मूलांश (हिंदी कविता संग्रह)
कवि का परिचय -
नाम - शमशेर खान
उपनाम - प्रेम, शमशेर गांधी
तखल्लुस - पहले परवाना नाम से लिखना शुरू किया। पत्नी अख्तर बानो (सदफ) के सुझाव पर जिगर चूरूवी नाम से लिखना शुरू किया।
पैदाइश - 18.04.1978 सहजूसर, चूरू (राजस्थान)
पिता का नाम - श्री भालू खां (पूर्व विधायक (1980 से 1985), चूरू।
माता का नाम - सलामन बानो (गृहणी)
ताअलिम -
1. रामावि सहजूसर में पहली कक्षा में दाखिला 10.07.1984 से 1993 में मेट्रिक तक।
2. राउमावि बागला, चूरू से हेयर सेकंडरी 1993 से 1995 तक
3. राजकीय शिक्षक प्रशिक्षण विद्यालय भाषाई अल्पसंख्यक अजमेर से BSTC, 1995 से 1997
4. राजकीय लोहिया महाविद्यालय चूरू से स्वयंपाठी के रूप में स्नातक 1998 से 2001 तक (महाराजा गंगा सिंह विश्वविद्यालय, अजमेर)
5. राजकीय लोहिया महाविद्यालय चूरू से स्वयंपाठी के रूप में अधिस्नातक 2004 से 2005 तक (महाराजा गंगा सिंह विश्वविद्यालय बीकानेर से गोल्ड मेडलिस्ट - 2005 उर्दू साहित्य)
6. कश्मीर विश्वविद्याल, श्रीनगर के नंद ऋषि शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय से B.Ed.- (2007 - 8)
7. इंदिरा गांधी मुक्त विश्वविद्यालय से विशेष आवश्यकता विद्यार्थियों के शिक्षण हेतु विशेष अध्ययन - 2012
8. वर्तमान में LLB में प्रवेश (13.08.2025 से)
विवाह - पत्नी अख्तर बानो (सदफ) से 20.10.1996 में विवाह हुआ।
संतान - तीन पुत्रियां
1. अंजलि खान (LLM)
2. रोजा खान (BSC Nursing) सेवारत
3. प्रेरणा खान (BSC Nursing) सेवारत
व्यवसाय -
1. निजी विद्यालय शिक्षक एवं विद्यालय संचालन - 1997 से 1999
2. राजकीय सेवा तृतीय श्रेणी अध्यापक 10.07.1999 से 14.12.2014 तक
3. द्वितीय श्रेणी शिक्षक 14.12.2014 से 01.09.2023 तक
4. स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति 01.09.2023 से
पद -
1. तहसील अध्यक्ष - शिक्षक संघ शेखावत, चूरू
2. जिला मंत्री शिक्षक संघ शेखावत चूरू
3. प्रदेशध्यक्ष, सर्व शिक्षा अभियान कर्मचारी संघ, राजस्थान
4. प्रदेशाध्यक्ष, युवा मुस्लिम महासभा, राजस्थान
5. प्रदेश संयोजक, राजस्थान तृतीय भाषा बचाओ आंदोलन
6. प्रदेश संयोजक, संविदा मुक्ति आंदोलन राजस्थान
7. प्रदेश सचिव अखिल भारतीय कांग्रेस सेवादल 2024 से
8. जिलाध्यक्ष शिक्षक प्रकोष्ठ कांग्रेस, चूरू 2025 से
9. संयोजक चूरू विधानसभा समस्या एवं समाधान समिति, चूरू
आंदोलन -
1. संविदा मुक्ति आंदोलन
2. दांडी यात्रा
3. सामाजिक सरोकार
पुस्तकें -
1. मिरातुल जिगर
2. हृदयांश (हिंदी कविता संग्रह)
3. कालजे री कोर (राजस्थानी कविता संग्रह)
4. कसासुल जिगर - गजल समूह
5. मिनाज ए जिगर - नज़्म संग्रह
6. मूलांश
7. इमरान ए जिगर
8. प्रस्तुत पुस्तक के बारे में -
लेखक ने उर्दू, हिंदी, मारवाड़ी भाषा की लगभग सभी विधाओं में कलम आजमाई है। प्रस्तुत दीवान शमशेर भालू खां का प्रथम प्रयास है। लेखक का मत है कि वर्तमान समय में काव्य में शुद्ध भाषा एवं शख्त बहर, गेयता और माप का चलन संभव नहीं है। इस दौर में भाषाओं के कुछ शब्द इस तरह से घुलमिल गए हैं कि उन्हें एक भाषा में बांधना शब्द के साथ अन्याय होगा। हिंदी - उर्दू दोनों भाषाओं में सम्मिलित ग़ज़ल, गीत, कविता एवं छंदों का उपयोग आम बात हो गई है।
अतः हमें बंधनों को तोड़ते हुए सम्मिलित विधाओं में सभी भाषाओं का मेल करते हुए साहित्य सृजन करना चाहिए।
अंत में लेखक के कथन अनुसार उन्होंने इस किताब को किसी भी बंधन से मुक्त रखते हुए भावों को जनता तक पहुंचाने का एक छोटा सा प्रयास किया है।
शायर की जुबान.....
तूफ़ाँ बनकर उड़ेंगे हम ज़ुल्म के साये से
वही अज़ियत वही दर्द इंसान पराए से।
समालोचना -
शमशेर भालू खां सहजूसर "जिगर चूरूवी" का यह कविता संग्रह, जो कि पर उपलब्ध है, उसमें कुल 80 कविताएँ संकलित हैं। इस संग्रह की समीक्षा इस प्रकार की जा सकती है:
सामाजिक और मानवीय मूल्यांकन -
यह संग्रह समकालीन सृजनात्मकता का प्रदर्शन करता है, जिसमें कवि ने जीवन के विविध पहलुओं — प्रेम, संघर्ष, आत्मबल, सामाजिक जिम्मेदारी एवं देशभक्ति — का प्रभावशाली चित्रण किया है। कविताएँ न केवल व्यक्तिगत अनुभवों और भावनाओं का संप्रेषण करती हैं, बल्कि समाज में व्याप्त दोषों और अच्छाइयों का भी व्यापक परिदृश्य प्रस्तुत करती हैं।
विषयक विविधता और गहराई -
संग्रह में विविध विषयों पर कविताएँ हैं जिनमें से कुछ सामाजिक चेतना की बातें हैं, जैसे -
राष्ट्रीय जागरूकता और राष्ट्रीयता - (जैसे “लोकतंत्र को बचाओ”),
-सामाजिक बदलाव - (जैसे “सत्ता”, “सपने”, “युवाओं का संघर्ष”),
- व्यक्तिगत जीवन के संघर्ष - (जैसे “आसमान की छत”, “घाव”, “सपने”)।
साहित्यिक स्तर पर इन कविताओं का भाषा-संस्कार सरल पर ओजपूर्ण है, जो दिल से निकल कर सीधे हृदय तक पहुंचती हैं। भावों की सच्चाई इन्हें अधिक प्रभावशाली बनाती है।
शैली और अभिव्यक्ति -
शामशेर का कवि-साहित्य सामाजिक और आत्मिक दोनों पक्षों को समेटे हुए है। उनका शब्द चयन सहज होने के साथ-साथ बहुत खुलापन रखता है, जिससे पाठक की कल्पना, संवेदना और मनोरथ सहजता से जुड़ जाते हैं। कुछ कविता मुक्त छंद और कुछ छंदबद्ध हैं, जो कविता के प्रवाह को मजबूत बनाते हैं।
सामाजिक संदेश और नैतिकता -
संग्रह की अधिकांश कविताएँ स्पष्ट सामाजिक और नैतिक संदेश देती हैं, लेकिन साथ ही कुछ ऐसी कविताएँ भी हैं जिनमें संदेश की स्पष्टता अभी भी पाठक की समझ और राजनीतिक परिप्रेक्ष्य पर निर्भर करती हैं। यह भी कहा जा सकता है कि इनमें से कुछ कविताएँ ऐसी भी हैं जिनकी नैतिकता स्पष्ट न होकर संदिग्धता भरे अर्थ लिए हो सकती हैं, जैसे “सत्ता” या “भ्रष्टाचार” जैसे विषय।
समीक्षा का निष्कर्ष-
यह संग्रह साहित्य में वैचारिक प्रगति और सामाजिक जागरूकता का उत्कृष्ट नमूना है। कवि ने समकालीन जीवन के जटिल अनुभवों, संघर्षों और भावनाओं को अपनी कविता के माध्यम से बड़े ही प्रभावी ढंग से व्यक्त किया है। यह संग्रह पाठकों को विचारशील, सामाजिक और राष्ट्रीय जिम्मेदारी की ओर प्रेरित करता है।
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01. लोकतंत्र ....
02. अहसान....
03. एक गीता एक कुरान...
04. सेवा....
05. चिड़िया........
06. व्यथा.....
06. खून से बनी......
07. लाते हैं..
08. धो बैठे...
09. पापाचार....
10. आज....
11. खोज.....
13.घर बनवाए.....
14. हृदय रामायण.......
15. सपने...
16. बलिदान....
17. वाह मोदी जी....
18. जिम्मेदारी...
19. अधिकारी....
20. मानुष.....
21. आऊं....
22. कोशिश....
23. हम...
24. कौन......
25. एक मां......
26. शक्ति......
27. संघर्ष.........
28. घाव........
29. धूप........
30. साथी........
31. पथ......
32. बेटियां......
33. धर्म.......
34. दिवाली....
35. भाई दूज.......
36. काम करो....
37. गुरू नानक देव.....
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01. लोकतंत्र .......
लोकतंत्र को बचाने चलोखुदी को आजमाने चलो
मत बनाओ बहाने चलो
चलो साने बा साने चलो
कटे सर गोली खाने चलो
कुछ खोने कुछ पाने चलो
पुरखों ने दिया बलिदान
आजादी का अभयदान
जवाहर लाल का सम्मान
इंदिरा राजीव जय जवान
लगे तानाशाह ठिकाने चलो
कुछ खोने कुछ पाने चलो
संसद की मर्यादा भंग है
चौकीदार चोर के संग है
चौथा स्तंभ मौनी रंग है
देखो सारी दुनिया दंग है
हिम्मत है आजमाने चलो
मन का डर भगाने चलो
राम लीला मैदान पुकारे
जीता कब जो मन से हारे
राहुल जय जयकार के नारे
आओ लगाएं हम सब सारे
चने लोहे के चबाने चलो
पकड़े पुलिस या थाने चलो
चल अभी दिल्ली दूर नहीं
अन्याय के आगे मजबूर नहीं
झूठ सच का सिंदूर नहीं
सत्ता के नशे में चूर नहीं
असलियत क्या बताने चलो
ढोंगी का भरम मिटाने चलो
02. अहसान...
रंग बिखरे और बढ़े मुस्कान
प्रगति पथ बढ़ता राजस्थान।
संविदाकर्मियों को जीवनदान
नहीं भूलेंगे आपका अहसान।
वादा निभाया आपने जो कहा
करते जाएं आपका गुणगान।
कोई कहे कुछ अवगुणकारी
हम आपके साथ सीना तान।
चिरंजीवी, पेंशन व सस्ती गैस
खुशहाल गृहणी, युवा, किसान।
03. एक गीता एक कुरान..
लाखों तारे एक आसमान
एक जमीन का इंसान।
एक चांद एक सूरज
गर्दिश करते सीना तान।
एक संदेश बाइबल का
एक गीता एक कुरआन।
आजा जुदा हैं जिस्म के
एक दिल और एक जान
एक ईश्वर एक खुदा है
एक अल्लाह एक भगवान।
एक साया एक ही सरमाया
एकता में सब का कल्याण।
04. सेवा....
कौन किस की सेवा करे
कौन यहाँ रखवाला है
सागर की तह में जन्मा
उसे पाले ऊपर वाला है।
किसकी इतनी जुर्रत हुई
नदियों को जो बांध सके
मुश्किल में देता हिम्मत
दाता सबको देने वाला है।
जिसकी लाठी बे आवाज
उसका हुआ अमर राज
सब का मालिक एक ही
गोरा या फिर काला है।
तपता सूरज सृष्टि पर
सकल उजास चुहुँ ओर
प्रकाश व अंधकार कू
एक सा बाँटे उजाला है।
मुसिबत आन पड़े तो
कोई तोड़ निकलता है
कंकड़ डाल के पानी पीता
प्यासा कौआ काला है।
05. चिड़िया.......
प्रातः काल
गुमसुम चिड़िया
बेटी थी अकेली
मायूस
मेरे घर के पास
बड़े टॉवर की
फोलादी एंगल पर
चोंच मार कर
पूछ रही थी
एक सवाल।
यहां था कभी
एक पेड़ नीम का
खूब निंबोलिया
घनी छांव
ठंडक
कहां गया
तपती एंगल पर
भूखी चिड़िया
पूछ रही थी
एक सवाल।
उसकी वेदना
मानो चीर देगी
सम्पूर्ण शांति
रोक देगी
निर्बाध विकास की
गति
गूंजती कानों में
चित्कार बन कर
अनवरत
एक सवाल।
मै उठा
ढूंढने जवाब
मालिक ने कहा
पेड़ नहीं दे सकता
महीने की आमदनी
तेज गति इंटरनेट
उसे काट कर
उगा दिया
एंगल वाला टॉवर
निशब्द मैं
अनुत्तरित
चिड़िया का
एक सवाल।
06. व्यथा.....
व्यथा और अवसाद से दूर
हे मनुज, कौन हुआ मशहूर।
जन्म जननी तुझ पर संताप करे
हे हेय, डूब मर जो पाप करे।
दाता ने दिया तुझ को अविराम
हो निकृष्ट, क्यों कर गंवाये नाम।
पुश्तों से पीढ़ियों ने सत्कर्म किये
विधर्मी, गंवाया सब अधर्म किये।
तात पिता कुल का ना नाम किया
किया रे, नाम को बदनाम किया।
गली गांव मोहल्ला थूकता है
हे अग्रज,अनुज से क्या पूछता हैं।
समय पर संभाल अपना व्यवहार
ताकि कल ना हो तु लाचार।
06. खून से बनी....
यह दुनिया खून से बनी है
जो टपक के रंग दिखाता है।
खेत में किसान के पसीने से
काम पे मजदूर के माथे से
सरहद पर जवान के सीने से
जो टपक के रंग दिखाता है।
यह दुनिया खून से सनी है
जो बहता है और रंग लाता है।
क्रांति के मैदानों में लहू के धारे
कौन किस को कब कहां मारे
हां बेजा वो जां रेजी के नजारे
बहता हुआ खून रंग लाता है।
यह दुनिया खून पे मुबनी है
ज़िंदा है रगों में दौड़ कर
जमे जिस्म को छोड़ कर
कोई पीता है निचोड़ कर
पर खून है रंग दिखाता है
टपक के नई उम्मीद लाता है।
07. लाते हैं....
किसान की फसल
घराने की नसल
बिना सार संभाल
बड़ी बर्बादी लाते हैं।
ज्यादा लाड़ से बेटी
बातें गुड़ लपेटी
मकड़ी का जाल
बड़ी बर्बादी लाते हैं।
हद पार का सहना
बुते से बाहर रहना
कुटिलता औऱ चाल
बड़ी बर्बादी लाते हैं।
फ़टे हुये कपड़े
रोज़-रोज़ के झगड़े
लगातार का अकाल
बड़ी बर्बादी लाते हैं।
डुलाये रातों पालना
बड़ों की बात टालना
बेटा हो जाये वाचाल
बड़ी बर्बादी लाते हैं।
ओछी बोली बोलना
ताख से कम तोलना
मंगते का लिया माल
बड़ी बर्बादी लाते हैं।
गरीब को सताना
घर के भेद बताना
निराशा का जंजाल
बड़ी बर्बादी लाते हैं।
08. धो बैठे...
मज़दूर कमाई से हाथ धो बैठे
बालक पढाई से हाथ धो बैठे
कैद हम घुमाई से हाथ धो बैठे
अंत्येष्टि भी कतार में होना है
किस-किस से हाथ धोना है
किराया चालू दुकान बंद है
रसोई खाली मकान बन्द है
घर घमाचौकड़ी मैदान बन्द है
आदमी टूटता सा खिलौना है
किस-किस से हाथ धोना है।
लूटता धरती का भगवान हमें
बेचता समझकर सामान हमें
करना कब तक विषपान हमें
यह जीवन बना बोझ ढोना है
किस- किस से हाथ धोना है।
सोये देवता नींद में फरिश्ते
अब तार-तार होने लगे रिश्ते
जमी आसमान के बीच पीसते
बहुत खो चुके कितना खोना है
किस-किस से हाथ धोना है।
मुश्किल के पल छंट जायेंगे
मुसीबत के दिन कट जायेंगे
पुण्य करने से पाप घट जायेंगे
भविष्य का स्वप्न सलोना है
किस-किस से हाथ धोना है।
09. पापाचार....
1
पढ़े नमाज हज करे छोड़े न पापाचार।
अल्ला रूठे ना मिले जतन करो हजार।।
2
सन्तों का संगम करे गंगा स्नान अपार।
पाप न धोये हृदय का लाख करे उपचार।।
3
साधु ऐसा चाहिये मेटे जो मन का भेद।
वस्त्र में क्या रखा है पहने पीत सफेद।।
4
मन मरा मानव मरा मानव मरे समाज।
होती होती देखिये कल देखो औऱ आज।।
5
अकेले हो क्या हुआ सत पथ पर अडीग।
माशा - माशा नापिये जैसे नपे जरीब।।
6
लड़ो लड़ाई सांच की रखो न मन मे बैर।
सत्य सदा विजयी हुआ असत्य हो ढेर।।
7
मन्दर मजीत की रार में राजधर्म से दूर।
दाता सुने ना देवता गया मुख से नूर।।
8
पहली फुरसत में मिलें मीत गुरु धाय।
ये जो न होते आपके कहाँ सफलता पाय।।
9
पेट भरन के वचन दियो पेटी भरी न जाय।
रत्न जवाहर सींच कर रोटी को ललचाय।।
10
कटु वचन बोल कर निज अहित समान।
सांझ तईं उलट मिले पत्थर तीर कमान।।
11
मन्त्रणा से विष मरे बैठें करें विचार।
शब्द बाण आहत करे भागी कोप संहार।
12
सफलता की सीढ़ियां माटी राखे कौन।
निज धरा के मान को सदा बढाये जोन।।
13
पहला आखर मात है दूजा गुरु का ज्ञान।
शीश नवाएँ मात को गुरुवर के सम्मान।।
14
तेरा मेरा हो गया जो मेरा तेरा हो जाय।
तेरे मेरे के बन्ध को जो तोड़े सो सुहाय।।
15
मन गड़े मावड़ी और पिता गढ़े विचार।आदर्शों की खान में फले फूले परिवार।।
16
चलचित्र की छांव में फैले खूब विवाद।
चरितवान मौन भये कौन सुने फरियाद।।
शुद्ध
1️⃣
नमाज़ पढ़े हज करे, छोड़े ना पापाचार।
अल्ला रूठा तो नहीं, लाख करे व्यवहार।।
2️⃣
सन्तों का संगम करे, गंगा स्नान अपर।
हृदय न धोए पाप को, करे लाख उपचार।।
3️⃣
साधु ऐसा चाहिए, मिटा सके मन भेद।
वस्त्र नहीं पहचान का, चाहे पीत-सफेद।।
4️⃣
मन मरा तो मानिए, मानव मरा समाज।
कल भी देखा आज भी, छोड़े दीनी लाज।।
5️⃣
अकेलापन क्या भला, सत्यपथी अडिगाय।
माशा-माशा नापिए, जैसे नपे जरीबाय।।
6️⃣
लड़ो लड़ाई साँच की, मन में न रखो बैर।
सत्य सदा विजयी रहा, झूठ रह पड़ा ढेर।।
7️⃣
मन्दिर-मसीत के बीच, रार बढ़े भरपूर।
राजधर्म से दूर हो, मुख से गया नूर।।
8️⃣
पहली फुरसत में मिलो, मीत गुरु सहाई।
तेरे बिन ना कुछ बने, ना सफलता पाई।।
9️⃣
पेट भरन को वचन दिया, पेटी भरी न जाय।
रत्न जवाहर सींच के, रोटी को ललचाय।।
🔟
कटु वचन जो बोलता, करता निज अहित आप।
सांझ तक उलट मिले, पत्थर तीर शराप।।
11️⃣
मन्त्रणा से विष मरे, बैठे करें विचार।
शब्द-बाण घायल करे, फूटे कोप-अधार।।
12️⃣
माटी सीढ़ी कौन रख, चढ़े सफल अभियान।
धरती का मान बढ़े, यही सच्चा सम्मान।।
13️⃣
पहला अक्षर मात है, दूजा गुरु का ज्ञान।
शीश नवाएँ मात को, फिर गुरु को मान।।
14️⃣
तेरा-मेरा भूल जा, मन का कर संयोग।
बंधन तोड़े प्यार का, वही सच्चा योग।।
15️⃣
मन गढ़े मावड़िया, पिता गढ़े विचार।
आदर्शों की खान में, फूले सारा परिवार।।
16️⃣
चलचित्र की छाँव में, फैले खूब विवाद।
चरितवान जो मौन है, कौन सुने फरियाद।।
10. आज के समय पर दोहे......
17
पूछे कहां जायेगा रे, आया कहां से मीत ।
होले होले चालकर , कर लक्ष्य नजदीक।।
18
पुराने पन्ने खोलकर, बढ़ाये बीरानी पीर।
शत्रु मित्र से संभल कर,घाव करे गंभीर ।।
19
खेती किसानी छोड़कर,चाहे नौकरी सब।
बढ़ती बेरोजगारी का,अंत होय सी कब।।
20
शब्द बाण से आहत करे,तीखे बोले बोल।
ऐसे जन को त्यागिये , काहे करे पंचोल।।
21
मती मरी मन मरा,जो पिये शराब दे गाल।
कोने रोये अर्धांगिनी , संतति हो बेहाल।।
22
लत बुरी बळत बुरी, है बुरा घणा हेत।
बाड़ बुरी सींव की, छोटा कर दे खेत।।
23
आक से ईख नीपजे, कहे सयाना लोग।
लोहे से लोहा कटे , कटे रोग से रोग।।
24
फ़सड़ फसड मत चालिये, घण न ऊँचा देख
मर्यादित भाषा कहे, राखे सब की रेख।।
25
ये रसना की चपलता ,घणी लगाये आग।
जागे को कहे सो जा, सोये को कहे जाग।।
26
अमरता किसको मिली, अटल मृत्यु सार।
ढोल बजे डोली उठी, ल कर चले कहार।।
27
मुमुक्षु अरिहंत हुये, लामा बोधि ज्ञान।
पंडित करे आरती , मुल्ला देत अजान।।
28
खेत घटे पानी घटा , घट गये किसान।
लाख रुपए अन्न मिले, तो भी सस्ता जान।।
29
धरती के पानी की सतह, जा रही पताल।
संचित को खरच करे,निश्चित होई अकाल।।
30
उपभोग की नीति पर, करो समीक्षा आज।
गये समय के उपाय क्या, रोये राज समाज।
31
पंछी उड़े आकाश में, बैठा खाये न सांप।
बाप धन पर ऐश करे, पिता करें संताप।।
11. खोज.....
32
जो जन खोजे मोतियाँ मिल जायेगा अपार
सोच निपजे उर जैसी, जैसा हो व्यापार।
33
सूखा सावन बीते व्याकुल होय व्यवहार
सूर्य जोत जलती रहे, सोया रहे संसार।
34
बाल मन हठ करे औऱ तात भये लाचार
जागे नित नई लालसा, असंभव उपचार।
35
सम्मुख बांह पसार कर करे पीठ पर वार
पशुता मनुज में बसी, करो दया करतार।
36
ठण्डी कर खाइये ताता भला न अचार
शनै शनै पार वैतरणी, संग नाव पतवार।
37
सखी सज्जन सन्त की कीजिये मनवार
बुरे समय में मित्र की, सुने सखा पुकार।
38
हिलमिल कर सब देश में,रहे समाज परवार
कृपा मालक की बनी रहे, कृपालु दातार।
39
अंतिम क्षण डटे रहें हो मुश्किल हज़ार
संबंधों के बीच में, नहीं आ पाये दरार।
40
दिवा स्वपन लीजिये बेड़ा कर दे पार
राजा बनकर नाग पे, गाये राग मल्हार।
41
थोड़ा समय निकालिये चाहे पल दो चार
कभू बैठ यार चार, लगा लिया दरबार।
42
जाना है हंस खेल कर, छोड़ेंगे घर बार
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12. घर बनवाए......
43
कंकर पत्थर जोड़ के, बना लिया घर बार।
राज धर्म को भूल कर, फोड़ दई सरकार।।
44
फेसबुक के शूर वीर, धरती पड़े निढाल।
यह बस शुरुआत है, आगे कौन हवाल।।
45
अपनी माटी अपना देश, अपनी माता भोम
अपनों का ना होय जो, जाये भाड़ में कौम।
46
अपनी बातें कर रहे , मैं मैं रट लगाय।
चिड़िया ज्यो चें चें करें, दर मत शर्माए।।
47
घर आए घर जाये का , दांत गिने के साख।
जीवन दूभर हो गया , भई कालजे राख।।
48
बस्ते के बोझ ने, बचपन दिया दबाय।
खेल कूद हंसी खुशी, पैसा दिया गंवाय।।
49
त्वरित तत्काल मिले , होय बटन से काम।
रजवाड़े महाराज के, न था यह आराम।।
50
पहले समय ऐसा था , खेले रेत में बाल।
रजकण लग जाय तो, मात रूप विकराल।
51
रिश्ते की शुरुआत म, समधी जी महान।
बीते दिन दो चार तो , ऐंठे परस्पर कान।।
52
लाड़ माता ने किया , हुआ सन्तान पे घात।
विपरीत दिशा म जावतो, गहराये आघात।
53
सुख में सुखी नही , दुख-दुख कहत अघाय
दुख सुख का आधार है ,दे कौन समझाय।।
54
खेत खलिहान छोड़ के, चले शहर की ओर।
सो सड़क पर बावला, किस पर चाले जोर।
55
सत्यपथ पर चालिहे , छोड़ पतीत काम।
अल्लाहु अकबर बोलिये बोले जय श्री राम।
56
मृदु भाषा बोलिये , बोली रूप अनेक।
हृदय दूरी ना रहे , मिट जावे अतिरेक।।
57
जोर जोर से बोल कर, थोथा करे बखान।
मंदिर होती आरती , मस्ज़िद में अज़ान।।
58
मीठा मीठा सब खायें , खाये खारा कौन।
लेन हार अग्रिम रहे , देते साधे मौन।।
59
केले की लकड़ी से मरे,दम्भ और अहंकार।
मुझ तुम भारी भये, किस का तुम पे भार।।
60
दाता के दाता हुये , हुये सूर के सूर।
पात्र बन समाहित करे, दान ज्ञान भरपूर।।
61
रात भर मस्ज़िद में, इबादत औऱ फरियाद।
परीक्षा उत्तर क्या लिखे,करे नहीं कुछ याद।
62
जूते कपड़े बाल की , भई पोशाक अजीब।
खाते- पीते घर के भी , बच्चे लगें गरीब।।
63
लड़कों से लड़की आगे , पढ़े और कमाय।
अनपढ़ मदमस्त फिरे , कौन संग बिहाय।
64
हाथ में ध्वजा ले कर, बोले जय श्री राम।
लोटे भर पानी को, पिता करे कोहराम।।
65
पानी का अपव्यय बुरा,होगा एक अभिशाप
बिन पानी जीवन मरण,हुआ बड़ा सन्ताप।।
66
मिथिला से आई सीता , कर स्वयंवर बड़ा।
भाग्य से दुर्भाग्य प्रबल , सन्मुख था खड़ा।।
67
पैर चादर से निकाल , करो बिराणा काम।
केंचुली से निकल कर , पाये सर्प आराम।।
68
होत की जोत है सब , सब होत में दाता।
अणहुति राख बड़ी , कृपा करो विधाता।।
69
लाभ ही सब कुछ नहीं ,नहीं जीवन अनेक।
चंदा खिंचे जलधि को, प्रीत लगा कर देख।
70
मन मे कदे नी राखणी , जो आ जाये बात।
समय गये सो कहि, ज्यों फागुन में बरसात।
71
पहली कक्षा में गये , पाटी हाथ मे कोरी।
आज कलम हाथ में, गुरु कृपा से जोरी।।
72
आँचल और अंचल में, अंतर इतना आय।
आँचल ढके सृष्टि को अंचल ढका न जाय।।
73
आँख मूंदकर बात करे, नहीं विश्वासी लोग।
चलने फिरने से रहें , लाख लगायें रोग।।
13. हृदय रामायण.....
प्रातः काल बेला पक्षी गा रहे थे।
विशिष्ट जन धरा पर आ रहे थे।।1
राजा दशरथ के घर हलचल बढ़ी।
राघवी जल निर्मल की कलकल बढ़ी।।2
कौशल्या प्रसव पीड़ा सहला रही थी।
अप्सरायें उनका मन बहला रही थी।।3
दसरथ मन की अधीरता बढ़ती गई।
ज्योँ-ज्योँ सूर्य किरणें चढ़ती गई।।4
दिन नवमी का मास चैत्र का।
प्रफुल्लित हर पुष्प हर उस क्षेत्र का।।5
अयोध्या नगरी ख़ुशी से झूम रही थी।
रवि किरणे कौशल्या के पग चूम रही थी।6
कैकई सुमित्रा भी अधीर थी।
घड़ी प्रतीक्षा की गम्भीर थी।।7
उमड़ कर मेघ घने आने लगे ।
आकर इंद्र धनुष सजाने लगे।।8
नाचे मोर कोयल मधुर गाती है।
बाल क्रंदन की ध्वनि सुनाती है।।9
जैसे दसरथ ने की यात्रा चार धाम की।
देववाणी ने कहा बोलो जय श्री राम की10
कौशल्या फुले नहीं समाती थी।
रघुकुल वंश को आगे बढ़ाती थी।।11
सुख दे रही बाल अठखेलियाँ।
बधाई हो रानी को बोली सहेलियाँ।।12
मन्थरा ने वक्र नयन से निहारा।
नृप नहीं बनेगा यह सूत तिहारा।।13
ममता हर्षित बाल राम खिलाती है।
पैजनियाँ। छम-छम सुख दिलाती है।।14
भिन्न रूप दिखाये भगवन करतार।
कभू बालक कभू विष्णु अवतार।।15
उठाते कभी परसुराम के कमण्डल को।
मुख में दिखाये सम्पूर्ण तारामण्डल को।16
चारों भ्राता बाल से किशोर वय जाने लगे।
गुरु युद्ध कौशल शस्त्र विद्या सिखाने लगे 17
शास्त्र ज्ञान रण भेद प्रखर।
सीख रहे क्षण-क्षण जाते निखर।।18
युवा हो रहे किशोर थे बालक।
धीर, वीर, गम्भीर प्रजापालक।।19
चारों भाइयों में है प्रेम अगाढ़।
एक माँ की संतान से संबन्ध प्रगाढ़।।20
सुयोग्य कन्या संग राम का हल्दहाथ हो।
लक्ष्मण, भरत व शत्रुघ्न का भी साथ हो।21
पुत्र विवाह की चिंता में लीन थे।
भेजे निमंत्रण जो घराने कुलीन थे।।22
जनक नंदिनी ने स्वयंवर रचाया।
जनक मिथिलानरेश का निमंत्रण आया।23
धरती की बेटी सुनयना की सुता।
खेत में हल के फल से निकली थी सीता24
कलश में मिली मिथिला नरेश को।
फाग बसन्त समझती सब परिवेश को।।25
ऋषि याज्ञवल्क्य से पूर्ण ज्ञान लिया।
सुख दुःख एक समान संज्ञान लिया।।26
अन्नपूर्णा सुंदर शुशील मोहिनी सीता।
ब्याह उसी से रचाये जो स्वयंवर जीता।।27
पहुँचे राम लक्ष्मण। लांघकर नदी- दीव।
प्रणय हेतु उठाने धनुष गाण्डीव।।28
उद्घोषणा में यह वचन गये सुनाये।
है कोई वीर जो शिव धनुष उठाये।।29
मल्ल बलिष्ठ राजपुत्र सब हारे।
नहीं उठा धनुष विवश काहू निहारे।।30
उठा कर धनुष प्रत्यंचा को उत्कर्ष किया।
टूटे गाण्डीव ने राम चरण स्पर्श किया।।31
सुनकर धनुष टूटने का कोहराम।
क्रोधित दौड़े आये परशुराम।।32
कौन दुष्ट इस कार्य का कारक।
जानता नहीं मैं हूँ क्षत्रिय संहारक।।33
लक्ष्मण परशुराम से हुये मुँह जोर।
बोले राम दोषी मैं, नहीं कोई ओर।।34
ऋषि विनय स्वीकारें चरण वंदन राम का।
पुराना धनुष टूटा था किस काम का।।35
परिस्थिति को शालीनता ने जोह लिया।
राम ने परशुराम का मन मोह लिया।।36
गुरु वशिष्ठ सब देख आनंद विभोर हुये।
राजा बनने के समर्थवान किशोर हुये।।37
वीर भाइयों की सर्वगुण सम्पन्न जोड़ी।
निर्मला संग लक्ष्मण सा वर ढूंढे करोड़ी38
बहन निर्मला को लक्ष्मण संग ब्याहा।
होता वही है जो नियति ने चाहा।।39
जनक कहे राम के आजीवन संग रहे।
परिस्थितियां हों जो सीता कुछ न कहे।।40
जानकी संग निर्मला का शुभ स्वागतं।
कुल लक्ष्मी अयोध्या सुआगतं सुआगतं।41
जीवन सुखमय बीत रहा प्रेम सुधा अपार।
विधाता के लेख पर हम सब लाचार।।42
राज सभा में राम राज तिलक की तैयारी।
खुश कौशल्या जा रही पुत्र पर बलिहारी43
कैकयी की दासी मन्थरा को नहीं सुहाया।
भरत बने राजा कैसे यह जाल बिछाया।44
मैं हूँ दासी मेरा राज से क्या काम।
बनना था भरत पर राजा बनेगा राम।।45
कौशल्या राज माता बने हमको का लेना।
तेरा क्या होगा कैकेयी सोच लेना।।46
रण क्षेत्र में दसरथ ने रथ चलाया था।
दे कर अँगुली पहिये में तूने उसे बचाया था।47
वचन राजा के तू ने रखे हैं बचाकर।
भरत राजा बने कह दो उनसे जाकर।।48
कैकेयी भरत समान राम से अनुरागी।
मन्थरा के कथन से पुत्र प्रीति जागी।।49
ले आटी-पाटी कोप भवन में सो गई।
पुत्र मोह में आज कोमला पत्थर हो गई।50
राजा ने मनाया ले लो धन लाख करोर।
बोली कैकेयी राजा भरत न हीं कोई ओर 51
राजा हो तो वचन निभाओ नहीं तो जाने दो।
मेरा क्या दासी सम दासी ही मर जाने दो।52
विवशता पूर्वक राजा ने हामी भर दी।
राज तिलक घोषणा भरत नामी कर दी।53
राजा भरत। राम को 14 साल बनवास।
स्वीकृति दसरथ की मय उच्छ्वास।।54
सुनकर सूचना कौशल्या फूटकर रोई।
हे राजन, बताओ मेरे राम का का होई।।55
बोली सीता मत रो माता राम मतिहारी।
छाया बनकर रहूँ राम की मैं दासी तिहारी।।56
सुमित्रा ने कौशल्या को धीरज बंधाया।
लक्ष्मण सदा रहे राम संग मेरा जाया।।57
युवराज ने जब गेरुये वस्त्र धारण किये।
देवों ने भी राम नाम उच्चारण किये।।58
चले राम पैदल ही जंगल को निहारे।
संग चले सब नागरिक साथ तिहारे।।59
मत रो माता तेरा आशिर्वाद साथ रहे।
राम जा रहा शरीर से आत्मा तेरे साथ रहे 60
चले जा। रहे राम पथ नगर रोया सारा ।
बेटे बहु बिन राज महल लगे खारा।।61
पुत्र संग ज्योति गई गये वैभव सारे।
बन में भटके दसरथ राम राम पुकारे।।62
भटकते राजा को राम नाम का जाप था।
शिकार खेलते मरे श्रवण का अभिशाप था।63
सुंदर कुटिया से सुसज्जित सारा जंगल था।
जहाँ बिराजे राम वहॉं मंगल ही मंगल था।64
मिलने आये भरत गले लगाया राम ने।
जीवन है अग्निपथ यह बताया राम ने।।65
जिद पर अड़े भाई को पादुका थमाई।
ऋणी भरत ने वो सिंहासन पर बिठाई।।66
केवट ने जब राम को सरयू पार उतारा।
नहीं भेंट देने को केवट उपकार तुम्हारा।67
सबरी ने प्रेम से जूठे बेर खिलाये।
हर्षित खाय रामचंद्र मंद-मंद मुस्काये।।68
घायल जटायु की सेवा का किया जतन।
समय पर बदला देने का उसने दिया वचन।69
कन्द मूल खा वन वासी सुखी रहने लगे।
बहुत बीते कुछ शेष बरस कहने लगे।।70
विधि के विधान अटल टल सकते नहीं।
प्रयास करें पर भाग्य बदल सकते नहीं।71
सर्प नखा लक्ष्मण पर मोहित हुई।
कटे कान नाक तो क्रोधित हुई।।72
भाई रावण को बताई उसने पूरी बात।
लो लक्ष्मण से बदला तुम आज के आज73
मारिच मृग बनकर सुंदर वन में आया।
सीता को उछल-उछल कर खूब लुभाया74
स्वर्ण मृग की खाल के वस्त्र पहनूँगी राम।
जाओ! मेरे लिये यह ले कर आओ राम75
रखवाला लक्ष्मण को छोड़ चले मृग लाने।
मारिच का भ्रम फैलाया लगा काम आने76
राम की आवाज़ में लक्ष्मण को पुकारे।
जाओ रक्षा करने विपत्ति में भ्राता तुम्हारे 77
कहा लक्ष्मण ने यह राक्षसी उपक्रम है।
राम सलामत हैं भाभी,यह तुम्हारा भ्रम है 78
सीता ने क्रोध से कटु कहि कछु बात।
रोते लक्ष्मण के लगा हॄदय पर आघात।।79
जाता हूँ पर ध्यान रखना मेरी मन व्यथा को
आये कोई मत लाँघना लक्ष्मण रेखा को80
विवश लक्ष्मण को वहाँ से पड़ा जान।
साधु के वेष में रावण खड़ा आन।।81
उड़न खटोले में बैठा सीता हरने आया।
खूब लड़ा जटायु नहीं रोक पाया।।82
व्याकुल थे भाई सीता का वियोग।
होनी हो सो होय विधि का संयोग।।83
बलात हरण नारी का भूल बड़ी भारी।
छूना नहीं दुष्ट मुझे मै पतिव्रता नारी।।84
भटकते हुये राम को सीता के निशान मिले।
भाग्य हुआ प्रबल वहीं हनुमान मिले।।85
बाली सुग्रीव के झगड़े को निपटाया।
वध कर बाली का सुग्रीव को नृप बनाया86
दे निशानी राम ने लंका भेजा हनुमान को।
उड़कर पहुँचे हनुमन्त लंका स्थान को।।87
बंदिनी कुटिया में सीता को जगाया।
श्री राम ने भेजा मुझे बलवीर ने बताया88
राम निशान देख कर सीता खूब रोई।
कैसे हैं प्रियतम दर्शन कबहु होई।।89
समझा कर सीता को लौटे मार्ग आकाश।
कैसी है जानकी डाला स्थिति पर प्रकाश 90
लंका जाने के बीच समुद्र बना बाधा।
ध्येय अटल के आगे टिकी कौनसी बाधा91
वानर सेना ने मिलकर सागर पथ बनाया।
राम नाम लिखकर पत्थर को तैराया।।92
संग सेना के रघुपत पहुँचे लंका धाम।
विभीषण को गले लगाते नहीं अघाये राम 93
भीषण युद्ध में अनुज लक्ष्मण मूर्छा आई।
सहित पर्वत बजरंग ले आये दवाई।।94
दशानन की अमरता का राज खास था।
अमृत कुण्ड उसकी नाभि के पास था।।95
राम का तीर रावण नाभि पार हुआ।
लंकापति प्रकांड पंडित का उद्धार हुआ96
विशाल रूप ले बजरंग ने पूंछ बढ़ाई।
उसी पूंछ की आग से सारी लंका जलाई97
विजय निश्चित मीत जिसके हनुमान से।
लौटे अयोध्या राम पुष्पक विमान से।।98
जले दीप नगर में आल्हाद उमड़ पड़ा।
सीता चरित्र पर प्रश्न धोबी ने किया खड़ा99
धोबी के वचनों से अग्निपरीक्षा सीता की।
धरती में समाई यही दीक्षा सीता की।100
लव कुश सन्तान बलिष्ठ और गुणवान थी।
सीता का हृदय कृपा राम महान की।।101
कौन सुखी जगत में भ्रम किसकी माया।
सुखी भव में जिस मन में राम समाया।102
जो चढ़ा वैतरणी पार उतरना होगा।
जीवन अमर नहीं सदा मरना होगा।।103
राम के नाम पाप कदापि क्षम्य नहीं।
राम अनादि पुरूष वह नगण्य नहीं।।104
ऋषि राजा नर में नरोत्तम हुये।
मर्यादित थे वो मर्यादा पुरुषोत्तम हुये।।105
मुझ में तुझ में सब में बसे राम।
द्वापर त्रेता कलयुग को रचे राम।।106
द्वेष भाव त्याग राम बनो।
बाँट-बाँट अनुराग श्री राम बनो।।107
भालू खां के पुत्र शमशेर का प्रणाम सा।
राम राम सा राम राम सा।।108
15. सपने....
कुछ सपने हैं
खुली आँखों में
बंद दरवाजे खोलने के
चीख चीख कर बोलने के
मेरी आवाज़ सुनो
खुल के आज सुनो
घुट रहा मन साँसों में
कुछ सपने हैं
खुली आँखों में।
यह बदलाव कैसा
पहले तू न था ऐसा
आ देख पहलू में मेरे
हुये बिरंगे रंग सुनहरे
कालजयी शक्त भरपूर
संबन्ध अंतरंग मधूर
जुड़े रहें पान साखों में
कुछ सपने हैं
खुली आँखों में।
गिगनार चढ़ कर बोली
जनाज़े और चिता की डोली
मरने वाले अपना घर बदल जाओगे
मिट्टी में सड़ो या आग में जल जाओगे
यहाँ का किया साथ रहेगा
किसी को दिया हाथ रहेगा
पिंजरा शेष अशेष साँसों में
कुछ सपने हैं
खुली आँखों में।
चंदन दो या मुश्के गुलाब
बाँट सकोगे पाप-पुण्य का हिसाब
पर सुख का हेतु बने
मायड़ ऐसे पूत जने
वृद्ध होनी तरुण काया
बेकार मद लोभ माया
कह दिया बातों-बातों में
कुछ सपने हैं
खुली आँखों में।
16. बलिदान...
दुर्गम पथ पर चल पड़ा
कहे नीच कोई कहे बड़ा।
दृढ़ निश्चय अटल विश्वाश
तपा कुंदन मणिक जड़ा।
बन के बेरागी जीना आया
दिया वसुंधरा ने कोष गड़ा।
दारुण्य कपट अशेष श्लाघा
मीत मिलन सुदामा बढ़ा।
भ्रंश न्यूनतम शून्य विभोर
कलरव मधुरिम शांत खड़ा।
दम्भ मति नाशक विनाशक
सन्निकट जो इस पर अड़ा।
सब का मान अपना मान
ना ही तू छोटा ना मैं बड़ा।
17. वाह मोदी जी....
वाह मोदी जी वाह
मोदीजी वाह।
मोदीजी धीरे-धीरे
मोदीजी वाह,
क़ीमतें बढाते हैं
मोदीजी वाह,
अच्छे दिन लाते हैं
मोदीजी वाह,
मोदीजी ना गुणगान करें
वाह मोदीजी
मोदीजी ना अभिमान करें
मोदीजी बहुत महान
मोदीजी वाह।
वाह मोदीजी वाह
वाह मोदीजी
मोदीजी बच्चे भूखे
मोदीजी वाह
मोदीजी खेत सूखे
वाह मोदीजी
मोदीजी कर्ज़ा बढाते
मोदीजी घर खर्च घटाते
मोदीजी कैसे लायें सामान
मोदीजी बहुत महान
मोदीजी वाह।
वाह मोदीजी वाह
मोदीजी वाह
मोदीजी 22 घण्टे काम करते
वाह मोदीजी वाह
मोदीजी नहीं आराम करते
मोदीजी वाह
मोदीजी के आठ साल
देश हुआ बेहाल
फिर कहते सीना तान
मोदीजी बहुत महान
मोदीजी वाह।
भूल असल बात प्यारे
वाह मोदीजी
मोदीजी के नारे लगा रे
वाह मोदीजी
जो सुधरी को बिगारे
मोदीजी नाम तिहारे
वाह मोदीजी
मोदीजी हमने पकड़े कान
मोदीजी बहुत महान
वाह मोदीजी।
वाह मोदीजी वाह
मोदीजी वाह।
18. जिम्मेदारी...
खाली पेट
घर की ज़िम्मेदारी
शौक और सपनों
की याद
किसे आई।
खुला तन
रोये कि हँसे
फुरकत तसव्वुर
की याद
किसे आई।
सर पर छांव
नंगे पैर को
अँधेरे में रोशनी
की याद
किसे आई।
प्यासे की जाति
रेगिस्तान में
शरबत
की याद
किसे आई।
कुछ छुट रहा
कोई छोड़ गया
मिलने-मिलाने
की याद
किसे आई।
*********************************
19. अधिकारी.....
बाबू अफसर अधिकारी
माननीय जी पर भारी
टालमटोल वक़्त निकाले
रोये-कूके जनता सारी
बने अति गम्भीर बीमारी।
बाबू अफसर......
बाहर हाथ सँवार कर
अंदर-अंदर मारें चोट
पैसे देकर पोस्टिंग लेते
किसमें कितना खोट
कैसी किसकी लाचारी।
बाबू अफसर........
नेता जी को माने क्यों
एमेले को जाने क्यों
डाले इनको दाने क्यों
करें इतने बहाने क्यो
गलती इसमें तुम्हारी।
बाबू अफसर..........
उठी तेज आवाज है
पब्लिक बहुत नाराज है
गिरनी तुम पर गाज है
कोढ़ में भी खाज है
बचना मुश्किल भारी।
बाबू अफसर..........
लेन-देन की बात कर
भाई भतीजा वाद कर
हिस्सा बंधी में साध कर
दफ्तर के सब काज कर
चाहे नर है या कोई नारी।
बाबू अफसर ........
जनता ने जिसको चुना है
उसको वही लगाये चूना है
विकास एक झुन-झुना है
आमद ऊपरी कई गुना है
मिलीभगत यह सब तुहारी।
बाबू अफसर.......
राजतंत्र से बढ़कर
जीते चुनाव लड़कर
बने अफसर पढ़कर
ठाठ में अकड़कर
बन गये अत्याचारी।
बाबू अफसर......
कितने दिन चलेगा सब
त्राहिमाम हो चुका अब
हमारा हक़ मिलेगा कब
होगा ऐश्वर्य ध्वस्त जब
आयेगी सबकी बारी।
बाबू ...अफसर......
बदलाव का है इतना शोर
नियत खोटी काला चोर
मचाये शोर दे कर ज़ोर
ममनीय माने हमको ढोर
लगे खार खरी अति खारी
बाबू अफसर......
20. मानुष....
यह कट्टरता तुझे अमानुष बना देगी
आग जाति-धर्म की सब जला देगी।
स्वर्ग धरती पर है यहीं है कर्म फल
पराई पीर भव दुख पार लगा देगी।
यह कट्टरता......…....................।
मोह बन्ध मुक्ति सम्मोहन ला देगी
गरल वर्षा से स्नेह छांव बचा देगी।
देख किसी का समुद्र सा शांत मन
अशान्त अंतश अवचेतन बना देगी।
यह कट्टरता............................।
प्रस्तर रज कण वसुंधे का आवरण
प्रकृति का सौम्य सहृदय सा वरण।
निश्चिन्त पंछी के विरक्त भाव करण
मानुष को निश्चय कुछ सीखा देगी।
यह कट्टरता.............................।
द्वंद भाव से किस का भला हुआ है
देख उड़ ना सारा नभ फैला हुआ है।
किस बात पर मन तेरा मैला हुआ है
द्वेष भावनायें कर्म पथ भुला देगी।
यह कट्टरता.............................।
21. आऊं....
देखूं जो सूरत तेरी
लगते हैं फूल खिलने
जी चाहता मैं आऊँ
उड़ के तुझ से मिलने
जी चाहता मैं आऊँ.....
मेरे यार तुझसा कोई
कोई और तो नहीं है
कैसे जुदा हूँ तुझसे
कोई ज़ोर तो नहीं है
इश्क़ की हक़ीक़त
इस प्यार की कहानी
खुदा करे हो सलामत
यह अपनी ज़िंदगानी
आवाज़ में तेरी अब
लगती है मिश्री घुलने
जी चाहता मैं आऊँ
उड़ के तुझसे मिलने
देखूँ......................
समझती है तू मुझे
मैं तुझ को जानता हूँ
जुदाई बड़ी है मुश्किल
यह मैं मानता हूँ
आऊँगा जल्दी घर पर
वो जख्म सारे सिलने
जी चाहता मैं आऊँ
उड़ के तुझ से मिलने
देखूं..................
अरमान बहुत लेकिन
कैसे बयान कर दूँ
तेरे नाम पे फना
मैं अपनी जान कर दूँ
दूरी बनी है दुश्मन
दरमियान तेरे मेरे
आती है याद तेरी
कलेजा लगे है छिलने
जी चाहता मैं आऊँ
उड़ के तुझसे मिलने
देखूं........
हैप्पी वेलेंटाइन डे सदफ़
22. कोशिश.....
एक कोशिश और कर
बैठ न तू थक-हार कर
कर्मवीर कर्म यार कर
शांत स्तुत उग्र शौर कर
एक कोशिश और कर
विश्वास पंख पसारकर
खून आँखों में उतारकर
कमी जो रही सुधारकर
दिक्क़तें एक ओर कर
एक कोशिश और कर
सम्भावना से इन्कार नहीं
कर हार को स्वीकार नहीं
बीती गई पर विचार नहीं
मन को न कमज़ोर कर
एक कोशिश और कर
ज़मीर से जिंदा रहना होगा
चुप्पी तोड़ कर कहना होगा
यह कब तक सहना होगा
जन को भाव विभोर कर
एक कोशिश और कर
23. हम....
भय
दारिद्रय
नफरत
घमंड
खतरा
दर्द
भेदभाव
जलन
स्वार्थ
हिंसा
से दूर
हम
सुकुन
मोहब्बत
इखलास
प्रेम
सम्मान
मेहनत
इज़्ज़त
मुस्कान
आनंद
से भरपूर
हम
त्याग
तप
तपस्या
शांति
न्याय
कल्याण
परोपकार
भाव
से मशहूर
हम
निश्चिंत
निष्फल
नूतन
ऊर्जा
धीर
गम्भीर
हम
मैं
से
पृथक
राही
लगे
पथिक
अभिलाषा
से दूर
हम
न मैं
न वो
बस
हम हैं
हम।
24. कौन.....
ढूंढ रहे संसार में कमियां
स्वयं के मन में झांके कौन।
पराया सुधार सबकी मंशा
खुद सुधरे आगे आके कौन।
अमृत वचन बहुतायत सुने
कर्म विष घूंट फांके कौन।
सुथरापन भाये सबन को
स्व स्वच्छता दे लाके कौन।
सत्य अजय अमर अखिल
सत्यमार्गी मिले बाँके कौन।
धूम्रकण रजकण उपयोगी
नभस्वाति लाये जाके कौन।
दौषारोपण तिमिर पे भ्रामक
स्फूर्त संध्या घर आँके कौन।
दर्द पीड़ा वनमाली ही जाने
टूटा फूल पेड़ से टांके कौन।
काहे करो व्यथा अभिव्यक्त
कर्म करो और साधो मौन।
25. एक मां........
एक रोती माँ
अबोध के लिए
जो कहता है
एक रोटी माँ
वो नहीं जानता
भूख नहीं जानती
उस का धर्म क्या
जाति क्या
वो नहीं समझता
कितने दुख ढ़ोती माँ
आप में चर्चा करें
मजहब पर
उम्मीद,विश्वास
देखकर अपना
बिलखता लाल
आस्था खोती माँ
मेरे भाई लडाई भूख से लड
आपस मे तो जानवर लड़ते हैं
धर्म पंथ जात बंधन मुक्त
समाज नया गढ़ते हैं।
26. शक्ति.......
अपनी शक्ति जानकर
बिना डरे आगे बढ़े।
जीवन झूठ मृत्यु सत्य
सब सत्य द्वार पे खड़े।
हार है तो सीख सही
जीत इम्तहान ले कड़े।
कुछ पागलपन ज़रूरी है
सोता नहीं जिस पे चढ़े।
नाम में क्या छोटा-बड़ा
कर जाएं कुछ काम बड़े।
आब वही ताब वही
हीरा मुकुट या हार में जड़े।
जिंदा वही रहे रहेंगे
परहित मरे मर के लड़े।
सखी सुअम्ब मरीचि
अतिरेक संग खड़े।
27. संघर्ष......
संघर्ष के साथियों को समर्पित
बुलबुलों की पीठ पर
हुये हो सवार तुम
खींच दो लकीर तुम
पानी पे इस बार तुम।
शांत हो प्रशांत हो
धैर्यशील गंभीर हो
दीन हीन दुःखियों का
करोगे उद्धार तुम।
जीत का जश्न होगा
थोड़ा इंतज़ार कर
संघर्षों की लाठियां
खुद पर मार तुम
हठ की कठोरता को
दर्द से निहार कर
ऐसी चोट कीजिये
बन के लुहार तुम
अस्त्र शस्त्र वस्त्र सब
छोड़ रण में आ गये
लड़िये या जाइये
करो ना चीत्कार तुम
घमण्डी नसों मरोड़ दे
बागी मैदान न छोड़ दे
संका और संसय का
कर दो संहार तुम
विपत्तियों के क्षणों में
मीत मुख ना मोड़ना
तुम पे भरोसा है हमें
मेरे हो परिवार तुम।
मूल्य जान स्वयं का
अमूल्य तू अनमोल है
गिराते हो बनाते हो
राजा की सरकार तुम
सत्य का मार्ग कठिन
सत्य सर्वदा विजयी
अंधकार असत्य अस्त
विजय का गलहार तुम
28. घाव.......
घाव को बहाल कर
भाव को उभार दो,
बीती को बिसार कर
नव्य को विचार दो।।
रंजिशों खत्म करो
लड़ाइयों को रोक दो,
प्यार लो उधार तुम
प्रेम का उधार दो।।
विपत्तियों को मोड़ने का
मन्त्र यह जान लो,
काम करो काम करो
कर्म की पुकार दो।।
ऐसे कोई संग न आयेगा
पग खुद तुम न दो चार दो
व्यथा मन की सुने कोई
उसे आवाज तुम यार दो
अट्टालिका के झरोखों पर
छांव की उम्मीद में
थम न जाना पथिक
पांव ना पसार दो।।
सीखना निरन्तर हो
भीख में भी सीख लो
रीस में और टीस में
ज्ञान की फुहार दो।।
थक गये हो जानकर
रुक गये जो कहीं
जमे हुये रक्त में
नया एक संचार दो।।
बरसों की समस्या का
हल हो सफल हो
संघर्षों के बल पर तुम
नय्या पार को उतार दो।।
तुम जड़ हो साख भी
तना हो तुम पात भी
सांझी कोशिशों से सब
बाग को सँवार दो।।
पापी को अधर्मी को
निज कर्म से सिंचिये
शांति सहयोग से
जड़ को सुधार दो।।
हल कर समस्या का
खेत में चला दो हल
परिश्रम के बल तुम
ज़िंदगियाँ निखार दो।।
दे दो अपना सर्वस्व
दीन हीन के लिये
जीतने की जिद को
मन में उतार दो।।
जीतने की जिद को
मन में उतार दो।।
29. धूप.....
मौत सी तपती धूप
फफोलों सी ज़िन्दगी
यहां हो या हो वहॉं
जलना है तपना है।
सुलगते सवाल बरसे
हमदर्दीयों के बादल से
विश्वास के टपकते घर को
जलना है तपना है।
आशीर्वाद या तिरस्कार
मिले झोली में डालकर
पीड़ा की पोशाक पहने
जलना है तपना है।
समर्पण में श्रेष्ठता से
नव कोंपल पल्लवित
पीतवर्ण का अस्तित्व
जलना है तपना है।
मिट्टी के देव जलते
निर्दयी मानव हाथ
दाता अभिदानी को
जलना है तपना है।
30. साथी.......
आओ रे साथ, चलो रे साथी-2 , आओ रे साथी आओ रे साथी...
आओ रे साथी
ठंडा ना हो जोश हलचल करेंगे
आज का मशला आज हल करेंगे,
हल करेंगे हल करेंगे....
आओ रे साथी चलो रे
आओ रे साथी
तुम आओ वो आयें साथ में आयें
मुर्झाये उम्मीदों के फूल खिलायें
फूल खिलायें फूल खिलायें....
आओ रे साथी चलो रे साथी
आओ रे साथी
अपने हक़ की आवाज़ उठायें
उर्दू की दुनियां में इंक़लाब लायें
इंक़लाब लायें इंक़लाब लायें....
आओ रे साथी चलो रे साथी
आओ रे साथी
हम दुःखियों दुख दूर भगायें
संविदा पैरा टीचर नियमित करायें
नियमित करायें नियमित करायें....
आओ रे साथी चलो रे साथी
आओ रे साथी
मिलकर वुजरा से सवाल करेगें
नहीं डरे थे नहीं डरे हैं नहीं डरेंगे
नहीं डरेंगे नहीं डरेंगे.....
आओ रे साथी चलो रे साथी........
31. पथ.....
पथ दुर्गम
लक्ष्य अटल
भय अकिंचित
चल अविरल
दुर्गम पथ..
बन वट वृक्ष
दे छाया शीतल
मोह द्वेष बिन
अनवरत चल
पथ दुर्गम .....
कर्म ज्योतिमय
शांत मन चंचल
वय बिसराता
धर धीर निर्मल
पथ दुर्गम.....
मद लोभ तर
संगत सरल
सहज आचार
भाग्य उज्ज्वल
पथ दुर्गम.....
विहंगम अट्टालिका
धूसरित एक पल
महि सा रख
धीरज अविचल
पथ दुर्गम......
32. बेटियां.....
बेटियां बोझ नहीं मानता हूँ
सही नज़र को पहचानता हूँ।
बेटा नहीं तीन बेटियों का बाप हूँ
बस यहीं से भोगता अभिशाप हूँ।
सपने बुनता हूँ नितनये पलपल
छू ना पाये उनको छलबल।
सच से दूर नहीं जानता हूँ
बेटियां बोझ नहीं मानता हूँ।
नज़र अपनों की मेरे घर पर
अनहोनी के डर से कांपु थरथर।
बेटियाँ तो पराया धन चली जायेगी
बाप की संपत्ति क्या ले पायेंगी।
चाल हर एक पहचानता हूँ
बेटियाँ बोझ नहीं मानता हूँ।
बेटों का बाप बलवान होता है
बेटों के बल पहलवान होता है।
बेटी का बाप डरपोक कायर
डरता,कांपता,सहमा शायर।
दर्द के वक़्त कलम संभालता हूँ
बेटियां बोझ नहीं मानता हूँ।
धर्म की दिवार मजहब की लकीर है
वहॉं का भिक्षुक यहां का फकीर है।
अर्थी झोंपड़ी से निकले या महल से
मौत,मौत है चाहे जवान या पीर है।
बदलाव शुरू करें कहाँ से कब से
खुद को बदलिये यही नज़ीर है।
हक़ सम्मान की बात बाद में करना
बस मीठे बोल बेहतर अकसीर है।
सीरत सूरत से मिले काश हो ऐसा
हया शायरी में ग़ालिब ओ मीर है।
अश्क़ आयें खुद से छुपा लीजिये
भीगी पलक ग़म की मुखबीर है।
हज़ार तम्मनाये न्योछावर जिगर
सबको सब कुछ मिले तक़दीर है।
छटा बहारों की आज निराली है
जले खुशियों के दिये दिवाली है।
सब और हर कोई गले मिल रहा
अनार संग दुश्मनी जलाली है।
गहराई नई नये सपने नई बात
रिश्तों की मिठास दो बाली है।
इंसानियत धर्म मज़हब से पहले
बन्द दरवाजों से राह निकाली है।
जले चराग घर में दिल में जले
अंधेरों ने फैली चादर उठाली है।
35. व्यथा.....
व्यथा से निःरस निहारती आँखें
रौबदार ताकतवर से दबती जबान
कौन इसका कारण कौन करे निदान
उत्तर इसका देगा कौन
कैसे हो भारत महान।
हाथ को काम नहीं
स्त्री का सम्मान नहीं
पूरे सब नहीं अरमान
कैसे हो भारत महान।
कहने को शक्तिशाली हैं
पर हाथ सबके खाली हैं
रोता सड़क पर किसान
कैसे हो भारत महान।
काम की पहली शर्त रिश्वत
रिश्वत नागरिक की किश्मत
आबरू बिके ज्यों सामान
कैसे हो भारत महान।
कोई इसका हल हो
हम से ही पहल हो
ईश्वर दे ऐसा वरदान
कैसे हो भारत महान।
दीप जले एक लो उठे
हम चले सब लोग उठे
जागे हिन्दू और मुसलमान
प्यारा अपना भारत महान।।
*******
36. सत्ता........
सत्ता के गलियारों में
सेठों की सरकारों में
धर्म के ठेकेदारों में
आदमी पिसता है
स्वाभिमान बिकता है।
जाती के प्रताप से
नेताजी के दाब से
या नोटों की आब से
सब हो गया दिखता है
स्वाभिमान बिकता है।
निर्भया अमानुष दृष्टि
चिंतित सम्पूर्ण सृष्टि
कोमला पर अम्ल वृष्टि
सम्भ्रांत ठिठकता है
स्वाभिमान बिकता है।
तिलक,टोपी पहचान
डाकू,चोर,लुटेरे महान
अपराध रक्षक विधान
सदाशय कहाँ टिकता है
स्वाभिमान बिकता है।
खेतिहर नीचे गगन के
बाबाजी अंदर सदन के
सड़ते फफोले बदन के
आमजन ही सिकता है
स्वाभिमान बिकता है।
*******
37. नेता ......
नेता एकम नेता
नहीं किसी को देता
नेता दूनी दगाबाज
गिरा हुआ जालसाज
नेता तिये तिकड़मी
भरता नही इसका टमी
नेता चौके छलिया
पिये खून बताये दलिया
नेता पंचे पाखंडी
इनसे बढ़कर न कोई घमण्डी
नेता छके छलकपट
गिरगिट सा रंग बदल झटपट
नेता साते सत्यानासी
डाकू बन फिरे सन्यासी
नेता आठे उठापटक
जो भी मिले जायें गटक
नेता नम्मा नाम खराब
इसका साथ एक अजाब
नेता ढहाई दलबदल
बचना इनसे रहना संभल
जनता के लिये यह जोंक हैं
चाहे उदयपुर,चूरू टोंक है।
*******
38. बिना मात्रा की कविता ....
तरवर पर घर बन्दर
अजगर सरवर अन्दर
सतरङ्ग फल चट बन्दर
हरण मछ जगर अन्दर
एक समय सख बन गए
मछ फल भख डटकर
सरतट बतयत सटकर
मगर घर फल पटककर
भरय कहत बन्दर लउ
कपल भख लउ चटकर
मगर बन्दर घर चलकर
मम घर चल सख बन्दर
मद फल भख चलकर
बइठ सख उर बन्दर
चल दई सर क अन्दर
चक्ष मलई मगर बन्दर
सच कह दइ फफककर
भर मङ्गत कपल बन्दर
बस ईतइ बत सख कउ
म कपल भइ तरवर पर
लउट झटपट तट पर
बन्दर उछल चढ़ तरवर
बउला न भए रह बन्दर
*******
40. व्यायाम.....
हाथ हिलाओ पैर उठाओ
आगे पीछे चलते जाओ।
आँख उठा कर देखो ऊपर
बात को समझो कान से सुनकर।
बन्द करो मुँह दांत से भिंचो
नाक से लम्बी सांस को खींचो।
सलाम नमस्ते हथजोड़ कर
नित्यक्रम बिस्तर जल्दी छोड़कर ।
बड़ों का आदर छोटों को दुलार
अच्छा रखना है व्यवहार।
घर आये का सत्कार कीजिये
सम्मानित नाम साकार लीजिये।
********
41. प्रार्थना.........
शक्ति कीजिये प्रभु त्रिभुवन में
जल में थल में और गगन में
शक्ति.......
अंतरिक्ष में अग्नि पवन में
सकल विश्व जड़ चेतन में
औषध वनस्पति वन उपवन में
मंगल चन्द्र अरुण वरुण में
शक्ति.......
शिक्षक के उपदेश वचन में
सैनिक के द्वारा हो रण में
व्यवसायी के होवे धन में
किसान के खेत खलिहन में
शक्ति......
शक्ति राष्ट्र निर्माण सृजन में
नगर ग्राम ओर भवन में
जीव मात्र के तन-मन में
जगत के हो कण-कण में
शक्ति.....
*********
42. होली.......
होली मेरे देश की
देखो कितनी प्यारी
प्यार से भीगा दिल
रंग से भीगी सारी
प्यार से......
गलतियां इस साल की जलें
मन में बस स्नेह पले
थिरके नर-नारी ढप तले
मगन है दुनिया सारी
प्यार से.....
दुःखी के दुःख दूर हों
हँसते गाते भरपूर हों
मदहोश थोड़े सुरूर हों
खेल हों साथ हमारी
प्यार से...
**********
43. सबल.......
निर्बल को सबल से
झोंपड़े को महल से
न्याय मिलने तक
शब्द गढ़ता रहूँगा
मैं लड़ता रहूँगा।
दिन के फिरने तक
घाव के भरने तक
ले सपना सुराज का
आगे बढ़ता रहूँगा
मैं लड़ता रहूँगा।
रोटी पानी छांव में
सुख साधन गांव में
हाथ को हुनर मिलने तक
बादल सा उमड़ता रहूँगा
मैं लड़ता रहूँगा।
चित्कार को उपकार में
उपेक्षा को अधिकार में
बदलने तक
उठता पड़ता रहूँगा
मैं लड़ता रहूँगा।
*********
44. गांधी.......
गांधी कठिन,दुर्गम मार्गगामी
गांधी विवेकशील अग्रगामी
गांधी अहिंसा शस्त्र संचालक
गांधी निर्मल सुधीर क्षमा पालक
गांधी का मार्ग सुगम सौम्य सरल
गांधी का मार्ग रसधार अविरल
गांधी अहम को भस्म करने का नाम है
गांधी होना बहुत मुश्किल काम है।
गांधी का सपना हर हाथ को काम
गांधी करते बुनियादी शिक्षा को आम
गांधी के रास्ते कब मिलता आराम है
गांधी होना बहुत मुश्किल काम है।
30 जनवरी शहीद दिवस पर बापू के नाम अर्पित शब्द पुष्प।
********
45. समर्पण......
पादरी पंथी बहमन हाजी एक हैं।
एक दाता सबका मालिक एक है।
जब सब नहीं थे वो था वो था वो था।
कुन फ़ा कुन की निदा वाला वो था।।
सूरज चाँद जमीं आसमान हर जगह।
नहीं मौजूद बतादो कोनसी वो जगह।।
नूर का नूर जोश में आया होगा।
कायनात को उसने सजाया होगा।।
समद की बारीकियों को सराहिये जरा।
हम देखते हैं दुनिया को आइये जरा।।
कतरे से छोटे कतरे से बनाया जहान।
उसने पैदा किये इंसान और शैतान।।
फूल पत्तियां दरख़्त बेल बूटे अजीब।
नज़र रुक जाये देखें जाके करीब।।
नूर बनाया नूर से सूरज चाँद से पहले।
उस नूर की नात बाद हम्द कहले।।
पानी के जानदार जमीन पर आये।
उसकी कुदरत क्या क्या दिखाये।।
नजर न आने नज़र में न आने वाला।
बनाई नदियाँ झीलें ओर हिमाला।।
नाजुकी कली को सख्ती लकड़ी को दी।
फाख्ता को कू जाल मकड़ी को दी।।
हर शै क्या खूब बनाई या रब तूने।
कमी ना रखी किसी में या रब तूने।।
काबिल आलिम बनाया हम सब को।
याद दिलाता हूँ भूल ना जाना रब को।।
*******
46. पथ.......
नव पथ सृजन
तज विष वमन
दीन-हीन के मन
सर्व सुख भवन
वय मृदु वचन
तम का नाश
नाया उल्लास
रहित उच्छवास
करो प्रयास
सुध मन रतन
*********
47. शक्ति......
अपनी शक्ति पहचान
बिना डरे आगे बढ़े
जीवन झूठ मृत्यु सत्य
सब सत्य द्वार पे खड़े
हार है तो सीख सही
जीत इम्तहान ले कड़े
कुछ पागलपन ज़रूरी है
सोता नहीं जिस पे चढ़े
नाम में क्या छोटा-बड़ा
कर जाएं कुछ काम बड़े
आब वही ताब वही
हीरा मुकुट या हार में जड़े
जिंदा वही रहे रहेंगे
हक़ के लिए मरे मरके लड़े
*********
48. गप.......
शिकार पर गये आदमी तीन
दो अंधे एक नाबीन
जो नाबीन उसने तीर चलाये तीन
दो के फल नही एक धार विहीन
जो धार विहीन उसने शेर मारे तीन
दो उठ भागे एक को निगली जमीन
ज़मीन से उसने नदियां उगाली तीन
दो सुखी एक जलहीन
जलहीन में घड़े भरे तीन
दो फूटे एक पेंदा बिन
पैंदा बिन में चावल पकाये तीन
दो पके नहीं एक को खाना कठिन
एक चावल पे आदमी बुलाये तीन
दो को भूख नहीं एक रोज़ा रखे तीन
जो रोज़े रखे तीन
वो कहे गप्पे तीन
*********
49. विचार........
आचार नहीं विचार नहीं
मानवीय सरोकार नहीं
प्रयोजन मात्र स्वार्थ है
उनका जीवन व्यर्थ है।
पाषाणी सा व्यवहार
आडम्बर हो श्रृंगार
भावना का ना अर्थ है
उनका जीवन व्यर्थ है।
तारतम्य से वास्ता नहीं
अलग थलग रास्ता वही
जहां दूर रहा परमार्थ है
उनका जीवन व्यर्थ है।
अविश्वाश के पात्र लोग
लक्ष्य केवल उपभोग
धन साधना शर्त है
उनका जीवन व्यर्थ है।
*********
50. गणित की गिनती....
एक से नो तक इकाई
दो अंकों से बने दहाई।
तीन अंकों का आंकड़ा
कहते जिस को सेंकड़ा।
चार-पांच अंकों की रकम हजार
चाचा जिसको लेकर गये बाजार।
लाख का हाथी सवा का हाथी
लाख छ-सात अंकों का साथी।
सो बातों का एक निचोड़
आठ-नो अंक हों बोलो करोड़।
ज़िरो है गणित का जिगर
याद कर इकाई दहाई का फिगर
******
50. स्कूल जाओ.......
जो चाहो करना चाहो
कूदो खेलो स्कूल जाओ
घर में उजियारा खेत में पानी
माटी पानी बिजली बचानी।
कृपणता का क्षय हो
बचत करना धेय हो।
देखो उद्धार मांगती सृष्टि
मृदा जंगल संरक्षण पर दृष्टि।
सोच समझ कर निर्णय शक्ति
अंधविश्वास से पूर्ण मुक्ति।
जल्दी उठने से जीवन सँवरता
विद्या बुद्धि बल तेज निखरता।
सत्य सादगी सदाचारी तंत्र
सफलता के तीन मूल मंत्र।
*******
51. आंखे.......
व्यथा से निःरस निहारती आँखें
रौबदार ताकतवर से दबती जबान
कौन इसका कारण कौन करे निदान
उत्तर इसका देगा कौन
कैसे हो भारत महान।
हाथ को काम नहीं
स्त्री का सम्मान नहीं
पूरे सब नहीं अरमान
कैसे हो भारत महान।
कहने को शक्तिशाली हैं
पर हाथ सबके खाली हैं
रोता सड़क पर किसान
कैसे हो भारत महान।
काम की पहली शर्त रिश्वत
रिश्वत नागरिक की किश्मत
आबरू बिके ज्यों सामान
कैसे हो भारत महान।
कोई इसका हल हो
हम से ही पहल हो
ईश्वर दे ऐसा वरदान
कैसे हो भारत महान।
दीप जले एक लो उठे
हम चले सब लोग उठे
जागे हिन्दू और मुसलमान
प्यारा अपना भारत महान।।
**********
52. संबंध.........
वैद्य का दवाई से
टोंक का निवाई से
बहन का भाई से
बिक्री का साई से
संबन्ध है।
फल का आम से
आदमी का नाम से
सीता का राम से
मालिक का गुलाम से
संबन्ध है।
आपका आप से
बेटे का बाप से
लाठी का सांप से
दर्जी का नाप से
संबन्ध है।
चींटी का कण से
हाथी का मण से
नाग का फण से
हीरे का पण से
संबन्ध है।
गर्मी का आग से
चूड़ी का सुहाग से
काले का दाग से
रागिनी का राग से
संबन्ध है।
राहगीर का चलने से
बालक का पलने से
आफत का टलने से
सूरज का ढलने से
संबन्ध है।
************
53. समाचार......
नमस्कार
सुनिये सरकार
आज के समाचार
इस प्रकार
परिधान मंत्री ने कहा है
भारत प्रगति कर रहा है
महंगाई सात साल में
आठ गुणा सूरज की ओर
भाव रुपये का गिरता जा रहा
भारत सोना गिरवी रख ऋण पा रहा
जनता की पूंजी मजे से
नीरव नटवर खा रहा है
रेलमंत्री की घोषणा
दुर्घटना में मरने वाले
प्रत्येक मृतक को
दो लाख मुआवजा
दिया जायेगा
आशा है इस योजना का
हर नागरिक फायदा उठायेगा।
सन 2022 तक भारत
विश्व में अलग नाम कमायेगा।
इसमें बलात्कार हत्या लूट डकेती शामिल है।
नक्सलियों के विस्फोट से
20 घायल 22 सैनिक शहीद
जांच जोरों पर
स्थिति नियंत्रण में
चार देशों की खेल प्रतियोगिता में
भारत ने चौथा स्थान प्राप्त किया
गत वर्ष से श्रेष्ठ प्रदर्शन
तीन देशों की टीम में तीसरा स्थान।
द्रविड़ ने कहा में नहीं मेरा बल्ला बोलेगा
माही प्रेमिका संग इडनगार्डन में डोलेगा
कबड्डी में हमने स्वर्ण पदक हथियाया
टांग खिंचाई का पुश्तेनी अनुभव काम आया
उपग्रह से प्राप्त
सूचना के अनुसार
यहां वहां कहीं भी
ठंडी या गर्म हवा चलेगी
जहां नहीं चली
वहां फिर कभी चलेगी
************
54. जिंदगी और मौत.......
सुलगते सहारा की
दहकती आग में
ठंडी हवा का झोंका
आया और गया
बस।
फलते बाग में
पतझड़ का आना
कली खिलने से पहले
मुरझाना
बस
**********
55. घोटाला..........
खलबली खलिबली वाला हो गया
चौकीदार के घर घोटाला हो गया
साफ सुथरे परिधान पर
दाग काला काला हो गया
चारा चीनी यूरिया गेंहू में
जोड़ राफेल वाला हो गया
ओलम्पिक बोफोर्स स्टाम्प पहले
अब राफेल गड़बड़ झाला हो गया
उधर भोली जनता बहकी
इधर उसका दिवाला हो गया
**********
56. दूर चले जाओ......
चाहे दूर चले जाओ
यादें तो सुहानी हैं
जब याद आयेगी
बहे अँखियों से पानी है
भूल सकूँ तुमको
क्या चीज भुलानी है
कर सकूं ऐसा
खुश्बू फूल से छुपानी है
रोते हुये छोड़ोगे
बात बिरानी है
रखे हुये हृदय में
तश्वीर पुरानी है
********
57. पहाड़ों से ......
गिरता पहाड़ो से झरझर
झरना कल कल नदी बनकर
बगुला खेलता है छुपकर
बगुली से कहे दुबककर
रात को चाँद निकले शर्माकर
हर्षाये कुमोदनी खिलखिलाकर
दीपक मित्रता निभाये उजियारे से
तेल संग बाती जलाकर
कुछ बात है समंदर के खारेपन में
गंगा मिलती नहीं नहीं तो आकर।
*********
59. गुड़िया......
ओ गुड़िया तेरा गुड्डा कहां है
ओ बुढ़िया तेरा बुढा कहां है
गुड़िया मेरी रानी
यह बड़ी सयानी
रोज सवेरे उठती
बाते करे ज्यों नानी
जल्दी तैयार हो पूछे
मेरा बस्ता कहां है
ओ गुड़िया...
बस्ता ले जाये स्कूल
गुड़िया खिलता फूल
स्कूल में क्या होता है
खेल खिलौना मिलता है
काम करे फिर खेले
स्कूल से डरती कहां है
ओ गुड़िया.......
*********
60. प्रभु.....
शरण तिहारी दास प्रभु
करते हैं अरदास प्रभु
भाव मानव कल्याण के
सृष्टि के नव निर्माण के
रोके जो विनास प्रभु
करते हैं ......
शरण....
विध्न बाधा दूर हो
सुख यहां भरपूर हो
मद में ना चूर हो
चारों दिशा प्रकाश प्रभु
करते हैं....
शरण...
पीड़ित हित न्याय करें
दिन के दुख कष्ट हरें
हम से काम सब के सरें
कहीं ना उच्छवास प्रभु
करते है.....
शरण....
***********
61. भाजपा....
जनसंघ का राजनीतिक अंग
नया जोश औऱ नई तरंग
जिसके झंडे में दो रंग
वह है भाजपा
मुद्दा मंदिर श्री राम का
नफरत मस्जिद नाम का
कथनी बदले करनी काम का
वह है भाजपा
2 से 350 तक आगे बढ़ी है
शिखर पर निरंतर चढ़ी है
भारत उदय का नारा गढ़ी है
वह है भाजपा
अटल मोदी शाह वैंकया
इसके तारण हार खेवय्या
सीधा सादा साफ रवैया
वह है भाजपा
सफल नीतियां बढ़ती साख
अनिश्चतता की उड़ती राख़
आमजन में पैठ विश्वास
वह है भाजपा
*********
62. एड्स .......
एड्स का कोई इलाज नहीं
पर बातचीत में लाज नहीं
फैलाव के कई कारण
नहीं फैलता अकारण
जो चाहे इस मौत से बचाव
जीवन साथी संग वफ़ा सुझाव
नशे में जो काम ले सुई
दूसरा कारण यह मूई
पेशेवरों से रक्त व्यापार
खून दे अपना रिश्तेदार
नहीं फैलता काटे मख्खी मच्छर
हाथ मिलाने खाने काम लें बिस्तर।
सावधानी से सो साल जियें
अपनों संग जीवन रस पियें।
**********
63. आदर्श.......
एक दिन मैंने अपने
आदर्श को मारा
लाखों दीं लानतें
करोड़ों धिक्कारा
एक दिन....
ना दे सका धन वैभव
अनुगानी जिसका भव
बच्चों को पि.सी.
पत्नी को गहने
घूमने को गाड़ी
कुछ बंगले रहने
करने अमीरी नजारा
एक दिन....
नङ्गा तन भूखी आंखें
समाज की थोथी बातें
भद्दी गालियां तिरस्कार
उसूलों के पुरस्कार
भर लिया घर सारा
एक दिन.....
**********
64. याद है.........
मुझे याद है
वो भयानक रात
जब अपने सब
दुश्मन थे अपने
कोई ना पराया
जो पुचकारता
दो महीने की
रोती बच्ची को
दुलारता
ठंडी थी रात
बारह बजे की बात
एक टुकड़े
ज़मीन के लिये
चली तलवार
उठी लाठियां
अबला पर वार
सोया था गांव
में डरा सहमा
डरा था अपनों के हाथ
समाप्त होने का
जीवन का
जिससे मैं हूँ
मैं ना रहता तो
मेरा क्या रहता
सोच कर सब
छोड़ दिया घर
अपना घर
जिसे बनाया था
मजदूरी कर
पेट काटकर
जिसमें पानी की जगह
मेरा पसीना खून था
जिसे सँवारा था
नींद काटकर
छुट गया आशियाना
उस ठंडी रात में
साथ नन्हीं सी जान
मैं और वो
ठिठुरते चले कहीं
दो पल की ठोर को
जहां अमन हो
चेन हो
झगड़ा ना हो
लाठियां
तलवारे
ना हों
ऐसी ठौर मिले।
*************
65. उठो.......
एक आह्वान से
उठो तूफान से
डटो जी जान से
बजो नगाड़ की तरह
शांत आसमान से
वीणा की तान से
अर्जुन के बाण से
बरसो बौछार की तरह
लक्ष्य महान रखकर
हथेली पर जान रखकर
स्व पहचान रखकर
डटो पहाड़ की तरह
अतिरेक से दूरी हो
बात वजन की पूरी हो
योजना ना अधूरी हो
लड़ो तातार की तरह
असंभव संभव करना
भय दंभ मोह भव हरना
चाहे सागर पे पग धरना
तारो अवतार की तरह
मानव स्वप्न संजोकर
तन मन धन खोकर
तन्मय निर्भय होकर
हाथ दो चार की तरह
कोई न लाचार रहे
न्याय से सरोकार रहे
सत्य कर्म आधार रहे
जियो खुद्दार की तरह
कथनी करनी न अलग हो
परमार्थ बढ़ा पग हो
निकसा सारा जग हो
दिखो आसार की तरह
जीवन जब भारी लगे
छाती पे कुल्हारी लगे
धरती बोझ सारी लगे
बजो सितार की तरह
*********
66. आई.....
वो आयी
ऐसे आई
जैसे आई
ठंडी बयार
जीवन आधार
सुंदर संसार
उनका साथ
प्रिय का हाथ
प्रेम बरसात
दुःख से निजात
वो गई
ऐसे गई
जैसे गई
मोह अभिलाषा
जीवन आशा
प्रेम की भाषा
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67. फूल सी......
खिल जाती हो फूल सी
जब आता हूँ मैं।
उदास। मुरझाती हो
जब जाता हूँ मैं।
तुम बेल सी लिपटी हो
जब आता हूँ मैं।
सिमटती छुईमुई सी
जब जाता हूँ मैं।
भूलकर सारे गम
जब आता हूँ मैं।
हो जाते चश्म नम
जब जाता हूँ मैं।
बिछड़कर मिलने फिर
जब आता हूँ मैं।
जाता सवाल से घिर
फिर क्यों जाता हूँ मैं।
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68. कुछ कुछ साधु सा........
सन्त समागम कीजिये
सन्त बनोजी आप।
सन्त का नहीं आदर जा
उस घर को अभिशाप।
अंतर इतना भर भय अंतर इतर माय।
अतर अकड़त फरे
इतर सुगन्ध भर जाय।
मन वाचा कर्मा
तन सत्व सुख धर्मा।
शुद्ध तन मन वचन
प्रशन्न होय ब्रहम्मा।
कर्म बड़ा जग मोहि
नहीं जात ओर पात।
होत न कंचन लोहा
चोर न सन्त कहात।
मनड़ा जग माहे
सुन न काहु की हाय
सबन का हित जाय
वचन न कहत अघाय।
गाँव हित म निज
देश हित म गांव
ज्यों अंतरिक्ष मेघ घने
मिटे तरवर छांव।
दो दिन की चांदनी
शेष अमावश होत।
सूर्य का ढलना अटल
अटल है मौत।
एक दूजे का साथ दे
जो जियो सो साल।
भला काहु न कर सके
आज मरे या काल।
सुंदर शरीर शौष्ठव
यौवन ईश्वर वरदान
जो न दियो शील गुण
कुछ न दियो भगवान।
गाजर मूली की तरह
कट रहा मनु आज।
ये भगवन क्या चाहे
जाने ना पड़े राज।
बाजा बजा ले चले
दूल्हा अश्व बिठाए
भाग सके तो ले भाग
कल गन्धर्व बन जाए।
सांसां की ना बात करो
आं की काची डोर।
ए छुट्यां लागे अयां
ज्यो बिन ब्याई ढोर।
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70. जवानों.........
देश के जवानों सीमाओं को सँभालो।
गुजराती का सुठा बंगाली का भालो
हिन्द की तकदीर को तदबीर बना लो।
देश.....
आया दुश्शासन फिर से चीर हरण को
आज दुर्योधन ने ललकारा भीम प्रण को
मायड़ को इस चंगुल से छुड़ा लो।
देश.....
राम की धरती रावण ने कदम बढ़ाया
पहचानो इस को अपना नहीं पराया
जागो बढ़ो देखो सीमायें सँभालो
देश.....
देश सब से पहले देश जाने जिगर हो
जय मां भारती आवाज उधर इधर हो
आओ अंतर बाहर सिमा की खबर लो
देश....
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71. घर के सामने..........
मेरे घर के सामने
एक पेड़ खड़ा है
वर्षों से आंधी यों
तूफानों से लड़ा है
यह छाया बालपन से
स्मृति में रचे
हरी पतली सांगरी
मीठे सूखे खोखे
रसना के द्वार
घर बना बसे
ढोर चरा कर
लौटते वापस घर
वो खामोश निहारता
में उसे पुचकारता
जैसे वो त्याग का पर्याय
निर्मम गंडासी के वार
सहता लूंग बांटता
घर बनाने की जगह
वो आ गया
बाबाजी ने कहा
इसे काट दो
काट कर
किवाड़ तख्ता बनेगा
भाई जी ने लिया
कुल्हाड़ा लग गये
वो कह रहा था
जोर से हिल हिल कर
मत काटो मत काटो
पर सुनता कौन
फिर गिरा थर्रा कर
बेबस लहू लुहान
पूछ रहा था
फल देने वाले कटते
कटते रहे हैं
पर फल देना आदत है
छूटेगी नहीं
फल देने वाले महान।
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36. काम करो.....
बचपन रहे ना सदा
बडॆ हो खाओगे क्या
वालिद शाह या गदा
खा के बचाओगे क्या
कुछ तो इंतज़ाम करो
काम करो, काम करो।
खुमारी लुट जायेगी
किस्मत रूठ जायेगी
पीढियाँ गुन गुनायेगी
गा-गा कर रुलायेगी
खून को न बदनाम करो
काम करो काम करो।
दूरअंदेशी से काम लो
और खुदा का नाम लो
कर आराम हराम लो
कारकुन इकराम लो
बंजर को गुलफाम करो
काम करो काम करो।
दरिया से रास्ता निकले
बेदारो गुमास्ता निकले
किसी से वास्ता निकले
तुझे तलाशता निकले
अमन का पैग़ाम करो
काम करो काम करो।
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