Monday, 14 April 2025

✅जलियांवाला बाग हत्याकांड

जलियांवाला बाग़ की कहानी -
भारत में  स्वतंत्रता आंदोलन को दबाने के लिए अंग्रेज़ी सरकार एनार्कीअल एंड रेवोल्यूशनरी क्राइम्स (रौलेट एक्ट) लेकर आई जो ब्रिटिश न्यायधीश सिडनी रौलेट के नाम पर जाना जाता है। यह कानून आज के UAPA कानून जैसा था जिसमें बिना मुकदमा चलाए गिरफ्तारी की जा सकती थी।
इसके विरुद्ध पंजाब में और ख़ास कर अमृतसर में विरोध शुरू हुआ। गांधीजी ने 30 मार्च 1919 को राष्ट्रव्यापी हड़ताल की घोषणा कर दी, जो तैयारी की कमी के कारण अगले रविवार 6 अप्रैल तक स्थगित कर दी गई। अमृतसर में कांग्रेस नेता एडवोकेट सैफुद्दीन किचलू और डाक्टर सत्यपाल के नेतृत्व में 30 मार्च को के दिन हड़ताल हो गई। अमृतसर के लोगों को छह अप्रैल की मीटिंग की सार्वजनिक रूप से कोई जानकारी नहीं दी गई। अंग्रेजों ने स्वामिभक्त रायबहादुरों को तलब कर किसी भी तरह की प्रदर्शन ना होने देने का आदेश दिया। 
05 अप्रैल के दिन सत्यपाल ने प्रस्तावित सभा स्थल में चल रहे क्रिकेट मैच को रुकवाने हेतु अपने घर में करीब दो सौ लोगों की सभा कर अगले दिन हड़ताल की घोषणा कर दी। हड़ताल की सूचना एक से दुसरे नागरिक तक पहुँचती गई और 06 अप्रैल को अमृतसर में शांतिपूर्ण हड़ताल शुरू हुई। सरकार ने एडवोकेट सैफुद्दीन किचलू और डाक्टर सत्यपाल पर सार्वजनिक सभाओं में भाषण देने पर रोक लगा दी। 
09 अप्रैल को रामनवमी के दिन के जुलूस के माध्यम से लोगों ने अंग्रेजों के विरुद्ध एकता प्रदर्शित करने की ठानी। जुलूस में  डाक्टर हाफ़िज़ मोहम्मद बशीर घोड़े पर आगे चल रहे थे और मुस्लिम युवक तुर्की की सैनिक वेशभूषा में संगीत बजाते हुए पीछे चल रहे थे। कांग्रेस खिलाफत आन्दोलन का समर्थन कर रही थी। यह जुलूस जब कटरा आहलूवालिया से गुज़रा तो वहाँ इलाहबाद बैंक की बालकनी पर डिप्टी कमिश्नर माइल्स इरविन खड़े थे, को युवकों का बैंड सलामी देते हुए आगे बढ़ गया। इरविन यह दृश्य देख बुरी तरह डर गया।
10 अप्रैल को डीसी ने समन भेज कर एडवोकेट सैफुद्दीन किचलू और डाक्टर सत्यपाल को बंगले पर बुलाया जहां तत्कालीन एसपी पहले से मौजूद था। दोनों को वहीं गिरफ्तार कर अमृतसर से दूर धर्मशाला (पहले पंजाब अब हिमाचल प्रदेश) की जेल में भेज दिया गया। हंसराज और जयराम सिंह (किचलू के साथी) जो डीसी के घर उनके साथ गये थे ने उनकी गिरफ्तारी की खबर पूरे शह में फैला दी।
एडवोकेट किचलू और डाक्टर सत्यपाल की गिरफ्तारी के खिलाफ लोग जमा होने लगे। उस समय सभी धर्म के लोग पगड़ी बांधते थे पर उस दिन विरोध और शोक व्यक्त करने हेतु किसी ने पगड़ी और जूते नहीं पहने। हजारों लोग भंडारी पुल (तब का रेलवे ब्रिज) पर जमा होने लगे। उस समय वहाँ से कई ब्रिटिश अधिकारी गुज़रे जिनमें नार्मल स्कूल की टीचर इंजिनियर जारमन भी थे। भीड़ ने उन्हें कुछ नहीं कहा। भीड़ डीसी के आफिस जाकर एक ज्ञापन देना चाहती थी कि हमारे नेताओं को रिहा किया जाए | पुलिस और जनता के बीच मध्यस्थता का काम दो लोग गुरुदयाल सिंह सलारिया और मकबूल महमूद कर रहे थे। लेकिन पुलिस ने भीड़ पर गोली चला दी, मकबूल महमूद के पाँव में गोली लगी।  सरकारी रिकार्ड के अनुसार इस गोलीबारी में तीस घायल एवं दस व्यक्ति मारे गए। सभी लोगों के सीने में गोली लगी थी। कोई भी पीठ दिखा कर नहीं भागा सबने सीने पर गोली खाई।
दस अप्रैल को इस घटना के विरुद्ध इकट्ठे हुए लोगों ने दो बैंकों को आग लगा दी। एक सरकारी गोदाम और एक छोटे रेलवे स्टेशन भक्तांवाली को भी आग लगा दी गई। एक ब्रिटिश लेडी टीचर मिस शेरवुड की पिटाई कर दी है। इसके बाद क्रोधित भीड़ ने एक ब्रिटिश बैंक मेनेजर और एक अन्य रेलवे स्टेशन मास्टर की हत्या कर दी गई।
घायल और मारे गए सभी लोगों की लाशें पास ही की जामा मस्जिद में रखी गई जो धार्मिक एकता की भावना का प्रतीक बना। पुलिस ने अगले दिन कब्रिस्तान और श्मशान तक शवों के पीछे जुलूस निकालने पर पाबन्दी लगा दी, बावजूद इसके शहीदों के पीछे बड़ी तादाद में लोग शामिल हुए और जनाजे व अर्थियों पर फूल बरसाए।
उस समय पंजाब का प्रशासनिक मुख्यालय लाहौर था, ज हाँ का लेफ्टिनेंट गवर्नर माइकल ओ डायर था | डीसी ने उसे खबर भेजी कि यहाँ निकट भविष्य में कोई बड़ी बगावत हो सकती है। इस संभावित बगावत को रोकने के लिए जालंधर से ब्रिगेडियर जनरल डायर ग्यारह अप्रैल को अपनी टुकड़ी को लेकर अमृतसर आ गया और रेलवे स्टेशन पर ही कैम्प लगा लिया।
बारह अप्रैल को जनरल डायर ने जनता को डराने के लिए सिपाहियों के साथ फ्लैग मार्च किया। सुलतानविंड गेट के पास एकत्रित ग्रामीणों ने फ्लैग मार्च की खिल्ली उड़ाई और सैनिकों की तरफ नफ़रत से थूकना शुरू कर दिया। जनरल डायर ने रात का कर्फ्यू लगाकर सभा करने पर रोक लगा दी।
तेरह अप्रैल को जनरल डायर ने पूरे शहर में मुनादी करवा दी कि कोई भी सभा ना की जाए।
कांग्रेस नेता चौधरी बुग्गामल और आर्य समाजी महाशय रतनचंद रत्तो ने तेरह अप्रैल को बैठक का एलान कर दिया। शहर के बल्लो हलवाई ने अपनी दूकान से एक पीपा उठाया और शहर में घूम - घूम कर जलियांवाला बाग़ में शाम को चार बजे बैठक की मुनादी करना शुरू कर दी।
चार बजे शहर के लोग जलियाँवाला बाग़ में जमा होने लगे। बैसाखी होने के कारण मेले में आये हुए लोग भी वहाँ पहुंच गए जिनमें बच्चे और बुज़ुर्ग शामिल थे | जनरल डायर ने सैनिकों को मुख्य चौराहों पर तैनात की और एक टुकड़ी लेकर जलियाँवाला बाग़ पहुंचा। बाग़ में आने और जाने का एक ही रास्ता था जिसे रोकने हेतु सिपाही तैनात कर खुद मशीन गन और बाकी सैनिकों को लेकर बाग़ के प्रवेश द्वार के पास खड़ा हो कर डायर ने मशीनगन से भीड़ पर बिना किसी चेतावनी के फायरिंग शुरू कर दी।
लोग बचने के लिए एक कुँए में कूदने लगे। कुआं भी लाशों से भर गया | दीवारों पर चढ़ कर बचने की कोशिश करने वालों की तरफ मशीनगन घुमा कर फायरिंग की गई। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 379 लोग इस गोलीकांड में शहीद हुए। कांग्रेस के अनुसार एक हजार लोग मारे गए।
इस घटना के बाद गांधीजी ने घोषणा की कि अब अंग्रेज़ी राज एक पाप बन गया है जिसे उखाड़ना ही एक मात्र विकल्प है। देश में जलियाँवाला बाग़ की मिट्टी लोग भर कर ले गये | इस मिट्टी की कसम खाकर भविष्य के कई स्वतन्त्रता सेनानी और शहीद बने जिनमें भगत सिंह एवं ऊधम सिंह का नाम प्रमुख है |
ऊधम सिंह ने इंग्लैण्ड जाकर फायरिंग का आदेश देने वाले लेफ्टिनेंट गवर्नर माइकल ओ डायर को गोली मारकर जान ले ली।
गिरफ्तार होने के बाद ऊधम सिंह ने अपना नाम बताया था राम मोहम्मद सिंह आज़ाद जो सभी भारतीयों को एकता का
सन्देश देने के लिए उन्होंने रखा था।
भगत सिंह जी की कहानी आगे के ब्लॉग में।
स्रोत - 
1.परमिंदर सिंह पूर्व प्राध्यापक गुरु नानक देव पंजाब विश्वविद्यालय से वार्ता अनुसार।
2. विभिन्न पत्रिकाएं 
शमशेर भालू खां 
जिगर चुरूवी 
9587243963

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