लघुकथा - समय की करवट
गांव जगदलपुर के लोग अपनी अच्छाई और आतिथ्य सत्कार के लिए प्रसिद्ध थे। यहां आने वाला हर व्यक्ति यहां के लोगों की मीठी बोली और आदर - भाव के कारण उनका हो कर रह जाता था। सुख सुविधाओं से सम्पन्न गांव के लोग खेती - बाड़ी पर निर्वाह करते थे। मणि इसी गांव का प्रतिष्ठित किसान था।
अच्छा बड़ा मकान, बढ़िया रहन - सहन और संतान के उत्तम संस्कार मणि की जीवटता को परिभाषित करते थे।
मणि के बड़े बेटे राजू का रिश्ता निकट के गांव अच्छापुर हुआ था। अच्छापुर कहने को तो अच्छापुर था पर यहां के लोग चालाक, चतुर एवं स्वार्थी अधिक थे। मणि के सगोजी हर्ष कुमार का खेत से आते समय दुर्घटना से निधन हो गया। मुसीबत के समय रिश्तेदारी निभाते हुए उसने हर संभव सहायता की। कुछ ही दिनों में परिवार दुःख की दिवारों से निकलकर अच्छी स्थिति में आया तो मणि ने बिना किसी लेन - देन के राजू का विवाह संपन्न करवाया। समधन मणि की प्रशंसा करते नहीं अघाती थी।
मणि जब भी अच्छापुर बेटे की ससुराल आता कुछ ना कुछ ले कर आता, समधन और उसका परिवार उसका बड़े मान सम्मान से सत्कार करते।
समय बीतता गया, बीतते समय ने संबंध स्थिर व स्थाई कर दिए। राजू खेती बाड़ी में पिता से भी एक कदम आगे था, वह खेत में जैविक खाद से सब्जियां उगाता। राजू के नाम से उसकी सब्जियां हाथों हाथ अच्छे दामों में बिक जातीं।
समय ने पलटी मारी, 26 जनवरी के दिन आए लातूर भूकंप के कारण राजू के क्षेत्र की जमीन का पानी ना जाने कहां गायब हो गया। उसने कुएं को ओर गहरा करवाया पर सब सूखा। जो पानी 150 फुट पर था 700 फुट खोदने पर भी नहीं मिला। इस क्षेत्र की बंद गोबी की फसल बंबई तक जाया करती थी, अब समाप्त हो गई।
हरे भरे खेत बंजर और वीरान हो गए।
धीरे - धीरे जगदलपुर पिछड़ता चला गया। किसान मजदूरी की तलाश में गांव छोड़ने लगे। राजू भी शहर में कमाने निकल गया।
एक दिन राजू की बहु नमिता गरीबी से तंग आ कर पीहर चली गई।
मणि ने खूब कोशिश की कि बहु घर आ जाए पर बात नहीं बनी।
एक दिन बातचीत कर मामला सुलझाने हेतु उसने समधन के घर का रुख किया। शाम के झुरमुट पहर में फटे हाल मणि पैदल ही अच्छापुर की ओर चल पड़ा। लंबा रास्ता तय करते - करते अंधेरा हो गया।
दरवाजा खटखटाया, बहू ने दरवाजा खोला, पहले जिस घर में उसके आने से उल्लास और सरगर्मियां बढ़ जाती थीं, आज वैसा माहौल नहीं था। बैठक में एक तरफ पड़ी खाट पर बैठा मणि जंगले से फूट रही चांद की चांदनी को निहार रहा था।
कुछ देर बाद नमिता का भाई पंकज आया, बिना रामा - श्यामा के पानी का लौटा पकड़ा कर चलता बना। यह वही पंकज था जो उछल कर मणिसा - मणिसा कहते हुए उनसे चिपट जाया कर दस का नोट लिए बिना नहीं हिलता था।
घंटे भर बाद समधन जी थाली में खाना ले कर आईं। खाना परोसते हुए कहने लगीं -
"घणा मो'ड़ आया सागोजी सांझ ढलगी
अंधे 'र मं बणाई खिचड़ी बलगी।"
एक समय माल पुए परोसने वाली सगीजी ने मुंह बनाते हुए खिचड़ी परोसी।
मणि ने चाव से खिचड़ी खाते हुए समधन को नमिता को ले जाने हेतु आने के बारे में बताया। समधन ने साफ कह दिया अब उसे नहीं भेजा जायेगा। मेरी बेटी दुःख सासरे में नहीं रह सकती शाहजी, समधन ने तपाक से कहा और थाली उठा कर चली गई।
मणि के लिए रात काटना मुश्किल हो गया, वो अंधेरे में ही वापस चलने लगा। समधन ने ऊपरी मन से भी उसे रुकने को नहीं टोका। भारी मन से वह वापस चल पड़ा।
रात को देर से घर आने और आते - जाते थकान के कारण उसे दालान में पड़ी खाट पर न जाने कब नींद आ गई पता ही नहीं चला। सूरज चढ़े दरवाजे पर जोर - जोर की खटखटाहट ने उसे नींद से जगाया।
आंखे मिचलते मिचलते उसने दरवाजा खोला।
सामने हरु डाकिया थैला लिए खड़ा था। क्या बात है भाई, सुबह सुबह क्या ले आए, अंदर बुलाते हुए मणि ने हरु से कहा। शहर से राजू का कागद आया है। हरु ने जवाब दिया। अच्छा पढ़कर सुना दे भाई, क्या लिखा है, मेरा चश्मा टूटने से पढ़ने में दिक्कत होती है। हरु ने कागद पढ़ना शुरू किया -
"पूज्य पिताजी प्रणाम, मुझे यहां एक कारखाने में गेटमैन का काम मिल गया है। मेरा मालिक बहुत अच्छा आदमी है, उसने रहने - सहने का सब बंदोबस्त यहीं फैक्ट्री में कर दिया है। खाना पास के ढाबे में खा लेता हूं, आप चिंता मत करना।" आगे कागद पढ़ते हुए हरु उछल पड़ा
"पिताजी, मैने कुछ दिन पहले एक लाटरी का टिकट खरीदा था, परमात्मा की कृपा से पांच करोड़ की लाटरी लग गई है, लाटरी के ईनाम के पैसे लेने के लिए आपको शहर आ कर बैंक खाता खुलवाना है। आप कागद मिलते ही अगले दिन शहर चले आना। इस पत्र के साथ मेरी पहले महीने की पगार में से 500 रुपया मनी आर्डर भेज रहा हूं।
खबर गांव में आग की तरह फैल गई।
गांव में हाका फट गया -
"राजू की पांच करोड़ की लाटरी लग गई, राजू की पांच करोड़ की लाटरी लग गई।"
फैलती - फैलती यह बात अच्छापुर भी पहुंच गई। नमिता ने खबर सुनते ही मां से ससुराल जाने की जिद करने लगी। मां ने जल्दी जल्दी विदाई की तैयारी करते मणि को बुलवाने हेतु गाड़ी भिजवाई।
हलवा, पूरी, मालपुए और तरह - तरह के व्यंजन तैयार किए गए। मणि बिना किसी देरी के बहु को लेने आ पहुंचा।
हलवा परोसती समधन ने थोड़ा ओर लेने की जिद की तो मणि कह उठा -
"परवा चाली पून मतिरी पलगी
धबसा - धबसा घाल सगीजी बा बरिया टलगी।"
शिक्षा - समय सदैव एक जैसा नहीं रहता, कभी धूप कभी छांव।
जिगर चूरूवी
शमशेर भालू खां सहजूसर
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