ग़ुफ़्तार ए जिगर
फेहरिस्त
01. आओ....
02. बात कर...
03. चमन.....
04. आ चल....
05. कसरत....
06. एहसान....
07. मुश्किल....
08. शहर...
09. नजर......
10. पैदा कर....
11. मिसाल.....
12. घायल....
13. एहसान....
14. पहचान..
15. आया..
16. कैसे..
17. करने लगे..
18. शहर......
19. किसने मारा...
20. मूर्तद......
21. सुन.......
22. पूरी नहीं....
23. डरने लगे.....
24. जात क्या है...
25. दिखाएगा...
26. याराना..
27. बेचा....
28. गवाह..
29. साए.....
30. होने तक...
31. परवाह नहीं....
32. नहीं डरते....
33. सुकून...
34. जाएंगे....
35. आंखों में.....
36. बस्ती मेरी....
37. रेस्तरां....
38. मुश्किल...
39. गुजर....
40. खुद.....
41. तावीज....
42. खास...
43. कैसे.......
44. हल......
45. पर्दे....
46. चाहत.....
47. पाबंदियां.......
48. पौधा.....
50. बैठे हो.....
51. मखौल.......
52. निकलेगा
53. ज़रूरी है....
54. नहीं है...
55. कब पूछेगा...
56. दूरियां ....
57. हवा....
58. क्या हुआ...
59. बिका हुआ......
60. हालात...
61. खाली...
62. नसीब का बादा....
01. आओ..
सर पर कब्र की खाक रख के आओसीने में बुग्ज़ की राख रख के आओ।
मौला तू ही नवाजे या रुसवा करे तू
अमानत यां साख रख के आया हूँ।
मुल्जिम हूँ तेरा फकीरी पर तोहमत
हर पैबन्द में सुराख रख के आओ।
नाकाम कह दे जुबाँ का क्या कह दे
नाकामी वहॉं पे लाख रख के आओ।
खुद चमड़े की जूतियां पहनाने वाले
शान में किसीके बाख रख के आओ।
जिगर फरेब की परवाह ना कीजिये
हस्र का चखना चाख रख के आओ।
02. बात कर....
नगीने जवाहरात ना सोने की बात कर
जो कर सको वो ही होने की बात कर।
ज़माना तुझको देख हो रहा खुशगवार
इखलाक से आदमी होने की बात कर।
जाना कहां यह खबर लगे तो बोलना
दिले बंजारा मकीं होने की बात कर।
बनाया तुमने क्या जो मिटा सकोगे हां
ज़बरो जुल्म से हाथ धोने की बात कर।
लाजिम ।सितमगर की चाल बेनकाब
आसां जिस्त बसर न रोने की बात कर।
खुद की निगाह से गिर के करोगे क्या
रोओगे बैठ के उस कोने की बात कर।
जख्म ज़िगर के अब नासूर बन गये
लाये साथ क्या जो खोने की बात कर।
04. चमन......
चमन गुलाब पंखुड़ी नाज़ुकि ए लब हो
मुरीदान ए खानकाह में हाजिब अब हो।
इल्म का बोलबाला माहे अनवर रूबरू
वास्ता हक़-हलाल से बा ख़बर अब हो।
कुर्बानियाँ पेश अज़मत से रियाकार की
फरामोश मशला असल इंतहा गजब हो।
बिखर गये मोती सब गुजारी ए मसनद
हज हो ना हो फ़क़त हाजी लक़ब हो।
तुफैल से उसके इसरत कुव्वत सनासी
उसी के अय्याम जिल हिज या रजब हो।
नाम इकराम दौलत इक़बाल सब तेरे
बातिल कम हक़ बढ़े पैदा वो सबब हो।
शम्स क़मर अर्दो बरक़ दरहम बरहम
हो क़यामत पेशी ए जिगर बा अदब हो।
04. आ चल...
आ चल कर ढूंढ कहीं ज़मीन अपनी
थी कौम की मेरी खोई ज़मीन अपनी।
हूँ लाख बुरा सही नागवार ना जान
उठ खड़ा हो छोड़ गद्दी नसीन अपनी।
टूटा घर पर खुला दिल सबके लिये
ड्योढ़ी पे आना जाने तौहीन अपनी।
पूराने दर्द की दरकार दवा खास हुई
खुराक कुछ ले दे छोड़ संगीन अपनी।
ना बिगाड़ मुस्तकबिल नोजवाँ का तू
माजी में देख थी तश्वीर रंगीन अपनी।
एतमाद रख कोशिश कर बार-बार
दौड़ा घोड़े सब कस कर जीन अपनी।
महफ़िल में आये उमरा बनठन कर
गलोज कर आराइशे शौकीन अपनी।
न सियासत विरासत तिजारत के हुये
अफसोस थड़ी पे गुजरी सीन अपनी।
बात सुन लीजिये जानना हो हमें गर
जिगर निकाले मेख देखे मीन अपनी।
05. कसरत से .....
ज़िंदाने दिया बुझा अन्धेरा हो जाये
मोहसीन की दुआ से सवेरा हो जाये।
ना तेरी ना मेरी यह दुनिया है लुटेरी
तेरा है कल मेरा वक्त की हेरा-फेरी।
अश्के मैल से धुले ऑखों से नफरत
दाग धुले बदले इन्सान की फितरत।
खतावार हूँ मुआफी का तलबगाार
वक्फ हो तो बने कोई खिदमतगार।
दफ़्न कर खता अच्छाई याद रखना
वसीयत मेरी तुन मेरी रूदाद रखना।
दो गज जमीं नहीं भी नसीब होनी
मरने पे रोये हमें बना के सूरत रोनी।
उम्मीद दुनिया कायम आसमां टिका
होना हो ना होना न जमन में लिखा।
जिगर शौकत क्या गम पी न सके
क्या जीना जो दर्दे दिल सी ना सके।
तश्वीर 12 जुलाई 2019 उर्दू बचाओ आंदोलन धरना 7वां दिन।
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06. एहसान.......
खुदा के दिये में से है औरों का भी हक़
मर्तबा घटाया तूने अहसान जता कर ।
उसने दिया बहाना ढूंढ कर दिया तुम्हे
बहुत खराब किया अहसान जता कर।
ज़मीं है पानी है तू है जिश्म की मेहनत
कहत क्यूँ हुआ करता कोई पता कर।
खन्दक में लाख मेहनती कमरतोड़ लगे
हीरा किसे मिला महसूल में अता कर।
मुक़द्दर पे भरोसा इतना कर जितना हो
मंज़िल नहीं राहे कामयाबी पता कर।
उन तक पहुंचने में सुकून की तलाश
सजा खिदमत की मिले वो खता कर।
सबके भले के लिये मुझे मुश्किलों में डाल दे
ए रब इब्ने आदम को मुसीबत से निकाल दे।
मरुं तो रोने वाले पुकार कर जनाजा रोक लें
कहें इससे बेहतर क्या महबूब की मिसाल दें।
चढ़े तिरंगा कफ़न इंक़लाब ज़िंदाबाद के नारे
तफरीक़ मिटा हर दिल में उल्फत उबाल दे।
दे ताकत दौलत गिलमा जवाहर चाहे जिसे दे
मैं यार बास संग यार एक पल दो सुरताल दे।
बहक जाऊं भूल जाऊं छूट न जाये मेरी ज़मीं
वसीले से नबी के जिगर की मुसीबत टाल दे।
08. शहर......
तेरा शहर इश्के मजहर की क़ीमत है
मेरा शहर इश्क़ है शहर की क़ीमत है।
रायगां हों कवाईश रोकने की हमें
बेपनाह मोहब्बत ज़हर की क़ीमत है।
खून से लथपथ यह उजड़ी बस्तियां
वहसी आदमी के क़हर की क़ीमत है।
बारीकी से बुने जाल क़सीदे गढ़ कर
फैला हुआ डर हर पहर की कीमत है।
बजाय सूरज के जलता है दिल रोज़
यह रोशनी उस दोपहर की क़ीमत है।
बदला लम्हों में मुआशरा किसने कब
उठे यलगार एक लहर की क़ीमत है।
क़ीमती वक़्त एक-एक टुकड़ा जिगर
जानता हूँ अमानो बहर की कीमत है।
09. नजर.......
खरे सोने को कसर लग गई
मेरे भारत को नज़र लग गई।
रहे यक जा भाईभाई मिलके
फासले की ख़बर लग गई।
ढक कर रखे अंगारे कितने
धुंयें से नार ए नगर लग गई।
बेचैन की तड़प से चैन मिले
लत बद से बदतर लग गई।
10. पैदा कर....
रास्ते के पत्थर क़दमों से रौंद दे
वो वक़ार वो जुनून पैदा कर।
बदले से नहीं खुद बदल सके
घर में अमन सुकून पैदा कर।
एक दिन दो रात की ज़िंदगी
बने सहारा वो सुकून पैदा कर।
तबाह कुन नश्ल दौलते हराम
नसों में हक ए खून पैदा कर।
गर्म रिश्तों का निभाव ठंडक सा
जिगर सितम्बर सा जून पैदा कर।
11. मिसाल......
ऐसे ना खुर्शीद की मिसाल दीजिये
पहले मेरे हाथ में मसाल दीजिये।
एक अवाज़ पर बढ़ा कर क़दम
हथियार ना बीच में डाल दीजिये।
लियाकत से उरूज़ पैर ज़मी पर
जलन है जलन निकाल दीजिये।
खोने को क्या है जो फिक्र इतनी
डर है बस डर निकाल दीजिये।
दफ्तर थे बने अब मीना बाजार
गर काम है तो वज़न डाल दीजिये।
तहरीर दीवारों पे सत्य मेव जयते
वहम है वहम निकाल दीजिये।
जिगर डसता है चूसता है खून
इन्सां है मच्छर कह के टाल दीजिये।
12. घायल.....
यहां हर कोई घायल परिंदा है
टूटे पर उड़े बस वही ज़िंदा है।
शरबत समझ के पी ले ज़हर
ज़िंदा वो ज़मीं का बाशिन्दा है।
आदाबो इफ़्कार से नामुराद
इंसान नहीं वो सच में दरिंदा है।
उदासीयां अच्छी नहीं नामानुस
करे गलती जो वही शर्मिंदा है।
लाखों फूल खिले रंग बिरंगे
पर तू अदद फूल चुनिंदा है।
सुन तफरीक़ आम करने वाले
मस्ज़िद खुदा मंदिर गोविंदा है।
पहल कर उठ आजमाइश में
फतह आज नहीं तो आइंदा है।
जिगर तस्कीनो सब्र से काम ले
यहाँ जो लड़ा वही ज़िंदा है।
13. एहसान....
अहसान है मेरा तुझ पे ए मुसीबत
तुझे सहते भी हैं ज़िंदा रहते भी हैं।
दौरान ए क़फ़स अदावत सखावत
ज्यादा सुनते हैं कुछ कहते भी हैं।
14. पहचान....
काश तू पहचानती मैं गले लगाता
अक्सर हुआ गुजर तेरे पास से हयात।
मैं टूटता हूँ वो खिंचती है मुँह मोड़कर
यूँ हो रही बसर मेरे पास से हयात।
कल जो आई नई उम्मीद नये जोश में
हो गई बेअसर सवेरे पास से हयात।
तुम चलो तो सब चलें मैं भी चला
समेटे क़बर के अंधेरे पास से हयात।
मिलो तो बताऊँ हाल क्या सनम के
कर देख नज़र ज़ेरे पास से हयात।
रंग है मौजूं है कलम भी रोशनाई भी
रंग बेफिकर चितेरे पास से हयात।
हादसे सीख दे गई हम लेते ही रहे
नादाँ है जिगर बहुतेरे पास से हयात।
आया....
माज़ूर की आँखों से आँसू निचोड़ आया
हुआ खानाबदोश घर अपना छोड़ आया।
मज़लूम को दिलासा नहीं इंसाफ दीजिये
तेरी इस ख़ुशी से मेरी निस्बत जोड़ आया।
गमें खारिश के दाद से फफोले होने तक
ज़रूरते दवा नज़दीक़ न कोई ओर आया।
मुब्तला वास्ते आफ़ियते क़ोम में रहनुमा
नहीं दिखा फ़क़त कानों तईं शौर आया।
रख बरक़रार उम्मीदे खुदी जां कशी तक
बदले हैं दौर कई बदलाव हर दौर आया।
मुश्के खाक के सिवा न रही आरज़ू कोई
सवाली मेरी आह पे दर्द से दौड़ आया।
इसरत ज़र ओ माल क्या शै है ए जिगर
फर्द ले कर तेरे वास्ते दुआ करोड़ आया।
16. कैसे...
मुख़ालिफ़ की बस्ती में तुम जाओगे कैसे
जाओगे तो हम से नज़र मिलाओगे कैसे।
कहीं यह आबे जबीं न उतर जाये अपनी
जाके वहां फिर यहाँ वापस आओगे कैसे।
तुम डोरों से उनके यूँ माज़ूर हो गये
जो लिया है उनसे माल छुपाओगे कैसे।
यह घर है तुम्हारा तुम्हारी अपनी बस्ती
यहॉँ हिलाई जो डोर वहाँ हिलाओगे कैसे।
माँ से दगा कर के चले जा रहे हो तुम
कालिख लगी माथे पर वो हटाओगे कैसे।
बसी है खून में रग-रग में दयानत इसकी
दी अमानत वो अमानत लौटाओगे कैसे।
सोच समझ कर जिगर करना ये फैसला
तुम मरे ज़मीर की लाश उठाओगे कैसे।
17. करने लगे.....
हमदर्द बनकर गमख्वारी करने लगे।
अपने ही अपनों से गद्दारी करने लगे।
जब थे पैदल साइकल मेरी पर सवार
मिली जो गाड़ी की सवारी करने लगे।
छोड़ देते हैं अक्सर बीच रस्ते में लोग
हम सफर अब होशियारी करने लगे।
भीगने से बचाया छाते ने खुद भीग के
बदला मौसम दर-किनारी करने लगे।
लौट आये होके मायूस जुदा हुये थे जो
कैसे-कैसे दिखवा लाचारी करने लगे।
हम से सीख कर अलिफ़ अफसरी का
दाद ए खुद की खुद भारी करने लगे।
जिगर अब संज़ीदगी से करना रहबरी
चोर उचक्के डाकू मदारी करने लगे।
18. शहर......
तमन्नाओं के शहर दिलाता कौन है।
माँगने पर ज़हर पिलाता कौन है।
गलबहियां रहते शब ओ रोज़ लोग
वक़्त पड़े हाथ हिलाता कौन है।
अपनी दोस्ती एक मिसाल बन गई
एक पान्चा जामा सिलाता कौन है।
धाये को सब खिलाते ख़ाने कई
भूखे को खाना खिलाता कौन है।
ज़माने के डर से दुनिया चल रही।
मरे बाप की चिता घी लाता कौन है।
हसरतें तक़लीद की बारगाह चली
मुर्दा हो मरों को जिलाता कौन है।
शबनम से कह दो न जलाये सजर
जिगर सूरज से हाथ मिलाता कौन है।
19. किसने मारा......
शीशे के रिश्तों को
किसने पत्थर से मारा
बुझता हुआ सिराज
कर रहा है इशारा।
अनल हक़ कहने वाले
तुम नार में जलोगे
जानता नहीं ज़ालिम
ज़ुल्म का खसारा।
बंद मुट्ठी थी मेरी
जान ले ली खुदा ने
अब रोये का होय
बीते वक़्त को पुकारा।
हिसाब रखने वाले
मुसाहिब बा साना
बुरा किस का किया है
दिया किस को सहारा।
थी चाहत यूसुफ से
जुलेखा की अना ज़िद
यकीने खलील देखा
देखा दहकां ए नज़ारा।
हमने सुना है लोगों से
सारी दुनिया बदल गई
आये वक्तन फ़ा वक्तन
मैने जब जब पुकारा।
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20. मूर्तद...
आज मुर्तद हो गया मोमिन
फटकारा हुआ खुद के घर से।
बरसती थीं रहमतें अर्श की
आवारा हुआ खुद के घर से।
शौकत वो सज़दे में मलाईक
मरा मारा हुआ खुद के घर से।
वो सज़्दे से ना वाला वली है
ग़मख्वारा हुआ खुदा के घर से।
चोरी, रहज़नी, डकैटी क़ब्ज़े
नकारा हुआ खुदा के घर से।
बिद्दतों में काम असल से दूर
छुटकारा हुआ खुदा के घर से।
क़र्ज़ की शाम सुबह क़र्ज़ की
गुजारा हुआ खुदा के घर से
आशिके रब जिगर को डरा ना
उतारा हुआ खुदा के घर से।
21. सुन....
सुन ए मेहमान आने वाले
घर में दाना न खाने वाले।
तुझको भेजा बेशक खुदा ने
क्या बनायेगा बनाने वाले।
कितना महंगा हुआ राशन
देखले भाषण सुनाने वाले।
बजट मेरे घर का बना दे
हिसाब पोरों पे लगाने वाले।
सब कमाई के रस्ते हुए बंद
मुश्किल में घर चलाने वाले।
शादी मकान की छोड़ो बातें
कैसे पढ़ाएं बच्चे बढ़ाने वाले।
बाबू अफसर हुये हैं लुटेरे
बचत हो ले जायें थाने वाले।
अमान के शहर हम बसायें
आ जायेगे वहाँ आने वाले।
22. पूरी नहीं.....
बेवफ़ा तुझ को कैसे कह दूँ
वफ़ाएँ मेरी पूरी नहीं हैं।
कमी हैं बहुत के हूँ परेशां
काविश मेरी पूरी नहीं हैं।
कैसे न आते जो मैं बुलाता
दी सदा, मे री पूरी नहीं है।
अब उनको जिगर से लगा लूँ
हसरतें मेरी पूरी नहीं हैं।
तुम सफीकों की महरबानी
खाबिदा नींद पूरी नहीं है।
करते हैं मसलक की बातें
सफ़ भरी और पूरी नहीं हैं।
क्यों पुकारूँ उसे ज़ोर दे कर
दरमियाँ जब दूरी नहीं हैं।
फ़हम जिगर मफ़हूम दुआ का
हैं कमी जो वो पूरी नहीं हैं।
23. डरने लगे......
इतनी मीठी हैं उनकी बातें
हम मिठाई से डरने लगे हैं।
तुझे पुकारें ना नाम लेकर
जग हंसाई से डरने लगे हैं।
बेवफाओं के शहर में आके
खैर ख्वाहि से डरने लगे हैं।
यह मासूम भोली सी सूरत
बनी बनाई से डरने लगे है।
हमसे वादे थे उस के इतने
निभे निभाई से डरने लगे हैं।
पंख फैला उड़ आऊँ या रब
उस रहनुमाई से डरने लगे हैं।
खोल दो जिगर लब अपने
चुप्पी, समाई से डरने लगे हैं।
24. जात क्या है...
आजकल हालात क्या है
कोई बताये बात क्या है।
मैं गया आलिम से लेने दर्श
पूछा बता तेरी जात क्या है।
निकला घर से तलाशे मुआश
कुछ कर क्या दिन रात क्या है।
जुबां की फिक्र विरलों का जमन
वर्ना वह एक कम सात क्या है।
हक़ीर फ़क़ीर दो कौड़ी का सही
आज़मा के मेरी औकात क्या है।
खुद के साये संग दौड़े तुम मियां
देख अखाड़ा हाथो लात क्या है।
अपनी करनी पार उतरनी जिगर
जीते जी या पुलसिरात क्या है।
25. दिखाएगा..
वक़्त है औकात दिखायेगा
क्या खैर क्या खार बतायेगा।
होने को क़ारून का खज़ाना खाली
वादा है वो भूखा न सुलायेगा।
सुन मेरे क़ल्ब की आवाज़ सुन
रोता आया पर क्या रोता जायेगा।
जो रिश्तों के रास्ते बं द हो गये तो
निभेगी क्या कौन निभायेगा।
फितरत से पार खुद को सुधार
या खुद मर कर हमें मरवायेगा।
बगावत के सुर कुछ तेज़ कर दो
झुकी गर्दन बाजुओं में कौन उठायेगा।
26. याराना....
तल्खी में भी खूब तराना हुआ
सदा ना एक सा जमाना हुआ।
पुकारे ना पास आया आने वाला
सीधे पा देख आया ले जाना हुआ।
बंजारा हूँ रंग खरीदना बेचना काम
किसका अपना कौन बेगाना हुआ।
शिकवा शिकायत फितरत नहीं
तेरा आना ही दर्द का जाना हुआ।
अपने सब गैर की महफ़िल में
चेहरा एक-एक पहचाना हुआ।
लाज़िम मजलूम का मुखालिफ होना
मलऊन का हद से जो सताना हुआ।
जावेद ना तारिकियाँ ना रोशनी सदा
खातिर नश्लों के मिट जाना हुआ।
दरगुज़र गुस्ताखियाँ रवादारी रख
जिगर मुश्किलों से याराना हुआ।
27. बेचा....
इन बुलंदियों को निहारने वाले
तू ने ही बेचा दीन बाजार में।
मुश्किल जीना एक-एक लम्हा
तेरी क़ौम गर्त में भाई आजार में।
ग़ाफ़िल हक़ की सदा पर तुम रहे
अब ना सुकून ना क़रार में।
मुल्ज़िम हूँ मैं जो बारहा पुकारा
लिख नाम मेरा दफ्तरे अगयार में।
ज़वाब क्या तेरा मेरा दमे क़ज़ा
मुकरे लगा के आग गुलज़ार में।
दोज़ख़ की आग क्या इससे बुरी
निकालो के मुत्तहिद इंतज़ार में।
कोई तो गुनाह बेशक़ हमसे हुआ
पुकारा तुम्हें दौरे अंतसार में।
शौके जिगर सुनना इसकी उसकी
मक़्फ़ल ज़ुबाँ शबे बद गुफ़्तार में।
27. गवाह....
हाँ हाँ तुम लिख लो वक्त गवाह है
हस्ती ए नुसवाँ हम मकरूज़ आपके
बेखतर का परवाज आस्माँ से आगे
पैरो में खार शाहीन तेरे पर गुलाब के
जालिम वाकिफ के तू हक़ है पे खड़ी
हाकिम वो अड़ा फैसले बरखिलाफ के
नस्लें पढ़ेंगी सुनेंगी जब किस्से तुम्हारे
तो कमतर लगेंगे रुआबो रौब नबाब के
ना थकना ना रुकना अब हारना नहीं
संगदिल सामने तू संगीन बेहिसाब के
बारिश सर्दी भूख प्यास सहकर लड़ो
बस तहरीर किये जा सफे किताब के
सब्र टूट ना जाये मेरी बहन बेटियों का
उस आवारा गोली से मगरुर खिताब से
जिगर शर्मिन्दा है कुछ कर ना पाया बेटी
हाँ मैं साथ हुँ इन्क़लाब के, इन्क़लाब के
28. साए ....
जबीं पे ज़ुल्फ़ों के साये हुये हैं
यह अँधरे उन्हीं के लाये हुये हैं।
तरन्नुम में बुलबुल ने नाला कहा
मुस्कुराते हैं पर सताये हुये हैं।
खुद ही को ओरों का हक़ मानते
हम आँख उन्ही से लगाये हुये हैं।
बू ए ख़बर तक न होने दे कहीं
वो अखबार ले कर आये हुये हैं।
नेज़े पर रख के सर फिरने वाले
यजीदी लश्कर बुलाये हुये हैं।
पलको पे रख खून से पलने वाले
मेरे काम से निगाह हटाये हुये हैं।
इल्म की शम्मा बेहतर ज़रिया है
जगह मोम के लहू जलाये हुये हैं।
जाने तमाम खामी -खूबियाँ मेरी
जान कर वो ही हमें भुलाये हुये हैं।
30. होने तक...
हमने सर झुकाया पत्थर के देवता होने तक
मुन्तज़िर हैं उस बेवफा के बावफा होने तक।
दरवाज़े पे इतनी मन्नतें इतने सितम सह कर
खड़े रहे खम ब खम उनके खफा होने तक।
अपना सब लुटाया वास्ते ख़ल्क़ की बेहतरी
वो लूटते रहे भरपूर जाती नफा होने तक।
रकीब हो तो कह दो न अब ना आइये मेरे घर
हकीम ही ने दिया ज़हर ला सिफ़ा होने तक।
तारीख़ गवाह कसमें टूटीं वक़्त का तक़ाज़ा
हक़ीक़त हूँ देखोगे तुम फ़लसफ़ा होने तक।
हद से गुज़री बलाग़त मेरी तो बगावत मंज़ूर
लड़ूँगा झुकाउंगा डटा हूँ तेरे दफा होने तक।
जिगर हर शाम की सुबह हर हाल में होगी
तू न रुक जल चमक कहकशाँ होने तक।
31. परवाह नहीं....
32. नहीं डरते...
33. सुकून....
मज़हब बने अमन सुकून के लिये
हम इसे काम ले रहे जुनून के लिये।
ईश्वर के एजेंट जी करते मजे मलंग
बन्दा तरसे रोटी दो जून के लिये।
आदमी जुदा एक ख़ुदा की ज़मीन
लड़ें प्यासे आपस में खून के लिये।
कहीं दूध बहता नालीयों में फ़िज़ूल
कहीं माँ रोती बच्चों को नून के लिये।
परिंदों का खालिक एक इंसान के दो
लड़े पायजामा,धोती पतलून के लिये।
ग़िज़ा सबको दी बमुताबिक मुकाम
इख़्तिलाफ़ चावल,बोटी चून के लिये।
मौत आखिरी मक़ाम तेरा भी मेरा भी
कर कुछ आखिरी घर सुतून के लिये।
34. जाएंगे.....
करने आये हैं कुछ कर जायेंगे
हम रुके हैं जीत के ही घर जायेंगे।
हम जो जीते तो ही जीतोगे तुम
साथ हमारे दिन तेरे सँवर जायेंगे।
मत घमण्ड इतना हुये हाकिम तुम
हार गले के ईक दिन बिखर जायेंगे।
बस में न था तो तूने वादा किया क्यो
मुख़ालफ़त के दूर तक असर जायेंगे।
दम है मुझमें में गर हूँ मैं गुरबते वतन
खेल के जान से कब्र में उतर जायेंगे।
तू है मेरा तो कर ना सिफारिश मेरी
वर्ना हम दोस्ती से तेरी मुकर जायेंगे।
सबक़ पढ़े हमने इस दौर में बहुत
मुश्के ख़ाक़ हुये बन ख़बर जायेंगे।
दाग़ लगने न पाये तहरीक पे कोई
वक़्त पे पत्ते खोल कर जिगर जायेंगे।
35. आंखों में.....
आँखों में डाल आँख बात किया करो।
यूँ न घुट- घुट कर तुम जिया करो।
परवरिश की जमानत पाकीज़ा ज़बान
सबक़ यह बुलबुल से ले लिया करो।
तेरा हिसाब देना तुझे मैदाने हसर में
रुजू जानिबे गुनाह से तौबा किया करो।
बेशक़ रब जानता है दिलों के हाल
शुरू सब्र से खत्म शुक्र से किया करो।
हो कौन तुम जो फैसला कुन बन गये
दख़ल आमाले गैर यूँ ही ना दिया करो।
खुदा एक है न तेरा अलग न मेरा जुदा
हों कहीं मकीं हम्द उ सी की किया करो।
लौट जाना सबको हमेशा के घर अपने
क़ब्ल कहने के बात खुद पर लिया करो।
संग तराश ने जो किया वो उस का गुनाह
तुमने बनाये कितने खुदा गौर किया करो।
जिगर संभल जा वक़्त की क़दर कर ले
तेरी इधर मेरी उधर ग़ीबत न किया करो।
36. बस्ती मेरी....
शमा से क्या पूछिये हस्ती मेरी
इसी ने जलाई थी बस्ती मेरी।
मयस्सर दो जून रोटी रब ने करी
कपड़ा व मकान तंग दस्ती मेरी।
शायद अब मरना इसी हाल हो
सवार जिसमें टूटी कश्ती मेरी।
हम बिकते दो लफ्ज़ मोहब्बत में
तुम न लगा सके क़ीमत सस्ती मेरी।
खूब हंगामा तेरी दनीश्वरी का सुना
कहा तुमने महफूज़ ज़ेरे गश्ती मेरी।
सिद्दत से निभाई दोस्ती हमने पर
खुशी छीनी तूने ज़बरदस्ती मेरी।
37. रेस्तरां...
रेस्त्रां में दिन कटे होटल में सोते हैं
नोजवां कौम के हाल क्या होते हैं।
जिंदगी के यह अहवाल कब तक
दोस्तों के मज़े हुये वालदैन रोते हैं।
मैं सही, मैं बड़ा,बस मैं ऊपर खड़ा
वक़्त इसी मैं में अपनों को खोते हैं।
दुनिया थी,रहेगी अपना क्या वजूद
हम ऐशो इशरत में खाब संजोते हैं।
जो दोगे मिलेगा दस्तूर यही पुराना है
चाहत फूलों की और कांटे चुभोते हैं।
38. मुश्किल....
सच का जीना मुश्किल आसान नहीं
झूठ की दुनिया आबाद विरान नहीं।
निकलेगा बातचीत से मशले का हल
आदमी है आदमी आदमी हैवान नहीं।
तकाजा दीये का रोशनी से सही हुआ
शमा से फानुश भी जले परेशान नहीं।
फ़ाज़िल की रिवायात नामवर हो गई
हद से दर्द गुजरा ख़ातिमे अरमान नहीं।
होश सँभाल कर रख बहक न जाना
हुआ ख़ुशी से महरूम जहान नहीं।
39. गुजर....
धीरे-धीरे से गुजर ए ज़िन्दगी तू
बका सब कुछ अरमान बाकी है।
हाल अदायेगी ए कर्ज़ बाकी रहा
चंद फराइजो अहसान बाकी है।
कुछ ख्वाब अधूरे मज़लूम के हैं
रखी ताक पर पहचान बाकी है।
आज ही शुरू की जद्दोजहद हमने
देखना उसे इनका परवान बाकी है।
तालियाँ ज़िंदाबाद सुनाये जिन्हें
लेना उनका इम्तेहान बाकी है।
बीत गई हटाते पत्थर राह के तू
देखना गिरते वो चट्टान बाकी है।
मेरी कॉम के नोज़वां कब जागे
अभी आने कई तूफान बाकी है।
40. खुद....
खुद के बारे में न पूछें पीर से
न ही पगारा, सन्त, फ़क़ीर से।
बंद कर के खुद अपनी आंखें
और पूछें खुद अपने ज़मीर से।
हम तो खुश हैं फ़हम ही सही
वाबस्तगी गुरबत से अमीर से।
तहरीक मीरासे अवाम हो गई
खत्म जान ख़ातिम शरीर से।
दौरे ज़हीन दौराने इख़्तिलाफ़
हुये मदखल क़ुरबत हक़ीर से।
जिगर ज़ख्म हैं पहचान तेरी
लगे बात तलवार या तीर से।
41. तावीज....
चंद लोग होते हैं तावीज़ की तरह।
लगें जो गले तो शिफा सी मिलती है।
सच में मुक़द्दर की बात उनसे मिलना
जिनके मुस्कुराने से फ़िज़ा सी खिलती है।
शाहीन,बर,फाख्ता या हो अबाबील तुम
तारीफ करे नाचीज़ जबाँ सी फिसलती है।
बेशक़ क़ादिर, ख़ालिक़, मालिक़ खुदा
तुझे देख के नातमाम दुआ सी मिलती है।
रिश्ता कुछ इस तरह क़ायम यार हुआ
ज़िन्दगी तेरे नाम मोम सी पिघलती है।
मायूस होता हूँ सुकूँ की तलब व तलाश
रूह चाहत से तेरे दीदार की मचलती है।
आयाम गुजारे बेहिसाब फ़लाहे क़ोम में
कामयाबी धुंधली रोशनी सी ढ़लती है।
हक़ीर शाकिर मोहब्बत का सिला दीजे
दीये से जुगनू की आह सी जलती है।
लिखे चंद औराक़ बड़ी शिद्दत,मेहनत से
हुआ तौल जिगर सिकन सी खिलती है।
42. खास......
खाक से उठा हूँ खास बनकर
आया हूँ उम्मीद ,आस बनकर।
बनाया जो एवाने अबतर हमने
ढह न जाये घर वो ताश बनकर।
फिजूल कवाईश क़त्ल मरे की
जो जिंदा लेकिन लाश बनकर।
बदबुओं से सना कौना कौना
महका दूँ इत्र फराश बनकर।
जीतना है दिल मुस्कुरा के दिखा
हासिल नहीं बद मुआश बनकर।
सच क्या तुम भी जानो मैं भी
हँस कर कहूँ या उदास बनकर।
तौफ़ीक़ कौम को थी बावक़ार
नुमाइशे हसद इजलाश बनकर।
जिगर करे कोई काम ना करे
अदायगी हक़ मीरास बनकर।
43. कैसे........
बू ए इत्र से रूह महकायें कैसे
उजड़ा जो नीड़ बसायें कैसे।
जिसने कभी मोहब्बत,कभी रंजिशों से मारा
वो फ़िराक़ में हैं हमें ही मुल्ज़िम बनायें कैसे।
मुद्दत से मुरीदी में शुमार हम फकीरों की
ना उम्मीदवार को उम्मीदवार बनायें कैसे।
मज़दूरी पसीना सूखने से पहले का हुक्म
तुम जानबूझकर अनजान तो बतायें कैसे।
काबिज़ हो आज भी दिल पर मेरे तुम
रास्ता बता दीजिये हम घर जायें कैसे।
हम रोते हैं ज़ारोक़तार हाल अहवाल पर
मेरे, मेरे न हुये तो गैर को गले लगायें कैसे
जिगर सराफत का दौर जाता रहा अब
गिरां हैं पर मरे के सर खाक उड़ायें कैसे।
44. हल.......
मसला यह नहीं है कल क्या हुआ
हाँ मसला यह है के कल क्या होगा।
घोर सन्नाटा होगा या डर से उबरेंगे
येलगार मे मिटेंगे य़ा फिर निखरेंगे।
चल साथ आ कदम से कदम मिला
ले सबक तारीख से दुनिया को हिला।
मामला तेरा मेरा नहीं पुश्तो का हुआ
आगे बढ़ काम कर बाद लेकर दुआ।
सोच ले अब परेशां होकर मलाल करे
या फिर तपा के खुद को कमाल करे।
हसर मे दारेन का ही तो हिसाब होना है
यहां किया ना कुछ तो वहाँ भी रोना है।
सामान किया बरसों का पास कुछ नहीं
करीबियां लाखों से हाँ खास कुछ नहीं।
आये हो यहां तो कुछ काम ऐसा कर
हर एक कल्ब मे ढूढें फर्द रोयें ज़िगर।
पर्दे में हो मुलाकात वो मुलाकात क्या
यूँ चुपचाप करते हो बात तो बात क्या।
चाल हमने भी चली ख़ूब तुम्हे मनाने को
पर तुमने बिछावाई बेहरीन बिसात क्या।
महक से फूलों ने किया गुलशन मुअत्तर
तुम मुस्कुरा के दो सौगात तो सौगात क्या।
हर्फ़ खिलखिलाते हैं सुना है दीवानों से
जेरे तबस्सुम खम आफतो बलियात क्या।
दौरे हिज़्रा में दम निकलता अब तो सदफ़
तुम बिन हुई वो बारिश क्या बरसात क्या।
जिगर के टुकड़े तलाश लोगे तराश लेना
गुजरे अयाम यूँ ही कटेगी निशात क्या।
46. चाहत.......
यहाँ कागज,नाव,पानी,बारिश सब है
आकर बैठे चाहते सफर जिसे अब है।
पौंछना पसीना रेत से मेरी आदत है
गिलाफ,फेंटा,रुमाल दस्तयाब सब है।
दौड़ आगे निकलने की घोड़ों में होगी
मेरी नज़र चीते,तेंदवे,बाघ पे गजब है।
कहना कुछ नहीं कहना भी कम नहीं
खिलते हुये ये मायूसी ना बे सबब है।
निकलना खन्दक से कौन नहीं चाहता
पर यह होगा तब ना जो चाहता रब है।
जिगर अब खुश रह मस्त रह मौज कर
हाले दरयाफ्त सऊर किस को कब है।
47. पाबंदियां....
बेहद पाबंदियां बगावत की शुरुआत हुई
लगाव से आगे अदावत की शुरुआत हुई ।
मकतूल क़ातिल वकील हैं तो इंसान ही
ह्ल्फ़ में उम्मीद ए सखावत क्या बात हुई।
परवाना जुगनू दीवाना इनकी दुनिया अलग जाँनिसारी नूर और इश्क यहीं शुरुआत हुई।
बहुत दूर से चलकर आए हो बैठो थक गए
क्या सच है बताओ किस से क्या बात हुई।
किसी की बराबरी करना कहना यह हुआ
बौछार, शबनम और बरसात एक बात हुई।
जमीन ना छोड़ पर आने पर खातिर तो रख
मंजिल है दूर पर परवाज की शुरूआत हुई।
कच्ची डोर से बांधना मुमकिन जो जाने तुझे
समंदर साहिल से बंधे यह खूब करामात हुई।
48. पौधा......
पौधा जो दरख्तों के साये में पलता है
थोड़ी सी धूप में जलता है मचलता है।
मुश्किलों का सामना करना खुद से
सोना तप के ही कुंदन में बदलता है।
अड़चनें होंगी लाखों दुश्वारियां होंगी
ठोकरें खा-खा के इंसान सँभलता है।
किसने कहा आसां मुतफ़्फ़ीक़ होना
मुंतसिर जगह जगह ज़हर उगलता है।
खिदमत से खुदा मिलता यह सब जानें
अफसोस इस रास्ते पर कौन चलता है।
बात मौजूँ की कर ना उलझा ऐसे ही
गिरगिट की तरह क्यों रंग बदलता है।
जिगर पानी बन के बहता रगों में तेरी
वर्ना खून तो खून है खून ही उबलता है।
50. बैठे हो.......
तुम सूने-सूने से मुरझाये बैठे हो
आग ये सीनों में लगाये बैठे हो।
आ गये हो तुम बातों में किसकी
वास्ते रोशनी घर जलाये बैठे हो।
मसनद पे पुर सुकूँ मुकीम हो तुम
भरोसे पे किसके पर फैलाये बैठे हो।
जंजीरों को जेवर समझ गर कुछ चाहे
मुखलिफ़ को महबूब बनाये बैठे हो।
यूँ दरकारे ख़ुशनूद मुआशरा करते
मसलक रफैदीन पे बंटे-बंटाये बैठे हो।
बुझ ना पाये शम्मअ जलाई हमने
उसका क्या जो ह्ल्फ़ उठाये बैठे हो।
जिगर तुम घर से कब के आये बैठे हो
गूँगे बहरों को ग़ज़ल सुनाये बैठे हो।
51. मखौल...
तालीम के मखोल शौक से उड़ाये जाते हैं
मकतब बन्द कर सियासत में बुलाये जाते हैं।
मुफ्त के राशन का मजा ले रहे आम आवाम
हम दिल दिमाग से अपाहिज बनाये जाते हैं।
कसरत से जी हुज़ूर कहने वाले मस्त हैं
मुख्तार खुद्दार के हौसले गिराये जाते हैं।
यूँ तड़पता है जिगर शोले बदन में उठते हैं
क़त्ले इंसानियत सलीक़े से कराये जाते हैं।
मदरिस अहले क़ज़ात अब उनके हो लिये
नामे इल्म तावीज़ रंगदारी पिलाये जाते हैं।
फल-फूल रहेगा धंधा बेचैनी बेचने का
लोग मज़हब की अफीम में सुलाये जाते हैं।
उनकी नवाजिश हुई हक़ से मूँह मोड़ कर
जिगर यूँ ही मोहब्बत में सताये जाते हैं।
52. निकलेगा
ना मालूम कब मेरा गुरूर निकलेगा
निकलेगा एक दिन जरूर निकलेगा।
ना जलाने वालों का कसूर निकलेगा
यह धुआं तलक बहुत दूर निकलेगा।
रात का वक्त जो शमा जलती है यहां
ज्यादा सूरज से उसका नूर निकलेगा।
सड़क पे खड़ा फटे हाल वो है कोई
टूटा हुआ अन्दर से चूर चूर निकलेगा।
जिगर सरेराह लड़ता हुआ आलिम
है भाई शैतान का मगरूर निकलेगा।
#ज़रूरी_है.......
कब्ल ए रुखसत नज़र आना जरूरी है
ख़िदमते खल्क का नज़राना ज़रूरी है।
आये का खैर मक़दम कीजिए जनाब
ना आये को घर पर बुलाना ज़रूरी है।
मुख्तार की ज़ीनत तहफ़ुज़ ए अना
मगुरूर को अब हराना ज़रूरी है।
दाना ले कर आई चिड़िया चोंच भर
परिंदों का पर को फ़ैलाना ज़रूरी है।
ख्यालों की दुनिया हकीकत से अलग
ख्वाबिदा को अब जगाना ज़रूरी है।
मसला अपने बीच कोई ओर न सुने
घर की बात को छिपाना ज़रूरी है।
जिगर नए ख्याल नई इबारत लिख रहे
नई पुश्त को हकीकत बताना ज़रूरी है।
*****
#नहीं_है
तुम को नागवार मेरी बात अगर तो नहीं है
ये बुरी बात नहीं बातों के नजर तो नहीं है।
कटते पैर पे चलती आरी सी तेज धार
कटते कटते कह गया यह सजर तो नहीं है।
सोया नहीं रात भर या जाग के कटी
वक्त ईशा का हुआ या फ़ज़र तो नहीं है।
खींच कर निहाल दे को कहां ले जाऊं
गीत ही तो है आखिर रबर तो नहीं है।
बांध लिया नफ़्स ने हर किसी को डोर से
घूम रहा आजाद कहीं वो जिगर तो नहीं है।
#कब_पूछेगा
मेरे बारे में तु उनसे कब पूछेगा
मैं ना रहूंगा यहां पर तब पूछेगा।
पका फल दूर बेल से खुद हुआ
अलग हो पत्ता पेड़ से सब पूछेगा।
कहना नहीं मानते हवाओं के रुख
सब खाली कर जायेगा जब पूछेगा।
नदामत का वक्त नहीं मिलेगा हमें
किया क्या वास्ते मेरे ये रब पूछेगा।
पूछेंगे कदम अगलात उठे जो हाथ
बोलेगी जीभ कांपता लब पूछेगा।
ना पूछेगा भाई न अहल रिश्तेदार
गुलाम नफ़्स का हाल अजब पूछेगा।
जिगर पूछेगा तुझ से हर बुरा ख्याल
इंसान होने के हासिल लकब पूछेगा।
56. दूरियां....
अपने दरम्यान इतनी दूरी तो नहीं
रूठने की कोई मजबूरी तो नहीं।
पढ़ कर नमाज बक्शीशे गुनाह
ये जुर्म खुदा की मंजूरी तो नहीं।
भक्ति की आड़ में तिलक का ढोंग
मति आस्था की इतनी बूरी तो नहीं।
खतरे में मजहब न धर्म है आदमी
वो उम्मीद गांधी की अधूरी तो नहीं।
जिगर बहक मत ले दिल से पूछ
बाद मरने के जिंदगी पूरी तो नहीं।
57. हवा
हवाओं ने आजमाई जमीं से पुख्तगी
सफ़ीर हवा चली गईं कदम बढ़ते गए।
आसमानी किरदार से रंगत हुई स्याह
दुश्वारियां हवा हुई सनम बढ़ते गए।
ज़ोर आजमाइश कर चढ़ी शराब
सीढ़ीया गिरती गईं हम चढ़ते गए।
फुरसत में हो तो पूछो हाल है क्या
बस कर दिलों में हम बढ़ते गए।
किसे डराते हो खंजर से संगीन से
गिरे लाख दफा उठे कदम बढ़ते गए।
*******
58. क्या हुआ...
उस सितमगर का न पूछ क्या हाल हुआ
ज़ुल्म ओ ज़ालिम हमेशा पामाल हुआ।
शर्त इतनी थी के झुक के करूं सलाम
झुकना शिर्क ए खुदा का आमाल हुआ।
मैं ना झुका सामने रियाकारी के कभी
हुआ राज़ी खुदा यह कमाल हुआ।
बदलते रिश्ते पूछते हैं मेरी पहचान
देखा नहीं हंगामा हुआ धमाल हुआ।
जिगर मुस्ताक हूं क़र्ज़ की अदायगी का
सूरत वापसी की बने लिया माल हुआ।
*******59. बिका हुआ
कुछ छपा बिना बिके अखबार तो देख
उम्र गुजार दी यूं मेरा इंतज़ार तो देख।
गुजरी हयात बंद पलक बिना खुशी
हुआ खुली आंख का दीदार तो देख।
डूबते हैं यहां बिना पानी के जहाज
कटता पानी नाव संग पतवार तो देख।
चले गिरे को ठोकर लगा लिखे पढ़े
उठा सीने से लगाता गंवार तो देख।
जिगर बेटियां बांटती दर्द बाप का
मां की बेटों से उम्मीदी कतार तो देख।
***************
60. हालात....
सैर सपाटे में दिन कटे देर रात को सोते हैं
नौजवान ए कौम के हाल क्या होते हैं।
हाल हैं जो तेरे अहवाल सब के होते हैं
मित्रों के हैं मज़े और वालदैन रोते हैं।
मैं ही सही हूँ बड़ा, सबसे अलग खड़ा
मैं के चक्कर में हम अपनों को खोते हैं
दुनिया थी है और रहेगी हमेशा का वजूद
मुस्ताक ए ऐश इशरत के ख्वाब संजोते हैं।
जिगर जो दिया मिलता दस्तूर है पुराना
चाहत फूलों की कांटे दिल में चुभोते हैं।
61. खाली......
नहीं अफसोस के हुआ जमाना खाली
हुआ मेरा आना तेरा जाना खाली।
हुई खाली यह ज़मीं खुदा के नाम से
हवा मुश्क परिंदे का चहचहाना खाली।
गुरेज सफर से फकत दो कदम चलकर
करना हमें एक दिन ये आशियाना खाली।
दरयाफ्त कर जूनूं से फसाना इश्क़ का
आह कहे देख उसका शरमाना खाली।
पुर नूर बज्म तेल से बाती के जले
नादां समझे चराग जलाना खाली।
दो पल का अहसास मुझ फकी से सुन
फानी हर शे से है दिल लगाना खाली।
आया मैं और तू यहां कोई तो बात है
जिगर बेवजह नहीं आना जाना खाली।
62. नसीब का बादा.....
हार जीत के दर्मियां नहीं फर्क ज्यादा है
मान ले हार या करे जीत का इरादा है।
वक्त है कभी मुश्किल कभी सादा है
बदी से दूर खुद से खुद का वादा है।
जुबां जमन कार हों यक्सा वाइज़ तेरे
झूठ का बोझ तूने खुद पे क्यों लादा है।
मेरे सब्र की इंतहा आंसुओं से न तौल
हूं यार ए फकी याराना सीधा सादा है।
रहो अकेले जंगल में बीच हैवानों के
रहे इंसानों में वही जिसमें ये माद्दा है।
जो है सो है जबीं पे नकाब नहीं दुरुस्त
पहना चोगे पे कोट फटे पे लबादा है।
जिगर सुन सुन के जा जो नहीं हुआ
तू खुद मुहर्रिर नहीं नसीब का बादा है।
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