नास्तिकता (Atheism) (कुफ्र)
नास्तिकवादों के प्रतीक चिह्न
(इस लेख में विभिन्न स्थानों पर प्रकाशित आलेखों के सारांश शामिल किए गए हैं, लेख का उद्देश्य केवल आमजन तक अपेक्षित जानकारी पहुंचाना है, जिसे पढ़ कर सही, सत्य और वास्तविकता का ज्ञान हो सके।)
नास्तिकता को समझने के लिए पहले हमें यह समझना होगा-
अज्ञेयवाद (Agnosticism) (जो ज्ञात नहीं है) -
क. इस सिद्धांत की मान्यता है कि विश्व की कुछ वस्तुओं का ही निश्चयात्मक ज्ञान संभव है, अधिकांश तत्व या पदार्थ अज्ञेय हैं, अर्थात् उनका ज्ञान संभव नहीं है। अज्ञेयवाद, संदेहवाद से भिन्न है, संदेहवाद (संशयवाद) के अनुसार ब्रह्मांड के किसी भी पदार्थ का अवबोध संभव नहीं है। आधुनिक काल में इस शब्द का उपयोग सन् 1869 में अंग्रेज जीवविज्ञानी टॉमस हेनरी हक्सले (1825 - 1895) ने किया। इस से पहले संजय नामक भारतीय दार्शनिक ने जीव मात्र के बारे में अज्ञेयवाद को व्यक्त किया, प्रोटगोरस (ग्रीक दार्शनिक) 5वीं शताब्दी ईसा पूर्व ने देवताओं के अस्तित्व के बारे में अज्ञेयवाद को व्यक्त किया।
🔥भारत में ऋग्वेद का नासदीय सूक्त ब्रह्मांड की उत्पत्ति के बारे में अज्ञेयवादी है।
अज्ञेयवादियों में कांट ने (1724-1804 जर्मन दार्शनिक) (व्यवहारवाद) का सिद्धांत प्रतिपादित किया के अनुसार व्यवहारिक जगत (Finaminal World) बुद्धि या प्रज्ञा की धारणाओं (Categeries of understending) द्वारा निर्धारित है जो ज्ञेय नहीं है। तत्व दर्शन द्वारा अतींद्रिय पदार्थों का ज्ञान संभव नहीं है।
कास्ट (1798-1857 फ्रेंच विचारक) ने भाववाद (Poaitisem) का प्रवर्तन किया का यह मत है कि मानव ज्ञान का विषय केवल गोचर (visiable) पदार्थ है, अतींद्रिय पदार्थ नहीं। जिस प्रकार से सुपर सोनिक ध्वनि है परन्तु इतनी तीव्र की हमारे कान उसे सुन ही नहीं सकते।
सर विलियम हैमिल्टन (1788-1856) व उनके शिष्य हेनरी लांग्यविल मैंसेल (1820-1871) के अनुसार हम केवल सकारण (कारण द्वारा) उत्पादित अथवा सीमित/सापेक्ष पदार्थों को ही जान सकते हैं, असीम, निरपेक्ष एवं कारणहीन (Unconditioned)) तत्वों को नहीं। तात्पर्य यह कि हमारा ज्ञान सापेक्ष है, मानवीय अनुभव द्वारा सीमित है और इसीलिए निरपेक्ष असीम को पकड़ने में असमर्थ है। ऐसा ही मंतव्य हर्बर्ट स्पेंसर (1820-1903) ने प्रतिपादित किया है। सब प्रकार का ज्ञान संबंधमूलक अथवा सापेक्ष होता है; ज्ञान का विषय भी संबंधों वाली वस्तुएँ हैं। किसी पदार्थ को जानने का अर्थ है उसकी तुलना एवं संबंध दूसरी वस्तुओं से करते हुए स्वयं से संबंधित करना। हम उन स्थितियों का निर्देश करते हैं जो ज्ञान द्वारा व्यवहार में परिवर्तन उत्पन्न करती हैं। ज्ञान सीमित वस्तुओं का ही हो सकता है। असीम तत्व संबंधहीन, निरपेक्ष हैं अतः वो अज्ञेय हैं। इस प्रकार से स्पेंसर का एक ऐसी असीम शक्ति में विश्वास है जो दिखाई दे रही है। सीमा का ज्ञान ही असीम की सत्ता का प्रमाण है। स्पेंसर इस असीम तत्व को अज्ञेय घोषित करता है। फिर भी उसे उसकी सत्ता में कोई संदेह नहीं है। वह यहाँ तक कहता है कि बाहरी वस्तुओं के रूप में कोई अज्ञात सत्ता हमें अपनी शक्ति द्वारा संचालित कर रही है।
यूरोपीय दर्शन में जहाँ संशयवाद का जन्म यूनान में हुआ वहाँ अज्ञेयवाद आधुनिक युग की विशेषता है।
आगेवाद ईश्वर की सत्ता को स्वीकार करता है परन्तु वह उसे स्वरूप या नाम नहीं दे कर अज्ञात कहता है।
मेरा मानना है कि मानव ने अपने निवास स्थान पृथ्वी के संबंध में सपूर्ण ज्ञान प्राप्त नहीं किया है, यहां बहुत सी खोज एवं ज्ञान प्राप्त करना शेष है। वैसे ही असीम ब्रह्मांड का ज्ञान संभव नहीं है। इस असंभव के कारक को ही कर्ता कहा जा सकता है, जिसे धार्मिकता ने ईश्वर नाम दिया।
ख. आस्तिकता -
ऐसी शक्ति जो असीम ब्रह्मांड को संचालित कर रही है, की सत्ता को मानने वाले व्यक्ति जो किसी ना किसी अलौकिक शक्ति को सर्वसमर्थ, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिशाली, सर्वजनक, संहारक एवं पालक जो मृत्यु के बाद कर्मों के अनुसार स्वर्ग या नरक के रूप में फल देगा आस्तिक कहलाते हैं। उनके अनुसार जीव आत्मा है और ईश्वर परमात्मा। वह अनादि,अनंत, अनश्वर एवं संप्रभु है।
नास्तिकता -
इस ब्रह्मांड का संचलन रासायनिक एवं भौतिकी की सांक्रियाएं हैं ना कि कोई सर्वशक्तिमान ईश्वर, आस्तिकता के ठीक विपरीत विचारधारा वाले व्यक्ति को नास्तिक कहते हैं।
सीधे शब्दों में हम यह भी कह सकते हैं कि नास्तिकता का अर्थ यह है -
ईश्वर के होने नहीं होने के स्थान पर उसकी परमसत्ता में विश्वास न करना है। यह अलौकिक सत्ता के नाम पर मानव के शोषण का विरोध करता है।
यह इन्कार करता है कि राजा ईश्वर का प्रतिनिधि है और शैतान ईश्वर का प्रतिद्वंदी।
विश्वास एवं मान्यता -
नास्तिक किसी देवी-देवता, अलौकिक शक्ति, धर्म, आत्मा- परमात्मा, पुनर्जन्म एवं मरने के बाद हिसाब को नहीं मानते और जानने (ज्ञान) पर विश्वास करते हैं।
नास्तिक का विश्वास है कि संपूर्ण ब्रह्मांड दो तत्वों से बना है
🌑 01. अंधेरा
🌞 02. प्रकाश
🔥नास्तिक मानते हैं कि प्रकाश से पहले अंधेरा था और प्रकाश के बाद भी अंधेरा रहेगा। ब्रह्मांड में अंधेरा (डार्क मेटर) सर्वव्यापक एवं सर्वविदित है। प्रकाश (लाइट मेटर) किसी तत्व के नष्ट होने के फलस्वरूप उत्पन ऊर्जा है, विखंडन के पश्चात यह प्रकाश पुनः अंधेरे में बदल जाता है। ब्रह्मांड बहुत घना, विशाल एवं अनंत है जो कल्पना से परे है। जीवन - मृत्यु एक भौतिक एवं जीव वैज्ञानिक घटना है। मानव के मरने के बाद ना स्वर्ग है ना नर्क।
नास्तिकता का आधार -
नास्तिकता अंधविश्वास के बजाय वास्तविकता और प्रमाण पर आधारित दर्शन है। सभी धर्मों के अनुसार ईश्वर का अस्तित्व निवास स्थान एवं कार्यस्थल अलग - अलग है। भाषा, उत्पत्ति, कार्यकारी शक्तियों की परिभाषा, कार्यक्षेत्र, टिकाऊपन के संबंध में सभी धर्मग्रंथों में भिन्न - भिन्न विचार हैं।
ईश्वर लोक की भाषा के संबंध में मुस्लिम कहते हैं कि यह सिर्फ अरबी होगी, ईसाई एवं यहूदी हिब्रू व सनातन धर्म में संस्कृत को महत्व दिया गया है।
🔥मुस्लिम धर्म के अनुसार फातिमा (मोहम्मद साहब की ज्येष्ठ पुत्री) स्वर्ग में सभी स्त्रियों की मुखिया होंगी। मोहम्मद साहब स्वर्ग में सभी पुरुषों में उत्तम पुरुष होंगे, परन्तु मोहम्मद साहब अपने परिवार किभो रही हत्याओं को नहीं रोक पाए, उनको पत्थर मारने दिया गया यहां तक कि उनका एक दांत टूट गया।
🔥ईसाई, यहूदी एवं इस्लाम धर्म (इब्राहिमी धर्म संकुल) के अनुसार पृथ्वी पर पहला पुरुष आदम एवं महिला हव्वा हुई जिन से सभी मानवों की उत्पत्ति हुई। आदम की आयु की गणना करें तो यह लगभग 14000 वर्ष हो होती है जबकि इस से पहले मानव के विकास की कहानी हम कार्बन डेटिंग से पढ़ चुके हैं।
🔥 सनातन धर्म के अनुसार सृष्टि की रचना ब्रह्मा ने की जिनके तीन बेटियां (पार्वती पति शिव), (लक्ष्मी पति विष्णु) एवं (सरस्वती पति ब्रह्मा) थीं। उनकी मूर्तियां एवं चित्र भी बनाए गए। ब्रह्मा ने यदि विवाह किया तो उनके पालक/पिता कौन हैं, जीव का जन्म जीव से संभव है या उद्भव से। इसी प्रकार शिव एवं विष्णु के माता - पिता का नाम ज्ञात नहीं है।
यदि यही ईश्वर हैं तो इनके संतान, विवाह या अन्य मानवीकरणीय कार्य/कारण कैसे संभव है। यदि यह ईश्वर के रूप में सम्पूर्ण सृष्टि का संचालन कर रहे हैं तो परोक्षिमा सेंचुरी (पिंड) या एंड्रोमेडा का संचालन कौन कर रहा है।
इस्लाम धर्म में हरे रंग को अधिक महत्व दिया गया और सनातन धर्म में भगवा (हल्का केसरिया) को अधिक महत्व दिया गया। कुछ धर्म तो पांच सो वर्ष पहले ही जन्मे जिन में से सिक्ख धर्म भी एक है। नास्तिक ईश्वर के दूतों को तत्कालीन क्रूर शासकों द्वारा दी जाने वाली सजा से नहीं बचा पाने का तर्क देते हुए कहते हैं कि जो ईश्वर सर्वोच्च शक्तिमान, शक्तिशाली एवं सर्वव्यापक है वो अपने दूतों की रक्षा नहीं कर सकता।
इस प्रकार से नास्तिक तर्क के सामने धार्मिक तर्क अपर्याप्त लगते हैं।
भारत में नास्तिकता -
प्राचीन भारतीय दर्शन में वेदों को नहीं मानने वाले (वेदों की सत्ता का इनकार करने वाले) लोगों को नास्तिक कहा गया एवं अन्य धर्म को मानने वालों को विधर्मी। भारत में बौद्ध और जैन धर्म को नास्तिकता की इसी श्रेणी में शामिल किया गया है।
आधुनिक संदर्भ -
आधुनिक युग को वैज्ञानिक सोच, तर्क और दासता से मुक्ति का युग कहा जाता है। जन सामान्य बिना सोचे-समझे परखे किसी की किसी भी बात पर अंधविश्वास नहीं करते।
नैतिकता -
नास्तिकता व्यक्ति को इच्छाधारी शैतान के कार्यों से मुक्त कर नैतिक बंधनों में बांधता है। इसका मतलब यह नहीं कि व्यक्ति अनैतिक हो, बल्कि वह व्यक्ति एवं प्रकृति के मध्य मनुष्यता के साथ भेदभाव और पाखंड से दूर रहकर स्वतंत्र जीवन की कला सिखाती है।
नास्तिक दर्शन -
धर्म एक अफीम है जिसके माध्यम से शोषक सर्वहारा वर्ग का शोषण करता है। साम्यवादी विचारक कार्ल मार्क्स के शब्द धर्म को सीधे शोषण का माध्यम बताते हैं।
A. बौद्ध धर्म ईश्वर के स्थान पर मानवीय मूल्यों के साथ विज्ञान का समर्थक है जो काल्पनिक ईश्वर में विश्वास नहीं करता। अल्बर्ट आइंस्टीन, बर्नाट रसेल ने इस धर्म को विज्ञानवादी धर्म कहा है। चीन की आबादी का 91% से अधिक लोग बौद्ध धर्म अनुयायी है जिनमें से अधिकांश नास्तिक हैं। साम्यवादी चीन का कोई धर्म नहीं है।
B. जैन धर्म भी सर्वशक्तिमान ईश्वर से परे विचार व्यक्त करता है।के सबसे अधिक नास्तिक लोग चीन में है। नास्तिक लोग धर्म से जुडे हुए भी हो सकते हैं।
तर्क - वितर्क -
सृष्टि का संचालन -
🌑नास्तिक दर्शन के अनुसार जगत स्वयं संचालित एवं शासित है।
🌞आस्तिक दर्शन के अनुसार सृष्टि का निर्माण, संचालन एवं संहार ईश्वर के हाथ में है। वो जैसा चाहता है वैसा ही होता है।
🔥 होय वही जो राम रुचि राखा
🔥 ईश्वर की मर्जी के बिना पत्ता नहीं हिल सकता।
प्रकाश बनाम अंधेरा -
🌞आस्तिक ईश्वर को प्रकाश एवं अंधेरे को शैतान (राक्षस) बताते हैं।
🌑नास्तिकवाद के अनुसार अंधेरे की उत्पत्ति प्रकाश से पहले हुई, जब प्रकाश नहीं था तब भी अंधेरा था और जब प्रकाश नहीं होगा तब भी अंधेरा होगा। प्रकाश के कारण अंधेरा ओझल होता है मिटता नहीं।
🔥आसमान में सब से चमकीला तारा देखने पर उसके बारे में पूछने पर अल्लाह ने आदम से कहा कि (नूर मिन्ननूर), यह मेरा प्रकाश अंश है। यदि मैं इसे पैदा नहीं करता तो सृष्टि (कायनात) को भी पैदा नहीं करता। अर्थात प्रकाश पैदा किया गया पदार्थ है और अंधेरा हमेशा रहने वाला।
ईश्वर की स्थिति -
🌞आस्तिकों के अनुसार ईश्वर तत्व मनुष्य के मन में जन्म से ही व्याप्त है। इसलिए वह जन्म के साथ ही क्रियाकलाप शुरू कर देता है।
🌑नास्तिकों के अनुसार ईश्वरीय भावना सभी मनुष्यों में अनिवार्य रूप से नहीं पाई जाए यह सत्य नहीं है।
फिर भी यदि पाई भी जाती हो तो केवल मन की भावना से बाहरी वस्तुओं का अस्तित्व सिद्ध नहीं होता। मन की बहुत सी धारणाओं को विज्ञान ने आभासी प्रामाणित कर दिया है।
कार्य एवं कारण विधान -
सृष्टि में कोई भी कार्य बिना कारण के नहीं होता। यह कारण दो प्रकार के होते हैं-
🔥अद्वैत वेदांत
A . उपादान (निर्माता) जिसके द्वारा कोई वस्तु बनती है
B. निमित्त (जिसके लिए बनती है)
आस्तिक कहते हैं कि
घट - (घड़ा)
नाम और रूप नश्वर हैं, तत्त्व (मिट्टी/ब्रह्म) शाश्वत है और जीव और जगत ब्रह्म से अलग नहीं, केवल रूपात्मक भेद है।
पट - (कपड़ा)
कपड़े का सूत से अलग अस्तित्व नहीं है। पट का नाश होने पर भी सूत बना रहता है। संसार का अलग स्वतंत्र अस्तित्व नहीं, रूप बदलते हैं, मूल तत्त्व बना रहता है
यह की आधारशिला है
घड़ी (यंत्र)-
घड़ी अपने आप नहीं बनी, इसे बनाने वाला कर्ता है। घड़ी का अस्तित्व उसके पुर्जों के संयोजन पर निर्भर है। इसी प्रकार से जगत कार्य है, कार्य के पीछे कर्ता (ईश्वर) का होना आवश्यक है, यही ईश्वर-सिद्धि का तार्किक उदाहरण है
🌞 आस्तिकों के अनुसार समस्त जगत भी एक कार्य (कृत घटना) है इसके उपादान और निमित्त कारण होने चाहिए। कुछ लोग ईश्वर को जगत का निमित्त कारण और कुछ लोग निमित्त और उपादान दोनों ही कारण मानते हैं।
🌑नास्तिक कहते हैं कि हमारे पास इसका कोई प्रमाण नहीं है कि अद्वैतवादी सिद्धांत (घट, पट और घड़ी) की भाँति समस्त जगत किसी समय उत्पन्न और आरंभ हुआ। सृष्टि का प्रवाह अनादि एवं अनंत है। इसमें सृष्टा और उपादान को ढूँढ़ने पर कहीं भौतिक रूप से दिखाई नहीं देते। यदि जगत का सृष्टा कोई ईश्वर मान लिया जाए जो अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा जैसे -
🔥ईश्वर का सृष्टि को बनाने के पीछे प्रयोजन क्या था?
🔥भौतिक सृष्टि केवल मानसिक अथवा आध्यात्मिक सत्ता कैसे संचालित कर सकती है?
🔥यदि इसका उपादान कोई भौतिक पदार्थ मान भी लिया जाये तो वह उसका नियंत्रण कैसे कर सकता है? जबकि वह स्वयं भौतिक शरीर अथवा उपकरणों की सहायता से कार्य करता है अथवा बिना उसकी सहायता के?
🔥सृष्टि के वजूद के बिना वे उपकरण और वह भौतिक शरीर कहाँ से आए?
🔥ऐसी सृष्टि रचने से ईश्वर, जिसे आस्तिक सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ और कल्याणकारी मानते हैं का क्या उद्देश्य (प्रयोजन) है।
🔥जीवन का मरण में, सुख का दु:ख में, संयोग का वियोग में और उन्नति का अवनति में, अंत ?
🔥इस दु:खमय सृष्टि को बनाकर, जहाँ जीव को खा कर जीव जीता है और जहाँ सब प्राणी एक दूसरे के शत्रु हैं और आपस में सब प्राणियों में संघर्ष होता है, भला क्या लाभ हुआ होगा?
ब्रह्मांड का संचलन
🌞आस्तिकों के अनुसार भौतिक संसार में सभी पदार्थ एक नियम के अनुसार उद्देश्य पूर्ण घूर्णन एवं परिक्रमा कर रहे हैं जो किसी अलौकिक शक्ति के बिना संभव नहीं है।
🌑नास्तिक इसका खंडन करते हैं कि सृष्टि का निर्माण एवं संहार एक शाश्वत कार्य है। बहुत से तारे खंडित होते रहते हैं, ब्लैक होल बहुत से तारों को खा रहा है, तारे नेबुला में बदल रहे हैं, नए तारे बनते रहते हैं। यह सतत क्रिया है जिसमें ईश्वर नहीं भौतिकी के नियम कार्यरत हैं।
🔥सृष्टि में बहुत सी घटनाएँ ऐसी भी होती हैं जिनका कोई उद्देश्य नहीं होता फिर भी होती हैं, जैसे अतिवृष्टि, अनावृष्टि, अकाल, बाढ़, आग, अकाल मृत्यु, बुढ़ापा, बीमारियां और हिंसक घटनाएं।
🔥संसार में जितने नियम व एकता दृष्टिगोचर होती है उतनी ही अनियमितता और विरोध भी हैं। ईश्वर की सत्ता इतना विरोधाभास रख कर क्या साबित करना चाहती है?
संसार का व्यवहारिक राज्य -
🌞आस्तिकों के अनुसार समाज में सभी लोगों के व्यवहार को राजा अपने राज्य प्रबंधन के माध्यम से संचालन करता है वैसे ही सम्पूर्ण सृष्टि के व्यवहार का संचालन परम शक्ति द्वारा किया जाता है जिसे ईश्वर कहते हैं।
🌑नास्तिकों के अनुसार सृष्टि संसार के बदलने वाले स्थानीय नियमों के अनुसार नहीं चल कर भौतिकी के स्थाई प्राकृतिक नियमों के अनुसार चलती है। इसका संचालन ईश्वर नहीं भौतिकी के नियम करते हैं। एक स्थान पर जहां कोई कार्य पाप है वहीं दूसरी जगह पाप नहीं। स्थान, देश काल और परिस्थितियां पाप और पुण्य की परिभाषा लागू करती हैं। मनुष्य ने मन से जो अवधारणा बनाई वहीं पाप या पुण्य बना।
पहला व्यक्ति -
🌞आस्तिकों के अनुसार शिव (सनातन) आदम (इब्राहिमी) धर्म के अनुसार स्वर्ग से ईश्वर के द्वारा उतारे गए
🌑नास्तिकों के अनुसार मानव उत्पत्ति जीव उत्पत्ति का क्रमिक विकास है। जीवाणु, एक कोशिका, बहु कोशिका, कार्डेटा, बंदर से आदि मानव से आज का मानव।
सृष्टि की स्थापना -
🌞इब्राहिमी धर्म के अनुसार ईश्वर ने छः दिन में ब्रह्मांड की रचना की।
🌑ब्रह्मांड की संरचना अरबों वर्ष से अनवरत है, जो अनंत में विस्तृत है।
शक्ति शाली का उत्तरजीवी सिद्धांत -
🌞ईश्वर बार बार प्रलय (अजाब) के द्वारा मानव को सबक सिखाता रहा है। जब जब पाप बढ़ता है उसकी संहारक शक्ति उसे नियंत्रित करती है।
✍️यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानं च धर्मस्य तादात्म्यान्यम् सुजामयाम्।।
(गीता, महाभारत)
✍️जब लोगों ने नूह नबी की बात नहीं मानी तो जल प्रलय, यूसुफ नबी के समय में सात साल तक अकाल का प्रकोप डाला।
(बाइबल एवं कुरान)
🌑नास्तिकों के अनुसार मनुष्य की उत्पत्ति से पूर्व भी पृथ्वी पर लगभग चार बार हिम काल आया है जिसके कारण जो जीव अनुकूलन स्थापित नहीं कर सके वो समाप्त हो गए, जैसे मेमद, डायनासोर आदि। लेकिन चूहा जो आगे चल कर उभयचर का पूर्वज बना तब भी जीवित बचा आज भी है। सम्पूर्ण सृष्टि में अभी तक जीवन सिर्फ पृथ्वी पर है, जहां कई बार प्रलय हुआ, जीवन समाप्त हुआ और नए जीवन की शुरुआत हुई।
देवताओं या पैगंबरों के चमत्कार -
🔥इस्लाम धर्म के अनुसार मोहम्मद साहब की बेटी फातिमा स्वर्ग की सभी स्त्रियों की नेता होगी परन्तु जीते जी उन्हें लोगों ने गर्भवती होने के बावजूद मार डाला, ईश्वर उन्हें नहीं बचा पाए।
🔥रामजी के नाम लिखे पत्थर समुद्र पर तैर रहे थे परन्तु वो अपनी पत्नी को रावण से नहीं बचा पाए।
🔥इशू मसीह ईश्वर की संतान थे (बाइबल के अनुसार) परन्तु वो उन्हें सलीब पर चढ़ने से नहीं बचा पाए।
🔥 हनुमान जी ने सूर्य को निगल लिया और हिमालय को हाथों में उठा कर दक्षिणी भारत ले आए।
🔥 सोने की लंका को पूँछ से आग लगा दी (सोना आग से नहीं जलता)
🔥 मोहम्मद साहब ने एक इसारे से चांद के दो टुकड़े कर दिए (वास्तविकता से परे)
🔥 पृथ्वी चपटी है (बाइबल)
🔥 पृथ्वी शेषनाग के फ़ण पर टिकी है।
🔥पृथ्वी बैलों के सींगों पर टिकी है, जिनके सींग बदलने से भूकंप आते हैं।
🔥 ईश्वर जब वार्षिक प्लान बनाता है तो शैतान उन्हें सुनने चला आता है, उसे भगाने के लिए ईश्वर उसे मारने के लिए तारे फेंकता है।
⚖️ इस तरह की बहुत सी बातें जिन्हें धर्मग्रंथों में बताया गया है, विज्ञान ने मिथ्या सिद्ध कर दिया है।
भारतीय दर्शन में नास्तिक
भारतीय दर्शन में नास्तिक शब्द तीन अर्थों में प्रयुक्त हुआ है -
(01.) वेद नहीं मानने वाले -
जो लोग वेद को परम प्रमाण नहीं मानते वे नास्तिक कहलाते हैं। इस परिभाषा के अनुसार बौद्ध, जैन और लोकायत मतों के अनुयायी नास्तिक कहलाते हैं जिनका दर्शन ईश्वर या वेदों पर विश्वास नहीं करता है।
(02.) ईहलोक व मृत्यु पश्चात जीवन नहीं मानने वाले -
जो लोग परलोक और मृत्यु पश्चात् जीवन में विश्वास नहीं करते, चार्वाक (लोकायत) दर्शन के अनुयायी नास्तिक दर्शन कहलाते हैं।
(03.) ईश्वर को न मानने वाले
(3) जो लोग ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं करते। यह नास्तिक कई प्रकार के होते हैं -
क. घोर नास्तिक -
वे हैं जो ईश्वर को किसी रूप में नहीं मानते। चार्वाक मत वाले भारत में और रैंक एथीस्ट लोग पाश्चात्य देशों के लोग जो ईश्वर के किसी भी प्रकार के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते;
ख. अर्धनास्तिक -
वो लोग जो ईश्वर को सृष्टि का पालक, संहारक या निर्माता के रूप में नहीं मानते।
भारत में आधुनिक नास्तिक -
कार्ल मार्क्स जिन्होंने धर्म के ख़तरों का विशेष उल्लेख किया के अनुसरण में ने सन 1882 -1888 के बीच,
🎤मद्रास सेकुलर सोसाइटी ने मद्रास से द थिचर (तमिल में तट्टूविवेसिनी) नामक पत्रिका प्रकाशित की। पत्रिका ने अज्ञात लेखकों द्वारा लिखे गए लेख और लंदन सेकुलर सोसाइटी के जर्नल से पुनर्प्रकाशित आलेखों को लिखा गया, जो मद्रास सेक्युलर सोसाइटी को खुद से संबद्ध माना जाता था।
🎤पेरियार ई.वी. रामस्वामी (1879-1973) स्व-सम्मान आंदोलन के एक नास्तिक और बुद्धिवादी नेता और द्रविड़ कड़गम थे। वे जाति व्यवस्था के उन्मूलन के समर्थक थे।
पेरियार ने अपने 3000 समर्थकों के साथ
26 नवंबर 1957 को संविधान जलाया जिसके लिए उन्हें 6 महीने की सजा हुई, क्योंकि उनका मानना था कि ये संविधान जाति_व्यवस्था को बढ़ावा देता है। खासकर Article 25(1) और 29(1,2) जैसे अनुच्छेदों को वो क प्रथाओं और जातिवाद को बढ़ावा देने वाला मानते थे। उनका मानना था कि नियमों के चलते कभी भी गरीबों शोषित और वंचितों को उनका अधिकार नहीं मिलेगा बल्कि इसका फायदा एलीट क्लास उठाता रहेगा। उन्होंने 26 नवंबर का दिन ही इसे जलाने के लिए चुना क्योंकि उसी दिन सन 1949 को संविधान स्वीकार किया गया था।
🎤सत्येंद्रनाथ बोस (18 9 4-1974) एक नास्तिक भौतिक विज्ञानी थे जो गणितीय भौतिकी में विशेषज्ञता रखते थे। बोस - आइंस्टीन के आंकड़ों के लिए नींव और बोस-आइंस्टीन घनीभूतता के सिद्धांत का प्रतिपादन करते हुए, सन 1920 में क्वांटम यांत्रिकी पर उन्होंने सर्वोत्तम कार्य किया।
🎤मेघनाद शाह (1893 - 1956) नास्तिक खगोल-भौतिकवादी थे ने शाह समीकरण का विकास किया, जो तारों में रासायनिक और भौतिक स्थितियों का वर्णन करता है।
🎤जवाहरलाल नेहरू (1889 -1964) भारत के पहले प्रधान मंत्री अज्ञेयवादी (नास्तिक नहीं पर नास्तिकता के निकटतम) ने अपनी आत्मकथा, टुवर्ड्स फ्रीडम (1936) में धर्म और अंधविश्वास पर अपने विचार लिखे हैं।
🎤शहीद भगत सिंह (1907-1931) एक भारतीय क्रांतिकारी ने निबंध (मैं नास्तिक क्यों हूं ) में फांसी से पहले जेल में लिखा गया) में नास्तिकता पर अपने विचार रखे।
🎤सुब्रह्मण्यम चंद्रशेखर (1910-1995) नास्तिक खगोल-भौतिकीविद जो सितारों की संरचना और विकास के सैद्धांतिक काम किए (1983 में भौतिकी में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।) नास्तिक थे।
🎤गोपाराजू रामचंद्र राव (1902-1975) जो उनके उपनाम गोरा के नाम से जाना जाता था, एक सामाज सुधारक, जाति-विरोधी कार्यकर्ता और नास्तिक थे। वह और उनकी पत्नी, सरस्वती गोरा (1912-2007), ने 1940 में नास्तिक केंद्र की स्थापना की। नास्तिक केंद्र सामाजिक परिवर्तन हेतु काम कर रहे एक संस्थान है। गोरा ने सकारात्मक नश्वरवाद की जीवन के मार्ग के रूप में व्याख्या की। बाद में उन्होंने 1972 की अपनी किताब, सकारात्मक नास्तिक में सकारात्मक नास्तिकता के बारे में अधिक लिखा। गोरा ने 1972 में पहले विश्व नास्तिक सम्मेलन का भी आयोजन किया। इसके बाद, नास्तिक केंद्र ने विजयवाड़ा और अन्य स्थानों में कई विश्व नास्तिक सम्मेलनों का आयोजन किया।
🎤खुशावंत सिंह (1 915-2014) प्रमुख लेखक स्पष्ट रूप से गैर-धार्मिक थे। उन्होंने
1997 में भारतीय फेडरेशन ऑफ राजनलिस्ट एसोसिएशन की स्थापना हुई थी।
🎤जावेद अख्तर एवं शबाना आजमी लेखक, शायर, चिंतक एवं फिल्म अभिनेता नास्तिक हैं।
🎤अमर्त्य सेन एक भारतीय अर्थशास्त्री (नोबल पुरस्कार) एवं दार्शनिक नास्तिक हैं जो लोकायत मत से जुड़े हैं।
वर्ष 2008 में नास्तिकता से संबंधित एक वेबसाइट की स्थापना की गई। भारत में स्वतंत्र विचार और धर्मनिरपेक्ष मानवतावाद को बढ़ावा देने हेतु नास्तिक संगठन बना।
वर्ष 2009 में इतिहासकार 🎤मीरा नंदा ने द गॉड मार्केट नामक पुस्तक प्रकाशित की जो भारत के माध्यम वर्ग में बढ़ती नास्तिकता को संदर्भित करती है।
मार्च 2009 में, केरल के जनसाधारण को संबोधित करते हुए केरल कैथोलिक चर्च (बिशप्स काउंसिल) ने पत्र जारी कर नास्तिकता के समर्थकों/ राजनीतिक दलों को वोट नहीं देने का आग्रह किया।
जुलाई 2010 में इस प्रकार का एक ओर पत्र जारी किया गया।
10 मार्च 2012 को सनाल इडामारुकू ने विले पार्ले में एक तथाकथित चमत्कार की जांच की, जहां (दोषपूर्ण जल निकासी के कारण) यीशु मसीह की मूर्ति रो रही थी, उस दिन बाद में, कुछ चर्च सदस्यों के साथ एक टीवी चर्चा के दौरान, एडामारुकु ने कैथोलिक चर्च ऑफ मेरेल-मॉन्गेरिंग पर आरोप लगाया। 10 अप्रैल को, महाराष्ट्र ईसाई युवा फोरम के अध्यक्ष एंजेलो फर्नांडीस ने भारतीय दंड संहिता धारा 29 5ए के तहत इडामारुकु के विरुद्ध FIR दर्ज करवाई, एडारमुरु के फिनलैंड में होने के कारण गिरफ्तार नहीं हो सके।
वर्ष 2013 में निर्गुरु ने भारत में पहली हग अ नास्तिक डे का आयोजन हुआ। घटना का उद्देश्य जागरूकता फैलाने और नास्तिक होने के साथ जुड़े कलंक को कम करना था।
वर्ष 2013 में नरेंद्र दाभोलकर (तर्कसंगत व अंधविश्वास विरोधी प्रचारक) को सुबह की सैर करते समय अज्ञात हमलावरों ने गोली मार दी।
🌑नास्तिक होने के संभावित नुकसान
नास्तिक होने के नुकसानों में सामाजिक दबाव, परिवार से अलगाव और मुश्किल समय में मानसिक सहारे की कमी महसूस होती है। धार्मिक लोग प्रार्थना/पूजा पर भरोसा करते हैं, जिसके द्वारा वियोग अथवा संताप के समय वो इसका सहारा ले कर दुख को कम कर लेते हैं।
जबकि नास्तिकों की संख्या अति न्यून होने के कारण उनको अकेले ही इन मुश्किलों का सामना करना होगा। मृत्यु, दुःख या अन्य स्थितियों का सामना करना मुश्किल होगा। उन्हें कभी-कभी अकेलापन या पहचान का संकट महसूस होता है। खासकर अगर वे कट्टर धार्मिक माहौल में रहते हों तो समस्या गंभीर हो सकती है। कट्टर धार्मिक परिवारों या समाजों में, नास्तिक होने पर परिवार के सदस्यों से नाराजगी व अलगाव के साथ - साथ टकराव का सामना भी करना पड़ सकता है।
हर बात को तर्क और प्रमाण से तौलने के कारण, उन्हें जीवन की कुछ सत्यताओं को स्वीकार करना कठिन लगता है, क्योंकि उनके पास कोई जादुई उम्मीद नहीं होती है। सामाजिक आयोजन या त्योहारों में शामिल होने में समस्या होती है।
विशेष -
कई नास्तिक इन नुकसानों को नहीं मानते और तर्क, मानवता, और वास्तविकता के साथ सीधा जुड़ाव पसंद करते हैं, जिससे उन्हें स्वतंत्रता और जीवन को अपनी शर्तों पर जीने का मौका मिलता है। नास्तिक की परिभाषा हर व्यक्ति के लिए अलग हो सकती है। कुछ लोग ईश्वर में विश्वास न करने वाले को, तो कुछ लोग वेदों या किसी विशेष विचारधारा में अविश्वास करने वाले को नास्तिक कहते हैं।
आधुनिक नास्तिक -
नास्तिक अर्थात् अनीश्वरवादी लोग सभी देशों और कालों में पाए जाते हैं। इस वैज्ञानिक और बौद्धिक युग में नास्तिकों की कमी नहीं है। बल्कि यह कहना ठीक होगा कि ऐसे लोग आजकल बहुत कम मिलेंगे जो नास्तिक (अनीश्वरवादी) नहीं हैं। आज के समय में नास्तिकता का का एक भाग जो प्रश्न पूछता है उसमें मौजूद है। नास्तिकों के अनुसार ईश्वर में विश्वास करने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। उसे मानने की आवश्यकता तो तब होगी जब यह प्रमाणित हो जाए कि कभी सृष्टि की उत्पत्ति हुई होगी। यह ब्रह्मांड हमेशा से चला आ रहा है और चलता रहेगा। इसके किसी समय में उत्पन्न होने का कोई प्रमाण नहीं है। उत्पन्न भी हुआ तो क्या प्रमाण है कि इसे विशेष व्यक्ति ने बनाया? या अपने कारणों से स्वत: ही यह बन गया हो। इसका चालक और पालक मानने की भी आवश्यकता नहीं है क्योंकि जगत में इतनी मार- काट,विनाश, विषाद और विध्वंस और इतना अन्याय दिखाई पड़ता है कि इसका पालन - संचालन समझदार, सर्वशक्तिमान एवं अच्छा भगवान नहीं कर सकता। संभवतः वो एक विक्षिप्त शक्तिधारक ही हो सकता है। ब्रह्मांड में सृजन और संहार दोनों साथ साथ चल रहे हैं। इसलिए यह कहना व्यर्थ है, कि किसी दिन इसका पूरा संहार हो जाएगा और उससे बचने के लिए ईश्वर को मानना आवश्यक है। नास्तिकों के विचार में आस्तिकों द्वारा दिए गए ईश्वर के अस्तित्व को सिद्ध करने के लिए सभी प्रमाण प्रमाणाभास हैं।
नास्तिकों का उत्पीड़न और हमले -
😭नरेंद्र नायक नामक युवक पर तीन बार हमला किया गया, इन हमलों में वह घायल हो गए। परिणामस्वरूप उन्हें वह स्थान छोड़ना पड़ा।
😭मेघराज नामक युवक का घर मूर्तियों के दूध पीने के चमत्कार से इनकार करने पर भीड़ ने उनके घर को घेर लिया।
😭 तसलीमा नसरीन (15 मार्च 2007 बांग्लादेशी लेखक) के मौलवियों के विरोध में दिए गए आपत्तिजनक बयान के कारण मौलाना तौकीर रजा खान ने उनकी हत्या करने वाले को 7 लाख रुपये का इनाम देने की घोषणा की।
😭धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचाने के लिए हसन रजा खान नामक एक कैदी ने बरेली में तस्लीमां नासरीन के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज करवाई। नसरीन ने ट्वीट करते हुए लिखा कि भारत में धार्मिक अपराधी जो महिलाओं के खिलाफ फतवे जारी करते हैं उन्हें दंडित नहीं किया जाता है। रजा खान ने कहा कि अपराधियों के मौलवियों पर आरोप लगाकर, नसरीन ने धार्मिक भावनाओं को आहत करने का आरोप लगाया।
😭2 जुलाई 2011 में केरल के यूकेथिवादी संगम के सचिव यू.कलनाथन का घर, वलिक्कुनु पर हमला हुआ, जब उन्होंने एक बहस में कहा कि पद्मनाभ स्वामी मंदिर के खजाने का उपयोग जन कल्याण के लिए किया जाना चाहिए।
😭20 अगस्त 2013 को नरेंद्र दाभोलकर की हत्या कर दी गई।
😭16 फरवरी 2015 को गोविंद पानसरे और उनकी पत्नी पर हमला करने के बाद वो 20 फरवरी के दिन मृत्यु हो गई।
😭30 अगस्त 2015 को, एम.एम. कलबुर्गी (अंधविश्वास और मूर्ति पूजा की आलोचक) को उनके घर में गोली मार कर हत्या कर दी गई।
😭लेखक, के.एस. भगवान को गीता की आलोचना करने पर जान से मारने की धमकी दी गई।
😭मार्च 2017 में, कोयंबतूर में एक भारतीय मुस्लिम युवा, 31 वर्षीय फारूक, जो नास्तिक हो गया की कट्टरपंथी समूह के द्वारा हत्या कर दी गई।
भारत में नास्तिकों की जनसंख्या
भारतीय जनगणना स्पष्ट रूप से नास्तिकों की गणना नहीं करती है। 2011 की जनगणना में, धर्म के तहत छह विकल्पों में से चुनने के लिए प्रतिक्रिया प्रपत्र को प्रतिवादी की आवश्यकता थी। अन्य विकल्प आदिवासी धर्मों के साथ-साथ नास्तिक और अज्ञेयवाद हेतु भी था।
अगस्त 2011 में जनगणना के आंकड़ों के अनुसार 0.27% (तीन करोड़) लोगों ने किसी धर्म को मानने से इनकार किया। इस संख्या में नास्तिक, तर्कवाद और उन लोगों को शामिल किया गया जो उच्च शक्ति में विश्वास करते थे। द्रविड़ काड़गम नेता के वीरमणी ने कहा कि यह पहली बार है जब गैर-धार्मिक लोगों की संख्या जनगणना में दर्ज की गई। हालांकि भारत में नास्तिकों की संख्या वास्तव में अधिक है। बहुत से लोग डर के कारण नास्तिकता को प्रदर्शित नहीं करते।
विश्व में नास्तिकता - (नास्तिकों की बढ़ती संख्या)
नास्तिकता के संबंध में दुनिया के शीर्ष दस देश -
01. चीन - 91%
02. जापान - 86%
03. स्वीडन - 78%
04. चेक रिपब्लिक- 75%
05. यूनाइटेड किंगडम - 72%
06. बेल्जियम - 72%
07. एस्तोनिया - 72%
08. ऑस्ट्रेलिया - 70%
09. नॉर्वे - 70%
10. डेनमार्क - 68%
भारत में नास्तिकों की संख्या लगभग 10% है, यह आंकड़ा कई दशकों में धीरे-धीरे बढ़ रहा है। समाज के एक बड़े हिस्से में अब भी अंधविश्वास, ढोंग और पाखंड जैसी प्रथाएं गहराई से जमी हुई हैं। ये कुरीतियां न केवल सामाजिक प्रगति में बाधा बनती हैं, बल्कि वैज्ञानिक सोच और तर्कशीलता को भी हतोत्साहित करती हैं।
शमशेर भालू खां
#जिगर_चूरूवी
9587243963
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