उपनाम - आज़ाद
पिता का नाम - पंडित सीताराम तिवारी (पूर्वज बदरका वर्तमान उन्नाव जिला,बैसवारा से थे)।
माता का नाम - जगरानी देवी
जाति - ब्राह्मण (तिवारी)
जन्म स्थान - भाबरा (अब आजादपुर) अलीराजपुर जिला, मध्यप्रदेश (आदिवासी क्षेत्र)
जन्म : 23 जुलाई 1906
मृत्यु : 27 फरवरी 1931
शांत स्थान - अल्फ्रेड पार्क, प्रयागराज (इलाहाबाद)
मृत्यु का कारण - अंग्रेजों द्वारा पकड़े जाने से पूर्व स्वयं को गोली मार ली।
शारीरिक बनावट - बड़ी-बड़ी आंखें, पुष्ट शरीर पर जनेऊ, मझला कद, गोल चेहरा, तनी हुई नुकीली मूछें और घने काले सर पर बाल।
संगठन - हिदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन
नारा - आज़ाद हूँ, आज़ाद रहूँगा और आज़ाद ही मरूँगा।
1921 के असहयोग आंदोलन में जेल में लिखवाया पता - मेरा नाम आजाद और पिता का नाम स्वतंत्रता और मेरा पता जेल है।
शिक्षा - बनारस
हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन -
शिक्षा के समय ही आजाद क्रांतिकारियों के सम्पर्क में आकर क्रान्तिकारी दल में शामिल हो गए।
1. पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल
2. शचीन्द्रनाथ सान्याल
3. योगेशचन्द्र चटर्जी
4. मन्मथनाथ गुप्त
5. प्रणवेश चटर्जी
गांधी से नाराज हो कर वर्ष 1924 में इन्होंने उत्तर भारत के क्रान्तिकारियों को लेकर एक दल हिन्दुस्तानी प्रजातान्त्रिक संघ (HRA) का गठन किया। एच० आर० ए०" के गठन के अवसर से ही इन तीनों प्रमुख नेताओं - बिस्मिल, सान्याल और चटर्जी में इस संगठन के उद्देश्यों को लेकर मतभेद था। चन्द्रशेखर आज़ाद भी इस दल में शामिल हो गये। यह संगठन अमीर घरों में डकैतियाँ डालकर क्रांति हेतु धन की व्यवस्था करता था। इस में यह तय किया गया कि किसी भी औरत पर हाथ नहीं उठाया जाएगा। एक गाँव में राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में डाली गई डकैती में जब एक औरत ने आज़ाद का पिस्तौल छीन लिया तो अपने बलशाली शरीर के बावजूद आज़ाद ने अपने उसूलों के कारण उस पर हाथ नहीं उठाया। इस डकैती में क्रान्तिकारी दल के आठ सदस्यों पर, जिसमें आज़ाद और बिस्मिल भी शामिल थे, पूरे गाँव ने हमला कर दिया। बिस्मिल ने मकान के अन्दर घुसकर उस औरत के कसकर चाँटा मारा, पिस्तौल वापस छीनी और आजाद को डाँटते हुए खींचकर बाहर लाये। इसके बाद दल ने केवल सरकारी प्रतिष्ठानों को ही लूटने का फैसला किया। 01 जनवरी 1925 को दल ने द रिवोल्यूशनरी (क्रान्ति) नाम का पर्चा पूरे भारत में बाँट कर अपने उद्देश्यों को सार्वजनिक किया। पोस्टर में सशस्त्र क्रान्ति की चर्चा लेखक विजयसिंह के छद्म नाम से की गई। शचींद्रनाथ सान्याल इस पोस्टर को बंगाल में लगाने जा रहे थे, बाँकुरा में पकड़े गए और जेल भेज दिए गए।
जब शाहजहाँपुर में इस योजना के बारे में चर्चा करने के लिये मीटिंग बुलायी गयी तो दल के एक मात्र सदस्य अशफाक उल्ला खाँ ने इसका विरोध किया था। उनका तर्क था कि इससे प्रशासन उनके दल को जड़ से उखाड़ने पर तुल जायेगा और ऐसा ही हुआ भी। अंग्रेज़ चन्द्रशेखर आज़ाद को तो पकड़ नहीं सके पर 17 दिसंबर 1927 को क्रांतिकारी राजेंद्र लाहिड़ी को फांसी दे कर हत्या कर दी गई। राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्ला खाँ एवं ठाकुर रोशन सिंह 19 दिसम्बर 1927 को गिरफ्तार कर लिया गया। प्रमुख कार्यकर्ताओं के पकड़े जाने एवं मुकदमे के कारण दल निष्क्रिय हो गया। एकाध बार बिस्मिल तथा योगेश चटर्जी आदि क्रान्तिकारियों को छुड़ाने की योजना भी बनी जिसमें आज़ाद के अलावा भगत सिंह भी शामिल थे लेकिन किसी कारण वश यह योजना पूरी न हो सकी।
चार क्रान्तिकारियों को फाँसी और सोलह को कड़ी कैद की सजा के बाद चन्द्रशेखर आज़ाद ने उत्तर भारत के सभी कान्तिकारियों को एकत्र कर 08 सितम्बर 1928 को दिल्ली के फीरोज शाह कोटला मैदान में एक गुप्त सभा का आयोजन किया। इसी सभा में भगत सिंह को दल का प्रचार-प्रमुख बनाया गया। इसी सभा में यह भी तय किया गया कि सभी क्रान्तिकारी दलों को अपने-अपने उद्देश्य इस नयी पार्टी में विलय कर हिंदुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसियेशन का नाम बदलकर हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसियेशन रखा गया। चन्द्रशेखर आज़ाद ने सेना-प्रमुख (कमाण्डर-इन-चीफ) का दायित्व सम्हाला। इस दल के गठन के पश्चात् एक नया लक्ष्य निर्धारित किया गया - "हमारी लड़ाई आखरी फैसला होने तक जारी रहेगी और वह फैसला है जीत या मौत। गांधी की सविनय विचारधारा के विपरीत यह संगठन सशस्त्र आंदोलन का पक्षधर था। हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी (HSRA) के सेंट्रल कमेटी मेम्बर वीरभद्र तिवारी अंग्रेजो के मुखबिर बन गए और आजाद की मुखबिरी करने लगे। संगठन के क्रांतिकारी साथी रमेश चंद्र गुप्त ने उरई में तिवारी पर गोली चलाई पर वीरभद्र तिवारी बच गए। गुप्त को गिरफ्तार कर 10 वर्ष कारावास की सजा दी गई।
शिक्षक एवं प्रशिक्षक के रूप में चंद्रशेखर -
चंद्रशेखर आजाद ने पंडित हरिशंकर ब्रह्मचारी के छ्द्म नाम से कुछ समय के लिए झांसी में क्रांतिकारी गतिविधियां शुरू की। झांसी से पंद्रह किलोमीटर दूर ओरछा के जंगलों में साथियों को निशानेबाजी सिखाते एवं पढ़ाते थे। यहां उन्होंने गाड़ी चलाना सीखा।
वेष बदलने में माहिर आजाद -
काकोरी काण्ड में फरार होने के बाद उन्होंने छिपने हेतु साधु का वेष बनाना सीख लिया। एक बार वे दल के लिये धन जुटाने हेतु गाज़ीपुर में मरणासन्न साधु के पास चेला बनकर रहे ताकि उनके मरने के बाद मठ की सम्पत्ति दल को मिल जाए। परन्तु वहाँ जाकर जब उन्हें पता चला कि साधु उनके पहुँचने के पश्चात् मरणासन्न नहीं रहा अपितु और अधिक हट्टा-कट्टा होने लगा तो वे वापस आ गये। प्राय: सभी क्रान्तिकारी उन दिनों रूस की क्रान्तिकारी कहानियों से अत्यधिक प्रभावित थे आजाद भी थे लेकिन वे खुद पढ़ने के बजाय दूसरों से सुनने में ज्यादा आनन्दित होते थे। एक बार दल के गठन के लिये बम्बई गये तो वहाँ उन्होंने कई फिल्में भी देखीं। उस समय मूक फिल्मों का ही प्रचलन था अत: वे फिल्मो के प्रति विशेष आकर्षित नहीं हुए।
आजादी के आंदोलन का घटनाक्रम -
वर्ष 1921 के असहयोग आंदोलन में गिरफ्दारी के अलावा, आजाद कभी फिरंगियों के हाथ नहीं लगे, जब घेर लिया गया तो खुद की पिस्तौल से खुद को गोली मार कर शहीद हो गए। जलियांवाला बाग नरसंहार के समय आजाद बनारस में पढ़ाई कर रहे थे। वर्ष 1921 में गांधी के असहयोग आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। उन्हें गिरफ्तार भी किया गया लेकिन हर हाल में वह वन्दे मातरम और महात्मा गांधी की जय ही बोलते रहे। अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर अदालत में पेश किया। जज ने परिचय पूछा गया तो कहा-
नाम - आजाद, पिता का नाम - स्वतंत्रता, पता - जेल।
जब गांधीजी द्वारा वर्ष 1922 में चौरीचौरा कांड में 21 पुलिस कांस्टेबल और 1 सब इंस्पेक्टर के मारे जाने से दु:खी होकर असहयोग आंदोलन को बंद कर दिया तो आजाद की विचार धारा में बदलाव आया और वे क्रान्तिकारी गतिविधियों से जुड़कर हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के सक्रिय सदस्य बन गए। रामप्रसाद बिस्मिल और चंद्रशेखर आजाद ने साथी क्रांतिकारियों के साथ मिलकर ब्रिटिश खजाना लूटने और हथियार खरीदने हेतु काकोरी ट्रेन डकैती कांड को अंजाम दिया। इस घटना ने ब्रिटिश सरकार को हिलाकर रख दिया था। वर्ष 1925 के दिन 9 अगस्त को शाम के समय सहारनपुर से लखनऊ पैसेंजर एक्सप्रेस आ रही थी। इस ट्रेन में लखनऊ से पहले काकोरी स्टेशन पर 10 क्रांतिकारी सवार हुए और ट्रेन को लूट लिया गया। लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला लेने के लिए आजाद, राजगुरु और भगत सिंह ने योजना बनाई। 17 दिसंबर, 1928 को आजाद, भगत सिंह और राजगुरु ने शाम के समय लाहौर में पुलिस अधीक्षक के दफ्तर को घेर लिया और ज्यों ही जे.पी. सांडर्स (जलियांवाला बाग हत्याकांड में फायरिंग का आदेश देने वाला अंग्रेज अफसर) अंगरक्षक चन्नन सिंह के साथ मोटर साइकिल पर सवार हो कर निकले, राजगुरु ने पहली गोली दाग दी। फिर भगत सिंह ने आगे बढ़कर 4 से 6 गोलियां दागी। जब सांडर्स के अंगरक्षक ने उनका पीछा किया, तो चंद्रशेखर आजाद ने अपनी गोली से उसे मार डाला। इसके बाद लाहौर में जगह-जगह पोस्टर लगे कि लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला ले लिया गया है।
27 फरवरी 1931 के दिन इलाहाबाद के एल्फ्रेड पार्क में उनके मित्र सुखदेव राज ने बुलाया जिसकी सूचना किसी ने सूचना पुलिस को दे दी। वो बात कर ही रहे थे कि पुलिस ने उन्हें घेर लिया और गोलियां दागनी शुरू कर दी। दोनों ओर से गोलीबारी हुई, चंद्रशेखर आजाद ने अपने जीवन में ये शपथ ले रखी थी कि वो कभी भी जीवित पुलिस के हाथ नहीं आएंगे। उनके पास आखिरी गोली बची थी, आखिर में उन्होंने स्वयं को गोली मार ली।
जिस पार्क में उनका निधन हुआ था आजादी के बाद इलाहाबाद के उस पार्क का नाम बदलकर चंद्रशेखर आजाद पार्क और मध्य प्रदेश के जिस गांव में वह रहे थे उसका नाम बदलकर आजादपुरा रखा गया है।
कुछ तथ्य कुछ बात पड़ताल अभी बाकी -
आजाद और नेहरू की मुलाकात आनंद भवन में हुई थी। इस मुलाकात के बारे में कहा जाता है कि नेहरू ने आज़ाद को दल के सदस्यों को समाजवाद के प्रशिक्षण हेतु रूस भेजने के लिये एक हजार रुपये दिये थे जिनमें से 448 रूपये आज़ाद की शहादत के समय उनके पास मिले थे। कहा जाता है कि सुरेन्द्रनाथ पाण्डेय तथा यशपाल का रूस जाना तय हुआ पर 1928 से 1931 के बीच धर पकड़ एवं हत्याओं का लंबा सिलसिला चला कि दल लगभग बिखर सा गया। कुछ लोगों के अनुसार यह सच नहीं है।
इच्छा के विरुद्ध कार्य पर भी साथियों के साथ रहे आजाद -
चन्द्रशेखर आज़ाद की इच्छा के विरुद्ध भगत सिंह ने एसेम्बली में बम फेंकने की योजना बनाई टैब आज़ाद पर दल की पूरी जिम्मेवारी आ गई थी। साण्डर्स वध में भी उन्होंने भगत सिंह का साथ दिया और बाद में उन्हें छुड़ाने की पूरी कोशिश की। आज़ाद की सलाह के खिलाफ जाकर यशपाल ने 23 दिसम्बर 1929 को दिल्ली के नज़दीक वायसराय की गाड़ी पर बम फेंका तो इससे आज़ाद क्षुब्ध थे क्योंकि इसमें वायसराय तो बच गया था पर कुछ और कर्मचारी मारे गए थे। आज़ाद को 28 मई 1960 को भगवती चरण वोहरा की बम-परीक्षण में हुई शहादत से भी गहरा आघात लगा था। इसके कारण भगत सिंह को जेल से छुड़ाने की योजना खटाई में पड़ गई। भगत सिंह, सुखदेव तथा राजगुरु की फाँसी रुकवाने के लिए आज़ाद ने दुर्गा भाभी को गांधीजी के पास भेजा पर सहायता नहीं मिली। आज़ाद ने अपने बलबूते पर झाँसी और कानपुर में अड्डे बना लिये थे। झाँसी में मास्टर रुद्र नारायण, सदाशिव मलकापुरकर, भगवानदास माहौर तथा विश्वनाथ वैशम्पायन थे जबकि कानपुर में पण्डित शालिग्राम शुक्ल सक्रिय थे। शालिग्राम शुक्ल को 01 दिसम्बर 1930 को पुलिस ने आज़ाद से एक पार्क में मिलने जाते समय गोली मार कर शहीद कर दिया।
जवाहर लाल नेहरू ने लिखा है कि -
असहयोग आंदोलन का फरमान जारी होते ही छात्र ज्वालामुखी की तरह सड़कों पर आ गए जिनमें 15 साल की आयु का एक लड़का चन्द्रशेखर भी शामिल था जो खुद को आजाद कहता था। गिरफ़्तार चंद्रशेखर को 15 बेतों की सज़ा मिली। उसे नंगा किया गया और बेंत की टिकटी से बाँध दिया गया। बेत एक एक कर उस पर पड़ते और उसकी चमड़ी उधेड़ डालते पर वह हर बेंत की मार के साथ भारत माता की जय बोलता जब तक कि वह बेहोश नहीं हो गया। बाद में वही लड़का उत्तर भारत के क्रान्तिकारीयों का बड़ा नेता बना।
स्मृतियों में आजाद -
आजाद, आप आजाद थे, आजाद है।
गोलियां से जिस्म मिटे रूह जावेद रही
शहीद, जन्नत की वादियों में शाद है।
जिगर चुरूवी
शमशेर भालू खां
9587243963
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