त्र व इकोनॉमिक्स से स्नातक किया।
 महाराज गायकवाड़ से 11.5 डॉलर प्रति माह स्कॉलरशिप प्राप्त कर  1913 में कोलम्बिया विश्विद्यालय न्यूयॉर्क में उच्च अध्ययन हेतु गये जहां साथी नवीन भटेला के साथ रहे। वहां एम ए के बाद एंशियंट इंडियन्स कॉमर्स (प्राचीन भारतीय वाणिज्य विज्ञान) विषय पर शोध कार्य किया।
अमेरिका से बाद में 11 नबम्बर 1917 को बैरिस्टर की उपाधि हेतु लन्दन गये।
1 स्नातक मुंबई विश्वविद्यालय
2  एमए,पीएचडी, एलएलडी कोलंबिया विश्वविद्यालय अमेरिका
3 एमएससी व डीएससी लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स ग्रेट ब्रिटेन
4 स्कॉलरशिप का तीन वर्ष का समय समाप्त होने पर 1917 में भारत वापसी।
4 1921 में कोल्हापुर के साहूजी के सहयोग से चार साल बाद अधूरी पढ़ाई पूरी करने हेतु पुनः लन्दन गये और 1922 में ग्रेज इन बैरिस्टर-एट-लॉ लन्दन ग्रेट ब्रिटेन से
5 इकोनॉमिक्स अध्ययन बर्लिन जर्मनी
6 1923 में, उन्होंने अर्थशास्त्र में डीएससी (डॉक्टर ऑफ साईंस) उपाधि प्राप्त की।
7  एलएलडी कोलंबिया विश्वविद्यालय, 1952 (चौथी डॉक्टरेट उपाधि
8  डीलिट उस्मानिया विश्वविद्यालय, 1953 (सम्मानित उपाधि)
सामाजिक कार्य गुरु - ज्योतिबा फुले

सम्मान- 
1भारत रत्न 1990
2 बोधिसत्व 1956
3 प्रथम कोलंबियन अहेड ऑफ देअर टाईम (2004)
4 द ग्रेटेस्ट इंडियन (2012)
5 राजस्थान सरकार द्वारा उनके नाम से कानूनी शिक्षा के विश्यविद्यालय का नाम रखा गया।
6 भारत सरकार ने ऑनलाईन पेमेंट एप्प उनके नाम से "भीम एप्प" जारी की।
7 आम जनता उनको बाबा साहब के नाम से जानती है।

कौशल व विशेषज्ञ :-
1 विधिवेत्ता
2 अर्थशास्त्री
3 राजनीतिज्ञ 
4 समाज सुधारक 
5 अछूत आंदोलन के जनक
6 पत्रकार
7 लेखक
8 सम्पादक

सामाजिक संगठन :-
 1 बहिष्कृत हितकारिणी सभा
 2 समता सैनिक दल

शैक्षिक संगठन :-
 1 डिप्रेस्ड क्लासेस एज्युकेशन सोसायटी
 2 द बाँबे शेड्युल्ड कास्ट्स इम्प्रुव्हमेंट ट्रस्ट
 3 पिपल्स एज्युकेशन सोसायटी

कार्य एवं आजीविका :-
1 बेरिस्टर की पढ़ाई पूरी करके आने के बाद बड़ौदा महाराज के यहां सेन्य सचिव बने पर छुआछूत के कारण पद त्याग दिया(उन्हें राजकीय आवास में नहीं ठहरने दिया और पारसी सराय में रहे) 
2 महाराज बड़ौदा के यहाँ छुआछूत के कारण नोकरी छोड़ कर लेखाकार,प्राइवेट ट्यूटर के रूप में काम करने लगे।
3 सिडनेम कॉलेज ऑफ कॉमर्स एंड इकोनोमिक्स मे राजनीतिक अर्थव्यवस्था के प्रोफेसर के रूप में नियुक्त
4 बम्बई हाई कोर्ट में 1923 में वकालत शुरू कर दी। जाति वाद के कारण वकालत का कार्य असफल ही रहा।
5 1925 में साईमन कमीशन के सदस्य बने।
5 1928 में ला कॉलेज बम्बई में प्रोफेसर नियुक्त हुये। 
6 अक्टूबर 13,1935 में गवर्नमेंट ला कॉलेज बम्बई के प्रिंसिपल नियुक्त।
7 1932 से सक्रिय राजनीति में
8 13 अक्टूबर 1935  सरकारी लॉ कॉलेज का प्रधानाचार्य नियुक्त जहां 2 वर्षो तक कार्य किया।
9 दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज के संस्थापक श्री राय केदारनाथ की मृत्यु के बाद इस कॉलेज के गवर्निंग बॉडी के अध्यक्ष के रूप में भी कार्य।

राजनीति विशेष - 
लोकतंत्र में जीत - हार जनता तय करती है। यह सत्य है कि बाबा साहब दो बार कांग्रेस प्रत्याशी से लोकसभा चुनाव हारे। 
1952 में मुंबई से शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन पार्टी के प्रत्याशी के रूप में कांग्रेस कांग्रेस प्रत्याशी नाराय़ण काजरोलकर से 15 हजार वोटों से हारे। हिंदू महासभा ने अपना प्रत्याशी खड़ा किया जो हार गए। 1954 में बंडारा से उपचुनाव लड़ा और कांग्रेस से करीब 8 हजार वोटों से हारे, उससे पहले आजादी के बाद नेहरु की अगुवाई में अंतरिम सरकार बनी तब कांग्रेस का सदस्य नहीं होने के बावजूद दलगत राजनीति से इतर योग्यता के आधार पर अंबेडकर को कानून मंत्री बनाया।
इससे पहले संविधान सभा का चुनाव बाबा साहब मुस्लिम बहुल क्षेत्र से जीत कर आए।

साहित्य - 
अम्बेडकर साहित्य को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है।
1 पुस्तकें
2 पत्रकारिता व सम्पादन
3 लेख,भाषण व शोध पत्र

1 पुस्तक ( धर्म,राजनीति, कानून)
मराठी,फ़ारसी,संस्कृत,पाल,गुजराती, बांग्ला, जर्मन,कन्नड़ व फ़्रेन्च सहित 11 भाषाओं का ज्ञान परन्तु अधिकांश लेखन इंग्लिश में किया। उनके निबंध, सम्पादन व लेखन में छुआछूत की टीस हर स्थान पर दृष्टिगोचर होता है। महाराष्ट्र सरकार ने 1976 में डॉ आंबेडकर साहित्य प्रकाशन समिति का गठन कर अधिकांश अप्रकाशित साहित्य को प्रकाशित करवाया।सामाजिक न्याय व अधिकारिता विभाग भारत सरकार द्वारा भी अम्बेडकर साहित्य का प्रकाशन करवाया गया है। उनके कई ज्ञापन व बयान भी चर्चित हैं जिनमे अल्पसंख्यक व दलितों के लिये द्वेध निर्वाचन व आरक्षण मुख्य हैं।
1 जाति प्रथा का विनाश 1936 (बान यूनिवर्सिटी में 
जर्मन भाषा में 25 फरवरी 1921 को लिखा गया लेख)
2 बुद्ध एवं उसका धम्म द  1956
3 भारत में जातियाँ
4, शुद्र कौन 1946
5 हिन्दू धर्म में समस्याएं
6 भारतीय रुपये की उत्पत्ति, समस्या व समाधान 1923 (शोध पत्र )
7 ईस्ट इंडिया कम्पनी का वित्तीय व प्रशासनिक प्रबंधन (शोध पत्र)
8 ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी के वित्तीय प्रबंधन का मूल्यांकन (शोध पत्र)
9   अधिकार संपन्नता के रास्ते 1936
10 संघ व स्वतंत्रता 1936
11 भारत का विभाजन व पाकिस्तान के निर्माण  की सोच 1940
11 रानडे, गांधी व जिन्ना (1943)
12 मेरे व गांधी के अधिकार संपन्नता पर विचार 1945
13 कांग्रेस व गांधी ने छुआछूत उन्मूलन के लिये क्या किया 1945
14 साम्प्रदायिक गतिरोध एवं इसका समाधान 1946
15 छुआछूत व केबिनेट 1946
17 राज्य व अल्पसंख्यक 1947
18 महाराष्ट्र एक भाषाई क्षेत्र 1948
19 अछूत कौन थे एवं छुआछूत के शिकार किस के द्वारा 1948)
20 राज्यों का भाषाई आधार पर पुनर्गठन 1955
21 डिक्शनरी ऑफ पाली लॅग्वेज (पालि से इग्लिश शब्दकोश)
22 पालि व्याकरण
23 वेटिंग फ़ॉर अ वीज़ा 1936 (आत्मकथा)
24 मैं (अछूत) क्या हिन्दू बन सकता हूँ।
25 ब्रह्मवाद के हिन्दू धर्म हेतु कार्य
26 भारतीय साम्प्रदायवाद व भगवत गीता पर समालोचनात्मक टिका
27 बुद्ध और कार्ल मार्क्स
28 विधान व संवैधानिकता
29 बोध पूजा पाठ 1956
30 कमोडिटी व एक्सचेंज
31 राष्ट्र रक्षा के वैदिक साधन की भूमिका (1948)
32 भारत में सामाजिक संरक्षण 1948
33 Preface to the Essence of Buddhism
34 पीपल एट बे
35 थॉट ऑफ पाकिस्तान 1940
36 वेटिंग फ़ॉर वीसा
37 द अनटचेबल्स: हू वेर दे आर व्हाय दी बिकम अनटचेबल्स 1948

2 प्रकाशन व पत्रकारिता :- 

1 मूकनायक :-
 दलितोद्धार हेतु 31 जनवरी 1920 से मराठी पाक्षिक पत्र शुरू किया जिसके ऊपरी भाग पर सन्त तुकाराम के वाक्यांश छापे जाते थे। 
पाण्डुराम व नन्दराम भटकर इसके सहयोगी सम्पादक थे। साहूजी महाराज (कोल्हापुर)द्वारा 25,000 रूपये की आर्थिक सहायता दी गई थी पर 1923 में डॉ भीमराव के विदेश अध्ययन हेतु जाने के कारण आर्थिक कारणों से बंद हो गया। मूकनायक का ही प्रभाव था कि स्थानीय शासक शाहूजी चतुर्थ आम्बेडकर के साथ भोजन किया जिससे रूढ़िवादी समाज मे हलचल मचा गई।

2 बहिष्कृत भारत :-
दूसरा मराठी पाक्षिक 3 अप्रैल 1924 से बम्बई से स्वयं अम्बेडकर ने प्रकाशित व सम्पादित किया। कुल 34 अंकों के बाद आर्थिक कारणों से यह भी नवम्बर 1929 से बंद हो गया। बहिस्कृत भारत की भी मूल भावना दलितोद्धार ही रही। 
यह पत्र केंद्रीय संस्थान बहिष्कृत हितकारिणी सभा के बैनर तले निकाला गया जिसका उद्देश्य शिक्षा,सामाजिक व आर्थिक सुधारों को बढ़ावा देने के साथ ही अवसादग्रस्त वर्गों का कल्याण करना था।

3 समता :-
समता सैनिक दल के मुख्य पत्र के रूप में 29 जून 1928 में  यह पत्र प्रारंभ किया। देवनारायण इसके सम्पादक नियुक्त किये गये। किन्ही कारणों से यह भी बंद हो गया।

4 जनता :-
 24 फर.1930 से पाक्षिक व 31 अक्टूबर 1930 से साप्ताहिक प्रकाशन शुरू किया गया। 
इसी पत्र में उनका प्रसिद्ध वक्तव्य हम शासक समाज बनेंगे 1944 में छपा था। 
26 साल बाद फरवरी 1956 में जनता समाचार पत्र भी बंद हो गया।

5 प्रबुद्ध भारत :-
अखिल भारतीय दलित फेडरेशन के मुख पत्र के रूप में जनता का नाम परिवर्तन कर प्रबुद्ध भारत नाम से 4 फरवरी 1956 से पांचवां समाचार पत्र शुरू किया। डॉ. अम्बेडकर की मृत्यु के बाद यह बंद हो गया जिसे उनके पोते प्रकाश अम्बेडकर ने 2017 से पुनः शुरू किया है।

3 लेख भाषण व शोध
1 प्राचीन भारतीय वाणिज्य विज्ञान 1915
2 नेशनल डिविडेंड ऑफ इंडिया, ए हिस्टोरिक एंड एनालिटिकल स्टडी 1916
3 इवोल्युशन ओफ प्रोविन्शिअल फिनान्स इन ब्रिटिश इंडिया 1916 (इसी आधार पर शोध प्रकाश्नोपरांत 1927 में डॉक्टरेट की उपाधि (पीएचडी) प्रदान की गई।
4 1 मई 1916 भारत में जातियां: उनकी प्रणाली, उत्पत्ति व विकास (पहला प्रकाशित शोध पत्र)
5 ब्रिटिश भारत में शाही अर्थ व्यवस्था का प्रांतीय विकेंद्रीकरण शोध पत्र
6 रुपये की समस्या: इसकी उत्पत्ति और इसका समाधान 1923 शोध पत्र
7 न्यूयार्क में लिखे गये शोध पत्र का मई 15, 1936 को पुस्तक 'एनीहिलेशन ऑफ कास्ट' (जाति प्रथा का विनाश) के रूप में प्रकाशन।

नारे/वाक्यांश
1 शिक्षा शेरनी का दूध है जो पियेगा दहाड़ेगा।
2 शिक्षित बनो,संघर्ष करो सँगठित रहो।
3 मार्च 18,1956 आगरा में वक्तव्य "मुझे पढ़े लिखे लोगों ने धोखा दिया"
4 "इस मिशन को में जहां तक लाया हूँ सब आगे न बढ़ा सको तो पीछे मत धकेलना।
5 राजा बनने के लिए रानी के पेट की जरूरत नहीं,तुम्हारे वोट की जरूरत है
6 छुआछूत का उन्मूलन मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और 
मैं इसे मिटा कर रहूँगा।
7 मैं दलित हिंदु जन्मा ज़रूर हूँ पर हिंदु के रूप में मरूँगा नहीं।
8 छुआछूत गुलामी से भी बदतर है
9 हमें अपना रास्ता स्वयँ बनाना होगा और स्वयँ... राजनीतिक शक्ति शोषितो की समस्याओं का निवारण नहीं हो सकती, उनका उद्धार समाज मे उनका उचित स्थान पाने में निहित है। उनको अपना रहने का बुरा तरीका बदलना होगा... उनको शिक्षित होना चाहिए॰.. एक बड़ी आवश्यकता उनकी हीनता की भावना को झकझोरने और उनके अंदर उस दैवीय असंतोष की स्थापना करने की है जो सभी उँचाइयों का स्रोत है।
10 हिंदू सभ्यता .... जो मानवता को दास बनाने और उसका दमन करने की एक क्रूर युक्ति है और इसका उचित नाम बदनामी होगा। एक सभ्यता के बारे मे और क्या कहा जा सकता है जिसने लोगों के एक बहुत बड़े वर्ग को विकसित किया जिसे... एक मानव से हीन समझा गया और जिसका स्पर्श मात्र प्रदूषण फैलाने का पर्याप्त कारण है।
11 "सांप्रदायिकता" से पीड़ित हिंदुओं और मुसलमानों दोनों समूहों ने सामाजिक न्याय की माँग की उपेक्षा की है।
12 हमने हिन्दू समाज में समानता का स्तर प्राप्त करने के लिए हर तरह के प्रयत्न और सत्याग्रह किए, परन्तु सब निरर्थक सिद्ध हुए। हिन्दू समाज में समानता के लिए कोई स्थान नहीं है।” हिन्दू समाज का यह कहना था कि “मनुष्य धर्म के लिए हैं” जबकि आम्बेडकर का मानना था कि "धर्म मनुष्य के लिए हैं।" आम्बेडकर ने कहा कि ऐसे धर्म का कोई मतलब नहीं जिसमें मनुष्यता का कुछ भी मूल्य नहीं। जो अपने ही धर्म के अनुयायिओं (अछूतों को) को धर्म शिक्षा प्राप्त नहीं करने देता, नौकरी करने में बाधा पहुँचाता है, बात-बात पर अपमानित करता है और यहाँ तक कि पानी तक नहीं मिलने देता ऐसे धर्म में रहने का कोई मतलब नहीं। आम्बेडकर ने हिन्दू धर्म त्यागने की घोषणा किसी भी प्रकार की दुश्मनी व हिन्दू धर्म के विनाश के लिए नहीं की थी बल्कि उन्होंने इसका फैसला कुछ मौलिक सिद्धांतों को लेकर किया जिनका हिन्दू धर्म में बिल्कुल तालमेल नहीं था।
13 मैं बुद्ध के धम्म को सबसे अच्छा मानता हूं। इससे किसी धर्म की तुलना नहीं की जा सकती है। यदि एक आधुनिक व्यक्ति जो विज्ञान को मानता है, उसका धर्म कोई होना चाहिए, तो वह धर्म केवल बौद्ध धर्म ही हो सकता है। सभी धर्मों के घनिष्ठ अध्ययन के पच्चीस वर्षों के बाद यह दृढ़ विश्वास मेरे बीच बढ़ गया है
14 "मैं भगवान बुद्ध और उनके मूल धर्म की शरण जा रहा हूँ। मैं प्रचलित बौद्ध पन्थों से तटस्थ हूँ। मैं जिस बौद्ध धर्म को स्वीकार कर रहा हूँ, वह नव बौद्ध धर्म या नवयान हैं।

दलितोद्धार के लिये कार्य-

1 महार वेतन बिल :- 
समान कार्य करते हुये भी सामान्य जाति के सैनिकों से महार सैनिकों को कम वेतन दिया जाता था व अस्पृश्यता काम ली जा रही थी। इस असमानता से छुटकारा दिलाने के लिये बम्बई विधानसभा में 14 मार्च 1929 को महार वेतन बिल प्रस्तुत किया। 

2 काला राम मंदिर बम्बई में  अछुतो के प्रवेश के लिए आंदोलन  03 मार्च 1930
कालाराम मंदिर सत्याग्रह एक असफल आंदोलन रहा पर इसने अम्बेडकर को और मजबूती से काम करने के लिये प्रेरित किया।
बड़ौदा के रियासत में गायकवाड़ के सेन्य सचिव रहते हुये राज्य द्वारा छुआछूत पर आक्रोशित होते हुये उन्हीने कहा था मैं अछूत हिंदू जन्मा ज़रूर हूँ मरूँगा नहीं।
उन्होंने इसका वर्णन अपनी आत्मकथा, वेटिंग फॉर अ वीजा में किया है।
परिवार के बड़े होते स्वरूप के लिये आजीविका के लिये लेखाका,ट्यूटर, निजी शिक्षक,निवेश परामर्श के रूप में काम किया पर छुआछूत के कारण असफल रहे ।
यह व्यग्रता उनको कचोट रही थी आखिरकार अंग्रेज मित्र की मदद से सिडेनहम कॉलेज ऑफ कॉमर्स एंड इकोनॉमिक्स में राजनीतिक अर्थशास्त्र के प्रोफेसर बने जहाँ ऊँची जाति के साथियों ने उनके साथ पानी पीने के बर्तन अलग कर लिये।
इससे रुष्ट हो कर 3 मार्च 1930 को 5000 साथियों के साथ तीन महीनों से तैयारी कर कालीबाई मंदिर में पूजा करने के लिये मार्च निकाला। पुजारियों ने मंदिर के कपाट बंद कर दिये और आंदोलन असफल हो गया।

3 सन1932 में महात्मा गांधी के साथ पूना पेक्ट समझौता
डॉ. अम्बेडकर ने भारत सरकार अधिनियम 1919  तैयार कर रही साउथ बरो समिति के समक्ष दलित प्रतिनिधि के रूप में उपस्थित हुये दलितों और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों के लिये पृथक निर्वाचिका और आरक्षण देने की मांग रखी।
लंदन में 8 अगस्त, 1930 के प्रथम गोलमेज सम्मेलन के दौरान आम्बेडकर ने पृथक निर्वाचन का प्रस्ताव रखा था। जिसके अनुसार शोषित वर्ग की सुरक्षा उसके सरकार और कांग्रेस दोनों से स्वतंत्र होने में है। उन्होंने सभी राजनीतिक दलों की जाति व्यवस्था के उन्मूलन के प्रति उनकी उदासीनता की कटु आलोचना की। 
आम्बेडकर ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और उसके नेता महात्मा गांधी की भी खुलकर आलोचना कर आरोप लगाया कि गांधी ने हरिजन के नाम पर अछूत समुदाय को एक करुणा की वस्तु के रूप मे प्रस्तुत किया।
आम्बेडकर ब्रिटिश शासन की विफलताओं से भी असंतुष्ट थे उन्होंने अछूत समुदाय के लिये एक ऐसी अलग राजनीतिक पहचान की वकालत की जिसमे कांग्रेस और ब्रिटिश दोनों की ही कोई दखल ना हो।
दूसरा गोलमेज सम्मेलन, 1931 में लन्दन में हुआ जिसमें आंबेडकर, गांधी, मालवीय व आदि शामील थे।भीमराव आम्बेडकर आज तक की सबसे बडी़ अछूत राजनीतिक हस्ती बन चुके थे। 
आम्बेडकर ने कांग्रेस और गांधी द्वारा चलाये गये नमक सत्याग्रह की आलोचना की। 
अछूतों को पृथक निर्वाचिका देने के मुद्दे पर गांधी से अम्बेडकर की तीखी बहस हुई।
ब्रिटिश सरकार ने डॉ॰ आम्बेडकर के विचारों से सहमती जताते हुये धर्म और जाति के आधार पर पृथक से निर्वाचन (द्वेध निर्वाचन) के अधिकार हेतु सहमति बन गई व 1932 में पृथक निर्वाचन का अधिकार मिल गया।
इस समय गाँधी यरवदा जेल में थे ने द्वेध निर्वाचन प्रस्ताव के विरुद्ध अनशन शुरू कर दिया। गांधी की हालत बिगड़ने लगी व देश मे असन्तोष फेल गया। अम्बेडकर टस से मस नहीं हुये। उनका वक्तव्य था कि एक हिंदूवादी व्यक्ति के जीवन के कारण मैं लाखों दलितों के भविष्य से खिलवाड़ नहीं कर सकता।
आखिरकार अम्बेडकर भारी दबाव व बढ़ते असन्तोष के कारण उन से मिलने येरवडा जेल गये जहाँ दलितों को 48 के स्थान पर 176 आरक्षित सीटों पर चुनाव लड़ने पर सहमति बनी व द्वेध निर्वाचन की मांग को समाप्त कर दिया गया।

कोरेगांव घटना की बरसी मनाना
 1 जनवरी 1927
द्वितीय अंग्रेज-मराठा युद्ध के में 1 जनवरी 1818 को हुई कोरेगाँव की लड़ाई के दौरान मारे गये भारतीय महार सैनिकों के सम्मान में आम्बेडकर व उनके साथियों ने 1 जनवरी 1927 को कोरेगाँव विजय स्मारक (जयस्तंभ) में एक समारोह का आयोजन किया। 
 शहीद महार सैनिकों के नाम संगमरमर के एक शिलालेख पर खुदवाये गये तथा कोरेगाँव को दलित स्वाभिमान के प्रतीक के रूप में मान्यता दिलवाई।

महाड़ जल आंदोलन :- 
1927 से डॉ॰ आम्बेडकर ने छुआछूत के विरुद्ध एक व्यापक एवं सक्रिय आंदोलन आरम्भ करने का निर्णय किया। उन्होंने सार्वजनिक आंदोलनों, सत्याग्रहों और जलूसों के माध्यम से अछूतों को  सार्वजनिक संसाधन उपयोग में लेने के अधिकार को सजगता से जनता में फैलाया व समाज के सभी वर्गों के लिये खुलवाने के साथ ही उन्होनें अछूतों को भी हिंदू मन्दिरों में प्रवेश करने का अधिकार दिलाने के लिये संघर्ष किया। 
इसी सिलसिले में उन्होंने महाड शहर में अछूत समुदाय के लोगों को नगर के चवदार जलाशय से पानी लेने का अधिकार दिलाने कि लिये सत्याग्रह चलाया।

मनु स्मृति दहन 25 दिसम्बर 1927
 1927 के अंत में सम्मेलन में, आम्बेडकर ने जाति भेदभाव और "छुआछूत" को वैचारिक रूप से अन्याय के रूप में सिद्ध करने के लिये उनके सभी प्रयास विफल रहने पर अब वो खुलकर विरोध करने पर उतर गये।
उन्होंने प्राचीन हिंदू पाठ, मनुस्मृति, जिसके कई पद, खुलकर जातीय भेदभाव व जातिवाद का समर्थन करते हैं कि सार्वजनिक रूप से निंदा की, और खुल कर सार्वजनिक रूप से प्राचीन पाठ की 25 दिसम्बर 1927 को हज़ारों साथियों के साथ प्रतियां जलाईं तब से 25 दिसंबर मनुस्मृति दहन दिवस के रूप में आम्बेडकरवादियों द्वारा मनाया जाता है।

अम्बेडकर लाइब्रेरी की स्थापना
आम्बेडकर ने बम्बई आकर तीन मंजिला घर 'राजगृह' का निर्माण कराया जिसमें उनके निजी पुस्तकालय में 50,000 से अधिक पुस्तकें थीं। 
उस समय यह दुनिया का सबसे बड़ा निजी पुस्तकालय था।

नया पंढरपुर :- 
27 मई 1953 को उनकी पत्नी रमाबाई की एक लंबी बीमारी के बाद मृत्यु हो गई। 
रमाबाई अपनी मृत्यु से पहले तीर्थयात्रा के लिये पंढरपुर जाना चाहती थीं पर आम्बेडकर ने उन्हे इसकी इजाज़त नहीं दी। आम्बेडकर ने कहा की उस हिन्दू तीर्थ में जहाँ उनको अछूत माना जाता है जाने का कोई औचित्य नहीं है।
इसके बजाय उन्होंने उनके लिये एक नया पंढरपुर बनाने की बात कहीं।

राजनीतिक जीवन :-
आंबेडकर का राजनीतिक कैरियर 1926 में शुरू हुआ और 1956 तक वो राजनीतिक क्षेत्र में विभिन्न पदों पर रहे। 
1 सर्व प्रथम दिसंबर 1926 में, बॉम्बे के गवर्नर ने उन्हें बॉम्बे विधान परिषद के सदस्य के रूप में नामित किया गया 1926 से 1936 तक
2 वायसराय की सरकार में श्रम मंत्री फिरोज खान नून के स्थान पर  जुलाई 1942 से 1946 तक
3 1928 में साईमन कमीशन में सम्मिलित हुये।
4 1936 में, आम्बेडकर ने स्वतंत्र लेबर पार्टी की स्थापना की, जो 1937 में केन्द्रीय विधान सभा चुनावों मे 13 सीटें जीत कर आई।
आम्बेडकर को बॉम्बे विधान सभा के बम्बई शहर विधानसभा से विधायक के रूप में चुना गया था। वह 1942 तक विधानसभा के सदस्य रहे और इस दौरान उन्होंने बॉम्बे विधान सभा में विपक्ष के नेता के रूप में भी कार्य किया।
5 ऑल इंडिया शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन एक सामाजिक-राजनीतिक संगठन की स्थापना अछूत समुदाय के अधिकारों के लिए अभियान चलाने के लिए 1942 में की ।
6 सन 1945 में बंगाल से संविधान सभा के सदस्य चुने गये। (बंगाल में मुस्लिम लीग का शासन था।)
7 सन 1946  में रक्षा सलाहकार समिति और वाइसराय की कार्यकारी परिषद में श्रम मंत्री के रूप में सेवाएँ दीं।
8 आम्बेडकर की राजनीतिक पार्टी अखिल भारतीय अनुसूचित जाति फेडरेशन (शेड्युल्ड कास्ट फेडरेशन) ने 1946 में आयोजित भारत के संविधान सभा के लिए हुये चुनाव में खराब प्रदर्शन किया। 
9 बंगाल (जहां मुस्लिम लीग सत्ता में थी) से संविधान सभा में चुने गये। संविधान की प्रारूप समिति के अध्यक्ष रहे  29 अगस्त 1947 से 24 जनवरी 1950 तक
10 बॉम्बे उत्तर से 1952 का पहला लोकसभा चुनाव लड़ा जिसमे पूर्व सहायक और कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार नारायण काजोलकर से हार गए। 
11 अप्रेल 2,1952  से अप्रेल 2 ,1956 व  3 अप्रेल 1956 से 2 अप्रेल 1962 तक राज्य सभा के सदस्य चुने गये। (दूसरा कार्यकाल पूर्ण होने से पहले 6 दिसंबर 1956 को मृत्यु)
12 भंडारा से 1954 के उपचुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी विजयी रहा व अम्बवडेकर तीसरे स्थान पर रहे।
13 अगस्त 1947 से सितम्बर 1952 तक भारत के प्रथम कानून मंत्री बने
14 सितंबर 30, 1956 क "अनुसूचित जाति महासंघ" का विघटन कर "रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया" की स्थापना की घोषणा की।
पार्टी के गठन से पूर्व उनका निधन हो जाने पर बाद 1 अक्टूबर 1957 को नागपुर में प्रेसीडेंसी की बैठक का आयोजन किया गया जिस में एन शिवराज, यशवंत आंबेडकर, पीटी बोराले, एजी पवार, दत्ता कट्टी, डीए रूपवते की उपस्थिति में 3 अक्टूबर 1957 को रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया का गठन किया गया और एन शिवराज को पार्टी अध्यक्ष के रूप में चुना गया।

भारतीय संविधान निर्माण में भूमिका :-
गांधी व कांग्रेस की कटु आलोचना के बावजूद आम्बेडकर की प्रतिष्ठा एक अद्वितीय विद्वान और विधिवेत्ता की थी। जिसके कारण जब, 15 अगस्त 1947 को भारत को स्वतंत्रता मिलने के बाद, कांग्रेस के नेतृत्व वाली नई सरकार अस्तित्व में आई तो उसने आम्बेडकर को देश के पहले क़ानून एवं न्याय मंत्री के रूप में सेवा करने के लिए आमंत्रित किया गया जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। 
29 अगस्त 1947 को, आम्बेडकर को स्वतंत्र भारत के नए संविधान की रचना के लिए बनी संविधान की मसौदा समिति के अध्यक्ष पद पर नियुक्त किया गया। 
संविधान निर्माण के कार्य में आम्बेडकर का शुरुआती बौद्ध संघ रीतियों और अन्य बौद्ध ग्रंथों का अध्ययन भी काम आया।
आम्बेडकर संविधान विशेषज्ञ थे उन्होंने लगभग 60 देशों के संविधानों का अध्ययन किया।
सदस्य टी॰ टी॰ कृष्णामाचारी के अनुसार
"अध्यक्ष महोदय, मैं सदन में उन लोगों में से एक हूं जिन्होंने डॉ. आंबेडकर की बातों को बहुत ध्यान से सुना है।
मैं इस संविधान की ड्राफ्टिंग के काम में जुटे काम और उत्साह के बारे में जानता हूं।
उसी समय मुझे यह महसूस होता है कि इस समय हमारे लिये जितना महत्वपूर्ण संविधान तैयार करने के उद्देश्य पर ध्यान देना आवश्यक था, वह ड्राफ्टिंग कमेटी द्वारा नहीं दिया गया। सदन के शायद सात सदस्यों की जानकारी है और आपके द्वारा नामित एक सदस्य ने सदन से इस्तीफा दे दिया था और उसे बदल दिया गया था। एक की मृत्यु हो गई और उसकी जगह कोई नहीं लिया गया। एक अमेरिका में था और उसका स्थान नहीं भरा गया और एक अन्य व्यक्ति राज्य के मामलों में व्यस्त था और उस सीमा तक एक शून्य था। 
एक या दो लोग दिल्ली से बहुत दूर थे और शायद स्वास्थ्य के कारणों ने उन्हें भाग लेने की अनुमति नहीं दी गई। इसलिए अंततः यह हुआ कि इस संविधान का मसौदा तैयार करने का सारा भार डॉ॰ आंबेडकर पर आन पड़ा और मुझे कोई संदेह नहीं है कि हम उनके लिये आभारी हैं। 
इस कार्य को प्राप्त करने के बाद मैं ऐसा मानता हूँ कि यह निस्संदेह सराहनीय है।"
आम्बेडकर द्वारा तैयार किए गए संविधान के पाठ में नागरिकों के लिये व्यक्तिगत स्वतंत्रता की एक विस्तृत श्रृंखला के लिए संवैधानिक गारंटी और सुरक्षा प्रदान की गई है।
जिसमें धर्म की आजादी, छुआछूत को खत्म करना, और भेदभाव के सभी रूपों का त्याग करना शामिल है। 
आम्बेडकर ने महिलाओं के लिए व्यापक आर्थिक और सामाजिक अधिकारों के लिए तर्क दिया और अनुसूचित जातियों (एससी) और अनुसूचित जनजातियों (एसटी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के सदस्यों के लिए नागरिक सेवाओं स्कूलों और कॉलेजों में नौकरियों के आरक्षण की व्यवस्था शुरू करने के लिए सदन का समर्थन हासिल किया।
भारत के सांसदों ने इन उपायों के माध्यम से निराशाजनक हालात में  सभी वर्गों को  सामाजिक-आर्थिक असमानताओं से  छुटकारा दिलाकर अवसरों की कमी को खत्म करने की उम्मीद की किरण दिखाई दी।
संविधान सभा द्वारा 26 नवंबर 1949 को संविधान अपनाया गया।
"मैं महसूस करता हूं कि संविधान, साध्य (काम करने लायक) है, यह लचीला है पर साथ ही यह इतना मज़बूत भी है कि देश को शांति और युद्ध दोनों के समय जोड़ कर रख सके। वास्तव में, मैं कह सकता हूँ कि अगर कभी कुछ गलत हुआ तो इसका कारण यह नही होगा कि हमारा संविधान खराब था बल्कि इसका उपयोग करने वाला मनुष्य अधम था।" डॉ. भीमराव अंबेडकर

पृथक देश पाकिस्तान की मांग की आलोचना :-
मुस्लिम लीग के लाहौर रिज़ोल्यूशन (1940) के बाद, आम्बेडकर ने "थॉट्स ऑन पाकिस्तान" पुस्तक लिखी  जिसमें सभी पहलुओं पर प्रकाश डालते हुये "पाकिस्तान" की अवधारणा का विश्लेषण किया। मुस्लिम लीग की लीग की मुसलमानों के लिए अलग देश पाकिस्तान की मांग की आलोचना कर तर्क भी दिया कि हिंदुओं को मुसलमानों के पाकिस्तान का विचार स्वीकार करना चाहिये। 
उन्होंने प्रस्तावित किया कि मुस्लिम और गैर-मुस्लिम बहुमत वाले हिस्सों को अलग करने के लिए पंजाब और बंगाल की प्रांतीय सीमाओं को फिर से तैयार किया जा सकता है। 
विद्वानों के अनुसार थॉट्स ऑन पाकिस्तान ने "एक दशक तक भारतीय राजनीति को रोके रखा। इसने मुस्लिम लीग और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बीच संवाद के मार्ग खोले।
अम्बवडेकर मोहम्मद अली जिन्ना और मुस्लिम लीग की विभाजनकारी सांप्रदायिक राजनीति के घोर आलोचक थे।
अंतिम रूप से उनका भी तर्क था कि हिंदुओं और मुसलमानों को पृथक कर देने में ही देश व दोनों की भलाई है।
दो देश बनने पर सिमा विवाद व जनसंख्या अन्तरण की समस्या से अवगत करवा दिया था।

धर्म संबन्धी विचार- 
इस्लाम धर्म  की आलोचना :-
इस्लाम धर्म  की कुरीतियों के भी बड़े आलोचक थे। उन्होने भारत विभाजन का तो पक्ष लिया पर मुस्लिमो में व्याप्त बाल विवाह की प्रथा और महिलाओं के साथ होने वाले दुर्व्यवहार की घोर निंदा की। उन्होंने कहा,
बहुविवाह और रखैल रखने के दुष्परिणाम शब्दों में व्यक्त नहीं किये जा सकते जो विशेष रूप से एक मुस्लिम महिला के दुःख के स्रोत हैं। 
जाति व्यवस्था को ही लें, हर कोई कहता है कि इस्लाम गुलामी और जाति से मुक्त होना चाहिये जबकि गुलामी अस्तित्व में है और इसे इस्लाम और इस्लामी देशों से समर्थन मिला है।
कुरान में निहित गुलामों के न्याय और मानवीय उपचार के बारे में पैगंबर द्वारा किए गए नुस्खे प्रशंसनीय हैं।
इस्लाम में ऐसा कुछ भी नहीं है जो इस अभिशाप के उन्मूलन का समर्थन करता हो। अगर गुलामी खत्म भी हो जाये पर फिर भी मुसलमानों के बीच जाति व्यवस्था रह जायेगी।
उन्होंने लिखा कि मुस्लिम समाज मे तो हिंदू समाज से भी कही अधिक सामाजिक बुराइयां है और मुसलमान उन्हें " भाईचारे " जैसे नरम शब्दों के प्रयोग से छुपाते हैं। उन्होंने मुसलमानो द्वारा अर्ज़ल वर्गों के ख़िलाफ़ भेदभाव जिन्हें " निचले दर्जे का " माना जाता था के साथ ही मुस्लिम समाज में महिलाओं के उत्पीड़न की दमनकारी पर्दा प्रथा की भी आलोचना की। उन्होंने कहा हालाँकि पर्दा हिंदुओं मे भी होता है पर उसे धर्मिक मान्यता केवल मुसलमानों ने दी है। उन्होंने इस्लाम मे कट्टरता की आलोचना की जिसके कारण इस्लाम की नातियों का आक्षरश पालना की बद्धता के कारण समाज बहुत कट्टर हो गया है और उसे को बदलना बहुत मुश्किल हो गया है। उन्होंने आगे लिखा कि भारतीय मुसलमान अपने समाज का सुधार करने में विफल रहे हैं जबकि इसके विपरीत तुर्की जैसे देशों ने अपने आपको बहुत बदल लिया है।

2 धर्म परिवर्तन की घोषणा व धर्म परिवर्तन :-
13 अक्टूबर 1935, को येवला नासिक में धर्म परिवर्तन की घोषणा करते हुये 10-12 साल तक हिन्दू धर्म व हिन्दु समाज में सुधार, समता तथा सम्मान प्राप्त करने के प्रयत्न किये, परन्तु सवर्ण हिन्दुओं का ह्रदय परिवर्तन नहीं हुआ। 
उल्टे उन्हें निंदित किया गया और हिन्दू धर्म विनाशक तक कहा गया। उसके बाद उन्होंने कहा था की, “हमने हिन्दू समाज में समानता का स्तर प्राप्त करने के लिए हर तरह के प्रयत्न और सत्याग्रह किए, परन्तु सब निरर्थक सिद्ध हुए। हिन्दू समाज में समानता के लिए कोई स्थान नहीं है।” हिन्दू समाज का यह कहना था कि “मनुष्य धर्म के लिए हैं” जबकि आम्बेडकर का मानना था कि "धर्म मनुष्य के लिए हैं।" आम्बेडकर ने कहा कि ऐसे धर्म का कोई मतलब नहीं जिसमें मनुष्यता का कुछ भी मूल्य नहीं। जो अपने ही धर्म के अनुयायिओं (अछूतों को) को धर्म शिक्षा प्राप्त नहीं करने देता, नौकरी करने में बाधा पहुँचाता है, बात-बात पर अपमानित करता है और यहाँ तक कि पानी तक नहीं मिलने देता ऐसे धर्म में रहने का कोई मतलब नहीं। आम्बेडकर ने हिन्दू धर्म त्यागने की घोषणा किसी भी प्रकार की दुश्मनी व हिन्दू धर्म के विनाश के लिए नहीं की थी बल्कि उन्होंने इसका फैसला कुछ मौलिक सिद्धांतों को लेकर किया जिनका हिन्दू धर्म में बिल्कुल तालमेल नहीं था।
उन्होंने अपने अनुयायियों से भी हिंदू धर्म छोड़ कोई और धर्म अपनाने का आह्वान किया।
उन्होंने अपनी इस बात को भारत में कई सार्वजनिक सभाओं में भी दोहराया। इस धर्म-परिवर्तन की घोषणा के बाद हैदराबाद के इस्लाम धर्म के निज़ाम से लेकर कई ईसाई मिशनरियों ने उन्हें करोड़ों रुपये का प्रलोभन को ठुकरा कर ऐसे धर्म को चुनना चाहते थे जिसका केन्द्र मनुष्य और नैतिकता हो, उसमें स्वतंत्रता, समता तथा बंधुत्व हो। वो किसी भी हाल में ऐसे धर्म को नहीं अपनाना चाहते थे जो वर्णभेद तथा छुआछूत की बीमारी से जकड़ा हो और ना ही वो ऐसा धर्म चुनना चाहते थे जिसमें अंधविश्वास तथा पाखंडवाद हो।
हालांकि गांधी ने भी सवर्ण हिंदुओं से अस्पृश्यता त्यागने का आह्वान कई बार किया जिसमें से 21 मार्च, 1936 के ‘हरिजन’ अंक का सन्देश महत्वपूर्ण है।
अम्बेडकर ने धर्म परिवर्तन की घोषणा करने के बाद 21 वर्ष तक के समय के बीच उन्होंने ने विश्व के सभी प्रमुख धर्मों का गहन अध्ययन किया। उनके द्वारा इतना लंबा समय लेने का मुख्य कारण यह भी था कि वो चाहते थे कि जिस समय वो धर्म परिवर्तन करें उनके साथ ज्यादा से ज्यादा उनके अनुयायी धर्मान्तरण करें। आम्बेडकर बौद्ध धर्म को पसन्द करते थे क्योंकि उसमें तीन सिद्धांतों का समन्वित रूप मिलता है जो किसी अन्य धर्म में नहीं मिलता।
बौद्ध धर्म प्रज्ञा (अंधविश्वास तथा अतिप्रकृतिवाद के स्थान पर बुद्धि का प्रयोग), करुणा (प्रेम) और समता (समानता) की शिक्षा देता है। उनका कहना था कि मनुष्य इन्हीं बातों को शुभ तथा आनंदित जीवन के लिये चाहता है। 
देवता और आत्मा समाज को नहीं बचा सकते। आम्बेडकर के अनुसार सच्चा धर्म वही है जिसका केन्द्र मनुष्य तथा नैतिकता हो।
धर्म विज्ञान एवं बौद्धिक तत्व पर आधारित हो न कि धर्म का केन्द्र ईश्वर, आत्मा की मुक्ति और मोक्ष हो। 
अम्बेडकर का कहना था कि धर्म का कार्य विश्व का पुनर्निर्माण करना है ना कि उसकी उत्पत्ति और अंत की व्याख्या करना। वह जनतांत्रिक समाज व्यवस्था के पक्षधर थे, क्योंकि उनका मानना था ऐसी स्थिति में धर्म मानव जीवन का मार्गदर्शक बन सकता है। ये सब बातें उन्हें एकमात्र बौद्ध धर्म में मिलीं और लाखों समर्थकों के साथ कुसिनारा के भन्ते की अगुवाई में भिक्षु महास्थवीर चंद्रमणी द्वारा पारंपरिक तरीके से त्रिरत्न और पंचशील को अपनाते हुये 22 प्रतिज्ञाएँ (स्वरचित) लेकर 14 अक्टूबर 1956 को बौद्ध धर्म ग्रहण किया।15 अक्टूबर को 3 लाख लोगों ने,16 अक्टूबर चन्द्रपुर जा कर 3 लाख लोगों को बौद्ध धर्म की दीक्षा दी। 14,25 व 16 अक्टूबर 1956 को 11 लाख लोगों को बौद्ध धर्म ग्रहण करवाया।
अंबेडकर धर्म सम्मेलनों में भाग लेने के लिये श्रीलंका (1950),म्यामार (1954,1955) व नेपाल (1955) भी गये।

अम्बेडकर के गुरु 
आम्बेडकर का जीवन तीन गुरुओं और तीन उपास्यों से सफल बना है। 
 गुरु 
1 गौतम बुद्ध, 
2 संत कबीर
3 महात्मा ज्योतिराव फुले

उपास्य  
1 ज्ञान
2 स्वाभिमान 
3 शील

संविधान के अनुच्छेद 370 का विरोध :-
आम्बेडकर ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 370 का विरोध किया, जिसमें जम्मू-कश्मीर राज्य को विशेष दर्जा दिया गया था। यह जवाहर लाल नेहरू व सरदार पटेल ने उनकी इच्छा के विरुद्ध संविधान में शामिल किया था। 
अम्बेडकर ने शेख अब्दुल्ला से स्पष्ट कहा कि "आप चाहते हैं कि भारत आपकी सीमाओं की रक्षा करे सड़कों का निर्माण करे,अनाज की आपूर्ति करे व भारत के समान दर्जा दे पर भारत सरकार के पास केवल सीमित शक्तियां हों व शेष भारत के लोगों को कश्मीर में कोई अधिकार नहीं होना चाहिए। इस प्रस्ताव की सहमति देने को मैं भारत के कानून मंत्री के रूप में भारत के हितों के खिलाफ एक विश्वासघाती कदम मानूँगा ऐसा कभी नहीं करूँगा। 
शेख अब्दुल्ला ने नेहरू से संपर्क किया नेहरू ने गोपाल स्वामी अयंगार के माध्यम वल्लभभाई पटेल से संपर्क किया। 
सरदार पटेल द्वारा अनुच्छेद पारित किया गया उस समय नेहरू जी विदेश दौरे पर थे। जिस दिन बिल पर चर्चा हुई आम्बेडकर के स्थान पर कृष्णा स्वामी अयंगार ने सदन के प्रश्नों के उत्तर दिये।

समान नागरिक संहिता :-
धर्म विशेष के लिये पृथक बिल के विरोध में बोलते हुये उन्होंने कहा "मैं व्यक्तिगत रूप से समझ नहीं पा रहा हूं कि क्यों धर्म को इस विशाल, व्यापक क्षेत्राधिकार के रूप में दी जानी चाहिए ताकि पूरे जीवन को कवर किया जा सके और उस क्षेत्र पर अतिक्रमण से विधायिका को रोक सके। सब के बाद, हम क्या कर रहे हैं के लिए इस स्वतंत्रता? हमारे सामाजिक व्यवस्था में सुधार करने के लिए हमें यह स्वतंत्रता हो रही है, जो असमानता, भेदभाव और अन्य चीजों से भरा है, जो हमारे मौलिक अधिकारों के साथ संघर्ष करते हैं।" डॉ. अम्बेडकर
 संविधान सभा में बहस के समय आम्बेडकर ने समान नागरिक संहिता अपनाने की सिफारिश की। 1951 मे संसद में हिन्दू कोड बिल (हिंदू संहिता विधेयक) के मसौदे को रोके जाने के बाद आम्बेडकर ने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया। हिंदू कोड बिल द्वारा भारतीय महिलाओं को कई अधिकारों प्रदान करने की बात कहीं गई थी। इस मसौदे में उत्तराधिकार, विवाह और अर्थव्यवस्था के कानूनों में लैंगिक समानता की मांग की गयी थी।[
 तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू,कैबिनेट और कुछ अन्य कांग्रेसी सांसद समर्थन में थे पर राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद, वल्लभभाई पटेल सहित संसद सदस्यों की बड़ी संख्या इसके ख़िलाफ़़ थी।

डॉ. अम्बेडकर एक अर्थशास्त्री :-
1950 में आम्बेडकर
आम्बेडकर विदेश से अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट की डिग्री लेने वाले पहले भारतीय थे। उनका मानना था कि औद्योगिकीकरण और कृषि विकास से भारतीय अर्थव्यवस्था में सुधार हो सकता है।
भारत में प्राथमिक उद्योग के रूप में कृषि में निवेश पर बल दिया।
राष्ट्रीय आर्थिक और सामाजिक विकास के साथ शिक्षा, सार्वजनिक स्वच्छता,सामुदायिक स्वास्थ्य, आवासीय सुविधाओं और बुनियादी सुविधाओं के विकास पर ज़ोर दिया।

भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना हेतु सुझाव :-
अम्बेडकर 1921 तक ख्यातनाम अर्थशास्त्री के रूप में प्रसिद्ध हो चुके थे ने अर्थशास्त्र के संबंध में तीन पुस्तकें लिखीं:
अ‍ॅडमिनिस्ट्रेशन अँड फायनान्स ऑफ दी इस्ट इंडिया कंपनी।
द इव्हॅल्युएशन ऑफ प्रॉव्हिन्शियल फायनान्स इन् ब्रिटिश इंडिया।
द प्रॉब्लम ऑफ द रूपी : इट्स ओरिजिन ॲन्ड इट्स सोल्युशन।
भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई), आम्बेडकर के विचारों पर आधारित थी जिसके संबंध में उन्होने विचार हिल्टन यंग कमिशन को प्रस्तुत किये थे।

जवाहरलाल नेहरू और डॉ अम्बेडकर हिंदू कोड बिल के मुख्य बिंदु -

* महिलाओं को संपत्ति में अधिकार

* इंटर-कास्ट शादी

* तलाक का अधिकार

* बहूविवाह पर रोक

* दूसरी जाति के बच्चों को गोद लेने की अनुमति

* शादी के लिए जाति आधारित रीति रिवाज़ो की समाप्ति

इस बिल के विरोध में मार्च 1949 में All India Anti Hindu Code Bill Committee बनाई गई थी। 

कमेटी ने देश में सैकड़ों मीटिंग की और बिल के ख़िलाफ़ धर्मयुद्ध की कॉल दी। दिसंबर 11 सन 1949 को RSS ने दिल्ली के रामलीला मैदान में बिल के विरोध में रैली व 12 दिसंबर को संसद भवन तक पैदल मार्च किया। नेहरू और डॉ अंबेडकर के पुतले जलाए। आंदोलन का नेतृत्व स्वामी करपात्री महाराज ने किया। वर्ष 1950 और 1951 में नेहरू -अंबेडकर ने बिल पास करवाने के कई प्रयास किए परन्तु रूढ़िवादियों के विरोध के कारण सफल नहीं हुए। ये रूढ़िवादी कांग्रेस में भी थे, महिलाओं को अधिकार देने को धर्म विरुद्ध मानते थे। 17 सितंबर 1951 को स्वामी करपात्री ने संसद भवन का घेराव किया, जिसमें लाठीचार्ज हुआ। बिल पास नहीं हो सका। निराश डॉ अंबेडकर ने अक्टूबर 1951 में मंत्रिमंडल से इस्तीफ़ा दे दिया। वो ऐसे मामले में नेहरू से अधिक गंभीरता और संकल्प की उम्मीद रखते थे। अंबेडकर के इस्तीफ़े के बाद नेहरू यह बिल पास करवाने की कोशिश करते रहे, हालाँकि संघ- हिंदू महासभा के साथ साथ कांग्रेस के कई दिग्गज भी उनकी इस कोशिश के विरोधी थे। इस बीच 1952 का पहला लोकसभा चुनाव घोषित हो गया। ये बिल नेहरू के चुनाव का मुख्य मुद्दा बन गया। जनसंघ और हिंदू महासभा व राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने पहला लोकसभा चुनाव इसी एक मुद्दे पर लड़ा। उन्होंने नेहरू के सामने धर्मगुरु प्रभु दत्त ब्रह्मचारी को उतरे। उस चुनाव में ब्रह्मचारी का एक ही मुद्दा था, सनातन रीति रिवाजों में कोई संवैधानिक बदलाव नहीं होना चाहिए और महिलाओं को धर्म विरोधी अधिकार देने वाला बिल पास नहीं होना चाहिए। नेहरू ने धार्मिक रूढ़िवादियों से लड़ते रहे। उन्होंने इस लोकसभा चुनाव को महिला अधिकारों पर जनमत संग्रह में बदल दिया। चुनाव में नेहरू ने और कांग्रेस ने ज़बरदस्त जीत हासिल की। कांग्रेस को देश भर में 364 सीट मिली, जनसंघ को 3 और हिंदू महासभा को 4 सीट ही मिली थी। नेहरू और डॉ अंबेडकर का महिलाओं को अधिकार देने प्रयास संघ और हिंदू महासभा को चुनाव में हरा कर ही आगे बढ़ा। नेहरू ने हिंदू कोड बिल को चार अलग अलग बिल में बांट कर संसद में पास किया था। आज भारत की महिलायें जो कर सकी हैं, उनकी स्थिति में आज़ादी के बाद जो बदलाव हुआ है, उसमें नेहरू-अंबेडकर की सोच का और संघर्ष का पूरा योगदान है। यदि नेहरू पहला चुनाव इस मुद्दे पर हार जाते, जनसंघ- हिंदू महासभा का उम्मीदवार जीत जाता, तो देश की महिलाओं को न जाने कितने दशक या सदियों तक इंतज़ार करना पड़ता। डॉ अम्बेडकर की निराशा और इस्तीफ़े का कारण RSS- हिंदू महासभा का और दूसरे रूढ़िवादियों का ज़बरदस्त विरोध था।


अंतिम रूप से हम कह सकते हैं अम्बेडकर एक प्रगतिशील, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, सामाजिक समरसता व श्रेष्ठ मानव थे।

जिगर चूरूवी

मुख्यमंत्री जी अशोक गहलोत से भेंट 15 अप्रैल 2023

15.04.2023 संविदा धन्यवाद सभा
15.04.2022 धन्यवाद सभा cmr जयपुर
      मुख्यमंत्री अशोक गहलोत जी के साथ शमशेर गांधी

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत जी,धर्मेंद्र सिंह राठौड़ चेयरमैन RTDC एवं शमशेर गांधी 

                      भेंट की गई तश्वीर
                समय समय की बात है
15 अप्रैल 2023 को माननीय श्री मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के आवास पर मुख्यमंत्री का धन्यवाद और स्वागत समारोह का आयोजन प्रदेश कार्यकारिणी के द्वारा किया गया था जिसमें पूरे राजस्थान से संविदा कर्मियों ने भाग लिया बहुत ही सफल समारोह रहा।
 पिछले 23 से 30 वर्ष तक संघर्ष जारी रहा और सीएम हाउस के अंदर जाने के लिए दुर कि बात हे बीच रास्ते में या फिर गेट पर रोक दी जाता था  मगर कल का नजारा कुछ और ही था वहीं है सी एम हाउस वहीं कर्मचारी हमारे साथियों को पलक पावडे बिछा रहे थे और स्वागत भी कर रहे थे सीएम आवास पहुंचने पर लंबी लंबी कतार में खड़ा होना पड़ा और एक घंटा से डेढ़ घंटा तक लाइन में खड़ा होकर अंदर प्रवेश के लिए सीएम हाउस पर बहुत बड़ा पंडाल टेंट कुशियां लगी हुई थी और एक तरफ हमारे साथियों के लिए मुख्यमंत्री द्वारा चाय नाश्ता वह खाना जिसमें दाल का हलवा गुलाब जामुन सब्जी पूड़ी आदि प्रकार के पकवान बनाए गए थे सबसे पहले सभी साथियों को आह्वान किया गया कि आप पहले खाना खा लो और बाद में समारोह का कार्यक्रम शुरू करेंगे धन्यवाद के पात्र प्रदेश कार्यकारिणी को एवं धन्यवाद उस व्यक्ति को जनों ने पिछले कई सालों से हमारे लिए बहुत ही लंबा संघर्ष लड़ा और कल उस संघर्ष को मंजिल तक पहुंचाने का काम किया बड़े भाई साहब शमशेर खान भालू जिनके द्वारा इस समारोह का सफल आयोजन किया गया और मुख्यमंत्री द्वारा एक से डेढ़ घंटा तक वार्ता की गई मुख्यमंत्री महोदय ने आश्वस्त किया है कि मेरी सरकार में जितना हो सके मैं आपके लिए करने को तैयार हूं और आपको नियमित जल्द ही किया जाएगा धन्यवाद मुख्यमंत्री महोदय को उन्होंने  अपने वाणी से हमारा अभिवादन किया और हमारी समस्या को अच्छी तरह समझा पिछले कई वर्षों से संघर्ष किऐ कई संगठनो  व नेताओं के पीछे चले  मगर किसी संगठन ने हमारा भला नहीं किया कुछ हाथ नहीं लगा धन्य है वह महान व्यक्ति शमशेर खान गांधी जिन्हेंने इस संघर्ष को संघर्षशील बनाते हुए मुख्य मंजिल तक पहुंचाने का काम किया।
 भाई साहब 

शमशेर गांधी
9587243963