लघुकथा - टटलू
अंकल आपके पास आईफोन है क्या? जल्दी - जल्दी बोलती रेशमा ने वयोवृद्ध पूर्णजी से पूछा। नहीं, कहते हुए वो अपने काम लग गए। रेशमा ने तपाक से एक पेज पर अपने नंबर लिख कर थमाते हुए कहा, एक दो दिन में आए तो इस नंबर पर कॉल कर लेना, अंकल! मुझे एक आईफोन लेना है।
कहानी अब शुरू होती है। जमाना बहुत खराब है पूर्ण सावधानी ही इसका इलाज है, नहीं तो जो पीढ़ियों की इज़्ज़त मिनटों में मिट्टी में मिलते देर नहीं लगेगी।
हमारे पड़ोस के एक कस्बे के मुख्य बाजार की शांत और वीरान गलियों में पूर्ण जी जैसे छोटे, सीधे-साधे दुकानदार रहते हैं। पूर्णजी की पीढ़ियों की दुकान है, जहां अब वो मोबाइल बेचते हैं। उम्र ढल चुकी थी, बाल सफेद हो चले थे, परन्तु व्यापार पूरी ईमानदारी से चलाते। बीवी-बच्चे घर पर, वो दिन भर दुकान, शाम को घर। जिंदगी सरल थी, बिना किसी उलझन के।
गौरी चिटी, बड़ी-बड़ीआंखों वाली, मीठी बोली वाली रेशमा की रंगत दोपहर की झुलसाती गर्मी ने एकदम लाल कर दी थी।
पूर्णजी के नहीं के बाद वह हर दिन फोन के बारे में पूछने आती, वहां पड़े फोन उठाती, मुस्कुराती, नजरें मिलातीं और चली जाती। इस तरह पांच - छह दिन में दोनों आपस में घुल- मिल गए। बातों-बातों में हँसी-मजाक होने लगा। बातें धीरे - धीरे प्यार भरी होने लगीं। रेशमा कहती, "आप बहुत अच्छे लगते हो... कोई मेरी इतनी केयर नहीं करता।" पूर्णजी उससे बातें कर आनंद महसूस करते।
पूर्णजी को लगा कि रेशमा सच में आईफोन खरीदना चाहती है तो एक आईफोन प्रो - 16 मंगवा लिया। शाम को उन्होंने रेशमा को फोन आ जाने का मैसेज किया। उसने गहरा लाल हार्ट भेज कर जवाब में धन्यवाद दिया। फिर कॉल आई कि सर, आप फोन ले कर आ जाइए, "मिल भी लेंगे, फोन भी ले लेंगे और आप पैसे ले लेना। मेरा घर ........होटल के पास ही है, मैं भी वहीं आ जाती हूं। पूर्णजी ने फोन थैली में डाला, साथ में कुछ गिफ्ट और चॉकलेट ले कर चल दिए। सजी संवरी रेशमा होटल के लॉज में पूर्णजी का इंतजार कर रही थी। दोनों ने चाय पी, फिर रेशमा पूर्णजी का हाथ पकड़ कर एक कमरे में ले गई। आगे जो होना था, बताने की जरूरत नहीं। प्रफुल्लित पूर्णजी फोन दे कर बिना पैसे लिए पहले दुकान पर जा कर उसे बढ़ाया, ऑटो लिया और घर पहुँच गए।
सुबह जब वो घर से दुकान पर आए और रोज की तरह व्हाट्सएप खोला। सब से ऊपर रेशमा का ही मेसेज था। मेसेज में एक वीडियो था, होटल वाला पूरा सीन फूल मूवी बना कर भेजा गया। इस दृश्य में वो खुद रेशमा के साथ थे।
अगला मैसेज था, तुरंत "5 लाख रुपये ले कर आ जाओ, होटल के उसी कमरे में, नहीं तो ये वीडियो पूरे कस्बे में वायरल कर दिया जायेगा साथ में रेप केस भी ठोक दूँगी। पुलिस तेरे घर आएगी।"
पूर्णजी के पैरों तले की जमीन खिसक गई। उन्हें समझ में आ गया कि वो किसी बड़े धोखेबाज (ब्लैकमेलर) समूह के हत्थे चढ़ चुके हैं। हाथ काँपने लगे। उलझन में पूरा दिन गुजर गया, शाम को घर आ कर रात भर नींद नहीं आई।
परिवार के लोगों को बताऊं या नहीं, दोस्तों को बताऊं या नहीं, रिश्तेदारों को पता चलेगा तो क्या होगा। इसी उधेड़बुन में
सुबह हो गई।
पूर्णजी की रोज की आदत है, सुबह- सुबह पार्क में घूमने की। पार्क में हम उम्र दोस्तों का एक लाफ्टर क्लब बना हुआ है। पूर्णजी भी उसके सदस्य थे। आज सभी हंस रहे थे पर पूर्णजी की तो हवाइयां उड़ी हुई थीं। इतने में मोबाइल में टन की आवाज के साथ रेशमा का व्हाट्सएप मेसेज साथ में कुछ आपत्तिजनक फोटो। उनके माथे पर पसीना आ गया। उनके पास खड़े गुप्ताजी ने कारण पूछा, कई बार टालने के बाद भी गुप्ता जी के जिद करने पर सारी बात खुल कर बताई।
एक हाथ में मोबाइल लिए दूसरे में पूर्णजी का हाथ पकड़े गुप्ताजी साइबर थाने में पहुंच गए। थाना प्रभारी इंस्पेक्टर धर्मवीर सिंह को पूर्णजी ने सारी बातें रोते- रोते बताईं, फोटो, वीडियो दिखाए। इंस्पेक्टर ने शांत स्वर में कहा, "चिंता मत करो, बाबूजी!अब हमारा नंबर है।"
पुलिस ने जाल बिछाया। पूर्णजी को कहा गया कि लड़की को मैसेज करो, "पैसे तैयार हैं, 2 लाख अभी दे रहा हूँ, बाकी बाद में।" जगह तय हुई। सुबह 6 बजे, उसकी बताई लोकेशन।
रेशमा अपने बाप के साथ आई, उसने जैसे ही 2 लाख का लिफाफा थामा, पुलिस ने दबोच लिया, रंगे हाथ पकड़े गए। रेशमा चिल्लाई, "यह सब झूठ है!" पर मोबाइल में चैट, वीडियो के साक्ष्य पूरे थे।
पुलिस रिमांड में हूंता (रेशमा का पिता) ने अन्य वारदात भी स्वीकार की।
कभी सोने के नकली जेवर बेचना, कभी नकली ईंट, कभी ओलेक्स पर गाड़ियां बेचने के नाम पर ठगी सब स्वीकार कर लिया।
मेवात क्षेत्र के निवासी हुँता और रेशमा जैसे हजारों लोग यह काम करते हैं जिसे उनकी स्थानीय भाषा में टटलू कहा जाता है।
नोट - यह कहानी नही सत्य घटना है, सामाजिक दृष्टि को सामने रखते हुए घटना स्थल एवं कहानी के पात्रों के नाम बदले गए हैं।
#जिगर_चूरूवी
No comments:
Post a Comment