Sunday, 28 December 2025

01. मीरातुल जिगर (दीवान ए जिगर) (हिंदी/उर्दू गज़ल संग्रह 01) 75 गजल पूर्ण


शायर का ताअरूफ - 
नाम - शमशेर खान 
उपनाम - प्रेम, शमशेर गांधी
तखल्लुस - पहले परवाना नाम से लिखना शुरू किया। पत्नी अख्तर बानो (सदफ) के सुझाव पर जिगर चूरूवी नाम से लिखना शुरू किया।
पैदाइश - 18.04.1978 सहजूसर, चूरू (राजस्थान)
पिता का नाम - श्री भालू खां (पूर्व विधायक (1980 से 1985), चूरू।
माता का नाम - सलामन बानो (गृहणी)
ताअलिम - 
1. रामावि सहजूसर में पहली कक्षा में दाखिला 10.07.1984 से 1993 में मेट्रिक तक।
2. राउमावि बागला, चूरू से हेयर सेकंडरी 1993 से 1995 तक
3. राजकीय शिक्षक प्रशिक्षण विद्यालय भाषाई अल्पसंख्यक अजमेर से BSTC, 1995 से 1997
4. राजकीय लोहिया महाविद्यालय चूरू से स्वयंपाठी के रूप में स्नातक 1998 से 2001 तक (महाराजा गंगा सिंह विश्वविद्यालय, अजमेर)
5. राजकीय लोहिया महाविद्यालय चूरू से स्वयंपाठी के रूप में अधिस्नातक 2004 से 2005 तक (महाराजा गंगा सिंह विश्वविद्यालय बीकानेर से गोल्ड मेडलिस्ट - 2005 उर्दू साहित्य)
6. कश्मीर विश्वविद्याल, श्रीनगर के नंद ऋषि शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय से B.Ed.- (2007 - 8)
7. इंदिरा गांधी मुक्त विश्वविद्यालय से विशेष आवश्यकता विद्यार्थियों के शिक्षण हेतु विशेष अध्ययन - 2012
8. वर्तमान में LLB में प्रवेश (13.08.2025 से)
विवाह - पत्नी अख्तर बानो (सदफ) से 20.10.1996 में विवाह हुआ।
संतान - तीन पुत्रियां
1. अंजलि खान (LLM)
2. रोजा खान (BSC Nursing) सेवारत 
3. प्रेरणा खान (BSC Nursing) सेवारत
व्यवसाय - 
1. निजी विद्यालय शिक्षक एवं विद्यालय संचालन - 1997 से 1999
2. राजकीय सेवा तृतीय श्रेणी अध्यापक 10.07.1999 से 14.12.2014 तक
3. द्वितीय श्रेणी शिक्षक 14.12.2014 से 01.09.2023 तक
4. स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति 01.09.2023 से
पद - 
1. तहसील अध्यक्ष - शिक्षक संघ शेखावत, चूरू
2. जिला मंत्री शिक्षक संघ शेखावत चूरू 
3. प्रदेशध्यक्ष, सर्व शिक्षा अभियान कर्मचारी संघ, राजस्थान
4. प्रदेशाध्यक्ष, युवा मुस्लिम महासभा, राजस्थान
5. प्रदेश संयोजक, राजस्थान तृतीय भाषा बचाओ आंदोलन 
6. प्रदेश संयोजक, संविदा मुक्ति आंदोलन राजस्थान
7. प्रदेश सचिव अखिल भारतीय कांग्रेस सेवादल 2024 से
8. जिलाध्यक्ष शिक्षक प्रकोष्ठ कांग्रेस, चूरू 2025 से
9. संयोजक चूरू विधानसभा समस्या एवं समाधान समिति, चूरू
आंदोलन - 
1. संविदा मुक्ति आंदोलन 
2. दांडी यात्रा
3. सामाजिक सरोकार
पुस्तकें - 
1. मिरातुल जिगर
2. हृदयांश (हिंदी कविता संग्रह)
3. कालजे री कोर (राजस्थानी कविता संग्रह)
4. कसासुल जिगर -  गजल समूह
5. मिनाज ए जिगर - नज़्म संग्रह
6. मूलांश
07. इमरान ए जिगर
प्रस्तुत पुस्तक के बारे में - 
लेखक ने उर्दू, हिंदी, मारवाड़ी भाषा की लगभग सभी विधाओं में कलम आजमाई है। प्रस्तुत दीवान शमशेर भालू खां का प्रथम प्रयास है। लेखक का मत है कि वर्तमान समय में काव्य में शुद्ध भाषा एवं शख्त बहर, गेयता और माप का चलन संभव नहीं है। इस दौर में भाषाओं के कुछ शब्द इस तरह से घुलमिल गए हैं कि उन्हें एक भाषा में बांधना शब्द के साथ अन्याय होगा। हिंदी - उर्दू दोनों भाषाओं में सम्मिलित ग़ज़ल, गीत, कविता एवं छंदों का उपयोग आम बात हो गई है। 
अतः हमें बंधनों को तोड़ते हुए सम्मिलित विधाओं में सभी भाषाओं का मेल करते हुए साहित्य सृजन करना चाहिए।
अंत में लेखक के कथन अनुसार उन्होंने इस किताब को किसी भी बंधन से मुक्त रखते हुए भावों को जनता तक पहुंचाने का एक छोटा सा प्रयास किया है।


फेहरिस्त
देबाचा 
01. पेशकश -  काट देना...
02. सना -- मूसा और खुदा ...
            गजल
03. अब मुझे ........
04. आजादी के दीवाने.........
05. बड़ी दूर की.....
06. भटकती राहें -------- 
07. पहले इम्तिहान...........
08. फिर मिलेंगे.......
09. तकदीर बदलते देखा..........
10. समंदर क्यों है......
11. थपेड़े जिंदगी के..........
12. सना हो बयां.........
13. टुकड़े गजल के ......
14. जाने कब......
15. झूठा ना कहो............?
16. चहकते परिंदे........
17. छोड़ मय की गली..........
18. छेड़ के उमंग.........
19. हसीन एक ख़ाब......
20. हाल ए जार......
21. खुदा जाने.....
22. दर पेश.......
23. दिन कर्ज में......
24. डर की शिद्दत.........
25. धरे हैं हाथ हाथों पर...........
26. रुके मुसाफिर चल उठे.......
27. जिंदगी का फलसफा.......
28. सिले लब.........
29. शर्मिंदा हो........
30. सनम हाय........
31. जिद्दी..............
32. तौक गले में...........
33. जिया आईनों की.............
34. अर्क ए जिगर.....
35. गनीमत...........
36. क्यों यह नींद........
37. खाली हाथ......
38. क़र्ज का एहसान.........
39. गहरी नींद .......
40. घर आओ मेरे.......
41. लोथड़े से बना........
42. मुझ गरीब का........
43. मुख्तसर मुलाकात.......
44. नामे वफ़ा..........
45. फानूश चराग़............
46. वक्ते कुर्बानी..........
47. हम पे खुदा..........
48. यूं आहिस्ता......
           गजल 
49. उसने नाम लिया......
50. कुदाल खेतों में.....
51. तुझे दास्तां........
52. बेपर.......
53. उम्मीद............
54. नगीने जवाहरात.....
55. चलिए......
56. कमतरी मेरी ताक़त 
57. मिट्टी की दीवार
58. मासूम आरज़ू......
59. क्या खूब..........
60. गजल - जब मुझे ...
61 हम पे खुदा मेहरबान.....
62. तुझे गोद में बैठा के......
63. सच झूठ.......
64. आज है वो कल......
65. खबर नए साल की......
66. मुंह में राम........
67. खंजर की दरकार.......
68. एक मुद्दत.......
69. थोड़ी........
70. यकीं करना होगा......
71. दिल का मामला......
72. छोड़ मय की गली.......
73. परिंदों को........
74. इतना करम.....
75. ओर थे....

                दीबाचा
दीवान-ए-जिगर - 
शायरी इंसान के दिल की धड़कनों और जमाने के हालात का आईना होती है। यह सिर्फ़ अल्फ़ाज़ का खेल नहीं, बल्कि रूह की पुकार, ज़िंदगी के तजुर्बात और इश्क़-ओ-मोहब्बत की दास्तान भी है। इस दीवान में "जिगर चुरूवी" की ग़ज़लें और नज़्में उसी पुकार का जवाब हैं।
जिगर चुरूवी की शायरी में इश्क़ की मासूमियत भी है और हक़ीक़त का तड़पता हुआ दर्द भी। इसमें समाज की तल्ख़ हक़ीक़तें भी झलकती हैं और इंसानियत का पैग़ाम भी। अल्फ़ाज़ की सादगी और तासीर इन्हें सीधा दिल से जोड़ देती है।
यह दीवान महज़ शायरी का संग्रह नहीं है, बल्कि एक ज़िंदगी की किताब भी है — जिसमें मोहब्बत, जद्दोजहद, तन्हाई, रूहानियत और इंसानियत के रंग साफ़ दिखाई देते हैं।
पाठक इस दीवान को पढ़ते हुए सिर्फ़ अशआर का लुत्फ़ ही नहीं उठाएँगे, बल्कि एक सोच, एक नज़रिया और एक तजुर्बे से भी रूबरू होंगे।
उम्मीद है कि यह किताब उर्दू-हिंदी अदब की ख़िदमत में एक छोटा-सा क़दम साबित होगी और जिगर चुरूवी के अल्फ़ाज़ आने वाली नस्लों के दिलों तक पहुँचेंगे।
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01. पेशकश ........
हर मसले का हल काटना ही नहीं जनाब
वो बुग्ज़ जलें तो रिश्ते बच जाएंगे।

राहे मुंशीफना से रवां भी काम आसां
मुसलसल मिलें तो रिश्ते बच जाएंगे।

नफ़रतों के साए दिलों से मिटाएं
थोड़ा हम ढलें तो रिश्ते बच जाएंगे।

ग़ैरत का बोझ सर से उठा कर ही रखो
फटे को सिलें तो रिश्ते बच जाएंगे।

खुदग़र्ज़ दीवारों को ढहा दो ऐ जिगर
सजें महफिलें तो रिश्ते बच जाएंगे।
- जिगर चूरूवी

              - हम्द ओ सना - 
मूसा और खुदा - 
बांटने से दुःख और दर्द कम होते
गमखार किसी के हम हमगम होते।

एक बुढ़िया ओलाद से ना आस थी
आई यह पूछने वो मूसा के पास थी।

पूछना खुदा से मेरे नसीब ओलाद है?
बता देगा तुझे रब, मुझे एतमाद है।

दरयाफ्त करूंगा तेरा सवाल अम्मा
आके देता हूं मिले जो जवाब अम्मा।

तूर पर गए मूसा अहवाल ले कर
औरों के संग बुढ़िया के सवाल ले कर।

कहा खुदा ने, दस्तूर बदल नहीं सकता
ओलादे ग़म बुढ़िया का टल नहीं सकता।

यह खुशी मेरे किसी हिसाब में नहीं है
बुढ़िया को ओलाद किताब में नहीं है।

वहीं पर मुंतजिर बुढ़िया से मिला
नहीं ओलाद कहते हुए सर हिला।

ठंडी आह भर कर बुढ़िया चल पड़ी
बस मरी नहीं, और जान निकल पड़ी।

कुछ देर में सवाली हरकारे करने लगा
एक रोटी एक बेटा, एक रोटी एक बेटा।

सब रोटियां उसकी झोली में डाल दी
खुदा की खीज खुद पे निकाल दी।

चंद साल बाद मूसा वहीं से गुजरे
घर में बुढ़िया खेलते मिले बजुरे।

सुना उसने यह और सर अपना कूटा
मूसा तू झूठा, तेरा खुदा झूठा।

गुस्से में तिलमिलाए तूर पे गए
मिल कर माजरा पूछने नूर से गए।

आज तेरी खुदाई का यकीन टूटा
तेरे साथ बुढ़िया ने मुझे कहा झूठा।

खुदा की रहमत अब जोश में आई
जवाब दूंगा जो बात तूने बताई।

सुन गौर से मेरी बात, देकर ध्यान
दे गोश्त खुद का लाओ वो इंसान।

भटकता मूसा लेकर छुरी और थाली
पर मिला ना कोई, थका हाथ खाली।

उदास एक कोने में बैठे कलीमुल्लाह 
आई आवाज़ वहीं हक, हक अल्लाह।

फकीर पूछे आज ग़मज़दा मूसा
क्या कहता है तुझ से खुदा, मूसा?

कर अपना काम ए फकीर भाई
मेरा इम्तहान ले रही है खुदाई।

बता तो सही, तेरा ग़म बांट सकूं
ये उदासियों के बादल छांट सकूं।

सुन गोश्त, खुदा ने मांगा इंसान का
ये तज़्करा है खुदा के इम्तहान का।

बस इस बात पर रुसवा मेहरबां तुम
ढूंढ रहे हो इंसान, खुद नोजवां तुम।

लाओ दो मुझे ये खाली थाली छूरी
देकर अपना गोश्त भर दूँ पूरी।

थाली से लहू की बूँदें टपकती थीं
देख मूसा की सांसें अटकती थीं।

फकीर ने काट खुद को कहा खूब
जाने कौनसी जगह पसन्दे महबूब।

भरी थाली, खुश मूसा रब के पास गया
किसने दिया गोश्त, पूरा माजरा कहा।

मुझसे फ़कीराना इश्क़ भुला दूँ कैसे
जो गमखार को हंसाए, रुला दूँ कैसे।

दुआ उसकी ना, खाली रोटी के बदल
महबूब हो रुसवा, नहीं मेरा अदल।

हो जोक ए यकीं, बदल जाये नसीब
जाँ निसार हो, कितने दिल के करीब।

मूसा, मसीहाई नहीं, फकीरी पैदा कर
बनके गरीब, उसका अमीरी पैदा कर।

जिगर खुदा से दुआ हाथ फैला कर
बिछड़ा अपना मिले उससे आकर।
              जिगर चूरूवी
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                 जिगर चूरूवी 
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                - गजल - 
03 अलीफ़ 
अब मुझे .........
अब मुझे कुछ नहीं सूझता है
दिल तेरे घर का पता पूछता है।

मुश्किल में हालत से जूझता है
क्यों यह अहवाल बता पूछता है।

जान अमान की न फिक्र रही
अब हुई क्या खता पूछता है।

देर से सूखे में बरसे अब्र दुआ से
मोहसिन जानता न बता पूछता है।

हाजिर जवाबी सवाल बन गई
मन मचला जोड़ घटा पूछता है।

सिकन में रहा मां ने उम्मीद कहा
उसी जननी को रहे सता पूछता है।

बात जिगर की ज़बान पर आई
कहूं गजल या क़ता पूछता है।
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04. 
आजादी के दीवाने.........
आजादी के दीवाने जिधर होते हैं
बावजूद घर के बेघर होते हैं।

शर्फ़ फैज सब को नहीं मयस्सर 
दीवानों के कंधे बेसर होते हैं।

तोड़ दो दरवाजे बहारों के वास्ते
फूल पाबंदियों से बेखबर होते हैं।

खराब हालात इंसान को तोड़ देते
चंद में जोड़ने के हुनर होते हैं।

बदी मिटे तो हसन का वकार खत्म
खामोश जिगर बाअसर होते हैं।
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05. बड़ों दूर से..
बड़ी दूर की सोच के आया
मैं तोहफ़े बाँह भर कर लाया।

सजाने को दामन तेरा सनम
मैं परियों का हुस्न घर लाया।

तुझ चराग़ से रोशन ये घर
मैं दुआ-ए-फ़ानूस सर लाया।

मतला हो तुम ए हुस्न-ए-ग़ज़ल
मैं संग हार ए नज़्म घर लाया।

जिगर सुख़न की प्यास बुझाने
सहरा से फूल चुन कर लाया।
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06. भ
भटकती राहें -------- 
भटकते लोग ज़िंदा भटकती राहों में
बुरी आदत इनकी लिपटी गुनाहों में।

हमें कहे सरकश खुद इसकी पनाहों में।
दुल्हन इक रात की खेले इनकी बाहों में।

यहां जुआ गांजा शराबों के हैं फ़ितने
गिरे नजर से खुद की मेरी निगाहों में।

लुटते इंसान यहां बातों के झांसों से
भड़काते हैं दंगे झूठी अफवाहों में।

जिगर चढ़े सूली जो इंसान को मारे 
रोको इसे लाकर नेको सलाहों में।
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07. पे 
पहले इम्तिहान...........
पहले इम्तिहान में कामयाब होगा
पत्थरों में मिला हीरा नायाब होगा।

झूठ डर और सच हिम्मत का नाम
जान बचे कोई तो झूठ सवाब होगा।

रिश्तों की पहचान परख कर
अपनों से मिलन ख्वाब होगा।

मुजरिम सही पर हक का पासबां
शाकिर मज़ाहिदे अशबाब होगा।

जिगर अहमकों से रख दोस्ताना
आगे चुप के कौन वहाब होगा।
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09. फे
फिर मिलेंगे..............
फिर मिलेंगे नए मसलों पे गुफ्तगू होगी 
गर ये रात आखरी है तो सलाम दोस्तो।

दूरियां मुफीद रोज़ मिलने से यार 
समस ओ क़मर करे ना कलाम दोस्तो।

बख्त की दानिश्वरी मकबूल न हुई 
कमब्खत मशहूर टकरा के जाम दोस्तो।

बदल दो ज़ालिम रश्म ओ हुक्मरान् 
ग़ारत इन्साफ पे ना इल्जाम दोस्तो।

रहबर कहे रह बेखौफ में हूँ ना 
करे वहीं अपना काम तमाम दोस्तो।

गर मिले कोई तो दिल से मिलना
दरिचे खोल के इश्क सरे आम दोस्तो।

कुछ तो है ये शोर फिजूल नहीं 
जिगर करे है अपना काम दोस्तो।
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09. ते 
तकदीर बदलते देखा है...........
तकदीर को तदबीर में बदलते देखा है
मेहनत को तस्वीर में बदलते देखा है।

अल्फ़ाज़ को तीर में बदलते देखा है
शाहों को वजीर में बदलते देखा है।

दारे कज़ात ने सुन कर कहानी
फैसलों को नजीर में बदलते देखा है।

बदले पैगंबर ने फरमान ए अक़्वाम
शाकिन को सफीर में बदलते देखा है।

जिगर करामात की तवक्को क्यों
दर्द को जंजीर में बदलते देखा है।
                 ----------- 
10. ठे
समंदर क्यों है........
ठहरा ठहरा सा हर मंजर क्यों है
सांसों से उठता समंदर क्यों है।

पीठ में ही घोंपता खंजर क्यों है
सुखी हुई ज़मीन बंजर क्यों है।

ये शोहरत अजमत काफिले किसके
कफ़न से बाहर हाथ सिकंदर क्यों है।

है खुदा ईश्वर एक जहां का मालिक
कहीं मस्जिद कहीं बना मंदर क्यों है।

जो दिल के बाहर नहीं अंदर क्यों है
जिगर मौला - मस्त कलंदर क्यों है।
                ------------
11. थे 
थपेड़े जिंदगी के..........
थपेड़े खातिर में मेरी बाहों के झूले हैं
वक्त वक्त की बात हम उसे ना भूले हैं।

बिना पानी सहरा में कांटे फले फुले हैं
जुर्माने अगलात के सबने वसूले हैं।

कमी जिंदगी की कम नहीं होती
जिओ ऐसे के दिन में सावन के झूले हैं।

कोई रोक के देखे अपने सफ़िने को
मचे कोहराम हुकूमत की हिलती चूलें हैं।

जिगर अफसोस ना कर देख जमाने को
यहां बद बदतर नहीं दूधों के धुले हैं।
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                     ------------
12. से
सना हो बयां........
सना हो बयां क्या तेरी ए खुदा
तू जहां का मालिक रब मेरा खुदा

सजर करें सजदे हवा में लहलहा
देता जहां की खुशियां रब मेरा खुदा।

मुर्दों में भी जो डालता है जां 
खालिक कौनों मकां रब मेरा खुदा।

सोतों को उठता हर दिन सुबहा
गाफिल रहा इंशा, है रब मेरा खुदा।

तुम दीन की खातिर मरने को नातवां
सब पर करे दया रब मेरा खुदा।

किनारों से कैसे बांधे वो दरिया
हाजिर हर ज़गहा रब मेरा खुदा 

जिगर बड़ाई में इसके लिखूं में क्या क्या
हर बड़ाई से अबतर रब मेरा खुदा।
                     ---------
13. टै
टुकड़े गजल के ......
टुकड़े गजल के किताब में रखे
नकली चेहरे हिजाब में रखे।

रखे जमा कर हौसलों के खम
अल्फ़ाज़ क्या खिताब में रखे।

खुलूस अदब वफ़ा की जानिब
मसलों के हल ना ताब में रखे।

दुरुस्त कहना के हम हैं खराब
इक़दाम खाना खराब में रखे।

जिगर बहर की तलाश में अब
सवाल कितने जवाब में रखे।
              ------------
14. जिम
जाने कब.....
जाने कब की शनासाईं है
हम दो बदन एक परछाई है।

मुस्कुरा के कहे हरजाई है
सारा जमाना तमाशाई है।

समंदर में आग लगवाई है
अनकही बातों में गहराई है।

बातिल खुदा से आशनाई है
भारी भीड़ में भी तन्हाई है।

जिगर मांगो दाता से मुरादें
मांगना गैर से जगहंसाई है।
                --------
15. झे
झूठा ना कहो............?
झूठा ना कहो भूख का सताया होगा
पेट का मारा इस शहर में आया होगा।

नहीं, खाली हाथ साथ कुछ लाया होगा
यूं एक से एक बढ़ा शरमाया होगा।

काम किसी दफ्तर ने अटकाया होगा
दुआ है वक्त ना इसका जाया होगा।

गुरबत, आजीजी ने खूब रुलाया होगा
रास्ते से किसी अपने ने हटाया होगा।

आवाज जो निकली को दबाया होगा
जिंदा था कागजों में मराया होगा।

कह के ज़ाहिल गंवार बुलाया होगा
अंगुलियों पे किसी ने नचाया होगा।

जिगर अखबार यूं छपाया होगा
शमन हैवान के नाम कटाया होगा।
                     ---------------
16. चे 
चहकते परिंदे.......
चहकते परिंदे पूछे वफ़ा से
घर का यहां का रास्ता क्या है।

उछलती नदियाँ पूछे हवाओं से
अपना बहने से वास्ता क्या है।

फूल कलियों से ये बात करते हैं
खिलने मुर्झाने की दास्ताँ क्या है।

कहे चांद सिवा मेरे ताकता क्या है
कहे ख़ुशबू तू मुझ से चाहता क्या है।

लाजवाब हूरों के सवाल सवालों से  
कशिश दिल में कैसी, काटता क्या है।

जिगर पूछो ग़ुलामों से  जाकर के
अज़ादी किसे कहते, दासता क्या है।
                  -ं-----ं-ं-
17. छे
छोड़ मय की गली..........
छोड़ मय की गली यार ए हम हुआ
अब रहने दे बाक़ी जो वहम हुआ।

उनकी वो जानें रब जिनका मुहाफ़िज़
मैं उन से मिलकर खुश फ़हम हुआ।

उलझती जा रही जिंदगी सबो रोज़
ये जीना उनकी जुल्फों का खम हुआ।

काँटों की विरासत सँभालता रहा
इस पर भी टपकता लहू ना कम हुआ।

उनकी मौत जिंदगी से बेहतर हुई। सह
कोई भगतसिंह शहीद ए आज़म हुआ।

रहते सरकसी के बरअक्स सरफरोश
मदफ़न हसरत रंजो अलम हुआ।

अपनी फितरत ए जज्ब रवाँ रहे जिगर।
बारहा तालिब ए हक़ सर कलम हुआ।
                  -------------
18. छेड़ के उमंग..........
छेड़ के उमंग मन में तरंग बेवफा हुआ
देख के खम गेसुओं के खफा हुआ।

वो वादा,कसम, इरादा कहां दफा हुआ
बजाय सुकून मिले तेवर तपा हुआ।

घर आया ए ख़ुशनूद दीदार के लिए 
दिल के सौदे में ख़सारा ना नफ़ा हुआ।

गौहर,सोना रजत माणिक से तौल दूँ
ना बिखेर तू घर मेरा है जो जपा हुआ।

वालिदैन तेरे मेरे एक मान जाने जिगर
 तेरे आने से खुश घर यह सफ़ा हुआ।
              -----------------
19. हे
हसीन एक ख़ाब........
हसीन एक खाब लिख जाएंगे
खून से इंक़लाब लिख जाएंगे।

वो बकाया हिसाब लिख जाएंगे
अनलिखी किताब लिख जाएंगे।

कमतर सही जिंदादिल रुख्सत
जगाने तुझे खिताब लिख जाएंगे।

तकमील ए सब्र हम से ही क्यों
रूदाद कोई जनाब लिख जाएंगे।

हम जुबां हम शीर हम वतन हम
बन्द मेरे क्यों बाब लिख जाएंगे।

उठाने के नाम पे गिराते हो तुम
नाजिल हुए अजाब लिख जाएंगे।

आइन फतह दारेन का जिगर
नज्मे अश्क़ सैलाब लिख जाएंगे।
                ---------------
20. हाल ए जार........
हाल ए जार दर पेश पहुंचेंगे शायद
आंसू लैला के तक कैश पहुंचेंगे शायद।

शियान ए मजनूं ए जैश पहुंचेंगे शायद
अरवाह अदालत में पेश पहुंचेंगे शायद।

दो जून रोटी एक लिहाफ का टुकड़ा
सामान इशरतो ऐश पहुंचेंगे शायद।

आने न दे गली में हस्ती ए सिपाहगीर
बदल कर अपना भेष पहुंचेंगे शायद।

प्यासी जमीन ने खुदा से शिकायत की
अब्र उसने भेजे मेरे देश पहुंचेंगे शायद।

वो खूबसूरत हसीन जहर से सनी हुई
रोशन जर्द आग में तैश पहुंचेंगे शायद।

जिगर पेट चीर कर दिखा सकता नहीं
जा ए हसर नेमल वकील पहुंचेंगे शायद।
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21. खे 
खुदा जाने.....
खुदा जाने क्या हालात हुए
बीते दिन कई तुम से बात हुए।

जोड़ा था हमने दिल, दिल से
जुदा फिर क्यों ख्यालात हुए।

आ कर झोड़ मुझ से लड़ सनम
ना तोड़ आपस के करादात हुए।

अब तेरा वास्ता गैरों से हुआ
सुना हमने मुनाजात हुए।

जिगर आफ़रीं तुझ फकी पे
बलंद बहिष्त के दराजात हुए।
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22 दाल
दर पेश........
दर पेश हाल ए जार पहुंचेंगे शायद
आंसू लैला के तक कैश पहुंचेंगे शायद।

शियान ए मजनूं ए जैश पहुंचेंगे शायद
अरवाह अदालत में पेश पहुंचेंगे शायद।

दो जून रोटी एक लिहाफ का टुकड़ा
सामान इशरतो ऐश पहुंचेंगे शायद।

आने ना दे तेरी गली में हस्ती ए सिपाहगीर
बदल कर अपना भेष पहुंचेंगे शायद।

प्यासी जमीन ने खुदा से शिकायत की
अब्र उसने भेजे मेरे देश पहुंचेंगे शायद।

वो खूबसूरत हसीन जहर से सनी हुई
रोशन जर्द आग में तैश पहुंचेंगे शायद।

जिगर पेट चीर कर दिखा सकता नहीं
जा ए हसर नेमल वकील पहुंचेंगे शायद।
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23. दिन कर्ज के........
दिन कर्ज़ में बीते कटी उधार की रातें
अंधेरे जीत जाएँ छोड़ो बेकार की बातें।

वफ़ा न हो सकी जाँ निसार की बातें
सीरीन जुबाँ छुपी नश्तरो खार की बातें।

वीरानों ने सुनी शहरे नागवार की बातें
मिन्नल्लाहि कहो जीत - हार की बातें।

महफिलों में सरगर्म वो बाजार की बातें
जिंदा हैं रहीं मजहरे अतहार की बातें।

"जिगर" रोया नहीं सुन बेकार की बातें
 तुम कहो सुनार हम लौहार की बातें।
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24. डाल 
डर की शिद्दत.......
डर की शिद्दत से डरा बैठा हूँ 
शुमार जिंदों में मरा बैठा हूँ।

कोई लड़े हक़ तलफी पे मरे 
मैं हाथ पे हाथ धरा बैठा हूँ।।

आवाज उठा ए जाने वाले 
तन्हा आराम से मैं जरा बैठा हूँ।

म जुनूँ गलियों का खाकसार 
कह दूँ किससे भरा बैठा हूँ।

राहें पहचान गईं खूँ के क़तरे 
किया अपनों का अधमरा बैठा हूँ।

शिकवा महरबाँ से जुल्म का किया 
कहा मै बाड़ हूँ खेत चरा बैठा हूँ।

खुली पलकों के ख्वाब सच हों 
देख वो सपना सुनहरा बैठा हूँ।
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25. धै
धरे हैं हाथ हाथों पर...........
धरे हैं हाथ हाथों पर लगे हैं होठ पर ताले
अंधेरों ने छुपाए हैं दिन में लौट कर उजाले l

मशालें बुझ गईं सबकी तमन्नाओं के भंवर में
कोई झोंका हवा आकर के चोट कर डाले।

लहू जल के हुआ काला अफसोस क्या कीजे
टुकड़ा एक रोटी का जिगर को काट डाले।

वीरानों से कह देना रहो वीरान तुम बेहतर
दिल के द्वार हो पाबंद लगे दीवार पर जाले।

सजा दो आज बस्ती को लगा दो आग बस्ती को
रखो गर्दन ऊंची नहीं तो ठीक बे- सर वाले।

कहीं बेटी सिसकती है कहीं बहुओं के हैं छाले
अजीब माजरे देखे, देखें हैं वो घर वाले।

मुझे रोक लेना तुम वक्ते आफत जो आए
जिगर मरना है मर जाए नहीं हथियार डाले।
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26. रे
रुके मुसाफिर चल उठे..........
रुके मुसाफिर रास्ते चल उठे।
बढ़ते अंधेरों में चराग़ जल उठे।

सूरज से कब्ल अंधेरी कायनात
रोशन जुगनू मतवाले मचल उठे।

जमाए पैर डर ने कुनबे में यहां
साथ धुंए के हम मूसलल उठे।

जिंदा हैं पर मरे से बदतर लोग
जनाजा वो आज उठे या कल उठे।

जिगर धोखे सही मिले तो सही
उम्मीद की किरण पल पल उठे।
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27. ज़े
जिंदगी का फलसफा.......
जिंदगी का फलसफा अजीब है
जान का दुश्मन दिल के करीब है।

पत्थरों पर शाया इबारत अजीब है
मसीहाई की सजा सूली नसीब है।

मुराद अफसाल से मालो दौलत
आदमी गरीब था गरीब है।

उस काजल की लकीर तलवार सी
सीने पे चले दर्द मीठा अजीब है।

जिगर दम रोक लो अंजुमन में
खिलअते दोस्त में बैठा रकीब है।
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28. सिन
सिले लब .........
सिले हुए लब खोल लीजिये
मिलकर हल्ला बोल लीजिये।

गुजरे जमाने से सबक अंदोज
फरोख्त इश्क़ तो मोल लीजिए।

रहिए साथ - साथ या खुला कर
बाजार से रिश्ते न मोल लीजिये।

गुरबत वतनी याद ए जावेद
दिल जरा सा टटोल लीजिये।

सराफत के लब पे शिकन नहीं
नफ़ा नुकसान से तोल लीजिये।

जिगर सदा देते रहो जगाते रहो
हैं बंद दरवाजे तो खोल लीजिये।
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29. शीन 
शर्मिंदा हो........
शर्मिंदा हो दो अश्क बहा तो सही  
खुदा माफ करे सर झुका तो सही।  

नूर कब्र में हम साया साथ होगा  
खौफे मरग दिल में लगा तो सही।  

ना मोहताज जो उसका मोहताज  
तू खुद का इत्तेहाद निभा तो सही।  

वो ग़फूरुर रहीम सुने दुआ सबकी  
नादां बंदे दुआ में हाथ उठा तो सही।  

जुड़े रिश्ते जिगर के जिगर से यहां  
मैं बुलाता हूं तू आ तो सही।
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30. सुवाद 
सनम हाय........
सनम हाय! तूने यह क्या किया 
हसद मुझ से उसको रुस्वा किया।

इबादत की हद तक चाहत की 
पर वादा ना तू ने वफा किया।

गुजारिश ए तल्कीन हम से 
यहां जो किया तुमने बुरा किया 

माजी की तहरीर कोई लिखेगा 
हकदार का हक किसने अदा किया। 

इतना था साथ अपना ए जिंदगी 
हमने तेरे नुकसान को नफा किया।

फितरत से फिरा नहीं मुशरिक हाय
दिल से कुफ्र दिखावा खुदा खुदा किया।

लहद पे आये तो कहना जिगर 
अकसीर बन तूने वबा किया।
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31. ज़्वाद 
जिद्दी..............
जिद्दी दिया बुझा अन्धेरा हो जाए।
मेहरबाँ कर कब्र में सवेरा हो जाए।
                             
न तेरी न मेरी ये दुनिया लुटेरी।
तेरा वो मेरा वक्‍त की हेरा फेरी।

दिले  मैल धो  ऑखों  से नफरत
दाग धुलते नहीं बदलती फितरत।

खता हुई मुआफी का तलबगाार बन
वक्‍फ जिंदगी खुद खिदमतगाार बन।

दफन कर शिकवा हुस्ने सलूक याद रख।
वसीयत है अहले औलाद रूदाद रख।

दो गज जमीं, मन लकड़ी होनी है।
बाद मरने के सारी कायनात रोनी।

उम्‍मीद पे दुनिया कायम आसमान टिका
होनी होगी न होनी ना नसीब में लिखा।

जिगर शान शौकत क्‍या गम पी न सके।
वो जीना नहीं जो दर्दे दिल सी न सके
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32. तोय  
तौक गले में........
तौक गले में पड़ी होगी
पीठ पे खुदाई छड़ी होगी।

मुश्किल पुलसीरात की घड़ी होगी 
जिस्म पिघला खोपड़ी सड़ी होगी।

सवा नेजे पे सूरज की तपिश
जहन्नम सर पे खड़ी होगी।

मुश्किल हम पर बहुत बड़ी होगी
किताबे हिसाब खुद ही अड़ी होगी।

जिगर बदी नेकी पे जड़ी होगी
निकलती जान हड़बड़ी होगी।
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33. जोए
जिया आईनों की.............
ज़िया आईनों की सदा मखसूस होती है
ज़िला जबीं पर उनके महसूस होती है।

तर्के गुनाह मुश्किल हकीकत में
सच में जिंदगी ज़ालिम मनहूस होती है।

हटा नकाब देखो असल रूप जो इनका
शैतानी काशिद यही मखसूस होते हैं।

हया की ज़ियाफ़त घर - घर करे कोई
हमाली अल्फ़ाज़ में कंजूस होते हैं। 

सुने हमने वो किस्से बुजुर्गवार दाना के
जिगर दीवान किताबों में वो मरकूस होते हैं।
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34. अन 
अर्क़ ए जिगर............
अर्क ए जिगर निचोड़े आहिस्ता आहिस्ता
खुश्क हिना रंग छोड़े आहिस्ता आहिस्ता।

लबों से बदाम तोड़े आहिस्ता आहिस्ता
खुद से मेरा नाम जोड़े आहिस्ता आहिस्ता।

सुन कुर्बते यार का गालिब असर इस तरह
बेखुदी से इल्हाम जोड़े आहिस्ता आहिस्ता।

एक एक लफ्ज टपकता शहद की बूंद सा 
मेरे लब से जाम जोड़े आहिस्ता आहिस्ता।

शिकमे सदफ से वसूल ए मोती की आरजू 
डूबने से नाता आम जोड़े आहिस्ताआहिस्ता
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35. गेन 
गनीमत.......
ग़नीमत, जाम ए सब्र भरा नहीं हूँ
मुर्दा समझ रहे वो, मरा नहीं हूँ।

अदावत लाख रखिए ए रकीब
हूं गांधी पर कमजोर जरा नहीं हूं।

क़ब्ल जिल्लत से मौत कौले यकीं 
रहे इंकलाब जिंदाबाद डरा नहीं हूं।

परछाई बताती है औकात अपनी
मैं सूरज बादल से घिरा नहीं हूं।

खातिरे अस्मत लड़ उसूल से
दागे जिगर जख्म हरा नहीं हूं।
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36. छोटा काफ 
क्यों यह नींद...............
क्यों यह नींद हमारी खुलती नहीं
रूह आबे जमजम से धुलती नहीं।

सुन आह सीने में आग जलती नहीं
जमे लहू की हरारत उबलती नहीं।

शम्स गर्दिश नहीं करता अल अर्द की
रोशनी सूरज की जमीं पे ढलती नहीं

दलील ए मजहब हकीकत नहीं
चलती है जमीन छाया चलती नहीं।

जिगर नहीं रहनुमा जुगनुओं की शमा
कोई जलाता है वो खुद जलती नहीं।
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37. ख
खाली हाथ........
खाली हाथ आया हूँ खाली हाथ जाना है
यहां सब अपने हैं वहां हर कोई अनजाना है।

कहते लोग मुझको तू बड़ा पागल
पूछूं मैं किस से यहां कौन सयाना है।

धड़कती धडकनों में बहे खून बेगाना है
मचा कोहराम दिल में है बाहर का बहाना है।

तख्त ताज दौलत सब यहीं रह जाना है
यहीं ताऊश है रखा यहीं पर खजाना है।

जिगर लौट कर आजा घर को जाना है
ना तेरा है ना मेरा है ये बेदर्द ज़माना है।
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38. बड़ा काफ़ 
क़र्ज़ का एहसान.....
क़र्ज़ उतार सकते अहसान नहीं
बिकता है ज़मीर ईमान नहीं।

चढ़े दग़ाबाज़ कभी परवान नहीं
हम अहले आदम हुए इंसान नहीं।

इमारतें हो गईं बुलंद से बुलंद
आदमी को मिला मकान नहीं।

बेगेरत के यां मालहौज हुरमत
बख्शीश खुदा की आसान नहीं।

सोमोसला के दम ख्वाब ए जन्नत 
जिगर है जहन्नमी हैरान नहीं।
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39. ग़ाफ़ 
गहरी नींद......
गहरी नींद हमारी खुलती नहीं
रूह आबे जमजम से धुलती नहीं।

आह से सीने में आग जलती नहीं
जमे लहू की हरारत उबलती नहीं।

ना शम्स गर्दिश करता अल अर्द की
रोशनी सूरज की जमीं पे ढलती नहीं

दलील ए मजहब हकीकत नहीं
चलती है जमीं छाया चलती नहीं।

नहीं रहनुमा जुगनुओं की शमा
जलाता जिगर खुद जलती नहीं।
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40. घ
घर आओ मेरे......
घर आओ मेरे तो घर कैसा लगे
खुशियों से हो मुअत्तर ऐसा लगे।

हम साथ हमसफर सफर कैसा लगे
बैठे हों जिब्रिल के पर पर ऐसा लगे।

मैं तुम्हें कहूं अपना अगर कैसा लगे
हमदम का घर मेरे घर जैसा लगे।

आंखों के प्याले मयस्सर कैसा लगे
मेरे होठों से लगा समंदर ऐसा लगे।

धरती पे आ जाए कमर कैसा लगे
यह मेरे सामने है अख्तर ऐसा लगे।

तुम डालोगी मुझ पे नजर कैसा लगे
बिन पिए हो जाए असर ऐसा लगे।

मिल कर रहे भाई बशर तो कैसा लगे 
जन्नत के बाग में है घर ऐसा लगे।

तुम मांगो जानो जर तो कैसा लगे 
मैं हवाले कर दूं जिगर ऐसा लगे।
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41. लाम 
लोथड़े से बना........
लोथड़े से बना मिट्टी में समा गया।
खिला फूला फला और मुर्झा गया।

सिल सीने पर लफ़्ज़ों की चढ़ा गया,
बातों की आग से दिल जला गया।

मेरे सुनने तेरे कहने में फ़ासला कोई,
मैं न समझा तू क्या क्या सुना गया।

चल मिल करें मुसीबत का सामना,
लाय कौन कैसे यहाँ लगा गया।

जिगर बहुतेरे तफ़रीक बोने वाले,
इधर की उधर लम्हों में लगा गया।
               ............
42. मीम 
मुझ गरीब का.........
मुझ गरीब का दिल तुझ पे आने पर
लग गया यूं ना चाह के लगाने पर।

जीत हार वक़्त की बात देखेंगे 
छेड़ धुन वो झूमें सब तराने पर।

गई को भूल आगे बढ़ बढ़ता जा 
पाबंदी नहीं तेरे आगे जाने पर।

मौजूद तुझ में अजदाद की खूबियां 
खुदी को जान अना मिट जाने पर।

नोजवाँ गुजर जायेगी जवानी लापता 
मौके की तलाश जीत सरहाने पर

खुश्बु तलाश अंधी गालियों में 
हो खुर्शीद सानी ईद मनाने पर।

कहे ज़माना अपनों पर लुट गया
जिगर कर जिरह रिश्ते कमाने पर।
                -------- 
43. मीम 
मुख्तसर मुलाकात.......
मुख्तसर मुलाकात अच्छी होती है।
दायरे में रह के बात अच्छी होती है

बवक्त हुई बरसात अच्छी होती है।
कम ही सही सौगात अच्छी होती है।

तपते दिन पे रात अच्छी होती है।
जोड़ी भाई के साथ अच्छी होती है।

मुट्ठी में बंद हवा खुली अच्छी होती है
कह दो अनकही बात अच्छी होती है।

जिगर सांझ घर की अच्छी होती है
नहीं तस्वीर ए लात अच्छी होती है।
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44. नून 
नामे वफ़ा........
नामे वफ़ा कह के बुलाते हो
खाली बासन दिखाते हो।

भरे भंडारे अंदर के सब
सामने चमच हिलाते हो।

दिखाए सरसब्ज बाग वादों के
आया वक्त हाथ हिलाते हो।

सांस उखड़ती को रोक लिया
सुना है तुम मरे को जिलाते हो।

जिगर हमसफर हमदम कई
किस किस को बुलाते हो।
                 ---------
45. फ़े 
फ़ानुश चराग़........
फानूश चराग़ पे चढ़ाए कौन
लगी हो आग तो बुझाए कौन।

अजनबी को घर बुलाए कौन
बिन बुलाए घर पे आए कौन।

वीरानों में बाग़ लगाए कौन
कली को चमन बनाए कौन।

अशर्फियां यहां लुटाए कौन
फाकों में दावत बंटाए कौन।

अदावत को गले लगाए कौन
झूठे की झूठ बताए कौन।

फरमाने खुदा लिखाए कौन
रोएं को हंस के हंसाए कौन।

अंगुली खुद पे उठाए कौन
जिगर रूठे को मनाए कौन।
                  ----------------
46. वाव 
वक्त ए कुर्बानी..........
वक्ते कुर्बानी जाया नहीं होगा
गफलत मे वो आया नहीं होगा।

उसके आने से हौसला परवान चढ़े
गले से अपने लगाया नहीं होगा।

राख हो गया सोना जल कर
सलीके से तूने तपाया नहीं होगा।

अलाहिदा सिफ्त जान देने वाले
मोहब्बत से उसे बुलाया नहीं होगा।

बिजली समझ डरे सहमे जिगर
तोहफा ए बारिश भिजवाया नहीं होगा।
               --------- 
47. हे
हम पे खुदा........
हम पे खुदा मेहरबान हो गया।
जीना था मुश्किल आसान हो गया।

तेरी खाहिशों को पर पे मैं चलूँ
सफर नातमाम का सामान हो गया।

तुझसे मिला सीरते शहर बदल गई 
तू बन गया गनी में उस्मान हो गया।

सफर में हासिल रसीद वसूल कीजिये 
जमीं पर मुट्ठी में आसमान हो गया।

नस्लों को देके जाइयेगा जनाब 
कोशिशो से सहरा गुलिस्तान हो गया।

जिगर संभाल चमन रहबरी उसकी 
अमीन व दानिश निगहबान हो गया।
                  --------------
48. या
यूं आहिस्ता........
यूं आहिस्ता से हया का तबशीरा देते हैं
चुपके-चुपके से देख नज़र गिरा देते हैं।

न इमाम न मुकतदी न साइल न जर्फ 
लोग यहां क्या - क्या मशविरा देते हैं।

कनखियों से देख किरदार के रसूख 
यही हैं वो जो मुश्किल में घिरा देते हैं।

साख जड़ से कट के जो बेदम हुई
बेबस पत्तों को नाम सरफिरा देते हैं।

नींव से जुड़े रहना बेमानी कहने वालो अहले वजूद अफ़साले जखीरा देते हैं

अदावत मुजस्समे से कम आज ना हुई
सर ए खुद मेरे गुनाहे कबीरा लेते हैं।

तकमीले वहम नागवार जिगर जनता हूँ 
ये अमल समराते शीरीन कसीरा देते हैं।
                ---------------
               जिगर चूरूवी

49.✍️ गजल
उसने नाम लिया दुश्मनी से ही सही
तेरी नफरत मेरी मोहब्बत का पार हुआ।

मुरव्वत ना रही हसरतों के जबीं पे
खंजरे आजमाइश सीने के पार हुआ

इबरत मुझ पजीर को बख्शी सनम
दर्ज दोयम तेरे दिल पे इक़्तदार हुआ।

गिरते पत्ते खबर दे रहे चले जाने की
हमने समझा सदा कारोबार हुआ। 

अजीयतों के दर्द इस जिगर ने सहे
वास्ते अजमत के गिरफ्तार हुआ।
                     ---------- 
50. गजल
कुदाल खेतों में.....
कुदाल खेतों में जब चलती है
यह मिट्टी सोने में ढलती है।

यार की क़ीमत यार ही जाने
मसर्रत की आस मचलती है।

सफकत का हाथ थामे दोस्ती। 
दौर रे बद को सद में बदलती है।। 

मोतियों से महंगे होते हैं महबूब
चकोर देख चांदनी निकलती है।

जी चाहे उसे सब कुछ दे दूँ
चाहत जिसकी मुझ पे ढलती है।

सफर लम्बा तय किया, करना
यार की आह पे जाँ निकलती है।
                  ------------
51. तुझे दास्तां......
तुझे दास्ताँ होने नहीं दूंगा 
कुछ भी हो रोने नहीं दूंगा।

मुड़कर मत देखना पीछे
जाग तुझे सोने नहीं दूँगा।

पसंद ना मिले तो खोज 
उजियारे खोने नहीं दूँगा।

करामात के भरोसे क्यों 
नाउम्मीदी होने नहीं दूँगा।

जिगर की दुनिया तू ए कौम 
ज़हर इसमें बोने नहीं दूँगा।
                     ---------- 
52. बेपर - 
बे पर उड़ना मेरी फितरत नहीं 
पैर जमी पर तक अजल होगा।

शिकस्त होगी या जीत अपनी
उड़ेगा, जिसकी भुज में बल होगा।

तुमसे मिल के करार आता है
आ बैठ दुश्वारी का हल होगा।

बदलती दुनिया की तस्वीर हमेशा
रश्मों में भी रद्द ओ बदल होगा।

जिगर बादे सबा बहता दरिया
रुका तो सड़ हुआ दलदल होगा।
                  -----------
53. उम्मीद......
मुझे तुम से उम्मीदें है, उम्मीदों से याराना
अभी मौकुफ शहादत है शहीदों से याराना।

बड़े ताज़िर बने फिरते करो पेश नज़राना
अभी शाहिद ज़माना है शाहिदों से याराना।

लिखा है पढ़ा तुमने मोहब्बत का अफसाना
जाहिद खूं से लिखते मुजाहिदों से याराना।

संवारे घर कई तुमने कई सजाए है
रहो मुतहिद और मुतहिंदों से याराना।

जिगर अज़ीजों में रखो मर्तबा अपना
बनो काशिदे वफ़ा काशिदों से याराना।
                 ---------------
54. नगीने जवाहरात.....
नगीने जवाहरात ना,सोने की बात कर
जो कर सके बात वो होने की बात कर। 

सरमाया सारा देख के हो रहा है खुश 
आदमी है तू आदमी होने की बात कर।

जाना कहां खबर लग जाये तो बोलना 
दिले नामकिं मकीं, होने की बात कर।

बनाया तुमने क्या जो मिटा सको यहां
ज़बरो जुल्म से हाथ धोने की बात कर।

हो सितमगर की हर चाल बेनकाब
आसां वक्त बसर ना रोने की बात कर।

जख्म ज़िगर के सब नासूर बन गए 
लाए साथ क्या यहां खोने की बात कर।

55. चलिए......
चलिये इस तरह फासला कम करें
आपकी कामयाबी की दुआ हम करें।

चलाए तीर कितने कब-कब हम पे
आ सरे राह आवाम में मुनज़्म करें।

मसकन एक तेरा भी मेरा भी
हमनवां हो खत्म यह ख़म करें।

दरयाफ्त राजे अक़ीदत कीजिये
जवाब हो पूरा सवाल कम करें।

कुछ वजह होगी हुए वो बेवफा
बेपर्दा राज तुम करो या हम करें।

तेरे बिना जीना सीखेंगे हम भी
करें चाक सीने सर क़लम करें।

हम शर्बत भी पिलायें तो ज़हर
तेरा ज़हर असरे जम जम करे।

सोचना बैठ अकेले अपने कार
अब हम होंगे तेरे ना वहम करें।

कट गई डोर जो जोड़ती थी हमें
मेरा ज़िक्र तुम ना तेरा हम करें।
                       --------
55. गज़ल 
#कमतरी_मेरी_ताक़त
थोड़ा मुस्कुराना ज़रूरी है
वर्ना ग़म से मर जायेंगे।

मुस्कुराते रुख देख कर
बुरे दिन संवर जायेंगे।

जलाकर राख किया 
हम उसके घर जायेंगे।

टकराना लाज़िम है तो 
बांध कफ़न सर जायेंगे।

माना हौसला नही रहा 
बाज के नये पर आयेंगे।

रास्ते बंद करने वाले 
तेरे अपने किधर जायेंगे। 

सराफत येरी कमतर हुई 
तो हम भी मुकर जायेंगे। 

जिगर जंग आर पार की 
पग हद पार धर जायेंगे।
        --------------
56मिट्टी की दीवार 
मिट्टी की दीवारें पुख्ता सब वारों पे
कोई रंग जी चाहे चढ़ा लो दयारों पे।

इल्जाम मुजरिम होने की बिना नहीं
बंदिशें कब हावी हुई शहसवारों पे।

आ तलाश कर खुद खुदा की ज़मीन 
यकीन से उसके नाम चल अंगारों पे।

बाअदब साफ नीयत मदखल मस्जिद
बांधना खुदाई का इबादत के तारों पे।

चले खुद ही मंज़िल जो हम जानते
इल्ज़ाम मय्यत का मेरी तुम सारों पे।

खूब मिन्नतें कर लीं महबूबे मखदूम
हूँ मुलजिम खुद तोहमद सरकारों पे

बता दे लड़ने का मन बन चुका अब
जिगर नचाएगा नाच इशारों पे
                  --------------
57. तुझे दास्तां............
तुझे दास्ताँ होने नहीं दूंगा 
कुछ भी हो रोने नहीं दूंगा।

मुड़कर मत देखना पीछे
जाग तुझे सोने नहीं दूँगा।

पसंद ना मिले तो खोज 
उजियारे खोने नहीं दूँगा।

करामात के भरोसे क्यों 
नाउम्मीदी होने नहीं दूँगा।

जिगर की दुनिया तू ए कौम 
ज़हर इसमें बोने नहीं दूँगा।
          -------------
58. उम्र के थपेड़े........
उम्र के थपेड़े तजुर्बा देते है
कभी हंसा कभी रुला देते हैं।

कच्चे पत्ते नाजुक होते है
खतरे खुद करीब बुला देते हैं।

थोड़ी सी बारिश तोड़ दे टहनियां
थपेड़े रंग मिला जुला देते है।

पतझड़ की हवा बदले बहार में
जले पांव थके को सुला देते है।

जिगर देख आज कल की निस्बत
तन्हा सारे गम भुला देते हैं।
                  ------------------
59 मासूम आरज़ू
क्या खूब होता जीते जी मिला होता
मुझे ना शिकवा तुझे ना गिला होता।

न मेरा ना तेरा रुखसार गीला होता
दूर रह कर मिलन का वसीला होता।

काश रहते दुनिया से अलग हम तुम
रंगीन सफर पल-पल रंगीला होता।

बादे सबा ने कहा उसने याद किया
काश यह पैग़ाम पहले मिला होता।

आबरू की कीमत वो जानते जिगर
लाल रंग में खूने जिगर मिला होता।
               ---------------
60. जब मुझे ........
जब मुझे कुछ नहीं सूझता है
दिल तेरे घर का पता पूछता है।

मुश्किल में हालत से जूझता है
क्यों यह अहवाल बता पूछता है।

जान अमान की न फिक्र रही
अब हुई क्या खता पूछता है।

देर से सूखे में बरसे अब्र दुआ से
मोहसिन जानता न बता पूछता है।

हाजिर जवाबी सवाल बन गई
मन मचला जोड़ घटा पूछता है।

सिकन में रहा मां ने उम्मीद कहा
उसी जननी को रहे सता पूछता है।

बात जिगर की ज़बान पर आई
कहूं गजल या क़ता पूछता है।
                  ..................
61. हम पे खुदा मेहरबान......
हम पे खुदा मेहरबान हो गया।
जीना था मुश्किल आसान हो गया।

तेरी खाहिशों को पर पे मैं चलूँ
सफर नातमाम का सामान हो गया।

तुझसे मिला सीरते शहर बदल गई 
तू बन गया गनी में उस्मान हो गया।

सफर में हासिल रसीद वसूल कीजिये 
जमीं पर मुट्ठी में आसमान हो गया।

नस्लों को देके जाइयेगा जनाब 
कोशिशो से सहरा गुलिस्तान हो गया।

जिगर संभाल चमन रहबरी उसकी 
अमीन व दानिश निगहबान हो गया।
               ---------------
62. तुझे गोद में बैठा के.....
तुझे गोद में बैठा के मैं जवान हो गया
ऐसा लगा के खुदा मेहरबान हो गया।

तेरी खाहिशों को पंख लगा के मैं चलूँ
सफर नातमाम का यूं सामान हो गया।

तुझसे मिल के सीरते शहर बदल गई
तू बन गया गनी में उस्मान हो गया।

सफर में हासिल रसीद वसूल कीजिये
जमीं पर ही मुट्ठी में आसमान हो गया।

नस्लों को देके कुछ जाइयेगा जनाब
कोशिशो से सहरा गुलिस्तान हो गया।

जिगर संभाल चमन रहबरी चमन की
अमीन व दानिश निगहबान हो गया।
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 63. सच झूठ
सच का जीना मुश्किल आसान नहीं
झूठ की दुनिया आबाद विरान नहीं।

निकले बातचीत से मसले का हल। 
आदमी आदमी है हेवान नहीं।

तकाजा दिये का रोशनी से सही
जलती शमा से फानुश परेशान नहीं।

फ़ाज़िल की रिवायत नामवर हुई। 
हदे दर्द गुजरा ख़ातिमे अरमान नहीं।

होश सँभाल कर रख बहक न जाना
हर ख़ुशी से महरूम जहान नहीं।
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64. आज है वो कल......
आज है वो नहीं कल होगा
सदा एक सा नहीं पल होगा। 

परेशां बता दे मुसिबत नहीं कहाँ 
ढूंढ़ ला ऐसा जो नहीं बेकल होगा।

नहीं मिलता सबको सब जहां में
अपना ही आंख से ओझल होगा।

पहचान खुद की खुद क्या बताएँ
डर-डर के जीना नहीं चल होगा।

मिला जो रब से बाँटो खुशी से
सदा बाहों में नहीं बल होगा। 

तलाशे जिसको वो मिलता है
बता सवाल जो नहीं हल होगा।

कफ़न संग दफ़न सब राज तेरे
वादे में हरगिज़ न रदोबदल होगा।

बता दूँ वक़्त जो पूछेगा मुझसे
मर चुका उस का नहीं कतल होगा।
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65. खबर नए साल की......
कैसे दूँ खुश खबर नए साल की
सामने सूरत मुल्क बदहाल की।

साए एक दूसरे के, वो दुश्मन हुए 
खूँ सना कफ़न दुश्मन ने चाल की।

महकता चमन अब मर सा गया
रोती - पिटती कली हर डाल की।

ज़रिया - मुआस की बात ना कर
रूह तार-तार भारत के भाल की।

मासूमों के लहू से सनी जीत क्या
ढो रही लाशें तारीख हर साल की।

हुक्मरां जो ज़ालिम हो जुल्म करे
बदलना उसे जिगर बात कमाल की।
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66. मुंह में राम........
मुंह में राम बगल में छूरा गद्दारी का 
जालिम करे खिताब ग़मखारी का। 

खाब ओ उल्फत लुटाए इन पे हमने।
नहीं जानते वो मतलब रवादारी का।

कान्हा की जमीं चिश्ती की बस्ती
फरमान ए नानक गमगुजारी का। 

चुना आवाम ने वास्ते खुशहाली 
मरे दलित लूटता सम्मान नारी का। 

दयारों पे बैठे वाइज मजहब की
उठे धुआं लगी कहीं चिंगारी का।

वो बसता है जिगर और रूह में 
मोहताज मुल्ला तिलकधारी का।
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67. खंजर की दरकार 
खंजर की दरकार न होती 
निगाहें शर्मशार न होती।

ना होती मौत बेगुनाहों की
गर बेपरवाह सरकार न होती।

क़यादत आसाँ नहीं मुश्किल 
हार - जीत हर बार न होती।

निबाह मुसलसल लाज़िम
इत्तेफाक खबरे अखबार न होती।

जमीं पे गुनाहों की सजा मुकर्रर
लाशे फिरओन संगसार न होती।

कौम बढ़ती आगे हमेशा वो
इसरत की तलबगार न होती।

हो रही नस्लें तबाह रोक लो
पड़े गलियों में मंजिल पार न होती।

पैगाम ए आह सुनकर जिगर
उन नसों की तेज धार न होती।
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68. एक मुद्दत
एक मुद्दत से डरा बैठा हूँ 
शुमार जिंदों में मरा बैठा हूँ।

कोई लड़े हक़ तलफी पे मरे 
मैं हाथ पे हाथ धरा बैठा हूँ।।

आवाज उठा ए जाने वाले 
तन्हा आराम से मैं जरा बैठा हूँ।

म जुनूँ गलियों का खाकसार 
कह दूँ किससे भरा बैठा हूँ।

राहें पहचान गईं खूँ के क़तरे 
किया अपनों का अधमरा बैठा हूँ।

शिकवा महरबाँ से जुल्म का किया 
कहा मै बाड़ हूँ खेत चरा बैठा हूँ।

खुली पलकों के ख्वाब सच हों 
देख वो सपना सुनहरा बैठा हूँ।
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69. यकीं करना होगा..........
किसी का तो यकीन करना होगा 
जिंदा को एक दिन मरना होगा।

सब्र का इम्तहान चाहे जितना ले
मगरूर हिसाब के दिन डरना होगा।

ख़ाक में मिल जाएगा गुरुर अपना
जो किया हमने वो भरना होगा।

बेशक बरतरी उस खालिक की
बेजारगी ए चमन को संवरना होगा।

हुस्न ए सलूक से हो फैज़याब
कमाल रोते को हंस करना होगा।

जिगर चीर देतीं वो चीख जिगर
सहोगे कब तक कुछ करना होगा।
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70. तख्त ए दामन........
तख्त ए दामन वो तेरा नहीं 
डूबना ही था, जो मेरा नहीं। 

तारीकियाँ मकीं रोशनी गुल 
दिल चराग़ाँ तो अंधेरा नहीं।

बहुत कटा चांद बका हिज्र 
अनक़रीब दूर सवेरा नहीं।

बिकते बेलोच सरे बाजार 
मैं मुअतबर ऐरा गेरा नहीं।

यलगार कब रुका कब झुका 
बांधले नशीम बना घेरा नहीं।

जो आयेगा साथ वही अपना 
जिगर रुख होंसलों ने फेरा नहीं।
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71. मामला दिल का.........
मामला जो दिल का होगा 
मुगालता ना तिल का होगा।

खाब मुस्तकबिल का होगा 
मुश्किल वसूल मंजिल का होगा।

नजर किया रोम रोम सदका 
गवाह मेरे कातिल का होगा।

मरने के बाद ज़िंदगी बेशक 
जवाब क्या आदिल का होगा।

दर्द ना हो कहीं आस पास 
हिस्सा उस महफ़िल का होगा।

टकराने की जुर्रत करेगा हमसे 
हाँ सर उसका सिल का होगा।

चला जिगर मुतालबे की राह 
जहद हक़ से बातिल का होगा।
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72. छोड़ मय की गली......
छोड़ मय की गली यार ए हम हुआ
अब रहने दे बाक़ी जो वहम हुआ।

उनकी वो जानें रब जिनका मुहाफ़िज़
मैं उन से मिलकर खुश फ़हम हुआ।

उलझती जा रही जिंदगी सबो रोज़
ये जीना उनकी जुल्फों का खम हुआ।

काँटों की विरासत सँभालता रहा
इस पर भी टपकता लहू ना कम हुआ।

उनकी मौत जिंदगी से बेहतर हुई। सह
कोई भगतसिंह शहीद ए आज़म हुआ।

रहते सरकसी के बरअक्स सरफरोश
मदफ़न हसरत रंजो अलम हुआ।

अपनी फितरत ए जज्ब रवाँ रहे जिगर।
बारहा तालिब ए हक़ सर कलम हुआ।
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73. परिंदों को.......
परिंदों को रोकते हो दीवार से 
महरूम ए सदा परवर दिगार से।

मतलूब सूरज रोशनी का हुआ 
हुआ मुन्नवर नूर ए अनवार से।

चल मन्ज़िल से क़ब्ल नाक़याम 
दुश्वारियां पूछ रस्ते की सवार से।

कलम में ताकत मसला ए हल 
क्यों हो बलाग़त तीर तलवार से।

चीथडों में लिपटी सांसे सिसकतीं 
जिंदा पुकारी ना गई नागवार से।

जान ए जिगर जा ना लौट आना 
जिंदगी उलझी अपनों के वार से।
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74. इतना करम......
इतना करम महरबां कीजिए 
मुझे भीख ना काम दीजिये।

बातें और वादे सुनूं कब तलक
वादा किया है अंजाम दिजिए।

आशियाना बनाया बहा के पसीना
घर ढहाने का ना इल्ज़ाम दीजिए।

वफ़ा की आजमाईश, और हम से 
सितमगर बेवफा ना नाम दीजिए।

जिगर हस्ती मिटाए कौन अपनी 
अय्यारियों से ना काम लीजिए।
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75. जाम ए शहादत......
जामे शहादत पिए वो शहीद और थे 
भगत सिंह और थे वो हमीद और थे।

जज्बा वास्ते मुल्क जीने - मरने का 
रहे आजाद ख्याल वो दीद ओर थे।

उनके जामे शहादत पी के मौत हारी 
मोहसीन हिंद सहे जो सदीद ओर थे।

सुन फिरकों में न बंट ए हिंद वासी
अफवाहों से बहके वो मुरीद और थे।

जिगर फरोख्त करे हरारते ईमां 
दे कीमत दार वो खरीद और थे।
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          जिगर चूरूवी
       xxxxxx खत्म सद xxxxxx
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Chat Gpt की समालोचना - 
भाई, आपके दीवान-ए-जिगर के लिए एक भूमिका / प्रस्तावना का ड्राफ़्ट तैयार किया है। यह ऐसी भाषा में है जिससे आपका संग्रह बड़े शायरों के बीच भी इज़्ज़त के साथ पेश हो सके और पाठकों को लगे कि यह एक ईमानदार अदबी कोशिश है, न कि मुकाबले की जिद।
✒️ भूमिका
दीवान-ए-जिगर
उर्दू अदब की दुनिया में “दीवान” सिर्फ़ अशआर का संग्रह नहीं होता, बल्कि यह किसी शायर के दिल की धड़कनों, तजुर्बों और ख़्वाबों का आईना भी होता है। दीवान-ए-जिगर इसी परंपरा की एक कड़ी है।
जिगर चूरूवी (शमशेर भालू खां) ने इस संग्रह में अपने अहसासात, तजुर्बात और समाजी सरोकारों को शायरी के लफ़्ज़ों में ढालने की कोशिश की है। इन ग़ज़लों और नज़्मों में मोहब्बत की नरमी भी है, जज़्बात की गहराई भी और समाज के हालात पर सोद्देश्य टिप्पणी भी।
इस दीवान की ख़ूबी यह है कि इसमें बहर और वज़न की पाबंदी को निभाने की सच्ची कोशिश नज़र आती है। शेरों में नग़्मगी और रवानी है, जो तरन्नुम में पढ़ने पर असर बढ़ा देती है। कहीं-कहीं अल्फ़ाज़ की सादगी पाठक को सीधे दिल तक पहुँचाती है और कहीं फ़लसफ़ाना सोच उसे सोचने पर मजबूर करती है।
जिगर चूरूवी का यह पहला मुकम्मल संग्रह है, इसलिए इसमें शुरुआती सफ़र की झलकियाँ भी हैं और एक परिपक्व शायर की तलाश भी। बड़े उस्तादों के बीच इसे रखना किसी मुकाबले का दावा नहीं, बल्कि अदबी कारवाँ में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने की एक सच्ची कोशिश है।

दीवान-ए-जिगर पढ़ते हुए यक़ीन होता है कि यह सफ़र आगे और भी मुकम्मल होगा। हर शायर का पहला दीवान उसके लिए बुनियाद रखता है, और यह बुनियाद सच्चाई, जज़्बात और लय से भरी हुई है।


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भाई, यह ड्राफ़्ट मैंने तटस्थ और अदबी अंदाज़ में लिखा है, ताकि पाठक सम्मान के साथ इसे पढ़ें।
क्या आप चाहेंगे कि मैं इसे थोड़े शायरी वाले रंग (मतलब भावुक और अलंकारिक भाषा) में भी ढाल दूँ, ताकि भूमिका और नफ़ीस लगे?


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