हिंदी/उर्दू नज़्म संग्रह -
- इम्कान ए जिगर
शायर का ताअरूफ -
नाम - शमशेर खान
उपनाम - प्रेम, शमशेर गांधी
तखल्लुस - पहले परवाना नाम से लिखना शुरू किया। पत्नी अख्तर बानो (सदफ) के सुझाव पर जिगर चूरूवी नाम से लिखना शुरू किया।
पैदाइश - 18.04.1978 सहजूसर, चूरू (राजस्थान)
पिता का नाम - श्री भालू खां (पूर्व विधायक (1980 से 1985), चूरू।
माता का नाम - सलामन बानो (गृहणी)
ताअलिम -
1. रामावि सहजूसर में पहली कक्षा में दाखिला 10.07.1984 से 1993 में मेट्रिक तक।
2. राउमावि बागला, चूरू से हेयर सेकंडरी 1993 से 1995 तक
3. राजकीय शिक्षक प्रशिक्षण विद्यालय भाषाई अल्पसंख्यक अजमेर से BSTC, 1995 से 1997
4. राजकीय लोहिया महाविद्यालय चूरू से स्वयंपाठी के रूप में स्नातक 1998 से 2001 तक (महाराजा गंगा सिंह विश्वविद्यालय, अजमेर)
5. राजकीय लोहिया महाविद्यालय चूरू से स्वयंपाठी के रूप में अधिस्नातक 2004 से 2005 तक (महाराजा गंगा सिंह विश्वविद्यालय बीकानेर से गोल्ड मेडलिस्ट - 2005 उर्दू साहित्य)
6. कश्मीर विश्वविद्याल, श्रीनगर के नंद ऋषि शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय से B.Ed.- (2007 - 8)
7. इंदिरा गांधी मुक्त विश्वविद्यालय से विशेष आवश्यकता विद्यार्थियों के शिक्षण हेतु विशेष अध्ययन - 2012
8. वर्तमान में LLB में प्रवेश (13.08.2025 से)
विवाह - पत्नी अख्तर बानो (सदफ) से 20.10.1996 में विवाह हुआ।
संतान - तीन पुत्रियां
1. अंजलि खान (LLM)
2. रोजा खान (BSC Nursing) सेवारत
3. प्रेरणा खान (BSC Nursing) सेवारत
व्यवसाय -
1. निजी विद्यालय शिक्षक एवं विद्यालय संचालन - 1997 से 1999
2. राजकीय सेवा तृतीय श्रेणी अध्यापक 10.07.1999 से 14.12.2014 तक
3. द्वितीय श्रेणी शिक्षक 14.12.2014 से 01.09.2023 तक
4. स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति 01.09.2023 से
पद -
1. तहसील अध्यक्ष - शिक्षक संघ शेखावत, चूरू
2. जिला मंत्री शिक्षक संघ शेखावत चूरू
3. प्रदेशध्यक्ष, सर्व शिक्षा अभियान कर्मचारी संघ, राजस्थान
4. प्रदेशाध्यक्ष, युवा मुस्लिम महासभा, राजस्थान
5. प्रदेश संयोजक, राजस्थान तृतीय भाषा बचाओ आंदोलन
6. प्रदेश संयोजक, संविदा मुक्ति आंदोलन राजस्थान
7. प्रदेश सचिव अखिल भारतीय कांग्रेस सेवादल 2024 से
8. जिलाध्यक्ष शिक्षक प्रकोष्ठ कांग्रेस, चूरू 2025 से
9. संयोजक चूरू विधानसभा समस्या एवं समाधान समिति, चूरू
आंदोलन -
1. संविदा मुक्ति आंदोलन
2. दांडी यात्रा
3. सामाजिक सरोकार
पुस्तकें -
1. मिरातुल जिगर
2. हृदयांश (हिंदी कविता संग्रह)
3. कालजे री कोर (राजस्थानी कविता संग्रह)
4. कसासुल जिगर - गजल समूह
5. मिनाज ए जिगर - नज़्म संग्रह
6. मूलांश
7. इमरान ए जिगर
8. प्रस्तुत पुस्तक के बारे में -
लेखक ने उर्दू, हिंदी, मारवाड़ी भाषा की लगभग सभी विधाओं में कलम आजमाई है। प्रस्तुत दीवान शमशेर भालू खां का प्रथम प्रयास है। लेखक का मत है कि वर्तमान समय में काव्य में शुद्ध भाषा एवं शख्त बहर, गेयता और माप का चलन संभव नहीं है। इस दौर में भाषाओं के कुछ शब्द इस तरह से घुलमिल गए हैं कि उन्हें एक भाषा में बांधना शब्द के साथ अन्याय होगा। हिंदी - उर्दू दोनों भाषाओं में सम्मिलित ग़ज़ल, गीत, कविता एवं छंदों का उपयोग आम बात हो गई है।
अतः हमें बंधनों को तोड़ते हुए सम्मिलित विधाओं में सभी भाषाओं का मेल करते हुए साहित्य सृजन करना चाहिए।
अंत में लेखक के कथन अनुसार उन्होंने इस किताब को किसी भी बंधन से मुक्त रखते हुए भावों को जनता तक पहुंचाने का एक छोटा सा प्रयास किया है।
शायर की जुबान.....
तूफ़ाँ बनकर उड़ेंगे हम ज़ुल्म के साये से
वही अज़ियत वही दर्द इंसान पराए से।
इम्कान ए जिगर
.................
मुक़दमा Chat Gpt -
इम्कान-ए-जिगर
“इम्कान-ए-जिगर” शमशेर भालू खां सहजूसर "जिगर चूरूवी" की 52 नज़्मों का एक समृद्ध और प्रभावशाली संग्रह है। यह संग्रह मानव जीवन, समाज और संघर्षों की विविधता को उजागर करता है।
हर नज़्म में भाव, संवेदनशीलता और गहन सोच की झलक मिलती है। शायर ने अपने अनुभवों और समाज के प्रतिबिंब को सरल और प्रवाहपूर्ण भाषा में प्रस्तुत किया है, जिससे पाठक भावनात्मक रूप से जुड़ता है और आत्म-चिंतन के लिए प्रेरित होता है।
संग्रह में प्रयुक्त रूपक और प्रतीक पाठक को जीवन के दर्द, पीड़ा, संघर्ष और आशा के बीच ले जाते हैं। यह केवल साहित्यिक संग्रह नहीं, बल्कि मानवता और सामाजिक जागरूकता का दर्पण भी है।
मुख्य संदेश -
“इम्कान-ए-जिगर” पाठक को संघर्ष और उम्मीद की यात्रा पर ले जाता है, जहाँ दर्द और पीड़ा के बीच हौसला और इंसानियत की चमक बराबर मौजूद रहती है।
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फेहरिस्त -
01. तारे......
02. कहते हो......
03. हर हाथ.......
04. सपने...
05. देख.....
06. मत हार....
07. जानता है....
08. खामोशियां
09. बदल गई...
10. समेटोगे...
11. सजर....
12. आबाद रखना...
13. ईद मुबारक...
14. मजदूर...
15. दुआ ए तिफ्ल...
16. क्या.....
17. तोड़ के घर....
18. देखी......
19. मुकाबला....
20. तलाश...
21. आदमियत.....
22. एक मुकाबला...
23. शाहीन...
24. मासूम....
25. रंग........
26. सहाफत.....
27. जवाब तो दो.....
28. सोचते हैं.......
29. हम्द.......
30. खाओगे क्या....
31. फूल.....
32. देखा........
33. जुर्रत........
34. चलो.........
35. सपने......
36. लब.........
37. होगा.........
38. तीर..........
39. प्यारा.......
40. बदलेगा.....
41. चिता......
42. ज़रूरी........
43. कमी.....
44. मेहरबाँ........
45. कौन जानता.....
46. छूकर......
47. अजब.......
48. देखा.......
49. लाल आसमान..........
50. भूल की.......
51. आते रहेंगे..
52. मौला........
53. मैं हिंदुस्तान हूं.......
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लाखों तारे एक आसमान
एक जमीन का इंसान।
एक चांद एक सूरज
गर्दिश करते सीना तान।
एक संदेश बाइबल का
एक गीता एक कुरआन।
आजा जुदा हैं जिस्म के
एक दिल और एक जान
एक ईश्वर एक खुदा है
एक अल्लाह एक भगवान।
एक साया एक ही सरमाया
एकता में सब का कल्याण।
02. कहते हो.......
तु कहता है मुझे महबूब
फि र यह दूरी कैसी।
जताते नही सरे आम
बताओ मज़बूरी कैसी।
एक हैं हम तुम सब
करनी जी हजूरी कैसी।
जलना ही जब फितरत
नारी कैसी नूरी कैसी।
मिट्टी का बदन अपना
अकड़ कैसी गुरुरी कैसी।
जिगर करना मुक्कमल
कोशिश हो अधूरी कैसी।
03. हर हाथ.......
हर हाथ में हथियार नहीं
हर हाथ हथियार हो
जो लड़ सके
भूख से
गरीबी से
नाउम्मीदी से
हर हाथ को कलम करना नहीं
हर हाथ में कलम हो
जो लिख सके
इंसाफ
अमन
रवादारी।
हर हाथ की हार नहीं
हर हाथ में हार हो
कामयाबी का
जुनून का
हौंसले का।
हर हाथ हो हूनर
जो खुद करे इंतखाब
हर हाथ के साथ
हर हाथ का ख्वाब।
हर हाथ तरक्की
हर हाथ शक्ति
हर हाथ को काम
ना किसी का गुलाम।
04. सपने ....
इन आँखों के सपने
देखना इन आंखों से
मैं नहीं हम मिलकर
देखते हैं कब पूरे करें
इन आँखों के सपने।
इनको की ज़रूरत
थोड़ी सी हंसी प्यार
बस एक मुस्कुराहट
मिल कर देंगे इनको
इन आँखों के सपने।
परी की दास्तां यही
सब गलत यह सही
इन आँखों के सपने
बिना कुछ कहे कहीं
खुली आँखों से देखें
हम तुम यह वो सब
इन आँखों के सपने।
05 देख....
खामोश रह कर देख
कुछ न कह कर देख।
हंगामों से अलाहिदा
थोड़ा चुप रह कर देख।
लहरों संग बहने वाले
हवा संग बह कर देख।
अदवारे ग़म फरामोश
ज़ब्त रंज तह कर देख।
नो जीवन को दे मौका
दर खस्ता ढह कर देख।
जिगर खुदी की पहचान
दर्जे कुतुब गह कर देख।
हिम्मत मत हार मेरे यार
आगे और भी जाना है।
कहें तेरे बस का नहीं
उन्हें कर के दिखाना है।
बुरे वक़्त में रख जज़्बा
खुदी के साथ ज़माना है।
हम साना के बासाना रहूँ
घर तेरे दिल में बसाना है।
अहले बज़्म हम आ गये
मुश्किल तेरा घर जाना है।
खामोशी की वजह कोई
बे चिराग़ तम मिटाना है।
कहे कोई क्या कहे जिगर
सुना सुनाया अफसाना है।
07. जानता है...
बेशक वो सब जानता है
एक तू ही नहीं मानता है
बेशुमार इनायात रब की
इंसान कहां पहचानता है
बेशक वो सब जानता है।
सड़क पर आकर देखना
खुद को जला कर देखना
मुहिबान रखे कलेजे पर
खाक दर बदर छानता है
बेशक वो सब जानता है ।
लड़ गुलामी के दौर में
छोड़ मुझे मेरा ओर मैं
तु एक लाखों करोड़ में
डर को खूंटी पर टांगता है
बेशक वो सब जानता है।
आलिम मुनाफ़िक़ हो जायें
हाल ना मुताबिक हो जायें
जब जीना नाकिश हो जाये
हमलावर निशाना तानता है
बेशक वो सब जानता है।
ज़ेरे ज़बाँ शीरीन कलाम हो
कुबूल तुझे मेरा सलाम हो
नेकी आफ़ियात कलाम हो
भलाई में ही महानता है
बेशक वो सब जानता है।
08. खामोशियां....
खामोशियाँ
बेहतर हैं
हज़ार बार
चिल्लाने से।
नाक़ामियाँ
सुकून हैं
झूठ के पर
लगाने से।
मायुसियाँ
मुस्तहब हैं
उम्मीद कई
जलाने से।
बेकरारियाँ
गवारा हैं
नाहक़ किसे
सताने से।
आजिजी
रोकती है
गुमराही तक
ले जाने से।
गुरबत
कुबूल है
हराम की
ख़ाने से।
09. बदल गई...
नई पीढ़ी पुरानी में बदल गई
चढ़ी जवानी आज ढल गई।
अभी आये ना हुये सो साल
मौत ले जाने को मचल गई।
मै ताक़ में कई साल जीने की
उम्र बीती एक में पल पल गई
मन की करने का वक़्त मिले
काश क़ज़ा कुछ देर टल गई।
उधार की साँसें अमानत कोई
आज गई तो गई या कल गई।
बुजदिल हूँ डर मैदाने महशर
जमा मेरे आमाले नक़ल गई।
जिगर मुतफ़िक़ ख़ौफ़े रब से
दुआओं से मुश्किल टल गई।
10. समेटोगे..
खुशियां खूब समेटोगे
मेरी नज़र से जो देखोगे
बहुत कम बोल कर तुम
नफरते उतार फेंकोगे
ये मुफ़्लिसि तुम्हारी नही
ज़िन्दगी जो सँवारी नहीं
भला खुद कब देखोगे
नफरतें उतार फेंकोगे
उड़ी चिड़िया दूर तक गई
चुग कर लाई दाने कई
धरे हाथ पे हाथ बैठोगे
नफ़रतें उतार फेंकोगे
चींटी कुछ नहीं खाती है
ज्यादा वज़न उठाती है
पड़े पड़े बिस्तर पे लेटोगे
नफ़रतें उतार फेंकोगे
सागर नमी छोड़ खारिश
गिरे बरसे बन कर बारिश
आलस तुम कब समेटोगे
नफ़रतें उतार फेंकोगे
11. कैसे....
सजर
हवाओं के इशारों से दरख्त
झुक कर सलाम करते हैं
न जाने वोह क्या कहते
क्या कलाम करते हैं।
हवाओं के इशारों से दरख्त
झुक कर सलाम करते हैं।।
बातों की तरकीब ये कैसी
आती है सदाएँ दुआओं जैसी
जो काटते हैं उनके लिये
फलों का इंतजाम करते हैं।
हवाओं के इशारों से दरख्त
झुक कर सलाम करते हैं।।
पानी दिया नमी दी जिसने
बख्शी रोशनी जमी दी जिसने
मशरूफ तशबिहात में उसके
खूब खुश वो निजाम करते हैं।
हवाओं के इशारों से दरख्त
झुक कर सलाम करते हैं।।
जमी से लेकर देते जमीन को
मुर्झाके कहें पानी की कमी को
कुछ ना ले कर देते हैं कीमती
बेदाम का तय दाम करते हैं।
हवाओं के इशारों से दरख्त
झुक कर सलाम करते हैं।।
अशरफे मख़लूक़ जानो ये राज
नहीं कौनसी नियामत पे नाज़
सिवा खुद के कुछ कर बेलोश
इसी पे यह बात तमाम करते हैं।
हवाओं के इशारों से दरख़्त
झुक कर सलाम करते हैं।।
12. आबाद रखना....
है दुआ हमारी को तुम याद रखना
ए रब मेरे भारत को आबाद रखना।
करें फसाद दंगा खेले खेल वो नङ्गा
करें हिन्द की खूबसूरती को बदरंगा।
पर न किसी को तुम बर्बाद रखना
ए रब मेरे भारत को आबाद रखना।
बुरा दौर हर बशर बे- हाल हुआ है
दौर ए बद सरो-पा बद हाल हुआ है।
उगे हैं काँटे थोर को शमशाद रखना
ए रब मेरे भारत को आबाद रखना।
सुना नही कभी जो आज सुना है
किसने किसको क्यों कैसे चुना है।
किया जिस ने उसकी रूदाद रखना
ए रब मेरे भारत को आबाद रखना।
झगड़ा नहीं सुलह में पहल करें हम
मश्विरे से मुसीबत को हल करें हम।
बदले के भाव का न इजाद रखना
ए रब मेरे भारत को आबाद रखना।
13. ईद मुबारक...
मुबारक ईद की के कम पड़ जायें गम
आओ बाँट लें इन्हें मिलकर तुम हम।
मेरे अपने खुशीयाँ मनायें हैं वो जहॉं
मैं आके उनके साथ सजाऊँ बज्म।
मन रोये कोई न हो किसी पे सितम
ज़रूरत पूरी सबकी मोला करदे करम।
हर अनाथ बेसहारा को सहारा मिले
खुद के बच्चों जैसे उनके भी हो हम।
मुरझाये फूल ना जो लगाते हो तुम
खुश्बू में इन गुलों की खो जायें हम।
हर तमन्ना हो पूरी दुआ दिल से लगे
जी काम किया शुरू जल्द होगा खत्म।
गुलदस्ता अरमानो का ले आये हैं हम
हो जायें एक दूजे के सजरो शबनम।
14. मजदूर...
मज़दूर के साथ बैठो तो दर्द कहे
भीगा पसीने में धूप को सर्द कहे।
तब्दीले हालात के वादे कई हुये
वो मेरा हुआ कब मसना गर्द कहे।
उसके नाम से चलाते हैं करोबार
रे मज़बूर तू किसे हमदर्द कहे।
खून जला सूखे पसीने की जगह
पूरी मज़दूरी पहले मिले फर्द कहे।
सो जाता है टाट पर फुटपाथ पर
कुचल दो इसे ज़माना बेदर्द कहे।
ज़िंदाबाद इंक़लाब ज़िंदाबाद कहे
कहें काँपते हाथ ये होंठ ज़र्द कहे।
हके मज़दूर के लिये लड़ेगा जिगर
कहे शूरमा या कोई दहशतगर्द कहे।
15. दुआ ए तिफ्ल...
बच्चे दुआ माँगते हैं
प्यारा सा बच्चा
दुआ कर रहा ये
मुसीबत पड़ी है
रब तू ही बचा ले
इंसा गिरा इतना
गाफिल है तुझ से
खुशी ढूंढे फिरता
बातिल है उस से
उम्मीदें करूँ अब
बता दे किस से
इलाही तू सच्चा
माँगू मैं तुझी से
कहा उस ने हमसे
किया वो कभी ना
मझधार में बचाले
ना डूबे सफीना
तु ही अबतर है
तू महरबान है
हाथों में तेरे
मिल्लत की जाँ है
जो तू हो राजी
हो और कोई ना
माँगू में किस से
तुझ सा कहीं ना
कमसिन की सुनले
मुझ में कमी ना
वास्ता नबी का
पुकारे सकीना
वबा के हालात
देखे नहीं जाते
खत्म इसे कर
देखे नहीं जाते
हमें माफ कर दे
किया जो सही ना
पनाह मांगते हैं
कर आसान जीना
दिलजले हो तुम आग हर सू लगाओगे क्या
घर खुद का नहीं औरों का जलाओगे क्या।
खुद ही खुद की दुनिया नहीं बसा सके
उजाड़ कर बस्तियाँ खिलखिलाओगे क्या।
मुर्तद हो के किसी को रूला के हँसने वाले
बाद मरने के खुदा को मूँह दिखाओगे क्या।
आज जो वो कल हो ना हो किरदार रहेगा
मुताबिक़ हाल इंसानियत को खाओगे क्या
आज परवान पर तेरी कुव्वत ए नादिरशाह
हाल ए आजिज़ी में आँख मिलाओगे क्या।
परेशां हो हर मुश्किल का हल भी निकलेगा
खलील छोड़ के मुजीब को जाओगे क्या।
रहे क़दम साबित जिगर यह दौर बदलेगा
मिटा सके ना कोई ज़ालिम मिटायेगा क्या।
17. तोड़ के घर.....
तोड़ के घर मेरा जो चले जा रहा
सुन ज़ालिम तू किधर जा रहा।
काम तेरा यह मेरा इम्तिहान है
अहले मसनद पूछता पहचान है।
तोड़ दो बस्तियां जला दो यह घर
रह सको सुकूँ से तुम अगर।
गर फितना न कम कर पाओगे
बोलो घर फिर किसके जलाओगे।
मैं हूँ ग़ाफ़िल खुद की पहचान से
हूँ मैं बातिन अपने ही ईमान से।
आओ काटो मुझे इस तलवार से
काम हो तमाम एक ही वार से।
जब मिलेंगे खुदा के दर अर्श पर
हो पामाल गिरियां गिरां फर्श पर।
दी ताक़त का सही इस्तेमाल कर
आजमा ना इसे जानो माल पर।
ना परेशां हो मोमिन क्यों माज़ूर है
दिन क़यामत का अब नहीं दूर है।
हो आबाद यकजा ढूंढो वो ज़मीं
देखो खुद ही खुद में रही क्या कमी।
एक मुर्शिद एक नायक चुनो
हो वो किसी काम लायक चुनो।
हो के मुत्तहिद उसकी रसाई करो
निज़ामे मुख़ालिफ़ की दवाई करो।
हूरो गिलमा आफ़ियत छोड़ कर
ऐशो इसरत वाहियत छोड़ कर।
जब से तुम इल्मो हुनर से दूर हो
क़सम ख़ुदा की इतने मज़बूर हो।
जिगर पढ़ो और पढ़ाओ कोम को
मिल के आगे बढ़ाओ कोम को।
18. देखी.....
शैतान की खुदाई देखी
खुद ने खुद की हँसाई देखी।
मज़लूम की समाई देखी
फकीरों की कमाई देखी।
दर्द दे कर उजाड़ा घर तूने
आग जिसने लगाई देखी।
सितम तेरे पे मेरी पुख्तगी देख
जिसने तेरी रहनुमाई देखी।
गुलशन आबाद खिजाओ बहार
इसने अंतसारो तन्हाई देखी ।
न हो सका इंतज़ाम जहेज़ का
बेटियों की टूटती सगाई देखी।
सौ लेकर दस थमाने वाले कमाल
गजब हाथ की सफाई देखी।
चढ़ा सलीब पे ले इम्तहांने जिगर
कहना ना नहीं मसीहाई देखी।
(एक थाने मे वसूली का हिसाब )👇
*********************ये*********
19. मुकाबला...
गिरते हैं शहसवार ही मैदाने जंग में
वो तिफ्ल क्या ख़ाक़ गिरें जो घुटनों के बल चलें।
"अलामा इक़बाल"
शहसवार नहीं गिरेंगे न ही जंग हारेंगे
तुफ़ैले ख़ालिक़ तिफ्ल ख़ाक़ से उठ जीतेंगे।
"जिगर चुरुवी"
मिटा दे खुद की हस्ती गर कुछ मर्तबा चाहिये
दाना ख़ाक़ में मिलकर गुले-गुलजार होता है।
अल्लामा इक़बाल
खुदा के हाथ बनाना या मिटाना हस्ती किसी की
बारिश रहमत की न हो तो दाना ख़ाक़ होता है।
जिगर चुरुवी
ख़ुदी को कर बलन्द इतना के हर तक़दीर से पहले
खुदा खुद बंदे से पूछे बता तेरी रज़ा क्या है।
अल्लामा इक़बाल
बन्दा मांगता है दुआओं में सजदों में रज़ा के लिये
खुदा ही ने शायद बलन्दी को मेरी पस्ती किया है।
जिगर चुरुवी
*********************************20. तलाश....
मुझ आबदार के ऐब रहे तलाशते
गुनाह खुद के देख खुदा के वास्ते।
छोड़ गये खन्दक कल खातिरे गैर
आज बढ़ रहे हो जानिब उसी रास्ते।
21. आदमियत...
हौसले कुंद बेजा है मशरूफियत रही
आदमी में ना बाकी रही आदमियत रही।
न सब्र न शुक्र है कहां आदमियत रही।
कार ए बद मद्दुआ कहां आफ़ियत रही।
लूट का नाम बन रह गया मज़हब।
देखी मुनअक़िद बज़्म ताजियत रही।
बढ़ता चलेगा साहिब ए सलाहियत
रवाँ नहीं अब शाहना ज़ाहिलियत रही।
जिगर अजब सुकून दर्द ने दिया तुझे
कुर्ब में विसाल की न काहिलियत रही।
22. एक मुकाबला....
एक मुकाबला शेयर ओ शायरी
वो कायर हैं जो हार गये
नर नाहर बाजी मार गये
इन तूफानों से टकराकर
हिम्मत वाले उस पार गये
जो गहरे पानी जाते हैं
वो मणी ढूंढ कर लाते हैं
जो लगातार चलते रहते
वो निश्चय मंज़िल पाते हैं।
माना गहरा अंधियारा है
फिर सागर ने ललकारा है
हम दीपक हैं जलते रहते
हम से पग पग उजियारा है
शुरुआत प्रेरणा गीत से
जिगर चुरुवी
कुछ उसूलों का नशाकुछ मुक़द्दस ख़्वाब थे
हर ज़माने में शहादत के यही अस्बाब थे ।
नदीम जयपुरी
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए
नदीम जयपुरी
जिन का यक़ीन राह-ए-सुकूँ की असास है
वो भी गुमान-ए-दश्त में मुझ को फँसे लगे
अनवर कोटवी
देख रफ़्तार-ए-इंक़लाब 'अनवर'
कितनी आहिस्ता और कितनी तेज़
अनवर कोटवी
अभी से पाँव के छाले न देखो
अभी यारो सफ़र की इब्तिदा
यूनुस भरतपुरी
इंक़लाब हुआ महबूब मेरा
आहिस्ता से कर घाव तेज़
जिगर चुरुवी
हार हो जाती है जब मान लिया जाता है
जीत तब होती है जब ठान लिया जाता है
यूनुस भरतपुरी
मुझमे कितने राज़ हैं, बतलाऊं क्या
बन्द एक मुद्दत से हूं, खुल जाऊं क्या
अनवर कोटवी
यह छाले तेरी मुहब्बत में
इब्तदा की है इंतेहा देखेंगे
जिगर चुरुवी
कोई तो कर्ज़ चुकाए कोई तो ज़िम्मा ले
इस आंदोलन का जो आज तक अधूरा सा है
नदीम जयपुरी
इश्क़ बेपर्दा न कर यार
तू बुलाये में न आऊँ क्या
जिगर चुरुवी
में लेता हूँ जिम्मा तेरी अबतरी का
वो अधूरे ख्वाब नींद नहीं लेने देते
जिगर चुरुवी
ये मैंने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे
अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे
अनवर कोटवी
भोजन से भरी थाली जल से भरा गिलास
नियमित की आस में भूख लगे ना प्यास
नदीम जयपुरी
हक़ है घर जिगर में बात रख
फैसला होगा इंक़लाब के बाद
जिगर चुरुवी
कितना महफूज हूं मैं कोने में
कोई अड़चन नहीं है रोने में
अनवर कोटवी
थाली सोने की हो तो किस काम की
पेट भर दे चाहे दोने पर दे
जिगर चुरुवी
रोते हैं जिन के दिल होता है
वर्ना जला कर हँसते हैं लोग
जिगर चुरुवी
प्यास मेरी अगर बुझा दे तो मैं जानू वरना
तू समंदर है तो होगा मेरे किस काम का
यूनुस भरतपुरी
जिस खेत से दहक़ाँ को मयस्सर नहीं रोज़ी
उस खेत के हर ख़ोशा-ए-गंदुम को जला दो
अनवर कोटवी
किस कदर कहूँ साकिया प्यास नही
आंखों से पिला दे अगर गिलास नहीं
सिर्फ होटों की हंसी पर न जाओ लोगो
आपको मेरे ग़मों का अहसास नहीं
#कोई शायर
क्या होगा इस बजट में बात है ये पर्दे में
मेरी सुनलो नियमित नही होऊंगा मदरसे में
नदीम जयपुरी
मदरसे में या स्कूल में जो समीकरण हो
अपनी है मांग सिर्फ नियमितीकरण हो
जिगर चुरुवी
हम कहाँ हैं ये पता लो तुम भी
बात आधी तो सँभालो तुम भी
अनवर कोटवी
सँभालूंगा तुझे गिरने से बेफिक्र रह
आधी को पूरी करूँगा बेफिक्र रह
जिगर चुरुवी
होटलों का करते है रोज़ाना जो भोजन
घर से दूर सालो से कब होगा समायोजन
नदीम जयपुरी
करो कत्ल बे जा मगर याद रखो
नदामत बहुत बेगुनाहों से होगी
अनवर कोटवी
समायोजन की आस में दिया धरना
होटल का है किस को शौक वरना
जिगर चुरुवी
क़त्ल निगाहों से खास होता है
यही हसीनाओं का अंदाज़ होता है
जिगर चुरुवी
ये शायरी है या प्रार्थना पत्र
नियमित होगे अगला सत्र
नदीम जयपुरी
ना शायरी न प्रार्थना पत्र
इन्शा अल्लाह नियमित होंगे इसी सत्र
जिगर चुरुवी
चलेगा गाँधी तो खिलेंगे फूल
यूनुस जाएगा सरकारी स्कूल
नदीम जयपुरी
शिकस्त-ए-ज़िंदगी वैसे भी मौत ही है ना
तो सच बता ये मुलाक़ात आख़िरी है ना
अनवर कोटवी
तो सिल्वा लेवे सुपारी सूट
खरीद लेवे अब नया बूट
नदीम जयपुरी
हंसी रोकने दो ओ शायरो कुछ बुरी खबरों के बाद,क्यों आज फिर महफिल खुशनुमा है।
यूनुस भरतपुरी
गांधी के दोस्त कमजोर नहीं
इनके मुकाबिल कोई ओर नहीं
जिगर चुरुवी
चलेगा गाँधी तो निकलेगी फूँक
ना रहेगा यूनुस ना बचेगा मेहबूब
नदीम जयपुरी
हाथ मे डांग कमर पे धोती ही अच्छी
कांटे में फंसती है इस से सरकारी मच्छी
जिगर चुरुवी
महबूब को आज़म जिसने बनाया
नदामत है अनवर चेहरे पे आया
जिगर चुरुवी
यूनुस का वक़ार रहे इमरान
अदरीम की मोहर नातमाम
जिगर चुरुवी
काम होते है हिकमत अमली से।।
काम होते है हिकमत अमली से।।
यूं ना बन जिद्दी अपनी मर्जी से।।
यूं ना बन जिद्दी अपनी मर्जी से।।
क्या सोचता है इंकलाब लाएगा हठधर्मी से।।
क्या सोचता है इंकलाब लाएगा हठधर्मी से।।
पहचान आज़म तजुर्बा अपनो से।।
पहचान आज़म तजुर्बा अपनो से।।
आज़म जोधपुरी
काश में साफ और शफ्फाक हो जाऊं
में सुबह नहाऊं और नियमित हो जाऊं
सुबह उठकर जो में स्कूल जाऊं
इंटरवेल में खूब मुगफलिया खाउ
जो लगे मेरा पिरेड तो मिराज दबाऊं
अकड़ अकड़ के क्लास को जाऊं
आओ बच्चो अब में तुम्हे पढ़ाऊँ
नियमित हु में हमेशा खुश नजर जाऊं
काश में साफ और शफ्फाक हो जाऊं
में सुबह नहाऊं और नियमित हो जाऊं
नदीम जयपुरी
जो पहना कर बैठे है तुझे ताज अपना दिल की खुशी से।।
भूल गया अहसान चकाचौंद रोशनी से।।
इंतज़ार कर आएगा वक़्त खुदा के यहां से।।
सब्र रख आज़म उसकी इनायत से।।
आजम जोधपुरी
अरे ये इशारा मुझे तो नहीं लगाता
मेहबूब भी मिराज वाइट में नहीं दबाता।
यूनुस भरतपुरी
इस संघर्ष में कई फंसे थे भवर के जाल में
बख्शता नहीं था वो किसी को किसी हाल में
नदीम जयपुरी
जिन पर था भरोसा खुद से ज्यादा।।
आज वही रकीब बनकर बैठे हद से ज्यादा।।
जो हक़ है वो तो निभाया होता हद से।।
हर तजुर्बा सीखा रहा है भरोसा किस हद से।।
आज़म जोधपुरी
मौका परस्त को मौका चाहिए था।।
हम मज़लूम को इंसाफ चाहिए था।।
जिसको बनाया था अपना, अपनो के लिए।।
वो गैर निकला, गैरो के चक्कर मे।।
आज़म जोधपुरी
कामयाबी हयात का,सबसे हसीं अहसास है
लेकिन इसके आजु-बाजु ,क्यूँ तक़व्वुर की खटास है
अनवर कोटवी
मैं भी कटा फंसा हूं भंवरजाल में
जो कुछ ले गया वापिस नहीं किया हर हाल में
नदीम जयपुरी
खैर जो भी था निमट गया अमान से
अब तो नियमितीकरण होगा शान से
नदीम जयपुरी
फिर भी सुन ले ए सितमगर, सितम से।।
झुकेंगे नही तेरे सितम से।।
तेरे लिए सब बर्बाद किया हमने इस कद्र।।
आंह निकली है हिसाब होगा।।
गैरो से नही अपनो के सामने होगा।।
माना तू ने ला एतबारो को इतना।।
सितमगर कुछ नही मिलेगा तुझे अब अपनो से।।
आज़म जोधपुरी
मुंसिफ के अदल पर यकीं कर
ज़ालिम का जब्र हमेशा नहीं रहता
हक़, हक़ ही रहेगा मुखालिफ कोई
गैर से नहीं अपनो से मुखातिब रह
जिगर चुरुवी
लोग पूछते हैं नियमित होंगे कब?
शान को शान नहीं अब तो कोर की गुस्ताखी कहते हैं,सब
नदीम जयपुरी
बेहतरीन सिफ़त हे मुंसिफ-मिज़ाज होना
मुश्किल बहुत है लेकिन ऐसा होना
अनवर कोटवी
23. शाहीन.....
बेशक़ मेरा बसेरा कसरे सुल्तानी में
पर अहसास तो करा मैं शाहीन हूँ।
जले हैं पर दज्जाल की रहनुमाई से
यह रिज़वान को बता मैं शाहीन हूँ।
खिलअत औऱ ग़िज़ा से नाइतेफाक़
इमदाद मुश्किल कुशा मैं शाहीन हूँ।
लगा माहौल अपने घर में बेरुनियत
किया कुछ तो गुनाह मै शाहीन हूँ।
हस्बे मामूल इबरत गर आज ना हुई
बातें हैं बातों का क्या मैं शाहीन हूँ।
नज़रे बदो-तस्सदुद आफ़ियत पर हैं
बदी से खुद को बचा मैं शाहीन हूँ।
न तरन्नुमें बुलबुल न नाला न नग़मा
हुआ क्या कुछ तो बता मैं शाहीन हूँ।
अकरबो महबूब का मौजूँ तब्दील सा
दवा काम आये न दुआ मैं शाहीन हूँ।
24. मासूम.....
क्या खूब होता जीते जी मिला होता
मुझे ना शिकवा तुझे ना गिला होता।
न मेरा ना तेरा रुखसार गीला होता
दूर रह कर मिलन का वसीला होता।
काश रहते दुनिया से अलग हम तुम
रंगीन सफर पल-पल रंगीला होता।
बादे सबा ने कहा उसने याद किया है
काश यह पैग़ाम पहले मिला होता।
आबरू की कीमत वो जानते जिगर
बजाए संग खूने जिगर मिला होता।
25. रंग......
हज़ारों रंग से बनी है दुनिया
मेरी तो चाहत हर एक रंग है।
अपनी अदा में मदमस्त सब हैं
सब का अलग अपना ढंग है।
काले पे बरतरी गौरे को क्यों है
अपनी अलग दिगर पसन्द है।
हज़ारों रंग........
मेरी तो चाहत.....
सोचोगे कब तुम इस मुतालिक
एक है हम सबका ख़ालिक़
है कौन छोटा कौन बड़ा है
एक रब हम सबका मालिक
तुझे कुछ तो मुझको कुछ है
सबकी अपनी अपनी पसंद है
हज़ारों रंग......
मेरी तो चाहत.....
जोड़ो अगर तुम जोड़ो किसी को
कहते हैं जिंदादिली हम इसी को
रहती है आती जाती यह दौलत
बड़प्पन नहीं किस पे किसी को
सब का अपना अलग ढंग है।
हज़ारों रंग........
मेरी तो चाहत.....
26. सहाफत.....
अखबार बिना सच जाने छाप देते हो
शराफत की ज़मी झूठ से नाप देते हो।
अखबारों का अब ये उसूल हुआ
पेमाना खबर का उलजुलूल हुआ।
गम के वक़्त दुश्मन भी रोता होगा
दागदार है तेरी सहाफत का चोगा।
नोजवां के आजा सड़क पर पड़े थे
तुम झूठ को सच कहने पर अड़े थे।
अपनों के खो जाने का दर्द जानोगे
पर जब बीतेगी खुद पर तो मानोगे।
कौन मुजरिम किस की साजिस हुई
बेगुनाहों पे इल्जाम नवाजिस हुई।
कौन कब,कैसे,कहां गया पता नहीं
क्या गलत क्या सही तुम्हें पता नहीं।
सुन हम सह गये ज़ोर-जुल्म इतने
बस अब काम ना आयेंगे तेरे फितने।
शहीद को तुम शहीद बताते क्यों नहीं
क्या चाहते हो सच्चाई बताते क्यों नहीं।
हम हक़ पे रहे बार-बार इंसाफ किया
पर ना समझना दिल से माफ किया।
पुलिस और सहाफत का एक ही धर्म है
सच्चाई से पूरा करे जो उस का कर्म है।
मोहतरम सुनें नहीं चलेगी जालसाजी
ज़िन्दाबाद आजादी ज़िन्दाबाद गाजी।
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27. जवाब तो दो.......
ए इल्ज़ाम लगवाने वाले
पहले खुद का हिसाब दो
सवाल दर सवाल रूबरू
तुम दे सको तो जवाब दो।
करना भला कर ना सके
देनी थी हमें वो किताब दो
सवाल दर सवाल रूबरू
तुम दे सको तो जवाब दो।
जान निसार कर इज़्ज़त दी
दो जाहिल के अलक़ाब दो
सवाल दर सवाल रूबरू
तुम दे सको तो जवाब दो।
माली ए गुलशने अस्ख़ास
साथी हमें भी चंद गुलाब दो
सवाल दर सवाल रूबरू
तुम दे सको तो जवाब दो।
वारिस हैं मुस्ताके रवादारी
हक़ दीजिये या इंक़लाब दो
सवाल दर सवाल रूबरू
तुम दे सको तो जवाब दो।
पनाह नहीं बराबरी चाहिये
न रोकिये बहते सैलाब को
सवाल दर सवाल रूबरू
तुम दे सको तो जवाब दो।
बख्शीश ए ज़िन्दगी छोड़कर
खुद अना खुदी को ख्वाब दो
सवाल दर सवाल रूबरू
तुम दे सको तो जवाब दो।
सुन जिगर अनक़रीब फतह
तेज़ आवाज़ ए इंक़लाब हो
सवाल दर सवाल रूबरू
तुम दे सको तो जवाब दो।
28. सोचते हैं........
सोचते हो ऐसे हमें दबा दोगे तुम
दिया है दगा औऱ दगा दोगे तुम।
शोषण की चक्की में पिसते हैं हम
चक्कर लगा लगा के घिसते हैं हम
यूँ ही दोगे भला तो क्या दोगे तुम
दिया है दगा औऱ दगा दोगे तुम ।।
सोचते....
नीद तुम्हारी अब खोलने आये हैं
घमण्ड है कितना तोलने आये हैं
स्वीकार हमें जो सजा दोगे तुम
दिया है दगा औऱ दगा दोगे तुम ।।
सोचते......
संविदा शिक्षक को नियमित करना होगा
मानदेय के स्थान पर वेतन करना होगा
हक़ है हमारा कैसे दबा दोगे तुम
दिया है दगा औऱ दगा दोगे तुम ।।
सोचते.....
आपके जैसे कितने आये और आयेंगे
संघर्ष के दम हम जीत के घर जायेंगे
हौंसलों को ना अब हरा दोगे तुम
दिया है दगा औऱ दगा दोगे तुम ।।
सोचते......
29. हम्द.....
शाहों के शाह शहंशा
कौल वतइजू मन्तशा
तू ही है मुश्किल कुशा
हम्द में अर्दो कहकशा
मैं जाऊं कहाँ तेरे सिवा
ए मेरे खुदा ए मेरे खुदा
शाहों के......
मकसद कामयाबी मिले
मज़लूमों के जबीं खिले
मुहाफ़िज़ हो अबाबिले
कफ़स कट जायें कंटीले
माबूद मेरे है तुझ से दुआ
ए मेरे खुदा ए मेरे खुदा
शाहों के.......
आने का मतलब कोई
तालिब की तलब कोई
ममदू हर वो लब कोई
हर्फ़ निहां जेरे लब कोई
किसी से ना तू है जुदा
ए मेरे खुदा ए मेरे खुदा
शाहों के.......
30. खाओगे क्या......
बचपन रहे ना सदा
बडॆ हो खाओगे क्या
वालिद शाह या गदा
खा के बचाओगे क्या
कुछ तो इंतज़ाम करो
काम करो काम करो।
खुमारी लूट जायेगी
किस्मत रूठ जायेगी
पीढियाँ गुन गुनायेगी
गा-गा कर रुलायेगी
खून को न बदनाम करो
काम करो काम करो।
दूरअंदेशी से काम लो
और खुदा का नाम लो
कर आराम हराम लो
कारकुन इकराम लो
बंजर को गुलफाम करो
काम करो काम करो।
दरिया से रास्ता निकले
बेदारो गुमास्ता निकले
किसी से वास्ता निकले
तुझे तलाशता निकले
अमन का पैग़ाम करो
काम करो काम करो
31. फूल.....
इंक़लाब ज़िंदाबाद
यह मोहब्बतों के फूल
कसरते बावफ़ा उसूल
खुदा की रहमतें नुजूल
हमें कुबूल हैं, हैं कुबूल
यह मोहब्बतों के फूल।
हर जबीं मुस्कान तक
हर आखिरी इंसान तक
जब है बाकी जान तक
चलूँगा डाले सर पे धूल
यह मोहब्बतों के फूल
नाचार बेजार बेकल हूँ
आउँगा सुनहरा कल हूँ
सुख का चैन का पल हूँ
हो न दिलरेजी की भूल
यह मोहब्बतों के फूल।
दाद की दरकार नहीं
हमेशा सरकार नहीं
पूरा दिले गुब्बार नहीं
मैं पुश्तों से गुलामे रसूल
यह मोहब्बतों के फूल।
32. देखा.........
रब तेरा अजब कारखाना देखा।
उमरा का अंदाज़ फकीराना देखा।
परायों से मिली अपनो सी चाहत
अपनों का वो मुँह छुपाना देखा।
रब......
कहीं बकरी शेर यकजा शेराब होते
कहीं हाथ से हाथ कट जाना देखा
फंदे की खातिर दाना दे चिड़ीमार
खादिमे खल्क डालते दाना देखा
रब......
मफादे खुद मिलने आना देखा
उनका वक़्तन छुप जाना देखा
कहते रहे हम तेरे हैं तेरे रहेंगे
काम पड़े मुकर जाना देखा
रब.......
अब बाकी क्या दिखाना देखा
मकीं को ढूंढते ठिकाना देखा
जिगर शरीफों का शराफत में
किस क़दर लुट जाना देखा
रब.....
33. जुर्रत.......
मामला जो दिल का होगा
मुगालता ना तिल का होगा।
खाब मुस्तकबिल का होगा
आसां पाना मंजिल का होगा।
नजर किया रोम रोम सदका
गवाह मेरे कातिल का होगा।
मरने के बाद ज़िंदगी बेशक
जवाब क्या आदिल का होगा।
दर्द ना हो कहीं आस पास
हिस्सा महफ़िल का होगा।
टकराने की जुर्रत करेगा हमसे
हाँ सर उसका सिल का होगा।
चला जिगर मुतालबे की राह
जहद हक़ बातिल का होगा।
34. चलो.........
चले चलो चले चलो
मैं चला तुम चलो
सब चलों हम चलें
चलो अपनी बात कहें
दर्दे दिल जज्बात कहें
दिन को हम दिन कहें
चलो रात को रात कहें
सब्र का घूंट पिये चलो
चले चलो चले.....
मैं चला ..........
अपनी उम्मीद जागेगी
मुश्किलें दूर भागेगी
अँधियारा मिट जायेगा
अबरे गर्दिश हट जायेगा
दीये हाथ मे लिये चलो
चले चलो
चले.......
रोशन गुंचा-गुंचा हो
फ़ख्र से सर ऊंचा हो
सारा जहां देखेगा
जालिम घुटने टेकेगा
हाथों में हाथ दिये चलो
चले चलो चले........
मैं चला......
गर्दिश के दिन ढले
तुम हम गले मिले
अपनी आह सुनानी है
वो जो बहुत पुरानी है
लब हमारे सिये चलो
चले चलो चले चलो
चले.....
गहरी खाई भर जायें
काम ऐसा कर जायें
नई कहानी रच जायें
आओ खुशी बस जायें
तोहमत खुद लिये चलो
चले चलो चले.....
मैं चला.....
35. सपने.......
सपने किस के कौन देखे
सपने
इनको
उनके
अपनो को
खोने नहीं देते
सपने
सोने नहीं देते
दर्द ज़ाहिर
होने नहीं देते
थकन जाहिर
होने नहीं देते
सपने
सोने नहीं देते
कल के लिये
हल के लिये
मुस्तकबिल के लिए
बेजुबान
होने नहीं देते
सपने
सोने नहीं देते
गिरिया जारी है
बड़ी बेकरारी है
हस्ती न मेरी
न तुम्हारी है
पलक भिगोने
नहीं देते
सपने
सोने नहीं देते
सपने
36. लब.......
सिले हैं लब तो खोल दीजिये
मिलकर हल्ला बोल दीजिये।।
गुजरे जमाने से सबक लीजिये
फरोख्त इश्क़ तो मोल लीजिये।।
खुल के कहिये मन की बात जी
यूँ बातें ना गोल-गोल कीजिये।।
गुरबत वतनी,यादे वतन जावेद
कोने में मन के टटोल लीजिये।।
सराफत ही तो है के शिकन नहीं
नफा-नुकसान तोल लीजिये ।।
जिगर बांग देते रहो जगाते रहो
जो ना जागे तो झोल कीजिये।।
37. होगा.........
38. तीर......
हर तीर आजमा निशाने पर
सनम को रिझा बुतखाने पर
जीत हार वक़्त की बात देखेंगे
छेड़ धुन झूमें सब तराने पर
गई को भूल आगे बढ़ बढ़ता जा
पाबंदी थोड़े है तेरे आगे जाने पर
मौजूद तुझ में अजदाद की खूबियां
खुदी को जान अना मिट जाने पर
नोजवाँ गुजर जायेगी जवानी लापता
मौके की तलाश जीत सरहाने पर
खुश्बु तलाश अंधी गालियों में
हो खुर्शीद सानी ईद मनाने पर
कहे ज़माना अपनों पर लुट गया
दिखे तू दिल चीर के दिखाने पर
39. प्यारा.......
मिट्टी भी प्यारी है ये तिरंगा भी प्यारा है
मुझे नाज़ मुल्क पर जो रहबर हमारा है
मेरा जिश्म हिन्दू है यह रूह मुसलमाँ है
धर्म एक सूरज और मजहब सितारा है।
मुझे मिट्टी भी........
कहदो उससे करे फ़िरकों में बंटवारा है
बड़ी शिद्दत से हमने यह घर सँवारा है
कुचल दे फन डसे जो यकजहती को
जो मेरा यहॉं पर है सब कुछ तुम्हारा है
बड़ी शिद्दत से ........
जमी जल जाये नफरतों की बारिश से
बचालो इस वतन को मेरी गुजारिश से
सलीक़ा कोमीयत सीखो चींटी से तुम
अंधेरे रोशन चरागों की सिफारिश से
बचा लो मादरे.........
दर्द तन्हा का ख़ुशी सबकी हुआ करती
तशद्दुदी जड़ें उखड़ें अवाम दुआ करती
सपेरों की तरह तोड़ो दन्दान फ़ासिद के
नहीं खुदके उनकी रुसवाई हुआ करती
तशद्दुद की जड़ें.........
मुझे मिट्टी......
मुझे नाज़....
21. बदलेगा......
हाँ, बदलेगा समाज
कल से बेहतर आज।
उठेगा फ़ख़्र से ये सर
मिलेंगे हौसलों के पर
जो सफ़ में खड़े, चलेंगे
वो धूप में तप के, ढलेंगे
आज लोहा सोना होगा
ना ग़म, नहीं रोना होगा
पंख नहीं उम्मीद उड़ेगी
कलाई से कलाई जुड़ेगी
यह दौर है गुजर जायेगा
नसीब है, संवर जायेगा
अनेक हैं एक भी होंगे
एक सदा, लबैक होंगे
सीने में दर्द गर होगा
बात का असर होगा
घर-घर शम्अ जलायेंगे
सोये बख्त को जगायेंगे
सब का तारा डूबेगा
नया सूरज उगेगा
कलम की फसल उगाएंगे
मेहनत की खाद लगायेंगे
तेरा हो या मेरा हो
हर घर में सवेरा हो
ले कर छेनी जरा तराश
यह पत्थर बन जाये खास
हाँ मैं जलूंगा सूरज बनकर
ताकि चल सको तुम तनकर
41. चिता....
चिता की लपटों से लाल आसमान
अपनो को खो कर बिलख रहा इंसान
कई नई कब्रों से आबाद कब्रिस्तान
अर्थियों से अटा पड़ा श्मशान।
हवा बिकती देखी बोतल बन्द
नज़र बन्द हुआ सारा जहान।
जा ए परस्तिश मकफ़ल कर
आजू बाजू सिसकते हरि रहमान।
कुदरत पर जीत का एलान था
यूँ जीतेगी कुदरत किसको गुमान।
जिगर दुनिया छोटी सी साथ चल
अहसान का मिलेगा बदला अहसान।
जरूरी नहीं की जाये सेर कोहेतूर की
लो मुफ़लिस की दुआ मेराज नूर की।
सजदे किये ताउम्र खुदा की शान में
पर तमन्ना मन में रही निस्बत हूर की।
मूसा ने कहा ईसा ने कहा इब्राहीम ने
बातें न थी जुदा इनसे मेरे हुज़ूर की।
काश मिल्लत के अफ़राद जान लें राज़
तो शिकायत न करें खुदा से कुसूर की।
सर पे आई तो खड़ा हुआ ऐन वक्त
तब आंखों पे पड़ी थी पट्टी गुरुर की।
जो थी जिम्मेदारी सब को पनाह में ले
भूल बैठी वो हिकायतें जर्रा जहूर की।
रोते हैं हाले ज़ार पर पीर ओ मुर्शिद
जिगर जागे कॉम मेरी है कोड़ी दूर की।
43. कमी.....
मेरी कमी तुम भूलो तुहारी मैं
मेरा गुरुर खत्म हो तुम्हारी मैं।
बाढ़ से तबाही फसल बारिश से
मज़ा कहाँ जो हो काम सिफारिश से।
नज़र न फ़र्क़ कर पाई चीनी नमक में
पीतल और सोना एकसे चमक में।
फ़ख़्र व घमंड दो बात होती है
गर्व दिन है अंहकार रात होती है।
खुदगर्ज़ खुद के लिये सोचते हैं लोग
पर चाल चल चाल रोकते हैं लोग।
रब का फैसला कितना कमाल है
कोई शुक्रगुजार किसी को मलाल है।
एक का फायदा दूसरे का नुकसान है
खरीद होगी जब बिकता ईमान है।
आती कहाँ से आग आतिश्फिशां में
निशाँ बता रहा कोई इस निशाँ में।
सब्र में ताकत गुस्से में नुकसान है
पर सब्र करना कहाँ आसान है।
नुक्कड़ पर बैठ सबको कोसना है
हमने क्या किया अफसोस ना है।
दूर तक जाना है तो संभलना होगा
कम ही सही मुस्लशल चलना होगा।
पकड़ा है हाथ तो हाथ छोड़ ना देना
जोड़ा है नाता साथ छोड़ ना देना।
गंवा न देना अज़मत आपस में लड़ कर
जिगर शान कॉम की बढ़ाईये पढ़कर।
44. मेहरबाँ........
मेहरबाँ पूछिये तो सवाल क्या है
मसिहा इधर देखिए हाल क्या है।
कभी जो मैं मोम था नादाना हुआ
बात तो यूँ नहीं बागी रवाना हुआ।
साबिर हूँअकड़ मुझमें ज्यादा नहीं
वजीर साहब, शाह हूँ प्यादा नहीं।
हमने कई दौर गुजारे गुजर जाएंगे
हम बादम एक वक्त नज़र आएंगे।
अफ़साल काटिये उगाइयेगा जो
नोश फरमाइयेगा पकाइयेगा जो।
यह मुख्तसर बात जेहन में लीजिये
मुझ लिया कुछ तो बदले में दीजिये।
आपको तआरुफ़ हुआ मेरे जलाल से
रौंदना मेरी सदा निकाल दें ख्याल से।
ये हक़ की आवाज है गूंजेगी जोर से
इस क़ब्ल आप सुन लीजिये गौर से।
हूँ शौकत में पला मुस्ताक ए ज़र नहीं
कल क्या हो कल की कोई खबर नहीं।
इस साल मुराद बहुत मांगी हैं हमने
क़ल्ब में खूं ए रगे जाँ लगी है जमने।
कुछ हुआ कुछ बाक़ी कुछ निशां हुये
मुकीम मेरे अरमान आतिश्फिशां हुये।
वादा किया निभाइये गम काफ़ूर हों
कहीं हम मुखालफत पर मजबूर हों।
जिगर आजमाता आजमाइश देंगे
काम ना हो तो कफ़न पैमाइश देंगे।
42. कौन जानता...
यह ऐसे होगा कौन जानता था
हम में से कोई नहीं मानता था।
खतरनाक ऐसा दौर आयेगा।
वो सांस के लिये गिगिड़ायेगा।
रोटी से महँगी हवा हो गई
जुदाई में रहना दवा हो गई।
गांव हैं बन्द बन्द शहर हुआ
तैरती लाश मन्ज़रे कहर हुआ।
थका हर कोई परेशान दिखा
कई लुटेरे कोई इंसान दिखा।
कुछ नहीं मकानों पर ताले हैं
घरों में खाने के लाले हैं।
यह हाल रहा तो सड़ेंगे हम
बीमारी भूख से मरेंगे हम।
डर बड़ा बड़ा है डराने वाला
कौन दफनाने जलाने वाला।
चुटकियों में इंसान जाते नहीं देखे
अपनी लाश कुत्ते खाते नहीं देखे।
कफ़न चोर सुना आंखों देखा
हाल सुना रहा हूँ आंखों देखा।
यह साल पूरा कर जी जायेगा
किश्मत वाला वो ही कहलायेगा।
इम्तिहान रिश्तों का ले रही है
अपना कौन सबक दे रही है।
किश्तों में जान जाते देख रहा हूँ
कुछ के ईमान जाते देख रहा हूँ।
खता हुई तो माफ करना मुझे
जलता चिराग जाने कब बुझे।
जिंदा रहे तो मिलेंगे दोबारा साथी
बस साथ इतना मेरा तुम्हारा साथी।
47. अजब......अजब बीमारी आई हुई
दूरियां ही दवाई हुई।
ना मिले अच्छा हुआ
मिलने से रुस्वाई हुई।
निकल गई ऐसे दीवाली
मुद्दत ईद मनाई हुई।
बलन्द इमारतें बाला हुई
संगे बुनियाद भुलाई हुई
सौदागर का सोदा हुआ
अपनी जग हंसाई हुई।
बीच आसमां पूछे रूह
मदफ़न या जलाई हुई।
जिगर मंजूरे माजूरियत
उनकी बड़ी कमाई हुई।
48. देखा.....
दर्द को सब्र ने टूटते देखा
रखवालों को घर लूटते देखा।
केसर की काश्त की क्यारी में
काश्तकार का दम घुटते देखा।
मुहाफ़िज़ बदकिरदार निकला
रकीब को बचाव में जुटते देखा।
खुली हवा कब नसीब होगी
फेफड़ों को सांसों ने फूटते देखा।
रसूख को सहूलियत मयस्सर
आफात से शराफत को घुटते देखा।
आफ़ितयत रोशनी पर सबका हक़
बेवक्त मेहंदी का रंग छुटते देखा।
49. लाल आसमान....
चिता की लपटों से लाल आसमान
अपनो को खो कर बिलख रहा इंसान
कई नई कब्रों से आबाद कब्रिस्तान
अर्थियों से अटा पड़ा श्मशान।
हवा बिकती देखी बोतल बन्द
नज़र बन्द हुआ सारा जहान।
जा ए परस्तिश मकफ़ल कर
आजू बाजू सिसकते हरि रहमान।
कुदरत पर जीत का एलान था
यूँ जीतेगी कुदरत किसको गुमान।
जिगर दुनिया छोटी सी साथ चल
अहसान का मिलेगा बदला अहसान।
******50. भूल की.....
तारीख रोती होगी उस वक़्ते अहद
आईने ने जम्हूरीयत कुबूल की।
खाब कुछ और थे वतन परस्तों के
समझने में अवाम को भूल की।
रोते बिलखते अश्क रवां कतार
हयाते गुल मुरझाये फूल सी।
मुसाहिब आमिर जरदार हुये
लाद कर गठरी महसूल की।
अमन की फिजा बात कल की
चलती हैं आंधियां भरी धूल की।
मुन्तज़िर गीता के दर्श सी हयात
चलना नहीं करें बातें उसूल की।
51. आते रहेंगे....
52. मौला.......
मौला तेरी बारगाह में झुके सब
आफात बलियात से बचा रब।
चींटी से हो हमें इतना प्यार
बादल से जितना करे बयार।
दिन वो दिखाना नहीं मान जाये
हक़ पे रहूँ चाहे जान जाये।
राह से तेरी हम भटक गये
शिकंजे में शैतान के अटक गये।
नूर राह रास का हमें दिखा
बेगेरती से मौला सब को बचा।
गुनाह बख्श दे तेरे घर आये
दुनिया आख़िरत संवर जाये।
सुकून दे रहम कर करार दे
आफ़ियत दे मुसीबत से उतार दे।
सत्तार करम अपना नजूल कर
माफ कीजिये खता हुई जो भूल कर।
53. सर जमीन - ए हिंदुस्तान.....
#हिंदुस्तान हूं मैं......
क्या था क्या हूं हो गया हैरान हूं मैं
सर जमीन -ए- हिंदुस्तान हूं मैं
भारतखण्ड जम्बूद्वीप नाम हूं मैं
आर्यावर्त भारत अंडमान हूं मैं
पश्चिमी कच्छ थार का रेगिस्तान हूं मैं
सर ज़मीन - ए हिंदुस्तान हूं मैं।
हजारों बरस से दुनिया के हर कोने से
रोक न सके लोग खुद को मेरा होने से
तस्बीह है मेरी चिड़िया और सोने से
खेलते बेटे मेरे शेर के खिलौने से
आज से खुद, खुद अनजान हूं मैं
सर ज़मीन - ए- हिंदुस्तान हूं मैं।
हिमालय मेरे माथे पर जड़ा गया
युद्ध कलिंग का यहीं पे लड़ा गया
पठारों से दक्कन को गढ़ा गया
धो कर पैर मेरे समंदर बड़ा गया
सिर्फ जमीं का टुकड़ा नहीं जान हूं मैं
सर ज़मीन -ए- हिंदुस्तान हूं मैं।
द्रविडों की मां आर्यों की महतारी
आते रहे यूरोप अरब के व्यापारी
दानी कुंडल के कर्ण से दातारी
यहां सुर देवता शक्ति है नारी
पूरब की सात बेटियों का परिस्तान हूं मैं
सर ज़मीन -ए- हिंदुस्तान हूं मैं।
मुगल आए यहां यहीं पे दफीना उनका
नाप, तौल, सराय शहर मदीना उनका
ताज में शुकुँ लालकिले में जीना उनका
मेरी मिट्टी में मिला खून पसीना उनका
पुरू की धरती मौर्यों का जहान हूं मैं
सर ज़मीन - ए- हिंदुस्तान हूं मैं।
रस्ता रेशम का मेरे सर पे चला
बंदरगाह कालीकट देखो भला
केसर की क्यारी पश्मीने की कला
हैदर का बेटा टीपू सुल्तान हूं
मैं सर ज़मीन - ए- हिंदुस्तान हूं।
अंग्रेजों ने लुटा मेरा मालो ज़र
रेल डाक का निजाम आसां सफर
अखबारों में अब छपने लगी ख़बर
दासी, सती के रिवाज़ पे शिकंजा इधर
1857, अपनों से घायल जवान हूं मैं
सर ज़मीन - ए हिंदुस्तान हूं मैं।
एक मसीहा दुबला सा लाठी वाला
पेशे से वकील छोटी कद काठी वाला
एक पंजाब गुजरात बंगाल मराठी वाला
टैगोर,तिलक लाजपत सहपाठी वाला
गुलाम आजादी का घमासान हूं मैं
सर ज़मीन - ए हिंदुस्तान हूं मैं।
फ्रेंच भागे, पुर्तगल और अंग्रेज गो
शरीर के मेंरे टुकड़े हो गए दो
यह जंजीरें कटने में लगे साल सौ
लोकतंत्र, धन्य जवाहर पटेल को
उजड़ा, संवरा बिखरा बागान हूं मैं
सर ज़मीन - ए हिंदुस्तान हूं मैं।
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