शामानी धर्म में पूर्वज पूजा, जीववाद और प्रकृति के साथ सामंजस्य पर ज़ोर दिया जाता है
धर्म एक प्राचीन, प्रकृति-आधारित आध्यात्मिक प्रणाली है जो आकाश, पृथ्वी, पूर्वजों और आत्माओं के साथ मनुष्य के संबंध पर केंद्रित है.
शामानी धर्म (तारों एवं आकाश के पुजारी) -
शामानी धर्म जिसे शमनवाद भी कहा जाता है, एक प्राचीन आध्यात्मिक प्रथा है जो जनजातीय और स्वदेशी समाजों में पाई जाती है, जहाँ शमन (Shaman) नामक व्यक्ति आत्माओं, देवताओं और मृतकों की दुनिया से जुड़कर उपचार करने, मार्गदर्शन प्राप्त करने और आध्यात्मिक यात्राएं करने की शक्ति रखता है; यह प्रथा प्रकृति, आत्माओं और पूर्वजों के साथ गहरे संबंध पर आधारित है और साइबेरिया, मध्य एशिया तथा अरुणाचल प्रदेश जैसी जगहों पर प्रचलित है।शामानी धर्म की स्थापना -
शामांनी धर्म का कोई एक संस्थापक नहीं है, यह विश्व की स्वदेशी और आदिवासी संस्कृतियों में हजारों सालों से चली आ रही प्राचीन आध्यात्मिक परंपरा या प्रथा है। सार्वभौमिक आध्यात्मिक प्रथा माना जाता है जो दुनिया के कई हिस्सों की स्वदेशी संस्कृतियों में मौजूद है, जिसमें उत्तरी और दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका और एशिया शामिल हैं।विभिन्न संस्कृतियों में विकसित हुआ। दुनिया की सबसे पुरानी आध्यात्मिक प्रथाओं में से एक है, जो हजारों साल पुरानी है। जिसमें एक शमन आत्माओं और दुनिया के बीच मध्यस्थता करता है।
मुख्य विशेषताएँ:
शमन एक आध्यात्मिक मध्यस्थ जो ट्रान्स या गहन अनुभव के माध्यम से दूसरी दुनिया में यात्रा करता है।
आत्माओं से संवाद: यह माना जाता है कि शमन बीमारों को ठीक कर सकते हैं, आत्माओं से बात कर सकते हैं, और मृत लोगों की आत्माओं को दूसरी दुनिया में ले जा सकते हैं। शमन साइबेरिया की तुंगुस जनजाति से निकला शब्द है,जो ऐसे व्यक्ति का वर्णन करता है जो आत्माओं से जुड़ सकता है। इसका शाब्दिक अर्थ है जानकार। शमन आध्यात्मिक और भौतिक दुनिया के बीच कड़ी के रूप में कार्य करता है, जो उपचार, भविष्यवाणी और मार्गदर्शन प्रदान करता है। यह विश्व की विभिन्न आध्यात्मिक प्रथाओं में शामिल है। इस धर्म के पुजारी सर्वेश्वरवाद (हर चीज़, पत्थर, पेड़, जानवर) में आत्मा या चेतना होती है, ऐसी मान्यता है।
शामानी धर्म की उत्पत्ति -
साइबेरिया व मध्य एशिया की प्राचीन जनजातियों में उत्पन्न हुआ आदिवासी धर्म जिसमें आकाश देवता की पूजा की जाती है। इसमें तारों को पवित्र माना जाता है।शमन यह मान्यता रखते हैं कि शामन लड़ाका जब युद्ध के मैदान में बलिदान देता है तो वह तारा बन जाता है।
शमन (पुजारी) आत्माओं से जुड़कर बीमारों को ठीक करते हैं, भविष्य बताते हैं और आत्माओं के मार्गदर्शन से काम करते हैं।
शामानी धर्म का उद्देश्य -
व्यक्ति, प्रकृति और ब्रह्मांड के साथ सामंजस्य स्थापित करना ही इस धर्म का मुख्य उद्देश्य है। ज्ञान प्राप्त कर, दुखों को आनंद में बदलना। पूर्वजों और प्रकृति की आत्माओं के साथ संबंध मजबूत करना। यह धर्म सार्वभौमिक आध्यात्मिक परंपरा है जो प्राचीन काल से चली आ रही है और मनुष्य को अदृश्य दुनिया से जोड़ती है।
शामानी संस्कृति की वेशभूषा -
शामानी धर्म की कोई एक निश्चित वेशभूषा नहीं होती, बल्कि यह दुनिया भर की स्वदेशी संस्कृतियों में पाई जाती है, जिसमें शमन (आध्यात्मिक नेता) विशेष, प्रतीकात्मक वस्त्र पहनते हैं,जो जानवरों की खाल, पंखों, हड्डियों, मोतियों, और रंगीन कपड़ों से बने होते हैं। शमन आत्माओं से जुड़ने, बीमारों को ठीक करने और अनुष्ठानों के लिए उन्हें दुनिया से परे ले जाने में मदद करते है। हर संस्कृति (जैसे साइबेरियाई, अमेरिकी मूल-निवासी) का अपना अनूठा शमनिक परिधान होता है।
शमनिक वेशभूषा की मुख्य विशेषताएँ- प्रतीकात्मकता - हर वस्त्र, गहना, और तत्व का एक गहरा आध्यात्मिक अर्थ होता है, जो आत्माओं या प्रकृति की शक्तियों से जुड़ा होता है।
सामग्री - अक्सर प्राकृतिक चीजें जैसे खाल (हिरण, भालू), पंख (ईगल, उल्लू), सींग, हड्डियाँ, सीपियाँ, और लकड़ी का इस्तेमाल होता है।
आवाज़ - कपड़ों में घंटियाँ, खड़खड़ाहट (जैसे रेनस्टिक या धातु के टुकड़ों से), और अन्य ध्वन्यात्मक उपकरण जोड़े जाते हैं ताकि आत्माओं को आकर्षित किया जा सके और जगाया जा सके।
रंग - चमकीले और गहरे रंग, जो आत्माओं के लोकों (जैसे ऊपरी, मध्य, निचला) का प्रतिनिधित्व करते हैं।
हेडड्रेस - बड़े और विस्तृत हेडड्रेस, जिनमें पंख, सींग, या अन्य आध्यात्मिक प्रतीक लगे होते हैं, जो शमन की शक्ति और स्थिति दर्शाते हैं।
विशेष वस्त्र - कुछ संस्कृतियों में विशेष कोट (जैसे साइबेरियाई शमनों के लिए), बेल्ट, या स्कर्ट होते हैं जो उन्हें आत्माओं की दुनिया में यात्रा करने में मदद करते हैं।साइबेरियाई शमन - अक्सर भालू या हिरण की खाल से बने, पंखों और मोतियों से सजे, घंटियों वाले वस्त्र पहनते हैं।अमेरिकी मूल-निवासी शमन - टोकरी जैसे हेडड्रेस, चमड़े के कपड़े, और पक्षियों के पंखों का उपयोग करते हैं। संक्षेप में, शमनिक वेशभूषा सिर्फ कपड़े नहीं, बल्कि एक शक्तिशाली आध्यात्मिक उपकरण होती है जो शमन को अलौकिक दुनिया से जुड़ने और कार्य करने में सक्षम बनाती है।
शामानी धर्म में ईश्वर की अवधारणा -
वास्तव में शामानी धर्म कोई संगठित धर्म नहीं है।, यह प्राचीन आध्यात्मिक प्रथाओं का आदिवासी समूह है, जिसमें ईश्वर की अवधारणा अलग-अलग संस्कृतियों में भिन्न - भिन्न होती है। इसमें अक्सर प्रकृति की शक्तियों (जैसे आकाश का देवता (टैंगड़ी), पूर्वजों और कई आत्माओं (अच्छी और बुरी दोनों) में विश्वास रखता है। जहाँ शमन (आध्यात्मिक चिकित्सक) इन आत्माओं से संवाद करते हैं, न कि एक सर्वशक्तिमान ईश्वर की पूजा करते हैं। बल्कि ब्रह्मांडीय शक्ति और आंतरिक दिव्यता से जुड़ते हैं। शामानी धर्म में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से ईश्वर की अवधारणा नहीं है।
शामानी धर्म में ईश्वर शब्द की व्याख्या नहीं की जाती, बल्कि एक ऐसी प्रणाली का पालन किया जाता है, जहाँ शमन आत्माओं और ब्रह्मांडीय शक्तियों के साथ सीधे संपर्क स्थापित करते हैं, जो किसी संगठित धर्म के एकात्मक ईश्वर से भिन्न होता है।
आत्माओं और प्रकृति की पूजा -
शामानी परंपराएँ पृथ्वी, पहाड़, नदियों और आकाश जैसी प्राकृतिक शक्तियों के प्रति सम्मान पर केंद्रित हैं, जिन्हें पवित्र मानते हैं।
बहुदेववाद -
इस धर्म में देवताओं और आत्माओं का बहुलवाद पाया जाता है। इसमें एक सर्वोच्च देवता के स्थान पर कई देवताओं और आत्माओं (जैसे मंगोलों में उलगन में विश्वास करते थे जो तीन लोकों (धरती, आकाश, पाताल) में निवास करते हैं।
टेंगड़ी -
आकाश का देवता जो सर्वोच्च शक्तिमान माना जाता है। यह एक व्यक्तिगत ईश्वर से अलग अवधारणा थी। यह ब्रह्मांड के निर्माता एवं नियंत्रक माने जाते हैं। टैंगड़ी नीले आकाश का सर्वोच्च देवता, जो सभी चीज़ों को देखते और समझते हैं।
उमय (धरती की देवी) -
पृथ्वी देवता को माता के रूप में पूजा जाता है जो उर्वरता और जीवन देती है।
पूर्वज पूजा -
पूर्वजों की आत्माओं का सम्मान और उनकी पूजा की जाती है। शामानी धर्म के लोगों का विश्वास है कि पूर्वजों की आत्मा तारा बन जाती है।
शासक -
इस धर्म में शासक को आकाश की इच्छा से शासन करने वाला माना जाता था। जीवन में सदाचारी रह कर प्राकृतिक नियमों का पालन करके सुख और समृद्धि प्राप्त की जाती है।
शामानी धर्म की आज की स्थिति -
यह धर्म मंगोलिया, साइबेरिया (जैसे तुवा और ख़कासिया) और मध्य एशिया के कुछ हिस्सों में आज भी जीवित है, हालांकि इसके अनुयायियों की संख्या घट गई है और कई परंपराएँ आधुनिकता के साथ बदल गई हैं।
यह धर्म अब लगभग विलुप्त हो गया है। मंगोलिया, साइबेरिया,किर्गिज़स्तान, रूस के कुछ भाग में यह इस धर्म के मानने वाले थे, जिनमें मंगोल महत्वपूर्ण थे। मंगोलों ने इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया और शामनी धर्म के मानने वालों का यह क्षेत्र मुस्लिम बहुल क्षेत्र बन गया। भारत में अरुणाचल प्रदेश की जनजातियों में यह प्रथा अभी भी प्रचलित है, जहाँ उनके अपने अनुष्ठान विशेषज्ञ होते हैं।
आंतरिक दिव्यता -
आधुनिक शामानी प्रथाओं में, ईश्वर को अवैयक्तिक रचनात्मक शक्ति (ब्रह्मांड) के रूप में देखा जाता है, जो हर व्यक्ति में मौजूद है।
शमानी धर्म में अंतिम संस्कार-
इस धर्म में मुर्दों को जमीन में दफनाया जाता है। शमानी धर्म में अंतिम संस्कार में आत्मा को परलोक ले जाने पर जोर होता है, जिसमें ओझा ड्रम, मंत्रोच्चार और नृत्य के द्वारा आत्मा का दूसरी दुनिया में मार्गदर्शन कराते हैं, शरीर को तैयार करते हैं, और कई बार शरीर को अकेला नहीं छोड़ते। ये अनुष्ठान आत्मा की शांति और सुरक्षित यात्रा के लिए होते हैं, जिनमें प्राकृतिक तत्वों और पूर्वजों की पूजा भी शामिल हो सकती है। इस संस्कार से मृतक को नई दुनिया में जाने में मदद मिलती है। ओझा आत्मा को बुरी शक्तियों से बचाने और एक अच्छी मृत्यु के लिए मार्गदर्शन करते हैं।
अनुष्ठान और प्रतीक -
शरीर की तैयारी-
शरीर को धो कर तेल लगाया जाता है, शव को सम्मानपूर्वक तैयार किया जाता है।
तीन दिन का जागरण -
तीन दिन तक शरीर को कभी अकेला नहीं छोड़ा जाता सिर के पास मोमबत्ती जलाई जाती है, और चारों दिशाओं में छोटे मंदिर बनाए जाते हैं।
ड्रम और मंत्र -
ओझा ड्रम बजाकर और मंत्रों का जाप करके समाधि की स्थिति में जाते हैं और आत्मा से संवाद करते हैं।
पवित्र घेरा -
शरीर के चारों ओर एक पवित्र घेरा बनाया जाता है, जिसमें परिवार और दोस्त प्रवेश कर सकते हैं।
नृत्य और यात्रा -
पार्थिव शरीर को नृत्य करते हुए ले जाया जा सकता है, और मृतक के प्रिय स्थानों पर छोटे मंदिर स्थापित किए जाते हैं।
पवित्र बांस -
कुछ संस्कृतियों में आत्मा की सरल यात्रा हेतु पवित्र बांस रोपने जैसे कार्य किए जाते हैं।
अंतिम संस्कार के बाद -
पत्थरों की पंक्ति -
दफनाने के बाद, अवशेषों के स्थान को पत्थरों से घेर दिया जाता है, जो जीवितों और मृतकों के लिए अलग-अलग द्वार बनाते हैं।
गट समारोह -
मृतक को परलोक में प्रवेश करने और नए रूप में ढलने में मदद करने हेतु शैमानिक गट समारोहआयोजित किया जाता है।
उद्देश्य -
मृतक की आत्मा को सुरक्षित रूप से परलोक भेजना ही मुख्य उद्देश्य है।
शोक की पूर्ण अभिव्यक्ति और मृतक के साथ अंतिम प्रत्यक्ष संपर्क का अवसर प्रदान करना। आत्मा को बाधाओं से मुक्त करना और एक अच्छी मृत्यु सुनिश्चित करना। शमानिक परंपराएं अलग-अलग संस्कृतियों में भिन्न होती हैं, लेकिन आत्मा को मार्गदर्शन देना और मृत्यु को एक आध्यात्मिक यात्रा मानना मुख्य है।
चंगेज खां (GanGhej khan) -
अब से तकरीबन 800 साल पहले एक मंगोल ख़ानाबदोश ने काले सागर से प्रशांत महासागर तक विशाल मंगोल साम्राज्य की स्थापना की। उसका नाम था तेमुजिन जिसे बाद में पूरी दुनिया में चंगेज़ ख़ाँ के नाम से जाना गया।
सन 1162 में मंगोलिया की बैकाल झील की पूर्व दिशा के ऊबड़-खाबड़ इलाक़े में दिलेर एवं ख़ानाबदोश कबीले में इस लड़के का जन्म हुआ।
जन्म के समय उसकी हथेली में ख़ून का थक्का था, जिसे उन लोगों ने एक महान विजेता होने की निशानी के रूप में देखा। उसके पिता को जब वह दस - बारह साल का था तब दुश्मनों ने ज़हर देकर मार डाला गया। नाम में ख़ाँ होने की वजह से कई लोग उसको मुसलमान समझ लेते हैं, ख़ाँ दरअसल एक आदरसूचक उपाधि है, वह मंगोल था और शामानी धर्म को मानता था, जिसमें आसमान की पूजा करने की परंपरा रही थी। चंगेज़ ने अपना शुरुआती जीवन जहालत, शर्मिंदगी और ग़रीबी में बिताया। 50 साल की उम्र में जाकर उसने जीत का जो सिलसिला शुरू किया वो उसे दुनिया के महान योद्धाओं की श्रेणी में खड़ा करता है। उसके नेतृत्व में मंगोल राजवंश का उदय हुआ, जिसने पूरे चीन, मध्य एशिया, ईरान, पूर्वी यूरोप और रूस के एक बड़े हिस्से पर राज किया। चंगेज़ के सैनिक ऑस्ट्रिया, फ़िनलैंड, क्रोएशिया, हंगरी, पोलैंड, वियतनाम, बर्मा, जापान और यहाँ तक कि इंडोनेशिया तक पहुंचे।
चंगेज़ का साम्राज्य एक करोड़ बीस लाख वर्ग मील में फैला हुआ था (अफ़्रीका महाद्वीप के बराबर और उत्तरी अमेरिका महाद्वीप से बड़ा) जिसकी तुलना में रोमन साम्राज्य बहुत छोटा था।
विश्व के महान योद्धाओं में से सिकंदर महान के पास अपने पिता फ़िलिप की बनाई विशाल युद्ध मशीनरी थी, जूलियस सीज़र के पास 300 वर्ष पुराना रोमन सैनिक श्रेष्ठता का इतिहास था,
नेपोलियन फ़्रेंच क्रांति के बाद मिले जन समर्थन की बदौलत राज कर पाए, इनकी तुलना में चंगेज़ को अपनी परंपराएं ख़ुद ईजाद करनी पड़ी थीं। तमाम राजनीतिक और सामाजिक समस्याओं से जूझते हुए उसने बहुत मुश्किल से अपने लिए जगह बनाई थी। जवान होते ही उसने बाज़ों के साथ पक्षियों का शिकार करने की कला सीखनी शुरू कर दी थी, इसे उस ज़माने में भावी नेता के लिए यह एक आवश्यक गुण माना जाता था। चंगेज़ ने कभी भी लिखना और पढ़ना नहीं सीखा।
13 साल की उम्र में उसने अपने सौतेले भाई बेहतेर की हत्या कर दी। इतनी कम उम्र में की गई हत्या बताती है कि चंगेज़ ख़ाँ में निर्दयता का पुट जन्मजात था। किशोरावस्था में ही उसमें भविष्य के बारे में सोचने की क्षमता विकसित हो गई। बेहतेर को वो अपना प्रतिद्वंदी मानता था, जिसका उसके पिता का वारिस बनने का दावा उससे अधिक था क्योंकि वो उसका सबसे बड़ा बेटा था।
धीरे-धीरे चंगेज़ ने एक युवा सिपहसालार के तौर पर अपनी जगह बनानी शुरू कर दी। चंगेज़ ने लगभग अपना पूरा जीवन तंबुओं और लड़ाई में बिताया, नागरिक प्रशासन पर ध्यान देने का उसे समय ही नहीं मिला। चंगेज़ बहुत बड़ी क्षमताओं वाला शख़्स था, जिसने अपनी सेना का ईश्वर की तरह नेतृत्व किया। जब वो खुरासान आया तब उसकी उम्र 65 वर्ष थी, वो लंबे और गठीले बदन का शख़्स था, उसके चेहरे पर बहुत कम बाल थे जो तब तक सफ़ेद हो चले थे, उसकी आँखे बिल्लियों की तरह थीं, उसके शरीर में ज़बरदस्त ऊर्जा थी। दुश्मनों के लिए उससे निर्दयी कोई नहीं हो सकता था।
ज़हरीले तीर से घायल हुआ चंगेज -
जमूगा के साथ हुई लड़ाई में चंगेज़ की गर्दन में एक ज़हरीला तीर आकर लगा। उस ज़माने में तीरों पर साँप या किसी जहरीले जानवर का ज़हर लगाया जाता था. ये दाँतदार तीर होते थे जो शरीर में एक बार घुसने के बाद अधिक देर तक रह कर ज़हर को तेज़ी से फैलने का मौक़ा देते। इसका इलाज होता था चोट को धोकर घायल व्यक्ति को दूध पिलाना लेकिन चंगेज़ की चोट गंभीर थी क्योंकि तीर से उसके गर्दन की एक नस कट गई थी और उसमें से तेज़ी से ख़ून बह रहा था। ऐसे समय में चंगेज़ के एक कमांडर जेल्मे ने उसकी जान बचाने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई। जेल्मे खून का बहना तो नहीं रोक पाया लेकिन उसने चंगेज़ की गर्दन से विषाक्त ख़ून को चूसकर थूकना शुरु कर दिया। थोड़ी देर में चंगेज़ को होश आ गया, जेल्मे ने उसके लिए दूध की व्यवस्था कर उसकी जान बचाई, लेकिन चंगेज़ ने उसके साथ असभ्य व्यवहार करते हुए कहा- 'क्या तुम उस ज़हरीले ख़ून को थोड़ी दूर नहीं थूक सकते थे?
चंगेज़ की शख़्सियत के कई स्याह पहलू रहे हों लेकिन अधिकतर इतिहासकारों का मानना है कि उसके राजनीतिक कौशल के बारे में किसी को संदेह नहीं है। चंगेज़ सैनिक रणनीति का बेजोड़ उस्ताद था लेकिन युद्ध के कमांडर के तौर पर वो उतना प्रभावशाली नहीं था। लोगों का दिमाग़ और मानव मनोविज्ञान पढ़ने की उसकी क्षमता ग़ज़ब की थी। उसकी कल्पनाशीलता भी प्रशंसनीय थी। वो कई निजी सदमों से उबर कर ऊपर आया था। वो दूरदर्शी, संयमित और चालाक व्यक्ति था, लेकिन उसमें निर्ममता, एहसान फ़रामोशी और प्रतिशोधी होने के अवगुण भी थे।
मर्किट के साथ लड़ाई में चंगेज़ की पत्नी बोर्ते का अपहरण कर लिया गया जिसे मर्किट के हाथ पड़ जाने दिया जबकि दूसरी महिलाएं जिसमें उसकी माँ होएलुन भी शामिल थीं, मर्किट के चंगुल से बच निकली। वैसे बोर्ते का इसलिए अपहरण हुआ क्योंकि चंगेज़ उसके घोड़े पर खुद सवार हो गया, चंगेज़ की माँ ने बेहतेर की हत्या के बाद उसे धिक्कारते हुए जानवर और शैतान तक कह दिया।
चंगेज़ के बारे में कहा जाता है कि वो बहुत अधिक सतर्क और चौकस रहने में विश्वास करता था। सबसे आगे रहकर सेना का नेतृत्व करना उसकी फ़ितरत में नहीं था।
चंगेज़ गुस्से में अक्सर अपना आपा खो बैठता। सन 1220 तक ट्रांजोक्सियाना पर कब्ज़ा करने के बाद उसने पश्चिम एशिया के मुस्लिम राजकुमारों से पत्र व्यवहार के लिए एक दुभाषिए और लिपिक की सेवाएं लीं। चंगेज़ को ख़बर मिली कि मोसुल का राजकुमार सीरिया पर हमला करने वाला है, उसने अपने लिपिक से उसे एक पत्र लिखवा कर कहा कि वो ऐसा करने की जुर्रत न करे। लिपिक ने कूटनीतिक समझ दिखाते हुए अपनी तरफ़ से उस पत्र की भाषा थोड़ी नर्म कर दी और मोसुल के राजकुमार के लिए इस्लामिक दुनिया में प्रचलित आदरसूचक शब्दों का उपयोग किया, जब चंगेज़ ने उस पत्र का मंगोलियन भाषा में पढ़वाया तो आगबबूला हो गया। उसने काँपते हुए लिपिक से कहा कि तुम ग़द्दार हो, मोसुल का राजकुमार तो ये पत्र पढ़कर और अहंकारी हो जाएगा। उसने ताली बजाकर अपने एक सिपाही को बुला कर उसे जान से मारने का आदेश दे दिया।
चंगेज़ की निर्दयता के और भी क़िस्से मशहूर हैं। उसके समय में किसी भी शहर पर कब्ज़ा करने के बाद युवाओं और शारीरिक रूप से सक्षम व्यक्तियों को छोड़कर बाकी लोगों को मैदान में खड़ा करके तीर से मार देना आम बात होती थी।
चंगेज खां का तंबू
एक बार एक बुज़ुर्ग महिला ने मंगोलों से उसकी जान बख़्श देने का अनुरोध किया उसने वादा किया कि उसके बदले में वो उन्हें एक क़ीमती मोती देगी, चंगेज़ के सिपाहियों ने उससे पूछा कि वो मोती कहाँ है? महिला ने कहा कि उसने वो मोती निगल लिया है. मंगोलों ने मोती पाने के लिए अपनी तलवारों से उसका पेट चीर दिया, उन्हें वो मोती मिल गया, उस सफलता से उन्हें लगा कि दूसरी महिलाओं ने भी इसी तरह मोती निगल कर उन्हें छिपाने की कोशिश की होगी, नतीजा ये हुआ कि बहुमूल्य मोतियों की तलाश में उन्होंने कई महिलाओं के पेट चीर डाले।
चंगेज़ को अपने नाती-पोतों से बहुत प्यार था। एक बार जब उसका एक पोता बामियान की घेराबंदी के दौरान मारा गया था उसने उस इलाक़े में सबको मार डालने के आदेश दिए जिसमें कुत्ते, बिल्ली और मुर्गियाँ भी शामिल थीं। लेकिन उसमें अचानक दरियादिली दिखाने की भी ग़ज़ब की क्षमता थी, एक बार जब उसने एक किसान को चिलचिलाती धूप में पसीना बहाते हुए देखा तो उसने उसके सारे कर माफ़ कर दिए और उसे बंधुआ मज़दूरी से आज़ाद कर दिया। सारे इतिहासकार क़रीब क़रीब एकमत हैं कि चंगेज़ ख़ाँ एक क्रूर, प्रतिशोधी और विश्वासघाती शख़्स था। कुछ इतिहासकार तो उसे मनोरोगी तक क़रार देते हैं, जिसने लोगों को मारने की अपनी हवस को तर्कसंगत होने का जामा पहनाते हुए हुए कहा कि उसने हमेशा ग़द्दार, कपटी और देशद्रोही लोगों के ही प्राण लिए।
इस मामले में उसके समकक्ष उसे असाधारण नहीं मानते थे क्योंकि 21वीं सदी में हम जिन चीज़ों को अपराध मानते हैं, तेरहवीं सदीं में वो आम बात थीं और ईसाई आक्रमणकारी भी उससे अछूते नहीं थे। क्रूरता में उसकी ख्याति 16वीं सदी के इंग्लैंड के हेनरी अष्टम से कम थी। क्रूरता में तैमूरलंग और यहाँ तक कि चीनी भी उससे बढ़ कर थे।
चंगेज खां का दरबार
चंगेज़ ख़ाँ ने हमेशा दावा किया कि उसकी आत्मसमर्पण करो या मरो की नीति ने हमेशा उसके दुश्मनों को अपनी जान बचाने का मौक़ा दिया। उसने उनके प्राण तभी लिए जब उन्होंने इस विकल्प का प्रयोग नहीं किया। चंगेज़ के बारे में कहा जाता है कि वो अपना साम्राज्य फैलाने में इतना व्यस्त रहा कि कभी घोड़े से नीचे नहीं उतरा। वो कभी आरामदेह बिस्तर पर नहीं सोया। वो आम तौर पर भूखा रहा जिसे हमेशा मौत का डर सताता रहा।
सिंधु नदी किनारे जलालुद्दीन और चंगेज खां का युद्ध
सन 1211 से लेकर 1216 तक का पाँच वर्ष का समय चंगेज़ ने मंगोलिया से दूर चीन को फ़तह करने के लक्ष्य में लगाया। जलालउद्दीन का पीछा करते- करते चंगेज़ भारत की सीमा तक पहुंच गया। चंगेज़ और जलाल की सेना के बीच आख़िरी लड़ाई सिंधु नदी के तट पर हुई। चंगेज़ ने जलाल की सेना को तीन तरफ़ से घेर लिया, उसकी पीठ के पीछे सिंधु नदी बह रही थी। जलाल ने अपनी सारी नौकाएं नष्ट करवा दीं ताकि उसके सैनिक लड़ाई के मैदान से भाग न सकें, चंगेज़ के पास उससे अधिक सैनिक थे, चंगेज़ के पहले हमले को जलाल ने नाकाम किया, चंगेज़ के साथ दिक्कत थी कि बहुत छोटे से इलाके में उसके सैनिक फैले हुए थे जिसकी वजह से उन्हें तीर चलाने में दिक्कत हो रही थी और तलवारों से लड़ना पड़ रहा था। जब मंगोलों का दबाव बढ़ने लगा, जलालूद्दीन ने अपने घोड़े समेत 180 फ़ीट गहरी सिंधु नदी में छलाँग लगा दी। 250 ग़ज़ की चौड़ाई पार करते हुए जलालुद्दीन नदी के दूसरे तट पर पहुंच गया। चंगेज़ ने जलालूद्दीन की दिलेरी देख अपने तीरंदाज़ों को उसका निशाना लेने से मना कर दिया लेकिन उसके दूसरे साथियों को नहीं बख्शा, चंगेज़ के तीरंदाज़ों ने सटीक निशाना लेते हुए उनमें से अधिकतर को मार डाला। जलालुद्दीन के सभी बेटों और पुरुष रिश्तेदारों को ने मौत की सज़ा सुनाई गई। जलालूद्दीन ने वहाँ से दिल्ली का रुख़ किया लेकिन दिल्ली के सुल्तान इल्तुतमिश ने मंगोलों के हमले के डर से उसे आधिकारिक शरण देने से मना कर दिया। जलाल दिल्ली तो नहीं पहुंचा लेकिन भारत में ही तब तक रहा जब तक चंगेज़ ने उसका पीछा करने का विचार त्याग नहीं दिया। जब जलाल इस बारे में सुनिश्चित हो गया कि चंगेज़ अपने देश मंगोलिया लौट गया है तब वो नौका के ज़रिए सिंधु नदी के मुहाने से निकला और फिर समुद्री रास्ते से ईरान पहुंचा।
चंगेज़ के पुराने इतिहास को देखते हुए ये आश्चर्यजनक था कि उसने जलालूद्दीन का पीछा करने का विचार त्याग दिया और भारत के अंदर अपनी सेना नहीं भेजी। हुआ यह कि चंगेज़ ने बाला और दोरबी दोक्श्न के नेतृत्व में दो टुकड़ियाँ भारत भेजी थी. उन्होंने सिंध नदी पार कर लाहौर और मुल्तान पर हमला भी बोला था लेकिन वो मुल्तान पर कब्ज़ा नहीं कर पाए. उनके आगे न बढ़ पाने का कारण वहाँ पड़ रही गर्मी थी, जिसके कि वो बिल्कुल भी आदी नहीं थे। दिल्ली सुल्तान इल्तुतमिश ने जहाँ जलालुद्दीन को शरण नहीं दी, उसने चंगेज़ को भी जलालूद्दीन का पीछा करने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया।
इल्तुतमिश ने साफ़ इनकार कर चंगेज़ को नाराज़ नहीं किया। उसने भारत में घुसकर जलालुद्दीन का पीछा करने के चंगेज़ के अनुरोध पर न तो हाँ कहा और न ही ना। चंगेज़ ने इल्तुतमिश की मंशा को पहचान लिया, वो समझ गया कि इल्तुतमिश इस मुद्दे पर उससे युद्ध नहीं चाहता है. वो भी इल्तुतमिश से लड़ाई करने के मूड में नहीं था। चंगेज़ के लिए भारत की गर्मी बर्दाश्त के बाहर थी इसी वजह से चंगेज़ के सिपहसालारों ने वापस लौटने का फ़ैसला किया।
घोड़ों के चारे की कमी -
चंगेज़ के सामने दूसरी समस्या घोड़ों की थी, इब्न बतूता ने भी ज़िक्र किया है कि मंगोल सेना के दस हज़ार घोड़ों की टुकड़ी को 250 टन चारे और ढाई लाख गैलन पानी की ज़रूरत पड़ती थी, सिंध और मुल्तान में पानी तो उपलब्ध था लेकिन चारा नहीं। दूसरे उस इलाक़े में उच्च कोटि के घोड़ों की भी कमी थी इसलिए अतिरिक्त घोड़ों का इंतज़ाम नहीं किया जा सकता था। इसके अलावा चंगेज़ इतनी अधिक भूमि जीत चुका था कि उस पर नियंत्रण करने के लिए उसके पास पर्याप्त सैनिक नहीं थे। फिर सैनिकों के स्वास्थ्य का मुद्दा भी था। चंगेज़ के बहुत से सैनिक बुख़ार और इस इलाके की बीमारियों के शिकार हो गए थे, चंगेज़ को आगे पड़ने वाले भारत के जंगलों और पहाड़ों के बारे में भी सटीक ख़ुफ़िया जानकारी नहीं थी, चंगेज़ अंधविश्वासी शख़्स भी था। उसके सैनिकों की नज़र एक गैंडे पर गई, जिसे आगे बढ़ने के लिए अपशकुन माना गया। इन्हीं सबके बीच चंगेज़ ने वापस अपने देश लौटने का फ़ैसला किया था।
चंगेज का बेटों को संदेश -
जुलाई 1227 आते-आते चंगेज़ का स्वास्थ्य गिरने लगा। मंगोल लोगों को बताया गया था कि चंगेज़ को बुख़ार है लेकिन चंगेज़ की पलंग के पास खड़े लोगों को अंदाज़ा था कि वो बहुत दिनों तक जीवित नहीं रह सकेगा।
एक दिन उसने अपने सभी बेटों और विश्वासपात्र जनरलों को बुला कर कहा कि ज़िंदगी बहुत छोटी है, मैं पूरी दुनिया नहीं जीत सका, तुम्हें ये काम पूरा करना होगा। मैं तुम्हारे लिए दुनिया का सबसे बड़ा साम्राज्य छोड़ कर जा रहा हूँ, इसकी रक्षा सिर्फ़ एक बात से हो सकती है कि तुम संगठित रहो, अगर तुम आपस में लड़ोगे तो ये साम्राज्य तुम्हारे हाथ से फिसल जाएगा।
कुछ समय बाद ही चंगेज़ ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।
पुस्तकें -
01इपॉक डिर मोंगोलेन - एफ़ ई क्राउज़
02. द सीक्रेट हिस्ट्री ऑफ़ मंगोल
03. गैंगिस ख़ान द मैन हू कॉन्क्वर्ड द वर्ल्ड - फ़्रैंक मैकलिन
04. मंगोल्स एंड रसिया - जॉर्ज वेरनाड्स्की
05. द सीक्रेट लाइफ़ ऑफ़ मंगोल'
06. तबाकत-ए-नासिरी - मिनहाज सिराज जुज़दानी
07. द हिस्ट्री ऑफ़ गैंगिस ख़ाँ - जैकब एबट
08. गैंगिस ख़ाँ हिज़ लाइफ़ एंड लेगेसी - पॉल राचनिउस्की
09. तुर्किस्तान डाउन टु द मंगोल इनवेशन - विलहेल्म बारथोल्ड
10. हिस्ट्री ऑफ़ इंडिया - जॉन मेक्लॉयड
11. स्लेव किंग्स एंड द इस्लामिक कॉन्क्वेस्ट -द्र विंक
12. द हिस्ट्री ऑफ़ मंगोल्स - आर डी थैक्सटन
#जिगर_चूरूवी
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