इमरान ए जिगर
शायर का ताअरूफ -
नाम - शमशेर खान
उपनाम - प्रेम, शमशेर गांधी
तखल्लुस - पहले परवाना नाम से लिखना शुरू किया। पत्नी अख्तर बानो (सदफ) के सुझाव पर जिगर चूरूवी नाम से लिखना शुरू किया।
पैदाइश - 18.04.1978 सहजूसर, चूरू (राजस्थान)
पिता का नाम - श्री भालू खां (पूर्व विधायक (1980 से 1985), चूरू।
माता का नाम - सलामन बानो (गृहणी)
ताअलिम -
1. रामावि सहजूसर में पहली कक्षा में दाखिला 10.07.1984 से 1993 में मेट्रिक तक।
2. राउमावि बागला, चूरू से हेयर सेकंडरी 1993 से 1995 तक
3. राजकीय शिक्षक प्रशिक्षण विद्यालय भाषाई अल्पसंख्यक अजमेर से BSTC, 1995 से 1997
4. राजकीय लोहिया महाविद्यालय चूरू से स्वयंपाठी के रूप में स्नातक 1998 से 2001 तक (महाराजा गंगा सिंह विश्वविद्यालय, अजमेर)
5. राजकीय लोहिया महाविद्यालय चूरू से स्वयंपाठी के रूप में अधिस्नातक 2004 से 2005 तक (महाराजा गंगा सिंह विश्वविद्यालय बीकानेर से गोल्ड मेडलिस्ट - 2005 उर्दू साहित्य)
6. कश्मीर विश्वविद्याल, श्रीनगर के नंद ऋषि शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय से B.Ed.- (2007 - 8)
7. इंदिरा गांधी मुक्त विश्वविद्यालय से विशेष आवश्यकता विद्यार्थियों के शिक्षण हेतु विशेष अध्ययन - 2012
8. वर्तमान में LLB में प्रवेश (13.08.2025 से)
विवाह - पत्नी अख्तर बानो (सदफ) से 20.10.1996 में विवाह हुआ।
संतान - तीन पुत्रियां
1. अंजलि खान (LLM)
2. रोजा खान (BSC Nursing) सेवारत
3. प्रेरणा खान (BSC Nursing) सेवारत
व्यवसाय -
1. निजी विद्यालय शिक्षक एवं विद्यालय संचालन - 1997 से 1999
2. राजकीय सेवा तृतीय श्रेणी अध्यापक 10.07.1999 से 14.12.2014 तक
3. द्वितीय श्रेणी शिक्षक 14.12.2014 से 01.09.2023 तक
4. स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति 01.09.2023 से
पद -
1. तहसील अध्यक्ष - शिक्षक संघ शेखावत, चूरू
2. जिला मंत्री शिक्षक संघ शेखावत चूरू
3. प्रदेशध्यक्ष, सर्व शिक्षा अभियान कर्मचारी संघ, राजस्थान
4. प्रदेशाध्यक्ष, युवा मुस्लिम महासभा, राजस्थान
5. प्रदेश संयोजक, राजस्थान तृतीय भाषा बचाओ आंदोलन
6. प्रदेश संयोजक, संविदा मुक्ति आंदोलन राजस्थान
7. प्रदेश सचिव अखिल भारतीय कांग्रेस सेवादल 2024 से
8. जिलाध्यक्ष शिक्षक प्रकोष्ठ कांग्रेस, चूरू 2025 से
9. संयोजक चूरू विधानसभा समस्या एवं समाधान समिति, चूरू
आंदोलन -
1. संविदा मुक्ति आंदोलन
2. दांडी यात्रा
3. सामाजिक सरोकार
पुस्तकें -
1. मिरातुल जिगर
2. हृदयांश (हिंदी कविता संग्रह)
3. कालजे री कोर (राजस्थानी कविता संग्रह)
4. कसासुल जिगर - गजल समूह
5. मिनाज ए जिगर - नज़्म संग्रह
6. मूलांश
7. इमरान ए जिगर
प्रस्तुत पुस्तक के बारे में -
लेखक ने उर्दू, हिंदी, मारवाड़ी भाषा की लगभग सभी विधाओं में कलम आजमाई है। प्रस्तुत दीवान शमशेर भालू खां का प्रथम प्रयास है। लेखक का मत है कि वर्तमान समय में काव्य में शुद्ध भाषा एवं शख्त बहर, गेयता और माप का चलन संभव नहीं है। इस दौर में भाषाओं के कुछ शब्द इस तरह से घुलमिल गए हैं कि उन्हें एक भाषा में बांधना शब्द के साथ अन्याय होगा। हिंदी - उर्दू दोनों भाषाओं में सम्मिलित ग़ज़ल, गीत, कविता एवं छंदों का उपयोग आम बात हो गई है।
अतः हमें बंधनों को तोड़ते हुए सम्मिलित विधाओं में सभी भाषाओं का मेल करते हुए साहित्य सृजन करना चाहिए।
अंत में लेखक के कथन अनुसार उन्होंने इस किताब को किसी भी बंधन से मुक्त रखते हुए भावों को जनता तक पहुंचाने का एक छोटा सा प्रयास किया है।
शायर की जुबान.....
तूफ़ाँ बनकर उड़ेंगे हम ज़ुल्म के साये से
वही अज़ियत वही दर्द इंसान पराए से।
फेहरिस्त -
01. कशीदा......
02. मुश्किल है.....
03. उठती....
04. तेरे हैं.....
05. खामोशियां....
06. लिखो.....
07. क्या.....
08. तकसीम.......
09. इश्क़........
10. आजादी के..........
11. परचम.......
12. मुबारक नए साल की......
13. दिवाली .........
14. बेकार......
15. ज़हर उगलते....
16. क्यों.....
17. ऐसा मिले.......
18. भुलाए नहीं जाते.....
19. सवाल.......
20. देखे.......
21.रूबाई.......
22. मचलती है.....
23. ये उम्मीद नहीं है.......
24. हम जानते हैं...
25. मुकरने की आदत.....
26. हो जाता है........
27. वफ़ा मुझसे.........
28. एकसे नहीं रहते.......
29. तो कोई बात नहीं.......
30. क्यों.........
31. अहसास है.....
32. देखते रह गए.....
33. मत कीजिए......
34. खुशी.....
35. रूबाई....
36. सवालों में है......
37. मिकराज.....
38. बताया तुमने......
39. आते हो........
40. भूल जाओगे तुम...
41. हादसा.........
42. एक नसीहत......
43. दोस्ती......
44. मिलते हैं........
45. चराग़........
46. संभाला कीजिए......
47. ज़िद.......
48. हूं मैं.......
49. मिजाज........
50. देखता हूं मैं......
51. हूं मैं......
52. निकल गया......
53. कब.....
54. है क्या..
55. भलाई है.....
56. रहती थी.....
57. है कोई......
58. रेत..
59. क्यों नहीं
60. बहाने थे......
61. आहिस्ता से....
62. डरता कौन है...
63. जाल से...
64. ज़रूरी है.....
65. याद रहते हैं.....
....................................................
01. कसीदा ......
जावेद है वो जो वक़्त से लड़ गये,
मिटा के खुद को शाकिर उजड़ गये।
ख़ुदी के बह्र में डूबे जो पारसां,
उनसे टकराकर तूफ़ान मुड़ गये।जलते हाथों से तसक़ीन गैरों की,
ताज़ीम बजा लायें उन दिलेरों की।
ख़लील को नार जला सकती नहीं,
सफ़ीना ए नूह मौज़ डूबा सकती नहीं।इस्माइल का इम्तिहान सरेआम हुआ,
क़ैद जज़्बात यूसुफ़ दबा सकती नहीं।वलियों ने की सवारी शेरों की,
ताज़ीम बजा लायें उन दिलेरों की।
नेजे पे सजे सर गिरियां नहीं होते,
अहले जुबां बेजुबां नहीं होते।
कफ़न जेब में सर हथेली पे लिये,
हालात वो कलम बयाँ नहीं होते।
कोहेतूर को दरकार क्या सवेरों की,
ताज़ीम बजा लायें उन दिलेरों की।
ओराक गीत गुनगुनाएँ जहां,
किरअत नग़में सुनाएँ वहां।
सदफ़ में महफ़ूज़ इल्मो अदब,
हुनर को शाहीन गले लगाएँ यहां।
हस्ती जो मिटा दें अंधेरों की,
ताज़ीम बजा लायें उन दिलेरों की।
हक़ की ज़मीं तलाश की जाये,
क़ल्ब से कोशिश काश की जाये।
अहले खिलात साहिब हिकमत,
जियें तो गाज़ी या लाश ही घर जाये।
खुर्शीद को परवाह कब लुटेरों की,
ताज़ीम बजा लायें उन दिलेरों की।
02. मुश्किल है....
सहना मुश्किल है पर सहते रहो,
दर्द ए ज़हर फिर - फिर पीते रहो,
कल का सूरज न जाने क्या लाए,
कहना मुश्किल है, यह मुश्किल है।
जबर महफ़ूज़ है, दहशत भी सही,
भीड़ चुप है तो खामोशी भी सही,
कौन आवाज़ उठाए डरते हैं सब,
कहना मुश्किल है, यह मुश्किल है।
हुकूमत मज़हब की चालों में गुम,
सियासत खेल रही है ज़हर का जुम,
सच पे बंदिश है, झूठा माथे पे गुल,
ढहना मुश्किल है, यह मुश्किल है।
सायों में जलते हुए ईमान हैं,
इरादों पे काबिज निगहबान हैं,
हुई ज़ुबाँ अब खुदा की कै़द में,
रहना मुश्किल है, यह मुश्किल है।
रवादारी के अरमान मरते गए,
बहसी बाजार में उतरते गए,
आँखें पत्थर की मूरत बन गईं,
बहना मुश्किल है, यह मुश्किल है।
03. उठती....
दिल से उठती है दुआ,
सुन ले ऐ मेरे खुदा,
इल्म की दौलत यहाँ,
जगमगा दे सारा समाँ,
रौशनी हर दिल में रमा,
दिल से उठती है दुआ।
जीना हो इंसां के लिए,
कदम हो अम्न के लिए,
तेरी बख़्शिश सब पे रहे,
हर ज़ुबां सच्चाई कहे,
ख़ुश रहमते फै़ज़ करे,
दिल से उठती है दुआ।
इल्म की रौशनी चमके हर सू,
भटके रस्ते पे भी आए सबू,
हर चमन में महके सबा,
रात गुंचा ए नूर बना,
बंदा‑बंदा ताजे वफ़ा,
दिल से उठती है दुआ।
नफ़रतें माटी हों अब,
मोहब्बत के सजें हों सब,
सीनों में सुकून उतर जाए,
सच ही अजर खुदा पाए,
हाल बदले नया सवेरा आए,
दिल से उठती है दुआ।
साथ‑साथ चलें सब यहां,
मिल कर बढ़े कारवां,
ऐसा काम कोई न हो,
जिस पे झुक जाए सर यहाँ,
जग - मग उम्मीदें जवां,
दिल से उठती है दुआ।
04. तेरे हैं.......
साथ तेरे है वो तेरा बाकी तेरा नहीं
अपना जिसने वक़्तन मुँह फेरा नहीं
सो साल की नींव हज़ार साल की पुश्त
भरोसा क्या देखे रात सवेरा नहीं।
मिटने वाली दुनिया से जी लगया
यह रेन बसेरा है अपना डेरा नहीं।
सामने उसके होगा हिसाब सब देना
यहां का यहां रहेगा वहां कब देना।
जन्नत जहन्नम इब्ने आदम के लिये
भरना है किया इब्ने आदम के लिये।
05. खामोशियां.........
खामोशियाँ मुझे जीने नहीं देंगी
सरगोसियाँ तुझे मरने नहीं देंगी।
यां क़हत सरकसों का हुआ नहीं
यह जाँकसी हमें डरने नहीं देगी।
ख़ामोशियाँ ज़िक्र-ए-ख़ुदा बन रह गईं
सरगर्मियाँ इश्क़ की सदा बन रह गईं।
किस्मत ने हर हाल में तेरा रुख़ दिखाया
अरवाहे जाँ-कशी दुआ बन के रह गई।
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06. लिखो......
कलम से अपना नसीब तुम लिखना
समंदर सी गहरी तहरीर तुम लिखना।
ये उम्मीद की रौशनी कभी कम न हो
सीन से लफ़्ज़ सुबह सा तुम खिलना।
07. क्या........
क्या मुंह दिखाओगे पेशी में खुदा की
नामे न रहम नाम पेशवाई रहनुमा की।
हम सब गुनाहगार, मगर रब से उम्मीद
साथ हो सिफ़ारिश अहमद मुजतबा की।
08. तकसीम.......
तकसीमी दीवारें जलती आग नफ़रत की
डूबती रौशनी ये, शान-ए-शाने करीम की।
लू-सी महसूस होती है बाद ए नसीम थी
भुला जिसकी बादशाहत बड़ी अजीम थी।
गलती खल्क को खल्क से जुदा की,
क्या मुँह दिखाओगे पेशी में खुदा की।
सहारे का वक़्त निकाल न सका,
अपनायत रिश्तों की संभाल न सका।
झोली में एक सिक्का डाल न सका,
आई अजल हाय इसे टाल न सका।
होनी मुलाकात उससे तयशुदा थी,
क्या मुँह दिखाओगे पेशी में खुदा की।
सिसकियां सुन खड़ा हँसता रहा,
जाल ए फरेब में पड़ा फंसता रहा।
जहर तुझ पर चढ़ा डसता रहा,
अना वसवशे में गड़ा धंसता रहा।
जिंदगी ना सदा रहेगी बुदबुदा सी,
क्या मुँह दिखाओगे पेशी में खुदा की।
हक़ अदा ना हुआ, ख़यानत की,
जुल्म किया जालिम की, ज़मानत ली।
सच में दिखाई वो सब अलामत थी,
यही वो निशानियां ए कयामत थी।
तब याद ना आई मुश्किल कुशा की,
क्या मुँह दिखाओगे पेशी में खुदा की।
09..इश्क.........
मेरे इश्क़ की पहचान सिर्फ इतनी सी है,
सिहरन से हाथ काँपते लब मुस्कुराते रहे।
रात को तन्हाइयाँ जज़्बात समझाते रहे
दिल की धड़कन में तेरे ख्याल आते रहे।
10. आजादी के..........
दास्तां लिख कर गए दीवाने आज़ादी के
सब लुटा कर घर गए दीवाने आज़ादी के।
भटकते दर-ब-दर गए दीवाने आज़ादी के
गए मर-मर कर गए दीवाने आज़ादी के।
जंजीर बंधी पिंजरों में कैद दीवाने हुए
जिंदा ख़्वाब कर गए दीवाने आज़ादी के।
जियें आज़ाद या मरना कुबूल किया
दिए भुला दिगर गए दीवाने आज़ादी के।
मरा जो क़ौम पे, उसे मिटा न सका कोई
याद में रह जिगर गए दीवाने आज़ादी के।
11. परचम.........
सदा ऊँचाइयों पर लहराता रहे
परचम-ए-हिन्द तुझे सैंकड़ों सलाम।
सदा गूंजे हर दिल में तेरा नाम
परचम ए हिंद .......।
बद नज़र उठी जब तुझ पर
उसी क्षण कर देंगे काम तमाम।
हमें रोक न सके कोई ताक़त,
परचम ए हिंद .........।
जिंदा रहे बावफ़ा वतन
मरते दम सब तेरे नाम।
हर साँस में बस गूंजे प्यार तेरा
परचम ए हिंद........... ।
हम निभाते दोस्ती फूलों की महक सी,
दुश्मनी अपनी नागिन का इंतकाम।
सदा रहे ये राहें साफ़ तेरे लिए,
परचम ए हिंद .............।
मेरा मुल्क मेरी ताक़त मेरा अभिमान,
मैं बुलबुल मेरा गुल गुलशन गुलफाम।
हर दिल में गूंजे तेरी जय-जयकार,
परचम ए हिंद ..............।
12. नया साल..........
कैसे दूँ खुश खबर नये साल की
सामने है सूरत मुल्क बदहाल की।
साए थे एक-दूजे के, अब दुश्मन हुए
खूं सना कफ़न, रकीब ने चाल की।
महकता चमन अब मर सा गया
रोती ग़मज़दा कली हर डाल की।
मन के अलावा कुछ और बात कर
अस्मत तार-तार हिन्द के भाल की।
मासूमों के लहू से सजी जीत हुई
गिन सके लाशें, तारीख साल की।
हुक्मरां जालिम, जुल्म की इंतहा
तबादला जाबिर, बात कमाल की।
13. दिवाली.....
श्रीराम के आने के दिन दिवाली हुई
ख़ुशी मनाने के दिन दिवाली हुई।
घर-घर दीप जलाने के दिन दिवाली हुई
फूल बरसाने के दिन दिवाली हुई।
हुए अवध के दिन रंगीन दिवाली हुई
आए दशरथ के जांनशीन दिवाली हुई।
मां कौशल्या भावभीन दिवाली हुई
नाबीना हुए मुबीन दिवाली हुई।
सरयू तट लहरा रहा जलाल से
जल गंगा का ताज़ा तरीन दिवाली हुई।
जिगर मनाएं दिवाली दिल से हम
अंधेरे हों पराधीन दिवाली हुई।
14. बेकार.......
राह तरक़्क़ी की बेकार लगी
आपकी यह बात नागवार लगी।
दारे तिब की तबियत बीमार रहे
स्कूल बंद के आवाम गंवार रहे।
काश्तकार तबाह खेत में पानी नहीं
महीनों से सुध उनकी ले आनी नहीं।
हर मोड़ पर बिक्री गाँजा,अमल शराब
नोजवानों को क्यों करते हो खराब।
कभी बरसे कभी नाराज इंद्र करे विरान
पेट काट दर-दर भटकता रहे किसान।
वो बड़े जो चौखट आपकी चूमते हैं
चोर लुटेरे डाकू संग घूमते हैं।
करना क्या है समझ नहीं पाते हो
इल्जाम सफाई से दूसरों पे लगाते हो।
हर दिन दलित पर जुल्म बढ़ रहे हैं
खुद दोष मढ़ने के बहाने ढूंढ रहे हैं।
नोजवानों को नोकरी का धोखा दिया
इसलिए सर आपको मौका दिया।
वादे थे बहाल पुरानी पेंशन के
हमें क्या मिला सिवा टेंशन के।
सड़क,स्कूल,हस्पताल सब बेहाल हैं
क्या लेना-देना इनको नेताजी निहाल हैं।
काम ना होंगे तो नाराज होगी आवाम
हर जमाअत में मचेगा कोहराम।
खून पसीने की कमाई खाने वाले भूखे
मरने को जगह नहीं आंसू भी सूखे।
बंगला साफ मजे ले रहे जिंदगी के
गांव शहर ढेर बन गये गन्दगी के।
कड़वी दवा का घूंट पी रहे हैं लोग
बारी के इंतज़ार में जी हैं लोग।
मुजरिम वजीर बेगुनाह जेल में।
सुकून मिलता इनको नफरती खेल में।
जनता बदहाल रोती जार-जार
लौट के आना बतायेंगे इस बार
आपके लिये गर्मी देखी ना जाड़ा।
काम आयें तो दिखाते हो बाड़ा।।
सियासत डर से नहीं काम से चलती है
समा रोशनी के लिए खुद जलती है।
हर अच्छे कदम पे साथ निभायेगें
गलत बात के खिलाफ लाठी खायेंगे।
वक़्त आया था आयेगा दूर नहीं
सब होश में हैं हम मगरूर नहीं।
यहां बस विकास की बात होती है
नया सवेरा होगा दिन की रात होती है।
लड़ेंगे जीतेंगे जंग यह हमारी है।
खूब लूटे अब नही जनता की बारी है।
15. ज़हर उगलते......
जहर उगलते साये इंसानी सियासत से
झूठ बोलते लोग सच बड़ी नफासत से।
किसी का रौब या बाजू का जोर चले
जम्हूरियत का वास्ता ना लियाकत से।
फाइल दफ्तर दाखिल जिनकी चलती
गरीब महरूम है हुआ इस नियामत से।
दर्द बांटने वाले अब दर्द की दवा करेंगे
इसे रहने दो फरामोश करो बलाग़त से।
जिगर इरफान शहर मुअजिज सजदे में
दाग सारे धो लिये खुदाई रियायत से।
16. क्यों.......
पैसे की चाह ने क्या क्योंकर बना दिया
कमसिन को बंधवा नोकर बना दिया।
तालीम शेबा ना रहा घर का मेरे
टीवी सिनेमा को मिम्बर बना दिया।
तड़पते लोगों को देख मज़ा ले रहे
खुदा ने इन्सां को पत्थर बना दिया।
ना हाथ का हुनर ना दीन रहा बाकी
ढाढ़ी-टोपी का हाल क्याकर बना दिया
जिनके न आने से महफ़िल बेहाल थी
अव्वल जो थे को आखिर बना दिया।
वक़्त आ गया अब दोस्तों सुनो
बदले माहौल जो सोकर बना दिया।
जन्नत उसकी जिसकी दुनिया मुकम्मल
तालीम ने खुल्द में घर बना दिया।
जिगर शुक्र खुदा का करने को बेकरार
खाक को ईमां का पेकर बना दिया।
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17. ऐसा मिले.......
महबूब मुझे कोई ऐसा मिले
अंदर और बाहर एक जैसा मिले।
शक्कर के बदले मिठाई मिले
प्यार का प्यार पैसे का पैसा मिले।
जिसने दर्द दिया उसे दर्द मिले
जैसा करे काम को तैसा मिले।
गले लगाने वाले को बांहे मिले
हो हमदर्द वो मसीहा ऐसा मिले
जिगर चिथड़े हो चुके जिस्म को
सील सके सुई और रेशा मिले
18. भुलाए नहीं जाते........
अफसाने भुलाए नहीं जाते।
इस कदर दीवाने सताए नहीं जाते।
पाबंदियां खुद पर आयद कर लीं
अंकुश इंसानों पे लगाए नहीं जाते।
डोर पतंग को बांध कर रखे
कटे पतंग घर लाए नहीं जाते।
मील के पत्थर फासला बताते
ये रास्ते के पत्थर हटाए नहीं जाते।
जिगर सोना खामोशी ओढ़ कर
थपकियों से सोए जगाए नहीं जाते।
19. सवाल.....
उर्दू का सवाल आप,हम और सियासत से
कोई जवाब है तो ज़रूर दें .....
मेरी ज़िंदगी क्यों है तबाह
आखिर मेरा गुनाह क्या
मेरे मोहसिन ज़रा बता
यूँ ज़िंदा ना मुझे जला
आखिर मेरा गुनाह क्या
पिघलती नहीं ये पीर क्यों
लगती नहीं अक्सीर क्यों
मक़तूल ही सब्बीर क्यों
मुझ से हुई खता है क्या
आखिर मेरा गुनाह क्या
में भी तेरे चमन का गुल
जैसे हैं बाग में बाकी कुल
गाता रहा नग़मा बुलबुल
रुककर तुमने सुना है क्या
आखिर मेरा गुनाह क्या
अफसोस में तुझ पे मरा
साबित रहा ना कभू डरा
अब है ये जो गला भरा
चलकर तुमने देखा है क्या
आखिर मेरा गुनाह क्या
तुम तीर आजमाते रहे
हम जिगर में लगाते रहे
तुम दूर जाते हम बुलाते रहे
बतादे मुझ से रुषवा है क्या
आखिर मेरा गुनाह क्या
20. देखे.........
समां संग फानूश जलते हमने देखे,
चलते गुमनाम सफ़ीर हमने देखे।
आजाद कैद में मचलते हमने देखे,
हाँ तख़्त-ए-शाह पज़ीर हमने देखे।
चरख पे सुराख सही दिखा न होगा,
देखीं ऐसी नादीद नज़ीर हमने देखे।
होगा सर के तले मगरूर देख लेना,
चमकते चेहरे मुनीर हमने देखे।
जिगर जो नैन कभी मिलते नहीं देखे,
वक्त पे वो शक्कर-ओ-शीऱ हमने देखे।
21. रूबाई.....
बदला ना सूरज है, चांद वही,
जंगल वही, वही शेर मांद वही।
वही नदी, नाले, वही बाँध वही,
कमज़र्फ बातों में सड़ांध वही।
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22. मचलती है........
तू एक खुश्बू सी साथ चलती है
देख देख के तमन्ना मचलती है।
बहर तरन्नुम साज मनक़बत गज़ल
कल्बी दरवाजे से ही निकलती है।
मुझ मेहमान ए दिल की आरजू
मोहसीन की आंख से निकलती है।
मुराद ए मोहब्बत किस ने नहीं की
यह फकीरी है जो रंग बदलती है।
जिगर अईन कवायद मांज़ूर नहीं
ताजीरात ए इश्क़ दिल से चलती है।
23. ये उम्मीद नहीं है.....
ग़म की घड़ी में आओगे ये उम्मीद नहीं हैतुम मुझ में समाओगे ये उम्मीद नहीं है।
खटकती है खबर तेरी उदासियों की
मुझे देख मुस्कुराओगे ये उम्मीद नहीं है।
बरसते अब्र में आंगन सूखा ही रहा
आंसुओं से नहाओगे ये उम्मीद नहीं है।
दर्द ही तो है हमने सहे तुमने दिए
ओर नहीं रुलाओगे ये उम्मीद नहीं है।
जिगर तुफैल रब का मैं शादमा ही रहा
आ के खुशी मनाओगे ये उम्मीद नहीं है।
24. हम जानते हैं.......
हम जानते हैं
जमाने की हक़ीक़त हम जानते हैं
इंसान की सिफत हम जानते हैं।
उकेरे हवा में अंगुली से किरदार
सच करने के तरीकत हम जानते हैं।
दो पल की हमारी तुम्हारी दास्तां
खलीफा की खलीफत हम जानते हैं।
उदासियां मुस्कुराने से बदनाम हुई
छुपी इसमें ज़ीनत हम जानते हैं।
जिगर समझ ज़िंदगी का फ़लसफ़ा
आजिज़ी से निस्बत हम जानते हैं।
25. मुकरने की आदत......
हसरतें बाकी रही कुछ कर गुजरने की
मुझे आदत तो नहीं बात से मुकरने की।
थोड़ा हौसला चंद उसूल कुछ काम
हालात ने रखी है शर्त यूं सुधरने की।
सुलगते सवाल और सूखा सा लहजा
दुआ तूफानो बर्क से पार उतरने की।
यहां वहां कहां कहां रेत सा तपता रहा
कोशिश चट्टान को दांत से कुतरने की।
सामना मुश्किल का जिंदगी तक जिगर
तार तार खुल कर बिखरने उधड़ने की।
26. हो जाता है.......
अपना कोई जब अंजान हो जाता है
जीना और भी आसान हो जाता है।
मुश्किल नहीं इम्तिहान हो जाता है
बेजा खुद परस्त इंसान हो जाता है।
आबदीदा को खामोशी ए साहिल पसंद
सुकून आराइशे सामान हो जाता है।
रहे ख्वाब अधूरे तेरे भी मेरे भी
फूल जब आजारे जान हो जाता है।
दबा के रखी बात दिल की दिल में
जिगर इश्तहार ए तूफान हो जाता है।
27. वफ़ा मुझसे.......
किरदार नुमायां हो वफ़ा मुझसे
बंदा कोई कभी न हो ख़फ़ा मुझसे।
अना मफाद की अब बात न हो
यह मिल्लत का क़र्ज़ हो अदा मुझसे।
यकीन की बस्ती में नामवरी रह जाये
सीने से लगा ले दिल लगा मुझसे।
मुक़्तदी निगाहें इमाम के क़ब्ल
कुबूल इमामत राज़ी हो खुदा मुझसे।
दरख़्त हूँ तो साया भी होगा
मिले सूरज बनके बड़ा मुझसे।
कर दुआ ए खैर कोई कुछ करे
मैं न करूं करे कोई दगा मुझसे।
जिगर दौर ए जामो- तेग जाता रहा
बता राज़े कलम हो पोशीदा मुझसे।
28. एकसे नहीं रहते.........
सदा के मौसम एकसे नहीं रहते
मौसम क्या हम एकसे नहीं रहते।
बदलना जिंदगी का कुदरती निज़ाम
जवानी के दमख़म एकसे नहीं रहते।
रहते हैं बाग़ में बुलबुल बहारों में
नाज़ ए निकहत हरदम एकसे नहीं रहते।
शहर थे कभी परवान पर उरूज पर
सुने सुने वो इरम एकसे नहीं रहते।
जिगर रूठते मनते यार बार बार
महबूब के करम एकसे नहीं रहते।
29. तो कोई बात नहीं.....
मेरी तुम सुनो ना सुनो तो कोई बात नहीं
मैने चुन लिया तुम चुनो तो कोई बात नहीं।
कनख़ियों से देख उठा जुल्फ की चादर
जाल फंसाने के बुनो तो कोई बात नहीं।
वो बात थी जो बातों के साथ चली गई
अब सर अपना धुनों तो कोई बात नहीं।
मुअल्लिम इल्मो हुनर की सफ़ ए अव्वल
लिखे-पढ़े को ना गुनो तो कोई बात नहीं।
मुनव्वर एक सूरज से सारी कायनात।
जिगर तारे लाख जनो तो कोई बात नहीं।
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30. क्यों .......
31. अहसास है....
ए जिंदगी कैसा तु अहसास है
कोई दूर हो के लगे मेरे पास है।
जमाना कहे पराये हैं लोग यहां
मैं कहता हूं जो है मेरा खास है।
31. देखते रह गए.....
खुद के सामने आईने हम देखते रह गए
गुमान थे निकले वहम देखते रह गए।
मुश्किल से बनते घर मजदूर की खातिर
खुदा के लिए देरो हरम देखते रह गए।
गुजरे और गुजरेंगे कई ज़माने फ़राग़त के
कमज़र्फ़ ज़ुल्मो सितम देखते रह गए।
बदले हुए दौर में आइने झूठ बोलते हैं
तब्दील औलादे आदम देखते रह गए।
जिगर शरफ निगहबान का सर ले लिया
बढ़ते गए लोह ए कदम देखते रह गए।
33. मत कीजिए......
संभालें खुद को हमारी बातें मत कीजिए
थोड़ी से शुरू करें सारी बातें मत कीजिए।
आजूर्दा कोई किसी का नहीं इस दौर में
बोलो मीठे बोल खारी बातें मत कीजिए।
नसीब लिखा बेमाता ने जो लिखना था
साफ-साफ कहें सरकारी बातें मत कीजिए।
छोटे आदमी हम सही छोटे नहीं विचारा
हल्के शब्द बोल के भारी बातें मत कीजिए।
दो पल सही हसीन ख्वाबों की रंगीनिया
बातों के लबादे इश्तिहारी बातें मत कीजिए
ना कीजिए बात चुभे कलेजे में तीर सी
ना करनी आए तो जारी बातें मत कीजिए।
जिगर हकीकत शहद नहीं नीम से खारी
हक़ीक़त कहिए दुलारी बातें मत कीजिए।
खुशी.....
इतनी खुशी से दिल मेरा घबरा गया
उसके मुस्कुराने से मैं शरमा गया।
आ गया वक्त मिलन का आ गया
मेरी आंखों में नशा सा छा गया।
उनके आने की खबर अखबार में
देख कर तश्वीर वो इतरा गया।
दौलतो दामन मेरा अहसास है
वो हुए मेरे मैं उनको भा गया।
जिगर खुश आगोश में हम यार की
बिछड़ने वालों को कोई मिला गया।
35. रूबाई....
हिज़्र के सालों साल बरस बीत जाती हैं
मिलने के लिए दो आंखे तरस जाती हैं।
वजूद के न होने का एहसास होता है
आहें दिल की मेरे तक अर्श जाती हैं।
36. सवालों में है.....
किताब सामने, तालिब ख्यालों में है
ख़ुद की तलाश, वजूद सवालों में है।
खुला बदन, नए दौर में नंगा सर
आज़ाद है कौन, कौन तालों में है।
फटी पेंट, कटा जूता, बदन बिखरा
फ़ैशन अजब नौनिहालों में है।
इश्क़ में घर को छोड़ गई बेटी
मदहोश बेटा पड़ा नालों में है।
लीव-इन का नया शगूफा आम
ख़ाविंद फँसा किसी के जालों में है।
घर पहले था सुकून का एहसास
बंटा - बंटा सा घिरा चालों में है।
समाज टूट गया, रिश्ते हैं तार-तार
तमन्ना जोड़ने की जिगर वालों में है।
37. मिकराज
जज़्बात अल्फाजों के मोहताज नहीं होते
आम हो जाएं वो राज नहीं होते।
बेपर पंछियों के परवाज़ नहीं होते
बिखरे लोगों के समाज नहीं होते।
अपनों से अपने नाराज़ नहीं होते।
बिन पंखुड़ि फूल उम्र दराज नहीं होते।
बड़े दिल वाले होते नहीं दिल से दूर
दूर होने वाले दिल नवाज़ नहीं होते।
जिगर जान लेती है हकीकत अक़्सर
दर्द ओ रंज ला इलाज नहीं होते।
38. बताया तुमने...
हमें अधजला चराग़ बताया तुमने
मैं खुद ही जला या जलाया तुमने
बर खिलाफ हर कदम उठाया तुमने
मिट्टी में कितनी बार मिलाया तुमने।
क़लम काग़ज़ पे घिसती रही ताउम्र
लिखी सब तहरीर को मिटाया तुमने
दिल नहीं दुखता तेरा यह देखकर
सोचिए वक्त किस लिए गंवाया तुमने।
ना पहले ना अब बोलने की आजादी
सवाल से पहले ही हमें डराया तुमने
शुक्रिया शामिल ए कुर्बा में शुमार का
पास अपने मसनद पे नहीं बैठाया तुमने।
जिगर कहते हैं लोग तुम दरी बिछाओ
मुद्दत से यही काम था बताया तुमने।
39. आते हैं..........
जो दूर से देख कर हंसी उड़ाते हैं
वही तो तुम्हे रास्ता गलत दिखाते हैं।
इतनी शिद्दत से देते हैं ज़ख्म लोग
मारे दर्द के दरख़्त सूख जाते हैं।
अपना हो कोई मुसाफिर तब बताना
आंखों में आंसू क्यों छलक आते हैं।
दरिया पी गया पर प्यास ना गई
कुछ हैं कि खून पी कर मुस्कुराते हैं।
जिगर कहे का घाव है ज़्यादा गहरा
हम ज़िला वतन इन्हें कब घर लाते हैं।
40. #भूल_जाओगे_तुम
कहते हो मुझ बिन तुम कुछ नहीं
वक़्फ़े पे ये इजाब भूल जाओगे तुम।
हुई जिंदाबाद सूली पे चढ़ने वाले की
बाद मारने के इंसाफ़ भूल जाओगे तुम।
नतीजों की खबर मिटने वालों को हुई
दफ़्न साथ ख्वाब भूल जाओगे तुम।
दरिया ने उखाड़ दिए लगाए दरख़्त
खेत की रेत का हिसाब भूल जाओगे तुम।
मरने के बाद हसर खुदा जाने
जीते जी अजाब भूल जाओगे तुम।
अदालत के फैसले सुन कर दलील
भारी गुनाहे किताब भूल जाओगे तुम।
जिगर अमीर माल से नहीं आमाल से
मुझे मेरे मरने के बाद भूल जाओगे तुम।
मुझ पे बीती कल रात की बात
उजड़ी साँसों, जज़्बात की बात।
आ रहा शहर से गाँव एक रात की बात
हुई अपनी मौत से मुलाक़ात की बात।
सड़क पे नचा रहे गाड़ियां नौजवां
दिल काँप उठा देख हालात की बात।
पूछा कि बताओ आपनी शिनाख़्त
भड़के बड़े, करने लगे सवालात की बात।
बोले, किसने तुम्हें डांटने का हक़ दिया
नापो ज़मीन या सुनोगे लात की बात।
कुछ डरा कुछ डराया बताया वालिदैन को,
किराये ले जाते थार में बरात की बात।
पहले भी यहाँ हादसे कितने गुजरें,
कह न सका बाप कौन जात की बात।
इतने में ट्रक थार स्कॉर्पियो टकराए
औलाद हुई चिथड़े सौगात की बात।
जिगर समझ ले ज़िंदगी खेल नहीं है
छोड़ पुरानी कर नई रिवायात की बात।
42.एक नसीहत...
मुखालिफ हालात समझदारी से काम लो
अपना या पराया गिरते को थाम लो।
किए सौदे के अदा पूरे दाम करो
बेची वो शे के पूरे-पूरे दाम लो।
बदले में गवाही के ना कुछ लेना तुम
अमीन रह कर खुदा का नाम लो।
काम वो करो कि कोई कहे वाह खूब
रस लो मीठा, गुठली से आम लो।
थोड़ी सी जिंदगी सर पे न इल्ज़ाम लो
जिगर झुके सर, मौत का जाम लो।
43. दोस्ती .......
गुजरे ना एक पल हाल बेहाल है
तेरे बगैर जीना क्या मरना मुहाल है।
यारी के आसमान के हम चांद तारे
बारे में अपने औरों के अजब ख्याल है।
दुनिया की मर्दुमशुमारी में फकत हम दो
करे कोई बराबरी क्या मजाल है।
बुरा वक्त आया गया आगे का नहीं पता
निभाई, निभाएंगे तलक विसाल है।
जिगर यारबास की जान दोस्त उसके
बिन यार के दिन लगता एक साल है।
44. मिलते हैं........
जंजीरों की खानक से बाजुओं को बल मिलते हैं।
इन तख्तों पर मौत के मुश्किलों के हल मिलते हैं।
मिलना गर तुम चाहो तो दरकार ए जरूरत
ढूंढने से सनम क्या ख़ुद अज़्वज़ल मिलते हैं।
मिलते हैं मुर्दे जन्नत में अहले खाना से खुद
बताते वहां जो किया के यां फ़ल मिलते हैं।
माहिरिन ने बनाया ताज़ कटवा के हाथ अपने
शाहजहां और मुमताज़ वहां बेकल मिलते हैं।
जिगर आफताब को थाम लिया आसमान ने
गोद में ज़मीन की सागर के जल मिलते हैं।
45. #चराग़.....
एक चराग से जमाने में उजाला कीजिए
शिकायत को दिल में न पाला कीजिए।
कुछ दबे कुचलों को संभाला कीजिए
एक ही मसला न रोज़ उछाला कीजिए।
दूर किनारे से पहले खुद को देखिए
यूं इल्ज़ाम लोगों पर न डाला कीजिए।
मन के कोने में सही, ग़ैरत जिंदा रखिए
जहां ज़रूरी आवाज़ निकाला कीजिए।
रहबरी का जुनून घर फूंकने जैसा
खुद उजड़ औरों को संभाला कीजिए।
जिगर न तैरें वसीलों के दम पे कश्तियां
वज़्न कंधों पर खुद के डाला कीजिए।
46. संभाला कीजिए .....
दुआ में याद रखना गर नाम याद नहीं
गुरबत किस्मत में है तो फरियाद नहीं।
कस्फे उल्फत ने दी दस्तक तेरे नाम पे
बन के आया साया, तेरा हमज़ाद नहीं।
नहीं ख़ून के दो रंग जो बांट दे हमको
मुझे चाहिए तुम, तेरी ज़ायदाद नहीं।
अंगार आंखों के आंसुओं से नहीं बुझते
गीली आँखें की सुने कोई रूदाद नहीं।
टूटते तारों से नहीं पुर आरजू होतीं
मुश्रिक बे यकीं को खुदा याद नहीं।
ज़ुर्म की सज़ा मुजरिम का ख़ात्मा नहीं
हर एक मुबनी किसी पे आज़ाद नहीं।
जिगर सजदे इब्लिश के हुए लामुफीद
सज्दे आदम खुदाई का तज़ाद नहीं।
47. ज़िद....
तुझे भूलने की ज़िद में खुद को खो दिया
लिखे खत फाड़ते हुए फफक के रो दिया।
गुजरे ज़माने का दर्द तुमने जो दिया
मिलने से कब्ल बीज जुदाई का बो दिया।
मांगा तुमने बदले में चाहत के जो कुछ
याद रखोगे मेरी दिलबरी ये लो दिया।
रुखसती के दिन हम शरीक ए महफ़िल
रोशन था दिल में मेरे बुझ गया वो दिया।
जिगर इश्क़ की दुनिया अजीब आशिक
एक कहे चुराया कहा दिल को दिया।
48. हूं मैं......
वक़्त को यूँ गुज़ारता हूँ मैं
रोज़ नई बाज़ी हारता हूँ मैं।
ख़्वाहिशें दिल की मारता हूँ मैं
एहसान सबके उतारता हूँ मैं।
सीने में छुपाए सारे ग़म अपने
अर्श को दिल में पुकारता हूँ मैं।
रेत के समंदर में भी है ज़िंदगी
कौड़ियों के साथ बुहारता हूँ मैं।
जिगर मुश्किलें हजारों यहां
मुर्दे गड़े नहीं उखाड़ता हूँ मैं।
49. मिजाज..
खो न जाना परदेशी रंगीन मिजाजों में
किसी ने बसाया है तुम्हें ख्वाबों में।
उखड़े पेड़ की जड़ें ज़मीन में रह गईं
कीकर सहरा में सिंघाड़े तालाबों में।
हम पैदाइशी अमीर शान ओ शौकत
उठना उमरा में बैठना नवाबों में।
दुनिया की कोई शे सिर्फ मीठी नहीं
फांस है बांस में और कांटे गुलाबों में।
जिगर ज़िद ने घर का बंटवारा किया
भाई ने किया रुस्वा खाना खराबों में।
50. देखता हूं मैं..
दो घोड़ों पे मत हो सवार देखना
मुश्किल है बड़ी दीवार देखना
कवाइश जो होती रहे लगातार
बेगुनाह को कहते गुनाहगार देखना
सूरत कोई बने जलन हो कम
सूर्यवंश की टूटी तलवार देखना।
एक सूरत दो सीरतें कई नाम
हुस्न-ए-सलूक का मिले तलबगार देखना
फतह शिकस्त नहीं कैफियत मेरी
हार कर लड़ूं दिलदार देखना।
झूठ की तरबियत सच के कफ़न पे
ले-दे कर छपा अख़बार देखना।
जिगर बात घर की दबी रहे घर में
फैल ना पाए सरे बाज़ार देखना।
51. #हूं_मैं....
सदा फ़हम की लगाता ग़ुफ़्तार मैं
जुड़ा साख से रिश्तों में गिरफ्तार हूं मैं।
मिलूं मुस्कुरा के बहार हूं मैं
आदमी गांव का गंवार हूं मैं।
बड़ा दिल साबित कदमो सीरत
नहीं हवा में ज़मीन पे सवार हूं मैं।
अहकामे अदल दो हो नहीं सकते
मुखालिफ नाइंसाफी के दीवार हूं मैं।
कब्ज़ रूह होनी एक दिन अपनी
तक जीने के मुंसिफ करार हूं मैं।
ग़म भूलने नहीं देते नींद से जगाते
हुस्ने कलीम हसीं यादगार हूं मैं।
जिगर बेख़िजा फसले बहार
गुलो गुलशन का नामदार हूं मैं।
52. निकल गया......
बेख़तर इम्तिहान से आगे निकल गया
मैं लाल निशान से आगे निकल गया।
दे दो चंद दुआ ए खैर मुझ गरीब को
मौत के सामान से आगे निकल गया।
पीछे से करता रहा तनकीद ज़माना
गीबत के मकान से आगे निकल गया।
नुक्स निकालो आदात में कुछ मेरी
गरज आसमान से आगे निकल गया।
दिल मोहब्बत जफ़ा वफ़ा का दौर गया
वक्त इन दास्तान से आगे निकल गया।
गरजे मुझ पर खाली अब्र बहुत से
मस्ती में शान से आगे निकल गया।
उनके फैसले मुखालिफ ए जिगर
कह दो जहान से आगे निकल गया।
53. कब
जान जा रही है आओगे कब
तुम मुझे अपना बनाओगे कब।
लगी रेत चेहरे पर धो आओगे मगर
कालिख कल्ब की मिटाओगे कब।
जिगर मिरातुल वजूद है अपना
साफ दिल है तो दिखाओगे कब।
हक़ तो यह है कि अदा ए हक़ हो पुर
शरीयत है यह तो निभाओगे कब।
नाराज़ भाई से भाई सलाम भी नहीं
ए मोमिन जन्नत में जाओगे कब।
बीमार की खातिर इमदाद की गई
तस्वीर अखबार में छुपाओगे कब।
जिगर मजबूरी के बख्त ना होना
बैठे हो खाली हाथ हिलाओगे कब।
54. है क्या....
बदामी आंख़ गमगीन लाल है क्या
डोरे लाल- लाल कोई जाल है क्या।
छोड़ फिक्र खुद की खुदा के लिए
उठा है भूखा, सोए मज़ाल है क्या।
उचक के कंधे जो इतराते हो तुम
उठती जवानी का कमाल है क्या।
समझ मुश्किल बाप की ए औलाद
ऊंच नीच का थोड़ा सा ख्याल है क्या।
दौड़ के पकड़ लो जाते वक्त को
गए को लौटा दो सवाल है क्या।
मुरीद का पीर पर यकीं बेअत के बाद
बीता दिन महीना और साल है क्या।
आज बड़े खुश फ़हम हो रहे जिगर
छेड़ा नया राग ठोकी ताल है क्या।
कुछ बातों के ज़ाहिर न होने में भलाई है
हर काम में माहिर न होने में भलाई है।
जादू से हर मुश्किल का हल नामुमकिन
मुद्दों के हल में साहिर न होने में भलाई है।
जुनूने जीत हराने का शोक नहीं अच्छा
चंद मामलों में काहिर न होने में भलाई है।
देखने में देहाती ये गमछे धोती वाले
सूट बूट वाले आहिर न होने में भलाई है।
जिगर नहीं अच्छा जो काम का नहीं
सोने के ताहिर न होने में भलाई है।
#काहिर - विजेता
#ज़ाहिर - सामने, #माहिर - विशेषज्ञ, #साहिर - जादूगर, #आहिर - ग्वाला
#ताहिर - शुद्ध
56. रहती थी.....
हम आहंगी चिनाबों में रहा करती थी
मलिके हुस्न नकाबों में रहा करती थी।
तस्वीर तेरी मेरे ख्वाबों में रहा करती थी
हर्फ सी सूरत किताबों में रहा करती थी।
वक्त ने सिकंदर कैस किसरा मिटा दिए
गुम अंधेरों में जो नवाबों में रहा करती थी।
आज हैं गर्त में हुनर और हौंसले उनके
कौम जो ऊंचे बाबों में रहा करती थी।
जिगर फिर गए दिन मेहनतकशां के
शाद हैं वो जो अज़ाबों में रहा करती थी।
#हम_आहंगी - तालमेल
#चेनाबों - दरिया ए चिनाब
#नकाब - घूंघट
#ख़्वाब - सपना
#मलिके - रानी
#हर्फ़ - अक्षर
#कैस_किसरा - अपने समय का विख्यात समाज
#नवाब - राजा
#गर्त - खाई, नीचे
#बाबों - दरवाजे
#मेहनतशां - मेहनती
#अज़ाब - पीड़ा, दुःख,सजा
56. है कोई...
जाता है कोई ....
ग़म ए नाशाद को मिटाता है कोई
आता है दुनिया में से जाता है कोई।
नहीं ठहरती मौत बमुकर्रर ए वक्त
खुदा से किया वादा निभाता है कोई।
सफेद कफन में लिपटा दाना ओ शाह
छोड़ कर फ़ानि जहां को जाता है कोई।
जो गया लौट के ना आयेगा दोबारा
दुनिया में आख़िरत सजाता है कोई।
जिगर अदालत ए बरजख अजब
बदल यहां किए का पाता है कोई।
#गम - दुख #नाशाद - दुःखी #बमुकर्रर - तय शुदा #दाना - बुद्धिमान #शाह - राजा #फ़ानि - नश्वर #आखिरत - परलोक #बरजख - परलोक #बदल - प्रतिफल
रेत....
बन के मिट्टी रेत में बिखर के जाओगे
मामला उसूल का वो कहां से लाओगे।
पत्थरों के ज़ख्म भर जाएंगे एक दिन
घाव रग ए जां साथ ले के जाओगे।
फिरते हो बात से मुनकिर के जैसे
जो दिया है वही तो ले के जाओगे।
मुसाफिर हो मालिक ए सराय नहीं
आंगन यह खाली कर के जाओगे।
ताक में बैठी मल्क उल मौत जिगर
दमे आखिर न धन ले के जाओगे।
#जिगर_चूरूवी
तुम यहां से गुजरे घर आए क्यों नहीं
रास्ते में पड़े पत्थर हटाए क्यों नहीं।
लिखे थे ख़त तुमने पढ़ाए क्यों नहीं
लिखे के जवाब भिजवाए क्यों नहीं।
मौका निकल जाए वो फिर ना मिले
हसरतों के दाग मिटाए क्यों नहीं।
सच कहना सुनना बोलना अच्छा
गलत को गलत बताया क्यों नहीं।
जिगर हमवार रास्ते कामयाबी के
रोके क़दम आगे बढ़ाए क्यों नहीं।
बहाने थे.....तुने कर लिए उतने जितने वहाने थे
यह सब तेरे मुझे भुलाने के बहाने थे।
खातिर में तेरी रही क्या कमी मेरी
जो दे छांव वही घर ही जलाने थे।
रह के मदहोश तुझे न भुलाया मैने
तू भूल गया मुझे इतने ही याराने थे।
सोच रहा शायद हम लौटके न आयेंगे
चूक गया जालिम जितने निशाने थे।
दूर चले अख्तर संग रोशन चराग
सूरज से निकले रोशन जमाने थे।
नजर का धोखा हमें कब तक रोकेगा
हिज्जे रवां हुए तेरे अफसाने थे।
जिगर कहो कोई ना गम करना
दिन सुहाना है वो मौसम सुहाने थे।
61. आहिस्ता से....
आहिस्ता से वक़्त निकल जाता है
बुढापा जवानी को निगल जाता है।
बदलाव ज़िन्दगी बदलते हैं सब
बढ़ती फिक्र में गुरुर पिघल जाता है।
रहनुमाई में शामिल चंद बेगैरत
बदले वक्त इंसाफ बदल जाता है।
पहलू में माशूक के गुजरते दिन
बदले नियत आंचल बदल जाता है।
नहीं जाता दाग दिल का जिगर
रस्सी जले पर नहीं बल जाता है।
62. डरता कौन है...
जान हो खतरे में तो ठहरता कौन है
अज्ल मुकर्रर मरने से डरता कौन है।
मेरे हुनर की कुछ दाद दे ए दुश्मन
मौत आती है वर्ना मरता कौन है।
महफिले ग़ैराँ में जिक्र होता होगा
दस्तरख्वाने नहूसत पे पसरता कौन है।
अलावा उनके बात को जी न करे
किया है वादा तो मुकरता कौन है।
नाइत्तेफाकी नामे अमल हरिक
दोधारी शमशीर पे गुजरता कौन है।
#जिगर_चूरूवी
*****
रहूं फंस के तेरे ज़ुल्फ़ ए जाल में
उम्र बीत गई एक इसी ख्याल में
कहते हैं लोग तू बेवफ़ा सनम
हो तुम बेदाग़ दाग हैं हिलाल में।
सोने की तलाश में गई सोने की उम्र
रातों को जागे दिन के मलाल में।
रोना नहीं हाल पे मेरे तुम जरा
आना के आए हो इंतेक़ाल में
मुश्किल है मुकरना सौदे से मेरा
उम्र गुजरी है उसने देखभाल में।
है इल्म का इल्हाम थोड़ा सा
जड़ से कटा दरख़्त एतदाल में
पूछ ना मेरा हाल क्या है यार
जिगर फंसा रहा इसी सवाल में।
64. ज़रूरी है.....
इंसान का समझदार रहना ज़रूरी है
क्या हर बात को कहना ज़रूरी है।
बंदिशों में नहीं रहते ख्वाबो ख्याल
मुखालिफ बहाव के बहना ज़रूरी है।
कल क्या हो कौन जाने हम हों ना हों
पुराने पुलों का ढहना जरूरी है।
परिंदों के घर जले जंगल की आग में
बाप के सर ओलाद का लहना ज़रूरी है।
आए को जाना है एक न एक दिन
ज़ेवर को ताव सहना ज़रूरी है।
#जिगर_चूरूवी
65.#याद रहते हैं....
परिंदों को आशियाने याद रहते हैं
दोस्तों को वो याराने याद रहते हैं।
खुद में खुश्बू के ज़माने याद रहते हैं
वो तेरे न आने के बहाने याद रहते हैं।
सरवरक ए दफ्तर बंद किए हमने
अन लिखे फसाने याद रहते हैं।
मैं पारसा नहीं के सब जानता
नग़्मे ताल और तराने याद रहते हैं।
जिगर लोग टूट चुके बिखरे हुए
कहे अल्फ़ाज़ के माने याद रहते हैं।
#जिगर_चूरूवी
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